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इतिहास और वर्तमान का संबंध-2: रोमिला थापर

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/01/2016 08:00:00 AM


 प्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रोमिला थापर से रणबीर चक्रवर्ती की इतिहास, समाज और संस्कृति पर बातचीत. साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार, अंग्रेज़ी पाक्षिक फ्रंटलाइन में प्रकाशित, रोमिला थापर के लंबे साक्षात्कार “लिंकिंग द पास्ट एंड द प्रेजेंट” का कुछ संपादित रूप है। यहां इसका पहला हिस्सा प्रकाशित किया जा चुका है। अनुवाद: शुभनीत कौशिक।

निर्देशात्मक (नॉर्मेटिव) टेक्स्ट से जुड़े सवाल पर आपका मत।
 
आज इतिहासकार निर्देशात्मक टेक्स्ट पर सवाल उठा रहे हैं, जैसे ये निर्देश आखिर रचे क्यों गए। उदाहरण के लिए, मनु ने विवाह के एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न आठ प्रकारों की चर्चा की है। जिनमें कन्यादान से लेकर राक्षस विवाह और पिशाच विवाह तक शामिल हैं। एक ही समाज में आठ तरह के विवाहों की मौजूदगी संभव नहीं जान पड़ती। हम जानते हैं कि बिरादरी के संबंधों को लेकर हर संस्कृति और जाति कितनी सजग रही है, और विवाह के स्वरूपों में यह बात अंतर्निहित ही है। तो अब सवाल यह है कि अगर आठ तरह के विवाहों की सूची मिलती है, तो ऐसी सूची के प्रकार्य (फंक्शन) क्या थे। या कि यह सूची विवाह के हर संभव रूप के बारे में एक फंतासी भर थी। विवाह के इन प्रकारों को किन लोगों या समूहों से जोड़ा जा रहा था? तो क्या यह अतीत की बहुतेरी संस्कृतियों को किसी तरह वैधता देने का प्रयास था। इस तरह इतिहासकार को, दैनंदिन और निर्देशात्मक में अंतर करना होगा।

असल में व्यवस्था में काफी तरलता (फ्लुइडिटी) थी। निर्देशात्मक टेक्स्ट के संदर्भ में इतिहासकार को यह भी पूछना होगा कि ये किन लोगों को ध्यान में रखकर रचे गए और क्यों?

हाँ, और यह भी कि इनका लेखक कौन था और पाठक/श्रोता कौन। एक स्तर पर ये निर्देशात्मक टेक्स्ट ऐसी संहिता थे, जिनसे कुछ मसलों में राय ली जाती थी, यद्यपि इन टेक्स्ट में किसी पूर्व-उदाहरण या नजीर का मिलना दुर्लभ है। इनका प्रयोग नव-ब्राह्मणों को पढ़ाने में भी शायद होता रहा हो, जिन्हें आरंभ में कर्मकांडों और टेक्स्ट से समस्या रही हो। उन्हें इसलिए मनु की चर्चा करनी होती होगी ताकि वे समझ सकें कि टेक्स्ट में क्या सुझाया जा रहा है और क्या यह स्थानीय स्तर पर लागू होता है।

निर्देशात्मक टेक्स्ट में भी विविधता है। मसलन, बाद के टीकाकार, जैसे मनु के पाँच सौ साल बाद के टीकाकार – कुल्लुक भट्ट, बिलकुल एक जैसे निर्देशों की बात नहीं करते। 

यह रोचक है कि ये टीकाएं ठीक उसी समय लिखी गईं, जब सामाजिक संहिताएँ नयी दशाओं का सामना कर रही थीं और नियमों पर पुनर्विचार जरूरी हो चला था। अगर उस समय के साहित्य की मानें तो यह समाज के उच्च समूहों के लिए संकट का समय था। असल में, इतिहास में रूढ़िवादी ब्राह्मणवाद के दो संकट-बिन्दु थे। पहला, जब बौद्ध और जैन धर्म ने लोकप्रियता हासिल कर ली, जिसके फलस्वरूप ब्राह्मणवाद को उनकी आलोचना झेलनी पड़ी। नतीजतन हम पाते हैं कि पुराणों में जैनियों और बौद्धों को ‘नास्तिक और पाषंडी’ बताया जाता है। दूसरा संकट का दौर, उत्तर-गुप्त काल में देखने को मिलता है, जिसे अक्सर ‘ब्राह्मण पुनरुद्धार’ का भी काल कहा जाता है। पर इसका अध्ययन होना चाहिए कि आखिरकार पुनरुद्धार के नाम पर किन चीजों का उद्धार किया जा रहा था।

