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गुजरात चुनाव में राहुल गांधी का ‘जबरदस्त झटका’

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/08/2018 07:31:00 PM


अपने नियमित स्तंभ में आनंद तेलतुंबड़े इस बार गुजरात चुनावों के नतीजों का विश्लेषण कर रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

कांग्रेस के नए-नए अध्यक्ष नियुक्त हुए राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों के नतीजों पर यह कहते हुए प्रतिक्रिया दी कि चुनावों ने भाजपा को जबरदस्त झटका दिया है और नरेंद्र मोदी की विश्वसनीयता के संकट को उजागर किया है. (टाइम्स ऑफ इंडिया, 20 दिसंबर 2017) गुजरात के चुनाव कोई मामूली चुनाव नहीं थे, उन्हें 2019 के आम चुनाव की आजमाइश के रूप में लिया जा सकता है, जिनमें अगर भाजपा के रथ को जीत का अपना सफर जारी रखने की इजाजत मिल गई तो भारत के औपचारिक रूप से एक फासीवादी हिंदू राष्ट्र में बदल दिए जाने का एक सचमुच का खतरा सामने आ खड़ा होगा.

गुजरात ने कांग्रेस को जीतने के लिए एक अनोखा मौका मुहैया कराया था. पिछले 22 सालों में यह पहला चुना था, जिसमें करिश्माई मोदी को राज्य मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया गया और न ही उनकी जगह किसी भरोसेमंद चेहरे को लाया गया. इसने सत्ताधारी दल के लिए मुश्किलें खड़ी कीं, जिसमें भाजपा के अपने स्थायी आत्मविश्वास और उद्दंडता का भी योगदान था, खास कर जब मोदी के गुजरात मॉडल का खोखलापन जगजाहिर हो गया है. इन चुनावों में सभी उल्लेखनीय समुदाय मुखर रूप से भाजपा के खिलाफ थे – हार्दिक पटेल के पीछे खड़े पाटीदार भाजपा को सबक सिखाने का ऐलान कर रहे थे, अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) अल्पेश ठाकुर के साथ कांग्रेस के पक्ष में खड़े थे और जिग्नेश मेवाणी द्वारा गोलबंद किए गए दलित भाजपा को हराने की कसमें खा रहे थे. किसान सबसे बुरे खेतिहर संकट झेल रहे हैं, नौजवान बढ़ती हुई बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं, भाजपा का मुख्य जनाधार रहे व्यापारी और छोटे कारोबारी नोटबंदी और जीएसटी से परेशान होकर खुलेआम अपनी नाराजी जाहिर कर रहे थे और आम जनता भी गैरमामूली तौर पर चुनावों को लेकर अपनी बेपरवाही दिखा रही थी. विपक्ष इससे और ज्यादा क्या उम्मीद कर सकता था? अगर इन सारी मुश्किलों के बावजूद, भाजपा वोट प्रतिशत में इजाफे के साथ ही विधानसभा में एक आरामदेह बहुमत से जीत गई तो हैरानी होती है कि राहुल गांधी किस झटके की बात कर रहे हैं.
 

होड़ में पिछड़ी कांग्रेस 

इस बार गुजरात में वोटों का कुल प्रतिशत 68.3 फीसदी था, जो 2012 के 71.3 फीसदी से कम है. यह लोगों में उत्साह की कमी को जाहिर करता है. इसे नोटा को भारी संख्या में मिले वोटों ने भी रेखांकित किया है. 5.52 लाख वोटरों ने, जो कुल वोटों का 1.8 फीसदी है, नोटा विकल्प को चुना और सियासत के हालात को लेकर अपनी मौन असहमति जाहिर की. नोटा को मिले वोटों की तादाद बहुजन समाज पार्टी और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी को मिले क्रमश: 2.07 और 1.85 लाख वोटों से कहीं अधिक है. ज्यादातर टिप्पणीकारों ने कांग्रेस के प्रदर्शन की तारीफ की है, जिसे पांच साल पहले मिली सीटों से 16 सीटें ज्यादा हासिल हुई हैं. भाजपा का कुल वोट शेयर 2014 के लोक सभा चुनावों के 60.11 फीसदी से गिर कर 49.1 फीसदी पर आ गया, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों के 47.85 फीसदी वोट शेयर के मुकाबले इजाफा ही हुआ है. इस बार कांग्रेस का वोट शेयर भी बढ़ कर 41.4 हो गया है, जबकि यह 2014 के लोकसभा चुनावों में 33 फीसदी और 2012 के विधान सभा चुनावों में 38.9 फीसदी था. उनके बीच के वोट शेयर का फर्क भी 2012 के 8.85 फीसदी से घट कर इस बार 7.7 फीसदी पर आ गया है, जो 2002 में गुजरात दंगों के फौरन बाद हुए चुनावों में 10.4 फीसदी और 2007 के चुनावों में 9.49 फीसदी था. लोक सभा चुनाव 2014 के आधार पर देखें तो भाजपा ने 66 सीटें खोई हैं और कांग्रेस ने 63 हासिल की हैं. भारत में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने (एफपीटीपी) की चुनाव प्रणाली  की बदौलत, अपने वोट शेयर में 1.25 फीसदी इजाफे के बावजूद भाजपा ने 17 सीटें खोईं. बेशक कांग्रेस को 19 सीटों का फायदा हुआ. यकीनी रूप से, कांग्रेस ने पहले से बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन एफपीटीपी चुनाव प्रणाली में इसका क्या फायदा है?

