भीमा-कोरेगांव: मिथक, रूपक और अभियान

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/24/2018 05:57:00 PM


भीमा-कोरेगांव पर बहस के संदर्भ में आनंद तेलतुंबड़े का स्तंभ. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह मनाने के लिए जस्टिस बीपी सावंत की अध्यक्षता में 31 दिसंबर को पुणे में दलितों, ओबीसी, मुस्लिमों और मराठा संगठनों द्वारा एक साथ मिल कर बुलाए गए यलगार कॉन्फ्रेंस की पूर्व संध्या पर मैंने द वायर में एक लेख लिखा था ‘द मिथ ऑफ भीमा-कोरेगांव रीइन्फोर्सेज द आइडेंटिटीज इट सीक्स टू ट्रान्सेंड’.[1] यह कॉन्फ्रेंस (जिसके संयोजकों में से एक मैं भी था) मौजूदा सत्ताधारी हिंदुत्व गिरोह की प्रतिक्रियावादी जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ था. इसके लिए एक महीने से ज्यादा चलने वाले अभियान के बावजूद, नागपुर, शिरूर और मुंबई से आयोजन स्थल शनिवारवाड़ा तक पहुंचने वाले लॉन्ग मार्चों में, मुझे बताया गया कि, सिर्फ 30-35 लोगों ने ही भागीदारी की. लॉन्ग मार्चों में सिर्फ 30-35 लोग ही क्यों शामिल हुए जबकि 1 जनवरी को भीमा-कोरेगांव में आने वालों की तादाद लाखों की होने वाली थी? यह देखना निराशाजनक था कि ‘नई पेशवाई’ से लड़ने के लिए लोगों को तैयार करने वाले सम्मेलन का नतीजा बस शायद यह निकले कि उससे भीमा-कोरेगांव में स्तंभ पर पहले से ही जुटने वाली भारी भीड़ में कुछ लाख लोग और बढ़ जाएं. सिर्फ बाबासाहेब आंबेडकर के साथ इसके जुड़ाव की वजह से ही, जिन्हें सीमित करके दलितों ने अपनी पहचान की निशानी बना कर रख दिया है, भीमा-कोरेगांव पर और ऐसी ही दूसरी जगहों पर हाल के बरसों में दलितों की भीड़ में इजाफा हुआ है.

इस लेख पर उग्र प्रतिक्रियाएं आईं, इनमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं शामिल हैं. सकारात्मक प्रतिक्रियाएं देश भर के प्रगतिशील दायरों से आईं, और नकारात्मक प्रतिक्रियाएं दिलचस्प तौर पर दलितों और हिंदुत्ववादी दकियानूस लोगों की तरफ से आईं जो ज्यादातर नाराजगी और दुर्व्यवहार से भरी हुई थीं. दलितों ने आमतौर पर ‘मिथक’ वाले हिस्से को पकड़ा[2], अपने दिल को तसल्ली देने के लिए मनमाने तरीके से उसे तोड़ा-मरोड़ा और इस तरह की अफवाहें फैला कर लोगों की भावनाएं भड़काने की कोशिश की कि यह आंबेडकर के खिलाफ था. यहां तक कि कांचा इलैया शेफर्ड जैसे विद्वान भी मेरी कही हुई बात को तोड़ने-मरोड़ने के इस शोर-शराबे में शामिल हो गए ताकि मुझे बदनाम कर सकें. मिसाल के लिए, उन्होंने लिखा, ‘आनंद तेलतुंबड़े, जो यह मानते हैं कि महार सैनिकों ने राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए अपनी जान नहीं दी’ जबकि मैंने साफ-साफ इसकी उल्टी बात लिखी थी: ‘ऐतिहासिक तथ्यों को एक ना-मौजूद राष्ट्र के चश्मे से देखना उतना ही निंदनीय है.’(3) लेख में पेश किए गए तथ्यों के लिहाज से एक भी चीज ऐसी नहीं थी जिस पर उंगली उठाई जा सके, लेकिन जब जुनून सिर चढ़ कर बोल रहा हो तो तर्क की कोई नहीं सुनता.
 