पर यह वैदिक पुनरुद्धार नहीं था।

नहीं। पुराण वेदों के प्रति श्रद्धा जरूर रखते हैं पर वे वैदिक ब्राह्मणवाद से जुड़े पूजा-पद्धति और यहाँ तक कि उससे जुड़े विश्वास और धारणाओं में भी परिवर्तन की मांग कर रहे थे। इस समय से जुड़े कर्मकांडों में बड़े यज्ञों की बजाय भक्ति और पूजा पर ज़ोर ज्यादे था। इनमें मंदिरों में जाकर मूर्ति की पूजा करने पर भी ज़ोर था।

अपने अकादमिक जीवन के पड़ावों के बारे में बताएं और उन लेखकों और विचारकों के बारे में भी, जिनका आपके इतिहासलेखन पर और आपकी विचार प्रक्रिया पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा हो।  

जब मैंने प्राचीन भारत पर अपना शोध आरंभ किया, उस समय इंडोलॉजी काफी प्रभावशाली थी। इसमें संस्कृत और हिन्दू धर्म के अध्ययन पर सबसे ज्यादे ज़ोर था। उस समय प्राचीन भारत का इतिहास भी बतौर इंडोलॉजी ही पढ़ाया जाता था, जिसमें प्राचीन समाजों की व्याख्या पर अधिक ज़ोर नहीं दिया जाता था। एक दृष्टि से देखें, तो उस समय प्राचीन भारत का इतिहास ‘हिन्दू इतिहास’ भर होकर रह गया था। 1960 के दशक से इस प्रक्रिया में बदलाव आने शुरू हुए।

इस बदलाव का एक कारण तो यह था कि योरोपीय चिंतन में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले समाजशास्त्रीय अध्ययनों जैसे, मार्क्स और एंगेल्स का लेखन, दुर्खीम, मैक्स वेबर, मौस, अनाल्स स्कूल का इतिहासलेखन आदि अंग्रेज़ी में अनूदित हुए और उन पर गंभीर चर्चा शुरू हुई। इन विचारकों ने इतिहास के अध्ययन को एक नयी बौद्धिक पृष्ठभूमि दी। मौस और हेल्ड जैसे विद्वानों ने उपहारों के आदान-प्रदान के संबंध में लिखते हुए, महाभारत से सूचनाएँ जुटाईं और इसे बिलकुल नए परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश की। दुर्खीम और मैक्स वेबर का क्रमशः बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्मसंबंधी अध्ययन विचारोत्तेजक था। यद्यपि, कार्ल मार्क्स की ‘एशियाटिक मोड ऑव प्रोडक्सन’ की अवधारणा को आगे चलकर भारतीय मार्क्सवादी इतिहासकारों ने नकार दिया, फिर भी मार्क्स को योरोपीय समाज से जुड़ी उनकी विश्लेषण पद्धति को समझने के लिए पढ़ा गया। ऐसा इस उद्देश्य से नहीं किया गया कि उस पद्धति को जस-का-तस भारतीय अतीत पर थोंप दिया जाये, बल्कि उन संभावित सवालों को जानने के लिए, जो भारतीय अतीत के संबंध में भी पूछे जा सकते थे।

इन लेखकों को पढ़कर, हम यह अधिक बेहतर समझ पाये कि प्राक-आधुनिक समाजों के कार्य (फंक्शन) करने का तरीका अलग था। इन आदिकालीन समाजों को समझने के लिए जरूरी है कि हम उन पर आधुनिक मॉडलों को थोंपने की बजाय तत्कालीन स्रोतों को फिर से पढ़ें और ये समझने की कोशिश करें कि वे स्रोत अपने समाजों की व्याख्या कैसे कर रहे थे।

