हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

एक सुसाइड नोट को कैसे पढ़ें

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/09/2016 03:50:00 PM



रेयाज उल हक

‘उम्मीद बहुत ज्यादा है, बेशुमार उम्मीद है – लेकिन हमारे लिए नहीं.’ काफ्का पर लिखते हुए वाल्टर बिनयामिन ने काफ्का की ये पंक्तियां उद्धृत की थीं. इसके 6 साल बाद, स्पेन के पोर्ट बोऊ शहर में नाजी हुकूमत से बचकर भाग निकलने की आखिरी कोशिश में नाकाम होता दिखने और वापस जर्मन गेस्टापो के हाथों सौंप दिए जाने की आशंका के बीच मॉर्फीन की ज्यादा गोलियां लेते हुए बिनयामिन ने जो सुसाइड नोट लिखा उसमें उम्मीद से महरूम कर दिए जाने की यह पीड़ा बहुत साफ है: ‘ऐसी हालत में जिसमें बच निकलने की कोई राह नहीं है, इसको खत्म कर देने के अलावा मेरे पास कोई रास्ता नहीं है.’

हम नहीं जानते कि बिनयामिन ने अपनी आखिरी चिट्ठी में क्या लिखा था, क्योंकि वह नष्ट कर दिया गया. लेकिन हम जितना जानते हैं, वह उन हालात के बारे में बिनयामिन के पक्के अंदाजे के बारे में बताता है, जिसमें वे पिछले कुछ सालों से फंसे हुए थे. एक साल पहले वे अपने कुछ दोस्तों की मदद से नाजी यातना शिविर की कैद से छूटे थे और फ्रांस और पूरे यूरोप में नाजी जर्मनी की बढ़ती धमक के साए में बॉदलेयर और आर्केड्स प्रोजेक्ट पर अपने काम को पूरा करना चाहते थे. यह उनका सपना था. लेकिन फ्रांस पर जर्मनी के कब्जे के बाद फ्रांस में रहना मुश्किल होता जा रहा था और वे स्पेन के रास्ते अमेरिका चले जाने की कोशिश कर रहे थे. इसी क्रम में वे पोर्ट बोऊ पहुंचे थे जहां अधिकारियों ने उन्हें सूचित किया कि गैरकानूनी रूप से स्पेन में घुसने की वजह से उन्हें अगली सुबह वापस जर्मन अधिकारियों को सौंप दिया जाएगा.

बिनयामिन स्पेनी अधिकारियों और नाजियों को नहीं रोक सकते थे. लेकिन अपने लिए उस सुबह को आने से रोक सकते थे.

रोहिथ वेमुला ने भी यही किया, लेकिन वे चाहते थे कि हम उनके बाद की सुबहों के गवाह बनें: ‘गुड मॉर्निंग’. उनके आखिरी खत की शुरुआत एक ही साथ कई फैसलों और उन फैसलों में पक्के यकीन को बहुत साथ साफ सामने रखती है. ‘आप जब इस खत को पढ़ रहे होंगे, मैं आपके आसपास नहीं होऊंगा.’

यह बताता है कि रोहिथ ने किसी गुस्से या जल्दबाजी में यह फैसला नहीं लिया. न ही यह हताशा में लिया गया एक फैसला है, जिसमें फैसला लेने वाले इंसान को आगे की कोई राह नहीं दिखाई देती. बल्कि यह दिखाता है कि उनको इस फैसले की तरफ धकेल दिया गया. भारत के जातीय समाज में धकेले जाने की यह कार्रवाई ऊपर से दिखाई नहीं देती. यह जीने और मरने के बीच की पूरी मुद्दत के दौरान, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचों के भीतर चुपचाप काम करती है. नजरों से ओझल होकर. असल में ये ढांचे इसीलिए काम करते हैं कि नाइंसाफी और शोषण को छुपा कर उन्हें जिंदगी के लिए एक जरूरत के रूप में पेश किया जाए और इस तरह सवाल करनेवाली, चुनौती देने वाली और असहमत आवाजों की सारी गुंजाइश खत्म कर दी जाए. और फिर भी अगर कहीं से ऐसी आवाज उठे तो उसे इस कदर अकेला कर दिया जाए कि उसके सवाल और असहमति अपनी ताकत खो दे.

