मंदिर की वापसी: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/15/2018 05:18:00 PM


अपने नियमित स्तंभ में आनंद तेलतुंबड़े इस बार अयोध्या में राम मंदिर बनाने की कवायदों पर टिप्पणी कर रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक

वैश्विक पूंजी के समर्थन के साथ, ‘भ्रष्ट’ कांग्रेस के खिलाफ तूफानी हमला करते हुए नरेंद्र मोदी 2014 में सत्ता में आए तो उन्होंने अच्छे दिन और स्वच्छ भारत जैसे नारों से जनता को मुग्ध कर दिया था, जिनका मतलब जितना सीधा था उतना ही प्रतीकात्मक भी. लेकिन पिछले तीन बरसों में उन्होंने हमारे सार्वजनिक जीवन के हरेक पहलू को जितनी गलाजत से भर दिया है, उससे आने वाले कई बरसों में उबरना मुश्किल होगा. सामाजिक तौर पर, भगवा गिरोह को इसके लिए मजबूती मिली है कि वे अल्पसंख्यकों पर अपना आतंक थोपने और सांप्रदायिक जहर फैलाने की अपनी फासीवादी हरकतों को आगे बढ़ाएं. राजनीतिक तौर पर, लोकतांत्रिक कायदे व्यवस्थित रूप से खोखले किए गए हैं, संसदीय शिष्टाचार को कमजोर किया गया है और संस्थानों का भगवाकरण किया गया है. आर्थिक रूप से नोटबंदी और आनन-फानन में जीएसटी लागू करने जैसे अतार्किक फैसले लिए गए हैं और अर्थव्यवस्था में वृद्धि का रुझान पलट गया है: ये बातें उनकी हुकूमत की पहचान हैं. अब, जब पास आते 2019 के चुनावों के मद्देनजर उनकी नाटकीय भाषणबाजी से मदहोश लोगों की आंखें खुलने लगी हैं और हकीकत दिखने लगी है, जिसकी झलक हाल में चुनावों में उनकी पार्टी के प्रदर्शन में आई गिरावट में देखी जा सकती है, तो इस बात के साफ संकेत मिल रहे हैं कि राम मंदिर के नाम पर लोगों को सांप्रदायिक रूप से बांटने की रणनीति को फिर से आजमाया जा रहा है. आने वाले सालों में यह देश फिर से एक बुरे दौर से गुजरने जा रहा है.

सांप्रदायिकता की गलाजत

यह सब जानते हैं कि राम मंदिर, कश्मीर पर अनुच्छेद 370 और पाकिस्तान (दुश्मन) ऐसे तीन मुद्दे रहे हैं, जिन्होंने भाजपा को एक छोटी-मोटी, किनारे पर खड़ी पार्टी से धकेल कर एक खौफनाक सत्ताधारी पार्टी बना दिया. लेकिन इसने असल में राम मंदिर के मुद्दे से ही उड़ान भरी, जिसमें तब जान पड़ गई जब राजीव गांधी सरकार ने 1 फरवरी 1986 को फैजाबाद जज के फैसले के घंटे भर के भीतर ही बड़े उत्साह से बाबरी मस्जिद का ताला खोलने का आदेश दे दिया था. उनका इरादा 1984 से शुरू भाजपा के राम मंदिर अभियान की हवा निकालने का था, लेकिन संघ परिवार ने इस पहलकदमी को झटक लिया और सरकार के फैसले का असर उल्टा पड़ा. गांधी के इस फैसले ने भाजपा को (जो तब जनसंघ थी) खासा फायदा पहुंचाया, जिसने इसे 1984 की दो सीटों के आंकड़े से बढ़ा कर 1989 में 86 सीटों पर पहुंचा दिया. अपनी कामयाबी के उत्साह में तब भाजपा के अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को गुजरात में सोमनाथ से अयोध्या तक एक रथ यात्रा शुरू की. अगर गृह राज्य मंत्री प्रदीपसिंह जडेजा पर यकीन किया जाए तो इस घिनौनी रथयात्रा के शिल्पकार और कोई नहीं बल्कि मोदी थे (इंडियन एक्सप्रेस, 22.04.2017). 23 अक्तूबर को समस्तीपुर में लालू प्रसाद यादव की सरकार द्वारा आडवाणी की गिरफ्तारी, इसके बाद अयोध्या में जमा कारसेवकों के उन्माद, 30 अक्तूबर को उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह सरकार द्वारा उन पर गोलीबारी का अंत आखिरकार 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने पर हुआ. इसने देश भर में, खास कर मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, कानपुर, दिल्ली, भोपाल जैसे शहरों में दंगों की आग फैला दी, जिसके नतीजे में 2000 से ज्यादा मौतें हुईं, जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे, और करोड़ों रुपए की संपत्ति का नुकसान हुआ. इसी मंदिर मुद्दे की ही अगली कड़ी में मोदी ने 2002 में गुजरात में 2000 मुसलमानों के कत्लेआम के जरिए इस पूरे कारनामे में एक अहम योगदान दिया.

