हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

उना की आग में रोशन भगवा उडुपी

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/22/2016 12:53:00 PM


 

आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि कैसे दलित समुदाय का एकजुट प्रतिरोध फासीवाद के खिलाफ संघर्ष की सबसे मजबूत उम्मीद है. अनुवाद: रेयाज उल हक

गुजरात में गौ रक्षकों द्वारा एक दलित परिवार को सरेआम पीटे जाने की घटना से दलितों का जो संघर्ष शुरू हुआ था, उसने देश भर के दलितों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है. किसी भी लिहाज से यह अपनी तरह की पहली घटना नहीं थी. जहां तक गाय की हत्या के शक में दलितों को सताने की बात है, तो 15 अक्तूबर 2002 को दशहरे के दिन हरियाणा के झज्झर के करीब कहीं ज्यादा खौफनाक घटना घटी थी. हिंदुत्ववादियों की एक भीड़ ने जानवरों की खाल ले जा रहे पांच दलितों को दुलीना पुलिस चौकी के करीब पीटा, उनकी आंखें निकाल लीं और उनके अंग-भंग किए और फिर उनमें आग लगा दी. अत्याचारों के रूप में पिछले साल दलितों पर हमलों के 47,000 से ज्यादा मामले आधिकारिक रूप से दर्ज किए गए, जिसका हिसाब लगाएं तो हम पाते हैं कि हर रोज दो दलित मारे जाते हैं और पांच दलित औरतों के साथ बलात्कार होता है.  उना प्रतिरोध से फर्क यह आया कि इसने जमीन के मुद्दे को उठाया, जो दलितों को मैला साफ करने और मरे हुए जानवरों को उठाने जैसे परंपरागत, अपमानजनक कामों से आजादी दिलाएगा. दूसरी अहम बात यह थी कि यह उस गुजरात में हुआ था जिसे कई बरसों से नरेंद्र मोदी द्वारा बनाए गए विकास मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा था. यही वह प्रचार था, जिसने उन्हें विकास पुरुष की छवि दी और प्रधानमंत्री के ऊंचे पद पर पहुंचाया. उना ने इस झूठ को सारी दुनिया के सामने उजागर कर दिया
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उना से प्रेरित पहला दलित आंदोलन करीब करीब उम्मीद के मुताबिक ही कर्नाटक में शुरू हुआ. यह सब सोशल मीडिया में उना पर चर्चा से शुरू हुआ, जिसके नतीजे में बेंगलुरु में बुलाई गई एक फौरी बैठक में 300 से ज्यादा नौजवान जमा हुए. उन्होंने बेंगलुरु से उडुपी तक “चलो उना” की तर्ज पर एक जुलूस निकालने का फैसला किया. उडुपी हिंदुत्व बलों का एक गढ़ है और जहां अगस्त 2016 में पिछड़ी जाति से आने वाले प्रवीण पुजारी को हिंदू जागरण वेदिके के बैनर तले विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के 18 लोगों ने पीट पीट कर मार डाला. उन्होने पुजारी को एक गाड़ी में दो गायें ले जाते हुए पाया था. दिलचस्प बात यह है कि 29 वर्षीय पुजारी खुद भाजपा सदस्य थे और उन्होंने उनसे फरियाद की थी कि वे बस अपने दोस्तों के लिए बछड़े ढोकर ले जा रहे हैं. बेशक इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, और वे संघ परिवार के घिनौने गोरक्षा अभियान के शिकार बन गए.

