वापस बर्बरता की ओर: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/10/2018 07:08:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े अपने इस स्तंभ में भाजपा के शासनकाल में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा और बलात्कार की घटनाओं की चर्चा कर रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

महाराष्ट्र के पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और अब मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह ने, जिन पर भारत के युवाओं की शिक्षा के प्रशासन की जिम्मेदारी है, अपनी समझदारी का नमूना दिखाते हुए यह दावा किया कि डार्विन गलत थे. लेकिन कठुआ में संघ परिवार के उनके संगियों की करतूत को देखते हुए यह सोचा जा सकता है कि शायद वो सही हैं. आठ साल की आसिफा को अगवा करने में जो बर्बरता दिखाई गई, वह इस धरती पर किसी भी ऐसे सभ्य इंसान को झकझोर देने और शर्मिंदा कर देने के लिए काफी है जिसे इन लोगों के इस बदतर हालत में विकसित हो जाने में यकीन हो: उसे एक मंदिर में बंद करके भूखे रखा गया और पांच दिनों तक उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, बेरहमी से उसकी हत्या की गई और उसकी कुचली हुई लाश को एक जंगल में फेंक दिया गया, ताकि उसके मुस्लिम बाकरवाल समुदाय को डरा कर उस इलाके से भगा दिया जाए. और मानो यह बर्बरता ही काफी न हो, सत्यपाल की ही वैचारिक मंडली के लोगों ने, जम्मू बार असोसिएशन में हिंदू एकता मंच के सदस्य और संघ परिवार से जुड़े दूसरे गिरोहों ने बलात्कारियों के समर्थन में एक घिनौना जुलूस निकाला, जिसका नेतृत्व भाजपा के मंत्री कर रहे थे. यह बताने के लिए वे राष्ट्रीय झंडे फहरा रहे थे कि वह अमानवीय करतूत एक राष्ट्रवादी उपलब्धि थी. यह डार्विन के गलत होने का एक और सबूत था – जानवर से इंसान बनने (यानी उद्विकास) की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरने के बाद, इंसानी शरीर वाले लोग वहशी जानवरों से तो बदतर नहीं ही हो सकते. ऐसी अनेक करतूतें भी हैं, जिनकी इस करतूत के साथ ठीक-ठीक तुलना तो नहीं की जा सकती, लेकिन जो पक्के तौर पर इसकी निशानी हैं कि हमने सभ्य दुनिया में अपनी जगह पर दावा करते हुए जो थोड़ी-बहुत तरक्की की थी, हम उससे पीछे जा रहे हैं.

आती हुई गर्मियों की गहमागहमी

अप्रैल में गर्मियों के मौसम की शुरुआत में ऐसी अनेक घटनाएं घटीं, जिन्होंने हमारे वक्त की हताशा और गमगीनी को और गहरा कर दिया. जिन दिनों इस देश को जनवरी में आसिफा के साथ घटी घटना का पता लगा, जब बलात्कारियों के समर्थन में हिंदुत्व कट्टरपंथियों ने प्रदर्शन किए, उन्हीं दिनों एक 17 साल की लड़की की त्रासद दास्तान भी सामने आई, जिसका उत्तर प्रदेश में उन्नाव विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने 4 जून 2017 को बलात्कार किया था और इसके बाद विधायक के तीन साथियों द्वारा उसका अपहरण करके उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था. यह घटना तब उजागर हुई जब लड़की ने 9 अप्रैल को योगी आदित्यनाथ के आवास के सामने खुद को जलाने की कोशिश की. उसी दिन उसके पिता की न्यायिक हिरासत में मौत हो गई थी. उन्हें सेंगर के भाई के नेतृत्व में सेंगर समर्थकों ने बुरी तरह मारा था क्योंकि उन्होंने एफआईआर वापस लेने से इन्कार कर दिया था. पुलिस ने हमलावरों को गिरफ्तार करने के बजाए लड़की के पिता को ही न्यायिक हिरासत में ले लिया, जहां उनकी मौत हो गई. इसके बाद भड़के गुस्से के नतीजे में ही जाकर सेंगर के नाम पर एक बाकायदा एफआईआर दर्ज हुआ और सीबीआई ने उसे पूछताछ के लिए हिरासत में लिया.

नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार के इन दो मामलों के सामने आने के बाद, खबरों में लड़कियों के साथ बलात्कार और उनकी हत्या की इतनी खबरें आने लगीं मानो लग रहा था कि भारत ‘बच्चियों के बलात्कार’ का एक महीना मना रहा हो. चार महीने की बच्चियां तक इसकी शिकार बन रही थीं. एक तरफ तो नागरिक समाज में ऐसी घटनाएं हो रही थीं, वहीं उनके साथ राज्य द्वारा लिए जाने वाले फैसले और कार्रवाइयों का सिलसिला मानो एक होड़ लगा रहा था. अगर कुछेक की ही मिसाल दें, तो सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी अनेक याचिकाओं को बड़ी नाराजगी के साथ खारिज कर दिया, जिनमें रहस्यमय हालात में और संदिग्ध राजनीतिक मोड़ पर जज लोया की अचानक होने वाली मौत की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई थी; गुजरात उच्च न्यायालय ने माया कोडनानी को बरी कर दिया, जिसे 2012 में एक विशेष अदालत ने 2002 में गुजरात दंगों के दौरान नरोदा पाटिया मामले की ‘मुख्य साजिशकर्ता’ बताया था, जिसमें 97 मुसलमान मार दिए गए थे – और यह पहली रिहाई नहीं थी; गुजरात 2002 में शामिल ज्यादातर अपराधी छूट चुके हैं, और इसके पीड़ितों के लिए इंसाफ की मांग करने वाला सबसे प्रमुख चेहरे तीस्ता सीतलवाड़ को लगातार परेशान किया जा रहा है. आतंक-विरोधी एक विशेष अदालत ने हिंदू साधु स्वामी असीमानंद और चार दूसरे लोगों को 2007 के मक्का मस्जिद बम धमाके के मामले में रिहा कर दिया, जिसमें 18 मई 2007 को नौ लोग मारे गए थे और 58 घायल हुए थे. गुजरात 2002 की ही तरह, ‘भगवा’ आतंक की इन कार्रवाइयों के ज्यादातर आरोपित छूट चुके हैं, और दूसरी तरफ पुलिस 31 दिसंबर 2017 को पुणे में यलगार परिषद के संबंध में कार्यकर्ताओं के घरों पर छापे मार रही है.

इस आखिरी मामले में, महाराष्ट्र के नरेंद्र मोदी माने जाने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने एक बयान दिया कि इन छापों का यलगार परिषद से कोई लेना-देना नहीं था. यह झूठ फौरन ही उजागर हो गया, जब सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तलाशी वारंट की एक कॉपी लोगों के बीच प्रसारित की, जिसमें साफ-साफ भीमा-कोरेगांव हिंसा का हवाला था. अगर वे सचमुच में भीमा-कोरेगांव से संबंधित थे, तो फिर यह समझना मुश्किल है कि तब नागपुर में वकील सुरेंद्र गडलिंग और दिल्ली में रोना विल्सन के घरों पर किस तर्क से छापा मारा गया, जिनका यलगार परिषद या भीमा-कोरेगांव हिंसा से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था. जहां फड़नवीस ने 1 जनवरी 2018 को हुई हिंसा के लिए एक एफआईआर में पहले आरोपित संभाजी भिडे को क्लीन चिट दे दी, वहीं वे उन कार्यकर्ताओं को लगातार परेशान कर रहे हैं, जो एक दिन पहले हुए यलगार परिषद के साथ जुड़े थे या न भी जुड़े हों.

बलात्कार और भाजपा

भाजपा के मई 2014 में सत्ता में आने के बाद से, बलात्कार की घटनाओं में साफ तौर पर तेजी से इजाफा हुआ है. एनसीआरबी की क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2010 से 2016 के बीच प्रति एक लाख आबादी पर बलात्कार की घटनाएं और उनकी दर इस प्रकार है:





