अकादमिक चिंतन की धुंध से परे: अलां बादिऊ

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/24/2018 06:07:00 PM


दुनिया के अग्रणी दार्शनिकों में से एक, फ्रांसीसी नाटककार और उपन्यासकार अलां बादिऊ का यह लेख रूसी क्रांति को याद करने की मौजूदा रणनीतियों के खिलाफ एक दखल है. यह दलील देती है कि रूसी क्रांति के मानक अकादमिक चिंतन से पैदा हुई धुंध को खत्म करके ही हम इसकी समकालीन वास्तविकता को समझने की शुरुआत कर सकते हैं. इसलिए यह 1917 की परिघटना को इंसानी इतिहास में रख कर देखता है और दिखाता है कि कैसे यह हमें यह सोचने में मदद करती है कि इस नजरिए से पूंजीवाद अतीत की एक चीज बन चुका है. अनुवाद: रेयाज उल हक

 

1917 की रूसी अक्तूबर क्रांति के बारे में

एक इंसानी जिंदगी की छोटी सी मुद्दत में यह देखना हमेशा ही प्रभावशाली होता है कि एक ऐतिहासिक घटना (इवेंट) अपनी उम्र को पहुंचे, उसे झुर्रियां पड़ें, उसका जिस्म सिकुड़ने लगे और फिर वह गुजर जाए. एक ऐतिहासिक घटना की मौत तब होती है जब करीब करीब पूरी इंसानियत उसे भूलने लग जाती है. जब अवाम के हजूम की जिंदगी को रोशन करने और उसे राह दिखाने के बजाए, वह घटना महज तारीख की खास स्कूली किताबों में ही दिखाई देने लगे, बल्कि उनमें भी दिखाई देना बंद हो जाए. वह मर चुकी घटना अभिलेखागारों की धूल में दफ्न हो जाए.

असल में मैं कह सकता हूं कि मैंने अपनी निजी जिंदगी में 1917 की अक्तूबर क्रांति को अगर मरते हुए नहीं देखा तो कम से कम से मौत के करीब पहुंचते हुए जरूर देखा है. आप कहेंगे: आप उतने युवा नहीं हैं और इससे भी बड़ी बात यह है कि आप क्रांति के बीस बरसों के बाद पैदा हुए. इसके बावजूद, इसकी एक खूबसूरत जिंदगी थी! और इसके अलावा, हर कोई हर जगह इसकी एक सौवीं सालगिरह की बातें कर रहा है.

मेरा जवाब यह होगा: असल में हर जगह यह सौवीं सालगिरह उस चीज को छुपाएगी और उसे समझने से चूक जाएगी, जो इस क्रांति का मूल मुद्दा थी, और जिसकी वजह से कम से कम पिछले साठ बरसों में यह यूरोप से लेकर लातीनी-अमेरिका, यूनान से लेकर चीन, दक्षिण अफ्रीका से लेकर इंडोनेशिया तक, दसियों लाख नौजवानों की हौसलाअफजाई करती आई है. और जिसकी वजह से इसी मुद्दत में, उसने हमारे थोड़े से असली मालिकों को, पूंजियों के मुट्ठी भर मालिकों के निजाम को भी उतना ही खौफजदा भी किया है और इसीलिए दुनिया भर में इसे अहम झटके खाने पड़े हैं जिससे इसकी राह दुश्वार हुई है.

यह सच है कि लोगों के जेहन और उनकी यादों में एक क्रांतिकारी घटना की मौत को मुमकिन बनाने के लिए असलियत को बदलना पड़ता है, उसे एक खूनी और घिनौनी दास्तान में बदल देना पड़ता है. एक क्रांति की मौत को इल्मी तोहमतों के जरिए अंजाम दिया जाता है. सही बात है कि लोग इसके बारे में बातें करते हैं, इसकी सौवीं सालगिरह मनाते हैं! लेकिन इल्म के जरियों को दी गई इस शर्त के मातहत कि इन सभी बातों का यही नतीजा होना चाहिए: क्रांति, फिर से कभी नहीं!

मैं यह याद करना चाहता हूं कि फ्रांसीसी क्रांति के साथ भी यही सब हो चुका है. इस क्रांति के नायकों, रॉब्सपियर, सां-जुस्त, कदन को दशकों तक तानाशाहों के रूप में, हत्यारों का लिबास पहने कड़वे और महत्वाकांक्षी लोगों के रूप में पेश किया गया. यहां तक कि मिशेले जैसे फ्रांसीसी क्रांति के ऐलानिया हिमायती की ख्वाहिश भी रॉब्सपियर को एक तानाशाह के रूप में पेश करने की थी.
यहां मुझे यह भी दर्ज करना चाहिए कि ऐसा करते हुए मिशेले ने एक ऐसी चीज ईजाद की, जिसका उसे पेटेंट करा लेना चाहिए था, क्योंकि कामयाब रही. आज, ‘तानाशाह’ (डिक्टेटर) शब्द तक एक ऐसी तलवार है जो किसी भी बहस को धकिया कर उसकी जगह ले लेती है. लेनिन, माओ, कास्त्रो, बल्कि वेनेसुएला में शावेज और हैती में आरिस्तिदे क्या हैं? तानाशाह. बात खत्म.

असल में ये कम्युनिस्ट इतिहासकारों की एक पूरी पीढ़ी थी, जिसके अगुवा अलबर्ट माथिएज थे, जिनकी बदौलत पिछली सदी के बीस के दशक के बाद फ्रांसीसी क्रांति को इसकी समतावादी और सार्वभौम अहमियत के साथ सचमुच में दोबारा एक नई जिंदगी मिली. इसलिए, 1917 की रूसी क्रांति की ही बदौलत भविष्य को जन्म देने वाली फ्रांसीसी क्रांति के बुनियादी पल के बारे में, 1792 और 1794 के बीच के मोंताना कन्वेन्शन के बारे में, एक दोबारा पैदा हुई जिंदादिली और जुझारू तरीके से सोचा जा सका.

