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इतिहास और वर्तमान का संबंध-3: रोमिला थापर

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/02/2016 08:00:00 AM


प्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रोमिला थापर से रणबीर चक्रवर्ती की इतिहास, समाज और संस्कृति पर बातचीत. साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार, अंग्रेज़ी पाक्षिक फ्रंटलाइन में प्रकाशित, रोमिला थापर के लंबे साक्षात्कार “लिंकिंग द पास्ट एंड द प्रेजेंट” का कुछ संपादित रूप है। पहले दो हिस्से यहां पढ़ें: भाग-1, भाग-2अनुवाद: शुभनीत कौशिक।  

आज यह भी कहा जा रहा है कि कुछ ऐतिहासिक शोध या पुस्तकें, एक समुदाय की भावनाओं को आहत कर सकते हैं, इसलिए इतिहास की ऐसी पुस्तकों को प्रतिबंधित कर देना चाहिए। यह एक खतरनाक रुझान है।

यह सचमुच खतरनाक रुझान है क्योंकि इस तरह तो हर किसी की भावनाएं अलग-अलग कारणों से आहत हो सकती हैं। और कुछ लोगों के लिए यह दावा करना कि वे पूरे समुदाय के प्रतिनिधि हैं, बिलकुल आसान काम है। समुदाय के बाकी लोगों को तो पता ही नहीं होता कि आखिर यह सब चल क्या रहा है।

अगर हम सच्चे तौर पर सहिष्णु हैं, तो हम आलोचना, मतभेद और असहमति को स्वीकार करेंगे, जिसके उदाहरण अतीत में भी मिलते हैं। अगर हम ब्राह्मण टेक्स्ट को देखें तो हम पाएंगे कि वे ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण का विरोध करने वालों के प्रति घृणायुक्त वक्तव्यों से भरे हैं, और उन्हें कभी नास्तिक, कभी पाषंडी तो कभी महामोह तक कहते हैं। पर यदि इन टिप्पणियों या घृणा से भरे वक्तव्यों से जैनियों और बौद्धों की भावनाएं आहत भी हुईं हों, तो भी उन लोगों ने कभी यह मांग नहीं कि विष्णु पुराण जैसे ग्रन्थों को जला देना चाहिए।

पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष से समृद्ध होती रही, भारत की तर्कवादी परंपरा को भी आज दरकिनार किया जा रहा है। तर्क की भारतीय परंपरा ऐसी कतई नहीं थी, जैसा आज इसे बनाया जा रहा है।

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो, जो लोग खुद को भारतीय परंपरा और भारतीय मूल्यों का मुखर प्रवक्ता बताते हैं, अक्सर ये लोग स्वयं ही भारतीय टेक्स्ट से अनभिज्ञ होते हैं। इन लोगों ने उन ग्रंथों को पढ़ा ही नहीं होता है, जिन्हें ये अपनी परंपरा का सूचक मानते हैं, न तो उनके अनुवादों को न ही मूल रूप में। वे इस बात से भी बेखबर होते हैं कि परंपरा में इन्हीं टेक्स्ट और विचारों को लेकर वाद-विवाद हुए हैं। प्राचीन टेक्स्ट पर आम पाठकों के लिए, एक सुविचारित पर अपारंपरिक टिप्पणी देना अब मुश्किल होता जा रहा है।

पर यह प्रवृत्ति हानिकारक है क्योंकि यह चिंतन की स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर बुरा असर डालेगी। लोग सुरक्षित समझी जाने वाली हदों के भीतर रहकर ही सोचने लगेंगे। वे विवादित और ‘असुरक्षित’ समझे जाने वाले मुद्दों से बचना चाहेंगे।

स्वतंत्र चिंतन के बगैर आलोचनात्मक मूल्यांकन संभव ही नहीं हो सकता। इधर भारत में शिक्षा के विषय में, मैंने यह कहा है कि मैं भारतीय शिक्षा को “एलसीडी शिक्षा” मानती हूँ, मेरा तात्पर्य है कि हमने शिक्षा के मूल्यों को इस हद तक गिरा दिया है कि आज जो शिक्षा दी जा रही उसे ‘लघुत्तम’ (लोएस्ट कॉमन डिनोमिनेटर) शिक्षा ही कहा जा सकता है। इसका उद्देश्य यही है कि लोगों में सवाल पूछने की प्रवृत्ति को ही खत्म कर दिया जाए, या उनमें किताबों का ऐसा खौफ़ पैदा कर दिया जाए कि वे किताबों की विषयवस्तु पर चर्चा ही न करें, न ही उनमें विचारों का कोई आदान-प्रदान हो। नतीजतन, मीडिया ही लोगों के दिमाग में पैठ बना लेगा क्योंकि अधिकांश लोग मीडिया के जरिये ही सूचनाएँ हासिल कर रहे हैं। आज स्वतंत्र अध्ययन और स्वाध्याय का भी अभाव होता जा रहा है।