लेकिन रोहिथ को आत्महत्या की तरफ धकेले जाने की कार्रवाई एक तमाशे की तरह हम सबकी नजरों से सामने हुई. एक अनुष्ठान की तरह, सारी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए रोहिथ को यहां तक पहुंचाया गया कि वे हमारे बीच से चले जाएं. और इस अनुष्ठान में ब्राह्मणवादी फासीवादी राज्य के सारे पुर्जों ने अपनी भूमिका निभाई: केंद्रीय मंत्रियों स्मृति ईरानी और बंडारू दत्तात्रेय से लेकर विश्वविद्याल प्रशासन तक ने. इस कार्रवाई को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की उस पुलिसिया शिकायत में देख सकते हैं, जिसमें रोहिथ और उनके संगठन आंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन (एएसए) के दूसरे कार्यकर्ताओं पर एबीवीपी के हैदराबाद विश्वविद्यालय ईकाई के अध्यक्ष एन. सुशील कुमार के साथ मारपीट करने का झूठा आरोप लगाया गया था. इसे केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के उस पत्र में देख सकते हैं कि जिसमें उन्होंने एएसए पर ‘राष्ट्रविरोधी’ गतिविधियां चलाने का आरोप लगाया था. इसे केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की उन चिट्ठियों में देखा जा सकता है, जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन को एएसए के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा.

कार्रवाई हुई. रोहिथ और उनके चार साथियों को प्रशासन ने होस्टल से निकाल दिया गया और विवि के भीतर उन पर अनेक पाबंदियां लगा दी गईं. ये पाबंदियां असल में उनका सामाजिक बहिष्कार थीं, जिसके तहत होस्टल और प्रशासनिक भवन में दाखिल होने और सार्वजनिक जगहों पर उनके एक साथ जाने पर रोक लगा दी गई थी. उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी गई. ये सारी सजाएं बिना किसी जांच और सुनवाई के उन पर थोप दी गई थीं. रोहिथ की स्कॉलरशिप भी रोक दी गई, जिसने उन्हें और उनके परिवार को आर्थिक मुश्किलों में डाल दिया. दिसंबर से एएसए और दूसरे जनवादी प्रगतिशील छात्र संगठन प्रशासन के फैसले और सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे.

आत्महत्या करते वक्त रोहिथ को अहसास था कि वे अपने संघर्षरत साथियों को बीच में छोड़ कर जा रहे हैं. और इसके लिए वे बस एक आग्रह करते हैं: ‘मुझ पर गुस्सा मत होना. मैं जानता हूं आपमें से कइयों ने सचमुच मेरी देखभाल की है, मुझे प्यार किया है, और मुझसे अच्छे से पेश आए हैं.’ उन्हें इसका भी अहसास था कि वे कैसी लड़ाई लड़ रहे हैं. रोहिथ इस पूरे दौरान शायद एक कहीं बड़ी समस्या को महसूस कर रहे थे. इंसानों को एक दूसरे बांट कर, गैरबराबर और नाइंसाफी भरे रिश्तों में बांध कर रखने वाली व्यवस्था इंसान को भीतर से भी किस तरह बांट देती है और उसके अपने हिस्सों में किस तरह गैरबराबरी को भर देती है, रोहिथ इसको लेकर फिक्रमंद थे: ‘मैं अपनी आत्मा और अपनी देह के बीच बढ़ती हुई खाई को महसूस करता हूं. और मैं एक राक्षस बन गया हूं.’

लेकिन यह अलगाव रोहिथ की अपनी निजी समस्या नहीं थी. वे प्रकृति से प्यार करते थे, वे इंसानों से प्यार करते थे और उन्होंने पाया कि इंसान प्रकृति से कितने दूर कर दिए गए हैं. ‘हमारी भावनाएं भी इस्तेमाल की हुई हैं. हमारा प्यार बनावटी है. हमारा भरोसा रंगा हुआ है. हमारी मौलिकता की तस्दीक बनावटी कला के जरिए होती है. खुद को चोट पहुंचाए बिना किसी को प्यार करना सचमुच मुश्किल हो गया है.’ वे एक लेखक बनना चाहते थे, लेकिन उनका शरीर एक निश्चित सामाजिक संदर्भ में स्थित था, जहां जाति, वर्ग, पहचान के पुर्जे उनके आस-पास सीमाओं का एक बेअंत जाल बुन रही थीं. उन्हें सिर्फ शरीर समझने वाली व्यवस्था के पास उनके लिए एक बनी बनाई भूमिका थी. वे उससे पार नहीं जा सकते थे. उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे उस पर सवाल न करें, उसको चुनौती न दें.