इससे जाहिर होता है कि एक सच्ची क्रांति हमेशा ही अपने से पहले की क्रांतियों को नई जिंदगी देती है: रूसी क्रांति ने 1871 के पेरिस कम्यून में जान डाली थी, और रोब्सपियर कन्वेन्शन और यहां तक कि हैती में तुसैं-लोवेर्तर के साथ काले गुलामों की बगावत को और यहां तक कि 16वीं सदी की जर्मनी में टॉमस म्वेन्त्सर की रहनुमाई में किसानों की बगावत को और उससे भी पहले, रोमन साम्राज्य में लौटें तो स्पार्टाकस के नेतृत्व में ग्लैडिएटरों और गुलामों की बगावत को दोबारा जिंदा किया.

स्पार्टाकस, टॉमस म्वेन्त्सर, रॉब्सपियर, सां-जुस्त, तुसैं-लोवेर्तर, वर्लिन लिसागरे और कम्यून के हथियारबंद मेहनतकश: इतने सारे ‘तानाशाह’, जिनके माथे बेशक झूठी तोहमतें और बदनामियां मढ़ दी गईं और जिन्हें भुला दिया गया, और जिन्हें लेनिन, ट्रॉट्स्की या माओ त्से-तुंग जैसे तानाशाहों ने उनका असली रुतबा हासिल कराया: वे अवामी मुक्ति के नायक थे, वे बेपनाह तारीख की मंजिलें थे, जिनसे होकर इंसानियत सामूहिक खुदमख्तारी की राह पर आगे बढ़ी.

आज, यानी पिछले तीस या चालीस बरसों से, चीन में सांस्कृतिक क्रांति के अंत के बाद से, बल्कि 1976 में माओ की मौत के बाद से इस पूरी बेपनाह तारीख की बाकायदा मौत की तैयारियां की जा रही हैं. हालात ऐसे हैं कि इसकी ओर वापसी की चाहत भी नामुमकिन करार दी जा रही है. हर रोज हमें बताया जाता है कि अपने मालिकों को बेदखल कर देना और दुनिया भर में एक समतापरक वजूद के लिए काम करना एक आपराधिक खामखयाली है और एक खूनी तानाशाही की शैतानी ख्वाहिश है. रीढ़विहीन बुद्धिजीवियों की एक फौज ने, खास तौर से हमारे मुल्क फ्रांस में, एक प्रति-क्रांतिकारी चुगलखोरी में महारत हासिल कर ली है और पूंजीवादी और साम्राज्यी हुक्मरानी की मजबूत तरफदारी का हुनर पाया है. गैरबराबरी के निगहबान, और बेबस अवाम के, गरीबों के, खानाबदोश मेहनतकशों के उत्पीड़न के निगहबान लोग ही हर जगह हुक्मरान हैं, काबिज हैं. उन्होंने बराबरी के विचार को लेकर चलने वाली सारी सियासी हुक्मरानियों को एक खास पहचान देने के लिए ‘टोटलिटेरियन’ (सर्वसत्तात्मक) शब्द ईजाद किया है.

इस पर गौर किया जाना चाहिए कि 1917 की रूसी क्रांति हर वह चीज थी, जो उससे होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन वह टोटलिटेरियन हरगिज नहीं थी. वह बेशुमार रुझानों से वाकिफ थी, उसने नए-नए अंतर्विरोध खड़े किए, वह अलग-अलग तरह के बेशुमार लोगों को साथ लेकर आई और उन्हें एकजुट किया, महान बुद्धिजीवी, कारखानों के मजदूर, सुदूर टूंड्रा के किसान. बेरहम खानाजंगी और जोशो-खरोश से भरी सियासी बहसों में इसने 1917 से 1929 तक कम से कम बारह साल गुजारे. यह किसी टोटलिटेरियन टोटलिटी की निशानी तो हरगिज नहीं थी, बल्कि यह एक गैरमामूली तौर पर सक्रिय उथल-पुथल की निशानी थी, जो इसके बावजूद एक विचार की रोशनी में अंजाम दिया जा रहा था.
 

1917 की रूसी क्रांति को ‘तानाशाही’ और ‘टोटलिटेरियन’ शब्दों के जरिए समझने की न तो गलती की जा सकती है और न ही उसे भुलाया जा सकता है.

इस क्रांति के बारे में कुछ भी समझने के लिए, इस क्रांति के बारे में कही जाने वाली हर एक चीज को पूरी तरह भुलाना होगा. हमें उस बेहद लंबे इंसानी इतिहास में लौटना होगा, और यह दिखाना होगा कि क्यों और कैसे 1917 की रूसी क्रांति अपने आप में ही आने वाली इंसानियत की बुलंदी की एक निशानी है.

यही वजह है कि मैं, हमारी प्रजाति के बेइंतहा इंसानी इतिहास की एक छोटी सी कहानी से शुरुआत करना चाहता हूं, जो इंसानी जीव का इतिहास है, इस अजीबोगरीब और खतरनाक, होशियार  और खौफनाक जानवर का इतिहास जिसे इंसान कहा जाता है और यूनानी दार्शनिकों ने जिसके बारे में कहा था: बिना परों वाला एक दोपाया जानवर. ‘बिना परों वाला दोपाया जानवर’ क्यों? क्योंकि जमीन की सतह पर रहने वाले सारे भारी-भरकम जानवर चार पैरों वाले हैं, लेकिन इंसान दो पैरों वाला है. और सभी चिड़ियां दो पैरों वाली होती हैं, लेकिन उन सभी के पर होते हैं और इंसान के पर नहीं होते. इसलिए सिर्फ इंसान ही ऐसा जानवर है जिसके दो पैर हैं लेकिन पंख नहीं हैं. 1917 की रूसी अक्तूबर क्रांति को असल में बिना परों वाले दोपायों के एक अहम मजमे ने अंजाम दिया था.
 

इस जानवर की प्रजाति के बारे में, जो हम सभी हैं, और क्या कहने को रह जाता है, सिवाय इस ऐतिहासिक और बहुत बुरे तरीके से साफ हो चुकी बात के कि यह बिना परों का दो पैरों वाला एक जानवर है?

आइए सबसे पहले हम इस बात को दर्ज करें कि हमारे छोटे से और नाचीज ग्रह पर जीवन के आम इतिहास के लिहाज से यह असल में एक ताजा जीव है. अगर खुले दिल से हिसाब लगाया जाए तो यह दो लाख साल से ज्यादा पुराना नहीं है, जबकि जीवन के वजूद की परिघटना के बारे में अंदाजा है कि यह अपने आप में ही करोड़ों साल पुरानी है.

