हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सहिष्णुता के अहंकार में डूबा समाज

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/25/2015 06:57:00 PM


आमिर खान के बयान के बाद छिड़े विवाद पर विद्या भूषण रावत की टिप्पणी।

आमिर खान की पत्नी के 'विदेश में बसने की खबर' से हर 'भारतीय' सदमे में हैं और उनको शाहरुख़ खान के साथ पाकिस्तान भेजने की बात कह रहे है। आमिर के पुतले जलाए जा रहे हैं और देश की विभिन्न अदालतों में उनके खिलाफ मुकदमे किए गए हैं जिनमें देशद्रोह का मुकदमा भी शामिल है। सबसे मज़ेदार बात यह है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय इस अभियान को बहुत हवा दे रहे हैं. वैसे भारत में रहने वाले लोग भी कह रहे हैं कि आमिर ने गद्दारी की है और उनको इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। है न कितनी अच्छी बात कि हम पश्चिमी लोकतान्त्रिक देशों में रहकर पूरे अधिकार के साथ भारत माता की जय बोलना चाहते हैं, मंदिर बनाना चाहते हैं, मोदी की बड़ी बड़ी रैलियां करना चाहते हैं लेकिन अपने देश में हम पूरी दबंगई दिखाना चाहते हैं। अगर यही बात अमिताभ करते तो क्या उन्हें कहीं भेजने की बात होती?

हम फ़िल्मी कलाकारों को भगवान बनाकर न देखें। व्यक्तिगत तौर पर मैं आमिर खान को ढकोसलेबाज़ मानता हूँ क्योंकि उनकी सत्य की जीत 'रिलायंस' के चंदे से होती है और भारत में अगर हम भ्रष्टाचार को लेकर लालू को इतना गरियाते हैं तो अम्बानी तो उस बीमारी के जनक थे। क्या अर्नब गोस्वामी जैसे भारत में 'ईमानदारी' का राग अलापने वाले मसीहा लोग अम्बानी और अडानी के बारे में बात करेंगे? जब करप्शन की बात हो तो राजनेताओं का ही हिसाब किताब क्यों हो, उद्योगपतियों का क्यों नहीं, क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगा उनकी ही दुकानों से निकलती है। इसलिए आमिर ने जो कहा वो बहुत सोच-विचार, रिहर्सल के बाद कहा और वो उनका व्यू पॉइंट है और उसे रखने की उनको छूट होनी चाहिए। उनको पाकिस्तान भेजने और उनको गाली देकर हिंदुत्व के लठैत आमिर की ही बात को सही साबित कर रहे हैं।

हालांकि, मैं आमिर की बातों से कत्तई इतेफाक नहीं रखता। सबसे पहले तो आमिर की यह बात गलत है कि भारत में असिहष्णुता अचानक बढ़ गई। हमारा देश असल में असभ्य और क्रूर है, जहाँ दहेज़ के लिए लड़कियां रोज जलती हैं, जहाँ प्रेम विवाह करने पर माँ बाप अपने ही बच्चों की निर्ममता से हत्या करने से नहीं घबराते, जहाँ किसी भी लड़की का शाम को घर से बाहर निकलना मुश्किल होता है। जहाँ सती का आज भी महिममंडन होता हो और विधवा होने पर औरतों की जिंदगी नरक बना दी जाती हो, जहाँ आज भी मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर उनकी हत्या कर दी जाती हो, जहाँ किसी के घर में क्या बन रहा हो उस पर समाज नियंत्रण करना चाहता हो, जहाँ स्कूलों से बच्चे इसलिए निकल कर चले जाते हो कि खाना किसी दलित महिला ने बनाया है, उस देश की महानता और संस्कृति का क्या कहें, जहां एक समाज को पढ़ने का हक़ नहीं और दूसरे को केवल मलमूत्र उठाने की जिम्मेवारी दी गई हो, जिसके छूने भर से लोग अछूत हो जाएं! लेकिन भारत की महान सभ्यता का ढोंग करने वालों का ध्यान इधर कभी नहीं गया। ऐसा नहीं कि इस विषय में लिखा नहीं गया हो या बात नहीं की गई हो।

असहिषुणता का इतिहास लिखें तो शर्म आएगी, तब आमिर खान से क्यों इतनी नाराज़गी है? मतलब साफ़ है। भारत के इलीट मुस्लिम सेकुलरिज्म के खेल में भारत की सहिष्णुता के सबसे बड़े 'ब्रांड' एम्बेसडर हैं। और जो व्यक्ति 'अतुलनीय भारत' की नौटंकी करता रहा हो वो अचानक पाला क्यों बदल बैठा! आमिर खान और अन्य कलाकारों ने भारत के 'सहिष्णु' होने के सबूत दिए और साथ ही दलितों या पसमांदा मुसलमानों की हालतों पर चुप रहकर उन्होंने हमेशा ही 'सहिष्णु' परम्परा का 'सम्मान' किया है। शायद रईसी परंपरा में केवल बड़े बड़े लोगों की बड़ी बड़ी बातें सेकुलरिज्म होती हैं लेकिन हलालखोर, कॅलण्डर, नट या हेला भी कोई कौम है, इसका शायद इन्हें पता भी नहीं होगा। हमें पता है कि अभी तक मैला ढोने की प्रथा के विरुद्ध आमिर ने कभी निर्णायक बात नहीं की, वो केवल टीवी शो में आंसू बहाने तक सीमित थी।