विंध्य के पार हिंदुत्व

कर्नाटक उस गुजरात से अच्छी तरह होड़ ले रहा है, जो पिछले दो दशकों से हिंदुत्व की जानीमानी प्रयोगशाला है. बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद हिंदुत्व बलों ने आक्रामक तरीके से विवादित मालिकाने वाली मुस्लिम संपत्तियों पर दावा जताना शुरू कर दिया. 15 अगस्त 1994 को उमा भारती ने इस तथ्य के बावजूद हुबली ईदगाह मैदान पर राष्ट्रीय झंडा फहराने की कोशिश की कि इसके मालिकाने का मुद्दा अदालत में लंबित था. 1998 में उन्होंने चिकमगलूर की पहाड़ियों में बाबा बुदन गिरी की दरगाह को चुना जो बहुत पुरानी सूफी दरगाह है. यह शैव, वैष्णव और सूफी मतों के मेल का नमूना है. सदियों से यह दरगाह एक मुस्लिम सज्जादा नशीं के परिवार के पास थी, जो दावा करते हैं कि वे सैयद शाह तनालुद्दीन आलमगरीबी के वंशज हैं, जिन्हें बीजापुर के आदिल शाह की हुकूमत के समय दरगाह का रखवाला नियुक्त किया गया था. इसके मालिकने का विवाद 1960 के दशक में शुरू हुआ, जब कर्नाटक वक्फ बोर्ड ने इसकी रखवाली को नोटिफाई किया. मुजराई विभाग ने इस पर आपत्ति जताई, जो राज्य में धार्मिक और दाय संपत्तियों व हिंदू मंदिर न्यास के प्रभारी आयुक्त हैं. अदालतों में कई दौर की सुनवाइयां भी दरगाह की रखवाली में कोई बदलाव नहीं कर पाईं. लेकिन 1990 से हिंदुओं ने एक ब्राह्मण के हाथों पूजा कराकर दत्तात्रेय जयंती मनाने की शुरुआत की, जो 1997 में तीन दिनों का एक उत्सव बन गया. अगले साल बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद ने पांच रथ यात्राएं निकालीं, जो कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों का सफर करते हुए 1 दिसंबर 1998 को बाबा बुदन गिरी पर आकर जमा हुईं. वाम और दलित कार्यकर्ताओं वाली धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने कर्नाटक कोमु सौहार्द वेदिके के तहत इसका विरोध किया और इसके खिलाफ अभियान चलाया. रथयात्रियों ने दरगाह पर भगवा झंडे लगा दिए और दरगाह के भीतर गणेश की मूर्ति रखने की कोशिश भी की, लेकिन इसे पुलिस की दखल के बाद रोक दिया गया. इस विवाद से भाजपा को भारी राजनीतिक फायदा मिला, जो यहां मई 2008 में सत्ता में आई.

भाजपा सरकार बनने के कुछ ही महीनों के भीतर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने चर्चों पर हमले किए. दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं द्वारा जबरन नैतिकता थोपने (मोरल पुलिसिंग) की घटनाएं भी हुईं, जिन्होंनें अपना ‘हिंदू’ संस्कार छोड़ने के लिए लड़कों-लड़कियों पर हमले किए. बदनाम प्रमोद मुतालिक के श्री राम सेने, हिंदू जागरण वेदिके, हिंदू जनजागृति समिति, सनातन संस्था वगैरह हिंदुत्व गिरोहों द्वारा की गई हिंसा की अनेक घटनाएं गिनाई जा सकती हैं. वे सांप्रदायिक तनाव पैदा करने और दंगे भड़काने के लिए बमों (मिसाल के लिए मई 2008 में हुबली कोर्ट में बम धमाके) और पटाखों का इस्तेमाल करते हैं. [रेंट अ रायट, तहलका, वॉल्युम 7, अंक 20, 22 मई 2010.] 2012 में उडुपी के करीब ब्रह्मावर के पास एक कार से विस्फोटक जब्त किए गए, जो एक हिंदुत्व संगठन के एक कार्यकर्ता के पास थे. वे जानबूझ कर भारत-विरोधी और हिंदू विरोधी काम करते हैं, जैसे उन्होंने सिंदागी में [द हिंदू, 11 जनवरी, 2012] और टीपू सुल्तान सर्किल में पाकिस्तानी झंडा फहराया; या विवेकानंद की प्रतिमा को बिगाड़ा या फिर एक मंदिर को गंदा किया, ताकि मुसलमानों के खिलाफ सांप्रदायिक गुस्से को हवा दी जा सके. इनमें राज्य की मिलीभगत बहुत खुली और साफ-साफ थी.

