हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

वोट डालें, या राजनीति को फिर से गढ़ें?: आलें बादिऊ

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/09/2017 12:32:00 PM


दुनिया के जाने माने दार्शनिक, राजनीति और गणित के जानकार, उपन्यासकार और नाटककार आलें बादिऊ ने हाल में हुए फ्रांसीसी चुनावों के दौरान कुछ महत्वपूर्ण लेख लिखे हैं, जिनमें उन्होंने फ्रांस के खास राजनीतिक संदर्भ में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों, पार्टियों और धाराओं पर बहस करते हुए मौजूदा दौर में पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी रुझानों पर गौर किया है और ऐसे माहौल से आगे जाने और इंसानियत की मुक्ति के सवाल पर आगे की राह तलाशने की जरूरत पर जोर दिया है. इन लेखों में से हम दो लेखों को यहां पेश कर रहे हैं, जिनमें से मुख्यत: फ्रांस के स्थानीय चुनावी संदर्भ वाले अंशों को हटा दिया गया है. यहां पर दो भागों में पेश किए जा रहे इन लेखों के मूल फ्रांसीसी से अंग्रेजी अनुवाद क्रमश: “वोट, ऑर री-इन्वेंट पॉलिटिक्स” और “लेट्स लूज़ इंटरेस्ट इन इलेक्शंस, वंस एंड फॉर ऑल!” शीर्षक से वर्सो बुक्स के ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है. ये लेख भारत सहित दुनिया भर में मौजूदा राजनीतिक हालात की एक बेहतर समझ बनाने की दिशा में उपयोगी हैं, इस यकीन के साथ इन्हें यहां पेश किया जा रहा है. अनुवाद एवं प्रस्तुति: रेयाज उल हक

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पुरानी और जानी-मानी भूमिकाओं के इस रंगमंच में, राजनीतिक प्रतिबद्धता का बहुत थोड़ा सा ही मोल है, या फिर यह सियासी करतब के लिए एक बहाना भर है. इसलिए बेहतर होगा कि हम इस सवाल से शुरू करें: राजनीति क्या है? और एक पहचानी जा सकने वाली, घोषित राजनीति क्या है?

चार बुनियादी राजनीतिक नजरिए

कोई राजनीति हमेशा तीन तत्वों के आधार पर खुद को परिभाषित कर सकती है. इनमें से पहला तत्व है सामान्य जनता का समूह और साथ ही उसके काम और उसकी सोच. आइए, हम इसे “जनता” कहें. इसके बाद विभिन्न सामूहिक संगठन आते हैं: असोसिएशन, यूनियन, पार्टियां – कुल मिला कर वे सभी समूह जो सामूहिक कार्रवाई करने के काबिल होते हैं. आखिर में राजसत्ता के अंग – सांसद, सरकार, सेना, पुलिस – आते हैं लेकिन साथ ही आर्थिक और/या मीडिया सत्ता के हिस्से भी इसके भीतर आते हैं (यह एक ऐसा फर्क है जो अब करीब करीब ऊपर से दिखाई नहीं देता), या फिर हर वो चीज जिसे आज हम एक खूबसूरत लगने वाले और लोगों के दिलो-दिमाग पर छा जाने तरीके से “फैसला लेने वाले लोग” कहा करते हैं.

राजनीति, हमेशा ही इन तीन तत्वों के जरिए मकसद को हासिल करने से बनती है. इस तरह हम देख सकते हैं कि आधुनिक दुनिया में मोटे तौर पर चार बुनियादी राजनीतिक नजरिए पाए जाते हैं: फासीवादी, रूढ़िवादी, सुधारवादी और कम्युनिज्म (साम्यवादी).

रूढ़िवादी और सुधारवादी नजरिए विकसित पूंजीवादी समाजों का मध्यमार्गी संसदीय धड़ा (ब्लॉक) बनाते हैं: फ्रांस में वामपंथ और दक्षिणपंथ, संयुक्त राज्य अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट वगैरह. इन दोनों नजरियों में बुनियादी तौर पर जो बात आपस में मिलती है वह ये है कि ये दोनों ही दावा करते हैं कि उनके बीच एक टकराव मौजूद है – खास तौर से इन तीनों तत्वों की अभिव्यक्ति के अर्थ में – इसके बावजूद इनमें से दोनों ही नजरिए संवैधानिक सीमाओं के भीतर रह सकते हैं और निश्चित रूप से रहते हैं.

इनसे अलग बचे दूसरे दोनों नजरियों, फासीवाद और कम्युनिज्म में, मकसद को लेकर अपने बीच के हिंसक विरोध के बावजूद जो बात एक जैसी है वो यह है कि दोनों ही मानते हैं कि राजसत्ता के सवाल पर विभिन्न पार्टियों के बीच के टकराव में, सुलह-समझौता नामुमकिन है: इसको किसी संवैधानिक सर्वसहमति का पाबंद नहीं बनाया जा सकता है. ये नजरिए अपने से विरोधी या यहां तक कि अपने से अलग किसी भी मकसद को समाज और राज्य की अपनी अवधारणाओं में शामिल करने से इन्कार करते हैं.

चहेता फासीवाद-परस्त नजरिया

हम राजसत्ता के उस संगठन के लिए “संसदीयतावाद” के नाम का इस्तेमाल कर सकते हैं जो चुनावी मशीनरी, अपने दलों और उनके अनुयायियों के जरिए रूढ़िवादियों और सुधारवादियों के साझे वर्चस्व को सुनिश्चित करता है. यह वर्चस्व हर जगह राज सत्ता पर फासीवादियों या कम्युनिस्टों के दखल की किसी भी गंभीर संभावना को खत्म करता है. हम जिसे “पश्चिम” कहते हैं, वहां पर यही राज्य का प्रभुत्वशाली रूप है. खुद इसके लिए एक तीसरे नाम की जरूरत है, जो इन दोनों मुख्य नजरियों के बीच आपस में तालमेल का एक साझा और ताकतवर आधार हो और जो इन दोनों का अटूट अंग हो और इनके अलावा भी जिसका वजूद हो. यह साफ है कि हमारे समाजों में नवउदारवादी पूंजीवाद यही आधार है. कारोबार और निजी दौलत को बढ़ाते जाने की बेपनाह आजादी, निजी संपत्ति के लिए पूरा सम्मान (अदालती व्यवस्था और भारी पुलिस बंदोबस्त जिसकी गारंटी करती है), बैंकों में भरोसा, युवाओं की शिक्षा, “लोकतंत्र” की ओट में होड़ (प्रतिस्पर्धा), “कामयाबी” की भूख,  बराबरी के नुकसानदेह और काल्पनिक चरित्र का बार-बार दावा करना: यह आम राय से कबूल की गई “आजादियों” का एक सांचा (मैट्रिक्स) है. ये वो आजादियां हैं जिनकी हमेशा गारंटी करने के लिए दोनों तथाकथित “शासनकारी” पार्टियां कमोबेश प्रतिबद्ध हैं.

पूंजीवाद का होना, संसदीय सर्वसहमति के मूल्य में कुछ अनिश्चितताएं लेकर आता है, और इस तरह चुनावी रस्मों के दौरान “बड़े” रूढ़िवादी या सुधारवादी पार्टियों में भरोसे को जाहिर किया जाता है. यह खास तौर से निम्न बुर्जुआ के लिए सही है, जिसकी सामाजिक हैसियत खतरे में होती है, या फिर मेहनतकश वर्ग के लिए, जो उद्योगों के धीरे-धीरे बंद होने से तबाह हो गए हैं. पश्चिम में हम यही देख रहे हैं, जहां एशियाई देशों की उभरती हुई ताकत के मुकाबले, हम एक तरह का पतन देख सकते हैं. आज का यह खास संकट साफ तौर पर फासीवादी, राष्ट्रवादी, धार्मिक, इस्लामविरोधी और युद्ध को पसंद करने वाले नजरिए का समर्थन करता है, क्योंकि खौफ एक बहुत बुरा सलाहकार है और संकट में डूबे ये खास समाज पहचान पर आधारित मिथकों की गिरफ्त में जाने को बेकरार हैं. सबसे बढ़कर इसलिए कि कम्युनिस्ट परिकल्पना मुख्यत: सोवियत संघ और चीन के जनवादी गणतंत्र के अपने पहले और राज्य आधारित संस्करणों की ऐतिहासिक नाकामियों की वजह बहुत बुरी तरह कमजोर होकर सामने आई है.

इस नाकामी के नतीजे खुद ब खुद जाहिर हैं: नौजवानों, वंचितों और बदहाल लोगों, रोजगार से बेदखल मजदूरों और हमारे उपनगरों के घुमंतू सर्वहारा इस बात पर यकीन करने लगे हैं कि कड़वाहट भरी पहचानों (अस्मिताओं), नस्लवाद और राष्ट्रवाद की फासीवादी राजनीति ही हमारी संसदीय सर्वसहमति का अकेला विकल्प है.

कम्युनिज्म, इंसानियत की मुक्ति

हालात ने जो रुख लिया है, अगर हम उसके खिलाफ हैं तो हमारे सामने सिर्फ एक ही रास्ता है: हमें कम्युनिज्म को फिर से गढ़ना होगा, उसमें जरूरी बदलाव करके उसे फिर से पेश करना होगा. अब यह जरूरी हो गया है कि बहुत अपमानित हो चुके इस शब्द को हम फिर से उठाएं, इसे साफ करें और फिर से इसकी रचना करें. यह इंसानियत की मुक्ति का हरकारा है, करीब दो सदियों से इसकी यही भूमिका रही है और ऐसा करते हुए इस महान नजरिए को हकीकत का समर्थन हासिल होता रहा है. अभूतपूर्व कोशिशों के कुछ दशक (जो इसलिए हिंसक थे कि इस दौरान बेरहमी से इसकी घेरेबंदी करके इस पर हमला किया गया जिसकी वजह से यह हार जाने के लिए अभिशप्त था) मजबूत इरादों वाले लोगों को इस बात का कायल नहीं बना सकते कि इस संभावना को हमेशा के लिए दफ्न कर दिया जाना चाहिए. वे हमें इसके लिए मजबूर भी नहीं कर सकते कि हम इसको जमीन पर उतार लाने की जिम्मेदारियों को हमेशा के लिए छोड़ दें.

इसलिए, क्या तब हमें वोट डालना चाहिए? बुनियादी तौर पर राज्य और इसके संगठनों की ओर से आने वाली इस मांग से हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए. अब तक हमें यह मालूम हो जाना चाहिए कि वोट डालने का मतलब और कुछ नहीं बल्कि मौजूदा व्यवस्था के रूढ़िवादी नजरियों में से किसी एक को मजबूत करना है.

अगर हम इसके असली मतलब तक जाएं तो वोट जनता को राजनीति से दूर करने यानी उनको अराजनीतिक बनाने का एक उत्सव है. हमें जरूरी तौर पर शुरुआत यह करनी है कि हम हर जगह पर भविष्य के लिए कम्युनिस्ट नजरिए को फिर से बाकायदा स्थापित करें. इस पर पक्के तौर पर यकीन रखने वाले जुझारू लोगों को जरूरी तौर पर दुनिया भर के लोकप्रिय संदर्भों यानी हालात में, जगह-जगह पर जाकर इसके उसूलों की चर्चा करनी होगी. जैसा कि माओ ने कहा था, हमें जरूरी तौर पर “उलझन और भ्रम के बीच से जो कुछ भी हासिल है, उसे उसकी खासियत के साथ, जनता को समझाना होगा.” और राजनीति को फिर से गढ़ने का मतलब यही तो है.


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मैं खास कर मेलेनकोनिज्म से नाउम्मीद हो चुके लोगों की कड़वाहट को समझता हूं, जो चुनावों के पहले दौर के बाद अपने गुस्से और नाराजगी को जाहिर कर रहे हैं. इसके बावजूद, वे चाहे जो भी करें या कहें, इस चुनाव में कोई खास गैरमामूली बात या धांधली नहीं हुई थी.

हालांकि असल में पार्टियों में दो अंतर्विरोध रहे हैं, जिन्होंने अफसोसनाक रूप से (वास्तव में मौजूद शक्तियों के लिए) केंद्रीय संसदीय धड़े को बिखेर दिया. यह धड़ा परंपरागत वाम और दक्षिण से मिल कर बना था. चालीस बरसों से – बल्कि दो सदियों से – यह धड़ा स्थानीय पूंजीवाद के फलने-फूलने की हिमायत करता आ रहा है. इसके बावजूद तथाकथित वामपंथ के स्थानीय प्रतिनिधि ओलां फिर से खड़े नहीं हुए, और इससे उनकी पार्टी की कमर टूट गई. दूसरी तरफ परंपरागत दक्षिणपंथ है. चुनावों की अपनी बदनसीब प्रक्रिया (प्राइमरी) की बदौलत यह अपने बेहतरीन बूढ़े घोड़े आलें युप्पे को उम्मीदवार नहीं बना पाया, बल्कि इसकी मनहूस चेहरे वाली, मुफस्सिल की एक बुर्जुआ उम्मीदवार के बतौर चुनी गई, जो आधुनिक पूंजीवाद की “सामाजिक” पसंद से कोसों दूर है.

“सामान्य” दूसरा दौर (राउंड) ओलां बनाम युप्पे का रहा होता, या फिर सबसे खराब हालात में भी मुकाबला ले पां बनाम युप्पे का रहा होता, और इन दोनों ही हालात में युप्पे आसानी से जीत जाते. सरकार की दो जर्जर पार्टियों की गैरमौजूदगी में, दो सदियों से हमारे असली मालिक यानी पूंजी के मालिक और उसके प्रबंधकों को थोड़ी परेशानी उठानी पड़ी. किस्मत से (यानी अपनी किस्मत से), अपने हमेशा के राजनीतिक किरदारों के साथ मिलकर, प्रतिक्रियावाद के पुराने दिग्गजों और सामाजिक लोकतंत्र के बचे-खुचे तत्वों (वॉल, ले द्रिएं, सेगोलें रॉयल एंड कंपनी) की मदद से, उन्होंने दम तोड़ रहे लावारिस केंद्रीय संसदीय धड़े की जगह लेने के लिए एक लायक चेहरा जुटा लिया. और वह चेहरा थे: इमानुएल मैक्रों. बहुत उपयोगी तरीके से और भविष्य को देखते हुए बहुत अहम तरीके से उन्होंने अपने मकसद के लिए फ्रांसुआ बेरो को भी इसमें लगा दिया, जो एक पुराने अनुभवी मध्यमार्गी संत हैं और सभी चुनावी जंगों और सबसे मुश्किल जंगों को भी देख चुके हैं. यह सारा कुछ बड़ी ठाठ-बाट के साथ अंजाम दिया गया और इतनी फुर्ती से किया गया कि यह एक रेकॉर्ड ही है. इसके नतीजे में अंतिम कामयाबी की तो खास गारंटी थी.

इन हालात में, जिनको समझाना पूरी तरह से मुमकिन है, वोट ने पहले की तुलना में कहीं अधिक साफ तौर पर इसकी तस्दीक कर दी है कि एक पूंजीवाद परस्त और दक्षिणपंथी नजरिया (जिसमें फासीवादी रूप भी शामिल है) इस मुल्क में चरम बहुमत में है.

बुद्धिजीवियों और नौजवानों का एक हिस्सा इसे देखने से इन्कार कर रहा है या फिर इस पर कड़वाहट भरे तरीके से अफसोस जाहिर कर रहा है. लेकिन यह क्या है? क्या लोकतांत्रिक चुनावों के ये आशिक लोग ये चाहते हैं कि कोई आए और इसे बदल दे कि लोग किसको वोट करें, जैसे कि आप अपनी गंदी कमीज बदलते हैं? जो लोग वोट डालते हैं, उन्हें हर हालत में बहुमत की मर्जी को कबूल करना होता है. सचमुच, नौजवानों और बुद्धिजीवियों के ये दो उक्त समूह दुनिया को अपने हालात और अपने सपनों के पैमाने से ही मापते हैं, और किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते जहां पहुंचना जरूरी है: वह नतीजा यह है कि “लोकतांत्रिक” शब्द से उम्मीद करने लायक कुछ भी नहीं है.