यह साफ-साफ दिखाता है कि जहां बरसों के दौरान बलात्कार की घटनाओं में लगातार एक इजाफा हो रहा था और संप्रग सरकार के आखिरी साल (2013) में इसमें खासा उछाल आया, वहीं इसके बाद इसमें एक तीखी बढ़ोतरी हुई है. संप्रग और राजग के तीन सालों के दौरान बलात्कार की घटनाओं का औसत क्रमश: 27613 और 36778 है, और प्रति लाख आबादी पर घटनाओं की दर क्रमश: 4.7 और 6.23 है, जिसका मतलब है कि भाजपा के शासन काल में बलात्कार की घटनाओं में और इसकी दर, दोनों में ही 33 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. संभव है कि इस चिंताजनक इजाफे की कोई ऐसी वजह पेश करना मुश्किल हो जिसको निर्विवाद रूप से कबूल किया जा सके, लेकिन इस पर जरूर गौर किया जा सकता है कि इस इजाफे में ज्यादातर भाजपा की हुकूमत वाले राज्यों का योगदान है. क्या ऐसा भारत के सामंती अतीत के वैचारिक महिमामंडन की वजह से हो रहा है, जिसमें औरतों को मर्दों के लिए महज एक यौन वस्तु समझा जाता था? ज्यादातर हिंदू धर्मशास्त्रों में – जिसकी एक प्रमुख मिसाल मनुस्मृति हो सकती है – औरतों को लेकर बेहद खौफनाक हवाले हैं.[1]  गर्भ में ही बच्चियों को मार देने की घटनाएं हिंदुओं में सबसे ज्यादा हैं, जो भाजपा शासित राज्यों में चिंताजनक लैंगिक अनुपात से जाहिर होता है. लैन्सेट द्वारा 2011 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक पिछले तीन दशकों में 1 करोड़ 20 लाख बच्चियों को जन्म से पहले ही मार दिया गया.[2]

बलात्कार के ऐसे मामलों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है, जिनमें भाजपा नेता अभियुक्त हैं. इस बात की गंभीरता को समझने के लिए 2016 और 2017 की कुछेक घटनाओं की एक झलक काफी है: उत्तराखंड पुलिस ने भाजपा नेता हरक सिंह रावत को एक 32 वर्षीय महिला के बलात्कार और उत्पीड़न के लिए गिरफ्तार किया. [3] एक भाजपा नेता वेंकटेश मौर्य पर चित्रदुर्ग की एक 38 वर्षीय महिला के बलात्कार के मामले में आरोप लगाए गए.[4]  गुजरात में एक स्थानीय भाजपा नेता अशोक मकवाना को 29 मई को इंडिगो एयरलाइंस की गोआ-अहमदाबाद उड़ान के दौरान 13 साल की एक लड़की के साथ छेड़खानी के आरोप में गिरफ्तार किया गया.[5] मध्य प्रदेश में एक स्थानीय भाजपा नेता और उसके पांच साथियों पर एक आदिवासी लड़की को अगवा करके उसके साथ सामूहिक बलात्कार करने के आरोप हैं, क्योंकि पुलिस के मुताबिक, उसने भाजपा नेता पर दर्ज कराए गए छेड़खानी के मामले को वापस लेने से मना कर दिया था.[6]  एक कॉरपोरेटर और भाजपा की मीरा-भयंदर ईकाई के महासचिव और म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन की वार्ड समिति के अध्यक्ष अनिल भोसले पर एक 44 वर्षीया महिला का बलात्कार और अप्राकृतिक सेक्स करने का आरोप है.[7]  एक स्थानीय भाजपा नेता भोजपाल सिंह जादोन और उसके दो साथियों पर एक दलित महिला का सामूहिक बलात्कार करने का आरोप दर्ज है. मध्य प्रदेश में मोरेना में सुमावली गांव की निवासी इस महिला को बीपीएल कार्ड दिलाने में मदद करने का वादा किया गया था.[8]  दिल्ली में भाजपा के पूर्व विधायक विजय जॉली पर बलात्कार का मामला दर्ज है. शिकायतकर्ता ने बताया कि जॉली ने गुड़गांव के एक रिज़ॉर्ट में उसके ड्रिंक में नशीली दवा मिला कर उसका यौन उत्पीड़न किया था.[9]  गुजरात से भाजपा के एक विधायक जयेश पटेल के खिलाफ, जो वडोदरा में निजी मालिकाने वाली पारुल यूनिवर्सिटी का संस्थापक अध्यक्ष है, एक 22 वर्षीय नर्सिंग छात्रा के बलात्कार का मामला दर्ज है.[10] रेक्टर भावना पटेल पर भी अपराध में मददगार होने का मामला दर्ज है.  ये बलात्कार के इक्के-दुक्के मामले भर नहीं हैं, जिनमें भाजपा के लोगों पर अपराध के आरोप लगे हैं. बलात्कार की पीड़ित एक महिला के लिए ताकतवर लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना भी कितना मुश्किल होता है, यह बात उन्नाव मामले से भी उजागर होती है.

