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बीच सफ़हे की लड़ाई

भीम आर्मी को भाजपा ने नहीं, बसपा की करतूतों ने जन्म दिया है

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/31/2017 05:10:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में भीम आर्मी के उभार के बारे में बता रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक

मायावती ने सहारनपुर का दौरा करते हुए भीम आर्मी का नाम नहीं लिया, लेकिन 25 मई को उन्होंने लखनऊ में इसका जिक्र किया. उन्होंने अपने भाई आनंद कुमार का रिश्ता भीम आर्मी से जोड़ने वाली खुफिया रिपोर्ट को खारिज करते हुए इसे भाजपा द्वारा पैदा किया गया एक संगठन कहा, जिसका मकसद मायावती के असर को नाकाम करना है. उनकी दलील यह थी कि भीम आर्मी के नेता हिंसा में शामिल हैं, फिर भी उन्हें पुलिस गिरफ्तार नहीं कर रही है, जो भाजपा के साथ इस समूह के भीतरी समर्थन की ओर इशारा करता है.

यह बदकिस्मती ही है कि बेहद संभावनाओं वाले इस संगठन को समर्थन देने के बजाए वे इसे दुश्मन के हाथ का एक औजार बता कर इसकी आलोचना कर रही हैं. इस संगठन के नौजवान उन जातिवादी गुंडों से सीधी टक्कर ले रहे हैं, जिनका मनोबल अपने सरपरस्त के राज्य का मुख्यमंत्री बन जाने से बढ़ा हुआ है. मायावती के पास अपने जन्म के उत्सवों के लिए दलितों की भारी गोलबंदी रहती रही है और वे आसानी से सहारनपुर में हुए अत्याचारों के खिलाफ लखनऊ में एक बड़ा प्रदर्शन आयोजित कर सकती थीं. लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगी. चुनावों में शर्मनाक हार के बावजूद उन्हें यह बात समझ में नहीं आई है कि दलितों की जमीनी समस्याओं से उनका कभी भी कोई रिश्ता नहीं रहा है और उल्टे उन्होंने खोखले भावनात्मक मुद्दों के साथ दलितों को बेवकूफ ही बनाया है. ‘दलित की बेटी’ जैसी लफ्फाजियों से भ्रमित दलित यह कल्पना करने लगे थे कि बसपा की ताकत दलितों की ताकत है और खुशफहमी का यह जुनून दो दशकों तक जारी रहा. अब मुखर ब्राह्मणवादी ताकतों के उभार के साथ उनका सामना कठोर हकीकत से हुआ है और उनकी आंखें खुली हैं और उन्होंने अपनी सियासत को नए तरह से एक नई शक्ल देने की शुरुआत की है. भीम आर्मी इसी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति है, यह सीधे-सीधे बसपा की अपनी करतूतों के नतीजे में पैदा हुई है.

इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि बसपा ने जिस तरह मुख्यधारा की पार्टियों को उनके अपने ही खेल में मात दी वह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी और यह कांशीराम की रणनीतिक महारत से ऐसा कर पाई. हालांकि एक बार सत्ता में पहुंच कर यह सियासत के एक दूसरे रास्ते पर चलने की कोशिश कर सकती थी, जिससे इसकी पहचान गरीब और सताई हुई जनता के लिए काम करने वाली, उन्हीं की एक पार्टी के रूप में बनती. राजनीतिक सत्ता पाने के लिए जातीय गुना-भाग का खेल खेलना एक बात थी, और सत्ता से चिपके रहना एक बिल्कुल ही दूसरी बात. जैसा कि कांशीराम ने दावा किया था, राजनीतिक सत्ता हर समस्या का हल थी और मायावती को उसका इस्तेमाल कम से कम दलितों के सामने खड़ी सबसे बड़ी समस्याओं से निबटने में करना चाहिए था. हालांकि मायावती ने जान-बूझ कर इस मौके को गंवाया और इसके बजाए उन्होंने हर वह काम करने के लिए इसका इस्तेमाल किया, जो शासक पार्टियां कहीं अधिक धड़ल्ले से करती रही हैं. मिसाल के लिए वो बेजमीन परिवारों के लिए जमीन का वितरण करने का रेडिकल कदम उठा सकती थीं (उस दिखावटी कार्रवाई से आगे जाकर, जैसा करने का उन्होंने दावा किया था), दलितों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में बुनियादी बेहतरी ला सकती थीं (जिसको भीम सेना ने अपने मुख्य अभियान के रूप में उठाया है), और बेशक दलितों पर की जा रही जातीय अत्याचारों पर लगाम लगा सकती थीं. अगर उन्होंने इतना भी किया होता, तो लोगों के दिमाग में उनकी और बसपा की एक खास छवि बन गई होती कि यह गरीब-सताए गए लोगों की और उन्हीं लोगों के लिए काम करने वाली पार्टी है. यह कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीतिक ऐसी नीतियों का आदी नहीं है. सिर्फ लोगों का भला करना इसकी गारंटी नहीं है कि वे आपको वोट भी करेंगे. अगर यह सही है, तब बसपा अपने जनाधार के बीच इस राजनीतिक व्यवस्था की नुकसानदेह संरचना को उजागर कर सकती थी और अपने समर्थकों को इसके खिलाफ गोलबंद कर सकती थी. लेकिन बसपा इनमें से किसी भी रास्ते पर नहीं चली और न आगे चलने वाली है. यह इतनी सारी पार्टियों में एक और पार्टी है, जो उसी व्यवस्था को वैधता दिलाती है, जो दलितों के उत्पीड़न का साकार रूप है.