1850 में नेपोलियन तृतीय ने यह देख लिया था कि वोट डालने का आम अधिकार (सार्वभौम मताधिकार) कोई खौफनाक चीज नहीं थी, जैसा कि रूढ़िवादी बुर्जुआ ने इसके बारे में कल्पना की थी, बल्कि यह एक सचमुच का वरदान था जो प्रतिक्रियावादी ताकतों के लिए एक अभूतपूर्व और अनमोल वैधता मुहैया कराता था. यह बात आज भी पूरी दुनिया में हर जगह सही है. नेपोलियन के वारिसों ने यह समझ लिया है कि कमोबेश सामान्य और स्थिर ऐतिहासिक हालात में, आबादी की बहुसंख्या हमेशा बुनियादी तौर पर रूढ़िवादी होती है.

इसलिए आइए, शांत दिमाग से एक नतीजे पर पहुंचने की कोशिश करते हैं. उन्माद में भर कर चुनावी नतीजों का मतलब लगाना और कुछ नहीं बल्कि एक बेकार की हताशा है. आइए, इसकी आदत डाल लें: अगर चार कारकों को ऐतिहासिक रूप से एक साथ नहीं लाया गया तो हमारी मौजूदा गुलामी की हालत पर कभी भी जानलेवा चोट नहीं पहुंचाई जा सकती है. और ये बातें चुनावी रस्मों से उतनी ही दूर हैं, जितनी दूर उनसे कोई चीज हो सकती है.

  1. ऐतिहासिक अस्थिरता की स्थिति, जो रूढ़िवादी जनमत पर हावी होकर उसे काबू में कर लेती है. अफसोस की बात ये है कि यह स्थिति संभावित रूप से ठीक ठीक एक युद्ध भी हो सकती है, जैसा कि 1870 में पेरिस कम्यून, 1917 में रूसी क्रांति या फिर 1937 और 1947 के बीच चीनी क्रांति के समय था.

  2. एक मजबूती से कायम किया गया विचारधारात्मक बंटवारा – विचारधारा के स्तर पर हमें यह बंटवारा करना है कि रास्ता सिर्फ एक नहीं है, बल्कि हमारे सामने दो रास्ते हैं. स्वाभाविक रूप से इसे सबसे पहले बुद्धिजीवियों के बीच अंजाम देना होगा लेकिन अंतिम तौर पर इसे खुद व्यापक जनता में स्थापित करना होगा. हमें राजनीतिक सोच के पूरे मुकाम को इस तरह खड़ा करने की जरूरत है कि हर चीज पूंजीवाद और कम्युनिज्म के बीच दुश्मनी भरे विरोध के इर्द-गिर्द स्थापित हो. इसमें इस विरोध के दूसरे आयामों की मदद भी ली जा सकती है. सरसरी तौर पर अपने पाठकों को मैं इस दूसरे रास्ते यानी कम्युनिज्म के उसूलों की याद दिलाना चाहता हूं: उत्पादन के साधनों, कर्ज और लेन-देन और निजी संपत्ति के खिलाफ प्रबंधन के सामूहिक स्वरूपों की स्थापना, श्रम को एक ही साथ अनेक रूपों में जाहिर होने को मुमकिन बनाना जिसे खास तौर से शारीरिक और बौद्धिक श्रम के रूपों के बीच फर्क ने अभी कुचल रखा है, हमेशा अंतरराष्ट्रीयतावाद पर अमल करना, और लोकप्रिय शासन के स्वरूपों पर काम करना, जो अलग-थलग राज्यों की किसी भी व्यवस्था के खात्मे के लिए काम करें.

  3. एक लोकप्रिय उभार – हमेशा की तरह यह पक्के तौर पर आबादी के एक छोटे से हिस्से का उभार होगा, लेकिन जो कम से कम राजसत्ता को स्थगित कर देगा. ऐसा एक उभार ऊपर दिए गए पहले बिंदु से जुड़ा हुआ है.

  4. एक मजबूत संगठन जो पहले तीनों बिंदुओं के बीच एक सक्रिय तालमेल को पेश करे, अपने दुश्मनों के बिखराव की दिशा में काम करे, जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी दूसरे बिंदु यानी कम्युनिस्ट रास्ते के ऊपर दिए गए उसूलों को अमल में लाने के लिए काम करे.

इन चार बिंदुओं में से दो – पहले और तीसरे – एक खास हालात के बनने पर निर्भर हैं. लेकिन दूसरे बिंदु पर तो हम अभी से ही सक्रिय रूप से काम शुरू कर सकते हैं. और यही सबसे नाजुक पहल है. हम खास कर दूसरे बिंदु की रोशनी में बुद्धिजीवियों और सर्वहारा के तीनों रूपों की साझी बैठकों और कार्रवाइयों का समर्थन करते हुए चौथे बिंदु पर भी काम कर सकते हैं. बुद्धिजीवियों और सर्वहारा के जिन तीन रूपों के बीच काम किया जाना जरूरी है, वो हैं: सक्रिय मजदूर और निचले दर्जे के सरकारी कर्मचारी; पिछले तीन दशकों में उद्योगों की अंधाधुंध कमी का सबसे बुरा असर झेल रहे और नैतिक रूप से टूट चुके मजदूर परिवार; और अफ्रीका, मध्य-पूर्वी और एशियाई मूल के घुमंतू सर्वहारा.

चुनावी नतीजों के बारे में जज्बाती होते हुए अवसाद में डूब जाना या शोर मचाना न सिर्फ बेकार है बल्कि नुकसानदेह भी है. यह एक दुश्मन इलाके में जाकर मोर्चा लेने जैसी बात है, जिसका कोई फायदा नहीं है और न ही जिससे कोई हल निकलने वाला है. हमें जरूरी तौर पर चुनावों से बेपरवाह होना होगा, जो अधिक से अधिक, शुद्ध रूप से एक रणनीतिक चुनाव होते हैं कि इस “लोकतांत्रिक” किस्से में हिस्सा लेने से बचा जाए, या फिर अपने माफिक एक खास हालात पैदा करने के नजरिए से इस या उस उम्मीदवाद का समर्थन किया जाए. ये खास हालात भी हम कम्युनिस्ट राजनीति के ढांचे के भीतर सटीक रूप से परिभाषित करते हैं, जिसका इस राजसत्ता की रस्मों से कोई रिश्ता नहीं होता. हमें अपना कीमती समय अपनी सच्ची राजनीतिक मेहनत में लगाना चाहिए. और यह काम ऊपर दिए गए चार बिंदुओं के दायरे में ही होना चाहिए.


समयांतर, जून 2017 में प्रकाशित

निर्भया फैसला: इंसाफ या प्रतिशोध

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/06/2017 12:08:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े का नियमित स्तंभ इस बार निर्भया बलात्कार मामले में आए अंतिम फैसले के बारे में है, जिसके तहत कसूरवार ठहराए गए युवकों को फांसी की सजा की पुष्टि की गई है. अनुवाद: रेयाज उल हक

पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय ने निर्भया मामले के नाम से जाने जाने वाले, 16 दिसंबर 2012 के सामूहिक बलात्कार मामले में चार कसूरवारों की फांसी की सजा की पुष्टि की तो अदालत में मौजूद लोग खुशी से झूम उठे. यह खुशी उस अभूतपूर्व गुस्से और आक्रोश के माफिक ही है, जो 23 साल की फिजियोथेरेपी इंटर्न ज्योति सिंह के बलात्कार और उस पर हुए क्रूर हमले से देश भर में पैदा हुआ था. सुप्रीम कोर्ट के लिए यह एक गैरमामूली मौका रहा होगा जब उसके किसी फैसले को लोगों का इतना व्यापक समर्थन हासिल हुआ, जिसकी गूंज देश के कोने-कोने में सुनने को मिली. लोगों की राय सुनकर ऐसा जाहिर होता है कि उन्हें इस बात की तसल्ली मिली है कि आखिरकार इस मामले में इंसाफ हो गया. लेकिन सवाल है कि क्या वाकई ऐसा हुआ है? बलात्कार और हत्या के अपराध के लिए मध्यकालीन और बर्बर मौत की सजा दिया जाना इंसाफ नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी चीज है, जिसकी जड़ें मध्यकालीन संस्कृति में ही हैं और जिसे प्रतिशोध या बदला कहा जाएगा. अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए ऐसा नहीं किया कि वो इसको पूरी गंभीरता में देखे और अपराधियों की सजा में कमी लाने वाले कारकों पर सावधानी से गौर करते हुए इसे एक दुर्लभतम (दुर्लभ में भी दुर्लभ) मामले के रूप में स्थापित करे, बल्कि उसने “सामूहिक विवेक” की बात का हवाला दिया है, जिसका सीधा सीधा मतलब यह है कि फैसले को सही ठहराने के लिए भीड़ की मानसिकता का उपयोग किया गया. इस फैसले में उम्र, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, सुधार की संभावना या किसी भी ऐसी बात पर गौर नहीं किया गया है, जो कसूरवारों से जुड़ी है और उनकी सजा में कमी करने की वजह बनती. न ही उसने पुलिस की नाकामी की तरफ रत्ती भर भी इशारा किया, जो ऐसे अपराधों में काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं. न ही अदालत ने भविष्य में ऐसे अपराधों को होने से रोकने के बारे में उठाए जाने वाले कदमों के बारे में कोई सवाल किया. जबकि ये सारे मुद्दे इंसाफ के सरोकार के दायरे में आते हैं.

दुर्लभ में भी दुर्लभ मामला

इसमें कोई शक नहीं है कि यह उस लड़की के खिलाफ एक घिनौना अपराध था. छहों अपराधियों ने न सिर्फ उसका यौन शोषण किया, बल्कि जैसा कि मीडिया में बताया गया था, उसके यौनांगों में धातु का सरिया डाल कर उसकी आंतें तक खींच ली थीं. कोई भी सभ्य समाज ऐसी घटना पर उसी तरह की प्रतिक्रिया देगा, जैसी प्रतिक्रिया भारत में हुई. लेकिन अगर इस समाज ने इससे पहले बलात्कार और हत्याओं के लाखों मामलों में से कुछ पर भी ऐसी ही संवेदना दिखाई होती, तो यह एक पूरी तरह से सराहनीय बात होती. क्योंकि आखिरकार ऐसा अपराध पहली बार नहीं हुआ था. लेकिन अपनी टीआरपी के उन्माद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे अपने पर्दे पर एक ऐसी क्रूरता का मामला बना दिया जो पहले कभी देखी-सुनी नहीं गई. निर्भया नाम भी मीडिया का ही दिया हुआ है और इसी तरह धातु के सरिए वाली बात भी इसकी अपनी खोज थी, जिसे निचली से लेकर सर्वोच्च अदालत तक ने बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया और इसे दुर्लभतम मामला बना दिया. 400 पन्नों के फैसले में ‘लोहे का सरिया (आयरन रॉड)’ शब्द 104 बार आया है, जो दिखाता है कि किस तरह इस बात ने अदालत द्वारा अपराधियों को मौत की सजा को कायम रखने में निर्णायक भूमिका निभाई है. सच्चाई यह है कि सिंगापुर के हॉस्पीटल द्वारा (जहां पीड़िता का इलाज किया गया था) तैयार पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट ने इसकी पुष्टि की थी कि उसका गर्भाशय और अंडाशय सही-सलामत थे. यह सीधे-सीधे सरिए वाले सिद्धांत को गलत साबित करता है, क्योंकि गर्भाशय को नुकसान पहुंचाए बिना सरिया आंतों तक नहीं पहुंच सकता. तब, मीडिया इस घटना पर सामूहिक उन्माद खड़ा करने में कैसे कामयाब रहा था? इसका जबाव शायद मीडिया द्वारा फैलाई गई इस खबर में है कि इस मध्यवर्गीय लड़की का कम से कम एक बलात्कारी दलित समुदाय से आता है. हालांकि यह बात चुपके-चुपके ही फैलाई गई, लेकिन इसने मध्यवर्ग के गुस्से को भड़काने में अहम भूमिका अदा की, जो देश भर में व्यापक रैलियों और कैंडल मार्च की शक्ल में सामने आई. दूसरे वर्ग इसमें जुड़ते गए और इसने विरोध आंदोलनों की एक सुनामी की शक्ल ले ली.

निर्भया के पहले और बाद में भी ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं, जिनकी तुलना इस मामले से की जा सकती है, लेकिन उन पर ऐसी किसी प्रतिक्रिया की बात तो छोड़ दी दीजिए, उस वर्ग के कानों पर जूं तक न रेंगी, जो निर्भया के लिए सड़कों पर उतरा था. 2006 में खैरलांजी में दिल को दहला देने वाली एक घटना में एक दलित मां और उसकी 19 साल की बेटी का गांव की एक भीड़ द्वारा क्रूर बलात्कार किया गया था और यातना दे-दे कर उन्हें मार दिया गया था. इसके बाद उसके दो बेटों को भी पीट-पीट कर मार डाला गया. बाद में उनकी निर्वस्त्र लाशें बरामद की गईं, जिनके यौनांगों में छड़ियां पाई गईं. लेकिन गैरदलितों में इस पर कोई सुगबुगाहट नहीं हुई. जब दलितों ने स्वत:स्फूर्त तरीके से इस मामले पर अपने गुस्से को जाहिर किया, तो पुलिस ने बहुत बुरी तरह उनकी पिटाई की और उन्हें नक्सली कहा, जिसकी शुरुआत महाराष्ट्र के तत्कालीन गृह मंत्री ने की थी. लेकिन यह भी इस वर्ग की संवेदना को जगा पाने में नाकाम रहा. इसके उलट इस वर्ग ने इस पूरे मामले की गंभीरता को कम करते हुए इसे एक ऐसी दुर्भाग्यशाली घटना का रंग दिया, जिसकी वजह एक औरत की गुस्ताखी थी, जिसने मासूम गांववालों के नैतिक गुस्से को भड़का दिया था. ऐसा नहीं है कि खैरलांजी दलित महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों की पहली और आखिरी घटना थी. दलित उत्पीड़न के ऐसे हजारों मामले खैरलांजी से पहले हो चुके हैं और उसके बाद उनमें तेजी ही आई है.  आज, हर रोज छह दलित औरतों का बलात्कार होता है, जिनमें से ज्यादातर में अमानवीय निर्ममता से हमला किया जाता है. लेकिन न तो उन घटनाओं पर व्यापक समाज में ही कोई प्रतिक्रिया हुई और न ही उन्होंने जजों की चेतना को झकझोरा कि वे उन बलात्कारों को दुर्लभतम मानें. शायद उनके लिए दलितों के साथ होने वाले बलात्कार एक मामूली बात, यानी सामान्यता है!

