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गुजरात में दलितों का आंदोलन: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/07/2016 02:33:00 PM



आनंद तेलतुंबड़े
अनुवाद: रेयाज उल हक


भाजपा के आदर्श राज्य गुजरात में चार दलित युवकों को हिंदुत्व के हत्यारे गिरोह द्वारा सरेआम पीटे जाने की एक शर्मनाक घटना घटी. 11 जुलाई को गौ रक्षा समिति के नाम से शिव सेना के आदमियों का एक गिरोह एक दलित परिवार के पास आया, जो गिर सोमनाथ जिले के उना तालुके में मोटा समाधियाला गांव में एक गाय की लाश से चमड़ा उतार रहे थे. उन पर गाय की हत्या करने का आरोप लगा कर गिरोह ने पूरे परिवार को पीटा और फिर चार नौजवानों को पकड़ा. उन्होंने उन्हें कमर तक नंगा किया, एक कार के पीछे बांध कर वे उन्हें घसीटते हुए उना शहर ले आए जहां ठीक एक पुलिस थाने की बगल में सबकी आंखों के सामने उन्हें पीटा गया. हमलावरों को इस बात को लेकर यकीन था कि उन पर कभी भी कार्रवाई नहीं होगी और उन्होंने अपने इस खौफनाक कारनामे का वीडियो बनाकर उसे प्रचारित किया. लेकिन उनकी यह हरकत उल्टी पड़ी और इससे दलित भड़क उठे और सड़क पर उतर पड़े. उन्होंने विरोध प्रदर्शन की एक मिसाल कायम की. हालांकि राज्य में दलितों की स्थिति के मामले में गुजरात कभी भी एक आदर्श नहीं था, लेकिन सरेआम दलितों पर ऐसा बेधड़क अत्याचार पहले कभी नहीं देखा गया था. इसने गुजरात में दलित विरोधी तत्वों द्वारा सरकार के हिंदुत्व के एजेंडे के समर्थन की ओट में अपने पूर्वाग्रहों पर बेलगाम अमल करने की हिम्मत को ही उजागर किया है.

मोदी के घड़ियाली आंसू

कहा गया कि नरेन्द्र मोदी इस हादसे के बारे में जानकर विचलित थे, मानो वे गुजरात में दलितों पर होने वाले जुल्म को कभी जानते ही न हों. उन्हें बेहतर मालूम होगा कि दलितों पर होने वाले अत्याचारों की दरों के मामले में गुजरात को सबसे ऊपर के पांच राज्यों में लगातार बने रहने का मनहूस सम्मान हासिल है. 2013 में जब आने वाले आम चुनावों और उनके प्रधान मंत्री के उम्मीदवार बनने के दौर में वाइब्रेंट गुजरात का उनका प्रचार शिखर पर पहुंचा, अनुसूचित जातियों की प्रति लाख आबादी पर अत्याचारों की संख्या 29.21 थी जो पिछले साल के आंकड़े 25.23 से बढ़ गया था, और गुजरात चौथा सबसे बदतर राज्य बन गया था. राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो (एनसीआरबी) ने इसके पहले के बरसों में प्रति लाख आबादी पर अत्याचारों की घटनाओं का गलत इस्तेमाल किया था और इसे सिर्फ 2012 में ही सुधारा गया. इसलिए एनसीआरबी की तालिकाओं में दिए गए अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों की घटनाओं की दरों को सुधार कर पूरे आंकड़े बनाना जरूरी होगा, लेकिन इससे राज्यों के बीच में गुजरात की तुलनात्मक स्थिति सुधर जाएगी, इसकी गुंजाइश कम ही है. हत्याओं और बलात्कारों जैसे बड़े अत्याचारों के वर्ग में भी गुजरात ने बाकी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है. तालिका एक में भारत के मुख्य राज्यों के लिए 2012 और 2013 के लिए इन अत्याचारों की दरें दी गई हैं, ताकि यह दिखाया जा सके कि कैसे गुजरात दलितों के खिलाफ अपराधों के मामले में सबसे ऊपर के कुछ राज्यों में जगह बनाता है.



तालिका साफ-साफ दिखाती है कि हत्याओं की दरों के मामले में 2012 में सिर्फ दो ही राज्य, उत्तर प्रदेश (0.57) और मध्य प्रदेश (0.78) गुजरात से आगे थे और 2013 में गुजरात साफ तौर पर उनका सिरमौर बन गया. असल में यह 2012 में भी करीब-करीब उत्तर प्रदेश के बराबर ठहरता है, जो अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों के लिए इतना बदनाम राज्य रहा है. बलात्कारों की दर के मामले में 2012 में पांच राज्य छत्तीसगढ़ (3.86), हरियाणा (2.79), केरल (6.34), मध्य प्रदेश (6.75) और राजस्थान (3.44) गुजरात से आगे रहे हैं. 2013 में गुजरात खुद को ऊपर ले गया और छत्तीसगढ़ को पीछे छोड़ते हुए पांचवें स्थान पर पहुंच गया. यह बस हरियाणा (5.45), केरल (7.36), मध्य प्रदेश (7.31) और राजस्थान (5.01) से ही पीछे था.

