हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

अकादमिक चिंतन की धुंध से परे: अलां बादिऊ

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/24/2018 06:07:00 PM


दुनिया के अग्रणी दार्शनिकों में से एक, फ्रांसीसी नाटककार और उपन्यासकार अलां बादिऊ का यह लेख रूसी क्रांति को याद करने की मौजूदा रणनीतियों के खिलाफ एक दखल है. यह दलील देती है कि रूसी क्रांति के मानक अकादमिक चिंतन से पैदा हुई धुंध को खत्म करके ही हम इसकी समकालीन वास्तविकता को समझने की शुरुआत कर सकते हैं. इसलिए यह 1917 की परिघटना को इंसानी इतिहास में रख कर देखता है और दिखाता है कि कैसे यह हमें यह सोचने में मदद करती है कि इस नजरिए से पूंजीवाद अतीत की एक चीज बन चुका है. अनुवाद: रेयाज उल हक

 

1917 की रूसी अक्तूबर क्रांति के बारे में

एक इंसानी जिंदगी की छोटी सी मुद्दत में यह देखना हमेशा ही प्रभावशाली होता है कि एक ऐतिहासिक घटना (इवेंट) अपनी उम्र को पहुंचे, उसे झुर्रियां पड़ें, उसका जिस्म सिकुड़ने लगे और फिर वह गुजर जाए. एक ऐतिहासिक घटना की मौत तब होती है जब करीब करीब पूरी इंसानियत उसे भूलने लग जाती है. जब अवाम के हजूम की जिंदगी को रोशन करने और उसे राह दिखाने के बजाए, वह घटना महज तारीख की खास स्कूली किताबों में ही दिखाई देने लगे, बल्कि उनमें भी दिखाई देना बंद हो जाए. वह मर चुकी घटना अभिलेखागारों की धूल में दफ्न हो जाए.

असल में मैं कह सकता हूं कि मैंने अपनी निजी जिंदगी में 1917 की अक्तूबर क्रांति को अगर मरते हुए नहीं देखा तो कम से कम से मौत के करीब पहुंचते हुए जरूर देखा है. आप कहेंगे: आप उतने युवा नहीं हैं और इससे भी बड़ी बात यह है कि आप क्रांति के बीस बरसों के बाद पैदा हुए. इसके बावजूद, इसकी एक खूबसूरत जिंदगी थी! और इसके अलावा, हर कोई हर जगह इसकी एक सौवीं सालगिरह की बातें कर रहा है.

मेरा जवाब यह होगा: असल में हर जगह यह सौवीं सालगिरह उस चीज को छुपाएगी और उसे समझने से चूक जाएगी, जो इस क्रांति का मूल मुद्दा थी, और जिसकी वजह से कम से कम पिछले साठ बरसों में यह यूरोप से लेकर लातीनी-अमेरिका, यूनान से लेकर चीन, दक्षिण अफ्रीका से लेकर इंडोनेशिया तक, दसियों लाख नौजवानों की हौसलाअफजाई करती आई है. और जिसकी वजह से इसी मुद्दत में, उसने हमारे थोड़े से असली मालिकों को, पूंजियों के मुट्ठी भर मालिकों के निजाम को भी उतना ही खौफजदा भी किया है और इसीलिए दुनिया भर में इसे अहम झटके खाने पड़े हैं जिससे इसकी राह दुश्वार हुई है.

यह सच है कि लोगों के जेहन और उनकी यादों में एक क्रांतिकारी घटना की मौत को मुमकिन बनाने के लिए असलियत को बदलना पड़ता है, उसे एक खूनी और घिनौनी दास्तान में बदल देना पड़ता है. एक क्रांति की मौत को इल्मी तोहमतों के जरिए अंजाम दिया जाता है. सही बात है कि लोग इसके बारे में बातें करते हैं, इसकी सौवीं सालगिरह मनाते हैं! लेकिन इल्म के जरियों को दी गई इस शर्त के मातहत कि इन सभी बातों का यही नतीजा होना चाहिए: क्रांति, फिर से कभी नहीं!

मैं यह याद करना चाहता हूं कि फ्रांसीसी क्रांति के साथ भी यही सब हो चुका है. इस क्रांति के नायकों, रॉब्सपियर, सां-जुस्त, कदन को दशकों तक तानाशाहों के रूप में, हत्यारों का लिबास पहने कड़वे और महत्वाकांक्षी लोगों के रूप में पेश किया गया. यहां तक कि मिशेले जैसे फ्रांसीसी क्रांति के ऐलानिया हिमायती की ख्वाहिश भी रॉब्सपियर को एक तानाशाह के रूप में पेश करने की थी.
यहां मुझे यह भी दर्ज करना चाहिए कि ऐसा करते हुए मिशेले ने एक ऐसी चीज ईजाद की, जिसका उसे पेटेंट करा लेना चाहिए था, क्योंकि कामयाब रही. आज, ‘तानाशाह’ (डिक्टेटर) शब्द तक एक ऐसी तलवार है जो किसी भी बहस को धकिया कर उसकी जगह ले लेती है. लेनिन, माओ, कास्त्रो, बल्कि वेनेसुएला में शावेज और हैती में आरिस्तिदे क्या हैं? तानाशाह. बात खत्म.

असल में ये कम्युनिस्ट इतिहासकारों की एक पूरी पीढ़ी थी, जिसके अगुवा अलबर्ट माथिएज थे, जिनकी बदौलत पिछली सदी के बीस के दशक के बाद फ्रांसीसी क्रांति को इसकी समतावादी और सार्वभौम अहमियत के साथ सचमुच में दोबारा एक नई जिंदगी मिली. इसलिए, 1917 की रूसी क्रांति की ही बदौलत भविष्य को जन्म देने वाली फ्रांसीसी क्रांति के बुनियादी पल के बारे में, 1792 और 1794 के बीच के मोंताना कन्वेन्शन के बारे में, एक दोबारा पैदा हुई जिंदादिली और जुझारू तरीके से सोचा जा सका.

इससे जाहिर होता है कि एक सच्ची क्रांति हमेशा ही अपने से पहले की क्रांतियों को नई जिंदगी देती है: रूसी क्रांति ने 1871 के पेरिस कम्यून में जान डाली थी, और रोब्सपियर कन्वेन्शन और यहां तक कि हैती में तुसैं-लोवेर्तर के साथ काले गुलामों की बगावत को और यहां तक कि 16वीं सदी की जर्मनी में टॉमस म्वेन्त्सर की रहनुमाई में किसानों की बगावत को और उससे भी पहले, रोमन साम्राज्य में लौटें तो स्पार्टाकस के नेतृत्व में ग्लैडिएटरों और गुलामों की बगावत को दोबारा जिंदा किया.

स्पार्टाकस, टॉमस म्वेन्त्सर, रॉब्सपियर, सां-जुस्त, तुसैं-लोवेर्तर, वर्लिन लिसागरे और कम्यून के हथियारबंद मेहनतकश: इतने सारे ‘तानाशाह’, जिनके माथे बेशक झूठी तोहमतें और बदनामियां मढ़ दी गईं और जिन्हें भुला दिया गया, और जिन्हें लेनिन, ट्रॉट्स्की या माओ त्से-तुंग जैसे तानाशाहों ने उनका असली रुतबा हासिल कराया: वे अवामी मुक्ति के नायक थे, वे बेपनाह तारीख की मंजिलें थे, जिनसे होकर इंसानियत सामूहिक खुदमख्तारी की राह पर आगे बढ़ी.

आज, यानी पिछले तीस या चालीस बरसों से, चीन में सांस्कृतिक क्रांति के अंत के बाद से, बल्कि 1976 में माओ की मौत के बाद से इस पूरी बेपनाह तारीख की बाकायदा मौत की तैयारियां की जा रही हैं. हालात ऐसे हैं कि इसकी ओर वापसी की चाहत भी नामुमकिन करार दी जा रही है. हर रोज हमें बताया जाता है कि अपने मालिकों को बेदखल कर देना और दुनिया भर में एक समतापरक वजूद के लिए काम करना एक आपराधिक खामखयाली है और एक खूनी तानाशाही की शैतानी ख्वाहिश है. रीढ़विहीन बुद्धिजीवियों की एक फौज ने, खास तौर से हमारे मुल्क फ्रांस में, एक प्रति-क्रांतिकारी चुगलखोरी में महारत हासिल कर ली है और पूंजीवादी और साम्राज्यी हुक्मरानी की मजबूत तरफदारी का हुनर पाया है. गैरबराबरी के निगहबान, और बेबस अवाम के, गरीबों के, खानाबदोश मेहनतकशों के उत्पीड़न के निगहबान लोग ही हर जगह हुक्मरान हैं, काबिज हैं. उन्होंने बराबरी के विचार को लेकर चलने वाली सारी सियासी हुक्मरानियों को एक खास पहचान देने के लिए ‘टोटलिटेरियन’ (सर्वसत्तात्मक) शब्द ईजाद किया है.

इस पर गौर किया जाना चाहिए कि 1917 की रूसी क्रांति हर वह चीज थी, जो उससे होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन वह टोटलिटेरियन हरगिज नहीं थी. वह बेशुमार रुझानों से वाकिफ थी, उसने नए-नए अंतर्विरोध खड़े किए, वह अलग-अलग तरह के बेशुमार लोगों को साथ लेकर आई और उन्हें एकजुट किया, महान बुद्धिजीवी, कारखानों के मजदूर, सुदूर टूंड्रा के किसान. बेरहम खानाजंगी और जोशो-खरोश से भरी सियासी बहसों में इसने 1917 से 1929 तक कम से कम बारह साल गुजारे. यह किसी टोटलिटेरियन टोटलिटी की निशानी तो हरगिज नहीं थी, बल्कि यह एक गैरमामूली तौर पर सक्रिय उथल-पुथल की निशानी थी, जो इसके बावजूद एक विचार की रोशनी में अंजाम दिया जा रहा था.
 

1917 की रूसी क्रांति को ‘तानाशाही’ और ‘टोटलिटेरियन’ शब्दों के जरिए समझने की न तो गलती की जा सकती है और न ही उसे भुलाया जा सकता है.

इस क्रांति के बारे में कुछ भी समझने के लिए, इस क्रांति के बारे में कही जाने वाली हर एक चीज को पूरी तरह भुलाना होगा. हमें उस बेहद लंबे इंसानी इतिहास में लौटना होगा, और यह दिखाना होगा कि क्यों और कैसे 1917 की रूसी क्रांति अपने आप में ही आने वाली इंसानियत की बुलंदी की एक निशानी है.

यही वजह है कि मैं, हमारी प्रजाति के बेइंतहा इंसानी इतिहास की एक छोटी सी कहानी से शुरुआत करना चाहता हूं, जो इंसानी जीव का इतिहास है, इस अजीबोगरीब और खतरनाक, होशियार  और खौफनाक जानवर का इतिहास जिसे इंसान कहा जाता है और यूनानी दार्शनिकों ने जिसके बारे में कहा था: बिना परों वाला एक दोपाया जानवर. ‘बिना परों वाला दोपाया जानवर’ क्यों? क्योंकि जमीन की सतह पर रहने वाले सारे भारी-भरकम जानवर चार पैरों वाले हैं, लेकिन इंसान दो पैरों वाला है. और सभी चिड़ियां दो पैरों वाली होती हैं, लेकिन उन सभी के पर होते हैं और इंसान के पर नहीं होते. इसलिए सिर्फ इंसान ही ऐसा जानवर है जिसके दो पैर हैं लेकिन पंख नहीं हैं. 1917 की रूसी अक्तूबर क्रांति को असल में बिना परों वाले दोपायों के एक अहम मजमे ने अंजाम दिया था.
 

इस जानवर की प्रजाति के बारे में, जो हम सभी हैं, और क्या कहने को रह जाता है, सिवाय इस ऐतिहासिक और बहुत बुरे तरीके से साफ हो चुकी बात के कि यह बिना परों का दो पैरों वाला एक जानवर है?

आइए सबसे पहले हम इस बात को दर्ज करें कि हमारे छोटे से और नाचीज ग्रह पर जीवन के आम इतिहास के लिहाज से यह असल में एक ताजा जीव है. अगर खुले दिल से हिसाब लगाया जाए तो यह दो लाख साल से ज्यादा पुराना नहीं है, जबकि जीवन के वजूद की परिघटना के बारे में अंदाजा है कि यह अपने आप में ही करोड़ों साल पुरानी है.

इस हालिया प्रजाति की सबसे आम खासियतें क्या हैं?

जैसा कि आप जानते हैं, एक प्रजाति की जैविक कसौटी यह होती है कि एक प्रजाति के मर्द और औरत के आपस में बनाए गए शारीरिक संबंधों से प्रजाति की नई औलादें पैदा हो सकती हैं. और हमारी प्रजाति की भी यह खासियत है. इंसानी प्रजाति के लिए अक्सर ही पक्के तौर पर इसकी तस्दीक हो चुकी है, चाहे उनका रंग कोई भी हो, वे कहीं के भी बाशिंदे हों, उनका कद, उनके विचार, उनके साथी का सामाजिक संगठन कोई भी हो. यह पहला नुक्ता है.

इसके आगे, दूसरा नुक्ता यह है कि इंसानी जीवन की मीयाद, जो एक और भौतिक कसौटी है, अगर बहुत दिल खोल कर अंदाजा लगाया जाए तब भी फिलहाल 130 बरसों से आगे जाती हुई नहीं दिखती. ये सारी बातें आप पहले से ही जानते हैं. लेकिन पहले से ही मालूम इन बातों से हमें दो बहुत ही सीधी-सादी बातें कहने की इजाजत मिल जाती है जो, मैं यकीन करता हूं कि सादगी के बावजूद बुनियादी बातें हैं, और अक्तूबर 1917 की रूसी क्रांति की हैसियत को साफ साफ तय करने में भी बुनियादी हैं.

पहली बात यह है कि अगर इंसानी प्रजाति के बारे में ऐसा कहा जा सकता है तो इंसानी जीव का इस धरती पर रोमांचक सफर (कॉस्मिक एडवेंचर) असल में छोटा है. इसलिए अपने बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल है, क्योंकि दो लाख साल भी एक व्यापक धुंध में ओझल दिखाई देते हैं, खास तौर से कमोबेश सौ बरसों की मीयाद की वजह से जो हमारे निजी सफर पर कड़ाई से पाबंदी लगा देती है.

लेकिन इसी के साथ इस मामूली बात को भी याद किया जाना चाहिए: जीवन के आलमी इतिहास के हवाले से देखें तो, ‘होमो सैपियंस’ प्रजाति – हमारा खुद को यह कहना आडंबर से भरपूर है - का वजूद बहुत ही खास और छोटी सी मुद्दत से है. इसलिए इस बात को रेखांकित किया जा सकता है कि शायद हमारा सफर अभी शुरू ही हुआ है, कि शायद हम इस खास सफर की शुरुआत में ही हैं. ऐसा इसलिए कि इंसान के सामूहिक वजूद के बनने के बारे में जो बातें हम कह सकते हैं और सोच सकते हैं, उसका एक पैमाना तय किया जा सके. डायनासोर बहुत खुशनुमा नहीं थे, कम से कम हमारी कसौटियों के हिसाब से, लेकिन हमारी प्रजाति के पैमाने से देखें तो उनका वजूद कहीं ज्यादा लंबा था. उनके वजूद की मुद्दत हजारों बरसों नहीं बल्कि करोड़ों बरसों में गिनी जाती है. जैसा हम जानते हैं उसके लिहाज से, इंसानियत खुद को एक तरह की जरा सी शुरुआत के रूप में ही पेश कर सकती है.