इस हालिया प्रजाति की सबसे आम खासियतें क्या हैं?

जैसा कि आप जानते हैं, एक प्रजाति की जैविक कसौटी यह होती है कि एक प्रजाति के मर्द और औरत के आपस में बनाए गए शारीरिक संबंधों से प्रजाति की नई औलादें पैदा हो सकती हैं. और हमारी प्रजाति की भी यह खासियत है. इंसानी प्रजाति के लिए अक्सर ही पक्के तौर पर इसकी तस्दीक हो चुकी है, चाहे उनका रंग कोई भी हो, वे कहीं के भी बाशिंदे हों, उनका कद, उनके विचार, उनके साथी का सामाजिक संगठन कोई भी हो. यह पहला नुक्ता है.

इसके आगे, दूसरा नुक्ता यह है कि इंसानी जीवन की मीयाद, जो एक और भौतिक कसौटी है, अगर बहुत दिल खोल कर अंदाजा लगाया जाए तब भी फिलहाल 130 बरसों से आगे जाती हुई नहीं दिखती. ये सारी बातें आप पहले से ही जानते हैं. लेकिन पहले से ही मालूम इन बातों से हमें दो बहुत ही सीधी-सादी बातें कहने की इजाजत मिल जाती है जो, मैं यकीन करता हूं कि सादगी के बावजूद बुनियादी बातें हैं, और अक्तूबर 1917 की रूसी क्रांति की हैसियत को साफ साफ तय करने में भी बुनियादी हैं.

पहली बात यह है कि अगर इंसानी प्रजाति के बारे में ऐसा कहा जा सकता है तो इंसानी जीव का इस धरती पर रोमांचक सफर (कॉस्मिक एडवेंचर) असल में छोटा है. इसलिए अपने बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल है, क्योंकि दो लाख साल भी एक व्यापक धुंध में ओझल दिखाई देते हैं, खास तौर से कमोबेश सौ बरसों की मीयाद की वजह से जो हमारे निजी सफर पर कड़ाई से पाबंदी लगा देती है.

लेकिन इसी के साथ इस मामूली बात को भी याद किया जाना चाहिए: जीवन के आलमी इतिहास के हवाले से देखें तो, ‘होमो सैपियंस’ प्रजाति – हमारा खुद को यह कहना आडंबर से भरपूर है - का वजूद बहुत ही खास और छोटी सी मुद्दत से है. इसलिए इस बात को रेखांकित किया जा सकता है कि शायद हमारा सफर अभी शुरू ही हुआ है, कि शायद हम इस खास सफर की शुरुआत में ही हैं. ऐसा इसलिए कि इंसान के सामूहिक वजूद के बनने के बारे में जो बातें हम कह सकते हैं और सोच सकते हैं, उसका एक पैमाना तय किया जा सके. डायनासोर बहुत खुशनुमा नहीं थे, कम से कम हमारी कसौटियों के हिसाब से, लेकिन हमारी प्रजाति के पैमाने से देखें तो उनका वजूद कहीं ज्यादा लंबा था. उनके वजूद की मुद्दत हजारों बरसों नहीं बल्कि करोड़ों बरसों में गिनी जाती है. जैसा हम जानते हैं उसके लिहाज से, इंसानियत खुद को एक तरह की जरा सी शुरुआत के रूप में ही पेश कर सकती है.

किसकी शुरुआत? आप जानते हैं कि फ्रांसीसी क्रांति के भागीदारों ने असल में खुद यह सोचा था कि वे ही शुरुआत हैं. सबूत: उन्होंने कैलेंडर बदल दिया. और इस नए कैलेंडर में पहला साल वह साल था जिसमें क्रांति ने फ्रांसीसी गणतंत्र कायम किया था. उनके लिए गणतंत्र, स्वतंत्रता, मैत्री, बराबरी, सदियों के निरंकुश शासन और अवाम की जिंदगियों की बदकिस्मती के बाद इंसानी प्रजाति की एक नई शुरुआत थी. और यह सिर्फ फ्रांस और फ्रांसीसी अवाम के लिए ही एक शुरुआत नहीं थी, बल्कि असल में पूरी की पूरी इंसानियत के लिए भी यह एक शुरुआत थी. इत्तेफाक से, 1793 के क्रांतिकारियों के लिए इंसानियत और फ्रांस में बहुत फर्क नहीं था. मिसाल के लिए 1793 के संविधान में यह ऐलान किया गया कि दुनिया में जो कोई भी एक यतीम का खयाल रखता है या एक बुजुर्ग आदमी का जिम्मा लेता है, उसे गणतंत्र का एक नागरिक माना जाना चाहिए. आपको पहले से ही इसका पुख्ता यकीन है कि क्रांति के साथ इंसानियत बदल जाती है, कि इसकी परिभाषा जस की तस नहीं रहती.

और रूसी क्रांति? इसने भी यही सोचा था कि इसने इंसानी प्रजाति के लिए एक नई मंजिल की बुनियाद रखी, एक कम्युनिस्ट मंजिल की, एक मंजिल जिसमें पूरी की पूरी इंसानियत अपने साझे मूल्यों के बारे में फैसला करेगी, मुल्कों और राष्ट्रों के पार जाकर खुद को संगठित करेगी. ‘कम्युनिज्म’ इस बात की तस्दीक है कि सारे इंसानों के लिए जो कुछ भी साझा है उसे हरदम हमारी सोच, कार्रवाई और संगठन का विषय होना चाहिए.

हमारी पहली बात इतनी भर ही है: शायद इंसानी प्रजाति ने अभी शुरुआत ही की है. और शायद ‘क्रांति’ के नाम से और खास तौर से ‘1917 की क्रांति’ के नाम से यह समझना चाहिए: शुरुआत, या इंसानी प्रजाति के इतिहास की दोबारा शुरुआत.
 

दूसरी बात यह है कि जैविक चरित्र के बारे में, प्रजातियों के पुनरुत्पादन के बारे में, सेक्सुएशन के बारे में, उनकी पैदाइश के बारे में एक निर्विवाद भौतिक स्तर मौजूद है, जहां कुछ मायनों में यह साबित हो चुका है कि हम सब बराबर हैं. शायद इस खास स्तर पर सभी बराबर हैं. लेकिन इस स्तर पर, जो वजूद में है और जो भौतिक रूप से काम कर रहा है. और फिर मौत का सवाल भी है, जो कमोबेश तयशुदा समय पर आता है.