मायावती ने जाटव-चमारों के अपने मुख्य जनाधार पर भी गौर नहीं किया और उन्हें महज अपने बंधुआ के रूप में लेती रहीं. दलितों पर अत्याचारों के मामले में उत्तर प्रदेश की अपनी खास जगह बनी हुई है. इस पर चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री के रूप में उनके पहले दोनों कार्यकालों को हम छोड़ सकते हैं, क्योंकि वे जून 1995 से अक्तूबर 1995 और मार्च 1997 से सितंबर 1997 तक बहुत थोड़े समय के लिए सत्ता में रही थीं. लेकिन मई 2002 से अगस्त 2003 तक और मई 2007 से मार्च 2012 तक के उनके बाद के दोनों कार्यकालों ने उन्हें एक दलित पार्टी के रूप में खुद को पेश करने का भरपूर मौका मुहैया कराया था, खास कर अपने अंतिम कार्यकाल में जब उनके पास विधानसभा में पूरा बहुमत था. एनसीआरबी के आंकड़ों को देखें तो राज्य में 2002 और 2003 में कुल अत्याचारों की संख्या क्रमश: 7927 और 2821 थी, जो बढ़ कर 2004 में 3785, 2005 में 4397 और 2006 में 4960 हो गई. यह वो वक्त था जब वे सत्ता से बाहर थीं और यह बसपा की राजनीति की वजह से दलितों पर होने वाली बदले की कार्रवाइयों और उनकी राजनीतिक असुरक्षा को दिखाता है. उनके आखिरी कार्यकाल के दौरान छह वर्षों (2007 से 2012 तक) के अत्याचारों के आंकड़े क्रमश: ये हैं: 6144, 8009, 7522, 6222, 7702 और 6202. इनमें हमें इनके पहले के तीन सालों के मुकाबले न सिर्फ अहम इजाफा देखने को मिलता है (औसतन 4381 से 6967), बल्कि हम यह भी देखते हैं कि अत्याचार एक ऊंची दर पर आ गए और उनकी दर ऊंची ही बनी रही. बेशक, जब सत्ता मायावती के हाथ से चली गई तो ये आंकड़े और भी बढ़ कर 2013, 2014 और 2015 में क्रमश: 7078, 8075 और 8358 हो गए. यह उनके मुख्य जनाधार दलितों की बदतर होती हालत की निशानी है. अत्याचारों के आंकड़ों में इजाफा सीधे सीधे उनकी ‘सर्वजन’ रणनीति से निकली राजनीतिक करतब का नतीजा है. आखिरकार 2007 में उनकी शानदार कामयाबी की वजह यही थी, जिसका प्रतिनिधित्व उनके इस भड़कीले नारे में दिखता है: ‘हाथी नहीं, गणेश हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश हैं’.

बसपा की ब्राह्मणवाद-विरोधी लफ्फाजियों पर चलने वाले दलित इस कलाबाजी से बेचैन तो हुए लेकिन वे जिस सत्ता को हासिल करने के लिए बेकरार थे, उसे मिलने की संभावना में उन्होंने बसपा को वोट दिया. लेकिन जब बसपा ने संतुलन साधने के लिए दलितों की अनदेखी करनी शुरू की, तब वे इसकी कठोर हकीकत से रू ब रू हुए. अब 2012 से, जब बसपा ने अपनी सत्ता गंवाई, ऊंची जातियों के पलटवार के साथ, और खास कर मार्च 2017 से, जब एक युद्धोन्मादी हिंदुत्व कट्टरपंथी राज्य का मुख्यमंत्री बना, दलितों की प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी. भीम आर्मी बस इसी की अभिव्यक्ति है और इसे बसपा की राजनीति का एक स्वाभाविक सह-उत्पाद माना जाना चाहिए.

भीम आर्मी के उभार की तुलना 1972 में महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स से की जा सकती है, जो तब की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) की दिवालिया राजनीति के नतीजे में पैदा हुई थी. हालांकि दोनों के बीच में कुछ फर्क है. दलित पैंथर्स के उलट, भीम आर्मी महज जुझारू और आक्रामक शोरशराबे और नारेबाजी तक सीमित नहीं है. बल्कि खबरों के मुताबिक इसके नेताओं चंद्रशेखर आजाद और विनय रत्न सिंह ने 2015 में भीम आर्मी एकता मिशन की स्थापना की थी, जिसका रचनात्मक मकसद दलित बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराना है. भीम आर्मी सहारनपुर और इसके आसपास 300 से ज्यादा स्कूल चला रहा है. निश्चित रूप से भीम आर्मी के नेताओं ने मायावती की शैली की राजनीति के साथ अपने मोहभंग की बात की है, लेकिन साथ ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से कांशीराम के नाम से शपथ भी ली है. चंद्रशेखर आजाद ने अपने लिए रावण की उपाधि रखी है, जिसमें भाजपा के राम के सांस्कृतिक जवाब की झलक मिलती है.

मौजूदा तौर पर जो दिखाई दे रहा है उसके मुताबिक भीम आर्मी की जड़ें असल में बसपा के अंदाज वाली पहचान की राजनीति की रूढ़ छवियों में ही धंसी नजर आती हैं. लेकिन जिस तरह सहारनपुर में उन्होंने जातिवादी गुंडों के साथ टक्कर ली है, अपने आप में यही तथ्य इस बात की पूरी संभावना को जाहिर कर देता है कि वे इससे आगे जाएंगे और दलितों की मुक्ति की एक नई राजनीति पेश करेंगे. रावण और उनके साथियों को इस चुनौती के लिए तैयार रहना होगा.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ भीम आर्मी को भाजपा ने नहीं, बसपा की करतूतों ने जन्म दिया है ”

  2. By Durgesh Kumar Singh on June 3, 2017 at 9:02 PM

    रष्ट्र निर्माण में अपनी सहभागिता बढ़ाये
    देश बचाएं देश बचाएं

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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