भगवा उडुपी में नीला परचम

4 अक्तूबर को चलो उडुपी रैली बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क से शुरू हुई और यह स्वत:स्फूर्त ढंग से दलितों, अल्पसंख्यकों और वाम कार्यकर्ताओं को एक साथ ले आई. अगले पांच दिनों तक यह उडुपी की तरफ बढ़ते हुए रास्ते में नीलमंगला, कुनीगल, चन्नारयपाटना, हासन, बेलुर और चिकमगलूर में हिंदुत्व बलों के फासीवादी हमलों के खिलाफ बैठकें और कार्यक्रम किए. 9 अक्तूबर को जब यह उडुपी पहुंची, वहां जोरदार बारिश ने इसका स्वागत किया. दोपहर तक बारिश रुक गई और अज्जारकड मैदान में तख्तियों और बैनरों के साथ लोग धीरे-धीरे जमा होने लगे. वहां तैयार किए गए छोटे से मंच को पोंछ कर साफ कर दिया गया, जिस पर लगा “चलो उडुपी” का गीला हो चुका बैनर चमक रहा था. मीटिंग शुरू होने तक नीले झंडे लिए हुए करीब 10,000 लोगों की भारी भीड़ भगवा उडुपी पर छा गई थी. रैली ने गुजराती दलितों के संघर्ष और दलित महिला स्वाभिमान यात्रा के साथ एकजुटता जाहिर की जिसे दलित महिलाओं ने 18-28 सितंबर के बीच राजस्थान में निकाला था. पूरे प्रतिरोध पर महिलाओं की दावेदारी की जबरदस्त छाप थी, हालांकि वे अल्पसंख्या में ही थीं और दस सदस्यों वाली कोर कमेटी  में उनकी संख्या सिर्फ तीन थी.

मीटिंग में उना संघर्ष का चेहरा बन चुके जिग्नेश मेवाणी ने भाग लिया, जिन्होंने बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित किए गए गुजरात मॉडल के खोखलेपन को उजागर किया और बताया कि कैसे 2002 दंगों के बाद, मुसलमानों के बाद दलित लोग ही पीड़ितों के अकेले सबसे बड़े समूह थे और गिरफ्तार होने वालों में भी वही थे. भाषण में उनके नारे की गूंज थी: “हमारी पसंद का खाना, जमीन हमारा अधिकार है”. जिग्नेश ने तीन सूत्रों वाले एजेंडे के साथ उडुपी लौटने का वादा किया: सभी गौरक्षकों पर पाबंदी लगाई जीए, कर्नाटक सरकार से पूछा जाए कि इसने 1969 के राजकीय भूमि अनुदान नियमों के मुताबिक इसने कितनी राजस्व भूमि दलितों और आदिवासियों की दी है और उडुपी के उन मठों में घुसा जाए जो दलितों के खिलाफ पंक्ति भेद का पालन करते हैं.

रैली के बाद हिंदुत्व ताकतों ने, जो सुधरने का नाम नहीं लेतीं, नमो युवा ब्रिगेड के बैनर तले 23 अक्तूबर को एक शुद्धिकरण का कार्यक्रम करने का फैसला किया. दिलचस्प रूप से उनके ब्रिगेड का नाम नरेंद्र मोदी के नाम पर रखा गया था, जो उना दलित आंदोलन के बाद यह मशहूर शगूफा छोड़ने को मजबूर हुए थे कि ‘अगर आप मारना चाहते हैं तो मुझे मारिए मेरे दलित भाइयों को नहीं.’ शुद्धिकरण में ब्रिगेड को पर्याय पेजावर मठ के विश्वेष तीर्थ स्वामी की मौन सहमति भी हासिल थी. विरोधाभास यह है कि एक शूद्र संत कनक के नाम पर, जिन्होंने कृष्ण को अपने लिए दीवार में एक खिड़की बनाने के लिए मजबूर किया था, रखे गए कनक नेडे में उन्होंने दावा किया कि जनता इस शुद्धिकरण समारोह को संपन्न करेगी, जिसमें दलित भी शामिल होंगे. अंतरविरोध तो बेशुमार थे: एक तरफ तो वे यह आरोप लगा रहे थे कि यह जुलूस एक वामपंथी चाल थी, तो दूसरी तरफ वे शुद्धि भी कर रहे थे! चलो उडुपी के आयोजक दलित दमनितारा स्वाभिमानी होराटा समिति ने इसका विरोध करने का फैसला किया और इसके नतीजे में पैदा हुए तनाव के मद्देनजर पुलिस ने इजाजत देने से इन्कार कर दिया और इस तरह एक टकराव को रोक दिया गया. लेकिन ऐसी खबरें हैं कि 9 अक्तूबर को ही नमो ब्रिगेड ने मठ के करीब  शुद्धिकरण कर दिया था, जिसके खिलाफ समिति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.