प्राचीन भारत में आलोचनाओं और स्वस्थ वाद-विवाद का जिक्र हम अक्सर पाते हैं। नाटकों आदि के जरिये प्राचीन साहित्यकार कई सामाजिक व्यवहारों और परम्पराओं की खिल्ली उड़ाते थे। कई बार उनके निशाने पर समाज का आभिजात्य वर्ग भी होता था। अगर यह भारतीय परंपरा है, तो वर्तमान में जो कुछ हम देख रहे हैं, वह निश्चय ही भारतीय परंपरा नहीं है।

आलोचना और स्वस्थ परिचर्चा या व्यंग्य अब भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं रह गए हैं। लोकवृत्त में इनकी जगह अब अपशब्दों और कटूक्तियों ने ले ली है। ऐसा होने की संभावना तब और अधिक होती है जब चर्चा का विषय धर्म, संस्कृति और इतिहास होते हैं। सामान्यतया, एक सभ्य समाज के नागरिकों को सार्वजनिक रूप से अपशब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए। एक सभ्य समाज में विवेकपूर्ण आलोचना और सवालों का हमेशा ही स्वागत किया जाना चाहिए।

आज हम अपनी संस्कृति को समरूपी और एकांगी बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं, भले ही इसका मतलब भारतीय संस्कृति को औपनिवेशिक चश्मे से देखना ही क्यों न हो! वे लोग जो विविधता की वकालत कर रहे हैं, उन्हें चुप करा दिया जा रहा है।

एक अन्य निराशाजनक प्रवृत्ति जो हाल में देखने को मिली है वह है हिंदू, मुस्लिम, सिख, और ईसाई समुदायों की एक एकल समरूपी छवि गढ़ने और उसे ही प्रचारित करने की कोशिश।

यह रोचक बात है कि अगर कोई भारत में धर्मों के इतिहास पर एक कोर्स पढ़ना चाहे और यह जानना चाहे कि कैसे धर्मों ने समाजों को प्रभावित किया तो इस कोर्स का सबसे चुनौतीपूर्ण पक्ष होगा, उन पंथों के बारे में पढ़ना, जो इन धर्मों से उत्पन्न हुए, और साथ ही, इन पंथों के परस्पर जटिल संबंधों का अध्ययन, जिसमें अक्सर इन पंथों के विश्वासों और व्यवहार की पूरी फेहरिस्त शामिल होती है।
धर्मों और उनसे निकले पंथों/संप्रदायों का अध्ययन करते हुए हमें उनके बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा और आदान-प्रदान को भी समझना होगा। और यह सब कुछ हमारे लिए अधिक स्पष्ट तभी होगा जब हम सिद्धांतों की बजाय जमीनी हकीकत को समझने का प्रयास करेंगे।          

अपनी पुस्तक अर्ली इंडिया में महाभारत युद्ध पर टिप्पणी करते हुए एक जगह आप ने लिखा है कि यदि अर्जुन के सारथी कृष्ण की जगह बुद्ध होते तो, अर्जुन को दिया जाने वाला उपदेश कुछ और ही होता। इस संबंध में बताएं।

मेरे कहने का तात्पर्य है कि भागवद गीता एक उत्तर-मौर्य कालीन टेक्स्ट है, और मेरे इस कथन से अधिकांश इतिहासकार सहमत होंगे। इस समय तक बौद्ध और जैन श्रमण परंपरा स्थापित हो चुकी थी, और यह पहले की ब्राह्मणवादी परम्पराओं और नए उभरते भागवत और शैव संप्रदायों के साथ सह-अस्तित्व में थी। धर्म की अवधारणा को पारिभाषित करने वाली दो प्रमुख धाराएँ थीं: ब्राह्मणवादी और श्रमण परंपरा। यह द्वैधता ईसा की पहली सहस्राब्दी में भी कायम रही। वैयाकरण पातंजलि ने इनके बीच के संबंधों की तुलना साँप और नेवले से की थी, यानि इन दोनों के संबंध संघर्षमय थे। कुछ विद्वानों का मत है कि भागवद गीता की शिक्षाएं अशोक की नीतियों और बुद्ध की शिक्षाओं के प्रतिक्रियास्वरूप लिखी गईं थीं।