किसकी शुरुआत? आप जानते हैं कि फ्रांसीसी क्रांति के भागीदारों ने असल में खुद यह सोचा था कि वे ही शुरुआत हैं. सबूत: उन्होंने कैलेंडर बदल दिया. और इस नए कैलेंडर में पहला साल वह साल था जिसमें क्रांति ने फ्रांसीसी गणतंत्र कायम किया था. उनके लिए गणतंत्र, स्वतंत्रता, मैत्री, बराबरी, सदियों के निरंकुश शासन और अवाम की जिंदगियों की बदकिस्मती के बाद इंसानी प्रजाति की एक नई शुरुआत थी. और यह सिर्फ फ्रांस और फ्रांसीसी अवाम के लिए ही एक शुरुआत नहीं थी, बल्कि असल में पूरी की पूरी इंसानियत के लिए भी यह एक शुरुआत थी. इत्तेफाक से, 1793 के क्रांतिकारियों के लिए इंसानियत और फ्रांस में बहुत फर्क नहीं था. मिसाल के लिए 1793 के संविधान में यह ऐलान किया गया कि दुनिया में जो कोई भी एक यतीम का खयाल रखता है या एक बुजुर्ग आदमी का जिम्मा लेता है, उसे गणतंत्र का एक नागरिक माना जाना चाहिए. आपको पहले से ही इसका पुख्ता यकीन है कि क्रांति के साथ इंसानियत बदल जाती है, कि इसकी परिभाषा जस की तस नहीं रहती.

और रूसी क्रांति? इसने भी यही सोचा था कि इसने इंसानी प्रजाति के लिए एक नई मंजिल की बुनियाद रखी, एक कम्युनिस्ट मंजिल की, एक मंजिल जिसमें पूरी की पूरी इंसानियत अपने साझे मूल्यों के बारे में फैसला करेगी, मुल्कों और राष्ट्रों के पार जाकर खुद को संगठित करेगी. ‘कम्युनिज्म’ इस बात की तस्दीक है कि सारे इंसानों के लिए जो कुछ भी साझा है उसे हरदम हमारी सोच, कार्रवाई और संगठन का विषय होना चाहिए.

हमारी पहली बात इतनी भर ही है: शायद इंसानी प्रजाति ने अभी शुरुआत ही की है. और शायद ‘क्रांति’ के नाम से और खास तौर से ‘1917 की क्रांति’ के नाम से यह समझना चाहिए: शुरुआत, या इंसानी प्रजाति के इतिहास की दोबारा शुरुआत.
 

दूसरी बात यह है कि जैविक चरित्र के बारे में, प्रजातियों के पुनरुत्पादन के बारे में, सेक्सुएशन के बारे में, उनकी पैदाइश के बारे में एक निर्विवाद भौतिक स्तर मौजूद है, जहां कुछ मायनों में यह साबित हो चुका है कि हम सब बराबर हैं. शायद इस खास स्तर पर सभी बराबर हैं. लेकिन इस स्तर पर, जो वजूद में है और जो भौतिक रूप से काम कर रहा है. और फिर मौत का सवाल भी है, जो कमोबेश तयशुदा समय पर आता है.

सो, बात के खारिज होने के जोखिम के बिना यह कहा जा सकता है कि इस तरह इंसानियत की एक पहचान है. और अंतिम जायजे में, हमें कभी भी, और मैं जोर देकर कह रहा हूं कि कभी भी इंसानियत की इस पहचान के वजूद को नहीं भूलना चाहिए चाहे कुदरती तौर पर बेशुमार फर्क मौजूद हों, मसलन राष्ट्रों, सेक्स, संस्कृतियों और ऐतिहासिक भागीदारियों के फर्क, जिनकी पड़ताल हम दूसरे मामलों में करेंगे. इसके बावजूद इंसानियत की पहचान को बनाने वाला एक निर्विवाद खांचा मौजूद है. जब क्रांतिकारियों ने, और इसमें रूसी क्रांतिकारी भी शामिल हैं, यह गाया कि ‘द इंटरनेशनल इंसानी नस्ल को एकजुट करता है’ तो वे यही कह रहे थे कि इंसानी प्रजाति बुनियादी तौर पर एक ही है. मार्क्स यह बात कह चुके हैं: सर्वहारा, मजदूर, किसान, जिनसे इंसानियत की बहुसंख्या बनती है, उनका एक साझा नसीब होता है और उन्हें सोच और काम की एक साझी सरहद पर आकर मिलना चाहिए. उन्होंने बेरहमी के साथ कहा था: ‘सर्वहारा की कोई मातृभूमि नहीं होती’. इसका मतलब हमें यह समझना चाहिए: इंसानियत उनकी मातृभूमि है.

उन नौजवानों को तो यह बात अच्छी तरह समझ में आनी चाहिए जो माली से, सोमालिया से या बांग्लादेश या किसी और जगह से परदेशी बन कर कहीं और काम करने जाते हैं: जो समंदर को पार करके एक ऐसी जगह जाकर रहना चाहते हैं जहां उन्हें लगता है कि वे जिंदगी गुजार सकते हैं, जैसा वे अपने मुल्कों में रहते हुए नहीं कर सकते; जो सैकड़ों बार अपनी जान जोखिम में डालते हैं; जिन्हें धोखेबाज तस्करों को पैसे देने पड़ते हैं, जो तीन या दस अलग अलग मुल्कों को पार करते हैं, लीबिया, इटली, स्विटजरलैंड या स्लोवानिया, जर्मनी या हंगरी; जो तीन या चार भाषाएं जानते हैं; जो तीन या चार या दस नौकरियां करते हैं. हां, ये खानाबदोश सर्वहारा हैं और हर मुल्क उनकी मातृभूमि है. आज वे इंसानी दुनिया का दिल हैं, वे जानते हैं कि जहां कहीं भी इंसान मौजूद हैं वहां कैसे जीया जा सकता है. वे इसका सबूत हैं कि इंसानियत एक है, साझी है.

मैं एक और कम्युनिस्ट दलील पेश करूंगा. इसके सबूत भी मौजूद हैं कि इंसानियत की दिमागी काबिलियत एक ऐसी काबिलियत है जो एक जैसी है.

पक्के तौर पर इंसानियत के आज तक के इतिहास में, जो 12000 और 5000 बरसों के बीच का है, एक बुनियादी क्रांति हुई थी, जो इंसानी जीव के इतिहास की अब तक की सबसे अहम क्रांति थी. इसे नियोलिथिक क्रांति कहते हैं. उस समय मौजूद इंसानियत ने, जिसके 100,000 वर्ष के इतिहास से हम वाकिफ हैं, करीब हजार वर्ष मानी जाने वाली एक मुद्दत के दौरान घुमंतू खेती की खोज की, बरतनों में अनाज जमा करके रखने का तरीका खोजा, इस तरह परवरिश के लिए जरूरी चीजों की जरूरत से ज्यादा खेप को जमा करके रखने की गुंजाइश बनी, इस तरह इस अतिरिक्त पर पलने वाले लोगों का एक वर्ग वजूद में आया और जिसने उत्पादक कामों में अपनी सीधी भागीदारी से छुट्टी पा ली, इस तरह एक राज्य वजूद में आया, जिसको धातु के हथियार चलाने वालों की ताकत हासिल थी, इस तरह हाथ की लिखाई शुरू शुरू में मवेशीपालकों को गिनने और उन पर कर लगाने के लिए इस्तेमाल हुई. और इस संदर्भ में, हर किस्म की तकनीकी को बचाने, उसे फैलाने और उसमें तरक्की लाने का काम बहुत जानदार तरीके से आगे बढ़ा. हमने महान शहरों को जन्म लेते और जमीनी और समुद्री रास्तों से एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय कारोबार की शुरुआत को देखा है.

कुछ हजार साल पहले आए इस बदलाव के नजरिए से देखें तो कोई भी दूसरा बदलाव फिलहाल सचमुच में दोयम दर्जे का होगा क्योंकि एक लिहाज से हम अभी भी उन्हीं दायरों में बने हुए हैं जो इस जमाने में खींचे गए थे. उल्लेखनीय रूप से, प्रभुत्वशाली और फुरसतिया वर्गों का वजूद, एक निरंकुश राज्य का वजूद और पेशेवर सेनाओं का वजूद, राष्ट्रों के बीच युद्धों का वजूद, यह सब कुछ हमें शिकार करने वालों और जंगल से चीजें जुटा कर गुजर-बसर करने वालों के उस छोटे से समूह से अलग कायम करता है, जो पहले इंसानियत की नुमाइंदगी किया करते थे. हम नियोलिथिक लोग हैं.

लेकिन दिमागी काबिलियत के नजरिए से इस क्रांति का मतलब यह नहीं था कि हम नियोलिथिक क्रांति से पहले के इंसानों से बेहतर होंगे. हमें पैंतीस हजार साल पुराने शॉवे गुफाओं की पेंटिग्स को याद करना चाहिए, जो एक ऐसे जमाने की तस्वीरें हैं जब अधिक से अधिक इसकी संभावना है कि नियोलिथिक दौर से काफी पहले, शिकारियों-संग्राहकों का बस एक छोटा सा समूह ही मौजूद रहा होगा. महज इन पेंटिंग्स का वजूद ही इस बात की तस्दीक करता है कि इंसानी जीव की विचार करने की, सोचने की और कल्पनाएं करने की काबिलियत और साथ ही इसका तकनीकी हुनर जस का तस तब भी मौजूद था जैसा आज है.

इसलिए न सिर्फ जीववैज्ञानिक और भौतिक आधार पर इस इंसानी पहचान को, इसके रोमांचक सफर के आरपार, कबूल किया जाना चाहिए, बल्कि बिना किसी शक के उस चीज के आधार पर भी इसे कबूल किया जाना चाहिए जिसे दिमागी काबिलियत कहा जाता है. यह बुनियादी एकता, यह जैविक और जेहनी ‘एक जैसापन’ हमेशा ही उन सिद्धांतों की राह की बुनियादी रुकावट रहा है जिनके मुताबिक इंसानियत समान नहीं है, वे सिद्धांत जिनके मुताबिक बुनियादी तौर पर अलग उप जातियां मौजूद हैं जिन्हें आम तौर पर नस्लें कहा जाता है. जैसा आप जानते हैं, नस्लवादी जिनको उच्चतर नस्लें और कमतर नस्लें घोषित करते है, उन नस्लों के सदस्यों के बीच आपस में शादी की कौन कहे, यौन संबंधों तक से हमेशा ही खौफ खाते हैं और उन पर पाबंदी लगाते रहे हैं. उन्होंने ऐसे खौफनाक कानून बनाए, जिनके तहत कभी भी काले लोग गोरी औरतों तक नहीं पहुंच सकते या यहूदी उन औरतों तक नहीं पहुंच सकते, जिन्हें आर्य माना जाता है. इस तरह नस्ली धाराओं के इतिहास का जाना-पहचाना उत्पीड़न, इंसानियत की आदिम एकता के सबूतों को नकारने की कोशिश करता है, और जिसने इंसान-इंसान के बीच सामाजिक फर्क जैसे दूसरे फर्क भी पैदा कर दिए हैं. लोग अच्छी तरह जानते हैं कि आखिरकार एक प्रभुत्वशाली वर्ग की एक औरत को मजदूर वर्गों के एक आदमी के साथ शादी नहीं करनी चाहिए, उनके बीच यौन रिश्ता भी नहीं होना चाहिए, बच्चे तो और भी नहीं होने चाहिए. मालिकों को गुलाम प्रजातियों से औलादों को जन्म नहीं देना चाहिए, वगैरह वगैरह. दूसरी तरह से रखें तो, इन सबके बावजूद ऐसे लंबे जमाने भी आए हैं जिनमें प्रजातियों ने जब अपनी एकता की पुष्टि की तो इससे भरपूर सामाजिक उथल-पुथल पैदा हुई.

फ्रांसीसी क्रांति की लीक पर, रूसी क्रांति इंसानी प्रजातियों की समतापरक हुक्मरानी को हमेशा के लिए कायम करना चाहती थी.
 

लेकिन इसमें शक नहीं है कि आज सबसे बुनियादी नुक्ते का रिश्ता प्रभुत्वशाली सामाजिक संगठन से है. प्रभुत्वशाली, बल्कि असल में प्रभुत्वशाली से भी कहीं ज्यादा प्रभुत्वशाली सामाजिक संगठन जिसने इंसानी सफर की समग्रता को अपनी गिरफ्त में ले रखा है, जो दुनिया की सारी जगहों की समग्रता पर हावी है. इसे पूंजीवाद कहा जाता है, यह इसका खास नाम है और यह इंसानी प्रजातियों के बीच एकता के उसूल के भीतर गैरबराबरी के और इसीलिए पराएपन के शैतानी रूपों को पैदा करता है, वरना तो यह इस एकता पर भी सफलता के साथ अपना दावा ठोक सकता है.
 

इसके आंकड़े बहुत जाने-माने हैं, लेकिन अक्सर मैं उन्हें दोहराता हूं क्योंकि उनकी जानकारी रखना जरूरी है. असलियत में, इसको एक वाक्य में कहा जा सकता है: आज दुनिया में बहुत थोड़े से लोगों की हुकूमत अरबों लोगों को सीधी-सादी जिंदगी जीने की गुंजाइश से भी महरूम कर देती है, जो एक काम की तलाश में, अपने परिवार को पालने के लिए, दुनिया भर में भटकते फिर रहे हैं.
 

इसलिए शायद यही तथ्य सही है कि इंसानियत अभी अपने ऐतिहासिक वजूद की शुरुआत में ही है. इसलिए हमें यह समझना होगा कि व्यावहारिक मानवता के स्तर पर वास्तविक इंसानियत का फिलहाल जैसा संगठन प्रभुत्व में है, वह बेहद कमजोर है. अभी भी यह नियोलिथिक मानवता है, इसका मतलब यह है: अभी इंसानियत जो उपजाती है, यह जो काम करती है और जिस तरह से संगठित करती है, वह अपने सबसे अच्छे स्वरूप में भी इसकी सैद्धांतिक एकता के स्तर तक नहीं पहुंची है. शायद इंसानियत का ऐतिहासिक वजूद इस बात में निहित है कि सामूहिक वजूद के प्रयोग किए जाएं और उसे हासिल किया जाए, जो इसकी बुनियादी एकता के उसूलों की बुलंदी होगी. हो सकता है कि हम अभी ऐसे मुकाम पर हैं जो अभी अस्थायी हैं और इस परियोजना तक नहीं पहुंच पाए हैं.

सार्त्र ने एक बार कहा था कि अगर इंसानियत कम्युनिज्म को साकार करने में नाकाम साबित हुई – अगर मैं कह सकूं तो कहूंगा कि यह वह दौर था जब इस शब्द को लोग मासूमियत से इस्तेमाल किया करते थे – तो यह कहा जा सकता है कि इसके अंत के बाद इसमें दिलचस्पी या इसकी अहमियत चींटियों से ज्यादा नहीं रह जाएगी. साफ जाहिर है कि वे क्या कहना चाहते थे – चींटियों की ऊंच-नीच की सामूहिक अर्थव्यवस्था को तानाशाह संगठन का एक मॉडल माना जाता है; वे कहना चाहते थे कि अगर कोई इस विचार के साथ इंसानियत के इतिहास का जायजा ले कि इंसानियत को अपनी बुनियादी एकता के शिखर पर एक ऐसा सामाजिक संगठन तैयार करना चाहिए, और यह काम वह कर सकती है, जो सचेत रूप से इस बात की तस्दीक करे कि यह एक एकीकृत प्रजाति है, वे यह कहना चाहते थे कि इसमें पूरी तरह नाकामी बाकी बातों के अलावा इंसानियत को जानवरों के सांचे में वापस धकेल देगी, जो अभी भी बस अपने वजूद को बनाए रखने की जद्दोजहद के कायदे पर चल रहे हैं, जहां अलग अलग व्यक्ति मिल कर काम करते हैं लेकिन जीतता सबसे ताकतवर ही है.
 