मिथकों के पीछे की सच्चाई
  
इस पर कोई मतभेद नहीं है कि भीमा-कोरेगांव में खड़ा स्तंभ महार सैनिकों के शौर्य की निशानी है, बल्कि इसके भी आगे कहें तो ये ज्यादातर दलित सैनिक ही थे जिन्होंने ब्रिटिशों को उनका साम्राज्य जीत कर दिया.(4) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की अनेक लड़ाइयों में सांकेतिक रूप से खास 1757 की पलासी की पहली लड़ाई से लेकर 1818 की भीमा कोरेगांव की आखिरी लड़ाई तक, दलित सैनिकों ने उनमें जीत हासिल करने में इंतहाई बड़ी भूमिका अदा की थी. जब अहसानफरामोश ब्रिटिशों ने यह बहाना बनाते हुए 1892 में दलितों की भर्ती बंद कर दी कि वे लड़ाकू नस्ल नहीं थे, तो दलित इससे नाराज हुए और उन्होंने वापस अपनी बहाली की मांग की. इसका नेतृत्व दलित आंदोलन के रहनुमाओं जैसे गोपाल बाबा वालंगकार, शिवराम जनबा कांबले ने किया और उनमें बाबासाहेब आंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी आंबेडकर थे, जिन्होंने लड़ाकू नस्ल होने के अपने दावे के लिए वाजिब ही कोरेगांव स्तंभ की गवाही का इस्तेमाल किया.

लेकिन इस बात का संकेत देना एक मिथक है कि महारों ने कोरेगांव की लड़ाई को पेशवाओं द्वारा अपने अपमान का बदला लेने के लिए जीता था. बाबासाहेब आंबेडकर ने 119 साल बाद 1 जनवरी 1927 को पहली बार इस स्तंभ का दौरा किया और कहते हैं कि इसके बाद वे कई बार वहां गए. उन्होंने इसका इस्तेमाल महारों को प्रेरित करने के लिए किया कि वे ब्राह्मणवाद के खिलाफ वैसी ही लड़ाई लड़ें जैसा उनके पुरखों ने पेशवाओं के खिलाफ लड़ी थी.(5) महाड सम्मेलन में उन्होंने यह बताते हुए कि उनके पुरखे कितने ज्ञानी लोग थे, उनको अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रेरित करने की कोशिश की. आगे चल कर उन्हें जातीय पहचान की सीमाओं का अहसास हुआ और उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के तहत अपने आह्वान को व्यापक बनाते हुए मजदूरों और किसानों तक उसका विस्तार किया, जिसके भीतर दलित भी आते थे. इसके पहले और इसके बाद भी भीमा-कोरेगांव भुला दिया गया था और 1990 के दशक तक ऐसा ही रहा, जब दलित वहां जमा होने शुरू हुए - ये तथ्य अपने आप में ही दलितों द्वारा इसका मतलब लगाए जाने और दलित विद्वानों द्वारा इसके बारे में बुने जाने वाले सिद्धांतों की कहानी कहते हैं. जिन बाबासाहेब आंबेडकर की समाधि की जगह पर एक छोटा सा ढांचा भी नहीं था जब तक कि उनके बेटे ने 1967 में मौजूदा स्तूप का निर्माण नहीं कराया, या फिर अन्य मांगों के अलावा जिनकी तस्वीर संसद के हॉल में लगाने के लिए दलितों को 1965 में एक व्यापक जेल भरो अभियान चलाना पड़ा था, वही आंबेडकर 1960 के दशक के आखिरी दौर में एक अहम प्रतीक बन गए. इसकी वजह समझना मुश्किल नहीं है. चुनावी राजनीति में लगातार प्रतिद्वंद्विता तेज होती जा रही थी, क्योंकि उत्तर-औपनिवेशिक राजनीतिक अर्थव्यवस्था ने जातियों के ढांचे में सबसे ज्यादा आबादी वाली शूद्र जातियों में जो एक ग्रामीण धनी तबका पैदा किया था, उनकी क्षेत्रीय पार्टियां उभरने लगी थीं. इन हालात में शासक वर्गों ने बड़ी महारत से आंबेडकर को एक प्रतीक में ढाल दिया, ताकि दलितों को लुभाया जा सके जो अपने आंदोलन की शिकस्त के बाद अतीत के प्रति मोह के साथ आंबेडकर को भक्ति-भाव से देखने लगे थे. 1960 के दशक के आखिरी दौर तक जिस चैत्य भूमि पर उनके परिजनों समेत महज कुछ सौ लोग 6 दिसंबर को उन्हें याद करने के लिए जमा होते थे, वहां आज जमा होने वाले लोगों की तादाद बीस लाख के पार चली जाती है. आंबेडकर के बाद बढ़ती हुई तादाद में स्मारकों पर जमा होने वाले लोगों की तादाद में इजाफा, पहचान के उस जुनून की अभिव्यक्ति है, जिसे समकालीन राजनीतिक बदलावों ने जन्म दिया है.
 