भारत में सामाजिक-आर्थिक इतिहास को अपने-आप ही ‘मार्क्सवादी इतिहास’ मान लिया जाता है। इसका कारण यह है कि पहले भी और आज भी, ऐसे कुछ ही लोग हैं जो यह जानने की जहमत उठाते हैं कि आखिर ‘इतिहास के मार्क्सवादी दृष्टिकोण’ का मतलब क्या है। ऐसे लोग समाज और इतिहास के विश्लेषण के सिद्धांतों के बारे में सीमित जानकारी रखते हैं और अक्सर आर्थिक नियतिवाद को मार्क्सवादी इतिहास से जोड़ देते हैं। इस तरह हर उस विद्वान पर जो आर्थिक इतिहास पर लिखता है या सामाजिक और आर्थिक इतिहास को तवज्जो देता है, ‘मार्क्सवादी’ होने का लेबल चस्पा कर दिया जाता है।

अपने दिल्ली विश्वविद्यालय के दिनों में, दिल्ली स्कूल ऑव इकोनॉमिक्स के प्राध्यापकों से हुई बातचीत भी मेरे लिए काफी अहम साबित हुई। इनमें समाजशास्त्री, एम एन श्रीनिवास और आंद्रे बेते, तथा अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन, जगदीश भगवती और सुखमय चक्रवर्ती प्रमुख थे। डी डी कोसांबी और राम शरण शर्मा के द्वारा आदिकालीन भारत पर लिखी पुस्तकों ने भी मुझे सोचने को विवश किया। मुझे यह बात स्पष्ट होने लगी कि इतिहास सिर्फ सूचनाएँ एकत्र करना भर नहीं है। लंदन के छात्र दिनों में हमसे यह अपेक्षा की जाती थी कि हम प्राचीन भारत के बारे में जरूर विस्तार से पढ़ें, पर अपने बौद्धिक विकास के लिए, विषय के रूप में इतिहास के बारे में और अधिक विस्तार से पढ़ें। आदिकालीन इतिहास के इंडोलॉजी से समाज-विज्ञानों की ओर उन्मुख होने ने, इतिहास की प्रासंगिकता को और अधिक बढ़ाया। अब अतीत को समझने के साथ-साथ अपनी समकालीन दुनिया को भी समझने के लिए, अतीत की नए सिरे से व्याख्या होने लगी। अतीत और वर्तमान के बीच की यह कड़ी तब और अधिक स्पष्ट हो जाती है, जब हम यह कहते हैं कि हम अतीत का अध्ययन इसलिए कर रहे हैं ताकि अतीत की व्याख्या करने के साथ ही हम अपने समय को भी अधिक बेहतर ढंग से समझ सकें।

तुलनात्मक इतिहास में मेरी रुचि ने इतिहास के प्रति मेरी समझ को और भी विस्तार दिया। चीनी इतिहास और ग्रीक-रोमन इतिहास के अध्ययन से मुझे आदिकालीन भारतीय समाज को भी समझने में सहायता मिली। होमर के महाकाव्य पर लिखने वाले मोजेज़ फ़िनले और इतिहासलेखन की ग्रीक-रोमन परंपरा पर लिखने वाले आर्नाल्डो मोमिग्लियानो के लेखन से भी मुझे क्रमशः भारतीय महाकाव्यों और भारतीय इतिहासलेखन की परंपरा को समझने में मदद मिली।

इतिहासकारों का भी अपना अतीत होता है और उनमें भी बदलाव आते हैं। मैं अक्सर अपने छात्रों से यह बात कहता हूँ कि मौर्य साम्राज्य के बारे में 1961 और 1996 में लिखी गई, प्रो रोमिला थापर की किताबों को पढ़ें तो आपका साबका दो अलग-अलग इतिहासकारों से होगा। यही इतिहास की ताकत है, यह इस विषय की कमजोरी नहीं है। क्या आप हमें यह बताएंगी कि कैसे समय के साथ, मौर्यों के विषय में आपकी अवधारणाओं में बदलाव आया।