आइए, इसको दूसरे तरह से कहते हैं. कोई सोच सकता है कि कि यह निश्चित है कि मौजूदा सदियों में, या अगर जरूरी हुआ तो आने वाली सहस्राब्दि में, नियोलिथिक क्रांति के बाद एक दूसरी क्रांति होनी ही चाहिए, जिसका पैमाना हम तय नहीं कर सकते. एक क्रांति जो अपनी अहमियत में नियोलिथिक क्रांति की बुलंदी होगी, लेकिन जो समाज के फौरी संगठन के वाजिब कायदे को इंसानियत की मौलिक एकता पर दोबारा कायम कर देगी. नियोलिथिक क्रांति ने इंसानियत को फैलाव के, वजूद के, टकरावों के और इल्म के जरिए मुहैया कराए थे जिसकी इसके पहले कोई मिसाल नहीं मिलती, लेकिन इसने गैरबराबरियों, ऊंच-नीच के वजूद का अंत नहीं किया था और न ही इसने हिंसा और ताकत के उन खाकों का अंत किया, जिसे वह इतने गैरमामूली पैमाने पर लेकर आई थी. न सिर्फ इसने इनका अंत ही नहीं किया, बल्कि इसने कई मायनों में उन्हें और गंभीर बना दिया. दूसरी क्रांति – इसे एक बड़े ही सामान्य अर्थ में परिभाषित करते हैं क्योंकि अगर मैं कहूं तो हम अभी पूर्व-राजनीतिक स्तर पर ही हैं – इंसानियत की एकता को, इसकी असंदिग्ध एकता को और इसकी अपनी नियति पर अपने अख्तियार को वापस बहाल करेगी. इंसानियत की एकता महज एक तथ्य नहीं रह जाएगी, यह कुछ मायनों में एक कायदा बन जाएगी, इंसानियत को अपनी वाजिब इंसानियत को कबूल करना होगा और उसे साकार करना होगा, न कि यह उसको फर्कों, गैरबराबरियों, राष्ट्रों, धर्मों, भाषाओं की व्यवस्थाओं के बिखरे हुए टुकड़ों के खाकों (फिगर्स) में बनाए रखेगी. दूसरी क्रांति दौलत और जिंदगी की शक्लों में गैरबराबरी की नीयत को खत्म कर देगी, जो इंसानियत की एकता के नजरिए से एक आपराधिक नीयत है.
 

यह कहा जा सकता है कि 1792-94 की फ्रांसीसी क्रांति के बाद से, असली बराबरी के मकसद से की जाने वाली कोशिशें नदारद नहीं रही हैं, वे लोकतंत्र, समाजवाद, कम्युनिज्म आदि अलग अलग नामों से चलती ही रही हैं. यह भी सोचा जा सकता है कि मौजूदा दौर में दुनिया के पैमाने पर मुट्ठी भर लोगों के एक समूह की हुक्मरानी की अस्थायी विजय इन कोशिशों के लिए एक धक्का है, लेकिन यह सोचा जा सकता है कि यह धक्का बहुत लंबे समय तक नहीं बना रहेगा और अगर इंसानियत की एकता के वजूद के पैमाने पर खड़े होकर देखा जाए तो इस धक्के से कुछ भी साबित नहीं होता. ऐसी एक समस्या अगले चुनावों से हल नहीं होती – उससे तो कुछ भी हल नहीं होता –, यह सदियों का एक पैमाना है. और असल में, फिलहाल हमारे पास इसके अलावा कहने को कुछ नहीं है कि ‘खैर हम नाकाम रहे, लेकिन चलो लड़ना जारी रखते हैं.’
 

लेकिन यह नुक्ता हमें अक्तूबर 17 की रूसी क्रांति पर करीबी से गौर करने की तरफ ले जाता है. यहां नाकामियां और नाकामियां हैं. इसलिए मेरी थीसिस यह है: रूसी क्रांति ने इतिहास में पहली बार यह दिखाया है कि जीतना मुमकिन है. यह बात हमेशा ही कही जा सकती है कि दीर्घकालिक नजरिए से देखें तो अंतिम दशकों में यह नाकाम रही. लेकिन यह हमारी यादों में फिर से जिंदा हुई और इसे होना ही चाहिए, भले ही जीत नहीं तो कम से कम जीत की संभावना ही जिंदा हुई. इसलिए कहेंगे कि रूसी क्रांति ने इंसानियत को अपने आप के साथ मेल-मिलाप करने की संभावना की संभावना को जाहिर किया.

लेकिन हम ठीक ठीक किस किस्म की जीत की बात कर रहे हैं?
 

ज्यादातर कुछ सदियों से गिनें तो बहुत हाल ही में राज्यों के आर्थिक आधार का सवाल सियासी बहस का केंद्र बना है. इससे यह बात समझी जा सकती है या दिखाई भी जा सकती है कि राज्य का (निजी सत्ता या लोकतंत्र के) चाहे जो चेहरा हो, उसके पीछे वही उत्पीड़नकारी और भेदभाव वाला सामाजिक संगठन अपनी जगह बना लेता है, जिसके सबसे अहम राज्यवादी (स्टेटिस्ट) फैसले अपार रूप से निजी संपत्ति की सुरक्षा से सरोकार रखते हैं, वे परिवारों में निजी संपत्ति के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में बढ़ते जाने से, और शैतानी गैरबराबरी को बरकरार रखने, और उन्हें कुदरती और अटल समझते हुए उन्हें कायम रखने से सरोकार रखते हैं.
 

हमारे मुल्क में, जो एक विशेषाधिकार वाला मुल्क है और जो अपने लोकतंत्र की शेखी बघारता रहता है, हम जानते हैं कि कुल दौलत के 50 फीसदी से ज्यादा पर कम से कम 10 फीसदी आबादी की मिल्कियत है! हम यह भी जानते हैं कि आधे से ज्यादा आबादी के पास असल में कुछ भी नहीं है. अगर दुनिया के पैमाने पर देखा जाए तो चीजें बदतर हालात में हैं: कुछ सौ लोगों के हाथ में जितनी दौलत है वह दूसरे तीन अरब लोगों लोगों की कुल दौलत के बराबर है. और दो अरब लोगों से ज्यादा लोगों के पास कुछ भी नहीं है.
 

जब निजी संपत्ति और इससे जुड़ी शैतानी गैर बराबरी का सवाल साफ हो गया, तो दूसरी व्यवस्था के लिए ऐसी क्रांतिकारी कोशिशें हुईं जो सिर्फ राजनीतिक सत्ता में दखल देना चाहती थीं. इन कोशिशों का मकसद पूरी सामाजिक दुनिया को बदलना था. उन्होंने एक सच्ची बराबरी को कायम करने का मकसद अपने सामने रखा. वे मजदूरों और किसानों, गरीबों, बदहाल लोगों और ठुकराए हुए लोगों को समाज की रहनुमाई देना चाहती थी. इन बगावतों के गीत को ‘इंटरनेशनल’ कहा गया. इसमें कहा गया: ‘हम कुछ भी नहीं है, चलो हम सब कुछ बन जाएं.’ इसमें कहा गया: ‘दुनिया की बुनियाद बदल जाएगी.’ पूरी की पूरी 19वीं सदी इस लीक पर चली कोशिशों की खून सनी नाकामियों से भरी हुई है. पेरिस के पत्थर बिछे रास्तों पर तीस हजार लाशों वाला पेरिस कम्यून, इन सभी तबाहियों में सबसे शानदार रहा. इसने ‘कम्यून’ के नाम से एक बराबरी वाली सत्ता की खोज की. लेकिन कुछ हफ्तों के भीतर ही, केंद्रीय हुकूमत की फौज पेरिस में दाखिल हुई और शहर के लोकप्रिय मुहल्लों के तीखे प्रतिरोध के बावजूद, उसने बागी मजदूरों का बेरहमी से कत्लेआम किया और लाखों बागियों को बंदी बना लिया या फिर देशनिकाला दे दिया. नाकामियों ने, जनाजों का सिलसिला जारी रखा.

यही वह मोड़ है, जहां हमें यह बात याद करनी है: जब रूसी क्रांति ने पेरिस कम्यून की उम्र पार कर ली, तो उसके अगले दिन क्रांति के रहनुमा लेनिन बर्फ पर नाच उठे थे. उन्हें इस बात का अहसास था कि चाहे कितनी ही खौफनाक मुश्किलें आएं, लेकिन नाकामी का दाग मिट गया था!

हुआ क्या था?

पहली बात, 1914-15 में रूस के निरंकुश केंद्रीय राज्य की ताकत अहम रूप से कमजोर हुई थी, जो बेवकूफी में 14-18 के महायुद्ध में शामिल हो गया था. फरवरी 1917 में, एक क्लासिक जनवादी क्रांति ने राज्य को जमींदोज कर दिया. इसमें कोई नई बात नहीं थी: फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी ने सरकार के चुनावों के प्रावधान वाला संसदीय शासन पहले ही कायम कर लिया था. एक मायने में जमींदारों की कुलीन ताकत वाली जार की तानाशाही अपने समय से काफी पीछे चल रही थी. लेकिन आंदोलन इस जनवादी क्रांति पर ही नहीं ठहरा. रूस में ऐसे बेहद सक्रिय क्रांतिकारी बौद्धिक समूह बरसों से रहे हैं, जिनकी निगाह पश्चिमी लोकतंत्र की सीधे सीधे नकल से आगे तक जाती है. एक युवा मजदूर वर्ग तैयार हो रहा है, जिसमें क्रांति के प्रति झुकाव है और जिसके ऊपर रूढ़िवादी मजदूर संघों की निगरानी नहीं है. बेइंतहा गरीब और सताए हुए किसानों का एक हुजूम है. जंग की वजह से लाखों फौजी और हथियारबंद जहाजी मौजूद हैं जो जंग से नफरत करते हैं जिसके बारे में उनकी वाजिब सोच है कि यह जर्मनों जैसे कमतर साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की तुलना में सबसे बढ़ कर फ्रांस और ग्रेट ब्रिटेन जैसे साम्राज्यवादी हितों की सेवा कर रही है. और आखिरकार एक जिंदादिल, पुख्ता क्रांतिकारी पार्टी है, जो मजदूरों के साथ करीबी से जुड़ी हुई है. इस पार्टी को बोल्शेविक पार्टी कहा जाता है. यह बहसों में जानदार होने के साथ साथ बाकियों के मुकाबले कहीं ज्यादा अनुशासित और सक्रिय है. इसकी रहनुमाई में हम लेनिन और ट्रॉट्स्की जैसे लोगों को पाते हैं, जो लोग एक मजबूत मार्क्सवादी संस्कृति और लंबे मिलिटेंट अनुभवों का मेल हैं और जो पेरिस कम्यून के सबकों से बखूबी वाकिफ हैं. और सबसे आखिर में और सबसे ऊपर हैं स्थानीय लोकप्रिय संगठन जो हर जगह, बड़े शहरों में, कारखानों में बनाए गए और जिन्होंने पहली क्रांति के आंदोलन को खड़ा किया था लेकिन अपने मकसद के साथ जो आखिर में इस मांग पर लौटा कि सत्ता को, फैसला करने के अधिकार को, सभाओं को सौंपा जाए न कि एक सुदूर बैठी, घबराई हुई सरकार के पास सत्ता बनी रहे, जो अभी भी पुरानी रूसी दुनिया को बचा कर रखे हुए थी. इन संगठनों को सोवियत कहा गया. बोल्शेविकों की अनुशासित ताकत और सोवियत कही जाने वाली व्यापक-जनवाद की सभाओं का मेल ही 1917 के पतझड़ में हुई दूसरी क्रांति की चाबी थी.

इंसानियत के इतिहास के इस पल में अनोखी बात थी एक क्रांति का बदलाव, जिसका मकसद सिर्फ एक सियासी हुकूमत को बदलना था, राज्य के स्वरूप को बदलना था, लेकिन जो एक बिल्कुल ही अलग क्रांति में बदल गई जिसका मकसद बन गया पूरे समाज के संगठन को बदलना, मुट्ठी भर लोगों की अर्थव्यवस्था को बदलना. उसका मकसद बन गया कि कुछेक लोगों की निजी संपत्ति के हाथ में औद्योगिक और खेतिहर उत्पादन को नहीं छोड़ा जाए, बल्कि इसे उन सभी लोगों के प्रशासनिक फैसलों के ऊपर छोड़ा जाए, जो काम करते हैं, मेहनत करते हैं.

इसे जरूर देखा जाना चाहिए कि इस परियोजना की चाहत पेश की गई और इसे संगठित किया गया, जो रूसी क्रांति, सत्ता पर कब्जे, गृह युद्ध, घेराबंदी, विदेशी दखल के भयानक तूफान में एक सचमुच की चीज बन जाने वाली थी. इन सबका सामान्य विचार सफल हो सका, क्योंकि इसे निश्चित रूप से बोल्शेविक पार्टी की बहुसंख्या के बीच में, लेकिन 1917 की गर्मियों का अंत आते आते सोवियतों की बहुसंख्या में और उल्लेखनीय रूप से सबसे उल्लेखनीय राजधानी पेत्रोग्राद की सोवियत में एक बेहद सचेत और उत्साही अंदाज में पेश किया गया था.

सबसे जबरदस्त मिसाल 1917 के बसंत के एक सामान्य कार्यक्रम में निहित है, जिसे लेनिन ने पार्टी में प्रचारित किया ताकि देश में हर जगह बहस खड़ी की जा सके. इस कार्यक्रम के सभी घटक, भावी फैसलों के इस समूह के सभी घटक, असल में नियोलिथिक दौर के बाद से वजूद में रही हर चीज में संपूर्ण और वैश्विक क्रांति के विचार पर केंद्रित थे. (देखें अप्रैल थीसिस).

इन आधारों पर, और रूस के खास हालात से जुड़ी भारी-भरकम मुश्किलों के पार अक्तूबर 17 की शुरुआत में पूरे इंसानी इतिहास में नियोलिथिक क्रांति के बाद की पहली जीत हुई. इसका मतलब एक ऐसी क्रांति से है जो एक ऐसी सत्ता को कायम करती है जिसका घोषित मकसद उन सभी समाजों की युगों पुरानी बुनियादों को पूरी तरह हिला देना था, जो खुद को ‘आधुनिक’ मानते हैं: यानी उन सभी लोगों की एक छुपी हुई तानाशाही का अंत जिनका उत्पादन और विनिमय के वित्तीय नक्शों पर मालिकाना है. एक क्रांति जिसने नई आधुनिकता की बुनियादों को आजाद किया. इस बेइंतहा महानता का सामान्य नाम ‘कम्युनिज्म’ रहा है और मेरी समझ से यह अभी भी सच है. यही वह नाम है जिसके साए तले दुनिया भर में लाखों लोगों को, हर किस्म के लोगों को, मजदूरों और किसानों के लोकप्रिय हुजूम से लेकर बुद्धिजीवियों और कलाकारों तक को, उत्साह के साथ कबूल किया गया और उनका स्वागत किया गया, जो उस प्रतिशोध के बराबर है जो पिछली सदी की बेपनाह नाकामियों के बाद इसने कायम किया. अब लेनिन यह कह पाने के लायक हुए कि जीतने वाली क्रांतियों का जमाना आ गया है.
 

यकीनन तीस के दशक की शुरुआत से जो कुछ हुआ, उनकी रोशनी में इस पर विचार किया जा सकता है, जिसकी शुरुआत अनोखे रूप से 1929 में स्तालिन के निर्मम नेतृत्व में हुई, पंच वर्षीय परियोजना और ‘सारी सत्ता सोवियतों के हाथ में’ से लेकर हम ‘सारी सत्ता कम्युनिस्ट पार्टी और राज्य के मुकम्मल घालमेल के हाथ में’ तक पहुंचते हैं और इस तरह सोवियतों की सत्ता का अंत हो जाता है.