नवउदारवादी कायदा लोगों से यह उम्मीद करता है कि वे किसी भी हाल में कामयाबी हासिल करें, वरना जिंदगी अप्रासंगिक मान ली जाती है. अगर कोई नाकाम रहता है तो इसका मतलब है कि कमी खुद उसमें है. उसकी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को दरकिनार कर दिया जाता है, जहां हरेक जन्म ‘एक जानलेना दुर्घटना’ होता है, जिसका विकास ऐसी बेघर और बेजमीन जिंदगियों में होता है, जहां बंधुआ मजदूरी है, छुआछूत है, बहिष्कार है और वंचित रखने की हजार तरकीबें हैं, जो किसी इंसान की क्षमताओं और संभावनाओं को बड़े पैमाने पर सीमित कर देती हैं. उनका जीना और सपने देखना, उनकी भावनाएं, उनका प्यार, उनकी नफरत, उनकी उम्मीदें: सब कुछ इस विकृत कर देने वाली नाइंसाफी की मशीन से गुजर कर वही नहीं रह जाते, जो होने की उम्मीद उनसे की जाती है.

इतिहास और इंसाफ से बेदखल कर दिए गए समाज में इंसान सिर्फ एक गिनती भर बन कर रह जाते हैं: ‘बस एक वोट. बस एक संख्या.’ रोहिथ महसूस करते हैं कि अपनी फौरी पहचान और सबसे करीब दिखती संभावनाओं में सीमित कर दिए जाने के बाद इंसान भी वह नहीं रह जाता जो वह असल में हो सकता था. जो असल में उसे होना चाहिए था: ‘सितारों से बनी हुई चमकदार चीज.’ एक दिमाग. रचना के काबिल, सोचने वाला, सवाल करने और जवाब देने वाला दिमाग.

इन सबके लिए फिक्र किसको है? व्यवस्था इसको बनाए हुए है. समाज की बहुसंख्या इससे बेपरवाह है. प्रतिरोध की ताकतें बंटी हुई हैं. ‘कोई जल्दी नहीं थी. लेकिन मैं हमेशा भाग रहा था. एक जिंदगी शुरू करने के लिए बेकरार.’
 

एक जिंदगी, जिसका जन्म ही ‘एक जानलेना दुर्घटना’ थी और जिसको एक ‘खालीपन’ से भर दिया गया.

अपने अंतिम दिनों में रोहिथ को ऐसा खालीपन क्यों महसूस होने लगा था? एक जहीन शोधार्थी और एक सक्रिय आंबेडकरी कार्यकर्ता के रूप में रोहिथ जो कर रहे थे, वह असल में सारी ‘बढ़ती हुई खाइयों’ और खालीपन को भरने की कोशिश थी. वे गैरबराबरी और वंचित करने वाले ढांचे के खिलाफ संघर्ष का हिस्सा था. एएसए के कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने एक ऐसे समाज की समझ हासिल की थी, जिसमें इंसान को इंसान से, शरीर को आत्मा से अलग करना नामुमकिन हो. ऐसा एक समाज उत्पीड़ित और अलग-थलग कर दी गई जनता को एकजुट करके ही बनाया जा सकता था: दलित, मुसलमान, आदिवासी और महिलाएं जो अपनी रचनात्मकता और अपनी मेहनत से इस मुल्क को गढ़ते हैं और फिर यह मुल्क उन्हें मलबे में तब्दील कर देता है. उस दूसरे समाज के लिए संघर्ष में उनकी एकजुटता जरूरी है.

एएसए ने फासीवादी भारतीय राज्य द्वारा मुसलमानों पर किए जाने वाले हमलों के खिलाफ आवाज उठाई. पिछले साल जब याकूब मेमन को अन्यायपूर्ण फांसी दी गई तो इसका विरोध करनेवालों में एएसए भी शामिल था. उसने उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में मुसलमानों पर व्यापक सांप्रदायिक हमलों पर बनी फिल्म मुजफ्फरनगर बाकी है के दिल्ली विवि में होने वाले प्रदर्शन पर एबीवीपी के हमले का भी विरोध किया. ऐसी एक राजनीति जो उत्पीड़ित अवाम को, उसकी चिंताओं और उसके संघर्षों को एकसाथ लाए, भारतीय राज्य के लिए यह खतरे की घंटी थी. जब यह राज्य और इसकी फासीवादी विचारधारा दलितों को बार बार हिंदू पहचान में बांधने की कोशिश कर रही है, एएसए दलितों की गैर हिंदू पहचान को रेखांकित कर रहा था और मुसलमानों के साथ एकता की जरूरत पर जोर दे रहा था. राज्य ऐसी एक एकजुटता को कभी भी कबूल नहीं करेगा, विश्वविद्याल जैसे एक सीमित जगह में भी नहीं, क्योंकि यह इसके फासीवादी ताकत को खोखला कर देगी. इसलिए एएसए पर हमला जरूरी बन गया था.