सो, बात के खारिज होने के जोखिम के बिना यह कहा जा सकता है कि इस तरह इंसानियत की एक पहचान है. और अंतिम जायजे में, हमें कभी भी, और मैं जोर देकर कह रहा हूं कि कभी भी इंसानियत की इस पहचान के वजूद को नहीं भूलना चाहिए चाहे कुदरती तौर पर बेशुमार फर्क मौजूद हों, मसलन राष्ट्रों, सेक्स, संस्कृतियों और ऐतिहासिक भागीदारियों के फर्क, जिनकी पड़ताल हम दूसरे मामलों में करेंगे. इसके बावजूद इंसानियत की पहचान को बनाने वाला एक निर्विवाद खांचा मौजूद है. जब क्रांतिकारियों ने, और इसमें रूसी क्रांतिकारी भी शामिल हैं, यह गाया कि ‘द इंटरनेशनल इंसानी नस्ल को एकजुट करता है’ तो वे यही कह रहे थे कि इंसानी प्रजाति बुनियादी तौर पर एक ही है. मार्क्स यह बात कह चुके हैं: सर्वहारा, मजदूर, किसान, जिनसे इंसानियत की बहुसंख्या बनती है, उनका एक साझा नसीब होता है और उन्हें सोच और काम की एक साझी सरहद पर आकर मिलना चाहिए. उन्होंने बेरहमी के साथ कहा था: ‘सर्वहारा की कोई मातृभूमि नहीं होती’. इसका मतलब हमें यह समझना चाहिए: इंसानियत उनकी मातृभूमि है.

उन नौजवानों को तो यह बात अच्छी तरह समझ में आनी चाहिए जो माली से, सोमालिया से या बांग्लादेश या किसी और जगह से परदेशी बन कर कहीं और काम करने जाते हैं: जो समंदर को पार करके एक ऐसी जगह जाकर रहना चाहते हैं जहां उन्हें लगता है कि वे जिंदगी गुजार सकते हैं, जैसा वे अपने मुल्कों में रहते हुए नहीं कर सकते; जो सैकड़ों बार अपनी जान जोखिम में डालते हैं; जिन्हें धोखेबाज तस्करों को पैसे देने पड़ते हैं, जो तीन या दस अलग अलग मुल्कों को पार करते हैं, लीबिया, इटली, स्विटजरलैंड या स्लोवानिया, जर्मनी या हंगरी; जो तीन या चार भाषाएं जानते हैं; जो तीन या चार या दस नौकरियां करते हैं. हां, ये खानाबदोश सर्वहारा हैं और हर मुल्क उनकी मातृभूमि है. आज वे इंसानी दुनिया का दिल हैं, वे जानते हैं कि जहां कहीं भी इंसान मौजूद हैं वहां कैसे जीया जा सकता है. वे इसका सबूत हैं कि इंसानियत एक है, साझी है.

मैं एक और कम्युनिस्ट दलील पेश करूंगा. इसके सबूत भी मौजूद हैं कि इंसानियत की दिमागी काबिलियत एक ऐसी काबिलियत है जो एक जैसी है.

पक्के तौर पर इंसानियत के आज तक के इतिहास में, जो 12000 और 5000 बरसों के बीच का है, एक बुनियादी क्रांति हुई थी, जो इंसानी जीव के इतिहास की अब तक की सबसे अहम क्रांति थी. इसे नियोलिथिक क्रांति कहते हैं. उस समय मौजूद इंसानियत ने, जिसके 100,000 वर्ष के इतिहास से हम वाकिफ हैं, करीब हजार वर्ष मानी जाने वाली एक मुद्दत के दौरान घुमंतू खेती की खोज की, बरतनों में अनाज जमा करके रखने का तरीका खोजा, इस तरह परवरिश के लिए जरूरी चीजों की जरूरत से ज्यादा खेप को जमा करके रखने की गुंजाइश बनी, इस तरह इस अतिरिक्त पर पलने वाले लोगों का एक वर्ग वजूद में आया और जिसने उत्पादक कामों में अपनी सीधी भागीदारी से छुट्टी पा ली, इस तरह एक राज्य वजूद में आया, जिसको धातु के हथियार चलाने वालों की ताकत हासिल थी, इस तरह हाथ की लिखाई शुरू शुरू में मवेशीपालकों को गिनने और उन पर कर लगाने के लिए इस्तेमाल हुई. और इस संदर्भ में, हर किस्म की तकनीकी को बचाने, उसे फैलाने और उसमें तरक्की लाने का काम बहुत जानदार तरीके से आगे बढ़ा. हमने महान शहरों को जन्म लेते और जमीनी और समुद्री रास्तों से एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय कारोबार की शुरुआत को देखा है.

कुछ हजार साल पहले आए इस बदलाव के नजरिए से देखें तो कोई भी दूसरा बदलाव फिलहाल सचमुच में दोयम दर्जे का होगा क्योंकि एक लिहाज से हम अभी भी उन्हीं दायरों में बने हुए हैं जो इस जमाने में खींचे गए थे. उल्लेखनीय रूप से, प्रभुत्वशाली और फुरसतिया वर्गों का वजूद, एक निरंकुश राज्य का वजूद और पेशेवर सेनाओं का वजूद, राष्ट्रों के बीच युद्धों का वजूद, यह सब कुछ हमें शिकार करने वालों और जंगल से चीजें जुटा कर गुजर-बसर करने वालों के उस छोटे से समूह से अलग कायम करता है, जो पहले इंसानियत की नुमाइंदगी किया करते थे. हम नियोलिथिक लोग हैं.

लेकिन दिमागी काबिलियत के नजरिए से इस क्रांति का मतलब यह नहीं था कि हम नियोलिथिक क्रांति से पहले के इंसानों से बेहतर होंगे. हमें पैंतीस हजार साल पुराने शॉवे गुफाओं की पेंटिग्स को याद करना चाहिए, जो एक ऐसे जमाने की तस्वीरें हैं जब अधिक से अधिक इसकी संभावना है कि नियोलिथिक दौर से काफी पहले, शिकारियों-संग्राहकों का बस एक छोटा सा समूह ही मौजूद रहा होगा. महज इन पेंटिंग्स का वजूद ही इस बात की तस्दीक करता है कि इंसानी जीव की विचार करने की, सोचने की और कल्पनाएं करने की काबिलियत और साथ ही इसका तकनीकी हुनर जस का तस तब भी मौजूद था जैसा आज है.

