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बीच सफ़हे की लड़ाई

मोदी को मूडी की शह: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/01/2017 07:29:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े अपने इस स्तंभ में मूडीज़ द्वारा मोदी सरकार को दी गई रेटिंग पर चर्चा कर रहे हैं. अनुवाद: रेयाज़ उल हक़

नोटबंदी और जीएसटी पर मोदी सरकार की भारी गलतियों के उजागर होने के दौर में मूडीज द्वारा भारत की सार्वभौम रेटिंग को बीएए3 से बढ़ा कर बीएए2 करने की खबर निकम्मेपन के आरोपों से घिरी हुई भाजपा के लिए राहत लेकर आई. इसने नोटबंदी की पहली बरसी पर इसके बुरे नतीजों पर होने वाली मीडिया में जो बहसें चल रही थीं, उनको रोकने में कामयाबी हासिल कर ली और इसकी जगह उन्हें सरकारी प्रचार चलाने के लिए राजी कर लिया जिसमें अवैध धन की अर्थव्यवस्था की सफाई के लिए फर्जी आंकड़ों को सबूत के रूप में पेश किया गया था. हमेशा की तरह इसके आखिर में भी भाजपा का रटा-रटाया राष्ट्रवाद की खुराक दी गई थी. मूडीज ने भाजपा के डूबते हुए मनोबल को अचानक ही उबार लिया है. अपने खास अंदाज में भाजपा ने मूडीज से जोड़ कर ऐसे दावे भी किए हैं जो मूडीज ने नहीं कहे हैं. अमित शाह ने ऐलान किया कि मूडीज की रेटिंग भारत के प्रधानमंत्री के रूप में मिस्टर मोदी के अच्छे काम की पुष्टि करती है. अरुण जेटली ने रेटिंग की तारीफ करते हुए कहा कि यह “नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा किए गए बेजोड़ अच्छे काम का एक सबूत है”. बड़बोलेपन में सबको पीछे छोड़ते हुए रेल मंत्री पीयूष गोयल ने भविष्यवाणी की कि भारत “वृद्धि और समृद्धि के स्वर्णकाल” में प्रवेश कर रहा है.

मूडीज की रेटिंग, अमेरिका से आए एक और सर्टिफिकेट के फौरन बाद आई. 31 अक्तूबर को विश्व बैंक ने अपनी सालाना “ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस रिपोर्ट” में भारत की 130वें स्थान की पिछली रेटिंग से 30 रैंकिंग ऊपर उठाई. भारत 10 अर्थव्यवस्थाओं जैसे कि एल साल्वादोर, मलावी, नाइजीरिया और थाईलैंड जैसी अर्थव्यवस्थाओं के साथ खड़ा था. इसे भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि वाशिंगटन डी.सी. स्थित एक और वैश्विक एजेंसी, द पिऊ रिसर्च सेंटर ने कुछ दिनों के बाद ऐलान किया कि मोदी की मंजूरी देने की दर 90 फीसदी है जो ईर्ष्याजनक है. इसके बाद विश्व मुद्रा कोष के मुखिया क्रिश्चियन लेगर्ट का सर्टिफिकेट आया कि भारतीय अर्थव्यवस्था “ठोस रास्ते पर” है. मन में सवाल उठता है कि बड़ी-बड़ी तारीफों की यह बारिश क्या गुजरात चुनावों के ठीक पहले करनी पड़ी, जहां मोदी को अपने घरेलू मैदान पर कड़ी चुनौती पेश कर रही थी, खास कर सभी बड़े गैर-मुस्लिम समुदायों की तरफ से जिनका प्रतिनिधित्व हार्दिक, जिग्नेश और अल्पेश कर रहे हैं.

