हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

दो माह बाद: जेएनयू के मामले पर एक बारीक नजर

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/10/2016 05:27:00 PM


दो महीने के बाद हाशिया लौट आया है. इस मुद्दत में जेएनयू और देश में काफी कुछ हुआ है और इन सब पर काफी कुछ लिखा और पढ़ा गया. हाशिया में उन पर गौर करने की कोशिश की जाएगी. इसी सिलसिले में यह पहली पोस्ट, जिसमें सौम्यब्रत चौधरी बता रहे हैं कि दो महीने पहले 9 फरवरी को जेएनयू में हुए आयोजन में कथित रूप से बोले गए शब्दों के मायने क्या हैं और उनका हमारी राष्ट्रीय समझदारी पर क्या असर पड़ा है. वे फिलहाल स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड ऐस्थेटिक्स, जेएनयू में पढ़ा रहे हैं. उन्होंने इसके पहले सीएसएसएससी, कोलकाता में पढ़ाया है और वे सीएसडीएस, दिल्ली और आईआईएएस, शिमला में फेलो रहे हैं. 2013 में आई उनकी किताब थिएटर, नंबर, इवेंट: थ्री स्टडीज ऑन द रिलेशनशिप ऑफ सॉवरेंटी, पावर एंड ट्रुथ राष्ट्रों की संप्रभुता और रंगमंच के साथ इसके रिश्ते पर गौर करती है. उनका हालिया काम बाबासाहेब आंबेडकर और जाति के प्रश्न पर है. मूल लेख: काफिला. अनुवाद: रेयाज उल हक.

पोलोनियस: ‘आप क्या पढ़ रहे हैं जहांपनाह?’
हैमलेट (नई दिल्ली, 2016): ‘भारत, पाकिस्तान, सुरक्षा, संप्रभुता, राष्ट्र, राष्ट्र-विरोधी...शब्द, शब्द, शब्द.’


सिगमंड फ्रायड के मुताबिक, जब हम सपनों में होते हैं और जब हम दिमागी बीमारी की वजह से होने वाले वहम से गुजर रहे होते हैं तो हम शब्दों को तस्वीरों और चीजों के रूप में लेने लगते हैं. इन हालात में एक शब्द का जो मतलब होता है, वह उस शब्द की शक्ल ले लेता है और हमें ऐसा लगने लगता है कि हम उसके भौतिक प्रभाव को, उससे लगने वाली चोट को महसूस कर रहे हों. तब यह बात हमारी समझ से परे चली जाती है कि एक शब्द बाहरी दुनिया की किसी चीज या किसी विचार का एक संदर्भ है या एक उपमा के रूप में या एक छुपी हुई तुलना या बिंब के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. हम शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहने के एक खास अंदाज (रेटरिक) में कही जा रही बात को भी कबूल नहीं कर पाते, जिसका मकसद हमें अपनी बात मनवाना, समझाना, किसी बात को खारिज करके नई बात कहना या अपमानित करना है. अगर कोई भी इंसान ऐसी बातचीत करना चाहता है तो उसकी ऐसी हरेक बात में हम महसूस करते हैं कि हम उसके शब्दों से शारीरिक, भावनात्मक और इसके नतीजे में मानसिक रूप से आहत हैं मानों वे शब्द कोई धक्का या हमला हों.

इसलिए, इसके जवाब में हम पलट कर बोलने वाले को अपनी बात मनवाने की कोशिश नहीं करते, उसे समझाते नहीं, उसकी बात को खारिज नहीं करते और न ही उसका अपमान करते हैं, बल्कि हम उसे शाप देते हैं (इस मुकाम पर यह किसी मानीखेज बातचीत की सबसे ऊपरी सीमा है), पीटते हैं, बोलने वाले का गला पकड़ लेते हैं, अगर हमारे पास छुरी या बंदूक में से कोई चीज हुई तो उसे उठा लेते हैं – या फिर हम घबरा जाते हैं, रोते हैं, अपना सिर अपने हाथ में ले लेते हैं और हाय-तौबा मचाने लगते हैं. अब सचमुच की दिमागी बीमारी से होने वाले वहम की हालत में इसकी कम ही संभावना है कि हम इस बात के काबिल हो पाएंगे कि एक खास कानून या कानून के एक खास प्रावधान का अपने पक्ष में इस्तेमाल करें और जाकर पुलिस में शिकायत कर दें. ऐसी हालत में हम अपनी हरकतों को वाजिब ठहराने के लिए एक जोरदार किस्म की भाषाई तस्वीर का इस्तेमाल कर पाने के काबिल नहीं होते. ‘हमने जो किया, उसके सिवाय हमारे पास कोई और रास्ता नहीं था, क्योंकि उन्होंने हमारी भारत माता का अपमान किया है.’ सचमुच की दिमागी बीमारी की हालत में, इसकी संभावना ही ज्यादा है कि हमें ही कानून की गिरफ्त में ले लिया जाए.