एक असामान्य सामान्यता

असल में भारतीय समाज में बलात्कार खुद एक असामान्य सामान्यता है. भारत में औरत की देह को सांस्कृतिक रूप से सामाजिक-राजनीतिक हिसाब बराबर करने की एक निशानी के रूप में लिया जाता है. समाज का टुकड़ों-टुकड़ों में अपार बिखराव और ऊंच-नीच की व्यवस्था इस स्थिति को संभावित रूप से व्यापक बना देती है और इसलिए यह औरतों की देह पर हमलों की संभावनाओं को भी बढ़ा देती है. किसी भी सांप्रदायिक या राष्ट्रीय संघर्ष में औरत की देह मुख्य निशाना बनती है. भारत के बंटवारे के दौरान सरहद के दोनों तरफ 100,000 से ज्यादा औरतों का अपहरण और बलात्कार किया गया था. उन पर सिर्फ यौन हमले ही नहीं हुए बल्कि हमलावरों की जीत की निशानी के तौर पर उनको निर्मम यातनाएं भी दी गई. अनेक औरतों के स्तन काट दिए गए, दूसरी अनेक औरतों के यौनांगों के साथ दुर्व्यवहार किया गया और यातना दी गई – जिनमें से ज्यादातर मामलों में अंजाम मौत के रूप में सामने आया.  यहां तक कि 1984 के सिख कत्लेआम में भी औरतों का व्यापक अपहरण और बलात्कार किया गया. गुजरात में 2002 में मुसलमान औरतों और बच्चियों के साथ बेरहमी से सरेआम बलात्कार किया गया और उन्हें मार कर उनकी लाशें जला दी गईं. अनेक औरतों ने यौन हिंसा का सबसे वहशी रूप देखा – जिसमें बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, सार्वजनिक बलात्कार, निर्वस्त्र किया जाना, उनकी देह में वस्तुएं घुसाना और छेड़खानी आदि शामिल हैं.  औरतों की देह एक राजनीतिक अखाड़ा बना दी गई है, जो राष्ट्रवाद और ताकत के प्रदर्शन के काम में लाई जाती है. विरोधी द्वारा बलात्कार की गई हरेक औरत जीत की एक वस्तु, एक तमगा, बन जाती है. इसी सोच के मुताबिक तरह राष्ट्र राज्य “भारत माता” बन जाता है, जो एक ऐसी महिला है जिसे बाहरी दुश्मनों से बचाने की जरूरत है.

असल में बलात्कार को रोजमर्रा की मामूली बात बनाने की जड़ें जातीय संस्कृति में धंसी हुई हैं, जिनमें एक प्रभुत्वशाली जाति के पास निचली जातियों की औरतों की देहों पर नियंत्रण हासिल होता है. ऐसे रिवाज थे कि निचली जातियों की नई दुल्हनों को अपनी शादी को मुकम्मल बनाने के लिए अपनी पहली रात में उन्हें ब्राह्मणों के पास भेजा जाता था. केरल में पिछली सदी की शुरुआत तक तो यह चलन में था ही, सामंती भारत के दूसरे हिस्सों में भी यह अलग-अलग रूपों में मौजूद था. संयोग से, संघ परिवार के विचारक इस रिवाज को गर्व से सही ठहराते हुए इसे गैर ब्राह्मणों की नस्लों को सुधारने का एक वैज्ञानिक तरीका बताते हैं.  इस रिवाज को पूंजीवादी आधुनिकता ने पीछे धकेल दिया है, लेकिन दलितों और आदिवासियों का बलात्कार कम नहीं हुआ है. वो लाखों की संख्या में अब भी होते हैं और इस तरह वे भारतीयों के रोजमर्रा के अनुभव और उनके आसपास की दुनिया को रचते हैं.

भारतीयों की सांस्कृतिक मानसिकता औरतों को मर्दों की जायदाद के रूप में देखती है, जिनको दूसरों से बचाना जरूरी होता है, जाहिर सी बात है कि बलात्कार ऐसा यौन प्रसंग बन जाता है जो इस पूरे नजरिए के साथ अटूट रूप से जुड़ा हुआ है. औरतों के शुद्ध, पवित्र और विनम्र होने का विचार बलात्कार संस्कृति की गंभीरता को हल्के-फुल्के तरीके से पेश करने और उसे आम बनाने का लक्षण है. यह प्रभुत्वशाली विचार कि औरतों की भूमिका मर्दों की सेवा करने की होती है, यौन इच्छाएं मर्दों का विशेषाधिकार हैं, बलात्कार जायदाद पर एक हमला है, लेकिन मर्दों को उकसाने का दोष औरतों पर आता है, बलात्कार की पीड़िता और उसके परिवार को सामाजिक रूप से अपमानित और अलग-थलग कर देना, इन सबने बलात्कार के प्रति संस्थागत (यानी पुलिस और न्यायपालिका के) रवैयों को भी अपने मुताबिक ढाल दिया है. बदकिस्मती से, औरतों ने भी इन्हें अपने भीतर उतार लिया है. वे सामाजिक दायरों में अपनी अलग जगहों (मसलन आरक्षित डिब्बे, सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में सीटें आदि) की जो मांगें खुशी खुशी करती हैं, वो इस संस्कृति के आपराधिक चरित्र को हल्का करने और बलात्कार संस्कृति को सामान्य बनाने में योगदान देती है.

क्या मौत इसका इलाज है?

मौत की सजा को लेकर लोगों में पाई जाने वाली सनक भी दुश्मन से बदला लेने की भारतीय संस्कृति में रची-बसी है, क्योंकि यहां इंसाफ का विचार जाति-सापेक्ष होता है. आंकड़े दिखाते हैं कि मौत की सजा के पीड़ितों/कसूरवारों की एक व्यापक बहुसंख्या दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय से आती है. मौत की सजा का रिश्ता, उस विषय की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से होता है.  1992 में निचली जातियों द्वारा ऊंची जाति के भूमिहारों के जनसंहार, बारा जनसंहार, के जवाब में भूमिहार जमींदारों की निजी सेना सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने 23 दिसंबर 1991 को पड़ोस के माने और बरसिम्हा गांवों के 10 दलितों की हत्या की. इस मामले में बड़ी तेजी से चार लोगों को मौत की सजा सुनाई गई, जिनमें से तीन दलित हैं (राष्ट्रपति ने हाल ही में इन सजाओं को आजीवन कारावास में बदल दिया है), लेकिन बिहार में कई दर्जन जनसंहार करने वाले ऊंची जातियों के हत्यारों को पटना उच्च न्यायालय एक जैसे मिलते जुलते फैसलों के जरिए जल्दी-जल्दी बरी कर रहा है.  नागरिक अधिकार संगठनों में काम करने वाले हम लोग मौत की सजा के खात्मे की मांग करते रहे हैं, क्योंकि यह सजा देने के किसी मकसद को पूरा नहीं करती, और यह किसी अपराधी को अपराध करने से तो और भी कम रोकती है. बल्कि अंतरराष्ट्रीय आंकड़े इसकी ओर इशारा करते हैं कि मौत की सजा को खत्म कर चुके देशों में, मौत की सजा को कायम रखने वाले देशों के मुकाबले अपराध की दरें कहीं कम हैं.

इस पर गौर करना आंखें खोल देने वाला होगा कि निर्भया के बाद के चार बरसों में खुद दिल्ली में ही बलात्कार के मामले तीन गुना बढ़ गए हैं.  एनसीआरबी आंकड़े बलात्कार के मामलों में अबाध इजाफे के रुझान को भी उजागर करते हैं. 2011 में कुल बलात्कारों की संख्या 24,206 से 2.97 फीसदी बढ़ कर 2012 में 24,923 हुई थी. लेकिन इसके बाद के साल में 35.24 फीसदी की भारी वृद्धि देखने को मिली जब यह 2013 में 33,707 हो गया और 2014 में यह 8.98 फीसदी के इजाफे के साथ 36,735 हो गया. सर्वोच्च अदालत द्वारा फांसी की सजा की तस्दीक करने के बाद चार दिनों के भीतर मीडिया में बलात्कार की तीन घटनाओं की खबरें आईं, जिनमें से एक रोहतक की घटना थी, जिसे निर्भया से भी कहीं अधिक क्रूर तरीके से अंजाम दिया गया था. मुक्त बाजार के कायदों ने जिस तरह के बहुआयामी संकट को जन्म दिया है, जिसके तहत युवाओं में जिंदगी को लेकर एक अनिश्चितता जुड़ी हुई है, यह उनके बीच अलगाव और हताशा को जन्म देती है जो बलात्कारों के रूप में सामने आता हुआ दिखाई देता है.

इसका इलाज कानून के शासन को समान रूप से लागू करने में है. निर्भया का मामला इस बात की बेहतरीन मिसाल है कि मीडिया अपने कारोबारी हितों की भरपाई के लिए कैसे लोगों के बीच की घटिया प्रवृत्तियों को हवा देता है और उसके पीछे-पीछे सरकार (और न्यायपालिका) आखिरकार देश को मध्ययुगीन अंधेरी खाई में खींच कर ले जा रहे हैं.

समयांतर जून 2017 में प्रकाशित

भीम आर्मी को भाजपा ने नहीं, बसपा की करतूतों ने जन्म दिया है

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/31/2017 05:10:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में भीम आर्मी के उभार के बारे में बता रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक

मायावती ने सहारनपुर का दौरा करते हुए भीम आर्मी का नाम नहीं लिया, लेकिन 25 मई को उन्होंने लखनऊ में इसका जिक्र किया. उन्होंने अपने भाई आनंद कुमार का रिश्ता भीम आर्मी से जोड़ने वाली खुफिया रिपोर्ट को खारिज करते हुए इसे भाजपा द्वारा पैदा किया गया एक संगठन कहा, जिसका मकसद मायावती के असर को नाकाम करना है. उनकी दलील यह थी कि भीम आर्मी के नेता हिंसा में शामिल हैं, फिर भी उन्हें पुलिस गिरफ्तार नहीं कर रही है, जो भाजपा के साथ इस समूह के भीतरी समर्थन की ओर इशारा करता है.

यह बदकिस्मती ही है कि बेहद संभावनाओं वाले इस संगठन को समर्थन देने के बजाए वे इसे दुश्मन के हाथ का एक औजार बता कर इसकी आलोचना कर रही हैं. इस संगठन के नौजवान उन जातिवादी गुंडों से सीधी टक्कर ले रहे हैं, जिनका मनोबल अपने सरपरस्त के राज्य का मुख्यमंत्री बन जाने से बढ़ा हुआ है. मायावती के पास अपने जन्म के उत्सवों के लिए दलितों की भारी गोलबंदी रहती रही है और वे आसानी से सहारनपुर में हुए अत्याचारों के खिलाफ लखनऊ में एक बड़ा प्रदर्शन आयोजित कर सकती थीं. लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगी. चुनावों में शर्मनाक हार के बावजूद उन्हें यह बात समझ में नहीं आई है कि दलितों की जमीनी समस्याओं से उनका कभी भी कोई रिश्ता नहीं रहा है और उल्टे उन्होंने खोखले भावनात्मक मुद्दों के साथ दलितों को बेवकूफ ही बनाया है. ‘दलित की बेटी’ जैसी लफ्फाजियों से भ्रमित दलित यह कल्पना करने लगे थे कि बसपा की ताकत दलितों की ताकत है और खुशफहमी का यह जुनून दो दशकों तक जारी रहा. अब मुखर ब्राह्मणवादी ताकतों के उभार के साथ उनका सामना कठोर हकीकत से हुआ है और उनकी आंखें खुली हैं और उन्होंने अपनी सियासत को नए तरह से एक नई शक्ल देने की शुरुआत की है. भीम आर्मी इसी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति है, यह सीधे-सीधे बसपा की अपनी करतूतों के नतीजे में पैदा हुई है.

इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि बसपा ने जिस तरह मुख्यधारा की पार्टियों को उनके अपने ही खेल में मात दी वह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी और यह कांशीराम की रणनीतिक महारत से ऐसा कर पाई. हालांकि एक बार सत्ता में पहुंच कर यह सियासत के एक दूसरे रास्ते पर चलने की कोशिश कर सकती थी, जिससे इसकी पहचान गरीब और सताई हुई जनता के लिए काम करने वाली, उन्हीं की एक पार्टी के रूप में बनती. राजनीतिक सत्ता पाने के लिए जातीय गुना-भाग का खेल खेलना एक बात थी, और सत्ता से चिपके रहना एक बिल्कुल ही दूसरी बात. जैसा कि कांशीराम ने दावा किया था, राजनीतिक सत्ता हर समस्या का हल थी और मायावती को उसका इस्तेमाल कम से कम दलितों के सामने खड़ी सबसे बड़ी समस्याओं से निबटने में करना चाहिए था. हालांकि मायावती ने जान-बूझ कर इस मौके को गंवाया और इसके बजाए उन्होंने हर वह काम करने के लिए इसका इस्तेमाल किया, जो शासक पार्टियां कहीं अधिक धड़ल्ले से करती रही हैं. मिसाल के लिए वो बेजमीन परिवारों के लिए जमीन का वितरण करने का रेडिकल कदम उठा सकती थीं (उस दिखावटी कार्रवाई से आगे जाकर, जैसा करने का उन्होंने दावा किया था), दलितों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में बुनियादी बेहतरी ला सकती थीं (जिसको भीम सेना ने अपने मुख्य अभियान के रूप में उठाया है), और बेशक दलितों पर की जा रही जातीय अत्याचारों पर लगाम लगा सकती थीं. अगर उन्होंने इतना भी किया होता, तो लोगों के दिमाग में उनकी और बसपा की एक खास छवि बन गई होती कि यह गरीब-सताए गए लोगों की और उन्हीं लोगों के लिए काम करने वाली पार्टी है. यह कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीतिक ऐसी नीतियों का आदी नहीं है. सिर्फ लोगों का भला करना इसकी गारंटी नहीं है कि वे आपको वोट भी करेंगे. अगर यह सही है, तब बसपा अपने जनाधार के बीच इस राजनीतिक व्यवस्था की नुकसानदेह संरचना को उजागर कर सकती थी और अपने समर्थकों को इसके खिलाफ गोलबंद कर सकती थी. लेकिन बसपा इनमें से किसी भी रास्ते पर नहीं चली और न आगे चलने वाली है. यह इतनी सारी पार्टियों में एक और पार्टी है, जो उसी व्यवस्था को वैधता दिलाती है, जो दलितों के उत्पीड़न का साकार रूप है.

मायावती ने जाटव-चमारों के अपने मुख्य जनाधार पर भी गौर नहीं किया और उन्हें महज अपने बंधुआ के रूप में लेती रहीं. दलितों पर अत्याचारों के मामले में उत्तर प्रदेश की अपनी खास जगह बनी हुई है. इस पर चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री के रूप में उनके पहले दोनों कार्यकालों को हम छोड़ सकते हैं, क्योंकि वे जून 1995 से अक्तूबर 1995 और मार्च 1997 से सितंबर 1997 तक बहुत थोड़े समय के लिए सत्ता में रही थीं. लेकिन मई 2002 से अगस्त 2003 तक और मई 2007 से मार्च 2012 तक के उनके बाद के दोनों कार्यकालों ने उन्हें एक दलित पार्टी के रूप में खुद को पेश करने का भरपूर मौका मुहैया कराया था, खास कर अपने अंतिम कार्यकाल में जब उनके पास विधानसभा में पूरा बहुमत था. एनसीआरबी के आंकड़ों को देखें तो राज्य में 2002 और 2003 में कुल अत्याचारों की संख्या क्रमश: 7927 और 2821 थी, जो बढ़ कर 2004 में 3785, 2005 में 4397 और 2006 में 4960 हो गई. यह वो वक्त था जब वे सत्ता से बाहर थीं और यह बसपा की राजनीति की वजह से दलितों पर होने वाली बदले की कार्रवाइयों और उनकी राजनीतिक असुरक्षा को दिखाता है. उनके आखिरी कार्यकाल के दौरान छह वर्षों (2007 से 2012 तक) के अत्याचारों के आंकड़े क्रमश: ये हैं: 6144, 8009, 7522, 6222, 7702 और 6202. इनमें हमें इनके पहले के तीन सालों के मुकाबले न सिर्फ अहम इजाफा देखने को मिलता है (औसतन 4381 से 6967), बल्कि हम यह भी देखते हैं कि अत्याचार एक ऊंची दर पर आ गए और उनकी दर ऊंची ही बनी रही. बेशक, जब सत्ता मायावती के हाथ से चली गई तो ये आंकड़े और भी बढ़ कर 2013, 2014 और 2015 में क्रमश: 7078, 8075 और 8358 हो गए. यह उनके मुख्य जनाधार दलितों की बदतर होती हालत की निशानी है. अत्याचारों के आंकड़ों में इजाफा सीधे सीधे उनकी ‘सर्वजन’ रणनीति से निकली राजनीतिक करतब का नतीजा है. आखिरकार 2007 में उनकी शानदार कामयाबी की वजह यही थी, जिसका प्रतिनिधित्व उनके इस भड़कीले नारे में दिखता है: ‘हाथी नहीं, गणेश हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश हैं’.