इस बार कांग्रेस को अनोखी और साफ-साफ दिखने वाली बढ़त हासिल थी. परंपरागत रूप से भाजपा को वोट करने वाला समुदाय पाटीदार या पटेल आबादी का 14 फीसदा हिस्सा बनाते हैं और पिछली विधान सभा में इस समुदाय के 25 फीसदी विधायक थे. इस बार के चुनावों में 182 विधानसभा सीटों में से 65 पर उन्हें प्रभावशाली माना गया और वे आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा के खिलाफ कमर कसे हुए थे. लेकिन वोटिंग में वे बंटे हुए दिखे. ग्रामीण आबादी ने कांग्रेस को वोट दिया, जबकि शहरी मतदाताओं ने भाजपा के लिए वोट किया. कुछ हद तक इसकी उम्मीद की जा रही थी, लेकिन भाजपा ने निश्चित रूप से हार्दिक पटेल के कुछ साथियों को खरीद कर, हार्दिक के नेतृत्व वाले पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास) में अपनी पैठ बना ली थी. ओबीसी वोट गुजरात में कुल वोटों का 45 से 50 फीसदी है और वे 71 सीटों पर प्रभावशाली हैं और इसलिए उन पर मोदी का रहमोकरम खूब रहा है. लेकिन इस बार उन्होंने ऐलानिया तौर पर कांग्रेस की हिमायत की. आबादी में 7 फीसदी तादाद वाले दलि परंपरागत रूप से कांग्रेस को वोट देते आए हैं और खुलेआम भाजपा के खिलाफ थे. राज्य की आबादी का 14.75 फीसदी हिस्सा, आदिवासी कुल 37 सीटों पर प्रभावशाली थे और भाजपा और कांग्रेस में बंटे हुए थे. भले ही ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती कि ये सारे समुदाय एकजुट होकर एक जगह वोट डालेंगे, लेकिन जब चुनावों का ऐलान हुआ तो साफ तौर पर कांग्रेस की ओर उनका झुकाव था. इसके बावजूद कांग्रेस इन समुदायों में भाजपा को मात नहीं दे पाई. उन 52 सीटों में से भाजपा ने 28 सीटें जीतीं, जहां पाटीदार आबादी 20 फीसदी या उससे ज्यादा है, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 23 सीटें ही मिलीं, और एक सीट एक निर्दलीय को गई. अनुसूचित जातियों में, भाजपा ने 8 सीटें जीतीं और कांग्रेस को 5 सीटें हासिल हुईं, जिनमें जिग्नेश मेवाणी की निर्दलीय सीट भी शामिल है, जिनको कांग्रेस ने समर्थन दिया था. सिर्फ अनुसूचित जनजातियों में ही भाजपा की 9 सीटों के मुकाबले कांग्रेस को 16 सीटें हासिल हुईं. लेकिन आदिवासी बहुल सीटों पर, भाजपा ने 19 सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस ने सिर्फ 15, दो सीटें भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) और एक सीट निर्दलीय को गई.
 