एएसए और ऐसे ही सैकड़ों दूसरे संघर्षरत साथियों की तरह रोहिथ भी एक विचार थे. लेकिन उनसे एक देह की तरह निबटा जाता है. उनके पास एक समझदारी है, जो इस व्यवस्था की आलोचना करती है, लेकिन इस समझदारी पर गौर करने के बजाए उन्हें अपराधी बना कर उनके शरीर को सजा दी जाती है.

रोहिथ एक दिमाग थे: उन्होंने इस दुनिया को, ‘प्यार, दर्द, जीवन, मौत’ को समझने की कोशिश की. इस दुनिया के बरअक्स एक वैकल्पिक दुनिया का उनके पास एक खाका था: सितारों से भरी हुई दुनिया. उन्हें यकीन था कि वे सितारों में सफर कर सकते हैं.

क्योंकि यह दुनिया तो परछाइयों और अंधेरे की दुनिया है.

इसको समझना मुश्किल नहीं है कि क्यों रोहिथ ने उन सबको माफ कर दिया, जिन्होंने उन्हें इस स्थिति तक पहुंचाया और उनकी हत्या कर दी. सिर्फ उनकी हत्या के जिम्मेदार लोगों को मिलने वाली कोई भी सजा रोहिथ को इंसाफ नहीं दिला सकती. वह इंसाफ जिसे बराबरी और आजादी के जरिए हासिल किया जाना है. जिसको हासिल करने के लिए इस अंधेरी दुनिया को सितारों की एक दुनिया में तब्दील करना जरूरी है.

इसलिए, वे अपने आखिरी खत को महज कुछ ‘शरीरों’ के खिलाफ आरोप पत्र बनाने के बजाए वे कोशिश करते हैं कि उस बंदोबस्त पर बात की जाए, जो उन्हें पैदा कर रही है.

अपने आखिरी सफर में बिनयामिन के पास उनकी वह पांडुलिपि थी, जिसको पूरा करना उनका सपना था. उनकी मौत के बाद वह पांडुलिपि खो गई और कभी नहीं मिल पाई.

रोहिथ का सपना कार्ल सेगान की तरह एक विज्ञान लेखक बनने का था. सेगान वह वैज्ञानिक और लेखक थे, जिन्होंने अंतरिक्ष में भेजा जानेवाले पहले भौतिक संदेश लिखा था, ताकि अंतरिक्ष की अनजान और नामालूम जगहों में अगर कोई हो तो उसे सुन और समझ सके. हम नहीं जानते कि उन्हें किसने सुना और उसका क्या जबाव दिया.

लेकिन सेगान जैसा लेखक नहीं बन पाने वाले रोहिथ ने भी एक संदेश लिखा ‘पहली बार आखिरी खत.’ अपनी इसी दुनिया के जाने-पहचाने लोगों के लिए. दोस्तों के लिए. अंधेरे से सितारों तक के सफर का संदेश.
 

उसे सुना जा रहा है. हैदराबाद से लेकर दिल्ली, मुंबई, पटना, लखनऊ और दर्जनों छोटे-बड़े शहरों कस्बों से उस आखिरी संदेश पर हामी भरते हुए बेशुमार जवाब आ रहे हैं.

सितारों की दुनिया के लिए जंग जारी है. 