बसपा की ब्राह्मणवाद-विरोधी लफ्फाजियों पर चलने वाले दलित इस कलाबाजी से बेचैन तो हुए लेकिन वे जिस सत्ता को हासिल करने के लिए बेकरार थे, उसे मिलने की संभावना में उन्होंने बसपा को वोट दिया. लेकिन जब बसपा ने संतुलन साधने के लिए दलितों की अनदेखी करनी शुरू की, तब वे इसकी कठोर हकीकत से रू ब रू हुए. अब 2012 से, जब बसपा ने अपनी सत्ता गंवाई, ऊंची जातियों के पलटवार के साथ, और खास कर मार्च 2017 से, जब एक युद्धोन्मादी हिंदुत्व कट्टरपंथी राज्य का मुख्यमंत्री बना, दलितों की प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी. भीम आर्मी बस इसी की अभिव्यक्ति है और इसे बसपा की राजनीति का एक स्वाभाविक सह-उत्पाद माना जाना चाहिए.

भीम आर्मी के उभार की तुलना 1972 में महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स से की जा सकती है, जो तब की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) की दिवालिया राजनीति के नतीजे में पैदा हुई थी. हालांकि दोनों के बीच में कुछ फर्क है. दलित पैंथर्स के उलट, भीम आर्मी महज जुझारू और आक्रामक शोरशराबे और नारेबाजी तक सीमित नहीं है. बल्कि खबरों के मुताबिक इसके नेताओं चंद्रशेखर आजाद और विनय रत्न सिंह ने 2015 में भीम आर्मी एकता मिशन की स्थापना की थी, जिसका रचनात्मक मकसद दलित बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराना है. भीम आर्मी सहारनपुर और इसके आसपास 300 से ज्यादा स्कूल चला रहा है. निश्चित रूप से भीम आर्मी के नेताओं ने मायावती की शैली की राजनीति के साथ अपने मोहभंग की बात की है, लेकिन साथ ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से कांशीराम के नाम से शपथ भी ली है. चंद्रशेखर आजाद ने अपने लिए रावण की उपाधि रखी है, जिसमें भाजपा के राम के सांस्कृतिक जवाब की झलक मिलती है.

मौजूदा तौर पर जो दिखाई दे रहा है उसके मुताबिक भीम आर्मी की जड़ें असल में बसपा के अंदाज वाली पहचान की राजनीति की रूढ़ छवियों में ही धंसी नजर आती हैं. लेकिन जिस तरह सहारनपुर में उन्होंने जातिवादी गुंडों के साथ टक्कर ली है, अपने आप में यही तथ्य इस बात की पूरी संभावना को जाहिर कर देता है कि वे इससे आगे जाएंगे और दलितों की मुक्ति की एक नई राजनीति पेश करेंगे. रावण और उनके साथियों को इस चुनौती के लिए तैयार रहना होगा.

सीमाहीन अन्याय: असीमानंद और साईबाबा पर अदालती फैसले

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/01/2017 03:39:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े का नियमित स्तंभ.

महज 24 घंटे से भी कम के भीतर ऐसे दो फैसले आए, जिनकी वजह से देश भर में सिहरन की एक लहर दौड़ गई. पहला फैसला 7 मार्च को महाराष्ट्र की गढ़चिरोली सत्र अदालत से आया, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा और चार दूसरे लोगों को नक्सली गतिविधियों में मदद करने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए गैर कानूनी गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आजीवन कैद की सजा सुनाई गई. छठे आरोपित को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई.

दूसरा फैसला अगले दिन नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) की जयपुर विशेष अदालत का था, जिसमें स्वघोषित साधु और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व कार्यकर्ता स्वामी असीमानंद और दूसरे छह लोगों को बरी कर दिया गया. ये लोग 2007 के समझौता एक्सप्रेस विस्फोट (जिसमें अड़सठ लोग मारे गए थे और दर्जनों घायल हुए थे), हैदराबाद मक्का मस्जिद विस्फोट (सोलह मौतें, सौ जख्मी) और अजमेर दरगाह विस्फोट (तीन मौतें, 17 जख्मी) मामलों में अभियुक्त थे. फैसले ने सनसनीखेज अजमेर दरगाह धमाके के मामले में तीन दूसरे लोगों को कसूरवार ठहराया. जाहिर तौर पर, अगर कठोर यूएपीए द्वारा तैयार की गई अपराध की धारणा को छोड़ दें तो साईबाबा के मामले में अदालत द्वारा किसी अपराध का जरा भर भी हवाला नहीं दिया गया है. वहीं दूसरा फैसला जिस मामले के बारे में है, उनमें लोग सचमुच में मारे गए थे, जब अपराधियों ने 13वीं सदी की इस पवित्र दरगाह पर पांच हजार श्रद्धालुओं के एक मजमे के बीच बम धमाके किए. लेकिन इस मामले में मुख्य अभियुक्त को ही छोड़ दिया गया. अगर कोई और वक्त होता तब भी इन फैसलों को दुर्भाग्यपूर्ण संयोग मानते हुए उन पर अफसोस जाहिर किया जाता. लेकिन भाजपा के सत्ता में होने से ये सिर्फ एक मनहूस चलन को ही मजबूती देते हैं कि न्यायपालिका की संस्थागत साख की कीमत पर हिंदुत्व के अपराधियों का बचाव किया जा रहा है और इसके विरोधियों को कुचला जा रहा है और इसमें यह संस्था इसकी फरमाबरदार की भूमिका निभा रही है.

असीमानंद की मासूमियत

11 सितंबर के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका जब पूरी दुनिया में मुसलमानों को आतंकवादियों के रूप में बदनाम कर रहा था, तो जायनिस्टों के बाद इसका सबसे बड़ा फायदा भारत में हिंदुत्ववादी ताकतों ने उठाया. संयुक्त राज्य के ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ ने मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्ववादी ताकतों की ऐतिहासिक रंजिश की पुष्टि करते हुए बढ़ावा दिया. हालांकि आजादी के बाद पहली आतंकी कार्रवाई खुद इन्हीं हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा की गई थी, जब उन्होंने मुसलमानों के प्रति नरमी दिखाने के लिए मो.क. गांधी की हत्या कर दी थी. लेकिन अजीब विरोधाभासी तरीके से आतंकवादी होने की छवि मुसलमानों के साथ जोड़ दी गई है. पहली बार, असीमानंद के कबूलनामों ने हिंदुत्ववादियों को आतंकवादी समूह के रूप में उजागर किया. हालांकि उसका यह कहना था कि उनका आतंक मुसलिम आतंक के जवाब में था, लेकिन जिन ज्यादातर हमलों को मुसलिम हमलों के रूप में देखा जाता है, मुमकिन है कि वे भी इन्हीं लोगों की करतूतें हों.

तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने अगस्त 2010 में पहली बार राज्य पुलिस प्रमुखों को ‘भगवा आतंकवाद’ के खतरों से आगाह कराया था. तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राज्य में भगवा गौरव आंदोलन चला कर इसका जवाब दिया. यह सब असीमानंद के कबूलनामे की वजह से ही हुआ था, जो पुलिस द्वारा हिरासत में यातना देकर हासिल नहीं किया गया था. यह बॉटनी में पोस्ट ग्रेजुएट और मंजे हुए आरएसएस कर्मी असीमानंद उर्फ जतिन चटर्जी का एक बयान था, जो अनेक आतंकी साजिशों का मास्टरमाइंड था. यह क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 164 के तहत 18 दिसंबर 2010 को तीस हजारी अदालत में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट दीपक दबास के सामने दिया गया एक बयान है, जो इंडियन एविडेंस एक्ट 1872 के तहत एक सबूत के दायरे में आता है. उसने यह कबूल किया कि वह और दूसरे हिंदू कार्यकर्ता मुसलिम धार्मिक स्थलों पर बम धमाकों में शामिल थे, क्योंकि वे हरेक इसलामी आतंक का जवाब ‘बम के बदले बम’ की नीति से देना चाहते थे. इसके अलावा, कारवां  पत्रिका के साथ एक टेप किए इंटरव्यू में स्वामी ने यह उजागर किया था कि 2006 से 2008 के बीच के भयानक धमाकों की जिम्मेदारी मोहन भागवत द्वारा सौंपी गई थी, जो तब आरएसएस के महासचिव थे, लेकिन उन्होंने सावधान किया था कि “...तुम इसको संघ से नहीं जोड़ना.” बाद में असीमानंद इन दोनों ही साफ साफ और नहीं पलटे जा सकने वाले बयानों से मुकर गया.

असीमानंद का कबूलनामा, अनेक मामलों की तफ्तीश में हासिल होने वाले तथ्यों से मेल भी खाता था. समझौता एक्सप्रेस धमाके (2007) में अभियुक्त दयानंद पाण्डेय के लैपटॉप से जब्त ऑडियो टेपों ने यह पुष्टि की कि हिंदुत्व गिरोह देश भर में बम धमाकों की साजिश रच कर उन्हें अंजाम दे रहे थे, जिसमें मालेगांव (2006 और 2008), अजमेर शरीफ (2007) और मक्का मस्जिद (2007) धमाके शामिल हैं. पुलिस ने इनमें से हरेक मामले में दर्जनों मुसलमान युवकों को पकड़ा, हिरासत में रखा और यातनाएं दीं तथा हमेशा की तरह इन मामलों में इस्लामी मॉड्यूलों के शामिल होने की कहानी गढ़ी. लेकिन इन मामलों में हिंदुत्व गिरोह के हाथ को उजागर करने का श्रेय महाराष्ट्र एटीएस के तत्कालीन प्रमुख हेमंत करकरे को जाता है, जिनको 26 नवंबर के हमले में मार दिया गया. लेकिन गढ़ी हुई कहानियों का झूठ उजागर किए जाने के बाद भी, मुसलमान नौजवान 10 बरसों तक कैद में रहे और तब जाकर अदालत ने उन्हें बरी किया. इस भंडाफोड़ ने कम से कम दो जिंदगियां लीं: करकरे की मौत जो अभी भी एक रहस्य है और शाहिद आजमी की मौत, जिसको एक देशभक्त गुंडे का गुस्सा कह कर निबटा दिया गया. राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना यह मामला घिसटता रहा और 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से, उनको अपने हाथ में लेने वाली एनआईए ने सभी सरगनाओं को छुड़ाने की साजिश रचनी शुरू कर दी है. मई 2016 में इसने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, शिवनारायण कलसांगरा, श्याम साहू, प्रवीण तक्कलकी, लोकेश शर्मा और धन सिंह तथा पांच दूसरे लोगों पर से 2008 के मालेगांव धमाके के मामले में आरोप वापस ले लिए, जबकि करकरे की तफ्तीश को ‘सवालों के घेरे में’ और ‘संदिग्ध’ बताते हुए बाकी सभी 10 अभियुक्तों पर से कठोर मकोका कानून के तहत आरोपों को हटा लिया गया है, जिसमें ले. कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित शामिल है.

साईबाबा का अपराध

साईबाबा की 90 फीसदी विकलांगता और गिरती हुई सेहत के बावजूद, जिस जोरदार तरीके से राज्य ने उनकी जमानत का विरोध किया और अदालतों ने जिस तरह से उसे स्वीकार किया, उससे यह साफ था कि राज्य माओवादियों के ‘शहरी नेटवर्क’ के लिए इसे एक सबक बनाना चाहता था. इस मामले की डॉ. विनायक सेन के मामले के साथ अनोखी समानता है, जिनकी ऊंची प्रोफेशनल प्रतिष्ठा, सार्वजनिक सेवा के बेदाग रेकॉर्ड और उनके प्रति पूरी प्रगतिशील दुनिया की मुखर हमदर्दी के बावजूद उन्हें रायपुर सत्र अदालत द्वारा आजीवन कैद की सजा सुनाई गई और उन्हें लगातार जमानत देने से मना किया जाता रहा, ताकि यह उन सबके लिए एक मिसाल बन जाए जिनके दिल में माओवादियों को लेकर जरा भी नरमी है. राज्य के इस मंसूबे में विनायक सेन की बेगुनाही ही सबसे बड़ा कसूर बन गई. साईबाबा के मामले में, महाराष्ट्र सरकार ने छत्तीसगढ़ को भी पीछे छोड़ दिया है, जिसने अपने शिकार के रूप में राजधानी के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में काम करने वाले एक 90 फीसदी विकलांग प्रोफेसर को चुना. साईबाबा एक रेडिकल कार्यकर्ता रहे हैं और उन्होंने संघर्षरत जनता के लिए, जिसको सरकार पूरी तरह माओवादी कहती है, अपनी हमदर्दी को कभी छुपाया नहीं. लेकिन व्हीलचेयर पर चलने वाला एक शख्स, जो बिना किसी मदद के चल-फिर भी नहीं सकता, वह सोचने और लिखने से आगे जाकर क्या कुछ कर सकता है? लेकिन राज्य ठीक यही बात दिखाना चाहता है. अगर वह साईबाबा के साथ ऐसा कर सकता है, तो वह किसी के साथ भी ऐसा कर सकता है. इस मामले में उनके सह-आरोपितों हेम मिश्रा, जो जेएनयू के छात्र रहे हैं, और प्रशांत राही को भी, जो एक स्वतंत्र पत्रकार और कार्यकर्ता हैं, आतंकित करने के इस मंसूबे का हिस्सा बनाया गया. बाकी तीन आदिवासियों थे, ताकि इस असंभव गठजोड़ को बना कर पेश किया जा सके.

गढ़चिरोली सत्र अदालत ने उन सभी को यूएपीए की धाराओं 13, 18, 20, 38 और 39 के साथ साथ आईपीसी की धारा 120-बी के तहत कसूरवार ठहराया. उन्हें प्रतिबंधित पार्टी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और इसके “फ्रंट” रेवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट (आरडीएफ) के साथ रिश्ते रखने के लिए सजा दी गई. विनायक सेन के मामले में ही जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने यह साफ-साफ कहा था कि महज एक प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होना किसी को अपराधी नहीं बनाता, जब तक कि उसने हिंसा का सहारा न लिया हो या लोगों को हिंसा के लिए न भड़काया हो. मई 2015 में केरल उच्च न्यायालय ने माओवादी होने के संदेह में 2014 में पकड़े गए श्याम बालाकृष्णन को यह कहते हुए रिहा कर दिया कि “माओवादी होना कोई अपराध नहीं है.” उच्च न्यायालय ने यह गहरी बात कही कि “लोगों के लिए एक उम्मीदें रखना एक बुनियादी मानवाधिकार है” और “कानूनों से भटकाव को वर्दी की ओट में” छुपाने के लिए राज्य की आलोचना की, जहां कानून को “बचाने वाले ही इसका उल्लंघन करने वाले” बन जाते हैं. इसके बावजूद आरोपितों के माओवादी रिश्तों को मुद्दा बनाया गया. यहां 827 पन्नों के फैसले पर बिंदुवार विचार करना मुमकिन नहीं है, लेकिन जैसा कि वकीलों ने इसके बारे में ध्यान दिलाया है, इस फैसले में कानूनों की साफ साफ अनदेखी की गई है और तथ्यों की तरफ से जानबूझ कर आंखें मूंदी गई हैं. साफ जाहिर है कि यह फैसला पुलिस और राजनेताओं के दबावों के रंग में रंगा हुआ है, जैसा कि ज्यादातर निचली अदालतों के मामले में होता है.