1961 में लिखी गई मेरी किताब [अशोक एंड द डिक्लाइन ऑव मौर्याज़], जो मेरे शोधग्रंथ पर ही आधारित थी, कुछ हद तक इंडोलॉजी से प्रभावित थी। मैं संरचनाओं पर ध्यान दे रही थी और इस किताब में किया गया काल-विभाजन भी, उस समय के इतिहासलेखन में प्रचलित काल-विभाजन से प्रभावित था। इसके अतिरिक्त मेरी कोशिश अशोक को एक राजनीतिज्ञ के रूप में ऐतिहासिक संदर्भ में रखने की भी थी। अगर वह एक शासक था तो निश्चय ही उसके पास कुछ प्राधिकार (अथॉरिटी) भी थे। तब यह सवाल उठता है कि अशोक की कौन-सी गतिविधियाँ उस संसार में, जिसमें वह रहता था, रहने से उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रियाएँ थीं और कौन-सी अशोक के अपने सोच का नतीजा थीं! सौभाग्य से हमारे पास अशोक के शिलालेख भी उपलब्ध हैं जो अशोक के समकालीन तो हैं ही, साथ ही हमें अशोक की गतिविधियों के बारे में भी महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हैं। तब दूसरा सवाल यह उठता है कि बाद के स्रोतों में, मसलन ‘दिव्यावदान’ और ‘महावंश’ में बतौर एक शासक और बतौर एक बौद्ध, अशोक का कैसा चित्रण किया गया।

हाँ इसी से जुड़ा एक सवाल यह है कि आखिरकार बाद के स्रोतों ने अशोक को इस रूप में क्यों याद किया?

अशोक पर अपनी पहली पुस्तक के प्रकाशन के बाद, अन्य संदर्भों में हुए प्राक-आधुनिक समाजों और धर्म के समाजशास्त्रीय अध्ययन ने मुझे नवीन दृष्टि दी। स्टेनली तंबिया और लेस्ली गुनावर्धने के बौद्ध राजव्यवस्थाओं के अध्ययन ने मुझे नए किस्म के सवालों से परिचित कराया। मेरी रुचि उन सवालों में ज्यादे थी, जो ये विद्वान अपने स्रोतों से पूछ रहे थे और इस बात में भी कि कैसे ये विद्वान अपने अध्ययन में अतीत के संपर्क-सूत्रों को जोड़ रहे थे।

क्या आप मानती हैं कि अतीत को बेहतर समझने के लिए अपने स्रोतों का गहराई से अध्ययन करते हुए उनसे न सिर्फ सवाल पूछने चाहिए बल्कि उनके प्रति थोड़ी ‘अश्रद्धा’ भी रखनी चाहिए।

हाँ, बिलकुल। मुझे याद है कि एक बार जब मैंने एक सेमिनार में एक पर्चा पढ़ा था तो बौद्ध ग्रंथों के एक प्रख्यात विद्वान ने मेरे लेख पर टिप्पणी करते हुए, मुझे अपने स्रोतों के प्रति संदेहभाव विकसित करने का सुझाव दिया था। खासकर, अपने आरंभिक अध्ययनों में जबतक कि मैं उन स्रोतों की प्रामाणिकता के विषय में निश्चिंत न हो जाऊँ।

ये स्रोत दरअसल हमारे दोस्त की तरह होते हैं, जो हमें उस शख़्स या उस घटना-विशेष के बारे में जानकारी देते हैं, जिनका अध्ययन हम कर रहे होते हैं। उनके कथ्य की सत्यता की जाँच और पुष्टि हमें खुद ही करनी होती है। मैंने अपने स्रोतों से नए सवाल पूछने आरंभ किए। मसलन, ‘अर्थशास्त्र’ जैसे एक टेक्स्ट को पढ़ते हुए, मैंने पूछा कि “क्या सचमुच मौर्य साम्राज्य वैसा ही था, जैसे इस ग्रंथ में बताया जाता है। क्या सभी कुछ केंद्रीकृत और पूर्ण नियंत्रण में था”। इसके अतिरिक्त मैंने यह समझने की कोशिश कि मौर्य साम्राज्य एक प्रणाली (सिस्टम) के रूप में कैसे कार्य करता था। अगर राजस्व-संग्रहण की ही बात लें, तो मौर्य काल में यह कैसे होता था।

क्या 20वीं सदी के पांचवें दशक में अपने लेखन के जरिए, आप यह रेखांकित कर रही थीं कि भारत को एक मजबूत सरकार की आवश्यकता है? और आप ऐतिहासिक प्रमाणों से यह भी दिखा सकती थीं कि भारत में मजबूत सरकार की एक परंपरा थी। असल में, वर्तमान को अतीत की जरूरत थी।