(समयांतर, फरवरी 2016 में प्रकाशित) 

रोहिथ वेमुला की मौत: भाजपा के गले का फंदा

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/08/2016 02:09:00 PM




हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित छात्र और आंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन के कार्यकर्ता रोहिथ वेमुला की आत्महत्या पर आनंद तेलतुंबड़े का स्तंभ. अनुवाद: रेयाज उल हक 

रोहिथ वेमुला विज्ञान पर लिखने के लिए कार्ल सेगान बनना चाहते थे, मगर उनका यह सपना जाति की भेंट चढ़ गया. लेकिन अपनी मौत में ही यह जनता के उस सपने में तब्दील हो गया कि उन हालात का अंत कर दिया जाए, जो इस सपने के अंत की वजह बने थे. जातिवादी सत्ता प्रतिष्ठान ने रोहिथ को एक भावी डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (पीएच.डी) बनने की प्रक्रिया से बाहर कर दिया, लेकिन वे अपने सुसाइड नोट के रूप में जो मर्मस्पर्शी पंक्तियां अपने पीछे छोड़ गए हैं, वे इस बदनसीब धरती में दलित अस्तित्व के दर्शन की एक बानगी है जो बरसों तक जिंदा रहेगी. भले ही एक बेजमीन दलित मां के इस 26 साल के बेटे ने अपने दोस्तो-दुश्मनों में से किसी को भी दोषी नहीं ठहराया हो, जिसकी बुनियाद पर पर उनकी जिंदगी को निगल लेने वाले जातिवादी गिद्ध अपनी बेगुनाही का दावा पेश करेंगे, लेकिन रोहिथ की मौत ने उनके जातिवादी सोच से पैदा होने वाली आपराधिकता को उजागर कर दिया है.

उनकी मौत ने जिस तरह उनके साथी छात्रों के विरोध को जन्म दिया, जिस तरह इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल हुआ और जिस तरह की प्रतिबद्धता के साथ उनके शिक्षक उनके साथ खड़े हुए, इसने अहंकारी प्रशासन को रोहिथ के बाकी चार कॉमरेडों के निलंबन को वापस लेने पर मजबूर कर दिया है. लेकिन विद्रोह के जज्बे के साथ रोहिथ के लिए एक सच्ची नैतिक श्रद्धांजली पेश करते हुए, छात्रों ने प्रशासन के इस अटपटे प्रस्ताव को फौरन नकार दिया और अपने संघर्ष को जारी रखने के अपने संकल्प का ऐलान किया, जो आज जब मैं लिख रहा हूं 18वें दिन में दाखिल हो चुका है, और जो भूख हड़ताल का चौथा दिन भी है. उन्होंने यह संघर्ष तब तक जारी रखने का ऐलान किया है जब तक स्मृति ईरानी समेत इसके लिए जिम्मेदार लोगों को सजा नहीं दी जाती. यह सवाल अहम नहीं है कि वे सचमुच में फासीवादी हुकूमत की ताकत के आगे सचमुच टिके रह पाएंगे कि नहीं, बल्कि असल में तो इस हुकूमत के खात्मे के ही आसार दिखने लगे हैं. जिन छात्रों ने अपनी मासूमियत में पिछले चुनावों में भाजपा को जिताने में भारी योगदान दिया था, वे एकजुट होकर इसके जातिवादी और सांप्रदायिक एजेंडे को मजबूती से खारिज कर रहे हैं. देश भर के कैंपसों में भाजपा के छात्र धड़े अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाने में दिखाई दे रही है. इसके संकेत भी हैं कि यह विरोध एक मजबूत संगठनात्मक शक्ल भी अख्तियार कर सकता है. रोहिथ की मौत ने वह हासिल कर लिया है, जिसे वे अपनी जिंदगी में हासिल करने में कामयाब नहीं रहे होते.