मूडीज का मतलब

मूडीज इन्वेस्ट सर्विस “तीन बड़ी” क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों (सीआरए) में से एक है. बाकी दो हैं स्टैंडर्ड एंड पुअर्स और फिच रेटिंग. सबसे मुख्यालय संयुक्त राज्य में हैं (फिच के दो मुख्यालय हैं, न्यूयॉर्क और पेरिस में) और मिल कर वे वित्त की दुनिया में एक ताकतवर एकाधिपत्य का प्रतिनिधित्व करती हैं और एक बहुत ही प्रभावशाली खिलाड़ी हैं. वे सौ बरस से भी पुरानी एजेंसियां हैं, लेकिन 1975 के बाद से उन्होंने सं.रा. सरकार के साथ सहयोग हासिल करते हुए और सेक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी) के साथ साथ कुछ निजी फर्मों के साथ मिल कर ताकत हासिल कर ली है और वे ऐसे नियम-कायदे बनाती रही हैं, जिससे उन्हें वित्तीय बाजार एकाधिकार दिलाने वाली खासियत हासिल हो गई है. मिसाल के लिए, इसमें फरमान जारी किया गया है कि पेंशन फंड का निवेश सिर्फ “बिग थ्री” द्वारा मुहैया कराए गए “निवेश ग्रेड” की सेक्योरिटीज में ही हो सकता है. एकाधिकार की अपनी हैसियत को पक्का करने के लिए एसईसी ने नेशनली रिकग्नाइज्ड स्टेटिस्टिकल रेटिंग ऑर्गेनाइजेशंस (एनआरएसआरओ) का निर्माण किया, जिसने उन्हें अनेक एजेंसियों के बीच में सं.रा. सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त पहली और अकेली एजेंसी बना दिया है (आईएमएफ, 2010 की रिपोरट 70 से ज्यादा सीआरए के बारे में बताती है). यह संरा सरकार द्वारा इन एजेंसियों को कंपनियों और देशों के कर्जे देने के लायक होने का अनुमान लगाने के लिए सौंपी गई एक प्रभावशाली जिम्मेदारी थी. उन्होंने वाशिंगटन कॉन्सेन्सस के आधार पर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक क्रम तैयार करने में बहुत अहम भूमिका निभाई है.

कर्ज या उधार देने वाले द्वारा कर्जदार की स्थिति का जायजा लेने का कारोबार व्यापारिक पूंजीवाद के दिनों से चला आ रहा है. आज इसका विस्तार उन देशों तक हो गया है जो बॉन्ड जारी करके रकम उधार लेते हैं. सीआर एजेंसियां निवेशकों को कंपनियों और देशों की “कर्ज सेक्योरिटीज” के साथ जुड़े संभावित जोखिम का अंदाजा मुहैया कराती है. ऐसा करने के लिए वे रेटिंग के एक पैमाने का उपयोग करती हैं जो बेहतरीन से शुरू होकर बदतरीन की ओर जाती है. निवेश ग्रेड की श्रेणी में इसके 10 दर्जे हैं, जिसमें एएए सबसे कम जोखिम वाला दर्जा है और बीएए3 औसत दर्जे के जोखिम वाला है. इनके बीच में, दो और श्रेणियां होती हैं – जैसे एए1, एए2, एए3, और ए1, ए2, ए3. मूडी ने भारत को सिर्फ एक दर्जा ऊपर उठाया है, लेकिन इसको निवेश ग्रेड की पहली वाली श्रेणी में ही रखा है. भारत में 2000-01 से 2016-17 के बीच 2.4 अरब डॉलर से 43.5 अरब डॉलर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रवाह की निरंतरता को देखते हुए, और विदेशी बाजार से भारतीय कंपनियों द्वारा ली जाने वाली उधारी में इसी तरह की वृद्धि को देखते हुए यह बात समझ में आती है कि इन बरसों में भारत को हासिल बीएए3 रेटिंग कभी उनके लिए कोई रुकावट नहीं बनी. क्या यह सचमुच डॉलर की आमद की मौजूदा रफ्तार को तेज करेगा? इसकी संभावना कम है. लेकिन अगर ऐसा होता है, तो यह रुपए की कीमत को भी बढ़ाएगी, जिसके अवांछित नतीजे अर्थव्यवस्था पर पड़ेंगे. यहां तक कि विदेशी मुद्दा ऋण को सैद्धांतिक रूप से सस्ता करने का बहुत कम फायदा सरकारी वित्त को मिलेगा क्योंकि सरकार का विदेशी मुद्रा भंडार (400 अरब डॉलर) बहुत बड़ा है और इसके हालिया कर्जे ज्यादातर (96 फीसदी) घरेलू रहे हैं.