इसलिए सरकार, स्मृति ईरानी और राजनाथ सिंह, दूसरे भाजपा मंत्री, आरएसएस के विचारक, पटियाला हाउस में वकीलों के लबादे में आए गुंडे और मीडिया एंकर असल में दिमागी रूप से बीमार नहीं हैं, भले ही वे दिखते जैसे भी हों. हालांकि जो दिख रहा है, वो खासा साफ है और उस पर थोड़ा गौर किया जाना जरूरी है. उसे मोटे तौर पर घटनाओं और दलीलों की यह तरतीब दी जा सकती है: जेएनयू में छात्रों का एक समूह अफजल गुरु की फांसी की बरसी पर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का ऐलान करता है जिसमें गीत, कविताएं और भाषण शामिल थे. पोस्टर में वे अपने नामों के पहले संक्षिप्त हिस्से का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वे कौन लोग हैं यह अभी बहुत कम अहमियत रखता है. पहचानों में दिलचस्पी सिर्फ तभी जाकर पैदा है जब उन्हें बहुत साफ साफ तरीके से छुपाया जाए या फिर उन्हें नाटकीय तौर पर उभारा जाए. छात्रों ने इनमें से कोई तरीका नहीं अपनाया था, वे ‘सामान्य’ हैं. फिर कार्यक्रम होता है और बहुत जोखिम न लेते हुए यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी मौके पर या कुछ मौकों पर कुछ नारे लगाए और सुने गए. क्या अभी इस मौके पर नारे लगाने वालों की पहचानें अहमियत रखती हैं? असल में नहीं, क्योंकि जिन्होंने भी नारे लगाए, उन्होंने न तो अपनी पहचान को छुपाने की कोशिश की और न ही उन्होंने उन्हें खास तौर से उभार कर पेश किया. उन्होंने जो कुछ भी किया, खुले तौर पर किया, और ऐसा करते हुए उन्होंने वहां मौजूद बाकी लोगों से खुद को अलग नहीं किया. इसलिए बाद में जब एक खास मंशा रखने वाली ताकतें व्यक्तियों और समूहों की पहचान करना चाहेंगी, तो यह दावा करते हुए कि कौन से नारे किन लोगों ने लगाए थे, उन्हें नारे लगाती हुई आवाजों की ऊंचाई और निचाई के साथ सबूतों की कमी का सामना करना होगा.

हालांकि उन नारों में जो बात कही गई थी, उसमें थोड़ी देर के लिए कुछ दम है और उसकी अहमियत है. इसी के साथ यह देखते हुए कि मामला कानूनी और फोरेंसिक मसले में तब्दील हो गया है, यह बात कहनी भी जरूरी है कि शब्द अभी भी ‘कथित तौर पर’ ही कहे गए हैं. कोई भी एकदम यकीन के साथ बोले गए नारों के बारे में दावा नहीं कर सकता. हालांकि कुछ देर के लिए अभी मान लेते हैं इन नारों में आने वाले कुछ मुख्य शब्द (जिसमें कुछ नाम भी शामिल हैं) इस तरह थे – अफजल गुरु, शहीद, कश्मीर, आजादी, भारत, पाकिस्तान, जिंदाबाद, मुर्दाबाद... इनमें से कुछ शब्द और नाम साफ तौर पर एक राजनीतिक सभा में रस्मी तौर पर इस्तेमाल किए जाने के लिए बने हैं ताकि भविष्य की राजनीति के लिए एक इंसानी तस्वीर पेश की जाए – अफजल गुरु को शहीद बना दिया गया. यह बात दूसरे शब्दों और नामों के साथ मिला कर वहां मौजूद लोगों से कही जा रही थी, ताकि उन्हें एक शहादत का यकीन दिलाया जाए. या फिर इसके लिए उनका हौसला बढ़ाया जाए कि वे इसमें यकीन करने लगें. इसी सिलसिले में, नारों की व्यापक होती हुई दहलीज “भारत” के टुकड़े कर देने की पुकार के साथ सामने आई. फिर क्या पाकिस्तान की तारीफ जले पर नमक छिड़कने के लिए की गई?

