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बीच सफ़हे की लड़ाई

कौए का जादू-1: न्गुगी वा थ्योंगो

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/10/2016 08:00:00 AM



मशहूर केन्याई उपन्यासकार न्गुगी वा थ्योंगो के उपन्यास विज़ार्ड ऑफ द क्रो के एक अंश का अनुवाद. अनुवाद: रेयाज़ उल हक़


आबुरीरिया के आज़ाद गणतंत्र के दूसरे सुल्तान की अजीबोगरीब बीमारी के बारे में कई सारे कयास लगाए जाते थे, लेकिन उनमें पांच कयास ऐसे थे जो अक्सर लोगों की ज़ुबान पर रहते थे.

पहले कयास के मुताबिक दावा किया जाता था कि उनकी बीमारी किसी वक्त उमड़ने वाले गुस्से का नतीजा है; और वो अपनी सेहत पर इसके खतरों से इस कदर वाकिफ थे कि वो इससे निजात पाने के लिए बस यही कर सकते थे कि वे हर खाने के बाद डकारें लें, कभी कभी एक से दस तक गिनती गिनें और कभी कभी ज़ोर ज़ोर से का के की को कू का जाप करें. कोई नहीं बता सकता था कि वो खास तौर से यही आवाज़ें क्यों निकालते थे. फिर भी उन्होंने मान लिया था कि सुल्तान की बात में दम था. जिस तरह कब्ज़ के शिकार इंसान के पेट में खलबली मचाने वाली हवा को निकालना ज़रूरी होता है ताकि पेट का बोझ हल्का हो जाए, एक इंसान के भीतर के गुस्से को भी निकालना ज़रूरी होता है ताकि दिल का बोझ हल्का हो सके. लेकिन इस सुल्तान का गुस्सा जाने का नाम नहीं लेता था और यह उसके भीतर खदबदाता रहा जब तक यह उनके दिल को खा नहीं गया. माना जाता है कि  आबुरीरिया की यह कहावत यहीं से पैदा हुई कि गुस्सा, आग से भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यह एक सुल्तान की रूह की तक को खा गई.

लेकिन इस गुस्से अपना जाल कब बिछाया? जब राष्ट्रीय नज़ारे पर पहली बार सांप दिखाई दिए थे? जब धरती के कटोरे का पानी कड़वा हो गया था? या जब सुल्तान अमेरिका गए और ग्लोबल नेटवर्क न्यूज़ के मशहूर कार्यक्रम मीट द ग्लोबल माइटी में इंटरव्यू दे पाने में नाकाम रहे थे? कहा जाता है कि जब उन्हें बताया गया कि उन्हें एक मिनट के लिए भी टीवी पर नहीं दिखाया जा सकेगा, तो उन्हें अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ. वे यह तक नहीं समझ पाए कि वे लोग किस चीज़ के बारे में बात कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें मालूम था कि अपने मुल्क में वे हमेशा ही टीवी पर होते थे; उनका एक एक पल कैमरे में दर्ज होता था: चाहे वो खा रहे हों, पाखाना कर रहे हों, छींक रहे हों या अपनी नाक साफ कर रहे हों. यहां तक कि उनकी जम्हाइयां भी खबरें थीं, क्योंकि वे ऊब, थकान, भूख या प्यास, चाहे जिस भी वजह से आ रही हों, उनके बाद कोई न कोई राष्ट्रीय तमाशा अक्सर ही होता था: उनके दुश्मनों को सरेआम चौराहों पर चाबुक लगाया जाता, पूरे के पूरे गांव मिट्टी में मिला दिए जाते थे या तीर-धनुष वाले दस्ते लोगों को गोद-गोद कर मार डालते. उनकी लाशें सियारों और गिद्धों के लिए खुले में छोड़ दी जातीं.

ऐसा कहा जाता है कि वो आबुरीरिया के परिवारों में झगड़े पैदा करने और दुश्मनी सुलगाते रहने के माहिर थे, क्योंकि उन्हें दुख भरे नजारों से ही सुकून मिलता था और वे चैन की नींद सो पाते थे. लेकिन अब ऐसा लगता था कि कोई भी चीज उनके गुस्से को बुझा नहीं पाएगी.

चाहे उसकी आंच कितनी ही गहरी हो, क्या गुस्सा एक रहस्यमय बीमारी की वजह बन सकता है जिसके आगे तर्क और दवाओं के सभी उस्तादों ने हार मान ली हो? 

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ कौए का जादू-1: न्गुगी वा थ्योंगो ”

  2. By बिजूका on February 9, 2017 at 11:11 AM

    जल्दी से पूरा उपन्यास पढ़वाओ भाई....इंतज़ार है

  3. By बिजूका on February 9, 2017 at 11:12 AM

    जल्दी से पूरा उपन्यास पढ़वाओ भाई....इंतज़ार है

  4. By Dr. Divyesh Mungra on February 28, 2017 at 2:12 PM

    I'm eager to Read full translation of this novel.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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