पेशवाई का रूपक 

1990 के दशक से अब तक भीमा-कोरेगांव पर बिना किसी दिक्कत के लोग जुटते रहे हैं. फिर इस साल यह घटना क्यों घटी? जवाब इस बात में है कि ‘नई पेशवाई’ के खिलाफ इसका नारा जिन ताकतों ने पेश दिया वे दलितों, मुसलमानों, ओबीसी और मराठाओं के एक साथ एक जगह आने का एक झलक देते हैं. महाराष्ट्र में यह बदलाव सत्ताधारी भाजपा के लिए खतरनाक हो सकता है, खास कर ऐसे समय में जब चुनाव नजदीक आ रहे हैं. पिछले साल राज्य को जिस मराठा आंदोलन ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था, वह राजनीतिक रूप से उलझन का शिकार था, क्योंकि भले ही इसे एक राजनीतिक दल ने उकसाया था, मगर वह दल इसके फायदे को अपने प्रतिद्वंद्वी दलों की झोली में जाने से रोक नहीं सका, साथ ही वह दलितों और ओबीसी के बीच अलगाव को भी नहीं रोक पाया. मराठाओं ने तय किया कि वे सत्ताधारी ब्राह्मणवादी भाजपा को निशाना बनाने के लिए दलितों से दोस्ती करेंगे. इस नई नई एकता को तोड़ने के लिए हिंदुत्व ताकतों ने शंभाजी भिडे और मिलिंग एकबोटे जैसे उकसावेबाजों को लगाया ताकि पास के वाडु बुडरूक गांव में संभाजी स्मारक के मुद्दे पर मराठाओं को दलितों के खिलाफ खड़ा किया जा सके. उन्होंने यह इतिहास का यह झूठ गढ़ा कि संभाजी के शव का अंतिम संस्कार गोविंद महार ने नहीं बल्कि एक मराठा परिवार ने किया था. 28 दिसंबर को उन्होंने गोविंद महार के स्मारक को नुकसान पहुंचाया, आसपास के गांवों में बंद का आह्वान किया, दलितों पर हमले की योजना बनाई और 1 जनवरी को इस पर अमल किया. इसमें राजसत्ता की मिलीभगत बहुत साफ थी. अत्याचार अधिनियम (एट्रॉसिटी एक्ट) के तहत अपराधियों पर एफआईआर के बावजूद, और राज्य की निष्क्रियता पर विश्वव्यापी नाराजगी के बावजूद, राज्य ने उन्हें गिरफ्तार करने से इन्कार कर दिया, बल्कि उल्टे इन हमलों के विरोध में 3 जनवरी को एक शांतिपूर्ण बंद में भाग लेने के लिए राज्य भर से हजारों दलित नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया.

