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सीमाहीन अन्याय: असीमानंद और साईबाबा पर अदालती फैसले

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/01/2017 03:39:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े का नियमित स्तंभ.

महज 24 घंटे से भी कम के भीतर ऐसे दो फैसले आए, जिनकी वजह से देश भर में सिहरन की एक लहर दौड़ गई. पहला फैसला 7 मार्च को महाराष्ट्र की गढ़चिरोली सत्र अदालत से आया, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा और चार दूसरे लोगों को नक्सली गतिविधियों में मदद करने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए गैर कानूनी गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आजीवन कैद की सजा सुनाई गई. छठे आरोपित को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई.

दूसरा फैसला अगले दिन नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) की जयपुर विशेष अदालत का था, जिसमें स्वघोषित साधु और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व कार्यकर्ता स्वामी असीमानंद और दूसरे छह लोगों को बरी कर दिया गया. ये लोग 2007 के समझौता एक्सप्रेस विस्फोट (जिसमें अड़सठ लोग मारे गए थे और दर्जनों घायल हुए थे), हैदराबाद मक्का मस्जिद विस्फोट (सोलह मौतें, सौ जख्मी) और अजमेर दरगाह विस्फोट (तीन मौतें, 17 जख्मी) मामलों में अभियुक्त थे. फैसले ने सनसनीखेज अजमेर दरगाह धमाके के मामले में तीन दूसरे लोगों को कसूरवार ठहराया. जाहिर तौर पर, अगर कठोर यूएपीए द्वारा तैयार की गई अपराध की धारणा को छोड़ दें तो साईबाबा के मामले में अदालत द्वारा किसी अपराध का जरा भर भी हवाला नहीं दिया गया है. वहीं दूसरा फैसला जिस मामले के बारे में है, उनमें लोग सचमुच में मारे गए थे, जब अपराधियों ने 13वीं सदी की इस पवित्र दरगाह पर पांच हजार श्रद्धालुओं के एक मजमे के बीच बम धमाके किए. लेकिन इस मामले में मुख्य अभियुक्त को ही छोड़ दिया गया. अगर कोई और वक्त होता तब भी इन फैसलों को दुर्भाग्यपूर्ण संयोग मानते हुए उन पर अफसोस जाहिर किया जाता. लेकिन भाजपा के सत्ता में होने से ये सिर्फ एक मनहूस चलन को ही मजबूती देते हैं कि न्यायपालिका की संस्थागत साख की कीमत पर हिंदुत्व के अपराधियों का बचाव किया जा रहा है और इसके विरोधियों को कुचला जा रहा है और इसमें यह संस्था इसकी फरमाबरदार की भूमिका निभा रही है.

असीमानंद की मासूमियत

11 सितंबर के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका जब पूरी दुनिया में मुसलमानों को आतंकवादियों के रूप में बदनाम कर रहा था, तो जायनिस्टों के बाद इसका सबसे बड़ा फायदा भारत में हिंदुत्ववादी ताकतों ने उठाया. संयुक्त राज्य के ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ ने मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्ववादी ताकतों की ऐतिहासिक रंजिश की पुष्टि करते हुए बढ़ावा दिया. हालांकि आजादी के बाद पहली आतंकी कार्रवाई खुद इन्हीं हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा की गई थी, जब उन्होंने मुसलमानों के प्रति नरमी दिखाने के लिए मो.क. गांधी की हत्या कर दी थी. लेकिन अजीब विरोधाभासी तरीके से आतंकवादी होने की छवि मुसलमानों के साथ जोड़ दी गई है. पहली बार, असीमानंद के कबूलनामों ने हिंदुत्ववादियों को आतंकवादी समूह के रूप में उजागर किया. हालांकि उसका यह कहना था कि उनका आतंक मुसलिम आतंक के जवाब में था, लेकिन जिन ज्यादातर हमलों को मुसलिम हमलों के रूप में देखा जाता है, मुमकिन है कि वे भी इन्हीं लोगों की करतूतें हों.

तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने अगस्त 2010 में पहली बार राज्य पुलिस प्रमुखों को ‘भगवा आतंकवाद’ के खतरों से आगाह कराया था. तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राज्य में भगवा गौरव आंदोलन चला कर इसका जवाब दिया. यह सब असीमानंद के कबूलनामे की वजह से ही हुआ था, जो पुलिस द्वारा हिरासत में यातना देकर हासिल नहीं किया गया था. यह बॉटनी में पोस्ट ग्रेजुएट और मंजे हुए आरएसएस कर्मी असीमानंद उर्फ जतिन चटर्जी का एक बयान था, जो अनेक आतंकी साजिशों का मास्टरमाइंड था. यह क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 164 के तहत 18 दिसंबर 2010 को तीस हजारी अदालत में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट दीपक दबास के सामने दिया गया एक बयान है, जो इंडियन एविडेंस एक्ट 1872 के तहत एक सबूत के दायरे में आता है. उसने यह कबूल किया कि वह और दूसरे हिंदू कार्यकर्ता मुसलिम धार्मिक स्थलों पर बम धमाकों में शामिल थे, क्योंकि वे हरेक इसलामी आतंक का जवाब ‘बम के बदले बम’ की नीति से देना चाहते थे. इसके अलावा, कारवां  पत्रिका के साथ एक टेप किए इंटरव्यू में स्वामी ने यह उजागर किया था कि 2006 से 2008 के बीच के भयानक धमाकों की जिम्मेदारी मोहन भागवत द्वारा सौंपी गई थी, जो तब आरएसएस के महासचिव थे, लेकिन उन्होंने सावधान किया था कि “...तुम इसको संघ से नहीं जोड़ना.” बाद में असीमानंद इन दोनों ही साफ साफ और नहीं पलटे जा सकने वाले बयानों से मुकर गया.

असीमानंद का कबूलनामा, अनेक मामलों की तफ्तीश में हासिल होने वाले तथ्यों से मेल भी खाता था. समझौता एक्सप्रेस धमाके (2007) में अभियुक्त दयानंद पाण्डेय के लैपटॉप से जब्त ऑडियो टेपों ने यह पुष्टि की कि हिंदुत्व गिरोह देश भर में बम धमाकों की साजिश रच कर उन्हें अंजाम दे रहे थे, जिसमें मालेगांव (2006 और 2008), अजमेर शरीफ (2007) और मक्का मस्जिद (2007) धमाके शामिल हैं. पुलिस ने इनमें से हरेक मामले में दर्जनों मुसलमान युवकों को पकड़ा, हिरासत में रखा और यातनाएं दीं तथा हमेशा की तरह इन मामलों में इस्लामी मॉड्यूलों के शामिल होने की कहानी गढ़ी. लेकिन इन मामलों में हिंदुत्व गिरोह के हाथ को उजागर करने का श्रेय महाराष्ट्र एटीएस के तत्कालीन प्रमुख हेमंत करकरे को जाता है, जिनको 26 नवंबर के हमले में मार दिया गया. लेकिन गढ़ी हुई कहानियों का झूठ उजागर किए जाने के बाद भी, मुसलमान नौजवान 10 बरसों तक कैद में रहे और तब जाकर अदालत ने उन्हें बरी किया. इस भंडाफोड़ ने कम से कम दो जिंदगियां लीं: करकरे की मौत जो अभी भी एक रहस्य है और शाहिद आजमी की मौत, जिसको एक देशभक्त गुंडे का गुस्सा कह कर निबटा दिया गया. राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना यह मामला घिसटता रहा और 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से, उनको अपने हाथ में लेने वाली एनआईए ने सभी सरगनाओं को छुड़ाने की साजिश रचनी शुरू कर दी है. मई 2016 में इसने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, शिवनारायण कलसांगरा, श्याम साहू, प्रवीण तक्कलकी, लोकेश शर्मा और धन सिंह तथा पांच दूसरे लोगों पर से 2008 के मालेगांव धमाके के मामले में आरोप वापस ले लिए, जबकि करकरे की तफ्तीश को ‘सवालों के घेरे में’ और ‘संदिग्ध’ बताते हुए बाकी सभी 10 अभियुक्तों पर से कठोर मकोका कानून के तहत आरोपों को हटा लिया गया है, जिसमें ले. कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित शामिल है.