तो आपका सवाल था कि यदि अर्जुन के सारथी कृष्ण की जगह बुद्ध होते तो, अर्जुन को दिया जाने वाले उपदेश का स्वरूप कैसा होता, यानि बुद्ध ने क्या कहा होता! उन्होंने अर्जुन से कहा होता: “क्या यह युद्ध सचमुच अनिवार्य है? तुम किसलिए युद्ध कर रहे हो? तुम राज्य के लिए युद्ध कर रहे हो, और इसके लिए तुम अपनी ही भाई-बंधुओं की हत्या करोगे”! शायद बुद्ध ने अर्जुन से पूछा होता कि क्या राज्य ही शासन करने का सर्वोत्तम रूप है। आखिरकार, उस समय तक कई गणसंघ अस्तित्व में थे, और बुद्ध ने भी उनकी कार्य-पद्धति की प्रशंसा की थी और बौद्ध धर्म के संघ के गठन में उनकी प्रणाली का अनुसरण भी बुद्ध ने किया था।

पाँचवीं सदी ईसापूर्व के दौरान भी बुद्ध उन गणसंघों के पक्ष में थे, जो अजातशत्रु से लोहा ले रहे थे।

शायद, बुद्ध यह भी पूछते कि क्या अहिंसा का सार्वभौम रूप से पालन नहीं किया जाना चाहिए। महाभारत के संदर्भ में कृष्ण ने यह संदेश दिया कि बुराई से युद्ध करना क्षत्रियों का कर्तव्य है। महाभारत के युद्ध में शामिल क्षत्रियों के दोनों समूह अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन कर रहे थे। ऐसी स्थिति में भी बुद्ध हिंसा को टालने के लिए बात-चीत पर ज़ोर देते। बात-चीत की इस प्रक्रिया के चलते शायद युद्ध ही टल जाता।
दूसरी बात यह कि गीता में कृष्ण यह कहते हैं कि जो उनमें आस्था रखते हैं, वे उनकी शरण में आएं, वे उनके दुखों का समाधान करेंगे। इसे भक्ति परंपरा और भागवत परंपरा से भी जोड़कर देखा जा सकता है। पर बुद्ध ईश्वर के अस्तित्व के प्रति द्वैधवृत्ति जताते। वे दुखों और उनके कारणों को समझने पर ज़ोर देते, और इस समझ के जरिये ही दुखों का समाधान पाया जा सकता था।

देखें तो, बुद्ध का नज़रिया बिलकुल एक चिकित्सक का नज़रिया था।

हाँ! बुद्ध का ज्यादा ज़ोर आत्म-निर्भरता और उनके द्वारा प्रतिपादित एथिकल कोड के अनुपालन पर था। बुद्ध और कृष्ण के दृष्टिकोण में जो अंतर है वह असल में, विवेकपूर्ण समझ और विशुद्ध आस्था के बीच का अंतर है।

युद्ध से पूर्व अर्जुन के मन में उपजे अंतर्द्वंद्व ने कृष्ण को भागवत गीता का उपदेश देने के लिए विवश किया। यही अशांति हमें युधिष्ठिर के मन में भी दिखाई देती है, जब वे भीष्म पितामह के पास यह अनुरोध लेकर जाते हैं कि वे युद्ध को बंद कराएं।

युद्ध के अंत में युधिष्ठिर ही ब्राह्मणों से कहते हैं कि वे राजा नहीं बनना चाहते। वे राजत्व त्यागकर वन में जाने की इच्छा जाहिर करते हैं। राजत्व की अवधारणा में रक्तरंजित अभियान भी निहित है। ब्राह्मण इस बात पर ज़ोर देते हैं कि राजत्व जरूरी है। मुझे यह रोचक लगता है कि महाभारत में युद्ध के आरंभ और अंत में दो ऐसे वृत्तांत आते हैं, जहां युद्ध की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगता है। हमें इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए। क्या गीता शांति और अहिंसा का संदेश देती है, या यह कुछ विशेष परिस्थितियों में हिंसा की अनदेखी करती है।         

मुझे एक सवाल परेशान करता है कि आखिर क्यों महात्मा गांधी ने, जो शांति और अहिंसा के पुजारी थे, गीता को अपने विचारों में इतनी प्रमुखता दी, वह गीता जो युद्ध और हिंसा को तरजीह देती है। 