बदलती हुई दलित राजनीति

उना के साथ ही दलित आंदोलन में एक अच्छा बदलाव आया है. आखिरी बार दलितों ने अपनी रोज-रोटी से जुड़े किसी मुद्दे को 1953-1965 के दौरान उठाया था, जब तीन भूमि सत्याग्रह खुद बाबासाहेब आंबेडकर की प्रेरणा से हुए थे. अपने जीवन के आखिरी दौर में आंबेडकर ने महसूस किया था कि उन्होंने जो कुछ भी किया था, उससे पढ़े लिखे दलितों के बस एक छोटे से हिस्से को ही फायदा हुआ है और वे देहाती दलित जनता की व्यापक बहुसंख्या के लिए कुछ नहीं कर सके. जहां पहले दो सत्याग्रह महाराष्ट्र में 1953 और 1959 में हुए थे, वहीं आखिरी सत्याग्रह देश भर में अभूतपूर्व स्तर पर किया गया था, जिसमें एक महीने के दौरान महिलाओं और बच्चों समेत लाखों लोगों ने गिरफ्तारियां दी थीं और देहाती शासक समूहों में हलचल मचा दी थी. कांग्रेस ने इससे निबटने के लिए कोऑप्शन की मिला लेने वाली तरकीब आजमाई जिससे मौकापरस्त दलितों की चांदी हो गई और आखिरकार जिसने दलित आंदोलन का ही अंत कर दिया.


पतित हो चुके दलित नेतृत्व के खिलाफ अपने गुस्से को जाहिर करने के लिए और उसे अलग-थलग करने के लिए हाल के दशकों में दलित बार-बार अपने बूते पर सड़कों पर उतरते रहे हैं, जिसमें वे कभी नेताओं का साथ नहीं लेते. इसकी झलक 1997 में मिली जब वे मुंबई के रमाबाई नगर में 10 बेगुनाह लोगों की गोली मार कर हत्या कर देने की प्रतिक्रिया में सड़कों पर उतरे. इसके बाद यह अहम रूप से खैरलांजी में दिखा. लेकिन वे अपनी खातिर लंबे दौर के लिए एक दिशा नहीं तय कर सके. पहली बार उस अत्याचार से आगे बढ़ते हुए, जिसने उसे जन्म दिया, उना ने यह मुमकिन कर दिखाया है. यह उनके अपमान से उपजी कमजोरी को उनकी ताकत में तब्दील कर सकती है. उन्होंने सामूहिक रूप से यह फैसला किया कि वे जाति द्वारा तय किए गए धंधे जैसे मैले की सफाई, मरे हुए जानवरों को उठाने और मवेशियों की खाल उतारने जैसा काम नहीं करेंगे. उन्होंने इसके बदले में जमीन की मांग की है. यह मोदी के मठ को हिला चुका  है और इसने राज्य प्रशासन को मजबूर किया है कि यह जमीन के टुकड़ों की पैमाइश करके उन्हें सचमुच लोगों को सौंपने की शुरुआत करे. उना से प्रेरित उडुपी मार्च इसका विस्तार करके इसे ‘अपनी पसंद के खाने’ तक पर ले गया, जिसने फासीवादी सरकारों द्वारा गोमांस पर लगाई गई सनक भरी पाबंदी को चुनौती दी, जिससे बहुसंख्यक आबादी के लिए भोजन और रोजगार का संकट पैदा हो गया है. इन आंदोलनों में इसकी क्षमता है कि वे देश भर में एक व्यापक फासीवाद-विरोधी आंदोलन के रूप में फैल सकते हैं, इसके लिए देश भर के सभी प्रगतिशील लोगों को अपने खोल से बाहर आकर इनका समर्थन करना चाहिए.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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