अजीब तौर पर, ऐसा लगता है कि जहां तक कश्मीर के साथ भारतीय राज्य के राजनीतिक इतिहास का मामला है, नारे बात को मनवाने, समझाने या पहले से कही गई बातों को खारिज करने तक जाते हैं...लेकिन “पाकिस्तान” का मामला आते ही, वे एक खरी-खरी कल्पना रच देते हैं. असल में अगर कोई भारतीय राज्य की संप्रभुता की हिंसा की आलोचना करता है तो इसका मतलब ये नहीं निकलता कि पाकिस्तान एक बेहतर वैकल्पिक संप्रभुता है. पाकिस्तान एक सचमुच के राष्ट्र का नाम है, जिसकी संप्रभु हिंसा का एक इतिहास है. यह इतिहास कश्मीरियों के लिए तसल्ली या भरोसा दिलाने वाला कोई भी वादा नहीं करता, सिवाय इसके कि अपने सबसे अच्छे रूप में यह एक संदिग्ध इस्लामी माहौल का वादा करता है और अपने सबसे खराब रूप में एक बहुसंख्यकपरस्त मुस्लिम पहचान का, यह वादा भी तब कोई मायने रखता है जब वे कश्मीरी लोग मुसलमान हों. पाकिस्तान, कश्मीरी अवाम के आत्म-निर्णय की मांग की मांग से भी नहीं आता, ठीक ठीक इसलिए क्योंकि वे अपना फैसला भारतीय और पाकिस्तानी दोनों राष्ट्रों में से किसी भी एक राष्ट्र के बतौर नहीं करना चाहते. लेकिन यह मुमकिन है कि अपने बारे में अपना फैसला आप करने की कश्मीरी ख्वाहिश अब तक पाकिस्तान की कल्पना से जुड़ने की ख्वाहिश रही हो क्योंकि पाकिस्तान अपने आप में ही कश्मीर का एक नया नाम है, पाकिस्तान की जो सचमुच की ऐतिहासिक अवधारणा रही है उसके रूप में नहीं बल्कि कश्मीरियों के सपनों की आजाद हैसियत के रूप में. इस तर्क के हिसाब से, पाकिस्तान सचमुच के कश्मीरी अवाम की अपनी ख्वाहिशों की संप्रभुता का एक काल्पनिक नाम बन जाता है और जेएनयू में - और दूसरी जगहों पर – नारे इसी मानीखेज लेकिन भड़काने वाली कल्पना को पेश करते हैं. पाकिस्तान एक ऐसे वक्त में सपनों के भावी कश्मीर का काल्पनिक नाम है, जब मौजूदा दौर में “आजाद कश्मीर” का नाम लेने पर पाबंदी है. तब इस दलील के मुताबिक, पाकिस्तान का नाम भारत का अपमान करने के लिए नहीं बल्कि उससे छुटकारे के लिए पुकारा जाता है.

इस मामले में ऊपर से जो कुछ भी दिखाई दे रहा है और जिसको हमने एक तरतीब दी है, उसमें पक्के तौर पर ऐसी नई कुछ बातें या कार्रवाइयां हो सकती हैं जो सामूहिक राजनीतिक दावेदारियों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती हों और उनमें से कुछ बातों के कानूनी पेंच हो सकते हैं, या शायद न भी हों. इसके बावजूद, यह देखने के लिए किसी तीसरी आंख की जरूरत नहीं है, कि घटनाओं और बातों का यह सिलसिला पूरी तरह एक विद्रोही शैली में राजनीतिक बेबाकी के साथ भाषा के दायरे में ही सामने आता है, उसमें रत्ती भर भी भौतिक हिंसा नहीं है. हम यहां विद्रोही उसूलों को देखते हैं, जिसके लिए आत्म निर्णय भारतीय राज्य या राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ एकजुट होने या फिर काम करने की साजिश करने की खातिर एक कदम है, लेकिन कोई राजद्रोही योजना इसका हिस्सा नहीं है. हम देखते हैं कि जेएनयू में तार्किक तरीके से सोचने वाली जनता जमा हुई और जिसने एक सभा की, जिसने कुछ कायदों – और कानूनों को भी? – लांघ दिया. लेकिन यह किसी विद्रोही आपराधिक इरादे वाले खुफिया संगठन (सीक्रेट सोसायटी) की बैठक नहीं थी. यह एक ऐसी जनता है जो तर्कों के आधार पर सोचती है और ऐसा दिख रहा है कि उसने एक विद्रोही कायदे और लोगों को भड़काने वाली काल्पनिक बातों की मदद लेते हुए, बेबाकी से बोलते हुए कुछ निश्चित दावेदारियों को खतरे में डाल दिया. इस मुकाम तक इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि उन लोगों की खास पहचान क्या है जिन्होंने बोलने के इस काम को अंजाम दिया चूंकि उन्होंने न तो अपनी पहचान को छुपाया था और न ही उसका ढिंढोरा पीटा था.