पेशवाई प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणवादी शासन का एक रूपक बन गई थी, जिसके उत्पीड़नकारी इतिहास का ब्योरा अपना थूक जमा करने के लिए एक महार के गले में बंधी मिट्टी के घड़े और अपने कदमों के निशान मिटाने के लिए कमर में बंधी कंटीली झाड़ी से दिया जाता है.(6) नई पेशवाई मौजूदा सत्ताधारी हिंदुत्ववादी गिरोह के रूपक के बतौर काम करती है. इसे सिर्फ जातियों के पहलू के लिहाज से देख कर, इसके पुराने संस्करण के साथ इसका मिलान मत कीजिए. यह अपनी व्यापकता और फासीवादी क्षमताओं की वजह से उससे कहीं ज्यादा घातक है. इसके फासीवादी गुणों पर वामपंथी बुद्धिजीवियों की बहसें अपनी जगह, यह यूरोप में 1920 और 30 के दशकों में आई बदनाम फासीवादी हुकूमतों से भी कहीं बदतर होने जा रही है. अपने सैकड़ों सिरों वाले संगठन, ब्राह्मणवाद की विचारधारा जो दुनिया में समता-विरोधी सबसे पुरानी विचारधारा है, वैश्विक पूंजीवाद का समर्थन और अनुकूल राजनीतिक हालात इसे संभावित रूप से मुसोलिनी के इटली या हिटलर के जर्मनी से भी कहीं अधिक नुकसानदेह बनाते हैं. यह सत्ताधारी गिरोह अपने संस्थापकों की परिकल्पना के अति-फासीवादी चरित्र वाले हिंदू राष्ट्र के अपने सपने को हकीकत में उतारने के लिए अगले चुनावों को आखिरी मौके के रूप में देख रहे हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि यह दलितों के लिए खतरनाक होने जा रहा है क्योंकि हिंदुत्व ताकतों के लिए वे ही असली ‘अन्य’ हैं.
 

दलितों का अपना मिशन 

बदकिस्मती की बात यह है कि दलित, फासीवाद, साम्राज्यवाद को अजनबी शब्दों की तरह लेते हैं, जो उनके लिए महज कम्युनिस्टों की बेमतलब की बकवास है. उनका अपना मिशन, उनका सर्वोच्च मकसद अपने जातीय उत्पीड़न से लड़ना है. लेकिन इस लड़ाई की प्रकृति क्या है? क्या वे इस पैमाने को उलटना चाहते हैं या जातियों का खात्मा करना चाहते हैं? पहचान (अस्मिता) की जो हसरत दिखाई देती है, उससे पक्के तौर पर तो यही इशारे मिलते हैं कि दलित जातीय ढांचे के भीतर ही एक तरह के शासक समुदाय जैसी प्रभुत्वशाली हैसियत पा लेंगे, जैसा कि कहीं पर आंबेडकर ने कहा था. इसके तहत मन ही मन यह मान लिया गया है कि जातियों का खात्मा नहीं हो सकता है. लेकिन इस मान्यता के साथ दिक्कत यह है कि यह जातीय पहचान के चरित्र को लेकर नादानी को ही जाहिर करती है, क्योंकि जातीय पहचान का बुनियादी गुण ऊंच-नीच का क्रम (हाइरार्की) है. यह जातियों को अमीबा की तरह बांटती और अलग करती है. इसका सबूत यह है कि आंबेडकर ने दलित नाम की जो श्रेणी बनाई, वह भी दलित जातियों को एक साथ नहीं रख सकी और न ही उन्हें उप-जातियों में टूटने से बचा सकी. जातीय पहचान के आधार पर बनाई गई कोई भी चीज जनता की एक व्यापक एकता नहीं बना सकती है. शासक समुदाय बनने का सपना, ऊपर उठ रहे दलितों के एक छोटे से तबके को प्रेरणा भले दे दे, लेकिन यह हमेशा ही एक ऐसा हसीन सपना बना रहेगा, जो कभी हकीकत नहीं बन पाएगा.