इसलिए न सिर्फ जीववैज्ञानिक और भौतिक आधार पर इस इंसानी पहचान को, इसके रोमांचक सफर के आरपार, कबूल किया जाना चाहिए, बल्कि बिना किसी शक के उस चीज के आधार पर भी इसे कबूल किया जाना चाहिए जिसे दिमागी काबिलियत कहा जाता है. यह बुनियादी एकता, यह जैविक और जेहनी ‘एक जैसापन’ हमेशा ही उन सिद्धांतों की राह की बुनियादी रुकावट रहा है जिनके मुताबिक इंसानियत समान नहीं है, वे सिद्धांत जिनके मुताबिक बुनियादी तौर पर अलग उप जातियां मौजूद हैं जिन्हें आम तौर पर नस्लें कहा जाता है. जैसा आप जानते हैं, नस्लवादी जिनको उच्चतर नस्लें और कमतर नस्लें घोषित करते है, उन नस्लों के सदस्यों के बीच आपस में शादी की कौन कहे, यौन संबंधों तक से हमेशा ही खौफ खाते हैं और उन पर पाबंदी लगाते रहे हैं. उन्होंने ऐसे खौफनाक कानून बनाए, जिनके तहत कभी भी काले लोग गोरी औरतों तक नहीं पहुंच सकते या यहूदी उन औरतों तक नहीं पहुंच सकते, जिन्हें आर्य माना जाता है. इस तरह नस्ली धाराओं के इतिहास का जाना-पहचाना उत्पीड़न, इंसानियत की आदिम एकता के सबूतों को नकारने की कोशिश करता है, और जिसने इंसान-इंसान के बीच सामाजिक फर्क जैसे दूसरे फर्क भी पैदा कर दिए हैं. लोग अच्छी तरह जानते हैं कि आखिरकार एक प्रभुत्वशाली वर्ग की एक औरत को मजदूर वर्गों के एक आदमी के साथ शादी नहीं करनी चाहिए, उनके बीच यौन रिश्ता भी नहीं होना चाहिए, बच्चे तो और भी नहीं होने चाहिए. मालिकों को गुलाम प्रजातियों से औलादों को जन्म नहीं देना चाहिए, वगैरह वगैरह. दूसरी तरह से रखें तो, इन सबके बावजूद ऐसे लंबे जमाने भी आए हैं जिनमें प्रजातियों ने जब अपनी एकता की पुष्टि की तो इससे भरपूर सामाजिक उथल-पुथल पैदा हुई.

फ्रांसीसी क्रांति की लीक पर, रूसी क्रांति इंसानी प्रजातियों की समतापरक हुक्मरानी को हमेशा के लिए कायम करना चाहती थी.
 

लेकिन इसमें शक नहीं है कि आज सबसे बुनियादी नुक्ते का रिश्ता प्रभुत्वशाली सामाजिक संगठन से है. प्रभुत्वशाली, बल्कि असल में प्रभुत्वशाली से भी कहीं ज्यादा प्रभुत्वशाली सामाजिक संगठन जिसने इंसानी सफर की समग्रता को अपनी गिरफ्त में ले रखा है, जो दुनिया की सारी जगहों की समग्रता पर हावी है. इसे पूंजीवाद कहा जाता है, यह इसका खास नाम है और यह इंसानी प्रजातियों के बीच एकता के उसूल के भीतर गैरबराबरी के और इसीलिए पराएपन के शैतानी रूपों को पैदा करता है, वरना तो यह इस एकता पर भी सफलता के साथ अपना दावा ठोक सकता है.
 

इसके आंकड़े बहुत जाने-माने हैं, लेकिन अक्सर मैं उन्हें दोहराता हूं क्योंकि उनकी जानकारी रखना जरूरी है. असलियत में, इसको एक वाक्य में कहा जा सकता है: आज दुनिया में बहुत थोड़े से लोगों की हुकूमत अरबों लोगों को सीधी-सादी जिंदगी जीने की गुंजाइश से भी महरूम कर देती है, जो एक काम की तलाश में, अपने परिवार को पालने के लिए, दुनिया भर में भटकते फिर रहे हैं.
 

इसलिए शायद यही तथ्य सही है कि इंसानियत अभी अपने ऐतिहासिक वजूद की शुरुआत में ही है. इसलिए हमें यह समझना होगा कि व्यावहारिक मानवता के स्तर पर वास्तविक इंसानियत का फिलहाल जैसा संगठन प्रभुत्व में है, वह बेहद कमजोर है. अभी भी यह नियोलिथिक मानवता है, इसका मतलब यह है: अभी इंसानियत जो उपजाती है, यह जो काम करती है और जिस तरह से संगठित करती है, वह अपने सबसे अच्छे स्वरूप में भी इसकी सैद्धांतिक एकता के स्तर तक नहीं पहुंची है. शायद इंसानियत का ऐतिहासिक वजूद इस बात में निहित है कि सामूहिक वजूद के प्रयोग किए जाएं और उसे हासिल किया जाए, जो इसकी बुनियादी एकता के उसूलों की बुलंदी होगी. हो सकता है कि हम अभी ऐसे मुकाम पर हैं जो अभी अस्थायी हैं और इस परियोजना तक नहीं पहुंच पाए हैं.