लेकिन इस अभूतपूर्व रोमांचक सफर में इन बदलावों का जो कुछ भी हुआ हो, और मौजूदा हालात जो कुछ भी रहे हों, जिनमें समकालीन नियोलिथिक गिरोह पूरी दुनिया का शासक बना हुआ है, हम जान सकते हैं कि हम कामयाबी के साथ नियोलिथिक दुनिया के आगे भी जा सकते हैं. कि ऐसी एक दुनिया वजूद में आ सकती है, रह सकती है और इसीलिए उसे रहना ही चाहिए. और यह कि आखिरकार मौजूदा दुनियावी हुक्मरानी बिना हितों या भविष्य वाली महज एक कतरन कभी नहीं रही है. इंसानियत के वजूद में आने के वक्त के पैमाने पर और वक्ती तौर पर इस इंसानियत की शक्ल चाहे जो, अक्तूबर 1917 की कम्युनिस्ट क्रांति एक ऐसी चीज बनी हुई है, जिसकी बदौलत हम जानते हैं कि अभी जो पूंजीवाद हुकूमत पर काबिज है, वह हमेशा के लिए अतीत की एक चीज बन चुका है.

भीमा-कोरेगांव: मिथक, रूपक और अभियान

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/24/2018 05:57:00 PM


भीमा-कोरेगांव पर बहस के संदर्भ में आनंद तेलतुंबड़े का स्तंभ. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह मनाने के लिए जस्टिस बीपी सावंत की अध्यक्षता में 31 दिसंबर को पुणे में दलितों, ओबीसी, मुस्लिमों और मराठा संगठनों द्वारा एक साथ मिल कर बुलाए गए यलगार कॉन्फ्रेंस की पूर्व संध्या पर मैंने द वायर में एक लेख लिखा था ‘द मिथ ऑफ भीमा-कोरेगांव रीइन्फोर्सेज द आइडेंटिटीज इट सीक्स टू ट्रान्सेंड’.[1] यह कॉन्फ्रेंस (जिसके संयोजकों में से एक मैं भी था) मौजूदा सत्ताधारी हिंदुत्व गिरोह की प्रतिक्रियावादी जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ था. इसके लिए एक महीने से ज्यादा चलने वाले अभियान के बावजूद, नागपुर, शिरूर और मुंबई से आयोजन स्थल शनिवारवाड़ा तक पहुंचने वाले लॉन्ग मार्चों में, मुझे बताया गया कि, सिर्फ 30-35 लोगों ने ही भागीदारी की. लॉन्ग मार्चों में सिर्फ 30-35 लोग ही क्यों शामिल हुए जबकि 1 जनवरी को भीमा-कोरेगांव में आने वालों की तादाद लाखों की होने वाली थी? यह देखना निराशाजनक था कि ‘नई पेशवाई’ से लड़ने के लिए लोगों को तैयार करने वाले सम्मेलन का नतीजा बस शायद यह निकले कि उससे भीमा-कोरेगांव में स्तंभ पर पहले से ही जुटने वाली भारी भीड़ में कुछ लाख लोग और बढ़ जाएं. सिर्फ बाबासाहेब आंबेडकर के साथ इसके जुड़ाव की वजह से ही, जिन्हें सीमित करके दलितों ने अपनी पहचान की निशानी बना कर रख दिया है, भीमा-कोरेगांव पर और ऐसी ही दूसरी जगहों पर हाल के बरसों में दलितों की भीड़ में इजाफा हुआ है.

इस लेख पर उग्र प्रतिक्रियाएं आईं, इनमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं शामिल हैं. सकारात्मक प्रतिक्रियाएं देश भर के प्रगतिशील दायरों से आईं, और नकारात्मक प्रतिक्रियाएं दिलचस्प तौर पर दलितों और हिंदुत्ववादी दकियानूस लोगों की तरफ से आईं जो ज्यादातर नाराजगी और दुर्व्यवहार से भरी हुई थीं. दलितों ने आमतौर पर ‘मिथक’ वाले हिस्से को पकड़ा[2], अपने दिल को तसल्ली देने के लिए मनमाने तरीके से उसे तोड़ा-मरोड़ा और इस तरह की अफवाहें फैला कर लोगों की भावनाएं भड़काने की कोशिश की कि यह आंबेडकर के खिलाफ था. यहां तक कि कांचा इलैया शेफर्ड जैसे विद्वान भी मेरी कही हुई बात को तोड़ने-मरोड़ने के इस शोर-शराबे में शामिल हो गए ताकि मुझे बदनाम कर सकें. मिसाल के लिए, उन्होंने लिखा, ‘आनंद तेलतुंबड़े, जो यह मानते हैं कि महार सैनिकों ने राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए अपनी जान नहीं दी’ जबकि मैंने साफ-साफ इसकी उल्टी बात लिखी थी: ‘ऐतिहासिक तथ्यों को एक ना-मौजूद राष्ट्र के चश्मे से देखना उतना ही निंदनीय है.’(3) लेख में पेश किए गए तथ्यों के लिहाज से एक भी चीज ऐसी नहीं थी जिस पर उंगली उठाई जा सके, लेकिन जब जुनून सिर चढ़ कर बोल रहा हो तो तर्क की कोई नहीं सुनता.
 

मिथकों के पीछे की सच्चाई
  
इस पर कोई मतभेद नहीं है कि भीमा-कोरेगांव में खड़ा स्तंभ महार सैनिकों के शौर्य की निशानी है, बल्कि इसके भी आगे कहें तो ये ज्यादातर दलित सैनिक ही थे जिन्होंने ब्रिटिशों को उनका साम्राज्य जीत कर दिया.(4) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की अनेक लड़ाइयों में सांकेतिक रूप से खास 1757 की पलासी की पहली लड़ाई से लेकर 1818 की भीमा कोरेगांव की आखिरी लड़ाई तक, दलित सैनिकों ने उनमें जीत हासिल करने में इंतहाई बड़ी भूमिका अदा की थी. जब अहसानफरामोश ब्रिटिशों ने यह बहाना बनाते हुए 1892 में दलितों की भर्ती बंद कर दी कि वे लड़ाकू नस्ल नहीं थे, तो दलित इससे नाराज हुए और उन्होंने वापस अपनी बहाली की मांग की. इसका नेतृत्व दलित आंदोलन के रहनुमाओं जैसे गोपाल बाबा वालंगकार, शिवराम जनबा कांबले ने किया और उनमें बाबासाहेब आंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी आंबेडकर थे, जिन्होंने लड़ाकू नस्ल होने के अपने दावे के लिए वाजिब ही कोरेगांव स्तंभ की गवाही का इस्तेमाल किया.

लेकिन इस बात का संकेत देना एक मिथक है कि महारों ने कोरेगांव की लड़ाई को पेशवाओं द्वारा अपने अपमान का बदला लेने के लिए जीता था. बाबासाहेब आंबेडकर ने 119 साल बाद 1 जनवरी 1927 को पहली बार इस स्तंभ का दौरा किया और कहते हैं कि इसके बाद वे कई बार वहां गए. उन्होंने इसका इस्तेमाल महारों को प्रेरित करने के लिए किया कि वे ब्राह्मणवाद के खिलाफ वैसी ही लड़ाई लड़ें जैसा उनके पुरखों ने पेशवाओं के खिलाफ लड़ी थी.(5) महाड सम्मेलन में उन्होंने यह बताते हुए कि उनके पुरखे कितने ज्ञानी लोग थे, उनको अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रेरित करने की कोशिश की. आगे चल कर उन्हें जातीय पहचान की सीमाओं का अहसास हुआ और उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के तहत अपने आह्वान को व्यापक बनाते हुए मजदूरों और किसानों तक उसका विस्तार किया, जिसके भीतर दलित भी आते थे. इसके पहले और इसके बाद भी भीमा-कोरेगांव भुला दिया गया था और 1990 के दशक तक ऐसा ही रहा, जब दलित वहां जमा होने शुरू हुए - ये तथ्य अपने आप में ही दलितों द्वारा इसका मतलब लगाए जाने और दलित विद्वानों द्वारा इसके बारे में बुने जाने वाले सिद्धांतों की कहानी कहते हैं. जिन बाबासाहेब आंबेडकर की समाधि की जगह पर एक छोटा सा ढांचा भी नहीं था जब तक कि उनके बेटे ने 1967 में मौजूदा स्तूप का निर्माण नहीं कराया, या फिर अन्य मांगों के अलावा जिनकी तस्वीर संसद के हॉल में लगाने के लिए दलितों को 1965 में एक व्यापक जेल भरो अभियान चलाना पड़ा था, वही आंबेडकर 1960 के दशक के आखिरी दौर में एक अहम प्रतीक बन गए. इसकी वजह समझना मुश्किल नहीं है. चुनावी राजनीति में लगातार प्रतिद्वंद्विता तेज होती जा रही थी, क्योंकि उत्तर-औपनिवेशिक राजनीतिक अर्थव्यवस्था ने जातियों के ढांचे में सबसे ज्यादा आबादी वाली शूद्र जातियों में जो एक ग्रामीण धनी तबका पैदा किया था, उनकी क्षेत्रीय पार्टियां उभरने लगी थीं. इन हालात में शासक वर्गों ने बड़ी महारत से आंबेडकर को एक प्रतीक में ढाल दिया, ताकि दलितों को लुभाया जा सके जो अपने आंदोलन की शिकस्त के बाद अतीत के प्रति मोह के साथ आंबेडकर को भक्ति-भाव से देखने लगे थे. 1960 के दशक के आखिरी दौर तक जिस चैत्य भूमि पर उनके परिजनों समेत महज कुछ सौ लोग 6 दिसंबर को उन्हें याद करने के लिए जमा होते थे, वहां आज जमा होने वाले लोगों की तादाद बीस लाख के पार चली जाती है. आंबेडकर के बाद बढ़ती हुई तादाद में स्मारकों पर जमा होने वाले लोगों की तादाद में इजाफा, पहचान के उस जुनून की अभिव्यक्ति है, जिसे समकालीन राजनीतिक बदलावों ने जन्म दिया है.
 

पेशवाई का रूपक 

1990 के दशक से अब तक भीमा-कोरेगांव पर बिना किसी दिक्कत के लोग जुटते रहे हैं. फिर इस साल यह घटना क्यों घटी? जवाब इस बात में है कि ‘नई पेशवाई’ के खिलाफ इसका नारा जिन ताकतों ने पेश दिया वे दलितों, मुसलमानों, ओबीसी और मराठाओं के एक साथ एक जगह आने का एक झलक देते हैं. महाराष्ट्र में यह बदलाव सत्ताधारी भाजपा के लिए खतरनाक हो सकता है, खास कर ऐसे समय में जब चुनाव नजदीक आ रहे हैं. पिछले साल राज्य को जिस मराठा आंदोलन ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था, वह राजनीतिक रूप से उलझन का शिकार था, क्योंकि भले ही इसे एक राजनीतिक दल ने उकसाया था, मगर वह दल इसके फायदे को अपने प्रतिद्वंद्वी दलों की झोली में जाने से रोक नहीं सका, साथ ही वह दलितों और ओबीसी के बीच अलगाव को भी नहीं रोक पाया. मराठाओं ने तय किया कि वे सत्ताधारी ब्राह्मणवादी भाजपा को निशाना बनाने के लिए दलितों से दोस्ती करेंगे. इस नई नई एकता को तोड़ने के लिए हिंदुत्व ताकतों ने शंभाजी भिडे और मिलिंग एकबोटे जैसे उकसावेबाजों को लगाया ताकि पास के वाडु बुडरूक गांव में संभाजी स्मारक के मुद्दे पर मराठाओं को दलितों के खिलाफ खड़ा किया जा सके. उन्होंने यह इतिहास का यह झूठ गढ़ा कि संभाजी के शव का अंतिम संस्कार गोविंद महार ने नहीं बल्कि एक मराठा परिवार ने किया था. 28 दिसंबर को उन्होंने गोविंद महार के स्मारक को नुकसान पहुंचाया, आसपास के गांवों में बंद का आह्वान किया, दलितों पर हमले की योजना बनाई और 1 जनवरी को इस पर अमल किया. इसमें राजसत्ता की मिलीभगत बहुत साफ थी. अत्याचार अधिनियम (एट्रॉसिटी एक्ट) के तहत अपराधियों पर एफआईआर के बावजूद, और राज्य की निष्क्रियता पर विश्वव्यापी नाराजगी के बावजूद, राज्य ने उन्हें गिरफ्तार करने से इन्कार कर दिया, बल्कि उल्टे इन हमलों के विरोध में 3 जनवरी को एक शांतिपूर्ण बंद में भाग लेने के लिए राज्य भर से हजारों दलित नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया.

पेशवाई प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणवादी शासन का एक रूपक बन गई थी, जिसके उत्पीड़नकारी इतिहास का ब्योरा अपना थूक जमा करने के लिए एक महार के गले में बंधी मिट्टी के घड़े और अपने कदमों के निशान मिटाने के लिए कमर में बंधी कंटीली झाड़ी से दिया जाता है.(6) नई पेशवाई मौजूदा सत्ताधारी हिंदुत्ववादी गिरोह के रूपक के बतौर काम करती है. इसे सिर्फ जातियों के पहलू के लिहाज से देख कर, इसके पुराने संस्करण के साथ इसका मिलान मत कीजिए. यह अपनी व्यापकता और फासीवादी क्षमताओं की वजह से उससे कहीं ज्यादा घातक है. इसके फासीवादी गुणों पर वामपंथी बुद्धिजीवियों की बहसें अपनी जगह, यह यूरोप में 1920 और 30 के दशकों में आई बदनाम फासीवादी हुकूमतों से भी कहीं बदतर होने जा रही है. अपने सैकड़ों सिरों वाले संगठन, ब्राह्मणवाद की विचारधारा जो दुनिया में समता-विरोधी सबसे पुरानी विचारधारा है, वैश्विक पूंजीवाद का समर्थन और अनुकूल राजनीतिक हालात इसे संभावित रूप से मुसोलिनी के इटली या हिटलर के जर्मनी से भी कहीं अधिक नुकसानदेह बनाते हैं. यह सत्ताधारी गिरोह अपने संस्थापकों की परिकल्पना के अति-फासीवादी चरित्र वाले हिंदू राष्ट्र के अपने सपने को हकीकत में उतारने के लिए अगले चुनावों को आखिरी मौके के रूप में देख रहे हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि यह दलितों के लिए खतरनाक होने जा रहा है क्योंकि हिंदुत्व ताकतों के लिए वे ही असली ‘अन्य’ हैं.
 