संदिग्ध नवउदारवादी औजार
मूडी द्वारा दर्जा बढ़ाया जाना (और साथ ही मोदी को दिया गया संयुक्त राज्य का सर्टिफिकेट भी) भले ही अर्थव्यवस्था का कोई भला न करें, लेकिन यह तय है कि वे महंगाई घटाने के तर्क के साथ अर्थव्यवस्था को नवउदारवाद के दलदल में और गहरे धंसा देंगे. एक दर्जा ऊपर उठने के बाद, सरकार अब साफ तौर पर इसका खयाल रखेगी कि यह नीचे न खिसक जाए, क्योंकि उसे इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी होगी. मूडी ने दो चिंताएं जाहिर की हैं: एक, भारत द्वारा राजस्व घाटे का प्रबंधन, और दूसरा, जीडीपी की दर की तुलना में ऊंचा ऋण, जो बीएए समूह के देशों के लिए मध्यम दर 44 फीसदी की तुलना में 68 फीसदी है. (हालांकि, समान रेटिंग के तहत, इटली और स्पेन जैसे देशों की दरें क्रमश: 132.6 फीसदी और 99.4 फीसदी है). इन दोनों स्थितियों में किसी भी गिरावट के नतीजे में, रेटिंग में गिरावट आ सकती है. भारत पहले से सार्वजनिक कल्याण की कीमत पर राजस्व घाटा रूढ़िवाद को अपना चुका है और अपने राजस्व घाटे पर बखूबी अंकुश लगा चुका है. यह 2011-12 के 5.8 फीसदी से कम करके 2016-17 में 3.5 फीसदी पर लाया जा चुका है. राज्यों और केंद्र का मिला-जुला राजस्व घाटे में गिरावट के रुझान हैं. इस साल सरकार का राजस्व घाटा अनुमान जीडीपी के 3.2 फीसदी होने का अनुमान लगाया गया है, जिस पर पहले से ही गैर-कर राजस्व में तीखी गिरावट की वजह से काफी दबाव है. इसकी वजह रिजर्व बैंक और सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं द्वारा लाभांश भुगतान में कमी और साथ-साथ बजट के अनुमान से कम विनिवेश होना और टेलीकॉम स्पेक्ट्रम की नीलामियां होना है. इस पर बैंकों को दी गई 2.11 लाख करोड़ की पूंजी और आधारभूत ढांचे का अतिरिक्त बोझ भी पड़ेगा. सरकार के वित्त के ढांचे को लें तो इसके आसार बहुत कम हैं कि विकास पर होने वाले खर्चों में कटौती किए बिना जीडीपी की दर पर ऋण के अनुपात में कोई गिरावट आ सकेगी. इन सबका मिला-जुला असर समाज के सबसे निचले तबके पर बड़ी चोट करेगा, यह तो तय है.