इन सांप्रदायिक जनसंहारों से भाजपा को भारी फायदा हुआ. यात्राएं लोगों में सांप्रदायिक उन्माद भड़काने का भाजपा का खास तरीका बन गईं. आडवाणी के बाद दूसरी यात्रा एकता यात्रा थी, जिसे भाजपा के मुखिया मुरली मनोहर जोशी ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक निकाला, जो भाजपा के थोड़े से नेताओं के साथ खत्म हुई. इसकी शुरुआत 1992 के गणतंत्र दिवस के मौके पर श्रीनगर के लाल चौक पर कड़ी सुरक्षा के बीच तिरंगा फहराने से हुई थी. इस यात्रा में भी मोदी शामिल थे जो इसके संयोजक थे. 2011 में एक और यात्रा ‘राष्ट्रीय एकता यात्रा’ की शुरुआत की गई, जिसे श्रीनगर में राष्ट्रीय झंडा फहराने के लिए भाजपा के युवा मोर्चा ने कोलकाता से निकाला. इसे जम्मू और कश्मीर में उमर अब्दुल्ला सरकार ने रोक दिया, जो उन दिनों जारी शांति प्रक्रिया को पटरी से उतार सकती थी. भाजपा जैसे-जैसे ताकत हासिल करती गई, इसने इन मुद्दों पर रणनीतिक चुप्पी साधे रखी और इनकी बजाए इसने विकास को अपने चुनावी मुद्दे के रूप में पेश किया. एक व्यापक पहुंच हासिल करने के लिए तो यह जरूरी था ही, वैश्विक पूंजी के अपने सरपरस्तों को मनाने के लिए भी यह जरूरी था. अब जब पार्टी महसूस कर रही है कि उसके नीचे की जमीन धंस रही है और लोगों के ऊपर हकीकत साफ होती जा रही है कि यह सरकार कुछ खास नहीं कर रही है, तो ऐसा लग रहा है कि पार्टी अपने जनाधार को मजबूत करने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अपने पुराने खेल का सहारा लेने लगी है.