सितंबर 2012 में गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के एक छोटे से कस्बे थानगढ़ में मोदी की पुलिस ने लगातार दो दिनों (22 और 23 सितंबर) में तीन दलित नौजवानों को गोली मार कर हत्या कर दी, लेकिन मोदी एक शब्द भी नहीं बोले जबकि वे उस जगह से महज 17 किमी दूर विवेकानंद यूथ विकास यात्रा का नेतृत्व कर रहे थे. पहले दिन एक छोटे से झगड़े में एक दलित नौजवान को पीटने वाले भारवाड़ों के खिलाफ विरोध कर रहे दलितों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं. पुलिस फायरिंग में एक सात साल का लड़का पंकज सुमरा गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसकी मौत बाद में राजकोट अस्पताल में हो गई. मौत की खबर ने दलितों में नाराजगी भड़का दी जो इस मौत के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की मांग के साथ सड़कों पर उतर पड़े. अगले दिन, पुलिस ने आंदोलनकारी दलितों पर फिर से गोलियां चलाईं और तीन दलित नौजवानों को घायल कर दिया, जिनमें से दो मेहुल राठौड़ (17) और प्रकाश परमार (26) राजकोट सिविल अस्पताल में मर गए. 2012 के राज्य विधानसभा चुनावों के ऐन पहले हुई इन हत्याओं से राज्य भर में सदमे की लहर दौड़ गई और चार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई गईं. जांच सीआईडी (अपराध) को सौंप दी गई. लेकिन पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआरों के बावजूद सिर्फ एक मामले में ही आरोपपत्र (चार्ज शीट) दायर की गई और एक आरोपित बीसी सोलंकी को तो गिरफ्तार तक नहीं किया गया.

जमा हुआ गुस्सा

गुजरात में अपने दलित समुदाय के सामंती दमन का लंबा इतिहास रहा है. राज्य का दलित समुदाय राष्ट्रीय औसत 16.6 की तुलना में छोटा और आबादी का महज 7.1 फीसदी है और यह मुख्यत: राजनीतिक रूप से निष्क्रिय रहा है. हालिया इतिहास में, 1970 के दशक में दलित पैंथर्स की झलक के बाद, उन्हें 1981 के आरक्षण विरोधी दंगों ने गांधीवादी नींद से झटके से जगाया. पहली बार राज्य भर में आंबेडकर जयंतियों के उत्सव का दौर शुरू हुआ. लेकिन यह जागना बहुत थोड़ी देर का ही साबित हुआ. जब भाजपा ने दलितों की चुनावी अहमियत को महसूस किया और उन्हें लुभाना शुरू किया, वे आसानी से उनकी बातों में आ गए और 1986 में इसके जगन्नाथ रथ जुलूसों में बढ़-चढ़ कर भागीदारी करने लगे और आगे चल कर उन्होंने खास कर 2002 में गोधरा के बाद मुसलमानों के कत्लेआम के दौरान इसका कारिंदा बनना कबूल कर लिया. लेकिन जमीन पर उनके लिए कुछ भी नहीं बदला. दलित-विरोधी सिविल सोसायटी की हिमायत से राज्य की खुली या छुपी मिलीभगत के साथ भेदभाव, अपमान, शोषण और अत्याचार बेलगाम तरीके से बढ़ते रहे.

हाल के ही एक अध्ययन ने दिखाया है कि गुजरात में चार जिलों में होने वाले अत्याचार के सभी मामलों में से 36.6 फीसदी को अत्याचार निवारण अधिनियम (एट्रॉसिटी एक्ट) के तहत दर्ज नहीं किया गया था और जहां इस एक्ट को लागू भी किया गया था, वहां भी 84.4 फीसदी मामलों में इसको गलत प्रावधानों के साथ दर्ज किया गया था, जिससे मामलों में हिंसा की गहनता छुप गई थी.[1]  इसके पहले अहमदाबाद स्थित काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस ने 1 अप्रैल 1995 से एक दशक के भीतर इस एक्ट के तहत राज्य के 16 जिलों में स्थापित स्पेशल एट्रॉसिटी कोर्ट्स में दिए गए 400 फैसलों का अध्ययन किया और पाया कि पुलिस द्वारा नियमों के निरंकुश उल्लंघन ने मुकदमे को कमजोर किया. फिर न्यायपालिका ने अपने पूर्वाग्रहों से भी इस एक्ट को नकारा बनाने में योगदान किया.[2]  कोई हैरानी नहीं है कि गुजरात में अत्याचार के मामलों में कसूर साबित होने की दर 10 बरसों में अनुसूचित जातियों-जनजातियों के मामले में भारतीय औसत से छह गुना कम है. 2014 में (जो सबसे ताजा उपलब्ध आंकड़े हैं) अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों में से सिर्फ 3.4 फीसदी में ही आखिर में कसूर साबित हो पाया. जबकि इन्हीं अपराधों में कसूर साबित होने की राष्ट्रीय दर 28.8 फीसदी है यानी देश भर में हरेक आठ अत्याचार में एक में कसूर साबित होता है. हैरानी की बात नहीं है कि राज्य में छुआछूत का चलन धड़ल्ले से जारी है. 2007 से 2010 के दौरान गुजरात के दलितों के बीच काम करने वाले एक संगठन नवसर्जन ट्रस्ट द्वारा रॉबर्ट ई. केनेडी सेंर फॉर जस्टिस एंड ह्यूमन राइट्स के साथ मिल कर किए गए “अंडरस्टैंडिंग अनटचेबिलिटी: अ कॉम्प्रीहेन्सिव स्टडी ऑफ प्रैक्टिसेज़ एंड कन्डीशंस इन 1,589 विलेजेज़” नाम के एक अध्ययन ने ग्रामीण गुजरात में छुआछूत के चलन की व्यापक घटनाओं को उजागर किया.[3]  अपने आस पास समृद्धि के समंदर में अपने अंधेरे भविष्य को देखते हुए दलितों की नई पीढ़ी इसको कबूल नहीं करेगी. यह भाजपा की मीठी-मीठी बातों के नीचे छुपाई हुई दलित-विरोधी नीतियों की वजह से जमा होता आया गुस्सा था जो राज्य में दलितों के सहज रूप से भड़क उठने की शक्ल में सामने आया.