दलितों का अपना मिशन 

बदकिस्मती की बात यह है कि दलित, फासीवाद, साम्राज्यवाद को अजनबी शब्दों की तरह लेते हैं, जो उनके लिए महज कम्युनिस्टों की बेमतलब की बकवास है. उनका अपना मिशन, उनका सर्वोच्च मकसद अपने जातीय उत्पीड़न से लड़ना है. लेकिन इस लड़ाई की प्रकृति क्या है? क्या वे इस पैमाने को उलटना चाहते हैं या जातियों का खात्मा करना चाहते हैं? पहचान (अस्मिता) की जो हसरत दिखाई देती है, उससे पक्के तौर पर तो यही इशारे मिलते हैं कि दलित जातीय ढांचे के भीतर ही एक तरह के शासक समुदाय जैसी प्रभुत्वशाली हैसियत पा लेंगे, जैसा कि कहीं पर आंबेडकर ने कहा था. इसके तहत मन ही मन यह मान लिया गया है कि जातियों का खात्मा नहीं हो सकता है. लेकिन इस मान्यता के साथ दिक्कत यह है कि यह जातीय पहचान के चरित्र को लेकर नादानी को ही जाहिर करती है, क्योंकि जातीय पहचान का बुनियादी गुण ऊंच-नीच का क्रम (हाइरार्की) है. यह जातियों को अमीबा की तरह बांटती और अलग करती है. इसका सबूत यह है कि आंबेडकर ने दलित नाम की जो श्रेणी बनाई, वह भी दलित जातियों को एक साथ नहीं रख सकी और न ही उन्हें उप-जातियों में टूटने से बचा सकी. जातीय पहचान के आधार पर बनाई गई कोई भी चीज जनता की एक व्यापक एकता नहीं बना सकती है. शासक समुदाय बनने का सपना, ऊपर उठ रहे दलितों के एक छोटे से तबके को प्रेरणा भले दे दे, लेकिन यह हमेशा ही एक ऐसा हसीन सपना बना रहेगा, जो कभी हकीकत नहीं बन पाएगा.

दलितों का असली मकसद, बल्कि देश का ही असली मकसद जातियों का खात्मा होना चाहिए, जिसकी पैरवी इत्तेफाक से खुद आंबेडकर ने ही की है. उन्होंने बीमारी की पहचान करते हुए कहा था कि जातियों की जड़ें हिंदू धर्म के धर्मशास्त्रों में हैं और चूंकि हिंदू कभी भी इन धर्मशास्त्रों को नष्ट करने को तैयार नहीं होंगे, इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म को छोड़ने का फैसला किया और बौद्ध धर्म अपनाया. यह समाधान कितना कारगर था, इस बहस में न जाते हुए, यह बात समझनी जरूरी है कि अकेले दलित कभी भी जातियों का खात्मा नहीं कर सकते. इसके अलावा यह बात भी है कि जातियां आज पुराने दौर की जातियां नहीं रह गई हैं जैसी आंबेडकर के चिंतन में दिखती हैं, बल्कि वे वर्ग के साथ घुल-मिल गई हैं, जो समकालीन दुनिया की एक प्रभुत्वशाली श्रेणी है. इसके अलावा, ऐसी घोर ढांचागत बाधाएं भी हैं जिन्हें उत्तर-औपनिवेशिक शासक वर्गों ने संविधान में ही तैयार किया, जिसे वे पवित्र मानते हैं. जाति और वर्ग के इस जटिल मकड़जाल को, सिर्फ अवाम के ऐसे एकजुट संघर्ष से ही तोड़ा जा सकता है जो वर्गीय पहचान की बुनियाद पर कायम हुआ हो.
 

जिन दलितों को इस पेशकश में कुफ्र की बू आ रही हो उनके लिए मैं आंबेडकर की ही बात को पेश कर सकता हूं:
‘कोई भी महान आदमी अपना फर्ज अदा नहीं कर रहा है अगर वह अपने शिष्य पर अपने उसूलों या अपने नतीजों को जबरदस्ती थोपते हुए उसे पंगु बना दे. महान आदमी अपने शिष्यों पर अपने उसूल नहीं थोपते. ...अगर एक शिष्य अपने गुरु के उसूलों या नतीजों को कबूल नहीं करता तो इसमें कोई भी कृतघ्नता नहीं है. क्योंकि जब वह उन्हें नकारता है तो वह गहरी श्रद्धा के साथ अपने गुरु के आगे यह भी कबूल करता है कि ‘‘आपने मेरी आंखें खोलीं कि मैं अपना आपा हासिल कर सकूं: इसके लिए आपका शुक्रिया.’’ गुरु इससे कम किसी चीज का हकदार नहीं है. और शिष्य इससे ज्यादा कुछ देने के लिए मजबूर नहीं है.’’(7)

नोट्स
1.    https://thewire.in/209824/myth-bhima-koregaon-reinforces-identities-seeks-transcend/.
2.    वह वाक्य था: “लेकिन जब बाबासाहेब आंबेडकर ने भीमा कोरेगांव की लड़ाई को पेशवा शासन में जातीय उत्पीड़न के खिलाफ महार सैनिकों की लड़ाई के रूप में पेश किया, वो एक शुद्ध मिथक रच रहे थे.”
3.    देखें “Why the Mahar Soldier Was the First Freedom Seeker in 1818,  https://thewire.in/213987/understanding-mahar-soldier-bhima-koregaon/.
4.    Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches (BAWS), Govt of Maharashtra, Mumbai, Vol. 12, p. 88.
5.    BAWS, Vol. 17/1, p.307.
6.    R.V. Russell, The Tribes and Castes of the Central Provinces of India, Vol.4, Maclillan & Co, London, 1916, http://www.gutenberg.org/files/20668/20668-h/20668-h.htm.
7.    BAWS (Ranande, Gandhi and Jinnah), Vol. 1, p.240.

गुजरात चुनाव में राहुल गांधी का ‘जबरदस्त झटका’

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/08/2018 07:31:00 PM


अपने नियमित स्तंभ में आनंद तेलतुंबड़े इस बार गुजरात चुनावों के नतीजों का विश्लेषण कर रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

कांग्रेस के नए-नए अध्यक्ष नियुक्त हुए राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों के नतीजों पर यह कहते हुए प्रतिक्रिया दी कि चुनावों ने भाजपा को जबरदस्त झटका दिया है और नरेंद्र मोदी की विश्वसनीयता के संकट को उजागर किया है. (टाइम्स ऑफ इंडिया, 20 दिसंबर 2017) गुजरात के चुनाव कोई मामूली चुनाव नहीं थे, उन्हें 2019 के आम चुनाव की आजमाइश के रूप में लिया जा सकता है, जिनमें अगर भाजपा के रथ को जीत का अपना सफर जारी रखने की इजाजत मिल गई तो भारत के औपचारिक रूप से एक फासीवादी हिंदू राष्ट्र में बदल दिए जाने का एक सचमुच का खतरा सामने आ खड़ा होगा.

गुजरात ने कांग्रेस को जीतने के लिए एक अनोखा मौका मुहैया कराया था. पिछले 22 सालों में यह पहला चुना था, जिसमें करिश्माई मोदी को राज्य मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया गया और न ही उनकी जगह किसी भरोसेमंद चेहरे को लाया गया. इसने सत्ताधारी दल के लिए मुश्किलें खड़ी कीं, जिसमें भाजपा के अपने स्थायी आत्मविश्वास और उद्दंडता का भी योगदान था, खास कर जब मोदी के गुजरात मॉडल का खोखलापन जगजाहिर हो गया है. इन चुनावों में सभी उल्लेखनीय समुदाय मुखर रूप से भाजपा के खिलाफ थे – हार्दिक पटेल के पीछे खड़े पाटीदार भाजपा को सबक सिखाने का ऐलान कर रहे थे, अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) अल्पेश ठाकुर के साथ कांग्रेस के पक्ष में खड़े थे और जिग्नेश मेवाणी द्वारा गोलबंद किए गए दलित भाजपा को हराने की कसमें खा रहे थे. किसान सबसे बुरे खेतिहर संकट झेल रहे हैं, नौजवान बढ़ती हुई बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं, भाजपा का मुख्य जनाधार रहे व्यापारी और छोटे कारोबारी नोटबंदी और जीएसटी से परेशान होकर खुलेआम अपनी नाराजी जाहिर कर रहे थे और आम जनता भी गैरमामूली तौर पर चुनावों को लेकर अपनी बेपरवाही दिखा रही थी. विपक्ष इससे और ज्यादा क्या उम्मीद कर सकता था? अगर इन सारी मुश्किलों के बावजूद, भाजपा वोट प्रतिशत में इजाफे के साथ ही विधानसभा में एक आरामदेह बहुमत से जीत गई तो हैरानी होती है कि राहुल गांधी किस झटके की बात कर रहे हैं.
 

होड़ में पिछड़ी कांग्रेस 

इस बार गुजरात में वोटों का कुल प्रतिशत 68.3 फीसदी था, जो 2012 के 71.3 फीसदी से कम है. यह लोगों में उत्साह की कमी को जाहिर करता है. इसे नोटा को भारी संख्या में मिले वोटों ने भी रेखांकित किया है. 5.52 लाख वोटरों ने, जो कुल वोटों का 1.8 फीसदी है, नोटा विकल्प को चुना और सियासत के हालात को लेकर अपनी मौन असहमति जाहिर की. नोटा को मिले वोटों की तादाद बहुजन समाज पार्टी और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी को मिले क्रमश: 2.07 और 1.85 लाख वोटों से कहीं अधिक है. ज्यादातर टिप्पणीकारों ने कांग्रेस के प्रदर्शन की तारीफ की है, जिसे पांच साल पहले मिली सीटों से 16 सीटें ज्यादा हासिल हुई हैं. भाजपा का कुल वोट शेयर 2014 के लोक सभा चुनावों के 60.11 फीसदी से गिर कर 49.1 फीसदी पर आ गया, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों के 47.85 फीसदी वोट शेयर के मुकाबले इजाफा ही हुआ है. इस बार कांग्रेस का वोट शेयर भी बढ़ कर 41.4 हो गया है, जबकि यह 2014 के लोकसभा चुनावों में 33 फीसदी और 2012 के विधान सभा चुनावों में 38.9 फीसदी था. उनके बीच के वोट शेयर का फर्क भी 2012 के 8.85 फीसदी से घट कर इस बार 7.7 फीसदी पर आ गया है, जो 2002 में गुजरात दंगों के फौरन बाद हुए चुनावों में 10.4 फीसदी और 2007 के चुनावों में 9.49 फीसदी था. लोक सभा चुनाव 2014 के आधार पर देखें तो भाजपा ने 66 सीटें खोई हैं और कांग्रेस ने 63 हासिल की हैं. भारत में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने (एफपीटीपी) की चुनाव प्रणाली  की बदौलत, अपने वोट शेयर में 1.25 फीसदी इजाफे के बावजूद भाजपा ने 17 सीटें खोईं. बेशक कांग्रेस को 19 सीटों का फायदा हुआ. यकीनी रूप से, कांग्रेस ने पहले से बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन एफपीटीपी चुनाव प्रणाली में इसका क्या फायदा है?

इस बार कांग्रेस को अनोखी और साफ-साफ दिखने वाली बढ़त हासिल थी. परंपरागत रूप से भाजपा को वोट करने वाला समुदाय पाटीदार या पटेल आबादी का 14 फीसदा हिस्सा बनाते हैं और पिछली विधान सभा में इस समुदाय के 25 फीसदी विधायक थे. इस बार के चुनावों में 182 विधानसभा सीटों में से 65 पर उन्हें प्रभावशाली माना गया और वे आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा के खिलाफ कमर कसे हुए थे. लेकिन वोटिंग में वे बंटे हुए दिखे. ग्रामीण आबादी ने कांग्रेस को वोट दिया, जबकि शहरी मतदाताओं ने भाजपा के लिए वोट किया. कुछ हद तक इसकी उम्मीद की जा रही थी, लेकिन भाजपा ने निश्चित रूप से हार्दिक पटेल के कुछ साथियों को खरीद कर, हार्दिक के नेतृत्व वाले पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास) में अपनी पैठ बना ली थी. ओबीसी वोट गुजरात में कुल वोटों का 45 से 50 फीसदी है और वे 71 सीटों पर प्रभावशाली हैं और इसलिए उन पर मोदी का रहमोकरम खूब रहा है. लेकिन इस बार उन्होंने ऐलानिया तौर पर कांग्रेस की हिमायत की. आबादी में 7 फीसदी तादाद वाले दलि परंपरागत रूप से कांग्रेस को वोट देते आए हैं और खुलेआम भाजपा के खिलाफ थे. राज्य की आबादी का 14.75 फीसदी हिस्सा, आदिवासी कुल 37 सीटों पर प्रभावशाली थे और भाजपा और कांग्रेस में बंटे हुए थे. भले ही ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती कि ये सारे समुदाय एकजुट होकर एक जगह वोट डालेंगे, लेकिन जब चुनावों का ऐलान हुआ तो साफ तौर पर कांग्रेस की ओर उनका झुकाव था. इसके बावजूद कांग्रेस इन समुदायों में भाजपा को मात नहीं दे पाई. उन 52 सीटों में से भाजपा ने 28 सीटें जीतीं, जहां पाटीदार आबादी 20 फीसदी या उससे ज्यादा है, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 23 सीटें ही मिलीं, और एक सीट एक निर्दलीय को गई. अनुसूचित जातियों में, भाजपा ने 8 सीटें जीतीं और कांग्रेस को 5 सीटें हासिल हुईं, जिनमें जिग्नेश मेवाणी की निर्दलीय सीट भी शामिल है, जिनको कांग्रेस ने समर्थन दिया था. सिर्फ अनुसूचित जनजातियों में ही भाजपा की 9 सीटों के मुकाबले कांग्रेस को 16 सीटें हासिल हुईं. लेकिन आदिवासी बहुल सीटों पर, भाजपा ने 19 सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस ने सिर्फ 15, दो सीटें भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) और एक सीट निर्दलीय को गई.
 

मोदी की मुकाबले की ताकत 

गुजरात में हालात ऐसे थे कि मोदी के बिना भाजपा यकीनी रूप से चुनाव हार जाती. मोदी 2019 के आम चुनावों के अभ्यास के रूप में गुजरात की अहमियत को जानते थे और अपने पद की गरिमा और मर्यादा को भुला कर किसी भी कीमत पर इसे जीतने पर उतारू हो गए. शुरुआत में, दब्बू चुनाव आयोग के जरिए चुनावों को भाजपा के लिए एक सुविधाजनक समय आने तक तक टाला जाता रहा. संसद के शीत सत्र को बुलाने की रिवायत को भी इसके लिए तोड़ा गया. आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए नाराज वोटरों को मनाने के लिए जीएसटी में सुधार किए गए. लेकिन इन सबके बावजूद, गुजरात जब उनकी गिरफ्त से फिसलता हुआ दिखा तो वे हरसंभव घटिया स्तर पर उतरने से भी नहीं हिचके, जब उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, एक पूर्व भारतीय सेना प्रमुख दीपक कपूर, चार विदेश सचिवों और पाकिस्तान में एक पूर्व भारतीय कूटनीतिज्ञ और साथ ही कुछ फौजी मामलों के माहिर लोगों पर आरोप मढ़ दिया कि वे गुजरात चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं. यहां तक कि उन्होंने हिंदुओं को सांप्रदायिक रूप से उकसाने की अपनी पुरानी तरकीब के तहत, सोमनाथ मंदिर में दाखिले के लिए किसी द्वारा राहुल गांधी का नाम गैर हिंदुओं के रजिस्टर में लिख दिए जाने को और अयोध्या मामले में कपिल सिब्बल की दखल को भी कांग्रेस को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किया. राष्ट्रवाद पर खड़े किए गए अंधराष्ट्रवादी शोरशराबे में गुजरात मॉडल या विकास पर एक शब्द नहीं कहा गया, जिसके बूते उन्होंने 2014 चुनावों में लोगों को बेवकूफ बना कर उनका वोट हासिल किया और सत्ता में आए.

