हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मौजूदा छात्र संघर्षों पर आनंद तेलतुंबड़े से एक बातचीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/08/2016 03:50:00 PM




जनवादी अधिकार कार्यकर्ता और चिंतक आनंद तेलतुंबड़े ने यह इंटरव्यू हाल ही में मलयालम साप्ताहिक माध्यमम को दिया था.  अनुवाद: रेयाज उल हक
 

सवाल: आपने अक्तूबर 2015 के ईपीडब्ल्यू में अपने लेख में इसे सटीक तरीके से दर्ज किया है कि डॉ. बीआर आंबेडकर की जिंदगी के मुख्य मकसद जाति के खात्मे को भुला कर उनके स्मारक खड़े करने के क्या खतरे हैं. हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहिथ वेमुला का हादसा और फिर देश भर में उसके बाद हुई घटनाओं ने बिना किसी संदेह के इसे साबित कर दिया कि जाति का जो खात्मा आंबेडकर के विचारों का मर्म था, वो अभी भी अधूरा सपना बना हुआ है.

जवाब: सचमुच ऐसा ही है. जबकि आंबेडकर ने साफ साफ जातियों के उन्मूलन को लक्ष्य के रूप में देखा था; उनकी कार्यनीति (टैक्टिक्स) प्रतिनिधित्व पर निर्भर थी. इन दोनों के बीच जो तीखा विरोधाभास है उसे नरम करने के लिए मैं जानबूझ कर इसे
कार्यनीति कह रहा हूं. शुरू से ही उन्होंने देखा और शायद उन्हें अपने खुद के अनुभवों से हौसला भी मिला था कि अगर कुछ दलितों को कानून बनानेवाली संस्थाओं (विधायिका) में भेजा गया तो वे दलित जनता के हितों का खयाल रखेंगे. इस नजरिए के साथ, उन्होंने दलितों के लिए उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए संघर्ष किया. यह अलग बात है कि इस जीत को गांधी की ब्लैकमेलिंग की रणनीति ने नाकाम कर दिया, जिसने उन्हें पूना समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर कर दिया. लेकिन इसी पूना समझौते ने जैसे शैक्षणिक संस्थाओं और सार्वजनिक रोजगारों जैसे दूसरे आरक्षणों की राह खोल दी. शुरू शुरू में वे तरजीही नीतियां बने रहे (जिसमें कुछ लोगों को आगे बढ़ाने में तरजीह दी जाती थी) क्योंकि ऐसा माना गया कि आरक्षण को संस्थागत बनाने के लिहाज से उतने दलित नहीं थे. लेकिन जब आंबेडकर वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य बने, तो उन्होंने एक सीधा-सा नोट लिखा, जिसे वायसराय ने मंजूर कर लिया और इस तरह 1943 में एक कोटा सिस्टम लागू हुआ. मैं यह दलील दे सकता हूं कि इन दोनों में कोई विराधाभास नहीं था, क्योंकि जातियों को उनके हिंदू कुनबे से अलग कर दिया गया था और अब वे ‘अनुसूचित जातियों’ की एक प्रशासनिक श्रेणी बन गई थीं. बदकिस्मती से, नतीजा इसी अर्थ में सामने नहीं आया. उपनिवेशवाद के बाद के भारत में, जिन देशी अभिजातों के हाथ में सत्ता की बागडोर आई, उनके पास ब्राह्मणवादी चालाकी और उसके भीतर औपनिवेशिक मालिकों से सीखी गई तरकीबें थीं और वे आसानी से इस बात को यकीनी बना सके कि संविधान में प्रतिष्ठित जातियां और धर्म (एक दूसरा कारक) अवाम को बांटने का एक हथियार बने रहें. जातियों पर आधारित आरक्षण जातियों के उन्मूलन का विरोधाभासी बन गया, क्योंकि इसने ऊपर जाने की उम्मीद कर रहे दलितों के एक तबके में निहित स्वार्थ विकसित कर दिए, और फिर यह अवाम के लिए एक आदर्श (रोल मॉडल) बन गया. इसमें मदद किया चुनाव की फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट की व्यवस्था ने, जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को प्रतिनिधि चुन लिया जाता है. यह असल में भारत जैसे एक देश के लिए सबसे प्रतिकूल व्यवस्था है, जो निराशाजनक रूप से जातियों, समुदायों, भाषाओं, जातीयताओं वगैरह में बंटा हुआ था और यहां इस व्यवस्था को लोकतांत्रिक शासन के एक औजार के रूप में अपनाया गया. इन दोनों का मेल जातियों के खात्मे के खिलाफ एक खतरनाक मोर्चाबंदी बन गया.