और फिर अब तक जो कुछ भी दिख रहा था, उन सब पर पागलपन सवार हो गया. एक टेलिविजन एंकर को दौरा पड़ गया जिसके बारे में ऐसा लगने लगा है कि वो खत्म ही नहीं होगा. और दूसरे अनेक एंकरों ने उसके साथ सुर में सुर मिलाते हुए मीडिया की घेरेबंदी का एक भयावह नजारा पेश किया. गृह मंत्री, शिक्षा मंत्री, पार्टी सरगना, वकील-गुंडे-भारतीय संस्कृति के भाषाओं के जानकार ठेकेदारों लोगों ने जेएनयू में लगे नारों में सुने गए शब्दों पर एक सुर में हंगामा खड़ा कर दिया. पगलाए हुए, भाषाओं के जानकार कहते हैं कि भारत माता को इन शब्दों से चोट लगी है और उन शब्दों में भारत की मौत छुपी हुई है. यह एक दिलचस्प बात है क्योंकि बजाहिर पगलाए हुए इन जानकारों की समझ के उलट, इन नारों - जो यकीनन ही जेएनयू, भारत और दुनिया में पहली बार नहीं सुने गए हैं - और वे जिन शब्दों से बने हैं उनकी ठोस राजनीतिक व्याख्या हमें बताएगी कि इस संदर्भ में “मुर्दाबाद” भौतिक और शारीरिक रूप से बर्बाद करने की नहीं बल्कि ढांचे का अंत करने की इच्छा को जाहिर करती है. मिसाल के लिए जब “वाइस चांसलर मुर्दाबाद” का नारा लगाया जाता है तो कोई भी उस व्यक्ति का जैविक खात्मा नहीं चाहता और न ही इसका इरादा रखता है, बल्कि वह सत्ता की एक निश्चित व्यवस्था के अंत के लिए आवाज उठाता है, वाइस चांसलर जिसका प्रतिनिधित्व करता है. राष्ट्रीय पैमाने पर इस दलील के विस्तार का एक विद्रोही सैद्धांतिक मतलब है कि संप्रभु सत्ता का, अपने वास्तविक ऐतिहासिक अर्थ में और सचमुच की जनता द्वारा किए गए अनुभव के रूप में, अपनी समग्रता में विरोध किया जा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई महज एक विद्रोही उसूल के इस ऐलान के जरिए ही संप्रभु क्षेत्र के भीतर और इस संप्रभु क्षेत्र की भौतिक नुकसान, तबाही और मौत की योजना बना रहा है. इसी के साथ, इसका यह मतलब भी नहीं है कि उसूलन एक इलाके में फैला हुआ हर कोई सत्ता के अपने अलग अलग ऐतिहासिक अनुभवों के साथ संप्रभुता और इलाके को, कानून और विरासत के बेदाग मेलजोल को जस का तस कबूल कर लेता है.