इस बात को लेकर काफी आलोचना होती रही है कि किस तरह सीआर एजेंसियां साम्राज्यवाद की नवउदारवादी राजनीति को आगे बढ़ाने में संदिग्ध भूमिका निभाती हैं.[1] अगर आईएमएफ और विश्व बैंक जैसे साफ तौर पर अधिक आदेशात्मक संस्थानों की तुलाना में, इन एजेंसियों की उक्त भूमिका ढंकी-छुपी होती है. ऐसा इसलिए है कि उनकी हैसियत निजी कंपनियों की होती है. आलोचकों ने सीआर एजेंसियों की रेटिंग से जुड़ी उनकी स्वतंत्रता, विशेषज्ञता और वैज्ञानिकता के आभामंडल उजागर किया है और उन पर धांधली और सीधे-सीधे भ्रष्टाचार के आरोप तक लगाए हैं.[2] उन्हें 2007-08 के वित्तीय संकट के लिए दोषी ठहराया गया, जिसने उजागर किया कि कैसे बीमाकर्ताओं ने एक दूसरे से होड़ कर रही रेटिंग एजेंसियों से रेहन समर्थित सेक्योरिटीज और कोलैटरलाइज्ड डेट ऑब्लिगेशंस के लिए रेटिंग ‘खरीदी’ थी.[3] फानेंशियल क्राइसिस इन्क्वायरी कमीशन (2011) ने इसको दर्ज किया है कि मूडी ने 2006 में जितनी रेहन समर्थित सेक्योरिटीज को एएए की रेटिंग दी थी, उनमें से 73 फीसदी एकदम बेकार हो गए. ‘द लास्ट मिस्ट्री ऑफ द फाइनेंशियल क्राइसिस’ शीर्षक से रॉलिंग स्टोन मैगजीन में 2013 में प्रकाशित मैट ताइबी की रिपोर्ट इसको उजागर करती है कि कैसे “राष्ट्र की दो शीर्ष रेटिंग कंपनियां मूडी और एसएंडपी बैंकों के हाथ में एक औजार रही हैं, और नकद के बदले में किसी को भी एक ऊंची रेटिंग देने को तैयार रहती हैं.”  2001 और 2002 में क्रमश: एनरॉन और वर्ल्डकॉम की नाकामी के मामले में सीआर एजेंसियों को गंभीर दुराचारों और हितों के टकराव का आरोप लगा था, क्योंकि मूडीज के अध्यक्ष क्लिफर्ड एलेक्जेंडर जूनियर वर्ल्डकॉम के बोर्ड में भी कार्यरत थे.

मोदी के प्रबंधन की निशानी
एकदम शुरुआत से ही, 2014 से मोदी का ध्यान लोगों को रिझाने के लिए विदेशों से तारीफें हासिल करने पर रहा है. इन बरसों में मोदी ने रेटिंग बढ़ाने के लिए मूडीज़ की बड़ी पैरवी की है. लेकिन रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अक्तूबर 2016 तक मूडी ने उनकी बात मानने से इन्कार करता रहा था, जिसकी वजह भारत की नाजुक बैंकिंग व्यवस्था थी. इस सितंबर में आकर, मूडीज के विश्लेषकों ने ऐलान किया कि भारत को अपना दर्जा बढ़ाए जाने के लिए कुछेक वर्षों तक इंतजार करना पड़ेगा. फिर दो महीनों के भीतर क्या बदल गया? गुजरात चुनावों के अहम दौर में, जो 2019 के आम चुनावों की छोटी सी झलक भी हो सकते हैं, भाजपा के सामने एक साथ ही अनेक मुसीबते आईं. नोटबंदी की पहली वर्षगांठ ने न सिर्फ इसके नुकसानों को ही साफ साफ उजागर कर दिया था, बल्कि उसने लोगों के सामने अर्थव्यवस्था के आम कुप्रबंधन को भी उजागर किया. आर्थिक वृद्धि जून की तिमाही में तीन बरसों के सबसे निचले स्तर 5.7 फीसदी को छू गई, इसी तिमाही में चालू खाता घाटा चार वर्षों में सबसे ऊंचे बिंदु तक उठ कर जीडीपी का 2.4 फीसदी हो गया और ऐसा तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि के बावजूद हुआ. जो रोजगार पैदा हो रहे हैं, वो हर महीने दस लाख लोगों के कार्यशक्ति में जुड़ने के अनुमान को देखते हुए कहीं कम हैं, कारोबारों द्वारा निवेश की मांग कमजोर रहा है, निजी खपत की रफ्तार में गिरावट आई है, उत्पादन के लिए जरूरी प्रमुख वस्तुओं (मिसाल के लिए इमारतें, उपकरण, वाहन, मशीनरी, आदि, जिन्हें कैपिटल गुड्स कहा जाता है) के उत्पादन में कमी, उपभोक्ताओं द्वारा लंबे समय तक इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं (जैसे वाहन, घरेलु उपकरण, फर्नीचर, गहने आदि) के उत्पादन में गिरावट, कुल उधार में कार्यरत पूंजीगत कर्जों के हिस्से में कमी, राजकीय मालिकाने वाले बैंकों में नाकारा परिसंपत्तियों (एनपीए) और डूबे हुए कर्जे बढ़ कर 31 मार्च 2013 के 1.56 ट्रिलियन रुपए से 31 मार्च 2017 को 6.41 ट्रिलियन हो गए. यह सारी बदहाली इतनी साफ है कि इसे लफ्फाजी से छुपाना मुश्किल है. यहां तक कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी अर्थव्यवस्था की बिगड़ती हालत को स्वीकार किया और कहा कि सरकार इसे उबारने के लिए एक स्टिमुलस पैकेज पर काम कर रही है. इसके एक हफ्ते के बाद, खुद मोदी ने प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद को फिर से गठित किया, जो उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से बंद पड़ा था.

भाजपा ने 16 नवंबर को, 14 साल के बाद दर्जा बढ़ाए जाने की घटना को जोर-शोर से उछाला, लेकिन इस बात को छुपा ले गई कि भारत को अक्तूबर 1990 के पहले ए2 की रेटिंग मिली हुई थी, जो इसे अब तक हासिल बेहतरीन रेटिंग है. लेकिन भारत के बिगड़े हुए भुगतान संतुलन और राजस्व अनुशासनहीनता के जुड़वां संकट के दौर में 4 अक्तूबर 1990 को इसका दर्जा घटा कर बीएए1 कर दिया गया. 26 मार्च 1991 को, इसे दो दर्जा और घटा कर बीएए3 कर दिया गया, जब दो ही महीने पहले विदेशी भुगतानों पर दिवालिएपन से बचने के लिए भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा. 24 जून 1991 को भारत की रेटिंग दो दर्जा घटाते हुए, बीए2 देकर गैर-निवेश श्रेणी में डाल दिया गया. 19 जून 1998 से (पोखरण में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद) 22 जनवरी 2004 तक, भारत गैर-निवेश या ‘जंक’ श्रेणी में पड़ा रहा. भारत का आखिरी बार दर्जा 13 साल पहले 2004 में बढ़ा था, जो कहीं ज्यादा अहम था, क्योंकि इसने छह साल के अंतराल के बाद, भारत को वापस निवेश ग्रेड की श्रेणी में जगह दिलाई. इस तरह, ऐतिहासिक रूप से देखें तो मूडीज द्वारा इस बार दर्जा बढ़ाए जाने से कुछ खास उपलब्धि हासिल नहीं हुई है.

मूडीज की रेटिंग के बजाए कुछ दूसरे ऐसे सूचकांक हैं जो भारत की जनता के लिए ज्यादा मायने रखते हैं जैसे शिशु मृत्यु दर (175/223), वैश्विक भूख सूचकांक (100/119), शिक्षा सूचकांक (145/197), विश्व खुशहाली सूचकांक (122/155), मानव विकास सूचकांक (131/188) आदि, जिनकी चिंता मोदी को करनी चाहिए.

नोट्स

 
1. Sinclair, T. J., The New Masters of Capital: American Bond Rating Agencies and the Politics of Creditworthiness, Ithaca: Cornell University Press, 2005; Stefanos Ioannou,  The Political Economy of Credit Rating Agencies. The Case of Sovereign Ratings, https://www.boeckler.de/pdf/v_2013_10_24_ioannou.pdf.
2. Paudyn, Bartholomew (2013) Credit rating agencies and the sovereign debt crisis: performing the politics of creditworthiness through risk and uncertainty. Review of International Political Economy, 20 (4). pp. 788-818.
3. Coffee, J. C., “Rating Reforms: The Good, The Bad and the Ugly”, Harvard Business Law Review, 1:231-78, 2011, 2410.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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