गांधी के विचारों के बारे में मैं अधिक नहीं जानती और न ही मैंने इतना गांधी साहित्य पढ़ा है कि मैं इस पर अपनी राय दे सकूँ। मुझे लगता है कि हिंसा/अहिंसा, असल में, पूरी कहानी का एक पक्ष भर है। इसमें ऐसी अहिंसा की बात शामिल है, जिसका बचाव आप नैतिक आधार पर कर सकें; जब तक कि उसमें अन्य मुद्दे शामिल न हों। अशोक ने कहा है कि उसे आशा है कि उसके पुत्र और पौत्र अहिंसक रहेंगे, पर यदि उन्हें हिंसक होना ही पड़े तो वे अपने द्वारा दिये जाने वाले दंडों में वे दयाभाव रखेंगे। यह एक तरीके की ‘नियंत्रित अहिंसा’ (कंट्रोल्ड नॉन-वायलेंस) थी। यदि अहिंसा सत्ता और एथिक्स के सवाल से भी जुड़ी हुई है तो हमें इसे अधिक सतर्कता के साथ समझना होगा। भारतीय राष्ट्रवाद ब्रिटिश उपनिवेशवाद की बुराई से लड़ रहा था। गांधी ने हिंसा का समर्थन नहीं किया, पर क्या इसका इशारा भी मिलता है कि अगर परिस्थिति की मांग हो तो एक सीमा तक हिंसा को अनदेखा किया जा सकता है? मुझे अक्सर इस बात पर आश्चर्य होता है कि गांधी ने अशोक और उसके शिलालेखों में इतनी कम रुचि क्यों दिखाई। जबकि उनके उलट, नेहरू ने इन शिलालेखों के संदेशों की सराहना की थी।

गांधी के लिए गीता का एक और पक्ष था: वर्णाश्रम धर्म पर इसका ज़ोर। जब दुनिया इतनी अनिश्चितता से भरी हो और जब लोग नियमों की अवहेलना कर रहें हों तो क्या वर्णाश्रम धर्म जैसा एक निर्देश देना जरूरी रह जाता है?

यह भी सच है कि अपने जीवन के अंतिम चरण में ही गांधी ने पूर्ण रूप से वर्णाश्रम के विचार को त्यागा था।

मुझे यह भी लगता है कि ‘हरिजन’ शब्द का उनका चुनाव यथास्थिति को बनाए रखने और उसमें ही हल ढूँढने की ओर इशारा करता है। गांधी ने इन समुदायों के प्रति अतीत में हुए दमन और शोषण का स्पष्ट शब्दों में विरोध किया, पर सवाल था कि वर्तमान में इस शोषण का प्रतिरोध कैसे किया जाए।

हमें बताएं कि महाभारत की अपेक्षा रामायण के इतने लोकप्रिय होने के लिए कौन से कारक उत्तरदाई थे।

रामायण की लोकप्रियता के साक्ष्य हाल के समय के हैं। जब मैं ‘हाल का समय’ कह रही हूँ तो असल में मैं, समय को प्राचीन इतिहास से जुड़े कालक्रम के तौर पर देख रही हूँ। मैं उस समय की ओर इशारा कर रही हूँ, जब रामानंदी संप्रदाय ने रामायण और राम-भक्ति का विधिवत प्रचार शुरू किया और इसी समय के आस-पास ही, तमिल में कंब रामायण, बांग्ला में कृत्तिबास रामायण और अवधी में तुलसीदास कृत रामचरितमानस की रचना हुई। ये सभी मध्यकाल में लिखे गए, यानि ईसा की दूसरी सहस्राब्दी में। 


रामायण एक ऐसे समाज में आते हुए नए बदलावों को भी परिलक्षित करता है, जिसमें परिवार, संपत्ति, प्रशासन, राजत्व प्रमुख स्थान लेते जा रहे थे। रामायण तक आते-आते सवालों के जवाब बिलकुल सीधे और सपाट हो जाते हैं। इसकी कहानी भी सरल है और नैतिकता बिलकुल सुस्पष्ट। राम का व्यक्तित्व भी, अर्जुन और युधिष्ठिर से कहीं कम जटिल है। राम को राजत्व की अवधारणा के बारे में कोई संदेह या भ्रम नहीं है।