दलितों का असली मकसद, बल्कि देश का ही असली मकसद जातियों का खात्मा होना चाहिए, जिसकी पैरवी इत्तेफाक से खुद आंबेडकर ने ही की है. उन्होंने बीमारी की पहचान करते हुए कहा था कि जातियों की जड़ें हिंदू धर्म के धर्मशास्त्रों में हैं और चूंकि हिंदू कभी भी इन धर्मशास्त्रों को नष्ट करने को तैयार नहीं होंगे, इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म को छोड़ने का फैसला किया और बौद्ध धर्म अपनाया. यह समाधान कितना कारगर था, इस बहस में न जाते हुए, यह बात समझनी जरूरी है कि अकेले दलित कभी भी जातियों का खात्मा नहीं कर सकते. इसके अलावा यह बात भी है कि जातियां आज पुराने दौर की जातियां नहीं रह गई हैं जैसी आंबेडकर के चिंतन में दिखती हैं, बल्कि वे वर्ग के साथ घुल-मिल गई हैं, जो समकालीन दुनिया की एक प्रभुत्वशाली श्रेणी है. इसके अलावा, ऐसी घोर ढांचागत बाधाएं भी हैं जिन्हें उत्तर-औपनिवेशिक शासक वर्गों ने संविधान में ही तैयार किया, जिसे वे पवित्र मानते हैं. जाति और वर्ग के इस जटिल मकड़जाल को, सिर्फ अवाम के ऐसे एकजुट संघर्ष से ही तोड़ा जा सकता है जो वर्गीय पहचान की बुनियाद पर कायम हुआ हो.
 

जिन दलितों को इस पेशकश में कुफ्र की बू आ रही हो उनके लिए मैं आंबेडकर की ही बात को पेश कर सकता हूं:
‘कोई भी महान आदमी अपना फर्ज अदा नहीं कर रहा है अगर वह अपने शिष्य पर अपने उसूलों या अपने नतीजों को जबरदस्ती थोपते हुए उसे पंगु बना दे. महान आदमी अपने शिष्यों पर अपने उसूल नहीं थोपते. ...अगर एक शिष्य अपने गुरु के उसूलों या नतीजों को कबूल नहीं करता तो इसमें कोई भी कृतघ्नता नहीं है. क्योंकि जब वह उन्हें नकारता है तो वह गहरी श्रद्धा के साथ अपने गुरु के आगे यह भी कबूल करता है कि ‘‘आपने मेरी आंखें खोलीं कि मैं अपना आपा हासिल कर सकूं: इसके लिए आपका शुक्रिया.’’ गुरु इससे कम किसी चीज का हकदार नहीं है. और शिष्य इससे ज्यादा कुछ देने के लिए मजबूर नहीं है.’’(7)

नोट्स
1.    https://thewire.in/209824/myth-bhima-koregaon-reinforces-identities-seeks-transcend/.
2.    वह वाक्य था: “लेकिन जब बाबासाहेब आंबेडकर ने भीमा कोरेगांव की लड़ाई को पेशवा शासन में जातीय उत्पीड़न के खिलाफ महार सैनिकों की लड़ाई के रूप में पेश किया, वो एक शुद्ध मिथक रच रहे थे.”
3.    देखें “Why the Mahar Soldier Was the First Freedom Seeker in 1818,  https://thewire.in/213987/understanding-mahar-soldier-bhima-koregaon/.
4.    Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches (BAWS), Govt of Maharashtra, Mumbai, Vol. 12, p. 88.
5.    BAWS, Vol. 17/1, p.307.
6.    R.V. Russell, The Tribes and Castes of the Central Provinces of India, Vol.4, Maclillan & Co, London, 1916, http://www.gutenberg.org/files/20668/20668-h/20668-h.htm.
7.    BAWS (Ranande, Gandhi and Jinnah), Vol. 1, p.240.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ भीमा-कोरेगांव: मिथक, रूपक और अभियान ”

  2. By Manish Ranjan on April 16, 2018 at 1:06 PM

    @दलितों का असली मकसद, बल्कि देश का ही असली मकसद जातियों का खात्मा होना चाहिए, जिसकी पैरवी इत्तेफाक से खुद आंबेडकर ने ही की है......। इत्तेफाक से?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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