हैदराबाद विश्वविद्यालय में हुई घटनाओं और रोहिथ की बदकिस्मत खुदकुशी ने शासक वर्गों के रवैए को साफ-साफ उजागर किया है, जो दलितों से पिछले किसी भी समय के मुकाबले सबसे ज्यादा प्यार दिखा रहे हैं. और जब वे यह सब कर रहे हैं और सब कुछ को दांव पर लगा कर आंबेडकर को एक प्रतीक के रूप में स्थापित कर रहे हैं, वहीं वे रेडिकल दलित नजरिए के उभरने को बर्दाश्त नहीं करेंगे. वो उन्हें उग्रवादी, राष्ट्र-विरोधी वगैरह कह कर बदनाम करेंगे, और यह इसके लिए काफी है कि दलित उन्हें नकार दें. दलित जनता ने, राज्य के छिपे हुए समर्थन से अपने मध्य वर्ग के असर में आंबेडकर का सरलीकरण कर दिया है. इस सरलीकृत आंबेडकर की एक धारणा यह है कि वे किसी भी तरह के उग्रवाद और रेडिकलिज्म के खिलाफ थे. इस धारणा के साथ वे आसानी से उन दलित नौजवानों को खारिज कर देंगे, जो रेडिकल आवाजें उठाते हैं. रोहिथ की मौत ने असल में भावनाओं को झकझोरा, लेकिन वो अभी भी दलितों में अपना रेडिकल संदेश नहीं जगा पाया जो जातियों के खात्मे की बात करता है. सभी छात्र संगठनों से मिले भारी समर्थन के बावजूद, जिसने एक वक्त पर एबीवीपी को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया था, इसको रेडिकल संभावनाओं के बिना बस पहचान (आइडेंटिटी) के आधार पर ही उठाया जा रहा है.

सवाल: रोहिथ वेमुला के हादसे और जेएनयू में संघर्ष ने कम से कम कैंपसों में वामपंथ और आंबेडकरी आंदोलनों के बीच गठबंधन की संभावनाओं को पेश किया है. क्या आप सोचते हैं कि दोनों धाराओं के बीच बनी इस नई नई करीबी को भाजपा और संघ परिवार की सांप्रदायिकता को कारगर तरीके से चुनौती देने और उसका मुकाबला करने के लिए एक संगठित शक्ल दी जा सकती है.

