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बीच सफ़हे की लड़ाई

एक सुसाइड नोट को कैसे पढ़ें

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/09/2016 03:50:00 PM



रेयाज उल हक

‘उम्मीद बहुत ज्यादा है, बेशुमार उम्मीद है – लेकिन हमारे लिए नहीं.’ काफ्का पर लिखते हुए वाल्टर बिनयामिन ने काफ्का की ये पंक्तियां उद्धृत की थीं. इसके 6 साल बाद, स्पेन के पोर्ट बोऊ शहर में नाजी हुकूमत से बचकर भाग निकलने की आखिरी कोशिश में नाकाम होता दिखने और वापस जर्मन गेस्टापो के हाथों सौंप दिए जाने की आशंका के बीच मॉर्फीन की ज्यादा गोलियां लेते हुए बिनयामिन ने जो सुसाइड नोट लिखा उसमें उम्मीद से महरूम कर दिए जाने की यह पीड़ा बहुत साफ है: ‘ऐसी हालत में जिसमें बच निकलने की कोई राह नहीं है, इसको खत्म कर देने के अलावा मेरे पास कोई रास्ता नहीं है.’

हम नहीं जानते कि बिनयामिन ने अपनी आखिरी चिट्ठी में क्या लिखा था, क्योंकि वह नष्ट कर दिया गया. लेकिन हम जितना जानते हैं, वह उन हालात के बारे में बिनयामिन के पक्के अंदाजे के बारे में बताता है, जिसमें वे पिछले कुछ सालों से फंसे हुए थे. एक साल पहले वे अपने कुछ दोस्तों की मदद से नाजी यातना शिविर की कैद से छूटे थे और फ्रांस और पूरे यूरोप में नाजी जर्मनी की बढ़ती धमक के साए में बॉदलेयर और आर्केड्स प्रोजेक्ट पर अपने काम को पूरा करना चाहते थे. यह उनका सपना था. लेकिन फ्रांस पर जर्मनी के कब्जे के बाद फ्रांस में रहना मुश्किल होता जा रहा था और वे स्पेन के रास्ते अमेरिका चले जाने की कोशिश कर रहे थे. इसी क्रम में वे पोर्ट बोऊ पहुंचे थे जहां अधिकारियों ने उन्हें सूचित किया कि गैरकानूनी रूप से स्पेन में घुसने की वजह से उन्हें अगली सुबह वापस जर्मन अधिकारियों को सौंप दिया जाएगा.

बिनयामिन स्पेनी अधिकारियों और नाजियों को नहीं रोक सकते थे. लेकिन अपने लिए उस सुबह को आने से रोक सकते थे.

रोहिथ वेमुला ने भी यही किया, लेकिन वे चाहते थे कि हम उनके बाद की सुबहों के गवाह बनें: ‘गुड मॉर्निंग’. उनके आखिरी खत की शुरुआत एक ही साथ कई फैसलों और उन फैसलों में पक्के यकीन को बहुत साथ साफ सामने रखती है. ‘आप जब इस खत को पढ़ रहे होंगे, मैं आपके आसपास नहीं होऊंगा.’

यह बताता है कि रोहिथ ने किसी गुस्से या जल्दबाजी में यह फैसला नहीं लिया. न ही यह हताशा में लिया गया एक फैसला है, जिसमें फैसला लेने वाले इंसान को आगे की कोई राह नहीं दिखाई देती. बल्कि यह दिखाता है कि उनको इस फैसले की तरफ धकेल दिया गया. भारत के जातीय समाज में धकेले जाने की यह कार्रवाई ऊपर से दिखाई नहीं देती. यह जीने और मरने के बीच की पूरी मुद्दत के दौरान, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचों के भीतर चुपचाप काम करती है. नजरों से ओझल होकर. असल में ये ढांचे इसीलिए काम करते हैं कि नाइंसाफी और शोषण को छुपा कर उन्हें जिंदगी के लिए एक जरूरत के रूप में पेश किया जाए और इस तरह सवाल करनेवाली, चुनौती देने वाली और असहमत आवाजों की सारी गुंजाइश खत्म कर दी जाए. और फिर भी अगर कहीं से ऐसी आवाज उठे तो उसे इस कदर अकेला कर दिया जाए कि उसके सवाल और असहमति अपनी ताकत खो दे.