दूसरी तरफ भाषा के पगलाए हुए जानकार इन शब्दों को तस्वीरों के रूप में देखते हैं, उन्हें सचमुच के धक्कों के जरिए किए जाने वाले हमलों के रूप में महसूस करते हैं. कायदे से कहें तो ये दिमागी बीमारी के आसार हैं और ऐसा लग सकता है कि भारत माता के अपमान से पागल हुए भाषा शास्त्री असल में पागल हो गए हैं, क्योंकि यह बातचीत और विचार-विमर्श के स्तर पर भी अपमान को सुन या पढ़ नहीं सकते हैं. बहरहाल अपमानित करने की एक लंबी और खासी प्रतिष्ठित बौद्धिक परंपरा रही है, और इस देश में भी रही है. न तो मार्क्स ने और न ही आंबेडकर ने अपने विरोधियों को अपने तीखी आलोचनाओं से बख्शा; उन्हें ऊंचे राजनीतिक जोखिम वाली एक वाद-विवाद की संस्कृति पसंद थी, जिसमें विषय को लेकर कोई पाबंदी नहीं थी. आंबेडकर अपने वक्त में देश के पूरे अवाम के सामने मुस्लिम बहुसंख्यक इलाकों में आत्म निर्णय के सवाल को उठाने के लिए भारत में विजय, संघर्षों और उन पर किए जाने वाले हमलों के बदसूरत इतिहास पर गौर करने में नहीं हिचके. उन्होंने 1940 और 1945 में हरेक से इस सवाल पर फैसला करने को कहा: पाकिस्तान बने या न बने?

आत्म निर्णय आम तौर पर, उसूल के बतौर और खास तौर पर कोई ऐसा प्रस्ताव नहीं था, जो समझ से परे हो. यहां तक कि इसके खिलाफ फैसला करने के लिए भी हमें इसके बारे में सोचना पड़ेगा. जोतिबा फुले ने आधुनिक भारतीय ऐतिहासिक साहित्य की महानतम और सबसे ज्यादा मुक्तिकारी, अपमानित करने वाली रचना गुलामगीरी की रचना हिंदू जड़सूत्रों, मिथक और कानून, की व्यवस्था को तहस-नहस करने के लिए की, जिन्हें एक मनुस्मृति में पिरोया हुआ है. उन्होंने भाषाई बिंबों के खेल को इस महारत के साथ खेला कि उन्होंने ब्रह्मा के शरीर से पैदा हुए चार वर्णों के हिंदू किस्से को शब्दश: पेश करते हुए ‘अपने आप में हंसी का पात्र’ बना दिया. अगर ब्रह्मा ने सचमुच में इन सभी वर्गों को अपनी देह से पैदा किया था, तो उनकी देह किस किस्म की थी? मर्द या औरत की? यौन संबंधों में सक्षम थी या दैवीय थी? जैविक देह थी या परम देह थी? आज जब भाषा की व्यवस्था शब्दश: बिंबों में बदल गई है और बिंब ही बुनियादी अर्थ बन गए हैं, यानी दूसरे शब्दों में जो विमर्शों का तंत्र हुआ करता है वह सनक के तंत्र में, बेवकूफी के तंत्र में तब्दील हो गया है, तब फुले की तर्क पर आधारित और एक मुक्तिकारी अपमान की परंपरा को उलट देना एक गहन प्रतिक्रांतिकारी कोशिश लगती है.

सभी प्रतिक्रांतियों की तरह, यह भी इस तथ्य से नफरत करती है कि यह अपने वजूद के लिए मूल क्रांति की एहसानमंद है – और इस तथ्य को भूलने के लिए यह एक विचार के रूप में क्रांति को एक गैर प्रतिक्रांतिकारी तरीके से खारिज करना पसंद नहीं करेगी, बल्कि यह उन सब लोगों के सफाए को पसंद करेगी जिनको यह “क्रांतिकारी” मानती है. मौजूदा हुकूमत के मुताबिक ‘जेएनयू टाइप’ से उसे उस तरह का खतरा नहीं है जैसे एक आतंकवादी से होता है, जो अपने सबसे भयानक रूप में भी बस एक स्थानीय और बाहरी खतरा है; यह कथित टाइप (‘जेएनयू टाइप’) सत्ता को अधिक व्यवस्थित रूप से और बुनियादी तौर पर खतरे में डालता है, जैसे कि क्रांतिकारी करते हैं. और इसलिए, अजीब तरह से दिमागी बीमारी के आसारों के सिलसिले में एक प्रति-क्रांतिकारी रणनीति उजागर हो गई है – वो वजह जो बेवकूफियों के एक तंत्र की बुनियाद में है जिसका मकसद राष्ट्र को बेवकूफों की एक हुकूमत के तौर तरीकों से हांकना है, और वह वजह है एक कुरूप और विकृत संप्रभुता.