तेजरफ्तार पतन

धूमधाम से होने वाले सरकारी प्रचार के बावजूद, भाजपा की हुकूमत के ये चार साल लोकतंत्र के तेज रफ्तार पतन को दिखाते हैं, जिसमें कानून व्यवस्था और तार्किक और वैज्ञानिक नजरिए की जड़ें उखड़ती जा रही हैं. देश में सभी संस्थानों का भगवाकरण होना और स्वतंत्र न्यायपालिका का, जो भारत में अवाम की आखिरी उम्मीद है, कमजोर पड़ते जाना लोकतंत्र के भविष्य के लिहाज से चिंताजनक है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को लेकर पैदा हुआ विवाद है, जिनके खिलाफ अभूतपूर्व तरीके से सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ जजों ने खास तौर पर बुलाई गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी बातें रखीं और हाल ही में विपक्ष जिनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लेकर आया. फिलहाल पूर्व भाजपा अध्यक्ष और अब राज्य सभा के सभापति वेंकैया नायडू ने महाभियोग के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जिससे किसी और अभूतपूर्व संवैधानिक विवाद के खड़ा होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता.


एक तरफ जहां सभी संवैधानिक अच्छाइयों को व्यवस्थित तरीके से खत्म किया जा रहा है, वहीं इस संविधान के शिल्पकार कहे जाने वाले आंबेडकर को भव्य स्मारकीय छवि दी जा रही है. अप्रैल में एक अहम आयोजन उनके नाम पर हुआ, जिसमें दिल्ली के 26 अलीपुर रोड में उनके लिए एक भव्य राष्ट्रीय स्मारक का उद्घाटन किया गया. उलझन में पड़े दलितों के मन में यह सवाल पैदा होता है कि कहीं आंबेडकर के नाम पर स्मारक, उनकी आवाज को दफनाए जाने के लिए तो नहीं बनाए जा रहे हैं. क्या यह हिंदू धर्म में औरतों को देवियों का दर्जा देने, लेकिन जीती-जागती औरतों को अमानवीय स्तर तक दबा कर और कुचल कर रखने के तरीके से मेल नहीं खाता है?

भाजपा के शासन का एक और शिकार तार्किकता और वैज्ञानिक नजरिया है, जिन्हें प्रोत्साहित करने की बात खुद संविधान में ही कही गई है, जो उन्हें लोकतंत्र का जरूरी उपकरण मानता है. छोटा हो या बड़ा, हरेक भाजपा नेता ने अतार्किकता को बढ़ावा देने में भारी योगदान दिया है, और इस अभियान की अगली कतार में खुद प्रधानमंत्री ही खड़े रहे हैं. याद कीजिए कि 2014 में ही उन्होंने कहा था कि भारत में प्रजनन की जीन तकनीक और प्लास्टिक सर्जरी महाभारत काल में मौजूद थी. हाल ही में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने कहा कि महाभारत काल में इंटरनेट मौजूद था और राज्य के राज्यपाल तथागत रॉय ने उन्हें अपना समर्थन दिया, जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे राष्ट्र के विवेक की रखवाली करेंगे. वे सभी जो अब तक डार्विन में यकीन रखते आए हैं कि इंसान तरक्की की राह पर आगे बढ़ रहे हैं, वे इस घनौनी पतनशीलता पर अवाक रह जाएंगे. इसीलिए, सत्यपाल सिंह ही सही मालूम पड़ते हैं जब वे कहते हैं कि डार्विन गलत थे!



नोट्स
  1. सृष्टि गोविलकर, ‘दीज 33 शॉकिंग वर्सेज़ फ्रॉम मनुस्मृति अबाउट वुमेन विल इन्फ्युरिएट यू’, http://www.youthconnect.in/2015/07/09/33-shocking-verses-from-manusmriti-about-women/
  2. नीता भल्ला द्वारा उद्धृत, https://in.reuters.com/journalists/nita-bhalla
  3. जी न्यूज, 30 जुलाई 2016
  4. डेक्कन क्रॉनिकल, 19 अक्तूबर 2016
  5. द हिंदू, 1 नवंबर 2016.
  6. डेक्कन क्रॉनिकल, 18 दिसंबर 2016.
  7. टाइम्स ऑफ इंडिया, 20 जनवरी, 2017.
  8. हिंदुस्तान टाइम्स 1 मार्च 2017.
  9. इंडिया टुडे, 23 फरवरी 2017.
  10. इंडियन एक्सप्रेस, 20 जून 2016.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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