उन्होंने शहरी मतदाताओं को आसानी से मना लिया कि वे नोटबंदी और जीएसटी की अपनी शिकायतों को भूल जाएं और शहरों के 48 में से 42 सीटें उनकी झोली में डाल दें. यह शहरी स्थानीय निकाय के चुनावों का दोहराव ही था, जिसमें 2016 की शुरुआत में भाजपा ने विजयी रही थी. लेकिन वे गांवों के मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पाए जो गहराते खेतिहर संकट और भाजपा शासन की आपराधिक अनदेखी का खामियाजा भुगत रहे हैं, जो राज्य में क्रोनी-पूंजीवाद को बढ़ावा दे रही है. इससे कांग्रेस को ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में 50 फीसदी से ज्यादा सीटें हासिल हुईं, खास कर मूंगफली और कपास के किसानों के बीच. कांग्रेस का प्रदर्शन सौराष्ट्र इलाके में सबसे प्रभावशाली रहा, जहां उसने अमरेली, मोरबी, गिर सोमनाथ और सुरेंद्रनगर जिलों में भारी जीत दर्ज की. इन नतीजों के लिए इन इलाकों में पाटीदारों के संगठन पास की जिस ताकत से जोड़ा जा रहा है, वह अपने आप में खेतिहर संकट की ही अभिव्यक्ति है. 182 सदस्यों वाली विधानसभा में 134 सीटें ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों से आती हैं. कांग्रेस को उनमें से 71 सीटें मिलीं, इसके बाद 57 सीटों के साथ भाजपा, दो सीटों के साथ बीटीपी, एक सीट के साथ एनसीपी और तीन निर्दलीय हैं. एक तरह से ये चुनावी नतीजे करीब दो साल पहले के जिला पंचायत और तालुका पंचायत चुनावों का दोहराव भी थे. इस तरह से, कहा जा सकता है कि मोदी का जादू चल रहा है और यह सिर्फ बदतर रुझानों की तरफ ही ले जा रहा है.
 

राहुल का नाकाबिल प्रदर्शन
 
यह तो तय है कि राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों को गंभीरता से लिया, 23 दिन वहां गुजारे और राज्य भर में 65 से ज्यादा रैलियों या सभाओं को संबोधित किया. इस बार उनके नारे भी थोड़े बेहतर थे जैसे कि ‘विकास गांडो थायो छे’ या ‘शाह-ज्यादा’ (अमित शाह के बेटे के लिए). लेकिन कुछ मुर्खता भरे नारे भी थे जैसे ‘गब्बर सिंह टैक्स’ या अपने वंश की तरक्की के बचाव में ‘अभिषेक बच्चन भी डायनेस्ट है’. लेकिन मीडिया के जायजे और अपने अंध-समर्थकों की तारीफों के उलट, वे अपने ताकतवर प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले टिक पाने में फिर से नाकाम रहे. कांग्रेस अभी भी शतुरमुर्ग की तरह बैठी मतदाताओं के भाजपा से मोहभंग होने का इंतजार कर रही है और अपनी ही घटती जा रही प्रासंगिकता को देखने से इन्कार कर रही है. भाजपा की ठोक-बजा कर बनाई गई चुनावी मशीन का रणनीतिक रूप से जवाब देने के बजाए गांधी बेवकूफी भरे तरीके से ‘मैं भी किसी से कम नहीं’ की रणनीति पर चल रहे हैं और खुद को सीधे सीधे मोदी के मुकाबले में खड़ा कर रहे हैं. वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि तय है कि इस तरह की रणनीति से वे नुकसान में ही रहेंगे. एक नेता की काबिलियत इसमें होती है कि वह अपने अनुयायियों को इसके लिए प्रेरित करे कि वे उसके विजन, उसके नजरिए को, जमीन पर उतार सकें, न कि इसमें होती है कि वह खुद को एक योद्धा के रूप में पेश करे. मोदी के पास उनकी गैरमामूली भाषणबाजी और ड्रामेबाजी का हुनर है, जिसकी मदद से वे झांसा देने वाली बातों और झूठों को बड़ी महारत के साथ फैलाते रहते हैं और भारतीय जनता को प्रभावित किया है, जिसकी परवरिश ही नायक पूजा पर हुई है. लेकिन साथ ही, मोदी वैश्विक पूंजी की पसंद भी हैं. गांधी के पास इनमें से कुछ भी नहीं है और वे सीधी टक्कर में उनसे होड़ नहीं ले सकते. उनके लिए जरूरी है कि वे एक तरह की स्वोट एनालिसिस यानी ताकत-कमजोरी-मौका-जोखिम का जायजा लें- ऐसा न सिर्फ वे अपनी पार्टी के साथ करें बल्कि अपने साथ भी करें और फिर एक व्यावहारिक रणनीति तैयार करें जो मोदी की राह रोक सके. उन्हें बार बार जो नाकामियां हासिल हुईं हैं उनको देखते हुए उनमें ऐसा कोई विजन दिखाई नहीं देता और न ही ऐसी सियासी समझ दिखाई देती है जो यह महसूस कर सके कि उनके सामने कैसा फौरी खतरा मौजूद है.

भाजपा की कामयाबी उसकी अकेली अपनी कामयाबी नहीं है. उसे काफी कुछ यह कामयाबी कांग्रेस की नालायकी की बदौलत भी हासिल हुई है. अगर महज हाल की ही कुछ घटनाओं को याद करें तो अगर राजीव गांधी ने शाहबानो फैसले को नहीं पलटा होता या अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाए होते या नरसिंह राव ने बाबरी मस्जिद के पास हिंदुत्ववादी गुंडों को जमा होने की इजाजत नहीं दी होती, तो मोदी वहां कभी नहीं पहुंच पाते जहां वे आज हैं. यह सड़न और गहराई तक जाती है, उन दिनों तक पहुंचती है जब कांग्रेस के क्रूर बहुमत के तहत उत्तर-औपनिवेशिक राज्य का निर्माण किया जा रहा था और इसने संविधान में ही जातियों और धर्म के लिए जगह तैयार की थी. आज भी, बहुसंख्यक आबादी भाजपा के पक्ष में नहीं है, 2014 में इसका लोकप्रिय वोट महज 31 फीसदी था. कांग्रेस के पुराने गुनाहों को जानने के बावजूद भारत के सारे प्रगतिशील लोग चुनावों में कांग्रेस के समर्थन में उतरे हैं, सिर्फ इसलिए कि भाजपा के शैतानी मकसद को साकार होने से रोका जा सके. लेकिन राहुल गांधी अपने उलझन भरे व्यवहारों से उन्हें निराश करते रहेंगे. वे मोदी के फंदे में फंस गए और गुजरात में 27 हिंदू मंदिरों का दौरा किया और यह भी दावा किया किया कि वे एक जनेऊ-धारी ब्राह्मण हैं. इस तरह न सिर्फ उन्होंने ‘नरम हिंदुत्व’ का प्रदर्शन किया, बल्कि घिनौने ऊंची-जातिवाद की शेखी भी बघारी. इससे पूरी निचली जातियां, खास कर दलित आसानी से उनसे अलग हो सकती हैं. वे बुजुर्ग गांधी (मोहनदास करमचंद) की तरह यह दावा क्यों नहीं कर सकते कि वे हिंदू होने के चलते अपनी मर्जी से एक भंगी हैं? यह कल्पना करना एक रणनीतिक दिवालियापन है कि वे अपने हिंदूपन और ब्राह्मणपन के बूते भाजपा को मात दे देंगे. बल्कि वे इस तरह भाजपा की सियासत को ही जायज ठहराते हैं, जैसा कि उनसे पहले के कांग्रेसी करते आए हैं.

बदकिस्मती से, जितना वक्त हमारे हाथ में है उसे देखते हुए, जनता के पास उन पर भरोसा करने के अलावा और कोई चारा नहीं है कि वे भारत को फासीवादी होने से बचाएंगे.

वोट डालें, या राजनीति को फिर से गढ़ें?: आलें बादिऊ

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/09/2017 12:32:00 PM


दुनिया के जाने माने दार्शनिक, राजनीति और गणित के जानकार, उपन्यासकार और नाटककार आलें बादिऊ ने हाल में हुए फ्रांसीसी चुनावों के दौरान कुछ महत्वपूर्ण लेख लिखे हैं, जिनमें उन्होंने फ्रांस के खास राजनीतिक संदर्भ में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों, पार्टियों और धाराओं पर बहस करते हुए मौजूदा दौर में पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी रुझानों पर गौर किया है और ऐसे माहौल से आगे जाने और इंसानियत की मुक्ति के सवाल पर आगे की राह तलाशने की जरूरत पर जोर दिया है. इन लेखों में से हम दो लेखों को यहां पेश कर रहे हैं, जिनमें से मुख्यत: फ्रांस के स्थानीय चुनावी संदर्भ वाले अंशों को हटा दिया गया है. यहां पर दो भागों में पेश किए जा रहे इन लेखों के मूल फ्रांसीसी से अंग्रेजी अनुवाद क्रमश: “वोट, ऑर री-इन्वेंट पॉलिटिक्स” और “लेट्स लूज़ इंटरेस्ट इन इलेक्शंस, वंस एंड फॉर ऑल!” शीर्षक से वर्सो बुक्स के ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है. ये लेख भारत सहित दुनिया भर में मौजूदा राजनीतिक हालात की एक बेहतर समझ बनाने की दिशा में उपयोगी हैं, इस यकीन के साथ इन्हें यहां पेश किया जा रहा है. अनुवाद एवं प्रस्तुति: रेयाज उल हक

1
पुरानी और जानी-मानी भूमिकाओं के इस रंगमंच में, राजनीतिक प्रतिबद्धता का बहुत थोड़ा सा ही मोल है, या फिर यह सियासी करतब के लिए एक बहाना भर है. इसलिए बेहतर होगा कि हम इस सवाल से शुरू करें: राजनीति क्या है? और एक पहचानी जा सकने वाली, घोषित राजनीति क्या है?

चार बुनियादी राजनीतिक नजरिए

कोई राजनीति हमेशा तीन तत्वों के आधार पर खुद को परिभाषित कर सकती है. इनमें से पहला तत्व है सामान्य जनता का समूह और साथ ही उसके काम और उसकी सोच. आइए, हम इसे “जनता” कहें. इसके बाद विभिन्न सामूहिक संगठन आते हैं: असोसिएशन, यूनियन, पार्टियां – कुल मिला कर वे सभी समूह जो सामूहिक कार्रवाई करने के काबिल होते हैं. आखिर में राजसत्ता के अंग – सांसद, सरकार, सेना, पुलिस – आते हैं लेकिन साथ ही आर्थिक और/या मीडिया सत्ता के हिस्से भी इसके भीतर आते हैं (यह एक ऐसा फर्क है जो अब करीब करीब ऊपर से दिखाई नहीं देता), या फिर हर वो चीज जिसे आज हम एक खूबसूरत लगने वाले और लोगों के दिलो-दिमाग पर छा जाने तरीके से “फैसला लेने वाले लोग” कहा करते हैं.

राजनीति, हमेशा ही इन तीन तत्वों के जरिए मकसद को हासिल करने से बनती है. इस तरह हम देख सकते हैं कि आधुनिक दुनिया में मोटे तौर पर चार बुनियादी राजनीतिक नजरिए पाए जाते हैं: फासीवादी, रूढ़िवादी, सुधारवादी और कम्युनिज्म (साम्यवादी).

रूढ़िवादी और सुधारवादी नजरिए विकसित पूंजीवादी समाजों का मध्यमार्गी संसदीय धड़ा (ब्लॉक) बनाते हैं: फ्रांस में वामपंथ और दक्षिणपंथ, संयुक्त राज्य अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट वगैरह. इन दोनों नजरियों में बुनियादी तौर पर जो बात आपस में मिलती है वह ये है कि ये दोनों ही दावा करते हैं कि उनके बीच एक टकराव मौजूद है – खास तौर से इन तीनों तत्वों की अभिव्यक्ति के अर्थ में – इसके बावजूद इनमें से दोनों ही नजरिए संवैधानिक सीमाओं के भीतर रह सकते हैं और निश्चित रूप से रहते हैं.

इनसे अलग बचे दूसरे दोनों नजरियों, फासीवाद और कम्युनिज्म में, मकसद को लेकर अपने बीच के हिंसक विरोध के बावजूद जो बात एक जैसी है वो यह है कि दोनों ही मानते हैं कि राजसत्ता के सवाल पर विभिन्न पार्टियों के बीच के टकराव में, सुलह-समझौता नामुमकिन है: इसको किसी संवैधानिक सर्वसहमति का पाबंद नहीं बनाया जा सकता है. ये नजरिए अपने से विरोधी या यहां तक कि अपने से अलग किसी भी मकसद को समाज और राज्य की अपनी अवधारणाओं में शामिल करने से इन्कार करते हैं.

चहेता फासीवाद-परस्त नजरिया

हम राजसत्ता के उस संगठन के लिए “संसदीयतावाद” के नाम का इस्तेमाल कर सकते हैं जो चुनावी मशीनरी, अपने दलों और उनके अनुयायियों के जरिए रूढ़िवादियों और सुधारवादियों के साझे वर्चस्व को सुनिश्चित करता है. यह वर्चस्व हर जगह राज सत्ता पर फासीवादियों या कम्युनिस्टों के दखल की किसी भी गंभीर संभावना को खत्म करता है. हम जिसे “पश्चिम” कहते हैं, वहां पर यही राज्य का प्रभुत्वशाली रूप है. खुद इसके लिए एक तीसरे नाम की जरूरत है, जो इन दोनों मुख्य नजरियों के बीच आपस में तालमेल का एक साझा और ताकतवर आधार हो और जो इन दोनों का अटूट अंग हो और इनके अलावा भी जिसका वजूद हो. यह साफ है कि हमारे समाजों में नवउदारवादी पूंजीवाद यही आधार है. कारोबार और निजी दौलत को बढ़ाते जाने की बेपनाह आजादी, निजी संपत्ति के लिए पूरा सम्मान (अदालती व्यवस्था और भारी पुलिस बंदोबस्त जिसकी गारंटी करती है), बैंकों में भरोसा, युवाओं की शिक्षा, “लोकतंत्र” की ओट में होड़ (प्रतिस्पर्धा), “कामयाबी” की भूख,  बराबरी के नुकसानदेह और काल्पनिक चरित्र का बार-बार दावा करना: यह आम राय से कबूल की गई “आजादियों” का एक सांचा (मैट्रिक्स) है. ये वो आजादियां हैं जिनकी हमेशा गारंटी करने के लिए दोनों तथाकथित “शासनकारी” पार्टियां कमोबेश प्रतिबद्ध हैं.

पूंजीवाद का होना, संसदीय सर्वसहमति के मूल्य में कुछ अनिश्चितताएं लेकर आता है, और इस तरह चुनावी रस्मों के दौरान “बड़े” रूढ़िवादी या सुधारवादी पार्टियों में भरोसे को जाहिर किया जाता है. यह खास तौर से निम्न बुर्जुआ के लिए सही है, जिसकी सामाजिक हैसियत खतरे में होती है, या फिर मेहनतकश वर्ग के लिए, जो उद्योगों के धीरे-धीरे बंद होने से तबाह हो गए हैं. पश्चिम में हम यही देख रहे हैं, जहां एशियाई देशों की उभरती हुई ताकत के मुकाबले, हम एक तरह का पतन देख सकते हैं. आज का यह खास संकट साफ तौर पर फासीवादी, राष्ट्रवादी, धार्मिक, इस्लामविरोधी और युद्ध को पसंद करने वाले नजरिए का समर्थन करता है, क्योंकि खौफ एक बहुत बुरा सलाहकार है और संकट में डूबे ये खास समाज पहचान पर आधारित मिथकों की गिरफ्त में जाने को बेकरार हैं. सबसे बढ़कर इसलिए कि कम्युनिस्ट परिकल्पना मुख्यत: सोवियत संघ और चीन के जनवादी गणतंत्र के अपने पहले और राज्य आधारित संस्करणों की ऐतिहासिक नाकामियों की वजह बहुत बुरी तरह कमजोर होकर सामने आई है.