अब संप्रभु सत्ता की कुरूपता के दो पहलू हैं: इसमें (1) कानून से परे जाकर समाज से अपने लिए वैधता हासिल की जाती है (जिसके लिए लगातार कानून के अक्षरों को, प्रावधानों को, शब्दों को बेवकूफी के साथ सूत्रों और मंत्रों की तरह जपा जाता है); (2) समाज को कुसूरों के समाज में ढाला जाता है ताकि कानून से परे जाकर इस वैधता को हासिल किया जाए. दूसरे पहलू पर पहले बात करते हैं: सत्ता इस गहरे संदेह के आधार पर बनी होने की वजह से कि संप्रभु सत्ता को अपने शासन के प्रति किसी न किसी तरह की नाफरमानी का सामना करना पड़ता है, वो इस संदेह को समाज के दायरे में ले आती है. इस तरह सत्ता के प्रति हर नाफरमानी सामाजिक मूल्य के रूप में सत्ता के मूल्य की नाफरमानी के रूप में ली जाने लगती है. एक सीमित संभावना के रूप में, हालांकि यह संभावना भी खत्म होती जा रही है, ऐसे मूल्य सामुदायिक और धार्मिक स्थानीयताओं में निहित होते हैं. इसलिए समाज अपनी धार्मिक, रस्मी और पारिवारिक भावनाओं के आहत होने या उनकी आलोचना होने पर गुस्से में तिलमिला उठता रहा है और यह अब भी जारी है. हर बार आहत होने पर, समाज को इस तरह पेश किया जाता है कि एक बुनियादी संस्था के रूप में समाज पर एक दुश्मन से खतरा है, यह संस्था जख्मी है, कि समाज की सरहदों पर दुश्मन की फौज खड़ी है. जब संभावनाओं का विस्तार कर दिया जाता है और खतरों को बढ़ी हुई एक शक्ल दी जाती है, तब समाज की सरहदें राष्ट्र की सरहदें बन जाती हैं, जिसमें इसकी सरहदों से लगे दुश्मन राष्ट्र की कल्पना बुनियादी तौर पर दुश्मन समाज के रूप में की जाने लगती है. राज्य की संप्रभुता और समाज की संस्था के इस मेल के साथ, राष्ट्र को गुमराही में राष्ट्रीय समाज के रूप में देखा जाने लगता है जिसको राष्ट्रीय (विरोधी) समाज (विरोधी) से खतरा है. फरेब के इस रंगमंच पर भारत और पाकिस्तान ने लंबे, बहुत लंबे अरसे से एक किस्म का दुश्मन-दुश्मन का खेल खेलना अब तक जारी रखा है.

हालांकि फौरी हालात में कुसूरों के समाज की रचना में देश के भीतर ही हर कहीं उस दुश्मन की खोज की जाती है जिसके साथ दुश्मन-दुश्मन खेला जा सके - और जेएनयू जैसी निश्चित स्थानीयताओं के बारे में यह भ्रम फैलाया जाता है कि वहीं संप्रभु फरमान के प्रति सारा परायापन, सारी पराई गवाहियां, सारी नाफरमानी पैदा होती है. इसलिए समाज को सबसे पहले तो परायों की पहचान करना और उन्हें कसूरवार ठहराना जरूरी है ताकि यह अपने उन दुश्मनों से छुटकारा पा सके, जिनके साथ दुश्मन-दुश्मन खेला करता है – वे समाज विरोधी, राष्ट्र विरोधी, आजादी परस्त, पाकिस्तान परस्त, भारत विरोधी लोग (जो भारतीय हैं, हमेशा भारतीय!). उनकी पहचान करने और उनको कसूरवार ठहराने का काम समाज के सामूहिक मतिभ्रम यानी मीडिया के जरिए किया जाता है– और इसके बाद पुलिस को बुलाया जाता है. जेएनयू के छात्रों के साथ जो हुआ, उसे आजाद भारत में अपने नागरिकों को झूठे तरीके से फंसाने की सबसे बड़ी घटना कहा जा सकता है, जिसमें कानून ने सिर्फ संप्रभु फैसलों का पालन किया है. लेकिन संप्रभु फैसला अपने आप में समाज से वैधता हासिल करता है, ऐसे समाज से जो खुद अपने सदस्यों की पहचान करने और उन्हें कसूरवार ठहराने में मसरूफ है. राजनाथ सिंह बड़ी खुशी खुशी और बेवकूफी भरे तरीके से जेएनयू के छात्रों के साथ हाफिज सईद के रिश्ते की बात करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी कुरूप संप्रभु हुकूमत समाज द्वारा ‘राष्ट्र-विरोधियों’ को कसूरवार ठहराने की कोशिशों के साथ लगातार मेल खाती हुई चल रही है. इससे क्या फर्क पड़ता है कि हाफिज सईद वाली यह पूरी बात तथ्यात्मक रूप से सच नहीं है, क्योंकि अगर कोई एक “राष्ट्र विरोधी है”, उसका हाफिज सईद में यकीन करना तो लाजिमी ही है. और यह काल्पनिक नाम ‘हाफिज सईज’ दिल्ली पुलिस को धूमधाम से काम पर लगाने के लिए पर्याप्त रूप से एक वाजिब वजह है. जब नारे “पाकिस्तान” की मनगढ़ंत की बेबाक तरीके से और सरेआम तारीफ करते हैं जिसमें उन्हें इस खतरनाक मनगढ़ंत के अलावा और किसी की मदद हासिल नहीं है, एक ऐसा इंसान जो असल में इन नारों से भले ही किसी भी तरह जुड़ा हो या नहीं, उसकी पहचान की जाती है, उसको कसूरवार ठहराया जाता है और गिरफ्तार कर लिया जाता है. लेकिन सरसरी तौर पर इन कार्रवाइयों का आधार सरकार द्वारा साजिशन गढ़ी गई एक कहानी है, जिसका नाम “हाफिज सईद” है. एक मनगढ़ंत बात का सिर्फ डंका ही पीटा जा सकता है, इसका जितना शोर मचाया जाएगा, उतना ही यह सार्वजनिक तफ्तीश के दायरे में आएगा. दूसरी मनगढ़ंत को लागू किया जा सकता है और लागू किया गया है, और इसे जितना ही लागू किया जाता है, उतना ही यह सच्चाई का ढोंग करती है, जिसको संप्रभुता की गोपनीयता की सुरक्षा हासिल होती है (“आप खुफिया रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं कर सकते”).