साईबाबा का अपराध

साईबाबा की 90 फीसदी विकलांगता और गिरती हुई सेहत के बावजूद, जिस जोरदार तरीके से राज्य ने उनकी जमानत का विरोध किया और अदालतों ने जिस तरह से उसे स्वीकार किया, उससे यह साफ था कि राज्य माओवादियों के ‘शहरी नेटवर्क’ के लिए इसे एक सबक बनाना चाहता था. इस मामले की डॉ. विनायक सेन के मामले के साथ अनोखी समानता है, जिनकी ऊंची प्रोफेशनल प्रतिष्ठा, सार्वजनिक सेवा के बेदाग रेकॉर्ड और उनके प्रति पूरी प्रगतिशील दुनिया की मुखर हमदर्दी के बावजूद उन्हें रायपुर सत्र अदालत द्वारा आजीवन कैद की सजा सुनाई गई और उन्हें लगातार जमानत देने से मना किया जाता रहा, ताकि यह उन सबके लिए एक मिसाल बन जाए जिनके दिल में माओवादियों को लेकर जरा भी नरमी है. राज्य के इस मंसूबे में विनायक सेन की बेगुनाही ही सबसे बड़ा कसूर बन गई. साईबाबा के मामले में, महाराष्ट्र सरकार ने छत्तीसगढ़ को भी पीछे छोड़ दिया है, जिसने अपने शिकार के रूप में राजधानी के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में काम करने वाले एक 90 फीसदी विकलांग प्रोफेसर को चुना. साईबाबा एक रेडिकल कार्यकर्ता रहे हैं और उन्होंने संघर्षरत जनता के लिए, जिसको सरकार पूरी तरह माओवादी कहती है, अपनी हमदर्दी को कभी छुपाया नहीं. लेकिन व्हीलचेयर पर चलने वाला एक शख्स, जो बिना किसी मदद के चल-फिर भी नहीं सकता, वह सोचने और लिखने से आगे जाकर क्या कुछ कर सकता है? लेकिन राज्य ठीक यही बात दिखाना चाहता है. अगर वह साईबाबा के साथ ऐसा कर सकता है, तो वह किसी के साथ भी ऐसा कर सकता है. इस मामले में उनके सह-आरोपितों हेम मिश्रा, जो जेएनयू के छात्र रहे हैं, और प्रशांत राही को भी, जो एक स्वतंत्र पत्रकार और कार्यकर्ता हैं, आतंकित करने के इस मंसूबे का हिस्सा बनाया गया. बाकी तीन आदिवासियों थे, ताकि इस असंभव गठजोड़ को बना कर पेश किया जा सके.

गढ़चिरोली सत्र अदालत ने उन सभी को यूएपीए की धाराओं 13, 18, 20, 38 और 39 के साथ साथ आईपीसी की धारा 120-बी के तहत कसूरवार ठहराया. उन्हें प्रतिबंधित पार्टी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और इसके “फ्रंट” रेवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट (आरडीएफ) के साथ रिश्ते रखने के लिए सजा दी गई. विनायक सेन के मामले में ही जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने यह साफ-साफ कहा था कि महज एक प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होना किसी को अपराधी नहीं बनाता, जब तक कि उसने हिंसा का सहारा न लिया हो या लोगों को हिंसा के लिए न भड़काया हो. मई 2015 में केरल उच्च न्यायालय ने माओवादी होने के संदेह में 2014 में पकड़े गए श्याम बालाकृष्णन को यह कहते हुए रिहा कर दिया कि “माओवादी होना कोई अपराध नहीं है.” उच्च न्यायालय ने यह गहरी बात कही कि “लोगों के लिए एक उम्मीदें रखना एक बुनियादी मानवाधिकार है” और “कानूनों से भटकाव को वर्दी की ओट में” छुपाने के लिए राज्य की आलोचना की, जहां कानून को “बचाने वाले ही इसका उल्लंघन करने वाले” बन जाते हैं. इसके बावजूद आरोपितों के माओवादी रिश्तों को मुद्दा बनाया गया. यहां 827 पन्नों के फैसले पर बिंदुवार विचार करना मुमकिन नहीं है, लेकिन जैसा कि वकीलों ने इसके बारे में ध्यान दिलाया है, इस फैसले में कानूनों की साफ साफ अनदेखी की गई है और तथ्यों की तरफ से जानबूझ कर आंखें मूंदी गई हैं. साफ जाहिर है कि यह फैसला पुलिस और राजनेताओं के दबावों के रंग में रंगा हुआ है, जैसा कि ज्यादातर निचली अदालतों के मामले में होता है.