आपने तर्क और आस्था के विरोधाभास की ओर भी इशारा किया है। एक इतिहासकार का अपना धार्मिक मत बिलकुल हो सकता है, पर इतिहास के अध्ययन में उसके धार्मिक मत के लिए कोई जगह नहीं होगी।

मेरा तात्पर्य है कि इतिहासकार को अपने धार्मिक विश्वास छोड़ने की जरूरत नहीं है, पर इतिहासकार द्वारा की जाने वाली स्रोतों की व्याख्या को इन विश्वासों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। एक इतिहासकार में धार्मिक अस्मिता की उपस्थिति या उसका अभाव थोड़ी मात्रा में उसकी व्याख्याओं पर प्रभाव छोड़ सकता है, पर एक इतिहासकार को हमेशा इसके प्रति सजग होना चाहिए। हर इतिहासकार में कुछ अंश तक पूर्वाग्रह होते हैं, पर अच्छा इतिहासकार वही है जो इनके प्रति सचेत हो, और जो पक्षपातरहित होने की हरसंभव कोशिश करता है। लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि तर्क करने का एक ही तरीका नहीं होता। इसलिए हमें व्यापक संपूर्णता को भी ध्यान में रखना होगा।

तो आप मानती हैं कि नयी व्याख्याओं के लिए हमेशा पर्याप्त संभावना रहती है।

हाँ, बिलकुल। मेरे विचार में इतिहास विषय के बारे में सबसे रोचक बात यही है कि इतिहासकार के तौर पर आप लगातार कुछ-न-कुछ सीखते रहते हैं। आप जब भी, नए विश्लेषणों से युक्त कोई किताब उठाते हैं तो ज्ञान का जो परस्पर जुड़ाव है, वह हमेशा आपको प्रेरित करता है, अंतर्दृष्टियाँ देता है और सवाल पूछने को भी उकसाता है। असल में, ज्ञान निर्भर ही होता है सवाल पूछने पर।

आप जैसे व्यापक अनुभव और अकादमिक प्रतिष्ठा वाले विद्वान, युवाओं को इस बात की प्रेरणा देते हैं कि आज के समय में, प्रभुत्वशाली विचारों के बीच भी, वे खुलकर सोच सकें, चिंतन कर सकें।  

आज रूढ़िवादी लगातार अपना प्रभुत्त्व स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, और जब मैं या दूसरे अन्य लोग इनका विरोध करते हैं, तो इसके पीछे यही विचार है कि अगर मैं इतिहास से जुड़ी समस्याओं पर स्पष्टीकरण दे रही हूँ तो सिर्फ समकालीन समय के लिए नहीं बल्कि ऐसा मैं इसलिए भी कर रही हूँ क्योंकि यह बात आने वाली पीढ़ियों के हित में है। यह बहुत जरूरी है कि सवाल करने और वाद-विवाद-संवाद की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहे। इसी तरह वर्तमान को समझने के क्रम में अतीत का अध्ययन करना हमेशा ही प्रेरणादायक और शिक्षाप्रद रहेगा।

साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। आदिकालीन भारत का सामाजिक-आर्थिक इतिहास उनका अध्ययन क्षेत्र है। उनके द्वारा लिखित/संपादित प्रमुख पुस्तकें हैं: ‘वारफेयर फॉर वेल्थ: अर्ली इंडियन पर्सपेक्टिव’, ‘अ सोर्सबुक ऑव इंडियन सिविलाइज़ेशन’, ‘ट्रेड इन अर्ली इंडिया’, ‘ट्रेड एंड ट्रेडर्स इन अर्ली इंडियन सोसायटी’, ‘एक्सप्लोरिंग अर्ली इंडिया’।

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ इतिहास और वर्तमान का संबंध-3: रोमिला थापर ”

  2. By Kavita Rawat on January 2, 2016 at 2:15 PM

    बहत अच्छी सार्थक चिंतनशील साक्षात्कार प्रस्तुति हेतु आभार!

  3. By Dwarika Prasad Agrawal on January 4, 2016 at 9:01 AM

    आभार। इस रोचक और ज्ञानवर्धक चर्चा को पढ़कर आनंद मिला।

  4. By Dwarika Prasad Agrawal on January 4, 2016 at 9:01 AM

    आभार। इस रोचक और ज्ञानवर्धक चर्चा को पढ़कर आनंद मिला।

  5. By Ramdeo Singh on January 20, 2016 at 8:40 AM

    वर्तमान संदर्भ में इस बातचीत का काफी महत्व है ।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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