मोदी की मुकाबले की ताकत 

गुजरात में हालात ऐसे थे कि मोदी के बिना भाजपा यकीनी रूप से चुनाव हार जाती. मोदी 2019 के आम चुनावों के अभ्यास के रूप में गुजरात की अहमियत को जानते थे और अपने पद की गरिमा और मर्यादा को भुला कर किसी भी कीमत पर इसे जीतने पर उतारू हो गए. शुरुआत में, दब्बू चुनाव आयोग के जरिए चुनावों को भाजपा के लिए एक सुविधाजनक समय आने तक तक टाला जाता रहा. संसद के शीत सत्र को बुलाने की रिवायत को भी इसके लिए तोड़ा गया. आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए नाराज वोटरों को मनाने के लिए जीएसटी में सुधार किए गए. लेकिन इन सबके बावजूद, गुजरात जब उनकी गिरफ्त से फिसलता हुआ दिखा तो वे हरसंभव घटिया स्तर पर उतरने से भी नहीं हिचके, जब उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, एक पूर्व भारतीय सेना प्रमुख दीपक कपूर, चार विदेश सचिवों और पाकिस्तान में एक पूर्व भारतीय कूटनीतिज्ञ और साथ ही कुछ फौजी मामलों के माहिर लोगों पर आरोप मढ़ दिया कि वे गुजरात चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं. यहां तक कि उन्होंने हिंदुओं को सांप्रदायिक रूप से उकसाने की अपनी पुरानी तरकीब के तहत, सोमनाथ मंदिर में दाखिले के लिए किसी द्वारा राहुल गांधी का नाम गैर हिंदुओं के रजिस्टर में लिख दिए जाने को और अयोध्या मामले में कपिल सिब्बल की दखल को भी कांग्रेस को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किया. राष्ट्रवाद पर खड़े किए गए अंधराष्ट्रवादी शोरशराबे में गुजरात मॉडल या विकास पर एक शब्द नहीं कहा गया, जिसके बूते उन्होंने 2014 चुनावों में लोगों को बेवकूफ बना कर उनका वोट हासिल किया और सत्ता में आए.

उन्होंने शहरी मतदाताओं को आसानी से मना लिया कि वे नोटबंदी और जीएसटी की अपनी शिकायतों को भूल जाएं और शहरों के 48 में से 42 सीटें उनकी झोली में डाल दें. यह शहरी स्थानीय निकाय के चुनावों का दोहराव ही था, जिसमें 2016 की शुरुआत में भाजपा ने विजयी रही थी. लेकिन वे गांवों के मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पाए जो गहराते खेतिहर संकट और भाजपा शासन की आपराधिक अनदेखी का खामियाजा भुगत रहे हैं, जो राज्य में क्रोनी-पूंजीवाद को बढ़ावा दे रही है. इससे कांग्रेस को ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में 50 फीसदी से ज्यादा सीटें हासिल हुईं, खास कर मूंगफली और कपास के किसानों के बीच. कांग्रेस का प्रदर्शन सौराष्ट्र इलाके में सबसे प्रभावशाली रहा, जहां उसने अमरेली, मोरबी, गिर सोमनाथ और सुरेंद्रनगर जिलों में भारी जीत दर्ज की. इन नतीजों के लिए इन इलाकों में पाटीदारों के संगठन पास की जिस ताकत से जोड़ा जा रहा है, वह अपने आप में खेतिहर संकट की ही अभिव्यक्ति है. 182 सदस्यों वाली विधानसभा में 134 सीटें ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों से आती हैं. कांग्रेस को उनमें से 71 सीटें मिलीं, इसके बाद 57 सीटों के साथ भाजपा, दो सीटों के साथ बीटीपी, एक सीट के साथ एनसीपी और तीन निर्दलीय हैं. एक तरह से ये चुनावी नतीजे करीब दो साल पहले के जिला पंचायत और तालुका पंचायत चुनावों का दोहराव भी थे. इस तरह से, कहा जा सकता है कि मोदी का जादू चल रहा है और यह सिर्फ बदतर रुझानों की तरफ ही ले जा रहा है.
 