यह सारा तामझाम संप्रभु हुकूमत के कुरूप चेहरे की हिफाजत करने के लिए किया जाता है, जिसका तरीका है: संप्रभु सत्ता जितनी ही बदसूरत दिखेगी, जितनी ही नफरत के काबिल लगेगी, जितने ही क्रूर तरीके से काम करेगी और जितनी बेवकूफी भरी बातें करेगी, वह अपने अख्तियार पर उतने ही कारगर तरीके से पकड़ बनाए रखेगी, उसको बढ़ाएगी और उसे और धारदार बना सकेगी. किसी ने भी नहीं सोचा था कि ज़ॉर्ज डब्ल्यू. बुश खास तौर से होनहार थे, लेकिन उनकी कम अक्ली की शोहरत का सीधे सीधे रिश्ता उनके खौफनाक लेकिन कारगर मंसूबों से था, जिनके तहत वे जिस देश पर चाहते थे, हमले कर देते थे. इस तरीके की संप्रभुता, अपनी संप्रभु सत्ता पर अमल करने वाली सभी सरकारों का सपना है, जिसमें उन्हें वैधता दिलाने वाली परंपरागत रणनीतियों की जरूरत नहीं होती और तब भी उन्हें महज कानून की हद से परे जाकर समाज द्वारा क्रूर तरीके से वैधता हासिल होती है. आज भाजपा हिंसक तरीके से इस सपने को साकार कर रही है और जिस अवाम ने उसे चुना है, उससे यह कहती हुई दिख रही है कि “हम तुम्हें बेवकूफ और पागल दिख रहे हैं, खैर, वो तो हम हैं ही और बेहतर होगा तुम इसको पसंद करना सीख जाओ!” यह कहने का मतलब यह है कि इस पागलपन के वक्त पागल बनने का फैसला करने में समझदारी है. और अगर सुनने में यह बहुत बेरहम बात लग रही है तो यह शायद ऐसी है ही. और अगर यह ऐसी ही है तो इसे तर्क के आधार सोच-समझ कर ही तैयार किया गया होगा, यह बिना तर्क के नहीं किया जा सकता! यह किसका तर्क है, इस दिमागी बीमारी की रणनीति और बेवकूफी की व्यवस्था से सबसे ज्यादा फायदा किसको हो रहा है इस पर अगले लेख में गौर किया जाएगा.

लेकिन एक ऐसे समय में ये रूखी-सूखी बातें, जब जेएनयू के छात्र जो कुछ रच रहे हैं, वह इस कदर बेपनाह खूबसूरत है कि दिल ने कभी भी इतना भरापूरा महसूस नहीं किया था.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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