अपराध उजागर

दलितों के खिलाफ अपराधों की दास्तान हालांकि बहुत पुरानी है, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) में मौजूदा घटना की जड़ें पुलिस में दर्ज कराई गई उस झूठी शिकायत में हैं, जिसमें एबीवीपी के एचसीयू इकाई के अध्यक्ष और इसकी राज्य समिति के सदस्य एन. सुशील कुमार ने आरोप लगाया था कि फेसबुक पर उनके द्वारा आंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन (एएसए) को ‘गुंडे’ कहने पर एएसए के तीस सदस्यों की एक भीड़ ने उनकी पिटाई करके एक माफीनामे पर उनसे दस्तखत कराया है. यह फेसबुक पोस्ट एएसए द्वारा किए गए एक प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया थी, जिसमें संगठन ने दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में मुजफ्फरनगर बाकी है फिल्म के प्रदर्शन पर एबीवीपी के हमले की निंदा की थी. उस पोस्ट में ‘मैं हिंदू हूं, मैं तुझे थप्पड़ मारूंगा’ जैसा उद्दंडता भरा बयान भी था. इस पर नाराजगी जताते हुए एएसए ने सुशील कुमार को घेर कर उससे एक लिखित माफीनामे की मांग की, जिसे उसने एक सुरक्षाकर्मी की मौजूदगी में लिख कर दे दिया. लेकिन अगली सुबह वह एक निजी अस्पताल में भर्ती हुआ, फोटो खिंचवाया और एक पुलिस शिकायत दर्ज करा दी. एचसीयू के प्रॉक्टोरियल बोर्ड ने अपनी जांच में पिटाई का कोई ‘ठोस सबूत’ नहीं पाया; डॉक्टर और उस सुरक्षाकर्मी ने भी नकारात्मक बयान दिए. लेकिन फिर भी, कुछ अदृश्य गवाहों के आधार पर, बोर्ड ने एक सेमेस्टर के लिए पांच छात्रों के निलंबन की सिफारिश कर दी. खबरों के मुताबिक इसके पीछे भाजपा विधायक रामचंद्र राव और केंद्रीय श्रम राज्य मंत्री बंडारू दत्तात्रेय का दबाव था. राव ने तब के कुलपति प्रो. आर.पी. शर्मा से मुलाकात की थी और दत्तात्रेय ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को चिट्ठी लिखी थी.

शैक्षिक संस्थानों में हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए बदनाम हो चुकीं स्मृति ईरानी को लिखी गई दत्तात्रेय की चिट्ठी आखिरकार उस मनहूस सजा की वजह बनी, जिसके नतीजे में रोहिथ की मौत हुई. 50 बरसों से आरएसएस के सदस्य, दो दशकों से प्रचारक, एक बुजुर्ग भाजपा नेता और अटल बिहारी वाजपेयी और मौजूदा मोदी सरकार में राज्य मंत्री दत्तात्रेय ने चिट्ठी में गैर जिम्मेदार तरीके से एचसीयू के खिलाफ शिकायत की थी कि यह एएसए की ‘जातिवादी, चरमपंथी और राष्ट्र विरोधी’ गतिविधियों का मूक तमाशबीन बन गया है. इस बात के समर्थन में उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि एएसए ने याकूब मेमन की फांसी के खिलाफ विरोध जताया था. और स्मृति ईरानी ने कुलपति को इस पर कार्रवाई करने के संकेत देते हुए चिट्ठी लिखी, जैसा वे पहले भी आईआईटी, मद्रास में आंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल के खिलाफ एक गुमनाम शिकायत के मामले में कर चुकी थीं. इन सिफारिशों के आधार पर, एएसए के पांच सदस्य एक सेमेस्टर के लिए निलंबित कर दिए गए. इसके बाद व्यापक विरोध भड़क उठा, जिसने कुलपति को इस फैसले को वापस लेने और एक नई समिति को जांच सौंपने पर मजबूर किया. इसके बाद प्रो. अप्पा राव नए कुलपति बने जिनका दलित छात्रों को निकालने का दो दशक पुराना इतिहास रहा है और जिनको उनका अपना ही स्टाफ खुलेआम जातिवादी कहने लगा है (द न्यूज मिनट, 22 जनवरी 2016). राव ने फौरन इन पांच छात्रों को होस्टल से निलंबित कर दिया और पुस्तकालय, होस्टल और प्रशासनिक भवन में समूह में दाखिल होने पर पाबंदी लगा दी. मनुस्मृति में अवर्णों (यानी दलितों) के लिए जो सजाएं तय की गई हैं, वे सभी प्रतीकात्मक रूप में इस सजा में निहित थीं.