भाजपा की हत्यारी गाय

इस अत्याचार और उसके बाद के गुस्से की जड़ में स्वयंभू गिरोहों का यह शक था कि गाय की हत्या की गई थी. इन गिरोहों को सत्ताधारी भाजपा के हालिया उकसावों से सीधी ताकत मिलती है. इस घटना ने हरियाणा के झज्झर की घटना की याद दिला दी जहां 15 अक्तूबर 2002 को पांच दलितों की गाय की हत्या के ऐसे ही शक में दुलीना में पुलिस थाने के सामने हिंदुत्व भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या कर दी गई और फिर उन्हें जला दिया गया. पीटे जाने के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाए पुलिस ने पीड़ितों के ही खिलाफ प्रिवेन्शन ऑफ काऊ स्लॉटर एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया! केस तभी वापस हुआ जब पोस्ट मार्टम ने यह उजागर किया कि गाय पीटे जाने की घटना से 24 घंटे पहले मर चुकी थी. सिर्फ तब जाकर हिचकते हुए 32 गांववालों के ऊपर हत्या और हत्या की कोशिश के दो मामले दर्ज किए गए. गिरफ्तारी के फौरन बाद जनवरी में उन सभी को जमानत मिल गई जबकि उन पर कठोर धाराओं के तहत आरोप लगे थे: हत्या, जानलेवा हथियार के साथ दंगा करने, आग और विस्फोटक पदार्थों के जरिए नुकसान पहुंचाने के लिए (435) और एसी और एसटी एक्ट के तहत. बाहर आने के बाद उन्होंने सरेआम बढ़-चढ़ कर कहा कि वे फिर से ऐसा करने से नहीं हिचकेंगे. हिंदुत्व संगठनों ने इसे सार्वजनिक रूप से जायज ठहराया. 28 सितंबर 2015 को ऐसी ही एक हत्यारी भीड़ ने इस अफवाह के बाद उत्तर प्रदेश में दादरी के करीब बिसाहड़ा गांव में एक मुसलमान परिवार पर हमला किया कि उन्होंने गोमांस रखा हुआ है और उसे खा रहे हैं. उन्होंने 50 साल के मुहम्मद अखलाक पीट-पीट कर मार डाला और उनके बेटे दानिश को गंभीर रूप से जख्मी कर दिया. हत्यारों को तो कुछ नहीं हुआ है लेकिन सूरजपुर में स्थानीय अदालत के निर्देश पर पुलिस द्वारा मुहम्मद अखलाक के परिवार के खिलाफ गाय की हत्या करने का एक केस दर्ज कर लिया गया है!

सरकार ने बेशर्मी से संविधान के भाग चार में दिए गए राज्य के नीति निर्देशक तत्वों की अनदेखी जारी रखी है, जो शासन के बुनियादी उसूल होने चाहिए थे. लेकिन यही सरकार जनता और अर्थव्यवस्था की व्यापक बहुसंख्या के लिए नुकसानदेह होने की वजह से गाय के पूरे परिवार (गोवंश) की हत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले एक अनुच्छेद की ओट लेती है. आनेवाले बरसों में यह सनक पक्के तौर पर देश के लिए अकेली सबसे बड़ी तबाही बनने जा रही है, लेकिन अभी तो यह मुसलमानों और दलितों की जान लेने वाली हत्यारा बन गई है, जो कारोबारी तौर पर गाय के परिवार की हत्या से जुड़े हैं और उस पर निर्भर हैं.

भाजपा इसके नतीजों की अनदेखी कर सकती है, लेकिन ऐसा करके वह खुद को तबाही के रास्ते पर ही ले जाएगी.

नोट्स

[1] http://navsarjan.org/navsarjan/status-of-dalits-in-gujarat/
[2] https://www.sabrangindia.in/tags/council-social-justice.
[3] http://navsarjan.org/Documents/Untouchability_Report_FINAL_Complete.pdf.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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