राज्य की बदमाशी

ये दोनों मामले राज्य की बदमाशी को उजागर करते हैं. नवउदारवादी दौर में, राज्यों में फासीवादी होने के अंतर्निहित रुझान होते हैं, ताकि वे बाजार की हुकूमत को सुनिश्चित कर सकें. ये रुझान पूरी दुनिया में देखे जा रहे हैं, वहीं भारत में ब्राह्मणवाद की वर्चस्वशाली विचारधारा के साथ इसकी अच्छी ताल-मेल बैठ गई है. चाहे कोई भी दल सत्ता में रहे, भारत में राज्य हमेशा ही वही पूंजीवाद-परस्त, हिंदू-परस्त, ऊंची जातियों का हिमायती और मुट्ठी भर लोगों की हुकूमत बना रहता है. भाजपा इस पर जिस बेशर्मी से काबिज़ हो रही है, उससे बस यह राज्य और आक्रामक और मर्दानगी भरा बन रहा है, जिसकी झलक मोदी के रोबीले अंदाज में देखी जा सकती है. बहुत करीब दिख रहे हिंदू राष्ट्र के अपने लक्ष्यों को हासिल करने की खातिर, यह प्रतिरोध को नेस्तनाबूद करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. इस दिशा में संस्थागत रुकावटों को इसने मोटे तौर पर अपने भगवाकरण अभियान के जरिए दूर कर दिया है, अब यह बची-खुची असहमतियों को भी कुचल रही है. हकीकत ये है कि 2014 के बाद से यह रुझान इतना साफ हो गया है कि ऐसे फैसलों का अंदाजा आप पहले से ही लगा सकते हैं. गुजरात में 2002 के कत्लेआम को अंजाम देने वाले सभी लोग कानून के फंदे से बाहर जा चुके हैं, बल्कि उनको अच्छा खास इनाम तक मिल चुका है. और तीस्ता सीतलवाड़ जैसे जिन लोगों ने प्रतिरोध खड़ा करने की कोशिश की है, उन्हें अलग-अलग तरह से परेशान और आतंकित किया जा रहा है.

अपने दावे के उलट हिंदुत्ववादी ताकतें हमेशा ही अपने काम को बेरहमी से अंजाम देती रही हैं; आखिर इस दुनिया में उनके बुनियादी प्रेरणास्रोत हिटलर और मुसोलिनी जैसे लोग रहे हैं और बुद्ध जैसे लोगों से वे नफरत करते आए है. हिंदुत्व के पूर्वज सावरकर ‘राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैन्यीकरण’ करना चाहते थे. 1999 में ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों को जला कर हत्या, 2002 में दुलीना में पांच दलितों और 2015 में दादरी में मोहम्मद अखलाक की पीट पीट कर हत्या; उना के पास मोटा समाढियाला में चार दलित नौजवानों की निर्मम पिटाई या फिर नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसर और कलबुर्गी की हत्याएं इन ताकतों के क्रूर व्यक्तित्व की झलक देती हैं. आखिरकार जब वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों का दम भरते हैं, तो हिंसा ही उनकी पहचान के रूप में सामने आती है, क्योंकि उनका धर्म ऐसा अकेला धर्म है, जिसके देवता हथियारों से लैस हैं. लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि राज्य भी अन्यायपूर्ण, हिंसक और अनैतिक बन जाए.

यह कल्पना करना एक गलतफहमी है कि इंसाफ के नाम पर साईबाबा और उनके सह-आरोपितों पर इस अन्यायपूर्ण और अनैतिक तरीके से निर्ममता से पेश आना उनके जैसे दूसरे लोगों के लिए एक सबक होगा. इसका कोई सबूत नहीं है कि ऐसे ‘सबक’ कभी अपने मकसद में कामयाब उतरे हों. इसके उलट, यह पुलिस मानसिकता माओवादियों के निर्माण को ही तेज करेगी. ये बदमाश राज्य की आतंकवादी कार्रवाइयों से लड़ने के जनता के इरादे को ही मजबूत करेगी.



समयांतर, अप्रैल 2017 में प्रकाशित.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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