घिनौनी तिकड़म

यह किसी जातिवादी पदाधिकारी के पूर्वाग्रहों का कोई छिटपुट  मामला नहीं है, न ही एचसीयू में एक दलित छात्र की आत्महत्या का यह पहला मामला है और न ही एचसीयू देश का अकेला विश्वविद्यालय है जहां ऐसी घटनाएं होती हैं. इस देश में जाति का जहर अब भी कायम है, इसको 1950 के दशक से लेकर अभी हाल के 2015 तक में हुए (एनसीएईआर द्वारा किया गया द इंडिया ह्यूमन डेवेलपमेंट सर्वे (आईएचडीएस-2)) अनेक सर्वेक्षणों ने इसे साबित किया है और पिछले कुछ वर्षों में इसकी घटनाओं में शायद इजाफा ही हुआ है, जिसकी क्रूर झलक अत्याचारों के रूप में दिखाई देती है. (राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो के मुताबिक अत्याचार 2001 के 33507 से बढ़ कर 2014 में 47,064 हो गए हैं). इसकी वजह नवउदारवाद के सामाजिक डार्विनवादी कायदे में देखी जा सकती है, जिसने कीन्सीय अर्थशास्त्र द्वारा बनाए गए कल्याणकारी आदर्श को बेदखल कर दिया है. ऊपर से भले यह जाहिर न हो, लेकिन इसी का सामाजिक नतीजा यह है कि देश में हिंदुत्व ताकतों का उभार हुआ है, जिसका सबूत 1980 के दशक में हाशिए पर पड़ी भाजपा का केंद्र में राजनीतिक ताकत का दावेदार बन जाना है. पहले जहां जाति व्यवस्था के बारे में ढंके-छुपे सुर में बातें होती थी, वहीं अब खुलेआम उन पर अकड़ के साथ बातें की जाती हैं और उन्हें जायज ठहराया जाता है. हिंदू धार्मिकता को पिछड़ेपन की निशानी माना जाता था, अब उसे अध्ययन-अध्यापन से जुड़े तबके द्वारा भी कलाई में बंधे सिंदूरी धागों और ललाट पर कुमकुम के चिह्न के साथ गर्व से दिखाया जाता है.

यह वो ब्राह्मणवादी उभार है, जो दलित अध्येताओं को आत्महत्या करने की तरफ धकेल रहा है. एचसीयू की ही बात करें तो 1970 में इसकी स्थापना से लेकर अब तक 12 दलित अध्येताओं की आत्महत्या की खबरें हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर (8) पिछले एक दशक में हुई हैं; रोहित की आत्महत्या नौवीं है. भौतिकी में पीएच.डी. कर रहे सेंथिल कुमार (2008), तेलुगु साहित्य में पीएच.डी. कर रहे आर. बलराज (2010), हाई एनर्जी मटेरियल्स में पीएच.डी. कर रहे मादरी वेंकटेश (2013) और अप्लाइड भाषाविज्ञान में स्नातकोत्तर छात्र पुल्यला राजु उनमें से कुछ नाम हैं, जो आसानी से याद आते हैं क्योंकि उनके मामलों की समितियों ने जांच की थी जिन्होंने इसकी तरफ ध्यान दिलाया था कि व्यापक जातीय भेदभाव इन आत्महत्याओं की वजह हो सकता है. लेकिन वे जातिवादी प्रशासन को संवेदनशील बना पाने में नाकाम रहे. इसके उलट, प्रशासन को इन भेदभावों को कायम रखने के लिए और बढ़ावा ही दिया गया, जाहिर है कि उन्हें इसके लिए सत्ताधारी दक्षिणपंथी ताकतों से हौसला मिलता है.

तब सवाल उठता है कि दक्षिणपंथी सरकार दलितों के प्रतीक बाबासाहेब आंबेडकर के प्रति कुछ ज्यादा ही प्यार जताते हुए दलितों को लुभाने की जो बेतहाशा कोशिशें कर रही है, उसके साथ कैसे इन सबका तालमेल बैठ सकता है? इसे समझना मुश्किल नहीं है. वह अपने हिंदुत्व के एजेंडे को पूरा करने के लिए दलितों को चाहती है लेकिन उसे रेडिकल दलित नहीं चाहिए, जो उसके खेल को बिगाड़ सकते हैं. आंबेडकर के स्मारक बना कर या फिर उनकी 125वीं जन्मशती को जोर-शोर से मना कर वह उम्मीद करती है कि यह सीधी-सादी दलित जनता को अपने लिए वोट डालने के लिए बेवकूफ बना सकती है. लेकिन रेडिकल बन चुके कुछेक रोहिथ इसके सपनों को चूर चूर कर सकते हैं. यह बदकिस्मती है; दलित यह नहीं समझते कि आंबेडकर चाहते थे कि उनके अनुयायी प्रबुद्ध दलित बनें न कि भजन गाने वाले भक्त. इसीलिए आंबेडकर ने प्राथमिक शिक्षा से ज्यादा उच्च शिक्षा पर जोर देने का जोखिम उठाया, क्योंकि उन्होंने देखा कि सिर्फ यही लोगों में आलोचनात्मक सोच को विकसित कर सकती है और प्रभुत्वशाली तत्वों के जातीय पूर्वाग्रहों के खुले खेल के खिलाफ खड़े होने की नैतिक ताकत मुहैया करा सकती है. सरकार आंबेडकर के जयकारे लगा रही है और दूसरी ओर आंबेडकर की मशाल को संभावित रूप से आगे बढ़ाने वालों को कुचल रही है. हिंदुत्व खेमे की रणनीति दलितों में से आम लोगों का ब्राह्मणवादीकरण करना और रेडिकल दलितों को बुराई की जड़ के रूप में पेश करना है. जिस तरह असहमत मुसलमान नौजवानों को आतंकवादी के रूप में पेश किया जा रहा है, दलित-आदिवासी नौजवानों पर चरमपंथी, जातिवादी और राष्ट्र-द्रोही का ठप्पा लगाया जा रहा है. भारतीय जेलें ऐसे बेगुनाह नौजवानों से भरी हुई हैं, जो देशद्रोह और गैरकानूनी गतिविधियों के संदिग्ध आरोपों में बरसों से कैद हैं. समरसता के लबादे में जाति की पट्टी आंखों पर बांधे हिंदुत्व ताकतें दलितों पर बेधड़क जुल्म करती रह सकती हैं. मौत इस जुल्म से छुटकारा पाने का प्रतीक है और जिंदगी इसको सहते जाने का.