सार्त्र ने एक बार कहा था कि अगर इंसानियत कम्युनिज्म को साकार करने में नाकाम साबित हुई – अगर मैं कह सकूं तो कहूंगा कि यह वह दौर था जब इस शब्द को लोग मासूमियत से इस्तेमाल किया करते थे – तो यह कहा जा सकता है कि इसके अंत के बाद इसमें दिलचस्पी या इसकी अहमियत चींटियों से ज्यादा नहीं रह जाएगी. साफ जाहिर है कि वे क्या कहना चाहते थे – चींटियों की ऊंच-नीच की सामूहिक अर्थव्यवस्था को तानाशाह संगठन का एक मॉडल माना जाता है; वे कहना चाहते थे कि अगर कोई इस विचार के साथ इंसानियत के इतिहास का जायजा ले कि इंसानियत को अपनी बुनियादी एकता के शिखर पर एक ऐसा सामाजिक संगठन तैयार करना चाहिए, और यह काम वह कर सकती है, जो सचेत रूप से इस बात की तस्दीक करे कि यह एक एकीकृत प्रजाति है, वे यह कहना चाहते थे कि इसमें पूरी तरह नाकामी बाकी बातों के अलावा इंसानियत को जानवरों के सांचे में वापस धकेल देगी, जो अभी भी बस अपने वजूद को बनाए रखने की जद्दोजहद के कायदे पर चल रहे हैं, जहां अलग अलग व्यक्ति मिल कर काम करते हैं लेकिन जीतता सबसे ताकतवर ही है.
 

आइए, इसको दूसरे तरह से कहते हैं. कोई सोच सकता है कि कि यह निश्चित है कि मौजूदा सदियों में, या अगर जरूरी हुआ तो आने वाली सहस्राब्दि में, नियोलिथिक क्रांति के बाद एक दूसरी क्रांति होनी ही चाहिए, जिसका पैमाना हम तय नहीं कर सकते. एक क्रांति जो अपनी अहमियत में नियोलिथिक क्रांति की बुलंदी होगी, लेकिन जो समाज के फौरी संगठन के वाजिब कायदे को इंसानियत की मौलिक एकता पर दोबारा कायम कर देगी. नियोलिथिक क्रांति ने इंसानियत को फैलाव के, वजूद के, टकरावों के और इल्म के जरिए मुहैया कराए थे जिसकी इसके पहले कोई मिसाल नहीं मिलती, लेकिन इसने गैरबराबरियों, ऊंच-नीच के वजूद का अंत नहीं किया था और न ही इसने हिंसा और ताकत के उन खाकों का अंत किया, जिसे वह इतने गैरमामूली पैमाने पर लेकर आई थी. न सिर्फ इसने इनका अंत ही नहीं किया, बल्कि इसने कई मायनों में उन्हें और गंभीर बना दिया. दूसरी क्रांति – इसे एक बड़े ही सामान्य अर्थ में परिभाषित करते हैं क्योंकि अगर मैं कहूं तो हम अभी पूर्व-राजनीतिक स्तर पर ही हैं – इंसानियत की एकता को, इसकी असंदिग्ध एकता को और इसकी अपनी नियति पर अपने अख्तियार को वापस बहाल करेगी. इंसानियत की एकता महज एक तथ्य नहीं रह जाएगी, यह कुछ मायनों में एक कायदा बन जाएगी, इंसानियत को अपनी वाजिब इंसानियत को कबूल करना होगा और उसे साकार करना होगा, न कि यह उसको फर्कों, गैरबराबरियों, राष्ट्रों, धर्मों, भाषाओं की व्यवस्थाओं के बिखरे हुए टुकड़ों के खाकों (फिगर्स) में बनाए रखेगी. दूसरी क्रांति दौलत और जिंदगी की शक्लों में गैरबराबरी की नीयत को खत्म कर देगी, जो इंसानियत की एकता के नजरिए से एक आपराधिक नीयत है.
 

यह कहा जा सकता है कि 1792-94 की फ्रांसीसी क्रांति के बाद से, असली बराबरी के मकसद से की जाने वाली कोशिशें नदारद नहीं रही हैं, वे लोकतंत्र, समाजवाद, कम्युनिज्म आदि अलग अलग नामों से चलती ही रही हैं. यह भी सोचा जा सकता है कि मौजूदा दौर में दुनिया के पैमाने पर मुट्ठी भर लोगों के एक समूह की हुक्मरानी की अस्थायी विजय इन कोशिशों के लिए एक धक्का है, लेकिन यह सोचा जा सकता है कि यह धक्का बहुत लंबे समय तक नहीं बना रहेगा और अगर इंसानियत की एकता के वजूद के पैमाने पर खड़े होकर देखा जाए तो इस धक्के से कुछ भी साबित नहीं होता. ऐसी एक समस्या अगले चुनावों से हल नहीं होती – उससे तो कुछ भी हल नहीं होता –, यह सदियों का एक पैमाना है. और असल में, फिलहाल हमारे पास इसके अलावा कहने को कुछ नहीं है कि ‘खैर हम नाकाम रहे, लेकिन चलो लड़ना जारी रखते हैं.’
 

लेकिन यह नुक्ता हमें अक्तूबर 17 की रूसी क्रांति पर करीबी से गौर करने की तरफ ले जाता है. यहां नाकामियां और नाकामियां हैं. इसलिए मेरी थीसिस यह है: रूसी क्रांति ने इतिहास में पहली बार यह दिखाया है कि जीतना मुमकिन है. यह बात हमेशा ही कही जा सकती है कि दीर्घकालिक नजरिए से देखें तो अंतिम दशकों में यह नाकाम रही. लेकिन यह हमारी यादों में फिर से जिंदा हुई और इसे होना ही चाहिए, भले ही जीत नहीं तो कम से कम जीत की संभावना ही जिंदा हुई. इसलिए कहेंगे कि रूसी क्रांति ने इंसानियत को अपने आप के साथ मेल-मिलाप करने की संभावना की संभावना को जाहिर किया.

लेकिन हम ठीक ठीक किस किस्म की जीत की बात कर रहे हैं?
 

ज्यादातर कुछ सदियों से गिनें तो बहुत हाल ही में राज्यों के आर्थिक आधार का सवाल सियासी बहस का केंद्र बना है. इससे यह बात समझी जा सकती है या दिखाई भी जा सकती है कि राज्य का (निजी सत्ता या लोकतंत्र के) चाहे जो चेहरा हो, उसके पीछे वही उत्पीड़नकारी और भेदभाव वाला सामाजिक संगठन अपनी जगह बना लेता है, जिसके सबसे अहम राज्यवादी (स्टेटिस्ट) फैसले अपार रूप से निजी संपत्ति की सुरक्षा से सरोकार रखते हैं, वे परिवारों में निजी संपत्ति के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में बढ़ते जाने से, और शैतानी गैरबराबरी को बरकरार रखने, और उन्हें कुदरती और अटल समझते हुए उन्हें कायम रखने से सरोकार रखते हैं.
 