जवाब: बेशक, मैं सोचता हूं कि हमारे कैंपसों के नौजवान ही वो अकेली ताकत हो सकते हैं जो उत्पीड़ित अवाम की राजनीति की विचारधारात्मक गड़बड़ियों को साफ कर सकते हैं. हमारे कैंपसों से आने वाले संकेत खासे हौसला बढ़ाने वाले हैं. हैदराबाद विवि का मामला भाजपा की रणनीति का हिस्सा था कि राष्ट्रवाद-विरोध, उग्रवाद वगैरह के हौवे को खड़ा करके छात्रों को दो अलग अलग खेमों में बांट दिया जाए. उन्होंने हैदराबाद विवि को चुना क्योंकि यह दलित छात्रों की रेडिकल आवाजों का केंद्र बन गया था. अगर वो यहां कामयाब रहे तो उनके छात्र संगठन के लिए दूसरे कैंपसों में और खास कर दलित छात्रों के बीच जगह बनाना बहुत आसान हो जाएगा. लेकिन उनकी बदकिस्मती से, रोहिथ की बदकिस्मत मौत ने पूरे मामले को पलट दिया. फिर सावधानी बरतते हुए उन्होंने जेएनयू को चुना और उन्होंने ऐसा ही मामला वहां गढ़ा, लेकिन इससे दलित पहलू को बाहर रखा. वहां यह सिर्फ राष्ट्रवाद-विरोध, देशभक्ति वगैरह का मामला था. लेकिन इसने वहां कन्हैया पैदा कर दिया. जेएनयू छात्रों ने जो सबसे अच्छी बात की, वो ये थी कि उन्होंने इसे रोहिथ के संघर्ष के साथ जोड़ दिया. इसने विचारधारात्मक बंटवारों (मैं इसे गड़बड़झाला कहूंगा) को दबा दिया और संघर्ष को उन सवालों पर टिकाया, जिनका सामना आज जनता कर रही है. ऐसा करने के लिए मैं कन्हैया को पूरे अंक दूंगा क्योंकि मैं सोचता हूं कि जनसंघर्षों का आज यही तरीका होना चाहिए. मार्क्स और आंबेडकर में से कोई भी (किसी और को तो छोड़ ही दीजिए) आपको इन शासक वर्गों से लड़ने के सारे साधन नहीं दे सकता है, जिनका जानकारियों और आधुनिक तकनीक से लैस राज्य
अभूतपूर्व ढंग से ताकतवर है. हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, उसे न तो मार्क्स ही पहचान पाएंगे और न आंबेडकर और इसलिए हमें अपने संघर्षों के लिए अपनी रणनीतियां खुद बनानी होंगी. मार्क्स, आंबेडकर और उनके जैसे अनेक महान लोग हमें राह दिखा सकते हैं, हमें प्रेरणा दे सकते हैं लेकिन हमें अपनी लड़ाइयों के लिए बने बनाए औजार और साज-सामान नहीं मुहैया करा सकते.

इस प्रक्रिया में मुश्किलें आ सकती हैं. मिसाल के लिए, जब हैदराबाद विवि में सभी छात्र संगठन एक साथ आए, तो मैंने वहां छात्रों के कुछ नेतृत्वकारी लोगों को सलाह दी थी कि एबीवीपी को अलग करके इस एकता को एक संगठनात्मक शक्ल दें. यह हिंदुत्व या सांप्रदायिकता के खिलाफ मोर्चा या ऐसा ही कोई नाम हो सकता था. यह बड़ी आसानी से हो सकता था, जब हैदराबाद विवि में लोहा गर्म था और फिर उसको आसानी से दूसरी जगह अपनाया जा सकता था. लेकिन बदकिस्मती से ऐसा नहीं हो पाया. मैंने अपने तरीके से इसमें कोशिश की, लेकिन वह कारगर नहीं रही. इसकी जगह पर ‘जस्टिस टू रोहिथ’ के लिए बनाई गईं ज्वाइंट एक्शन कमेटियां धीरे धीरे और भीतर ही भीतर पहचान (आइडेंटिटी) की पुरानी लीक पर चलने लगीं जिन्होंने प्रतिक्रियावादी तत्वों का हौसला बढ़ाया कि वे कन्हैया को भूमिहार के रूप में देखें. मौजूदा हालात में इससे ज्यादा बदकिस्मत बात कुछ नहीं हो सकती है. लेकिन अभी भी मुझे इसका भरोसा है कि छात्र इन मुश्किलों को पार कर लेंगे. इस राह में अनेक और बाधाएं हो सकती हैं. मिसाल के लिए, शासक वर्ग ने जेएनयू के छात्रों पर कड़ी सजाएं थोप दी हैं, जिसके खिलाफ वे भूख हड़ताल पर हैं. उन्हें इसका अहसास होगा कि आने वाले कल में क्या करना बेहतर होगा. मुझे यकीन है कि वे भाजपा/एबीवीपी की मिली जुली शैतानी साजिशों को हरा देंगे. जहां तक आंबेडकर और मार्क्स के बीच अनोखी एकता की बात है, जेएनयू के छात्र इस मामले में एकदम सही रास्ते पर हैं. उन्होंने जो तरीका अपनाया है, वो मायावतियों और उनके चेलों की जातिवादी दलीलों को अप्रासंगिक बना देगा. मुझे इसको लेकर खासी उम्मीद है कि ये लड़के और लड़कियां वह करेंगे जो अब तक नहीं किया गया है. क्योंकि अगर वे नाकाम रहे, तो भारत के लिए उम्मीद ही खत्म हो जाएगी.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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