फिर से राम मंदिर

भाजपा के वैश्विक सरपरस्त लेकिन इस विचार से हो सकता है कि सहमत न हों और इसलिए यह 41 दिनों तक चलने वाली रामराज्य यात्रा से खुद को अलग रखे हुए है, जिसे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को झंडी दिखा कर रवाना करना था. लेकिन आखिरकार इसे 13 फरवरी को अयोध्या में भाजपा सासंद द्वारा रवाना किया गया, और यह यात्रा 6,000 किमी दूरी तय करते हुए तमिलनाडु के रामेश्वरम तक पहुंचेगी. बताया जाता है कि यात्रा का आयोजन महाराष्ट्र के एक अनजान से संगठन श्री राम दास मिशन यूनिवर्सल सोसायटी ने किया है, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े दो संगठनों विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने समर्थन दिया है. इसका मकसद ‘रामराज्य’ और राम मंदिर के बारे में ‘जागरुकता पैदा करना’ है. सवाल यह है कि ऐसा करने के लिए क्या उन्हें यात्राओं की जरूरत है? केंद्र और ज्यादातर राज्यों में भाजपा के सत्ता में है, जिनमें वे राज्य भी शामिल हैं जहां से यात्रा को गुजरना है, और इन राज्यों की मिसाल बखूबी बता सकती है कि रामराज्य कैसा होता है. मोदी की परिभाषा में यह एक कल्याणकारी राज्य है. अगर ऐसा है तो भाजपा सरकारें इसका ठीक उल्टी कही जा सकती हैं. भाजपा का सियासी एजेंडा सबकी नजरों के सामने है: यह यात्रा छह राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में 224 लोक सभा सीटों से गुजरेगी और यह कम अहम बात नहीं है कि कर्नाटक में अप्रैल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. हालांकि भाजपा सरकार ने यात्रा से खुद को एक सुरक्षित दूरी पर रखा है, लेकिन यात्रा जिन राज्यों से गुजरने वाली है वहां के पुलिस प्रमुखों को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लिखा है कि वे इसके आगे सफर को संभव बनाएं. यह दिलचस्प है कि जो सरकार, किसी रैली को तो छोड़ ही दें, एक छोटी सी आम सभा के लिए भी कार्यकर्ताओं को बेवजह ही अनुमति देने से मना कर देती है, उसने न सिर्फ इस यात्रा की इजाजत दी है, बल्कि अपनी व्यवस्था के लिए फरमान जारी किया है कि वो उसे मुमकिन बनाए, जबकि यह कानून-व्यवस्था के लिहाज से संभावित तौर पर खतरा है. रामराज्य की इसकी मांग भी अर्थपूर्ण है: रामराज्य की स्थापना, स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में रामायण को शामिल करना, रविवार की जगह गुरुवार को साप्ताहिक छुट्टी और विश्व हिंदू दिवस के रूप में एक दिवस का ऐलान. इस परियोजना का एक और पहलू भी है, वो यह है कि हिंदुत्व ताकतें रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का अदालत से बाहर निबटारा चाहती हैं, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में 15 मार्च से अंतिम सुनवाई होने वाली है. यह यात्रा मुस्लिम समूहों पर एक दबाव का काम कर सकती है, कि वे इसके लिए सहमत हो जाएं, क्योंकि अदालत के फैसले के बारे में पक्के तौर पर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है.

यह देखना दिलचस्प होगा कि यह रामराज्य क्या है. पहली बार गांधी ने अपने आजादी के आंदोलन में लोगों को फुसला कर जोड़ने के लिए इस अवधारणा का इस्तेमाल किया था, जब उन्होंने वादा किया था कि एक बार आजादी मिल जाने के बाद वे राम राज्य की स्थापना करेंगे. अपने खास अंदाज में गांधी इसकी व्याख्याएं बदलते रहे और आगे चल कर हिंदू धर्म से इसका रिश्ता तोड़ दिया. 26 फरवरी 1947 को उन्होंने लिखा, ‘कोई यह सोचने की भूल न करे कि रामराज्य का मतलब हिंदुओं का राज्य है. मेरा राम, खुदा या गॉड का दूसरा नाम है. मैं खुदा राज चाहता हूं, जो धरती पर ईश्वर के राज्य के समान है.’ गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने रामराज्य का मतलब एक ‘कल्याणकारी राज्य’ लगाया, लेकिन उन्होंने वहां जो कुछ भी किया वह आम लोगों का हक मार कर अंबानी और अडाणी जैसे लोगों की न बुझने वाली लालच की सेवा करने का ही काम किया. व्यवहार में रामराज्य ऐसा लगता है कि भोले-भाले हिंदुओं को प्रभावित करने के लिए सभी सियासी दलों द्वारा एक लफ्फाजी के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है. 1989 में अयोध्या के करीब ही राजीव गांधी ने कांग्रेस पार्टी के चुनावी अभियान की शुरुआत रामराज्य लाने के वादे के साथ की थी, जैसा आज उनके बेटे करते हैं. रामायण में जैसे रामराज्य को बताया गया, उसे बिना किसी आलोचना के आदर्श शासन के रूप में लिया जाता है. वाल्मीकि रामायण के छठे कांड (लंकाकांड) में बाकी बातों के अलावा यह कहा गया है, ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने कर्तव्य निभा रहे थे, अपने कामों से संतुष्ट थे और लालच से मुक्त थे.’ यह ठेठ वर्ण व्यवस्था है, जिसमें गांधी विश्वास करते थे और जो हमारे शासकों को पसंद है. लेकिन उन दलितों, आदिवासियों, शूद्रों और गैर-हिंदुओं का क्या, जो मिल कर एक व्यापक बहुसंख्या बनाते हैं और जो यकीनन ही ऐसे एक रामराज्य से इन्कार करेंगे?