वर्तमान को वैधता देने के लिए इतिहास की हमेशा ही जरूरत होती है। मेरा तात्पर्य है, जब मैं अतीत को समझने और उसकी व्याख्या करने की बात कर रही हूँ तो वह बौद्धिक जिज्ञासा से प्रेरित है। पर राजनीतिक तौर पर अतीत का कैसे इस्तेमाल किया जाता है, यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण सवाल है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। मसलन, अगर हम मौर्य साम्राज्य और कौटिल्य का ही उदाहरण लें तो हमें पूछना पड़ता है कि जहाँ कौटिल्य यह कहता है कि राजा के आदेशों का अनुपालन होना चाहिए, तो ऐसी स्थिति में, सीलबंद आदेशों को पाटलिपुत्र से तक्षशिला तक ले जाने में कितना समय लगता रहा होगा। शायद दो महीने, और तब तक शायद वहाँ निर्णय लिया जा चुका होगा।

अब इस पूरी स्थिति पर पुनर्विचार करने पर हम पाते हैं कि इस प्रक्रिया में लगे समय में जरूर अंतर रहा होगा या यह भी संभव है कि कलिंग और तक्षशिला के राज्याधिकारियों को दिये आदेशों में कुछ फर्क होता हो। तो क्या इस तरह हम वैकल्पिक तौर पर एक ऐसे प्रशासन के बारे में सोच सकते हैं जो आधिकारिक जरूरतों के आधार पर स्थानीय दशा को ध्यान में रखते हुए श्रेणीबद्ध होता हो। मौर्य काल में एक केंद्रीकृत शासन प्रणाली जरूर अस्तित्त्व में थी और कौटिल्य उसी की वकालत कर रहे थे। पर शायद इसका प्रभाव-क्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित था। इस तरह मेरे अनुसार, मौर्य राज्य को केंद्रीय प्रशासन के घटते हुए नियंत्रण के अनुसार क्रमशः तीन भागों में रखा जा सकता है: महानगरीय राज्य (मेट्रोपॉलिटन स्टेट); ‘कोर’ क्षेत्र; परिधीय क्षेत्र।

यहाँ मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि मैं प्रशासनिक पैटर्न में अंतर की बात कर रही हूँ, न कि शासक की सत्ता/शक्ति के प्रत्यक्षीकरण में अंतर की। मेरा ज़ोर इस बात पर है कि एक ही शासक द्वारा भिन्न क्षेत्रों में, जो अपनी आर्थिक प्रणाली और सामुदायिक व्यवस्था के आधार पर भिन्न-भिन्न हों, शासन की प्रणाली में अंतर रखा जा सकता है। संचार के साधनों में सुधार और हाशिए के क्षेत्रों में बसावट के साथ ही, धीरे-धीरे ये क्षेत्र भी केंद्रीय प्रशासन के दायरे में आ गए। इसी कारण गुप्त साम्राज्य की शासन प्रणाली मौर्य साम्राज्य की शासन प्रणाली से भिन्न है।                 
    
क्या आपको लगता है कि पिछले 25 वर्षों में भारतीयों में अलग मतों और दृष्टिकोणों को लेकर असहिष्णुता बढ़ी है? मैं पेशेवर इतिहासकारों की बात नहीं कर रहा हूँ, जिनमें वाद-विवाद-संवाद की परंपरा अब भी जारी है। मेरा इशारा तर्कवादी भारतीय परंपरा की ओर था, क्या आप आज, खासकर ऐतिहासिक समझ के मसले पर, तर्कवादी भारतीय (आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन) की कमी या अनुपस्थिति महसूस करती हैं?