इस नाकामी के नतीजे खुद ब खुद जाहिर हैं: नौजवानों, वंचितों और बदहाल लोगों, रोजगार से बेदखल मजदूरों और हमारे उपनगरों के घुमंतू सर्वहारा इस बात पर यकीन करने लगे हैं कि कड़वाहट भरी पहचानों (अस्मिताओं), नस्लवाद और राष्ट्रवाद की फासीवादी राजनीति ही हमारी संसदीय सर्वसहमति का अकेला विकल्प है.

कम्युनिज्म, इंसानियत की मुक्ति

हालात ने जो रुख लिया है, अगर हम उसके खिलाफ हैं तो हमारे सामने सिर्फ एक ही रास्ता है: हमें कम्युनिज्म को फिर से गढ़ना होगा, उसमें जरूरी बदलाव करके उसे फिर से पेश करना होगा. अब यह जरूरी हो गया है कि बहुत अपमानित हो चुके इस शब्द को हम फिर से उठाएं, इसे साफ करें और फिर से इसकी रचना करें. यह इंसानियत की मुक्ति का हरकारा है, करीब दो सदियों से इसकी यही भूमिका रही है और ऐसा करते हुए इस महान नजरिए को हकीकत का समर्थन हासिल होता रहा है. अभूतपूर्व कोशिशों के कुछ दशक (जो इसलिए हिंसक थे कि इस दौरान बेरहमी से इसकी घेरेबंदी करके इस पर हमला किया गया जिसकी वजह से यह हार जाने के लिए अभिशप्त था) मजबूत इरादों वाले लोगों को इस बात का कायल नहीं बना सकते कि इस संभावना को हमेशा के लिए दफ्न कर दिया जाना चाहिए. वे हमें इसके लिए मजबूर भी नहीं कर सकते कि हम इसको जमीन पर उतार लाने की जिम्मेदारियों को हमेशा के लिए छोड़ दें.

इसलिए, क्या तब हमें वोट डालना चाहिए? बुनियादी तौर पर राज्य और इसके संगठनों की ओर से आने वाली इस मांग से हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए. अब तक हमें यह मालूम हो जाना चाहिए कि वोट डालने का मतलब और कुछ नहीं बल्कि मौजूदा व्यवस्था के रूढ़िवादी नजरियों में से किसी एक को मजबूत करना है.

अगर हम इसके असली मतलब तक जाएं तो वोट जनता को राजनीति से दूर करने यानी उनको अराजनीतिक बनाने का एक उत्सव है. हमें जरूरी तौर पर शुरुआत यह करनी है कि हम हर जगह पर भविष्य के लिए कम्युनिस्ट नजरिए को फिर से बाकायदा स्थापित करें. इस पर पक्के तौर पर यकीन रखने वाले जुझारू लोगों को जरूरी तौर पर दुनिया भर के लोकप्रिय संदर्भों यानी हालात में, जगह-जगह पर जाकर इसके उसूलों की चर्चा करनी होगी. जैसा कि माओ ने कहा था, हमें जरूरी तौर पर “उलझन और भ्रम के बीच से जो कुछ भी हासिल है, उसे उसकी खासियत के साथ, जनता को समझाना होगा.” और राजनीति को फिर से गढ़ने का मतलब यही तो है.


2
मैं खास कर मेलेनकोनिज्म से नाउम्मीद हो चुके लोगों की कड़वाहट को समझता हूं, जो चुनावों के पहले दौर के बाद अपने गुस्से और नाराजगी को जाहिर कर रहे हैं. इसके बावजूद, वे चाहे जो भी करें या कहें, इस चुनाव में कोई खास गैरमामूली बात या धांधली नहीं हुई थी.

हालांकि असल में पार्टियों में दो अंतर्विरोध रहे हैं, जिन्होंने अफसोसनाक रूप से (वास्तव में मौजूद शक्तियों के लिए) केंद्रीय संसदीय धड़े को बिखेर दिया. यह धड़ा परंपरागत वाम और दक्षिण से मिल कर बना था. चालीस बरसों से – बल्कि दो सदियों से – यह धड़ा स्थानीय पूंजीवाद के फलने-फूलने की हिमायत करता आ रहा है. इसके बावजूद तथाकथित वामपंथ के स्थानीय प्रतिनिधि ओलां फिर से खड़े नहीं हुए, और इससे उनकी पार्टी की कमर टूट गई. दूसरी तरफ परंपरागत दक्षिणपंथ है. चुनावों की अपनी बदनसीब प्रक्रिया (प्राइमरी) की बदौलत यह अपने बेहतरीन बूढ़े घोड़े आलें युप्पे को उम्मीदवार नहीं बना पाया, बल्कि इसकी मनहूस चेहरे वाली, मुफस्सिल की एक बुर्जुआ उम्मीदवार के बतौर चुनी गई, जो आधुनिक पूंजीवाद की “सामाजिक” पसंद से कोसों दूर है.

“सामान्य” दूसरा दौर (राउंड) ओलां बनाम युप्पे का रहा होता, या फिर सबसे खराब हालात में भी मुकाबला ले पां बनाम युप्पे का रहा होता, और इन दोनों ही हालात में युप्पे आसानी से जीत जाते. सरकार की दो जर्जर पार्टियों की गैरमौजूदगी में, दो सदियों से हमारे असली मालिक यानी पूंजी के मालिक और उसके प्रबंधकों को थोड़ी परेशानी उठानी पड़ी. किस्मत से (यानी अपनी किस्मत से), अपने हमेशा के राजनीतिक किरदारों के साथ मिलकर, प्रतिक्रियावाद के पुराने दिग्गजों और सामाजिक लोकतंत्र के बचे-खुचे तत्वों (वॉल, ले द्रिएं, सेगोलें रॉयल एंड कंपनी) की मदद से, उन्होंने दम तोड़ रहे लावारिस केंद्रीय संसदीय धड़े की जगह लेने के लिए एक लायक चेहरा जुटा लिया. और वह चेहरा थे: इमानुएल मैक्रों. बहुत उपयोगी तरीके से और भविष्य को देखते हुए बहुत अहम तरीके से उन्होंने अपने मकसद के लिए फ्रांसुआ बेरो को भी इसमें लगा दिया, जो एक पुराने अनुभवी मध्यमार्गी संत हैं और सभी चुनावी जंगों और सबसे मुश्किल जंगों को भी देख चुके हैं. यह सारा कुछ बड़ी ठाठ-बाट के साथ अंजाम दिया गया और इतनी फुर्ती से किया गया कि यह एक रेकॉर्ड ही है. इसके नतीजे में अंतिम कामयाबी की तो खास गारंटी थी.

इन हालात में, जिनको समझाना पूरी तरह से मुमकिन है, वोट ने पहले की तुलना में कहीं अधिक साफ तौर पर इसकी तस्दीक कर दी है कि एक पूंजीवाद परस्त और दक्षिणपंथी नजरिया (जिसमें फासीवादी रूप भी शामिल है) इस मुल्क में चरम बहुमत में है.

बुद्धिजीवियों और नौजवानों का एक हिस्सा इसे देखने से इन्कार कर रहा है या फिर इस पर कड़वाहट भरे तरीके से अफसोस जाहिर कर रहा है. लेकिन यह क्या है? क्या लोकतांत्रिक चुनावों के ये आशिक लोग ये चाहते हैं कि कोई आए और इसे बदल दे कि लोग किसको वोट करें, जैसे कि आप अपनी गंदी कमीज बदलते हैं? जो लोग वोट डालते हैं, उन्हें हर हालत में बहुमत की मर्जी को कबूल करना होता है. सचमुच, नौजवानों और बुद्धिजीवियों के ये दो उक्त समूह दुनिया को अपने हालात और अपने सपनों के पैमाने से ही मापते हैं, और किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते जहां पहुंचना जरूरी है: वह नतीजा यह है कि “लोकतांत्रिक” शब्द से उम्मीद करने लायक कुछ भी नहीं है.

1850 में नेपोलियन तृतीय ने यह देख लिया था कि वोट डालने का आम अधिकार (सार्वभौम मताधिकार) कोई खौफनाक चीज नहीं थी, जैसा कि रूढ़िवादी बुर्जुआ ने इसके बारे में कल्पना की थी, बल्कि यह एक सचमुच का वरदान था जो प्रतिक्रियावादी ताकतों के लिए एक अभूतपूर्व और अनमोल वैधता मुहैया कराता था. यह बात आज भी पूरी दुनिया में हर जगह सही है. नेपोलियन के वारिसों ने यह समझ लिया है कि कमोबेश सामान्य और स्थिर ऐतिहासिक हालात में, आबादी की बहुसंख्या हमेशा बुनियादी तौर पर रूढ़िवादी होती है.

इसलिए आइए, शांत दिमाग से एक नतीजे पर पहुंचने की कोशिश करते हैं. उन्माद में भर कर चुनावी नतीजों का मतलब लगाना और कुछ नहीं बल्कि एक बेकार की हताशा है. आइए, इसकी आदत डाल लें: अगर चार कारकों को ऐतिहासिक रूप से एक साथ नहीं लाया गया तो हमारी मौजूदा गुलामी की हालत पर कभी भी जानलेवा चोट नहीं पहुंचाई जा सकती है. और ये बातें चुनावी रस्मों से उतनी ही दूर हैं, जितनी दूर उनसे कोई चीज हो सकती है.

  1. ऐतिहासिक अस्थिरता की स्थिति, जो रूढ़िवादी जनमत पर हावी होकर उसे काबू में कर लेती है. अफसोस की बात ये है कि यह स्थिति संभावित रूप से ठीक ठीक एक युद्ध भी हो सकती है, जैसा कि 1870 में पेरिस कम्यून, 1917 में रूसी क्रांति या फिर 1937 और 1947 के बीच चीनी क्रांति के समय था.

  2. एक मजबूती से कायम किया गया विचारधारात्मक बंटवारा – विचारधारा के स्तर पर हमें यह बंटवारा करना है कि रास्ता सिर्फ एक नहीं है, बल्कि हमारे सामने दो रास्ते हैं. स्वाभाविक रूप से इसे सबसे पहले बुद्धिजीवियों के बीच अंजाम देना होगा लेकिन अंतिम तौर पर इसे खुद व्यापक जनता में स्थापित करना होगा. हमें राजनीतिक सोच के पूरे मुकाम को इस तरह खड़ा करने की जरूरत है कि हर चीज पूंजीवाद और कम्युनिज्म के बीच दुश्मनी भरे विरोध के इर्द-गिर्द स्थापित हो. इसमें इस विरोध के दूसरे आयामों की मदद भी ली जा सकती है. सरसरी तौर पर अपने पाठकों को मैं इस दूसरे रास्ते यानी कम्युनिज्म के उसूलों की याद दिलाना चाहता हूं: उत्पादन के साधनों, कर्ज और लेन-देन और निजी संपत्ति के खिलाफ प्रबंधन के सामूहिक स्वरूपों की स्थापना, श्रम को एक ही साथ अनेक रूपों में जाहिर होने को मुमकिन बनाना जिसे खास तौर से शारीरिक और बौद्धिक श्रम के रूपों के बीच फर्क ने अभी कुचल रखा है, हमेशा अंतरराष्ट्रीयतावाद पर अमल करना, और लोकप्रिय शासन के स्वरूपों पर काम करना, जो अलग-थलग राज्यों की किसी भी व्यवस्था के खात्मे के लिए काम करें.

  3. एक लोकप्रिय उभार – हमेशा की तरह यह पक्के तौर पर आबादी के एक छोटे से हिस्से का उभार होगा, लेकिन जो कम से कम राजसत्ता को स्थगित कर देगा. ऐसा एक उभार ऊपर दिए गए पहले बिंदु से जुड़ा हुआ है.

  4. एक मजबूत संगठन जो पहले तीनों बिंदुओं के बीच एक सक्रिय तालमेल को पेश करे, अपने दुश्मनों के बिखराव की दिशा में काम करे, जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी दूसरे बिंदु यानी कम्युनिस्ट रास्ते के ऊपर दिए गए उसूलों को अमल में लाने के लिए काम करे.

इन चार बिंदुओं में से दो – पहले और तीसरे – एक खास हालात के बनने पर निर्भर हैं. लेकिन दूसरे बिंदु पर तो हम अभी से ही सक्रिय रूप से काम शुरू कर सकते हैं. और यही सबसे नाजुक पहल है. हम खास कर दूसरे बिंदु की रोशनी में बुद्धिजीवियों और सर्वहारा के तीनों रूपों की साझी बैठकों और कार्रवाइयों का समर्थन करते हुए चौथे बिंदु पर भी काम कर सकते हैं. बुद्धिजीवियों और सर्वहारा के जिन तीन रूपों के बीच काम किया जाना जरूरी है, वो हैं: सक्रिय मजदूर और निचले दर्जे के सरकारी कर्मचारी; पिछले तीन दशकों में उद्योगों की अंधाधुंध कमी का सबसे बुरा असर झेल रहे और नैतिक रूप से टूट चुके मजदूर परिवार; और अफ्रीका, मध्य-पूर्वी और एशियाई मूल के घुमंतू सर्वहारा.

चुनावी नतीजों के बारे में जज्बाती होते हुए अवसाद में डूब जाना या शोर मचाना न सिर्फ बेकार है बल्कि नुकसानदेह भी है. यह एक दुश्मन इलाके में जाकर मोर्चा लेने जैसी बात है, जिसका कोई फायदा नहीं है और न ही जिससे कोई हल निकलने वाला है. हमें जरूरी तौर पर चुनावों से बेपरवाह होना होगा, जो अधिक से अधिक, शुद्ध रूप से एक रणनीतिक चुनाव होते हैं कि इस “लोकतांत्रिक” किस्से में हिस्सा लेने से बचा जाए, या फिर अपने माफिक एक खास हालात पैदा करने के नजरिए से इस या उस उम्मीदवाद का समर्थन किया जाए. ये खास हालात भी हम कम्युनिस्ट राजनीति के ढांचे के भीतर सटीक रूप से परिभाषित करते हैं, जिसका इस राजसत्ता की रस्मों से कोई रिश्ता नहीं होता. हमें अपना कीमती समय अपनी सच्ची राजनीतिक मेहनत में लगाना चाहिए. और यह काम ऊपर दिए गए चार बिंदुओं के दायरे में ही होना चाहिए.


समयांतर, जून 2017 में प्रकाशित

निर्भया फैसला: इंसाफ या प्रतिशोध

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/06/2017 12:08:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े का नियमित स्तंभ इस बार निर्भया बलात्कार मामले में आए अंतिम फैसले के बारे में है, जिसके तहत कसूरवार ठहराए गए युवकों को फांसी की सजा की पुष्टि की गई है. अनुवाद: रेयाज उल हक

पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय ने निर्भया मामले के नाम से जाने जाने वाले, 16 दिसंबर 2012 के सामूहिक बलात्कार मामले में चार कसूरवारों की फांसी की सजा की पुष्टि की तो अदालत में मौजूद लोग खुशी से झूम उठे. यह खुशी उस अभूतपूर्व गुस्से और आक्रोश के माफिक ही है, जो 23 साल की फिजियोथेरेपी इंटर्न ज्योति सिंह के बलात्कार और उस पर हुए क्रूर हमले से देश भर में पैदा हुआ था. सुप्रीम कोर्ट के लिए यह एक गैरमामूली मौका रहा होगा जब उसके किसी फैसले को लोगों का इतना व्यापक समर्थन हासिल हुआ, जिसकी गूंज देश के कोने-कोने में सुनने को मिली. लोगों की राय सुनकर ऐसा जाहिर होता है कि उन्हें इस बात की तसल्ली मिली है कि आखिरकार इस मामले में इंसाफ हो गया. लेकिन सवाल है कि क्या वाकई ऐसा हुआ है? बलात्कार और हत्या के अपराध के लिए मध्यकालीन और बर्बर मौत की सजा दिया जाना इंसाफ नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी चीज है, जिसकी जड़ें मध्यकालीन संस्कृति में ही हैं और जिसे प्रतिशोध या बदला कहा जाएगा. अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए ऐसा नहीं किया कि वो इसको पूरी गंभीरता में देखे और अपराधियों की सजा में कमी लाने वाले कारकों पर सावधानी से गौर करते हुए इसे एक दुर्लभतम (दुर्लभ में भी दुर्लभ) मामले के रूप में स्थापित करे, बल्कि उसने “सामूहिक विवेक” की बात का हवाला दिया है, जिसका सीधा सीधा मतलब यह है कि फैसले को सही ठहराने के लिए भीड़ की मानसिकता का उपयोग किया गया. इस फैसले में उम्र, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, सुधार की संभावना या किसी भी ऐसी बात पर गौर नहीं किया गया है, जो कसूरवारों से जुड़ी है और उनकी सजा में कमी करने की वजह बनती. न ही उसने पुलिस की नाकामी की तरफ रत्ती भर भी इशारा किया, जो ऐसे अपराधों में काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं. न ही अदालत ने भविष्य में ऐसे अपराधों को होने से रोकने के बारे में उठाए जाने वाले कदमों के बारे में कोई सवाल किया. जबकि ये सारे मुद्दे इंसाफ के सरोकार के दायरे में आते हैं.