लेकिन रोहिथ को आत्महत्या की तरफ धकेले जाने की कार्रवाई एक तमाशे की तरह हम सबकी नजरों से सामने हुई. एक अनुष्ठान की तरह, सारी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए रोहिथ को यहां तक पहुंचाया गया कि वे हमारे बीच से चले जाएं. और इस अनुष्ठान में ब्राह्मणवादी फासीवादी राज्य के सारे पुर्जों ने अपनी भूमिका निभाई: केंद्रीय मंत्रियों स्मृति ईरानी और बंडारू दत्तात्रेय से लेकर विश्वविद्याल प्रशासन तक ने. इस कार्रवाई को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की उस पुलिसिया शिकायत में देख सकते हैं, जिसमें रोहिथ और उनके संगठन आंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन (एएसए) के दूसरे कार्यकर्ताओं पर एबीवीपी के हैदराबाद विश्वविद्यालय ईकाई के अध्यक्ष एन. सुशील कुमार के साथ मारपीट करने का झूठा आरोप लगाया गया था. इसे केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के उस पत्र में देख सकते हैं कि जिसमें उन्होंने एएसए पर ‘राष्ट्रविरोधी’ गतिविधियां चलाने का आरोप लगाया था. इसे केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की उन चिट्ठियों में देखा जा सकता है, जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन को एएसए के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा.

कार्रवाई हुई. रोहिथ और उनके चार साथियों को प्रशासन ने होस्टल से निकाल दिया गया और विवि के भीतर उन पर अनेक पाबंदियां लगा दी गईं. ये पाबंदियां असल में उनका सामाजिक बहिष्कार थीं, जिसके तहत होस्टल और प्रशासनिक भवन में दाखिल होने और सार्वजनिक जगहों पर उनके एक साथ जाने पर रोक लगा दी गई थी. उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी गई. ये सारी सजाएं बिना किसी जांच और सुनवाई के उन पर थोप दी गई थीं. रोहिथ की स्कॉलरशिप भी रोक दी गई, जिसने उन्हें और उनके परिवार को आर्थिक मुश्किलों में डाल दिया. दिसंबर से एएसए और दूसरे जनवादी प्रगतिशील छात्र संगठन प्रशासन के फैसले और सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे.

आत्महत्या करते वक्त रोहिथ को अहसास था कि वे अपने संघर्षरत साथियों को बीच में छोड़ कर जा रहे हैं. और इसके लिए वे बस एक आग्रह करते हैं: ‘मुझ पर गुस्सा मत होना. मैं जानता हूं आपमें से कइयों ने सचमुच मेरी देखभाल की है, मुझे प्यार किया है, और मुझसे अच्छे से पेश आए हैं.’ उन्हें इसका भी अहसास था कि वे कैसी लड़ाई लड़ रहे हैं. रोहिथ इस पूरे दौरान शायद एक कहीं बड़ी समस्या को महसूस कर रहे थे. इंसानों को एक दूसरे बांट कर, गैरबराबर और नाइंसाफी भरे रिश्तों में बांध कर रखने वाली व्यवस्था इंसान को भीतर से भी किस तरह बांट देती है और उसके अपने हिस्सों में किस तरह गैरबराबरी को भर देती है, रोहिथ इसको लेकर फिक्रमंद थे: ‘मैं अपनी आत्मा और अपनी देह के बीच बढ़ती हुई खाई को महसूस करता हूं. और मैं एक राक्षस बन गया हूं.’

लेकिन यह अलगाव रोहिथ की अपनी निजी समस्या नहीं थी. वे प्रकृति से प्यार करते थे, वे इंसानों से प्यार करते थे और उन्होंने पाया कि इंसान प्रकृति से कितने दूर कर दिए गए हैं. ‘हमारी भावनाएं भी इस्तेमाल की हुई हैं. हमारा प्यार बनावटी है. हमारा भरोसा रंगा हुआ है. हमारी मौलिकता की तस्दीक बनावटी कला के जरिए होती है. खुद को चोट पहुंचाए बिना किसी को प्यार करना सचमुच मुश्किल हो गया है.’ वे एक लेखक बनना चाहते थे, लेकिन उनका शरीर एक निश्चित सामाजिक संदर्भ में स्थित था, जहां जाति, वर्ग, पहचान के पुर्जे उनके आस-पास सीमाओं का एक बेअंत जाल बुन रही थीं. उन्हें सिर्फ शरीर समझने वाली व्यवस्था के पास उनके लिए एक बनी बनाई भूमिका थी. वे उससे पार नहीं जा सकते थे. उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे उस पर सवाल न करें, उसको चुनौती न दें.