नहीं, मुझे जो बात चुभती है वह है ‘उदार मूल्यों’ (लिबरल वैल्यूज) का ह्रास। इन मूल्यों का आज़ादी के छह दशक बीत जाने के बाद और विस्तार होना चाहिए था, पर ऐसा हुआ नहीं! इन ‘उदार मूल्यों’ में यकीन करने वाले लोग अब गिनती भर ही रह गए हैं। परेशान करने वाली बात यह है कि जिन मुद्दों का सामना हम आज कर रहे हैं, अधिकांश लोग उन मुद्दों पर गहराई से सोचना नहीं चाहते। वे चीजों को जस-का-तस स्वीकार कर लेते हैं। शिक्षा भी युवाओं को स्वतंत्र रूप से सोचने और अपनी इर्द-गिर्द की दुनिया के बारे में सवाल करने के लिए प्रोत्साहित नहीं कर रही है। वे चुपचाप उस बात में यकीन कर लेते हैं जो उन्हें बताई जाती है, बगैर सवाल पूछे या उस पर तार्किक ढंग से सोचे बिना।

इंटरनेट और सोशल मीडिया पर आपका मत।

इंटरनेट पर हर तरह के लोग सूचना का संचार कर रहे हैं। इंटरनेट पर सूचनापरक और सुविचारित लेखों से लेकर अज्ञानता से भरे हुए लेख तक मौजूद हैं। यह पूरी तरह से मुक्त है। आपको यह ध्यान रखना होगा कि जब आप ऐसे मुक्त स्रोतों से सूचना ले रहे हैं, जहाँ आप इन स्रोतों की विश्वसनीयता के बारे में निश्चिंत नहीं हो सकते, तो आप गलत जानकारी पाने का भी खतरा उठा रहे हैं। लोगों में इस खतरे के प्रति जागरूकता नहीं है।

पहले के बरक्स आज सोशल मीडिया को बार-बार और कहीं ज्यादे उद्धृत किया जा रहा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया, प्रिंट और विजुअल मीडिया, आज मत-निर्माता (ओपिनियन मेकर) की भूमिका निभा रहे हैं। ये सभी युवाओं में विशेष रूप से प्रभावी हो गए हैं, जिनमें अच्छी किताबों को पढ़ने की प्रवृत्ति में गिरावट आई है। इसलिए अब यह बेहद ज़रूरी हो गया है कि इन्हीं एजेंसियों का प्रयोग कर यह बताया जाये कि इतिहास के अध्ययन के अर्थ क्या हैं, यह बताने के लिए कि अब इतिहास भी एक ऐसा विषय है, जिसकी अपनी एक पद्धति है, जिसमें आलोचनात्मक विश्लेषण और मूल्यांकन का एक तरीका है। यह कहना होगा कि “इतिहास की सैद्धांतिक समझ और विश्लेषण की ऐतिहासिक पद्धति से परिचित हुए बिना, इतिहास और इतिहास संबंधी लेखन पर टिप्पणी करने से बचें। वैसे ही जैसे कि आप भौतिक विज्ञान से अनभिज्ञ होने की दशा में एक भौतिक-विज्ञानी की खोज पर टिप्पणी करने से बचेंगे”। पर आजकल कोई भी इतिहासकार के दृष्टिकोण का मूल्यांकन करने के अधिकार का दावा करता है और वह भी इतिहास के बारे में कुछ जाने बगैर। ऐसे लोग असहमत होने पर इतिहासकार को भला-बुरा भी कहने लगते हैं। मैं आलोचना के इस अधिकार का विरोध नहीं कर रही, मेरा कहना सिर्फ यह है कि आलोचना करने से पहले अगर थोड़ा आत्म-मूल्यांकन कर लिया जाये तो अच्छा रहेगा।

क्या आप कहना चाहती हैं कि अकादमिक इतिहास को आम लोगों तक पहुंचाने के प्रयास किए जाने चाहिए और इसे पब्लिक स्पेस में सबकी पहुँच के दायरे में लाना चाहिए। 

बिलकुल। हमारे यहाँ ‘बौद्धिक मध्यस्थों’ (इंटेलेक्चुयल मिडलमेन) का अभाव है। यूरोप और अमेरिका में आपको ऐसे लोग मिलेंगे। वहाँ एक ओर तो वे शोधकर्ता हैं जो अधुनातन शोध कर रहे हैं और दूसरी ओर वे लोग हैं जो उस विषय को समझते हैं और इसे आम लोगों तक सहज भाषा में पहुंचा सकते हैं। विषय-वस्तु में कोई घालमेल किए बिना, ये ‘बौद्धिक मध्यस्थ’ आम जनता और शोधकर्ता के बीच सेतु का काम करते हैं। हमारे पास जनता और शोधकर्ता को जोड़ने वाली ये कड़ियाँ नहीं हैं।
 

[यहां पढ़ें: भाग 3]

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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