राज्य की बदमाशी

ये दोनों मामले राज्य की बदमाशी को उजागर करते हैं. नवउदारवादी दौर में, राज्यों में फासीवादी होने के अंतर्निहित रुझान होते हैं, ताकि वे बाजार की हुकूमत को सुनिश्चित कर सकें. ये रुझान पूरी दुनिया में देखे जा रहे हैं, वहीं भारत में ब्राह्मणवाद की वर्चस्वशाली विचारधारा के साथ इसकी अच्छी ताल-मेल बैठ गई है. चाहे कोई भी दल सत्ता में रहे, भारत में राज्य हमेशा ही वही पूंजीवाद-परस्त, हिंदू-परस्त, ऊंची जातियों का हिमायती और मुट्ठी भर लोगों की हुकूमत बना रहता है. भाजपा इस पर जिस बेशर्मी से काबिज़ हो रही है, उससे बस यह राज्य और आक्रामक और मर्दानगी भरा बन रहा है, जिसकी झलक मोदी के रोबीले अंदाज में देखी जा सकती है. बहुत करीब दिख रहे हिंदू राष्ट्र के अपने लक्ष्यों को हासिल करने की खातिर, यह प्रतिरोध को नेस्तनाबूद करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. इस दिशा में संस्थागत रुकावटों को इसने मोटे तौर पर अपने भगवाकरण अभियान के जरिए दूर कर दिया है, अब यह बची-खुची असहमतियों को भी कुचल रही है. हकीकत ये है कि 2014 के बाद से यह रुझान इतना साफ हो गया है कि ऐसे फैसलों का अंदाजा आप पहले से ही लगा सकते हैं. गुजरात में 2002 के कत्लेआम को अंजाम देने वाले सभी लोग कानून के फंदे से बाहर जा चुके हैं, बल्कि उनको अच्छा खास इनाम तक मिल चुका है. और तीस्ता सीतलवाड़ जैसे जिन लोगों ने प्रतिरोध खड़ा करने की कोशिश की है, उन्हें अलग-अलग तरह से परेशान और आतंकित किया जा रहा है.

अपने दावे के उलट हिंदुत्ववादी ताकतें हमेशा ही अपने काम को बेरहमी से अंजाम देती रही हैं; आखिर इस दुनिया में उनके बुनियादी प्रेरणास्रोत हिटलर और मुसोलिनी जैसे लोग रहे हैं और बुद्ध जैसे लोगों से वे नफरत करते आए है. हिंदुत्व के पूर्वज सावरकर ‘राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैन्यीकरण’ करना चाहते थे. 1999 में ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों को जला कर हत्या, 2002 में दुलीना में पांच दलितों और 2015 में दादरी में मोहम्मद अखलाक की पीट पीट कर हत्या; उना के पास मोटा समाढियाला में चार दलित नौजवानों की निर्मम पिटाई या फिर नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसर और कलबुर्गी की हत्याएं इन ताकतों के क्रूर व्यक्तित्व की झलक देती हैं. आखिरकार जब वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों का दम भरते हैं, तो हिंसा ही उनकी पहचान के रूप में सामने आती है, क्योंकि उनका धर्म ऐसा अकेला धर्म है, जिसके देवता हथियारों से लैस हैं. लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि राज्य भी अन्यायपूर्ण, हिंसक और अनैतिक बन जाए.

यह कल्पना करना एक गलतफहमी है कि इंसाफ के नाम पर साईबाबा और उनके सह-आरोपितों पर इस अन्यायपूर्ण और अनैतिक तरीके से निर्ममता से पेश आना उनके जैसे दूसरे लोगों के लिए एक सबक होगा. इसका कोई सबूत नहीं है कि ऐसे ‘सबक’ कभी अपने मकसद में कामयाब उतरे हों. इसके उलट, यह पुलिस मानसिकता माओवादियों के निर्माण को ही तेज करेगी. ये बदमाश राज्य की आतंकवादी कार्रवाइयों से लड़ने के जनता के इरादे को ही मजबूत करेगी.



समयांतर, अप्रैल 2017 में प्रकाशित.

देश के साथ किसका साझा है?

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/20/2017 05:58:00 PM


कास्तिय्यो आर्मास, संयुक्त राज्य समर्थित एक फौजी तानाशाह था, जिसने एक फौजी तख्तापलट के बाद सत्ता हथियाते हुए गुआतेमाला पर तीन साल तक हुकूमत की. गुआतेमाला एक लातीनी अमेरिकी देश है, जो प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है और जहां पिछली सदी में अनेक देशों में संयुक्त राज्य की सरपरस्ती में होने वाले फौजी तख्तापलट के सिलसिले की शुरुआत हुई थी. फौजी तख्तापलट एक कार्रवाई है, जिसके जरिए यातना कक्षों में लोकतंत्र को कंपनियों के सांचे में ढाला जाता है. यातना कक्ष किसी मुल्क की आंखों में कटी हुई वो रातें हैं जहां सपनों के अपराधों के लिए देह को सज़ा दी जाती है. सपनों के बारे में लिखना अपनी खोई हुई मासूमियत को याद करना है, एदुआर्दो गालेआनो यहां जिसकी कोशिश कर रहे हैं. जालसाज़ धंधेबाजों को कर अदायगी से छूट दिए जाने के इस दौर में पेश है उनकी किताब  दिआस ई नोचेस दे आमोर ई दे गेर्रास का एक अंश. अनुवाद: रेयाज उल हक

1954 के बीच में संयुक्त राज्य ने न्गो दिन्ह दिएम को साइगॉन की गद्दी पर बिठाया और इसके इंतेजाम किए कि गुआतेमाला में कास्तिय्यो आर्मास विजेताओं की तरह दाखिल हो.

यूनाइटेड फ्रूट कंपनी को उबारने की मुहिम ने एक ही झटके में उन खेतिहर सुधारों को तहस-नहस कर दिया, जिन्होंने इस मुल्क में परती पड़ी हुई कंपनी की जमीन पर दखल करके उसे बेजमीन किसानों में बांट दिया था.

अपने माथे पर इसकी निशानी लिए हुए मेरी पीढ़ी ने अपनी राजनीतिक जिंदगी की शुरुआत की. अपमान और कुछ न कर पाने की बेबसी से भरी वो घड़ियां...मैं उस भारी-भरकम भाषणबाज को याद करता हूं जो हमसे शांत आवाज़ में बातें करता, लेकिन उन्हीं दिनों मोंतेविदेओ में गुस्से से भरे शोर-गुल और बैनरों वाली उस रात को वह अपने मुंह से आग उगलता. “हम जुर्म की जिम्मेदारियां तय करने आए हैं...”

उस वक्ता का नाम था खुआन खोसे आरेवालो. तब मैं चौदह साल का था और उस पल की छाप कभी भी फीकी नहीं पड़ने वाली थी.

आरेवालो ने ही गुआतेमाला में सामाजिक सुधारों का वह सिलसिला शुरू किया जिसको खाकोबो आर्बेन्स ने आगे बढ़ाया और जिसे कास्तिय्यो आर्मास ने खून में डुबो दिया. उसने हमें बताया कि अपनी हुकूमत के दौरान वो तेईस बार मार दिए जाने की कोशिशों से बच निकला था.

बरसों बाद आरेवालो एक सरकारी ओहदेदार बना. वह एक खतरनाक चीज में तब्दील हो चुका था, जिसे अपने अतीत के कारनामों पर पछतावा होने लगा था: आरेवालो जेनेरल आरान्या की हुकूमत में एक राजदूत बन गया, एक सामंती जमींदार, गुआतेमाला का औपनिवेशिक हाकिम, कत्लेआम का कर्ताधर्ता.

जब मुझे यह बात पता लगी, तब मुझे लगा कि मैं एक ऐसा बच्चा हूं जिसके साथ धोखा किया गया था हालांकि मुझे अपनी मासूमियत खोए तब एक अरसा हो गया था.

*

मैं 1967 में गुआतेमाला में मिखांगोस से मिला. पहाड़ों से लौट कर जब मैं शहर वापस आया तो अपने घर में उन्होंने मेरा स्वागत किया. उन्होंने मुझसे कुछ भी नहीं पूछा.

उन्हें गाना, अच्छी शराब पीना और जिंदगी को शिद्दत से जीना पसंद था. नाचने के लिए उनके पास पांव नहीं थे, लेकिन वे दावतों में रंग भरने के लिए अपने हाथों से थाप दिया करते थे.

थोड़े ही समय बात जब आरेवालो राजदूत बना, तब आदोल्फो मिखांगोस कांग्रेस [संसद] के सदस्य थे.

बीतती हुई एक दोपहर, मिखांगोस ने कांग्रेस में एक धांधली के विरोध में अपनी आवाज उठाई. ब्राजील में दो सरकारों को गिरा चुकी हाना माइनिंग कंपनी अपने एक अधिकारी को गुआतेमाला की अर्थव्यवस्था का मंत्री बनवाने में कामयाब रही थी. जल्दी ही एक करार पर दस्तखत किए गए, जिसके बाद हाना, राज्य के साथ मिल कर लेक इसाबेल के किनारे निकेल, कोबाल्ट, तांबे और क्रोम के भंडारों का दोहन कर सकती थी. करार के मुताबिक, राज्य को अपनी कोशिशों के लिए बख्शीश मिलती, जबकि कंपनी को एक अरब डॉलर से ज्यादा की कमाई होती. देश के साझीदार की अपनी भूमिका के तहत कंपनी को कोई आयकर नहीं चुकाना था और वह आधी कीमत पर बंदरगाह का इस्तेमाल कर सकती थी.

मिखांगोस ने विरोध में अपनी आवाज बुलंद की.

इसके थोड़े ही समय बाद, जब वे अपनी प्यूजो पर सवार हो रहे थे कि गोलियों की बौछार ने उनकी पीठ को छलनी कर दिया. अपनी देह में ढेर सारा सीसा लिए हुए अपनी पहियोंवाली कुर्सी से वे नीचे ढह गए.

बिग डाटा के बड़े झूठ: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/14/2017 01:30:00 PM


इस बार आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि कैसे बिग डेटा की जुमलेबाजी के जरिए नोटबंदी से होने वाली तबाही और गैरकानूनी धन के ताने-बाने को ढंकने की कोशिश की जा रही है। अनुवाद: रेयाज उल हक

“आंकड़ों को ठोक-पीट कर आप उनसे कुछ भी उगलवा सकते हैं”-रोनाल्ड कोज़

यह बात पूरी तरह से शायद कभी भी उजागर न हो कि 86.4 फीसदी करेंसी को वापस लेने के इतिहास में अभूतपूर्व रूप से बेवकूफी भरे फैसले के पीछे का राज क्या था, लेकिन अब तक यह पर्याप्त रूप से साफ हो गया है कि यह फैसला और किसी ने नहीं बल्कि भारतीय राईख  के डेर फ्यूहरर  नरेंद्र मोदी ने लिया था. जब इस फैसले की बेवकूफी उजागर होने लगी तो अपनी मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के खास अंदाज में वे जब भी मुंह खोलते हैं, तब नोटबंदी का एक अलग ही मकसद बताने लगे हैं. जब लोगों तक नकदी पहुंचाने की बंदोबस्त चरमरा गई तो उन्होंने लोगों से डिजिटल हो जाने के लिए कहा; ताकि भारत को एक कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाया जाए, जिसे बाद में बदल कर लेस-कैश इकोनॉमी (कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था) कहा गया. जब 30 दिसंबर को आधार आधारित ई-लेनदेन की बायोमेट्रिक ऐप को ‘भीम’ (बीएचआईएम: भारत इंटरफेस मनी) का नाम दिया गया तो यह कहते हुए वे इससे भी राजनीतिक गोटी सेंकना नहीं भूले कि इसका नाम बाबासाहेब आंबेडकर के नाम पर रखा गया है. लेकिन फिर भी लोगों की नाराजगी इससे दूर न हो सकी, जिनमें से अनगिनत लोग भुखमरी की कगार पर धकेल दिए गए और कइयों की अब तक मौत हो चुकी है.

यह बेवकूफी भरी उम्मीद कि पुराने नोटों में जमा किए गए गैरकानूनी धन की भारी मात्रा कभी नहीं लौटेगी नाकाम हो गई है, जब 15 लाख करोड़ रुपए लौट आए हैं. यह रकम वापस लिए गए नोटों का 97 फीसदी है. मोदी ने फौरन अपना लक्ष्य बदलते हुए कहा कि अपराधियों को गिरफ्त में लेने के लिए नोटबंदी की प्रक्रिया में पैदा हुए डाटा का विश्लेषणात्मक उपकरणों के जरिए छानबीन की जाएगी. अपने नेता को सही साबित करने के लिए अनगिनत मोदीभक्त आनन-फानन में यह प्रवचन देने लगे कि कैसे बिग डाटा एनालिटिक्स (बीडीए) गैरकानूनी धन से छुटकारा दिलाने में मदद कर सकते हैं. उन्हें इसका अहसास नहीं था कि इस डाटा में एक बहुत अहम चीज की कमी थी.

विश्लेषण का वितंडा
 

बिग डाटा को आम तौर पर अंग्रेजी के वी अक्षर से शुरू होने वाले तीन शब्दों के जरिए परिभाषित किया जाता है: वॉल्युम (यानी आंकड़े का आकार), वेरायटी (यानी डाटा का बहुमुखी स्वरूप: ऑडियो, वीडियो, टेक्स्ट, सिग्नल),  और वेलॉसिटी (यानी डाटा के जमा होने की तेजी). एनालिटिक्स यानी विश्लेषण की व्यवस्था, सांख्यिकीय मॉडलिंग और मशीन लर्निंग को मिला कर बनती है. बिग डाटा के विश्लेषण के दौरान भारी मात्रा में जटिल डाटासमूहों की छानबीन की जाती है, ताकि ऊपर से नजर न आने वाली परिपाटी, अनजान अंदरूनी संबंध, रुझान और अनेक तरह के दूसरे उपयोगी सूचनाएं उजागर हों.

लेकिन यह सब सच होने के बावजूद, यह कोई जादू की छड़ी नहीं है जो हवा में से नतीजे पैदा कर सकती है. सही है कि जाली नोटों की रोकथाम के लिए करेंसी नोटों में देश की पहचान करने के संकेत, उनका मूल्य, अनोखे सीरियल नंबर जैसी विशेषताएं तथा इसके अलाव एक पूरा तंत्र मौजूद है. इस डाटा तक नकदी गिनने वाली मशीनों के जरिए आसानी से और हाथोहाथ पहुंचा जा सकता है, बशर्ते उनसे होकर गुजरने वाले करेंसी नोटों के सीरियल नंबरों का पता लगाने और उन्हें स्टोर करने के लिए जरूरी सेंसर मशीनों में लगे हुए हों. इसके जरिए उन आखिरी व्यक्तियों या खाता धारकों तक का पता लगाया जा सकता है, जिनके पास से आखिरी बार ये नोट आए हों या जिन्होंने उनका आखिरी बार उपयोग किया हो. ऐसे अलगोरिद्म बनाए जा सकते हैं कि उन पर डाटा चलाने के बाद वे उन इलाकों का एक अनुमान लगा सकें, जिन इलाकों में रकम की जमाखोरी की गई थी.