हमारे मुल्क में, जो एक विशेषाधिकार वाला मुल्क है और जो अपने लोकतंत्र की शेखी बघारता रहता है, हम जानते हैं कि कुल दौलत के 50 फीसदी से ज्यादा पर कम से कम 10 फीसदी आबादी की मिल्कियत है! हम यह भी जानते हैं कि आधे से ज्यादा आबादी के पास असल में कुछ भी नहीं है. अगर दुनिया के पैमाने पर देखा जाए तो चीजें बदतर हालात में हैं: कुछ सौ लोगों के हाथ में जितनी दौलत है वह दूसरे तीन अरब लोगों लोगों की कुल दौलत के बराबर है. और दो अरब लोगों से ज्यादा लोगों के पास कुछ भी नहीं है.
 

जब निजी संपत्ति और इससे जुड़ी शैतानी गैर बराबरी का सवाल साफ हो गया, तो दूसरी व्यवस्था के लिए ऐसी क्रांतिकारी कोशिशें हुईं जो सिर्फ राजनीतिक सत्ता में दखल देना चाहती थीं. इन कोशिशों का मकसद पूरी सामाजिक दुनिया को बदलना था. उन्होंने एक सच्ची बराबरी को कायम करने का मकसद अपने सामने रखा. वे मजदूरों और किसानों, गरीबों, बदहाल लोगों और ठुकराए हुए लोगों को समाज की रहनुमाई देना चाहती थी. इन बगावतों के गीत को ‘इंटरनेशनल’ कहा गया. इसमें कहा गया: ‘हम कुछ भी नहीं है, चलो हम सब कुछ बन जाएं.’ इसमें कहा गया: ‘दुनिया की बुनियाद बदल जाएगी.’ पूरी की पूरी 19वीं सदी इस लीक पर चली कोशिशों की खून सनी नाकामियों से भरी हुई है. पेरिस के पत्थर बिछे रास्तों पर तीस हजार लाशों वाला पेरिस कम्यून, इन सभी तबाहियों में सबसे शानदार रहा. इसने ‘कम्यून’ के नाम से एक बराबरी वाली सत्ता की खोज की. लेकिन कुछ हफ्तों के भीतर ही, केंद्रीय हुकूमत की फौज पेरिस में दाखिल हुई और शहर के लोकप्रिय मुहल्लों के तीखे प्रतिरोध के बावजूद, उसने बागी मजदूरों का बेरहमी से कत्लेआम किया और लाखों बागियों को बंदी बना लिया या फिर देशनिकाला दे दिया. नाकामियों ने, जनाजों का सिलसिला जारी रखा.

यही वह मोड़ है, जहां हमें यह बात याद करनी है: जब रूसी क्रांति ने पेरिस कम्यून की उम्र पार कर ली, तो उसके अगले दिन क्रांति के रहनुमा लेनिन बर्फ पर नाच उठे थे. उन्हें इस बात का अहसास था कि चाहे कितनी ही खौफनाक मुश्किलें आएं, लेकिन नाकामी का दाग मिट गया था!

हुआ क्या था?

पहली बात, 1914-15 में रूस के निरंकुश केंद्रीय राज्य की ताकत अहम रूप से कमजोर हुई थी, जो बेवकूफी में 14-18 के महायुद्ध में शामिल हो गया था. फरवरी 1917 में, एक क्लासिक जनवादी क्रांति ने राज्य को जमींदोज कर दिया. इसमें कोई नई बात नहीं थी: फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी ने सरकार के चुनावों के प्रावधान वाला संसदीय शासन पहले ही कायम कर लिया था. एक मायने में जमींदारों की कुलीन ताकत वाली जार की तानाशाही अपने समय से काफी पीछे चल रही थी. लेकिन आंदोलन इस जनवादी क्रांति पर ही नहीं ठहरा. रूस में ऐसे बेहद सक्रिय क्रांतिकारी बौद्धिक समूह बरसों से रहे हैं, जिनकी निगाह पश्चिमी लोकतंत्र की सीधे सीधे नकल से आगे तक जाती है. एक युवा मजदूर वर्ग तैयार हो रहा है, जिसमें क्रांति के प्रति झुकाव है और जिसके ऊपर रूढ़िवादी मजदूर संघों की निगरानी नहीं है. बेइंतहा गरीब और सताए हुए किसानों का एक हुजूम है. जंग की वजह से लाखों फौजी और हथियारबंद जहाजी मौजूद हैं जो जंग से नफरत करते हैं जिसके बारे में उनकी वाजिब सोच है कि यह जर्मनों जैसे कमतर साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की तुलना में सबसे बढ़ कर फ्रांस और ग्रेट ब्रिटेन जैसे साम्राज्यवादी हितों की सेवा कर रही है. और आखिरकार एक जिंदादिल, पुख्ता क्रांतिकारी पार्टी है, जो मजदूरों के साथ करीबी से जुड़ी हुई है. इस पार्टी को बोल्शेविक पार्टी कहा जाता है. यह बहसों में जानदार होने के साथ साथ बाकियों के मुकाबले कहीं ज्यादा अनुशासित और सक्रिय है. इसकी रहनुमाई में हम लेनिन और ट्रॉट्स्की जैसे लोगों को पाते हैं, जो लोग एक मजबूत मार्क्सवादी संस्कृति और लंबे मिलिटेंट अनुभवों का मेल हैं और जो पेरिस कम्यून के सबकों से बखूबी वाकिफ हैं. और सबसे आखिर में और सबसे ऊपर हैं स्थानीय लोकप्रिय संगठन जो हर जगह, बड़े शहरों में, कारखानों में बनाए गए और जिन्होंने पहली क्रांति के आंदोलन को खड़ा किया था लेकिन अपने मकसद के साथ जो आखिर में इस मांग पर लौटा कि सत्ता को, फैसला करने के अधिकार को, सभाओं को सौंपा जाए न कि एक सुदूर बैठी, घबराई हुई सरकार के पास सत्ता बनी रहे, जो अभी भी पुरानी रूसी दुनिया को बचा कर रखे हुए थी. इन संगठनों को सोवियत कहा गया. बोल्शेविकों की अनुशासित ताकत और सोवियत कही जाने वाली व्यापक-जनवाद की सभाओं का मेल ही 1917 के पतझड़ में हुई दूसरी क्रांति की चाबी थी.