नवउदारवादी कायदा लोगों से यह उम्मीद करता है कि वे किसी भी हाल में कामयाबी हासिल करें, वरना जिंदगी अप्रासंगिक मान ली जाती है. अगर कोई नाकाम रहता है तो इसका मतलब है कि कमी खुद उसमें है. उसकी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को दरकिनार कर दिया जाता है, जहां हरेक जन्म ‘एक जानलेना दुर्घटना’ होता है, जिसका विकास ऐसी बेघर और बेजमीन जिंदगियों में होता है, जहां बंधुआ मजदूरी है, छुआछूत है, बहिष्कार है और वंचित रखने की हजार तरकीबें हैं, जो किसी इंसान की क्षमताओं और संभावनाओं को बड़े पैमाने पर सीमित कर देती हैं. उनका जीना और सपने देखना, उनकी भावनाएं, उनका प्यार, उनकी नफरत, उनकी उम्मीदें: सब कुछ इस विकृत कर देने वाली नाइंसाफी की मशीन से गुजर कर वही नहीं रह जाते, जो होने की उम्मीद उनसे की जाती है.

इतिहास और इंसाफ से बेदखल कर दिए गए समाज में इंसान सिर्फ एक गिनती भर बन कर रह जाते हैं: ‘बस एक वोट. बस एक संख्या.’ रोहिथ महसूस करते हैं कि अपनी फौरी पहचान और सबसे करीब दिखती संभावनाओं में सीमित कर दिए जाने के बाद इंसान भी वह नहीं रह जाता जो वह असल में हो सकता था. जो असल में उसे होना चाहिए था: ‘सितारों से बनी हुई चमकदार चीज.’ एक दिमाग. रचना के काबिल, सोचने वाला, सवाल करने और जवाब देने वाला दिमाग.

इन सबके लिए फिक्र किसको है? व्यवस्था इसको बनाए हुए है. समाज की बहुसंख्या इससे बेपरवाह है. प्रतिरोध की ताकतें बंटी हुई हैं. ‘कोई जल्दी नहीं थी. लेकिन मैं हमेशा भाग रहा था. एक जिंदगी शुरू करने के लिए बेकरार.’
 

एक जिंदगी, जिसका जन्म ही ‘एक जानलेना दुर्घटना’ थी और जिसको एक ‘खालीपन’ से भर दिया गया.

अपने अंतिम दिनों में रोहिथ को ऐसा खालीपन क्यों महसूस होने लगा था? एक जहीन शोधार्थी और एक सक्रिय आंबेडकरी कार्यकर्ता के रूप में रोहिथ जो कर रहे थे, वह असल में सारी ‘बढ़ती हुई खाइयों’ और खालीपन को भरने की कोशिश थी. वे गैरबराबरी और वंचित करने वाले ढांचे के खिलाफ संघर्ष का हिस्सा था. एएसए के कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने एक ऐसे समाज की समझ हासिल की थी, जिसमें इंसान को इंसान से, शरीर को आत्मा से अलग करना नामुमकिन हो. ऐसा एक समाज उत्पीड़ित और अलग-थलग कर दी गई जनता को एकजुट करके ही बनाया जा सकता था: दलित, मुसलमान, आदिवासी और महिलाएं जो अपनी रचनात्मकता और अपनी मेहनत से इस मुल्क को गढ़ते हैं और फिर यह मुल्क उन्हें मलबे में तब्दील कर देता है. उस दूसरे समाज के लिए संघर्ष में उनकी एकजुटता जरूरी है.

एएसए ने फासीवादी भारतीय राज्य द्वारा मुसलमानों पर किए जाने वाले हमलों के खिलाफ आवाज उठाई. पिछले साल जब याकूब मेमन को अन्यायपूर्ण फांसी दी गई तो इसका विरोध करनेवालों में एएसए भी शामिल था. उसने उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में मुसलमानों पर व्यापक सांप्रदायिक हमलों पर बनी फिल्म मुजफ्फरनगर बाकी है के दिल्ली विवि में होने वाले प्रदर्शन पर एबीवीपी के हमले का भी विरोध किया. ऐसी एक राजनीति जो उत्पीड़ित अवाम को, उसकी चिंताओं और उसके संघर्षों को एकसाथ लाए, भारतीय राज्य के लिए यह खतरे की घंटी थी. जब यह राज्य और इसकी फासीवादी विचारधारा दलितों को बार बार हिंदू पहचान में बांधने की कोशिश कर रही है, एएसए दलितों की गैर हिंदू पहचान को रेखांकित कर रहा था और मुसलमानों के साथ एकता की जरूरत पर जोर दे रहा था. राज्य ऐसी एक एकजुटता को कभी भी कबूल नहीं करेगा, विश्वविद्याल जैसे एक सीमित जगह में भी नहीं, क्योंकि यह इसके फासीवादी ताकत को खोखला कर देगी. इसलिए एएसए पर हमला जरूरी बन गया था.