इस चुप्पी का सबब?

भाजपा के हिंदुत्व का विरोध करने की जब बात आती है, तो कोई भी राजनीतिक विपक्ष नहीं मिलता. असल बात तो यह है कि भारत में कोई विपक्षी पार्टी ही नहीं है. सभी पार्टियां व्यापक जनविरोधी गठबंधन में एक साथ खड़ी हैं. मौजूदा मिसाल लें तो दो संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों (भाकपा और भाकपा-मार्क्सवादी) को छोड़ कर औपचारिक राजनीतिक धाराओं की ओर से विरोध की फुसफुसाहट भी नहीं है. इन पार्टियों का विरोध भी इस तरह के संकोची बयानों तक सीमित है कि यात्रा से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होगा, मानो एक सांप्रदायिक पार्टी से कोई और उम्मीद की जा सकती है. पश्चिम बंगाल में जिस तृणमूल कांग्रेस पर ‘अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण’ का आरोप लग रहा था, क्योंकि राज्य में उनकी तादाद अपेक्षाकृत ज्यादा है, उसने भी हाल ही में एक व्यापक ‘ब्राह्मण और पुरोहित सम्मेलन’ का आयोजन किया. इसे पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और तृणमूल के बीरभूम जिला अध्यक्ष अनुब्रत मंडल द्वारा संगठित किया गया. सम्मेलन में आए सभी पुरोहितों को गीता की एक प्रति, एक शॉल और रामकृष्ण परमहंस और उनकी पत्नी शारदा देवी की एक तस्वीर  भेंट की गई. सभी दलों की असलियत एक ही है. जिस कांग्रेस से विपक्षी की भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है, उसे यह दिखाने की फिक्र है कि वह हिंदू विरोधी नहीं है और इसलिए वह अपने नरम हिंदुत्व के साथ एक हास्यास्पद प्रतिद्वंद्वी बन कर रह गई है. जिस तरह से कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को जनेऊधारी ब्राह्मण के रूप में पेश किया जा रहा है, उसकी निंदा होनी चाहिए, लेकिन ‘सेक्युलर’ भारत में यह भी बिक रहा है.

हालिया गुजरात चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने इस पर जोर देने के लिए 27 मंदिरों का दौरा किया कि वे भी हिंदू हैं. कांग्रेस यह समझती है कि 18 सीटें वह उन विधानसभा इलाकों में जीती, जहां ये मंदिर स्थित थे, और 10 सीटें वह भाजपा से हथिया पाई क्योंकि राहुल गांधी ने मंदिरों की दौड़ लगाई थी. इसको इस बात से भी शर्म नहीं आती कि राज्य में जो भाजपा-विरोधी गर्म माहौल मौजूद था, उसके बावजूद वह भाजपा से सत्ता नहीं हथिया सकी, और न ही यह इस बात को समझ पाई है कि यह हिंदुत्व के मंच पर भाजपा से होड़ नहीं कर सकती है. आज जिन्होंने राहुल गांधी के नरम हिंदुत्व को कबूल किया, जल्दी ही वही उनसे कट्टर रुख की मांग करेंगे. यह एक खतरनाक घटनाक्रम है, जो भारत में हिंदू राष्ट्र की स्थापना को और करीब ही लाएगा. यह भले ही सच है कि चुनावी सफलता धार्मिक और जातीय हिसाब-किताब के आधार पर मिलती है न कि सामाजिक और राजनीतिक सेवाओं के रेकॉर्ड के आधार पर, लेकिन यह एक स्वाभाविक बात नहीं है. शासक वर्गों ने जानबूझ कर संविधान में जातियों और समुदायों को कायम रखने की साजिश रची और अनेक चीजों की ही तरह सेक्युलरिज्म के मामले में भी अवाम को धोखा दिया. धर्मनिरपेक्षता, सेक्युलरिज्म नहीं है, बल्कि यह बहुसंख्या के धर्म के प्रभुत्व को बनाए रखने की साजिश है, जिसे आज हम भारत में देख रहे हैं. अगर भारत सचमुच सेक्युलर होता, तो हमें हिंदू राष्ट्र के इन प्रेतों का सामना नहीं करना पड़ता.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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