दुर्लभ में भी दुर्लभ मामला

इसमें कोई शक नहीं है कि यह उस लड़की के खिलाफ एक घिनौना अपराध था. छहों अपराधियों ने न सिर्फ उसका यौन शोषण किया, बल्कि जैसा कि मीडिया में बताया गया था, उसके यौनांगों में धातु का सरिया डाल कर उसकी आंतें तक खींच ली थीं. कोई भी सभ्य समाज ऐसी घटना पर उसी तरह की प्रतिक्रिया देगा, जैसी प्रतिक्रिया भारत में हुई. लेकिन अगर इस समाज ने इससे पहले बलात्कार और हत्याओं के लाखों मामलों में से कुछ पर भी ऐसी ही संवेदना दिखाई होती, तो यह एक पूरी तरह से सराहनीय बात होती. क्योंकि आखिरकार ऐसा अपराध पहली बार नहीं हुआ था. लेकिन अपनी टीआरपी के उन्माद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे अपने पर्दे पर एक ऐसी क्रूरता का मामला बना दिया जो पहले कभी देखी-सुनी नहीं गई. निर्भया नाम भी मीडिया का ही दिया हुआ है और इसी तरह धातु के सरिए वाली बात भी इसकी अपनी खोज थी, जिसे निचली से लेकर सर्वोच्च अदालत तक ने बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया और इसे दुर्लभतम मामला बना दिया. 400 पन्नों के फैसले में ‘लोहे का सरिया (आयरन रॉड)’ शब्द 104 बार आया है, जो दिखाता है कि किस तरह इस बात ने अदालत द्वारा अपराधियों को मौत की सजा को कायम रखने में निर्णायक भूमिका निभाई है. सच्चाई यह है कि सिंगापुर के हॉस्पीटल द्वारा (जहां पीड़िता का इलाज किया गया था) तैयार पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट ने इसकी पुष्टि की थी कि उसका गर्भाशय और अंडाशय सही-सलामत थे. यह सीधे-सीधे सरिए वाले सिद्धांत को गलत साबित करता है, क्योंकि गर्भाशय को नुकसान पहुंचाए बिना सरिया आंतों तक नहीं पहुंच सकता. तब, मीडिया इस घटना पर सामूहिक उन्माद खड़ा करने में कैसे कामयाब रहा था? इसका जबाव शायद मीडिया द्वारा फैलाई गई इस खबर में है कि इस मध्यवर्गीय लड़की का कम से कम एक बलात्कारी दलित समुदाय से आता है. हालांकि यह बात चुपके-चुपके ही फैलाई गई, लेकिन इसने मध्यवर्ग के गुस्से को भड़काने में अहम भूमिका अदा की, जो देश भर में व्यापक रैलियों और कैंडल मार्च की शक्ल में सामने आई. दूसरे वर्ग इसमें जुड़ते गए और इसने विरोध आंदोलनों की एक सुनामी की शक्ल ले ली.

निर्भया के पहले और बाद में भी ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं, जिनकी तुलना इस मामले से की जा सकती है, लेकिन उन पर ऐसी किसी प्रतिक्रिया की बात तो छोड़ दी दीजिए, उस वर्ग के कानों पर जूं तक न रेंगी, जो निर्भया के लिए सड़कों पर उतरा था. 2006 में खैरलांजी में दिल को दहला देने वाली एक घटना में एक दलित मां और उसकी 19 साल की बेटी का गांव की एक भीड़ द्वारा क्रूर बलात्कार किया गया था और यातना दे-दे कर उन्हें मार दिया गया था. इसके बाद उसके दो बेटों को भी पीट-पीट कर मार डाला गया. बाद में उनकी निर्वस्त्र लाशें बरामद की गईं, जिनके यौनांगों में छड़ियां पाई गईं. लेकिन गैरदलितों में इस पर कोई सुगबुगाहट नहीं हुई. जब दलितों ने स्वत:स्फूर्त तरीके से इस मामले पर अपने गुस्से को जाहिर किया, तो पुलिस ने बहुत बुरी तरह उनकी पिटाई की और उन्हें नक्सली कहा, जिसकी शुरुआत महाराष्ट्र के तत्कालीन गृह मंत्री ने की थी. लेकिन यह भी इस वर्ग की संवेदना को जगा पाने में नाकाम रहा. इसके उलट इस वर्ग ने इस पूरे मामले की गंभीरता को कम करते हुए इसे एक ऐसी दुर्भाग्यशाली घटना का रंग दिया, जिसकी वजह एक औरत की गुस्ताखी थी, जिसने मासूम गांववालों के नैतिक गुस्से को भड़का दिया था. ऐसा नहीं है कि खैरलांजी दलित महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों की पहली और आखिरी घटना थी. दलित उत्पीड़न के ऐसे हजारों मामले खैरलांजी से पहले हो चुके हैं और उसके बाद उनमें तेजी ही आई है.  आज, हर रोज छह दलित औरतों का बलात्कार होता है, जिनमें से ज्यादातर में अमानवीय निर्ममता से हमला किया जाता है. लेकिन न तो उन घटनाओं पर व्यापक समाज में ही कोई प्रतिक्रिया हुई और न ही उन्होंने जजों की चेतना को झकझोरा कि वे उन बलात्कारों को दुर्लभतम मानें. शायद उनके लिए दलितों के साथ होने वाले बलात्कार एक मामूली बात, यानी सामान्यता है!

एक असामान्य सामान्यता

असल में भारतीय समाज में बलात्कार खुद एक असामान्य सामान्यता है. भारत में औरत की देह को सांस्कृतिक रूप से सामाजिक-राजनीतिक हिसाब बराबर करने की एक निशानी के रूप में लिया जाता है. समाज का टुकड़ों-टुकड़ों में अपार बिखराव और ऊंच-नीच की व्यवस्था इस स्थिति को संभावित रूप से व्यापक बना देती है और इसलिए यह औरतों की देह पर हमलों की संभावनाओं को भी बढ़ा देती है. किसी भी सांप्रदायिक या राष्ट्रीय संघर्ष में औरत की देह मुख्य निशाना बनती है. भारत के बंटवारे के दौरान सरहद के दोनों तरफ 100,000 से ज्यादा औरतों का अपहरण और बलात्कार किया गया था. उन पर सिर्फ यौन हमले ही नहीं हुए बल्कि हमलावरों की जीत की निशानी के तौर पर उनको निर्मम यातनाएं भी दी गई. अनेक औरतों के स्तन काट दिए गए, दूसरी अनेक औरतों के यौनांगों के साथ दुर्व्यवहार किया गया और यातना दी गई – जिनमें से ज्यादातर मामलों में अंजाम मौत के रूप में सामने आया.  यहां तक कि 1984 के सिख कत्लेआम में भी औरतों का व्यापक अपहरण और बलात्कार किया गया. गुजरात में 2002 में मुसलमान औरतों और बच्चियों के साथ बेरहमी से सरेआम बलात्कार किया गया और उन्हें मार कर उनकी लाशें जला दी गईं. अनेक औरतों ने यौन हिंसा का सबसे वहशी रूप देखा – जिसमें बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, सार्वजनिक बलात्कार, निर्वस्त्र किया जाना, उनकी देह में वस्तुएं घुसाना और छेड़खानी आदि शामिल हैं.  औरतों की देह एक राजनीतिक अखाड़ा बना दी गई है, जो राष्ट्रवाद और ताकत के प्रदर्शन के काम में लाई जाती है. विरोधी द्वारा बलात्कार की गई हरेक औरत जीत की एक वस्तु, एक तमगा, बन जाती है. इसी सोच के मुताबिक तरह राष्ट्र राज्य “भारत माता” बन जाता है, जो एक ऐसी महिला है जिसे बाहरी दुश्मनों से बचाने की जरूरत है.

असल में बलात्कार को रोजमर्रा की मामूली बात बनाने की जड़ें जातीय संस्कृति में धंसी हुई हैं, जिनमें एक प्रभुत्वशाली जाति के पास निचली जातियों की औरतों की देहों पर नियंत्रण हासिल होता है. ऐसे रिवाज थे कि निचली जातियों की नई दुल्हनों को अपनी शादी को मुकम्मल बनाने के लिए अपनी पहली रात में उन्हें ब्राह्मणों के पास भेजा जाता था. केरल में पिछली सदी की शुरुआत तक तो यह चलन में था ही, सामंती भारत के दूसरे हिस्सों में भी यह अलग-अलग रूपों में मौजूद था. संयोग से, संघ परिवार के विचारक इस रिवाज को गर्व से सही ठहराते हुए इसे गैर ब्राह्मणों की नस्लों को सुधारने का एक वैज्ञानिक तरीका बताते हैं.  इस रिवाज को पूंजीवादी आधुनिकता ने पीछे धकेल दिया है, लेकिन दलितों और आदिवासियों का बलात्कार कम नहीं हुआ है. वो लाखों की संख्या में अब भी होते हैं और इस तरह वे भारतीयों के रोजमर्रा के अनुभव और उनके आसपास की दुनिया को रचते हैं.

भारतीयों की सांस्कृतिक मानसिकता औरतों को मर्दों की जायदाद के रूप में देखती है, जिनको दूसरों से बचाना जरूरी होता है, जाहिर सी बात है कि बलात्कार ऐसा यौन प्रसंग बन जाता है जो इस पूरे नजरिए के साथ अटूट रूप से जुड़ा हुआ है. औरतों के शुद्ध, पवित्र और विनम्र होने का विचार बलात्कार संस्कृति की गंभीरता को हल्के-फुल्के तरीके से पेश करने और उसे आम बनाने का लक्षण है. यह प्रभुत्वशाली विचार कि औरतों की भूमिका मर्दों की सेवा करने की होती है, यौन इच्छाएं मर्दों का विशेषाधिकार हैं, बलात्कार जायदाद पर एक हमला है, लेकिन मर्दों को उकसाने का दोष औरतों पर आता है, बलात्कार की पीड़िता और उसके परिवार को सामाजिक रूप से अपमानित और अलग-थलग कर देना, इन सबने बलात्कार के प्रति संस्थागत (यानी पुलिस और न्यायपालिका के) रवैयों को भी अपने मुताबिक ढाल दिया है. बदकिस्मती से, औरतों ने भी इन्हें अपने भीतर उतार लिया है. वे सामाजिक दायरों में अपनी अलग जगहों (मसलन आरक्षित डिब्बे, सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में सीटें आदि) की जो मांगें खुशी खुशी करती हैं, वो इस संस्कृति के आपराधिक चरित्र को हल्का करने और बलात्कार संस्कृति को सामान्य बनाने में योगदान देती है.

क्या मौत इसका इलाज है?

मौत की सजा को लेकर लोगों में पाई जाने वाली सनक भी दुश्मन से बदला लेने की भारतीय संस्कृति में रची-बसी है, क्योंकि यहां इंसाफ का विचार जाति-सापेक्ष होता है. आंकड़े दिखाते हैं कि मौत की सजा के पीड़ितों/कसूरवारों की एक व्यापक बहुसंख्या दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय से आती है. मौत की सजा का रिश्ता, उस विषय की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से होता है.  1992 में निचली जातियों द्वारा ऊंची जाति के भूमिहारों के जनसंहार, बारा जनसंहार, के जवाब में भूमिहार जमींदारों की निजी सेना सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने 23 दिसंबर 1991 को पड़ोस के माने और बरसिम्हा गांवों के 10 दलितों की हत्या की. इस मामले में बड़ी तेजी से चार लोगों को मौत की सजा सुनाई गई, जिनमें से तीन दलित हैं (राष्ट्रपति ने हाल ही में इन सजाओं को आजीवन कारावास में बदल दिया है), लेकिन बिहार में कई दर्जन जनसंहार करने वाले ऊंची जातियों के हत्यारों को पटना उच्च न्यायालय एक जैसे मिलते जुलते फैसलों के जरिए जल्दी-जल्दी बरी कर रहा है.  नागरिक अधिकार संगठनों में काम करने वाले हम लोग मौत की सजा के खात्मे की मांग करते रहे हैं, क्योंकि यह सजा देने के किसी मकसद को पूरा नहीं करती, और यह किसी अपराधी को अपराध करने से तो और भी कम रोकती है. बल्कि अंतरराष्ट्रीय आंकड़े इसकी ओर इशारा करते हैं कि मौत की सजा को खत्म कर चुके देशों में, मौत की सजा को कायम रखने वाले देशों के मुकाबले अपराध की दरें कहीं कम हैं.

इस पर गौर करना आंखें खोल देने वाला होगा कि निर्भया के बाद के चार बरसों में खुद दिल्ली में ही बलात्कार के मामले तीन गुना बढ़ गए हैं.  एनसीआरबी आंकड़े बलात्कार के मामलों में अबाध इजाफे के रुझान को भी उजागर करते हैं. 2011 में कुल बलात्कारों की संख्या 24,206 से 2.97 फीसदी बढ़ कर 2012 में 24,923 हुई थी. लेकिन इसके बाद के साल में 35.24 फीसदी की भारी वृद्धि देखने को मिली जब यह 2013 में 33,707 हो गया और 2014 में यह 8.98 फीसदी के इजाफे के साथ 36,735 हो गया. सर्वोच्च अदालत द्वारा फांसी की सजा की तस्दीक करने के बाद चार दिनों के भीतर मीडिया में बलात्कार की तीन घटनाओं की खबरें आईं, जिनमें से एक रोहतक की घटना थी, जिसे निर्भया से भी कहीं अधिक क्रूर तरीके से अंजाम दिया गया था. मुक्त बाजार के कायदों ने जिस तरह के बहुआयामी संकट को जन्म दिया है, जिसके तहत युवाओं में जिंदगी को लेकर एक अनिश्चितता जुड़ी हुई है, यह उनके बीच अलगाव और हताशा को जन्म देती है जो बलात्कारों के रूप में सामने आता हुआ दिखाई देता है.

इसका इलाज कानून के शासन को समान रूप से लागू करने में है. निर्भया का मामला इस बात की बेहतरीन मिसाल है कि मीडिया अपने कारोबारी हितों की भरपाई के लिए कैसे लोगों के बीच की घटिया प्रवृत्तियों को हवा देता है और उसके पीछे-पीछे सरकार (और न्यायपालिका) आखिरकार देश को मध्ययुगीन अंधेरी खाई में खींच कर ले जा रहे हैं.

समयांतर जून 2017 में प्रकाशित

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें