एक प्रोफेसर किसे कहते हैं?: इंसाफ की कसौटी

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/01/2017 07:18:00 PM



सौम्यब्रत चौधरी

 
“यह किताब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 2004 में पेश की गई डॉक्टरल थीसिस का संशोधित रूप है. डेढ़ दशक से भी पहले लिखी गई इस किताब पर अपने समय की छाप है, जिस तरह इंसान की बनाई हुई हर चीज पर होती है.”

ये खूबसूरत शुरुआती पंक्तियां मैं अपने दोस्त, प्रोफेसर सैत्य ब्रत दास की नई किताब से पढ़ रहा हूं, जो उनकी तीसरी किताब है.

मैं ये पंक्तियां पढ़ रहा हूं और इनसे प्रभावित हूं. जब भी मैं प्रोफेसर दास की लिखी हुई कोई चीज पढ़ता हूं तो प्रभावित होता हूं. प्रोफेसर सत्य ब्रत दास. यह बात मैं कुछ जोर देते हुए ठीक ऐसे वक्त में कह रहा हूं जब उन्हें उस विश्वविद्यालय द्वारा कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (सीएएस) के तहत प्रोफेसरशिप देने से इन्कार कर दिया गया है, जहां वे और मैं पढ़ाते हैं. ठीक तब जब दुनिया के कैरियर एडवांसमेंट कार्यक्रम, चयन समितियां और वाइस चांसलर हमारे बेहतरीन विद्वानों और दार्शनिकों में से एक को पहचानने और उसे कबूल करने में नाकाम हैं, मैं इसे अपने लिए बड़ी खुशी और खुशनसीबी मानता हूं कि उनके साथ मेरा दोस्ती का रिश्ता है.

ऐसे वक्त में, जब उनकी नाकामी के लिए बहाने गढ़े जा रहे हैं, ऐसे बहाने उन ठोस सबूतों के आगे पल भर भी नहीं टिक पाएंगे, जो किसी भी संस्थागत पैमाने के लिए जरूरी होते हैं - तीन शानदार किताबें, संपादित किताबें, दुनिया भर में प्रकाशित कई सारे लेख – तब ऐसे वक्त में उस बात को कहना जरूरी हो जाता है जो सुनने में एक उलटबांसी ही लगेगी. और ठीक अभी वो बात कहना जरूरी है: एक सच्चा प्रोफेसर तब वजूद में आता है जब हम उसे उपलब्धियों के पैमानों और मानकों से आजाद कर देते हैं, उसे गिने और मापे जा सकने वाले सारे सबूतों से आजाद कर देते हैं, हम उसे हर उस चीज से आजाद कर देते हैं जिसमें हेरफेर और धांधली की जा सकती हो, जिसे गलत ठहराया जा सकता हो. असल में एक प्रोफेसर चुपचाप इस तमाशे से अपने को बाहर कर लेता है, जबकि तमाशबीनों के गोल में बड़ी महारत से जमे हुए लोगों को लगता है कि वे “प्रदर्शन” पर फैसला सुना रहे हैं, कि जिसे वो प्रोफेसर कह रहे हैं, क्या वह प्रोफेसर होने के लायक है. अपनी सत्ता की अकड़ रखने वाले सभी लोगों की तरह, वे गलत सोचते हैं कि वे महज इसलिए फैसले ले सकते हैं, क्योंकि उन्हें ऐसा करने का संस्थागत अधिकार हासिल है. प्रोफेसर का वजूद अक्सर इतना बारीक होता है कि वह फैसले सुनाने का खास अधिकार और अकड़ रखने वाले ओहदों की गिरफ्त में नहीं आ सकता. इसलिए, जहां एक तरफ जब जेएनयू के वाइस चांसलर, सैत्य ब्रत दास को प्रोफेसर का ओहदा देने का सम्मान हासिल करने का मौका गंवा देते हैं, वहीं दूसरी तरफ हमें सैत्य ब्रत दास को पढ़ने और उसने सीखने का सम्मान हासिल है – और इसका भी कि हम तारीफ, आभार और दोस्ती के जज्बे के साथ उन्हें कह सकें: “प्रोफेसर!”

तब भी, इस तमाशे के फूहड़पन और छलावेबाजी के परे इंसाफ का मुद्दा बना हुआ है. जाति की गैरबराबरी से संघर्ष करते हुए उभरे एक दलित विद्वान के लिए इंसाफ का मुद्दा एक संस्थागत मुद्दा है, एक सामाजिक मुद्दा है, एक बुनियादी मुद्दा है. इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए, आइए इसके पहलुओं को एक एक कर उठाते हैं.

संस्थागत इंसाफ

संस्थागत निष्पक्षता को यकीनी बनाने के लिए संस्थान एक कायदे पर चलते हैं, जिसके लिए जरूरी मानक किसी के निजी विचारों से परे ठोस, गिने और मापे जा सकने वाले होते हैं (उनका एक इतिहास भी है, जिस पर हम आगे चर्चा करेंगे). यह कायदा सबसे न्यूनतम होता है और यह एक नकारात्मक और एक सकारात्मक बुनियाद पर खड़ा होता है. सकारात्मक बुनियाद यह है कि जो लोग संस्थान का हिस्सा हैं, उनमें से हरेक की बराबर पहुंच संस्थान द्वारा मुहैया कराए जाने वाले मौकों और फायदों पर होती है. सिद्धांत के रूप में यह सबको बराबरी पर खड़ा करने की कोशिश करता है, लेकिन इस कायदे के नकारात्मक आधार के साथ इस सकारात्मक बुनियाद का एक द्वंद्व चलता है. नकारात्मक बुनियाद ये है कि एक संस्थान का काम-काज चलाने वाला प्राधिकार निजी और सांगठनिक पूर्वाग्रहों, महत्वाकांक्षाओं और भौतिक प्रलोभनों का शिकार हो सकता है. इसी के साथ यह जटिल संभावना भी जुड़ी होती है कि इस प्राधिकार को उसी जैसी एक दूसरी, लेकिन उससे कहीं अधिक ताकतवर प्राधिकार द्वारा भ्रष्ट किया जा सकता है (यानी जब अफसर किसी और का हुक्म मानने लगे).

इन्हीं दोनों बुनियादी अवधारणाओं पर, राजनीतिक सिद्धांतकार और कॉन्स्टीट्यूशनलिस्ट एमानुएल जोसेफ सियेस द्वारा रखे गए नाम के मुताबिक, 19वीं-सदी के बोनापार्टीय फ्रांस में “ग्रेडुएटेड प्रोमोशन” या कदम दर कदम तरक्की की व्यवस्था शुरू हुई (जहां से सिविल सेवाओं का मॉडल भी लिया गया). सीढ़ी दर सीढ़ी तरक्की का मतलब था कि संस्थान में तरक्की की हरेक सीढ़ी तक पहुंच को सीढ़ी दर सीढ़ी संचालित किया जाएगा, जिसमें हरेक सीढ़ी पर पहुंचने के लिए एक उम्मीदवार को एक इम्तिहान से गुज़रना होगा, जो हरेक के लिए बराबर होगा. इसके पीछे मंशा व्यवस्था को बदनीयती और एक मनमानी करने वाले प्राधिकार द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग से बचाना था. हमारे समय में संस्थान जिस दर्शन के आधार पर चलते हैं, उसकी बुनियाद में स्थित मेरिटोक्रेटिक दलील के मूल में यही है; जिसके संस्थापक एक संविधानवादी सियेस और एक सम्राट नेपोलियन थे.

सामाजिक न्याय

सामाजिक न्याय हर संस्थागत आधार से आगे एक सवाल उठाता है. यह एक हस्तक्षेप से शुरू होता है, संस्थाओं का कामकाज जिस सोच के जरिए चलता है, उसके औपचारिक आधारों पर एक सवाल खड़ा किया जाता है: क्या होगा जब खुद समाज का ढांचा ही सत्ता और विशेषाधिकार की एक ऊंच-नीच वाली सीढ़ीनुमा ढलान के रूप में हो? महज एक औपचारिक रिपब्लिकन सोच के सामने रखा गया यह एक बड़ा आंबेडकरी सवाल है, जैसे बी.आर. आंबेडकर और सियेस के बीच एक बातचीत, एक बहस हो रही हो. क्या होता है जब काम-काज चलाने वाला प्राधिकार सामाजिक रूप से पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो, और संस्थान, अपने ढांचे में ही हिंसक हों? दूसरे शब्दों में, ब्राह्मणवादी मेरिटोक्रेसी में फैसला करने वाले के बारे में फैसला कौन करेगा? उस झूठ को उजागर कौन करेगा, जो अपने सबसे मासूम रूप में, इस बात को मान कर चलता है कि समाज बदल गया है और अब पुराना, ऊंच-नीच का ढांचा अब नहीं रहा. जबकि अपने सबसे विकृत रूप में यह झूठ, औपचारिक रूप से मौजूद बराबरी के आधार और हकीकत में मौजूद गैरबराबरी के बीच की खाई में अपने संस्थागत अधिकारों के जरिए इस तरह दखल देता है कि यह वास्तविक गैरबराबरी कायम ही न रहे बल्कि उसमें इजाफा होता रहे?

जब सामाजिक न्याय का ठोस हस्तक्षेप हरेक औपचारिक-मेरिटोक्रेटिक, हरेक औपचारिक-निरंकुश व्यवस्था को कंपा देता है – आज वाम, मध्यमार्गी, दक्षिण सभी कांप उठे हैं – यह सबके लिए पूरी तरह से साफ है कि संस्थानों की भाषा में जिसे “तरक्की” कहा जाता है, वह राजनीति की भाषा में पावर का सवाल है, जिसमें सत्ता और शक्ति दोनों शामिल है. और इसलिए संस्थागत अन्यायों के सभी मामलों में इंसाफ का सवाल समाज में सत्ता की व्यवस्था के फिर से बंटवारे और पुरानी व्यवस्था को उलट देने का सवाल है. तब, दूसरा आंबेडकरी सबक यह है कि – जब एक दलित, सत्ता और शक्ति की एक जगह या ओहदे पर अपनी तरक्की किए जाने का दावा करता है, तब ब्राह्मणवादी सत्ता का अभिजात तबका खुद सत्ता से ही कांप उठता है. इसलिए जब तक समाज में पहले से ही एक सीढ़ी मौजूद है, जहां कुछ वर्ग/जातियों को अपने जन्म से ही पूरी की पूरी तरक्की दे दी गई है, तरक्की में भी आरक्षण की मांग करने की राजनीतिक दलीलों की हिमायत करने में कोई शर्म-संकोच नहीं है.

बुनियादी इंसाफ

फिर भी, इंसाफ का सवाल सत्ता के सवाल से आगे जाता है. इंसाफ बुनियादी तौर पर एक दार्शनिक अवधारणा है और कुछ-कुछ इसका सरोकार एक ऐसी सच्चाई से है जो सार्वभौम और स्वयंसिद्ध है. वो सच्चाई यह है कि हम सबके पास बुनियादी और सचमुच की इंसानी काबिलियत मौजूद होती है. आंबेडकर ने इसे साफ तौर पर देखा, लेकिन उन्होंने यह भी देखा कि समान इंसानी काबिलियत के बुनियादी सिद्धांत को कभी भी प्रदर्शित नहीं किया जा सकता. इसको उसी तरह घोषित किया जाना जरूरी है, जैसा एक स्वयंसिद्ध तथ्य को घोषित किया जाता है. इसके होने का कोई सबूत नहीं दिया जा सकता, इसको कहना पड़ता है और इसे कहने की हिम्मत होनी चाहिए. साहस के साथ, कल्पनाशीलता के साथ और हमेशा के लिए यह बात कही जानी जरूरी है. तब भी, जब इसको जातियों और राष्ट्रों द्वारा दबा कर रखा गया हो. इसको कहना और एक नए विनय के साथ इसको जीना, इस पर अमल करना जरूरी है. एक ऐसे वक्त में, जब ब्राह्मणवादी वर्चस्ववादी ताकतें अपनी जरूरत के हिसाब से संरक्षण से लेकर आतंक के बेशुमार तरीकों का इस्तेमाल अपने नियंत्रण के लिए कर रही हैं. इसलिए एक बुनियादी तत्व के रूप में, इंसाफ बराबरी का एक विचार है, जिसकी बिना शर्त हिमायत (प्रोफेस) वे लोग करते हैं जिनकी जिंदगी इसी पर टिकी है, और यह इंसाफ भी उन लोगों से ही ज़िंदा रहता है, जो इसकी हिमायत (प्रोफेस) करते हैं.

ऊपर दी गई परिभाषा के मुताबिक, सैत्य ब्रत दास अरसा पहले से ही मुकम्मल तरीके से एक प्रोफेसर बन चुके हैं. वहीं उनसे उम्र में कुछ बड़े जगदीश कुमार, कई ओहदों से गुजरते हुए  आज जेएनयू के वाइस चांसलर हैं, फिर भी इंसाफ की इस बुनियादी कसौटी पर प्रोफेसर होने के काबिल नहीं हैं.
 

अनुवाद: रेयाज उल हक

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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