राजनीतिक चेतावनियां

रोहिथ की मौत ने भगवा सत्ता प्रतिष्ठान की अनेक परतों वाली नाइंसाफी को उजागर किया है. पूरा छात्र समुदाय, बेशक एबीवीपी को छोड़ कर, फौरन हिंदुत्व की गुंडागर्दी की आलोचना करने के लिए सड़कों पर उतर आया. इसने दलित नेताओं के चेहरे भी उजागर किए, जो ऐसी भारी नाइंसाफी के सामने, अपने राजनीतिक आकाओं के खिलाफ मुंह खोलने तक में नाकाम रहे. उनके हाथों बेवकूफ बन कर हिंदुत्व ताकतों को वोट देने वाले दलितों की आंखें खुल रही हैं और वे धीरे धीरे अपनी गलती को देख रहे हैं. जाति भारत की प्राचीन संस्कृति है, जो हिंदुत्व ताकतों की चाहत है. दलित जिसे भेदभाव कहते हैं, वह हिंदुत्व के लिए स्वाभाविक बात है. अपनी राजनीतिक रणनीति के लिए एक तिकड़म के रूप में उन्होंने भले ही इसको छुपा कर रखा हो, लेकिन यह हर रोज अनेक तरीकों से उजागर होता रहता है. लखनऊ विश्वविद्यालय में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने रोहित की मौत को बस एक मां का नुकसान बताया और फिल्मी अंदाज में मगरमच्छ के आंसू बहाए. भारी राजनीतिक विरोध के बावजूद, उन्होंने अपने खुद के मंत्रियों की करतूतों पर चुप्पी साधे रखी, जिन्होंने रोहिथ को मौत की कगार पर पहुंचा दिया. स्मृति ईरानी ने अपनी खास नाकाबिलियत के तहत यह झूठ बोलते हुए पूरे एचसीयू की घटनाओं के लिए दलितों को ही कसूरवार ठहराने की कोशिश की कि एक दलित प्रोफेसर उस उपसमिति के अध्यक्ष थे, जिसने सजा की सिफारिश की थी. इससे उत्तेजित एचसीयू के सभी दलित शिक्षकों ने सामूहिक रूप से अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों से सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया. एक दिन पहले, एचसीयू के शिक्षकों की संस्था ने सजा को वापस लिए जाने तक कुलपति के इस आग्रह को मुखरता से ठुकरा दिया कि क्लासों को बहाल किया जाए. कुलपति को मुंह की खानी पड़ी और निलंबन को वापस लेना पड़ा. प्रधानमंत्री ने अपने कुनबे के गुनाहों को रफा-दफा करने की एक और कोशिश करते हुए पूरे मामले की जांच के लिए न्यायिक आयोग के गठन का ऐलान किया. जनता की निगाहों से ये सब चीजें छुपी हुई नहीं रहेंगी. अपनी उद्दंडता के ब्राह्मणवादी गर्व में अंधी भाजपा नहीं देख पा रही है कि रोहिथ का फंदा उसके गले में भी कसता जा रहा है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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