इंसानियत के इतिहास के इस पल में अनोखी बात थी एक क्रांति का बदलाव, जिसका मकसद सिर्फ एक सियासी हुकूमत को बदलना था, राज्य के स्वरूप को बदलना था, लेकिन जो एक बिल्कुल ही अलग क्रांति में बदल गई जिसका मकसद बन गया पूरे समाज के संगठन को बदलना, मुट्ठी भर लोगों की अर्थव्यवस्था को बदलना. उसका मकसद बन गया कि कुछेक लोगों की निजी संपत्ति के हाथ में औद्योगिक और खेतिहर उत्पादन को नहीं छोड़ा जाए, बल्कि इसे उन सभी लोगों के प्रशासनिक फैसलों के ऊपर छोड़ा जाए, जो काम करते हैं, मेहनत करते हैं.

इसे जरूर देखा जाना चाहिए कि इस परियोजना की चाहत पेश की गई और इसे संगठित किया गया, जो रूसी क्रांति, सत्ता पर कब्जे, गृह युद्ध, घेराबंदी, विदेशी दखल के भयानक तूफान में एक सचमुच की चीज बन जाने वाली थी. इन सबका सामान्य विचार सफल हो सका, क्योंकि इसे निश्चित रूप से बोल्शेविक पार्टी की बहुसंख्या के बीच में, लेकिन 1917 की गर्मियों का अंत आते आते सोवियतों की बहुसंख्या में और उल्लेखनीय रूप से सबसे उल्लेखनीय राजधानी पेत्रोग्राद की सोवियत में एक बेहद सचेत और उत्साही अंदाज में पेश किया गया था.

सबसे जबरदस्त मिसाल 1917 के बसंत के एक सामान्य कार्यक्रम में निहित है, जिसे लेनिन ने पार्टी में प्रचारित किया ताकि देश में हर जगह बहस खड़ी की जा सके. इस कार्यक्रम के सभी घटक, भावी फैसलों के इस समूह के सभी घटक, असल में नियोलिथिक दौर के बाद से वजूद में रही हर चीज में संपूर्ण और वैश्विक क्रांति के विचार पर केंद्रित थे. (देखें अप्रैल थीसिस).

इन आधारों पर, और रूस के खास हालात से जुड़ी भारी-भरकम मुश्किलों के पार अक्तूबर 17 की शुरुआत में पूरे इंसानी इतिहास में नियोलिथिक क्रांति के बाद की पहली जीत हुई. इसका मतलब एक ऐसी क्रांति से है जो एक ऐसी सत्ता को कायम करती है जिसका घोषित मकसद उन सभी समाजों की युगों पुरानी बुनियादों को पूरी तरह हिला देना था, जो खुद को ‘आधुनिक’ मानते हैं: यानी उन सभी लोगों की एक छुपी हुई तानाशाही का अंत जिनका उत्पादन और विनिमय के वित्तीय नक्शों पर मालिकाना है. एक क्रांति जिसने नई आधुनिकता की बुनियादों को आजाद किया. इस बेइंतहा महानता का सामान्य नाम ‘कम्युनिज्म’ रहा है और मेरी समझ से यह अभी भी सच है. यही वह नाम है जिसके साए तले दुनिया भर में लाखों लोगों को, हर किस्म के लोगों को, मजदूरों और किसानों के लोकप्रिय हुजूम से लेकर बुद्धिजीवियों और कलाकारों तक को, उत्साह के साथ कबूल किया गया और उनका स्वागत किया गया, जो उस प्रतिशोध के बराबर है जो पिछली सदी की बेपनाह नाकामियों के बाद इसने कायम किया. अब लेनिन यह कह पाने के लायक हुए कि जीतने वाली क्रांतियों का जमाना आ गया है.
 

यकीनन तीस के दशक की शुरुआत से जो कुछ हुआ, उनकी रोशनी में इस पर विचार किया जा सकता है, जिसकी शुरुआत अनोखे रूप से 1929 में स्तालिन के निर्मम नेतृत्व में हुई, पंच वर्षीय परियोजना और ‘सारी सत्ता सोवियतों के हाथ में’ से लेकर हम ‘सारी सत्ता कम्युनिस्ट पार्टी और राज्य के मुकम्मल घालमेल के हाथ में’ तक पहुंचते हैं और इस तरह सोवियतों की सत्ता का अंत हो जाता है.

लेकिन इस अभूतपूर्व रोमांचक सफर में इन बदलावों का जो कुछ भी हुआ हो, और मौजूदा हालात जो कुछ भी रहे हों, जिनमें समकालीन नियोलिथिक गिरोह पूरी दुनिया का शासक बना हुआ है, हम जान सकते हैं कि हम कामयाबी के साथ नियोलिथिक दुनिया के आगे भी जा सकते हैं. कि ऐसी एक दुनिया वजूद में आ सकती है, रह सकती है और इसीलिए उसे रहना ही चाहिए. और यह कि आखिरकार मौजूदा दुनियावी हुक्मरानी बिना हितों या भविष्य वाली महज एक कतरन कभी नहीं रही है. इंसानियत के वजूद में आने के वक्त के पैमाने पर और वक्ती तौर पर इस इंसानियत की शक्ल चाहे जो, अक्तूबर 1917 की कम्युनिस्ट क्रांति एक ऐसी चीज बनी हुई है, जिसकी बदौलत हम जानते हैं कि अभी जो पूंजीवाद हुकूमत पर काबिज है, वह हमेशा के लिए अतीत की एक चीज बन चुका है.

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ अकादमिक चिंतन की धुंध से परे: अलां बादिऊ ”

  2. By Kokilaben Hospital on March 13, 2018 at 5:16 PM

    My name is Dr. Ashutosh Chauhan A Phrenologist in Kokilaben Hospital,We are urgently in need of kidney donors in Kokilaben Hospital India for the sum of $450,000,00,All donors are to reply via Email only: hospitalcarecenter@gmail.com or Email: kokilabendhirubhaihospital@gmail.com
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  3. By Manish Ranjan on April 16, 2018 at 12:43 PM

    शानदार लेख है । एक सांस में पढ़ गया ..☺

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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