एएसए और ऐसे ही सैकड़ों दूसरे संघर्षरत साथियों की तरह रोहिथ भी एक विचार थे. लेकिन उनसे एक देह की तरह निबटा जाता है. उनके पास एक समझदारी है, जो इस व्यवस्था की आलोचना करती है, लेकिन इस समझदारी पर गौर करने के बजाए उन्हें अपराधी बना कर उनके शरीर को सजा दी जाती है.

रोहिथ एक दिमाग थे: उन्होंने इस दुनिया को, ‘प्यार, दर्द, जीवन, मौत’ को समझने की कोशिश की. इस दुनिया के बरअक्स एक वैकल्पिक दुनिया का उनके पास एक खाका था: सितारों से भरी हुई दुनिया. उन्हें यकीन था कि वे सितारों में सफर कर सकते हैं.

क्योंकि यह दुनिया तो परछाइयों और अंधेरे की दुनिया है.

इसको समझना मुश्किल नहीं है कि क्यों रोहिथ ने उन सबको माफ कर दिया, जिन्होंने उन्हें इस स्थिति तक पहुंचाया और उनकी हत्या कर दी. सिर्फ उनकी हत्या के जिम्मेदार लोगों को मिलने वाली कोई भी सजा रोहिथ को इंसाफ नहीं दिला सकती. वह इंसाफ जिसे बराबरी और आजादी के जरिए हासिल किया जाना है. जिसको हासिल करने के लिए इस अंधेरी दुनिया को सितारों की एक दुनिया में तब्दील करना जरूरी है.

इसलिए, वे अपने आखिरी खत को महज कुछ ‘शरीरों’ के खिलाफ आरोप पत्र बनाने के बजाए वे कोशिश करते हैं कि उस बंदोबस्त पर बात की जाए, जो उन्हें पैदा कर रही है.

अपने आखिरी सफर में बिनयामिन के पास उनकी वह पांडुलिपि थी, जिसको पूरा करना उनका सपना था. उनकी मौत के बाद वह पांडुलिपि खो गई और कभी नहीं मिल पाई.

रोहिथ का सपना कार्ल सेगान की तरह एक विज्ञान लेखक बनने का था. सेगान वह वैज्ञानिक और लेखक थे, जिन्होंने अंतरिक्ष में भेजा जानेवाले पहले भौतिक संदेश लिखा था, ताकि अंतरिक्ष की अनजान और नामालूम जगहों में अगर कोई हो तो उसे सुन और समझ सके. हम नहीं जानते कि उन्हें किसने सुना और उसका क्या जबाव दिया.

लेकिन सेगान जैसा लेखक नहीं बन पाने वाले रोहिथ ने भी एक संदेश लिखा ‘पहली बार आखिरी खत.’ अपनी इसी दुनिया के जाने-पहचाने लोगों के लिए. दोस्तों के लिए. अंधेरे से सितारों तक के सफर का संदेश.
 

उसे सुना जा रहा है. हैदराबाद से लेकर दिल्ली, मुंबई, पटना, लखनऊ और दर्जनों छोटे-बड़े शहरों कस्बों से उस आखिरी संदेश पर हामी भरते हुए बेशुमार जवाब आ रहे हैं.

सितारों की दुनिया के लिए जंग जारी है. 


(समयांतर, फरवरी 2016 में प्रकाशित) 

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ एक सुसाइड नोट को कैसे पढ़ें ”

  2. By जमशेद आज़मी on March 21, 2016 at 3:58 AM

    रोहित वेमुला की मौत ने देश के छात्र छात्राओं को बुरी तरह झिंझोड़ा है। इसलिए दिल्ली हो या जादवपुर सभी जगहों पर छात्रों को सड़कों पर उतरने पर मजबूर हुए हैं। एक खास विचारधारा को थोपने के लिए सरकारें भी कमर कस चुकी हैं। शायद छात्रों को यह मंजूर नहीं है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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