राहुल का नाकाबिल प्रदर्शन
 
यह तो तय है कि राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों को गंभीरता से लिया, 23 दिन वहां गुजारे और राज्य भर में 65 से ज्यादा रैलियों या सभाओं को संबोधित किया. इस बार उनके नारे भी थोड़े बेहतर थे जैसे कि ‘विकास गांडो थायो छे’ या ‘शाह-ज्यादा’ (अमित शाह के बेटे के लिए). लेकिन कुछ मुर्खता भरे नारे भी थे जैसे ‘गब्बर सिंह टैक्स’ या अपने वंश की तरक्की के बचाव में ‘अभिषेक बच्चन भी डायनेस्ट है’. लेकिन मीडिया के जायजे और अपने अंध-समर्थकों की तारीफों के उलट, वे अपने ताकतवर प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले टिक पाने में फिर से नाकाम रहे. कांग्रेस अभी भी शतुरमुर्ग की तरह बैठी मतदाताओं के भाजपा से मोहभंग होने का इंतजार कर रही है और अपनी ही घटती जा रही प्रासंगिकता को देखने से इन्कार कर रही है. भाजपा की ठोक-बजा कर बनाई गई चुनावी मशीन का रणनीतिक रूप से जवाब देने के बजाए गांधी बेवकूफी भरे तरीके से ‘मैं भी किसी से कम नहीं’ की रणनीति पर चल रहे हैं और खुद को सीधे सीधे मोदी के मुकाबले में खड़ा कर रहे हैं. वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि तय है कि इस तरह की रणनीति से वे नुकसान में ही रहेंगे. एक नेता की काबिलियत इसमें होती है कि वह अपने अनुयायियों को इसके लिए प्रेरित करे कि वे उसके विजन, उसके नजरिए को, जमीन पर उतार सकें, न कि इसमें होती है कि वह खुद को एक योद्धा के रूप में पेश करे. मोदी के पास उनकी गैरमामूली भाषणबाजी और ड्रामेबाजी का हुनर है, जिसकी मदद से वे झांसा देने वाली बातों और झूठों को बड़ी महारत के साथ फैलाते रहते हैं और भारतीय जनता को प्रभावित किया है, जिसकी परवरिश ही नायक पूजा पर हुई है. लेकिन साथ ही, मोदी वैश्विक पूंजी की पसंद भी हैं. गांधी के पास इनमें से कुछ भी नहीं है और वे सीधी टक्कर में उनसे होड़ नहीं ले सकते. उनके लिए जरूरी है कि वे एक तरह की स्वोट एनालिसिस यानी ताकत-कमजोरी-मौका-जोखिम का जायजा लें- ऐसा न सिर्फ वे अपनी पार्टी के साथ करें बल्कि अपने साथ भी करें और फिर एक व्यावहारिक रणनीति तैयार करें जो मोदी की राह रोक सके. उन्हें बार बार जो नाकामियां हासिल हुईं हैं उनको देखते हुए उनमें ऐसा कोई विजन दिखाई नहीं देता और न ही ऐसी सियासी समझ दिखाई देती है जो यह महसूस कर सके कि उनके सामने कैसा फौरी खतरा मौजूद है.

भाजपा की कामयाबी उसकी अकेली अपनी कामयाबी नहीं है. उसे काफी कुछ यह कामयाबी कांग्रेस की नालायकी की बदौलत भी हासिल हुई है. अगर महज हाल की ही कुछ घटनाओं को याद करें तो अगर राजीव गांधी ने शाहबानो फैसले को नहीं पलटा होता या अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाए होते या नरसिंह राव ने बाबरी मस्जिद के पास हिंदुत्ववादी गुंडों को जमा होने की इजाजत नहीं दी होती, तो मोदी वहां कभी नहीं पहुंच पाते जहां वे आज हैं. यह सड़न और गहराई तक जाती है, उन दिनों तक पहुंचती है जब कांग्रेस के क्रूर बहुमत के तहत उत्तर-औपनिवेशिक राज्य का निर्माण किया जा रहा था और इसने संविधान में ही जातियों और धर्म के लिए जगह तैयार की थी. आज भी, बहुसंख्यक आबादी भाजपा के पक्ष में नहीं है, 2014 में इसका लोकप्रिय वोट महज 31 फीसदी था. कांग्रेस के पुराने गुनाहों को जानने के बावजूद भारत के सारे प्रगतिशील लोग चुनावों में कांग्रेस के समर्थन में उतरे हैं, सिर्फ इसलिए कि भाजपा के शैतानी मकसद को साकार होने से रोका जा सके. लेकिन राहुल गांधी अपने उलझन भरे व्यवहारों से उन्हें निराश करते रहेंगे. वे मोदी के फंदे में फंस गए और गुजरात में 27 हिंदू मंदिरों का दौरा किया और यह भी दावा किया किया कि वे एक जनेऊ-धारी ब्राह्मण हैं. इस तरह न सिर्फ उन्होंने ‘नरम हिंदुत्व’ का प्रदर्शन किया, बल्कि घिनौने ऊंची-जातिवाद की शेखी भी बघारी. इससे पूरी निचली जातियां, खास कर दलित आसानी से उनसे अलग हो सकती हैं. वे बुजुर्ग गांधी (मोहनदास करमचंद) की तरह यह दावा क्यों नहीं कर सकते कि वे हिंदू होने के चलते अपनी मर्जी से एक भंगी हैं? यह कल्पना करना एक रणनीतिक दिवालियापन है कि वे अपने हिंदूपन और ब्राह्मणपन के बूते भाजपा को मात दे देंगे. बल्कि वे इस तरह भाजपा की सियासत को ही जायज ठहराते हैं, जैसा कि उनसे पहले के कांग्रेसी करते आए हैं.

बदकिस्मती से, जितना वक्त हमारे हाथ में है उसे देखते हुए, जनता के पास उन पर भरोसा करने के अलावा और कोई चारा नहीं है कि वे भारत को फासीवादी होने से बचाएंगे.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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