लेकिन जहां तक नोटबंदी की प्रक्रिया के डाटा की बात है, यह तथ्य बरकरार है कि बैंकों में लगी हुई नोट गिनने की मशीनों में करेंसी नोटों के सीरियल नंबर जमा करने के लिए सेंसर नहीं लगे हैं. इस अहम डाटा की गैरमौजूदगी को देखते हुए इस नतीजे पर पहुंचना नामुमकिन है कि जमा की गई रकम गैरकानूनी थी. किसी व्यक्ति का सुराग लगा पाना तो और भी मुश्किल है. पुराने करेंसी नोटों को नए करेंसी नोटों से बदलने के तरीके ये थे: (1) आम लोगों ने कतारों में लग कर अपनी पसीने की कमाई को बदला, (2) एजेंटों के जरिए नोट बदले गए जिसके लिए 20 से 40 फीसदी कमीशन अदा की गई और (3) 50 फीसदी का जुर्माना कर भर कर नोट जमा किए गए. इनमें से सिर्फ दूसरा तरीका ही गैरकानूनी है, क्योंकि इसके जरिए गैरकानूनी धन को कानूनी धन में तब्दील किया गया. ऐसा दो तरीकों से हुआ: एक, जिसमें बैंक अधिकारियों की मिलीभगत थी, और दो, जिसमें गरीब लोगों को 10 फीसदी के कमीशन पर पुराने नोट बदलने के काम पर लगाया गया. इन तरीकों से करोड़ों रुपए बदले गए. विश्लेषण की प्रक्रिया में इस डाटा से आखिर क्या मतलब निकाला जा सकेगा? उम्मीद के मुताबिक, बस बैंकों के पास जमा रकमों में भारी इजाफा होगा, लेकिन क्या इसे गैरकानूनी धन कहा जा सकता है? नोटबंदी ने सिर्फ एक ही काम किया है और वो यह है कि इसने अपराधियों के गैरकानूनी धन को कानूनी बना दिया है और इस तरह उन्हें फायदा पहुंचाया है.

बेवकूफ बनी जनता
 

जैसा कि मैंने अपने पहले के एक स्तंभ (समयांतर, दिसंबर 2016) में लिखा था कि कुल गैरकानूनी धन का सिर्फ 5 फीसदी ही नकदी में है (जिसमें जेवरात भी शामिल हैं). इसलिए अगर गैरकानूनी धन का सुराग लगाना ही मकसद था, तो नकदी के पीछे पड़ना फायदेमंद नहीं था. गैरकानूनी धन का मुहाना तो कॉरपोरेट दुनिया से निकलता है जिसकी पीठ पर राजनेताओं और नौकरशाहों का हाथ है. दिलचस्प यह है कि इस मुहाने को मोदी की निजी सुरक्षा हासिल है. उन्होंने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर, 20 हजार रुपए प्रति दानदाता तक करों में छूट दे रखी है. इस तरह राजनीतिक दल वो घाट बन गए हैं, जहां अपराधियों के गैरकानूनी धन को धो-पोंछ कर कानूनी बनाया जाता है. खुद मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने इन राजनीतिक दलों को, जिनकी संख्या आज 1900 से ज्यादा है, ‘काले धन को ठिकाने लगाने वाला परनाला’ कहा है. बेशक, इसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिला है. करेंसी जमा करने के बिद डाटा की छानबीन करके संदिग्धों को पकड़ने का दिखावा करना ऐसा ही है जैसा जाल के बड़े छेद से तो मछलियों के झुंड को निकलने दिया जाए, और फिर मछली पकड़ने का दिखावा किया जाए. क्या मोदी, नोटबंदी का ऐलान करने से पहले जमा की गई भारी रकम की छानबीन करने वाले हैं? आखिरकार, मीडिया रिपोर्टों ने गोपनीयता के उनके दावे की पोल पहले ही खोल दी है कि पिछली तिमाहियों में भारी लेन-देन हुए हैं. यह जानने के लिए बहुत बुद्धि लगाने की भी जरूरत नहीं है कि वे सभी भाजपा के अंदरूनी हलके से जुड़े हुए थे.

जब डाका डालने वालों के गिरोह खुलेआम घूम रहे हों तो जेबकतरों की पहचान करने के लिए क्या आपको सचमुच में बिग डाटा एनालिटिक्स उपकरणों की जरूरत है? और ये गिरोह ठीक-ठीक मोदी के अपने राजनीतिक वर्ग से ताल्लुक रखते हैं. असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा उम्मीदवारों के चुनावी हलफनामों के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक, 16वीं लोकसभा में दोबारा चुने गए 165 सासंदों की परिसंपत्तियों में 2009 से 2014 के दौरान 137 फीसदी का भारी इजाफा हुआ था (एफडीआर के मुताबिक कुल 168 सांसदों में से तीन के हलफनामे भारत के चुनाव आयोग की वेबसाइट पर साफ-साफ उपलब्ध नहीं हैं). मोदी की अपनी पार्टी परिसंपत्तियों और आपराधिक मुकदमों, दोनों ही मामलों में सबसे ऊपर है. उत्तर प्रदेश में, जहां भाजपा ने 80 में से 71 सीटें जीतीं, वरुण गांधी की परिसंपत्तियां 625 फीसदी की दर से बढ़ीं. 2009 में वरुण गांधी के हलफनामे के मुताबिक उनके पास कुल 4.93 करोड़ की परिसंपत्तियां थीं. 2014 में यह सीधे 30.81 करोड़ बढ़ते हुए, 35.73 करोड़ हो गईं. उनकी मां मेनका गांधी की परिसंपत्तियों में 105 फीसदी का इजाफा हुआ. अगर परिसंपत्तियों में इजाफे को भ्रष्टाचार के संकेत के रूप में लिया जाए, तो भाजपा साफ तौर पर कांग्रेस से आगे है. जहां भाजपा के दोबारा चुने गए सांसदों की परिसंपत्तियां तेजी से बढ़ते हुए 2014 में 5.11 करोड़ से 12.6 करोड़ हो गईं, जिसकी वृद्धि दर 146 फीसदी है, वहीं कांग्रेस में 104 फीसदी की वृद्धि दर देखी गई, जो 2009 के 5.66 करोड़ से बढ़ कर 2014 में 5.90 करोड़ हो गई. जनता के सेवक कहे जाने वाले ये राजनेता आखिर कैसे पैसे जुटाने की जादुई छड़ी में तब्दील हो गए हैं, इस सवाल का जवाब मोदी को देना होगा. कभी कॉलेज का मुंह तक न देखने वाले वरुण गांधी एमबीए किए हुए लोगों को मात दे सकते हैं. इसी तरह का जादू नौकरशाहों के मामलों में भी देखा जा सकता है, जिनके बगैर राजनेताओं की जादुई छड़ी कारगर नहीं हो सकती. यह एक आम जानकारी है कि नौकरशाह, खास कर प्रशासन, पुलिस का नियंत्रण करने वाले और नियामक पदों पर तैनात तमाम नौकरशाहों के पास भारी परिसंपत्तियां हैं जो उनकी आमदनी के स्रोत के अनुपात के बाहर हैं. उनमें से कितनों की कभी जांच-पड़ताल हुई है, और कितनों को कसूरवार साबित किया गया है? जो फूहड़ गैरबराबरी भारत को दुनिया के सबसे गैरबराबरी वाले देशों में खास तौर से बदनाम करती है, जिसके तहत 57 अरबपतियों के पास इसकी कुल संपत्ति[1] का 58 फीसदी है, वह आखिरकार ईमानदारी की कमाई नहीं है.

विश्लेषण की मुश्किलें

बीडीए के डाटा आधारित फैसलों के नए मॉडल के नतीजे बड़े हैं, जो सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही हैं. दार्शनिक रूप से कहें तो यह ‘सिद्धांतों का अंत’ कर देता है.[2] बिग डाटा अंदरूनी संबंधों की तलाश करता है, यह वजहों की तलाश नहीं करता. इसकी दिलचस्पी ‘क्यों’ के बजाए ‘क्या’ में है. इस नए मॉडल पर मुग्ध लोगों के लिए व्हाइट हाउस की एक हालिया रिपोर्ट “बिग डाटा: अ रिपोर्ट ऑन अलगोरिद्मिक सिस्टम्स, अपॉर्च्युनिटी, एंड सिविल राइट्स” इसके खतरों से आगाह करने के काम आ सकती है. यह कहती है, “डाटा को सूचनाओं में बदलने वाला अलगोरिद्म अचूक नहीं है, वह अशुद्ध इनपुट, तर्क, संभाव्यता और अपने बनाने वाले लोगों पर निर्भर करता है.” इसके पहले की एक व्हाइट हाउस रिपोर्ट ने भी स्वचालित और खुफिया फैसलों में एनकोडिंग भेदभाव की संभावनाओं के प्रति आगाह किया था, जो एनालिटिक्स के जटिल अलगोरिद्म का हिस्सा होते हैं. बिग डाटा के फायदे उतने नहीं हैं, जितना गंभीर चिंता निजता और डाटा सुरक्षा के बारे में है. डाटा पारिस्थितिकी के फायदे, सरकार, कारोबार और व्यक्तियों के बीच के शक्ति संबंधों को उलट देते हैं और नस्ली या दूसरी तरह की बदनाम करने वाली छवियों के निर्माण, भेदभाव, समुदायों या समूहों को गैरवाजिब तरीके से अपराधी बताने और आजादियों को सीमित करने की तरफ ले जा सकते हैं.

जहां एक तरफ पूरी दुनिया इन मुद्दों को लेकर चिंतित है, भारत सरकार अपने डिजिटल रथ को आगे धकेल रही है और इसके नुकसान की ओर से आंखें मूंदे हुए है. यह आधार डाटा को लेकर बहुत उम्मीद पाले हुए है, जिसका इस्तेमाल करते हुए यह हरेक लेन-देन को डिजिटाइज करना चाहती है, जिसमें बायोमेट्रिक्स पहचान करने का आधार होगा. विशेषज्ञों द्वारा यह दिखाया गया है कि बायोमेट्रिक्स वित्तीय लेनदेन के लिए भरोसेमंद नहीं है, इसके बावजूद मोदी ने बीएचआईएम को “आपका अंगूठा आपका बैंक” के रूप में प्रचारित किया. एक अनोखी पहचान तैयार करने के अपने घोषित उद्देश्य के उलट, 2009 में अपनी शुरुआत के फौरन बाद आधार-ऑथेन्टिकेशन एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (एपीआई) बनाया गया, जिसने इसको कारोबारों के लिए उपलब्ध करा दिया. जैसाकि इसके निर्माता नंदन निलेकणी ने हाल ही में दावा किया है कि महज एक “आधार-सक्षम बायोमेट्रिक स्मार्टफोन” से 600 अरब डॉलर के अवसर पैदा होने का अंदाजा है.
[3] इसमें इस बात की रत्ती भर भी चिंता नहीं है कि भारतीयों की निजता और उनके महत्वपूर्ण डाटा की सुरक्षा का क्या होगा. जब अगस्त 2015 में यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में आया तो महाधिवक्ता ने यह कह कर इसे रफा-दफा कर दिया कि इस देश के लोगों को पास निजता का अधिकार नहीं है. दिलचस्प बात यह है कि लगभग ठीक उन्हीं दिनों मानहानि को अपराधों की सूची से हटाने के लिए सरकार ने ठीक इसकी उलटी बात कही कि उन्हें जनता के निजता के अधिकारों की सुरक्षा करनी है. सर्वोच्च न्यायालय ने उचित ही आधार कार्ड के उपयोग को सिर्फ छह क्षेत्रों तक सीमित कर दिया – सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राशन, एलपीजी, जन धन योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम और पेंशन. और इसमें भी कार्ड का इस्तेमाल स्वैच्छिक है. लेकिन इसकी पूरी तरह अवमानना करते हुए, सरकार हर जगह इसको अनिवार्य बनाते हुए इसे जबरन लागू कर रही है. जाहिर है कि यह संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन करते हुए हम सबकी जिंदगियों पर पूरा नियंत्रण करना चाहती है और बिग डाटा एनालिटिक्स के इस्तेमाल के साथ हमें प्रयोगशालाओं के जानवर और फरमाबरदार मशीनों के रूप में ढाल देना चाहती है.

अगर लोग नोटबंदी से होने वाली तबाहियों को चुपचाप बर्दाश्त कर सकते हैं, तो यह अपराध तो शायद एक जरा सी परेशानी ही मानी जाएगी!


नोट्स

[1] ऑक्सफेम स्टडी, देखें द हिंदू, 16 जनवरी, 2017.
[2] सी एंडरसन, “द एंड ऑफ थ्योरी: द डाटा डेल्युज मेक्स द साइंटिफिक मेथड ऑब्सोलीट,” वायर्ड, 23 जून 2008, ऑनलाइन उपलब्ध www.wired.com/2008/06/pb-theory.
[3] https://www.credit-suisse.com/media/cc/docs/cn/india-digital-banking.pdf

 

क्रांति की यादें: स्मारकीय विचारधारा से परे

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/10/2017 01:01:00 PM


अक्तूबर क्रांति की सौवीं सालगिरह के मौके पर क्रांतियों द्वारा विकसित किए जाने वाले नजरिए और क्रांति को देखने के नजरिए के बारे में सौम्यव्रत चौधरी और रेयाजुल हक का लेख. 


 

1789 में फ्रांस की क्रांति की शुरुआत में ही दो बातें सामने आती हैं. पहली बात: हर क्रांतिकारी कदम और घटना मानो एक सामूहिक इच्छा को जन्म देती है, कि ऐसा हर कदम और घटना एक राष्ट्रीय स्मारक का विषय बने. स्मारक ही नहीं; हर क्रांतिकारी तारीख एक सामूहिक उत्सव के रूप में मनाई जाए. इस तरह फ्रांसीसी क्रांति, क्रांतिकारी भावनाओं के साथ-साथ, कुछ खास नाटकीय भावना भी पैदा करना चाहती है. ये वे भावनाएं हैं जिनसे एक दर्शक समूह किसी रंगमंच पर नाट्य प्रदर्शन के दौरान गुजरता है. या फिर एक समूह इन घटनाओं में इस तरह हिस्सा लेता है, जैसे किसी उत्सव में हिस्सा ले रहा हो. दोनों सूरतों में क्रांतिकारी दौर, मानो अपने आपको उस ऐतिहासिक पल की सच्चाई से आगे बढ़ कर एक कलात्मक और हमेशा कायम रहने वाली एक सच्चाई, एक शाश्वत सत्य का दर्जा देना चाहता है.
 

दूसरी बात: 1789 से 1794 के बीच फ्रांसीसी क्रांति यह बात भी जाहिर करती है कि फ्रांस के क्रांतिकारी जो कर रहे थे, बोल रहे थे, जिन व्यापक गतिविधियों में हिस्सा ले रहे थे, वो सारी गतिविधियां मानो इतिहास के रंगमंच पर रचा जाने वाला प्रदर्शन यानी परफॉरमेंस हों. फर्क सिर्फ इतना था कि इतिहास के रंगमंच पर खेला गया नाटक किसी बाहरी दर्शक-समूह के लिए नहीं होता है. ऐसे रंगमंच में दर्शक खुद इतिहास के अभिनेता होते हैं, या कम से कम बन सकते हैं. इस संदर्भ में एमानुएल कांट द्वारा 1794 में कॉन्टेक्स्ट ऑफ फैकल्टी  में कही गई बात याद आती है कि अगर फ्रांसीसी क्रांति के विषय पर कोई ऐसा दर्शक सोचें या उसकी कल्पना करें जो इतिहास की परिधि से बाहर हो, जो खुद ही एक काल्पनिक दर्शक हो, तो ऐसे दर्शक में फ्रांस की क्रांति के संबंध में एक खास भावना पैदा होगी. इस भावना को कांट ने एंथुसियाज्म  यानी उत्साह का नाम दिया. इस भावना को हम नाट्यशास्त्र के नजरिए से एक ‘राजनैतिक रस’ कह सकते हैं. हालांकि याद रखना जरूरी है कि कांट की राय में फ्रांसीसी क्रांति में जो असली अभिनेता या दर्शक थे, जो उस हकीकत का हिस्सा थे, उनके नज़रिए से क्रांति की घटनाएं इतनी उलझी हुई थीं और भावनाएं भी उतनी ही उलझी हुई होंगी कि उनका बस चले तो उस क्रांति की पटकथा को, उसके मौलिक रूप में इतिहास के रंगमंच पर शायद दूसरी बार न खेलें. कांट के मुताबिक इसकी वजह यह थी कि यह क्रांति इतने खून-खराबे वाली थी, और क्रांति के भागीदारों की चाहतों और सामने आने वाली असलियत के बीच बड़ा अंतर और यहाँ तक कि विरोध भी था. इसलिए कांट सोचते हैं कि क्रांति में भागीदार बने लोग इतिहास के उसी बिंदु पर पहुंच कर उसे नहीं दोहराएंगे. हालांकि इस क्रांति में भाग लेने से उनकी कल्पना में, उनकी सोच में जो भावना पैदा हुई, उसको कांट ने उत्साह के रूप में पहचाना. यह उत्साह, एक आदर्श बना रहा – क्रांति का आदर्श. भले ही उसे एक ऐतिहासिक परिघटना के रूप में दोहराने लायक नहीं माना जाए, लेकिन वह आगे बढ़ने की एक निशानी जरूर थी, जो इंसानी सभ्यता का एक लक्षण है.
 

इसके बावजूद, फ्रांस की क्रांति उसी उलझे इतिहास में क्रांतिकारी सोच – आज़ादी, बराबरी और मैत्री[1]  – को सामने लाती है, उसे अभिव्यक्त करती है. उसे साकार (परफॉर्म) करती है. यही फ्रांसीसी क्रांति की असली घटना (इवेन्ट) है.

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1917 में रूसी क्रांति के बाद, 1920 में अक्तूबर के महीने में रंगमंच के प्रसिद्ध निर्देशक निकोलाई एवरेइनोव ने एक विशाल स्मारक-प्रदर्शन का निर्देशन किया. 1917 की घटनाओं को तीन साल बाद 1918 में सेंट पीटर्सबर्ग में जार के राजमहल की सीढ़ियों पर एक नाटक के रूप में लाखों दर्शकों के बीच खेला गया. दर्शक यह प्रदर्शन देख भी रहे थे, उसमें हिस्सा भी ले रहे थे, जैसे तीन साल पहले रूस की जनता ने क्रांति में हिस्सा लिया था. 


फ्रांसीसी क्रांति से जुड़ी जो चाहत थी, वह रूस में भी नज़र आती है कि इतिहास की भौतिक असलियत को न छोड़ते हुए, इतिहास को एक नाटक की पटकथा, एक नाट्य-प्रदर्शन, एक नाट्य-उत्सव, एक नाट्य-रस की तरह आत्मसात किया जाए. लेकिन यह प्रयोग फ्रांसीसी क्रांति से इस मायने में अलग हो जाता है कि यहां जो हो चुका है और जो हो रहा है, उन दोनों को ही एक स्मारक के रूप में तब्दील कर देने की कोशिश हो रही थी. सोवियत संघ में असलियत से कल्पना तक का सफर तय किया जा रहा था, जहां चाहत और असलियत में फर्क तो था, लेकिन इस फर्क को स्मारकीय उत्सवों के जरिए महत्वहीन बनाने की कोशिश भी हो रही थी. 

इस रूसी अनुभव के परिप्रेक्ष्य में कुछ सवाल पैदा होते हैं – (i) क्या कोई राज्य (स्टेट) इस सामूहिक चाहत को पूरी तरह आकार दे सकता है? राज्य की अपनी संरचना, समूह/समाज की चाहत और एक राष्ट्रीय समूह/समाज की कल्पना में किस तरह का तालमेल बैठ सकता है कि घटनाओं की असलियत एक हवाई सपने में तब्दील न हो जाए? (ii) और जब राज्य की संरचना किसी दल (पार्टी) या संघ की संरचना से जुड़ जाए, और जब दोनों, समूह की चाहत और राष्ट्र की कल्पना का एकमात्र माध्यम बन जाएं, तो क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता है कि राज्य-पार्टी/संघ की संरचना ने क्रांतिकारी सोच को एक राज्य/पार्टी की विचारधारा बना दिया है?
 

रूस की बोल्शेविक पार्टी जिस वैचारिक दृष्टि को स्वीकार करती थी, उसके तहत राज्य यथास्थिति का एक उपकरण था, जो सिद्धांतत: परिवर्तन की सामूहिक चाहत का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था. इस अर्थ में क्रांतिकारी सोवियत राज्य की अवधारणा अपने आप में एक विरोधाभास महसूस होगी. लेकिन क्रांति के फौरन बाद क्रांति से असहमत, उसके विरोधी और प्रतिक्रांतिकारी – हर तरह की ताकतों से जनता और क्रांतिकारी ताकतों की रक्षा करने की उम्मीद और समाज के विकास को गति देने की चाहत एक वाजिब चाहत थी और इसे नकारा नहीं जा सकता. इस तरह क्रांति के बाद के सोवियत समाज में राज्य एक जमीनी हकीकत का हिस्सा था.
 

इस संदर्भ में यह बात साफ करना जरूरी है कि एक क्रांतिकारी पार्टी के रूप में बोल्शेविक पार्टी ने इतिहास की भौतिकता और असलियत, उसके द्वंद्व में हिस्सा लिया और उस उलझी हुई असलियत को एक क्रांतिकारी दिशा (orientation) देने की व्यावहारिक और सैद्धांतिक कोशिश की। यह क्रांतिकारी सोच को ही एक भौतिक (material) और आत्मिक (subjective) आयाम प्रदान करने की कोशिश थी. द्वंद्वात्मक स्थिति में दिशा (orientation) और विमर्श तलाशने की कोशिश, द्वंद्व को हवाई सपनों और शब्दों में तब्दील करना नहीं है–जैसा रूस की क्रांति के बाद राजकीय बोल्शेविक विचारधारा (बोल्शेविक स्टेट आइडयोलॉजी) ने एक समय में करना शुरू कर दिया था.
 

जैसा कि ऊपर रेखांकित किया गया है, यह भूलना भी गलत होगा कि राज्य एक ऐसी संचरना है, जिसका क्रांतिकारी जनता प्रतिक्रांति के खतरे का सामना करने के लिए इस्तेमाल करना चाहती है. एकदलीय राज्य ने शुरू में जो वादा किया, जनता ने उसका भरोसा किया, क्योंकि क्रांतिकारी घटना द्वंद्व का अंत नहीं है, उसका एक नया पड़ाव है, जहां नई दिशा की जरूरत है. पर यह सच है कि दलगत-राज्य (पार्टी स्टेट) प्रतिक्रांतिकारी शक्ल भी अख्तियार करता है. इस दुविधा या उलझन का हल क्या है?

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फ्रांस की इतिहासकार सोफी वाहनिक ने अपनी किताब इन डिफेन्स ऑफ द टेरर: लिबर्टी ऑर डेथ इन द फ्रेंच रिवॉल्यूशन  में यह दावा पेश किया है कि 1793-94 के क्रांतिकारी फ्रांसीसी दौर में राज्य ने अगर दहशत की नीति अपनाई तो इसका आधार यह था कि क्रांतिकारी जोश और प्रतिक्रांतिकारी खतरे का द्वंद्व, भावनाओं और हिंसा की एक पुनरावृत्ति में न फंसा रह जाए, वह ‘विध्वंस के उन्माद’ में फंसकर कत्लेआम में न लग जाए, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण की ओर बढ़े, जो प्रतिशोध की मांग कर रहे क्रांतिकारी जोश को शांत करने की भूमिका अदा करे. इस प्रक्रिया का अध्ययन करते हुए वाहनिक यह पाती हैं कि 1793-94 की नाज़ुक परिस्थिति में फ्रांस के क्रांतिकारी राज्य ने, जो क्रांतिकारी होने के साथ-साथ कमज़ोर भी था, दहशत की नीति अपनाई तो इसके पीछे उसका यह विश्वास था कि इससे सामने आनेवाली असलियत ऐसी होगी, कि उसकी वजह से प्रतिक्रांतिकारी दहशत से कांपेंगे और क्रांतिकारी सोच का सैद्धांतिक जुनून और व्यावहारिक संस्थाएं, प्रतिक्रांति पर जीत हासिल करेंगी. भावनाओं और हिंसा की पुनरावृत्ति के बाद एक नई राजनैतिक भावना या रस पैदा होगा जो प्रकृति के नियम और चक्र से परे हो. जैसे इतिहास में एक नाट्य प्रदर्शन होता है, जिसके अभिनेता और दर्शक दोनों एक ऐसी अनुभूति से गुज़रते हैं जो नई सोच से पैदा हुई है न कि उस ‘पुरातन प्रकृति’ या ‘आदिम गुणों’ से, जिनको इंसान की प्रकृति का हिस्सा माना जाता है. इसके खिलाफ, एक नया समाज और नई सोच पैदा होती है जिससे एक नया राजनैतिक ‘रस’ जन्म लेता है.


यह दूसरी बात है कि फ्रांस और दुनिया के इतिहास में दहशतगर्द राज्य और क्रांतिकारी सोच इस नए रंगमंच और रस–यानी एक नए ऐतिहासिक बिंदु–पर कभी मिल नहीं पाए हैं. फ्रांस की क्रांति में जिस नीति को क्रांतिकारी दहशत कहा जाता था, वह रूस की क्रांति तक पहुंचते-पहुंचते, सीधे-सीधे राजकीय दहशत बन गई. इस राजकीय दहशत के दो पहलू हैं–विचारधारात्मक दहशत (आइडियोलॉजिकल स्टेट एपरेटस, राज्य के वैचारिक उपकरण) और सैनिक या पुलिसिया दहशत (कोएर्सिव स्टेट एपरेटस, राज्य के हिंसक उपकरण).
 

लेकिन यह भी याद रखने वाली बात है कि जब सोवियत रूस इस राजकीय दहशत की स्थापना कर रहा था, जिसकी मूर्ति स्तालिन है, तभी रूसी रंचमंच में एक ऐसी लहर दौड़ रही थी, जो भविष्य के एक ऐसे रंगमंच की कल्पना कर रही थी, जिसमें एक उत्तर-क्रांतिकारी इंसान ही उसके लेखकों, अभिनेताओं, दर्शकों की रचना करेगा. जिसकी नाट्य भावनाएं एक क्रांतिकारी सोच से मंझे नए सामूहिक स्थान, आकार, समय और समाज में प्रवाहित होंगी.
 

संभव है कि स्तालिन की विचारधारात्मतक (आइडियोलॉजिकल) दहशत, मेयरहोल्ड या मायकोव्स्की के उत्तर-क्रांतिकारी भविष्य की कल्पना से घबराते हुए हिंसा और भावना की पुनरावृत्ति पर उतर आए. संभव है क्रांतिकारी सोच, उस दौर में भी, राज्य की दहशत से जूझता, बचता, मरता हुआ, हर पुनरावृत्ति के आगे और परे एक नई कल्पना, नई सोच की निशानी पेश करता आया. हावी होने के बावजूद, राज्य की दहशत पूरी तरह उसे मिटा नहीं सकी. राजनीति में नया इंसान दहशत के साथ ही आया, उसे हिंसात्मक तरीके से थोपा गया, लेकिन आगे की राह उसने नई कल्पनाओं के जरिए बनाई. इसके लक्षण कला में जाहिर होते हैं, जहां हर पुनरावृत्ति से आगे और परे, एक अलग तरह का नया रस दिखता है. जहां एक नए तरह के समाज और भविष्य की कल्पना होती है, जिसकी सच्चाई इंसानों को प्रेरित करती है.

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7 नवंबर 1918 को अक्तूबर क्रांति की पहली सालगिरह पर व्सेवोलोद मेयेरहोल्ड ने एक नाटक पेश किया: मिस्ट्री-बूफे. मायकोव्स्की के लिखे इस नाटक को मेयरहोल्ड ने पेशेवर कलाकारों और थिएटर समूहों के बहिष्कार के बावजूद बड़ी मशक्कत से तैयार किया था. क्रांति के बाद यह पहला सोवियत नाटक था, जिसमें अभिनय करने के लिए सार्वजनिक अपील करनी पड़ी थी और आखिरकार छात्रों की बड़ी भागीदारी से इस नाटक को 7 नवंबर 1918 को खेला गया. राजकीय आयोजन होने के बावजूद, इस नाटक से सोवियत सत्ता प्रतिष्ठान को परेशानी थी, क्योंकि इसमें भविष्यवादी रचनाधर्मिता का भरपूर उपयोग किया गया था, जो मायकोव्स्की की खासियत थी और जो मेयरहोल्ड के क्रांतिकारी नजरिए से भी मेल खाती थी. ऐसा इसलिए था कि मेयरहोल्ड महसूस करते थे कि रंगकर्म को वर्तमान की समस्याओं पर गौर करते हुए भविष्य के लिए नई कल्पना को प्रेरित करना चाहिए, जो अपने अंतिम मकसद के रूप में एक नए इंसान के निर्माण और जरूरतों को ध्यान में रखे.


इसीलिए मेयरहोल्ड एक ऐसे रंगमंच को विकसित करने की प्रक्रिया में थे, जो स्मृतियों पर नहीं बल्कि सामाजिक मुद्राओं पर आधारित हो, जिसकी बनावट और बिंब विधान जाने-पहचाने अतीत का हवाला देने वाली पृष्ठभूमि बन कर न रह जाए, बल्कि उसमें ऐसे तत्व हों जो भविष्य की खातिर नई परिकल्पनाओं को उकसाएं. इसीलिए उन्होंने अपने रंगमंच में क्यूबिस्ट और फ्यूचरिस्ट कलाकारों को जगह दी. इस तरह वे कला की एक ऐसी भूमिका पर जोर दे रहे थे, जो ऐतिहासिक तो थी, लेकिन तो अतीत के किसी एक बिंदु पर ठहरी हुई नहीं थी.
 

नाटक को मिली प्रतिक्रियाएं बहुत कड़ी थीं और महज तीन प्रदर्शनों के बाद इसके प्रदर्शन को रोक दिया गया. यह मानो बाईस साल बाद मेयरहोल्ड की गिरफ्तारी, यातनाओं और जेल में मौत की सजा का एक तरह से पूर्वाभास देती हुई घटना थी.
 

अक्तूबर क्रांति बदलाव के एक ऐसे वादे के साथ हुई थी, जिसकी व्यापकता बहुत गहरी थी, जिसके दांव पर बहुत कुछ लगा था, लेकिन उसके पास इस वादे की कोई ठोस शक्ल नहीं थी, जिसको छू कर दिखाया जा सके कि क्रांति इसको हासिल करना चाहती है. ऐसे में, जब कुछ लेखक-कलाकारों ने उसे एक शक्ल देने की कोशिश की तो ऐसा क्यों हुआ कि उन्हें सत्ता के पूरे विरोध का सामना करना पड़ा?

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पहले बोल्शेविक रंगकर्मी के रूप में मेयरहोल्ड द्वारा निर्देशित इस पहले सोवियत नाटक के प्रदर्शन से दो दिन पहले पेत्रोग्राद्साकाया प्राव्दा  में ए.वी. लुनाचार्स्की की एक टिप्पणी प्रकाशित हुई, जो उन दिनों पीपुल्स कमिसार फॉर एजुकेशन थे. यह टिप्पणी मेयरहोल्ड द्वारा अपने नाटक में किए जा रहे प्रयोगों के संदर्भ में थी, जिसमें लुनाचार्स्की ने भविष्यवादी कलाकारों द्वारा की गई ‘लाखों गलतियों’ के प्रति अपनी आशंकाएं व्यक्त करते हुए कहा था, “अगर बच्चा विकृत हो, तब भी यह हमें प्यारा होगा, क्योंकि यह उसी क्रांति की पैदाइश है, जिसको हम अपनी महान मां के रूप में देखते हैं.”
 

बहुत कम टिप्पणियां इतने गहरे अर्थों वाली होती हैं. इस टिप्पणी में सोवियत संघ में आगे चल कर सामने आने वाले उस खौफनाक दौर की मानो एक भविष्यवाणी छिपी हुई थी, जिसमें असहमत नजरिए वाली कला को दबाया गया, पाबंदियां लगाई गईं, बहसों और तर्कों से परे जाकर, कलाकारों का यातनाएं दी गईं, वे गायब कर दिए गए, और उनकी हत्याएं तक हुईं. साथ ही, यह टिप्पणी जाहिर करती है कि क्रांति कला और संस्कृति के प्रति राज्य के संरक्षणवादी और सरपरस्ती भरे नजरिए को दूर नहीं कर पाई थी, जो अब तक के शासक वर्गों का नजरिया रहा था और जिसने कला को महज एक औजार, मतलब साधने की एक गतिविधि भर बना दिया था.
लेकिन यह सब तो महज उस बड़ी समस्या के लक्षण थे, जिसकी झलक बहुत साफ तौर पर लुनाचार्स्की की इस टिप्पणी में ही मिलती है. वह है खुद क्रांति के बारे में नजरिया. यहां क्रांति, भविष्य का एक वादा, एक रचनात्मक सपना नहीं रह गई है. बल्कि यह एक ‘महान मां’ है, जिसको सवालों और संदेहों से परे एक पूज्य मूर्ति के रूप में देखा जाना है. मां मानो एक स्मारक है, जो अपने ‘बेटों’ की जिंदगियों को अपने साए में लिए हुए है. एक ऐसी उपस्थिति है, जिसका होना भर ही वर्तमान को वैध या अवैध बना देने के लिए काफी है.
 

क्रांति को इस तरह देखना, यह एक ऐसी ऐतिहासिक सच्चाई का नकार थी, जिसमें क्रांति एक घटना, एक इवेन्ट होती है लेकिन यह नई प्रक्रिया को जन्म देती है, जो नजरिए, सोच, तौर-तरीकों और उम्मीदों को संभव बनाती है. यह घटना, उन नई प्रक्रियाओं के लिए एक संदर्भ की तरह मौजूद होती है, लेकिन ये प्रक्रियाएं सीधे-सीधे उसकी पाबंद नहीं होतीं और वे उससे आगे जाती हैं.
 

गौर कीजिए कि किस तरह लुनाचार्स्की, क्रांति का जिक्र करते हुए मेयरहोल्ड और मायकोव्स्की के नाटक को एक ही झटके में अवैध, लेकिन बर्दाश्त किए जाने लायक घोषित कर देते हैं. मेयरहोल्ड और मायकोव्स्की जिस नजरिए का प्रतिनिधित्व करते थे, उसके लिए कला रचना, महज प्रचार का मशीनी औजार नहीं थी, हालांकि मेयरहोल्ड ने खुद थिएटर को प्रचार के एक तंत्र के रूप में विकसित करने में अहम भूमिका निभाई. पहले बोल्शेविक रंगकर्मी और निर्देशक के रूप में उन्होंने फौरी राजनीतिक जरूरतों की भरपाई करने वाले प्रयोग किए, उन्होंने रंगशाला में संदेशों वाली तख्तियां लटकाईं, अंतराल के दौरान दर्शकों पर पर्चों की बारिश की गई, नाटकों के बीच में गृह युद्ध के ताजा समाचार देने के लिए बाइक सवार मंच पर लाए जाते. लेकिन बुनियादी रूप से, मेयरहोल्ड के लिए नाटक एक ऐसा माध्यम थे, जो प्रचार की फौरी जरूरतों को पूरा करते हुए, उससे आगे जाकर एक नए इंसान के निर्माण की अवधारणा पेश करे.
 

रूसी कलाकारों के संदर्भ में यह बात नई नहीं थी. जैसा कि जॉन बर्जर ने रेखांकित किया है, उनकी रचनाओं में अक्सर ही भविष्यवाणियां और आने वाले दिनों के पूर्वाभास हुआ करते थे. यह प्रक्रिया क्रांति के कुछ समय बाद तक जारी रही, लेकिन क्रांति के बाद अपनाई जाने वाली स्मारकीय दृष्टि और कला के क्षेत्र में अकादमिक नौकरशाही ने रूसी कलाकारों से उनकी यह खूबी भी छीन ली. क्रांति के बाद के समाज में जमीनी तौर पर जनता को रोटी, जमीन और शांति चाहिए थी, और सांस्कृतिक और वैचारिक गतिविधियों को मशीनी तौर पर इस मकसद को हासिल करने के लिए काम में लगा दिया गया.
 

मेयरहोल्ड की परिकल्पनाओं में यह देखा जा सकता था कि क्रांति से जो नया उत्साह पैदा हुआ था, उसको वे नए इंसान के निर्माण की दिशा में मोड़ना चाहते थे. उनकी असहमति जिस नजरिए से थी, वह क्रांति को ही नहीं, क्रांति के बाद की हकीकत को, जिंदगी को स्मारक बना देने के करीब ले गया.
 

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स्मारकीय सोच के अपने नुकसान होते हैं. फ्रांसीसी क्रांति ने बदलाव के स्मारकों को सामूहिक या राष्ट्रीय चाहत के साथ जोड़ा, लेकिन उसने स्मारकों की बुनियादी अवधारणा में कोई बदलाव नहीं किया कि मुख्यत: उनका ताल्लुक अतीत से होता है. वे वर्तमान में अतीत के उद्धरणों की तरह लिए जाएंगे. लेकिन सोवियत संघ ने इस अवधारणा के साथ एक गहरा प्रयोग किया. यहां स्मारकों को अतीत के एक निश्चित अवधि (घटना) और स्थान (संदर्भ) के उद्धरण से बढ़ा कर वर्तमान को परिभाषित करने वाली और उसकी पहचान को गढ़ने वाली जीवंत गतिविधि में तब्दील कर दिया गया. इसने स्मारकों को, खास कर राष्ट्रीय संदर्भ में, अतीत के दायरे से वर्तमान के दायरे में लाकर रख दिया. इसके बाद यह लगभग अनिवार्य बन गया, कि वर्तमान अपनी वैधता लगातार उस स्मारकीय संदर्भ से हासिल करे, जिसे यों तो अतीत में होना था, लेकिन जिसे वर्तमान की जिम्मेदार बना दिया गया है.


1930 और 40 के दशक में चली उस बहस का पूरा सिरा इससे जुड़ता है, जिसमें कथ्य और स्वरूप को लेकर गंभीर बहस हुई और जिसमें अपने समय के कई बड़े चिंतकों, रचनाकारों और दार्शनिकों ने भाग लिया, जिसमें उस समय के ज्यादातर दिग्गज कलाकारों और चिंतकों की भागीदारी थी मसलन अर्न्स्ट ब्लॉख, थियोडोर अडोर्नो, बेर्तोल्त ब्रेख्त, वाल्टर बेंजामिन और जॉर्ज लुकाच. आइजेन्सटाइन, द्जीगा वेर्तोव. स्नानिस्लाव्स्की, मेयेरहोल्ड.  जैसा कि नामों की इस सीमित सूची से ही जाहिर है, यह बहस, सिर्फ साहित्य तक ही सीमित नहीं रही और कला, थिएटर और सिनेमा जैसी विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों तक इसका विस्तार हुआ. इन बहसों का स्वरूप हमेशा औपचारिक और परस्पर वाद-विवाद का नहीं था, लेकिन वे एक दूसरे की रचनाओं और विचारों के संदर्भ में आगे बढ़ रही थीं और उनके सरोकारों में सबसे ऊपर यही चिंता थी कि एक ऐसे भविष्य के बरअक्स बदलते हुए वर्तमान को कैसे देखा जाए, जिसका एक बाहरी खाका तो हमारे पास है लेकिन जिसकी अंदरूनी शक्ल मौजूद नहीं है.
 

मोटे तौर पर दो भिन्न वैचारिक स्थितियों की पैरवी करने वाले दो समूहों ने – जो किसी भी लिहाज से अंदरूनी तौर पर आपस में सहमत लोगों से नहीं बने थे और उनमें आपस में काफी मतभेद थे – दो अलग अलग नजरियों की पैरवी की. एक का आग्रह अतीत से एक झटके से मुक्ति के साथ एक नए नजरिए की स्थापना थी, जिसमें एकदम नए तरह की रचना और चिंतन प्रक्रिया विकसित किए जाने की जरूरत थी.  दूसरे नजरिए में, परंपरागत कला रूपों में से कुछ को चुन कर वर्तमान और इसलिए एक सीमित भविष्य के लिए एक आदर्श के रूप में पेश किया गया.
 

एवरेइनोव और मेयरहोल्ड के नाटकों के संदर्भ में कई समानताएं देखी जा सकती हैं: वे एक ही अक्तूबर क्रांति की अलग-अलग सालगिरहें मनाने के लिए खेले गए. दोनों ही राजकीय आयोजन थे. दोनों में ही जनता की भागीदारी की परिकल्पना थी. इसके बावजूद, क्रांति के प्रति दोनों का व्यवहार उनके नतीजों को इतना अलग-अलग कर देता है. जैसा कि ऊपर कहा गया है, एवरेइनोव के प्रदर्शन ने क्रांति के साथ साथ, क्रांति के बाद के जीवन को भी एक स्मारक में तब्दील कर दिया.
 

एक स्मारक समय और स्थान, जैसा कि जॉन बर्जर इशारा करते हैं, दोनों के लिए एक चुनौती होता है. एक स्मारक एक द्वंद्व को, एक तनाव को ठहराव देता है, जिनका रिश्ता उन विशिष्ट स्थितियों से होता है, जिनमें उसे निर्मित किया गया होता है. तब एक ऐसे वर्तमान में स्मारकों को कैसे देखा जाए, जहां चीजें हर पल बदल रही हैं और हर विकल्प के अपने आयाम और द्वंद्व हैं?
 

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रूसी क्रांति से ठीक सौ साल पहले, भारत के पश्चिमी हिस्से में स्थित ताकतवर पेशवा राज की सेना को हराते हुए भारतीय ब्रिटिश फौज की एक टुकड़ी ने भारत में औपनिवेशिक शासन को निर्णायक रूप में स्थापित करने में मदद दी. ब्रिटिशों की ओर से लड़ते हुए जीतने वाली यह रेजिमेंट महार लोगों से बनी थी, जो महाराष्ट्र की सबसे उत्पीड़ित जातियों में से एक से ताल्लुक रखते थे और तब की बोली में ‘अछूत’ कहे जाते थे. भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखे जाने वाले महार सैनिकों ने इतिहास में बदनाम ब्राह्मणवादी पेशवा राज को हमेशा के लिए दफ्न कर दिया. 1 जनवरी 1818 को हुई इस लड़ाई में मारे गए सैनिकों की याद में पुणे के पास कोरेगांव में एक स्मारक बनाया गया.
 

इसके बाद का इतिहास उपनिवेशवादी सत्ता की क्रूरता, बर्बरता और लूट की सदी थी. यह पूरे समाज के लिए अनेक तरह की तबाहियां लेकर आई, लेकिन साथ ही इसने सबसे उत्पीड़ित तबकों के लिए जातीय और सामुदायिक गिरफ्त को ढीला भी किया. इसने उनके लिए शिक्षा, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी के दरवाजे खोले. पिछड़ों और दलितों द्वारा अपनी मुक्ति के आधुनिक आंदोलनों की बुनियाद भी इसी के बाद पड़ी.
 

1927 की एक जनवरी को डॉ. बी.आर. आंबेडकर कोरेगांव स्मारक पर गए और इस जगह पर सालाना रैलियों का एक सिलसिला शुरू किया. किसी स्मारक के साथ आंबेडकर का यह शायद अकेला रिश्ता था. गेल ओमवेट लिखती हैं कि आंबेडकर इन रैलियों में कहा करते थे कि महारों ने ही भारत में ब्रिटिश सत्ता को स्थापित कराया था और महार ही इस सत्ता को यहां से उखाड़ सकते हैं.
 

यह वो दौर था, जब पूरे उपमहाद्वीप में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष चल रहे थे और इसको लेकर कोई विवाद नहीं था कि जनता के व्यापक हिस्से में आजादी की उम्मीदें थीं. लेकिन विवाद इसको लेकर था कि यह आजादी कैसी होगी. कोरेगांव स्मारक पर आंबेडकर का ऐलान इसकी सबसे क्रांतिकारी अभिव्यक्तियों में से एक थी. इसमें यह उम्मीद और मांग थी कि आनेवाली आजादी को प्रभुत्वशाली ब्राह्मणवादी विचारधारा और समाज की जातीय बनावट से मुक्त होना होगा. और इस मुक्ति को वो लोग हासिल करेंगे, जो इससे सबसे अधिक उत्पीड़ित हैं. इस तरह आनेवाली सच्ची आजादी की कल्पना में ब्राह्मणवाद से मुक्ति की कल्पना भी शामिल थी.
इस तरह अपनी रैलियों के जरिए, आंबेडकर ब्रिटिश सत्ता की निर्णायक विजय के उस स्मारक को स्वीकार नहीं कर रहे थे, बल्कि उसे चुनौती दे रहे थे. उन्हें कोरेगांव स्मारक के ऐतिहासिक अर्थ को ही उलट दिया था, जिसमें स्वीकार और नकार की एक जटिल प्रक्रिया काम कर रही थी. वे पेशवाओं की पराजय को स्वीकारते थे, लेकिन इसके नतीजे में स्थापित औपनिवेशिक सत्ता को वे इस योग्य नहीं मानते थे कि वह मुल्क पर शासन करे. वे उस स्मारक में निहित उस ऐतिहासिक पल को संभव बनाने वाले मानवीय श्रम और कुरबानियों को सम्मान दे रहे थे, जिनका योगदान आजादी और नए समाज के निर्माण के लिए प्रेरणा देगा.
 

आंबेडकर जो कर रहे थे, वह सिर्फ एक स्मारक को चुनौती देने से कहीं अधिक था. यह स्मारकों की एक ऐसी अवधारणा को चुनौती थी, जिसके तहत उन्हें एक द्वंद्व रहित, सपाट संदेशों के रूप में देखा जाता है. यह ऐतिहासिक पलों को रूढ़ स्मृतियों में तब्दील करने का एक विरोध था. यह एक मांग थी कि इंसान की आजादी, बराबरी और तरक्की की उम्मीदों को अतीत की दुहाई देकर परे नहीं किया जा सकता. इस तरह आंबेडकर हमारी मदद करते हैं कि हम इतिहास के निर्माण में इंसानी कोशिशों की तरफ ध्यान दें, लेकिन साथ ही इसके अंतर्विरोधों और जटिलताओं को कभी अपनी नजरों से ओझल न होने दें.
 

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बाद के दिनों में सोवियत संघ द्वारा समर्थित सामाजिक यथार्थवाद की अवधारणा पर बहस करते हुए बेर्तोल्त ब्रेख्त की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि यह अवधारणा, अतीत के स्वरूपों को आज की सामग्री की अभिव्यक्ति के लिए एक आदर्श के रूप में पेश करती है. व्यापक राजनीतिक क्षेत्र में इस धारणा का विस्तार करके देखें तो इसका अर्थ यह भी हो सकता था कि समस्याओं के समाधान अपनी अभिव्यक्ति के लिए, अतीत के स्वरूपों को चुन सकते हैं.
 

1917 और उसके बाद के समाज के लिए अतीत का मतलब दूसरी चीजों के साथ-साथ पूंजीवाद भी था.


सौम्यव्रत चौधरी जेएनयू के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड ऐस्थेटिक्स में असोसिएट प्रोफेसर हैं. रेयाजुल हक इसी स्कूल से शोध कर रहे हैं.


समयांतर  के फरवरी 2017 अंक में प्रकाशित.

नोट्स

[1] अक्सर ‘फ्रेटर्निटी ’ के लिए ‘भाईचारा’ शब्द का इस्तेमाल होता है, लेकिन यहां हम सोच-समझकर ‘मैत्री’ शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसका उपयोग डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने बुद्धा एंड हिज धम्म  में किया है. इस शब्द के इस्तेमाल की वजह यह है कि भाईचारा शब्द एक पारिवारिक रिश्ते का आभास देता है, जबकि मैत्री में दोस्ताना और बराबरी पर निहित होती है.  

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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