तो फिर क्या बदला? लोग कहते हैं कि कांग्रेस के ज़माने में भी सेंसरशिप लगी और फिल्में प्रतिबंधित हुईं। बिलकुल सही बात है। हम इमरजेंसी के विरुद्ध खड़े हुए लेकिन अब ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ दल का मुख्य आदर्श संजय गांधी और चीखने चिल्लाने वाले मुल्ले हैं जो किसी भी उदार विचार को या उनसे विपरीत विचार को डंडे और धमका डरा के रुकवाना चाहते हैं। फ़िल्मी लोगों को उतनी ही तवज्जो मिलनी चाहिए जिसके वे हक़दार हैं। पिछले कुछ वर्षों में बम्बइया फ़िल्मी लोग हिंदुत्व का एजेंडा लागू करने में सबसे प्रमुख रहे हैं और उनकी प्रसिद्धि ने चुनाव भी जितवाया है लेकिन उनमें कोई भी ऐसे नहीं हैं जो शाहरुख़, आमिर या अमिताभ का दूर दूर तक मुकाबला कर सके। अमिताभ हालाँकि गुजरात या अन्य सरकारी विज्ञापनों में आते हैं लेकिन वो भी राजनैतिक हकीकतों से वाकिफ हैं, इसलिए चुप रहते हैं। हालाँकि देर सवेर उन्हें मुंह खोलना पड़ेगा। आज के हिंदुत्व कॉर्पोरेट के दौर में भारत की आक्रामक मार्केटिंग चल रही है इसलिए आमिर या शाहरुख़ जो वाकई में भारत के सवर्णों की 'सहनशीलता' के 'प्रतीक' हैं इसलिए उनसे ये 'उम्मीद' ये की जाती है कि वे डॉ. ए. पी. जे. कलाम की तरह अपने 'भारतीय' होने का सबूत दें। कोई मुसलमान यदि अपने दिल की बात रख दे तो वो 'देशद्रोही' है। जिन लोगों को सुनकर हम बड़े हुए उन साहिर, दिलीप कुमार, मोहम्मद रफ़ी, बेगम अख्तर को धर्म के दायरे में डाला जा रहा क्योंकि वे अपनी एक राय रखते हैं। कई बार फिल्म स्टार, गायक या खिलाड़ी लोग वो बात कह देते हैं जो उनके कई प्रशंसकों को नहीं जंचती। उसमें कोई बुरी बात नहीं है। हम आमिर खान से साम्प्रदायिकता और सहिष्णुता का ज्ञान नहीं लेते, अपितु उनकी फिल्म इसलिए देखते हैं कि वो साफ सुथरी फिल्म बनाते हैं। क्या हम रवीना टंडन, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान या मनोज तिवारी से ज्ञान लें? हाँ फिल्मो में बहुत से लोग रहे हैं जिन्होंने गंभीर विषयों पर बोला है और उनकी समझ समझ है। बाकी हमको कोई कलाकार इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि हमें उसकी एक्टिंग अच्छी लगती है या फिल्म अच्छी लगती है। अगर आप आमिर या शाहरुख़ की फिल्मों का बॉयकॉट इसलिए करना चाहते हैं कि उनकी कोई बात आपको अच्छी नहीं लगी तो फैसला आपका है क्योंकि फिर आपको मनोज तिवारी, अनुपम खेर, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान आदि की फिल्मे देखनी पड़ेंगी क्योंकि उनके विचार आपको अच्छे लगते हैं।

आमिर खान ने जो कहा वो उनका हक़ था और शायद देश का बहुत बड़ा तबका वैसे ही सोच रहा है। अपने दिल की बात को अगर वो कह दिए तो हमारा क्या फ़र्ज़ है? उसको गालियों से लतियाएं या भरोसा दिलाएं? आमिर ने बस एक ही बात गलत कही कि असहिष्णुता बढ़ रही है, क्योंकि वो पहले से ही है। इस देश के लोगों ने उनको प्यार दिया है। जो लोग इस वक़्त दबंगई कर रहे हैं वो हमें आपातकाल के संजय गांधी के गुंडों की याद दिला रहे हैं। आमिर को कहना चाहिए कि कौन लोग ऐसा तमाशा कर रहे हैं। ये पूरे देश के लोग नहीं हैं, ये एक पार्टी विशेष और जमात विशेष के लोग हैं जिन्होंने उन सभी को गरियाने और धमकाने का लाइसेंस लिया हुआ है जो इनकी विचारधारा से मेल नहीं खाते। इसलिए आमिर साहेब सबको न गरियाएं। साफ़ बोलिए वो कौन हैं जो असहिष्णुता फ़ैला रहे हैं। इमर्जेन्सी का विरोध करने वालों का सबसे बड़ा मॉडल इमरजेंसी का दौर ही है और वही व्यक्तिवादी राजनीति आज हावी है। केवल फर्क इतना है कि उस दौर में दूरदर्शन और रेडियो पर समाचार सरकार सेंसर करती थी और आज सरकार और सरकारी पार्टी के दरबारी पत्रकार पूरी ताकत से ये काम कर रहे हैं। आज अर्नब गोस्वामी और सुधीर चौधरी का दौर है जिसमें सरकार से मतभेद रखने वालों की खबरें सेंसर ही नहीं होंगी बल्कि उनको अच्छे से गरियाया जाएगा। आखिर 9 बजे के प्राइम टाइम शोज का यही उद्देश्य है। हकीकत यह है कि हम वाकई में एक भयानक दौर से गुजर रहे हैं जिसमें तिलिस्मी राष्ट्रवादी नारों की गूँज में हमारे मानवाधिकारों और अन्य संवैधानिक अधिकारों की मांग की आवाज़ों को दबा दिया जा रहा है। पूंजीवादी ब्राह्मणवादी लोकतंत्र से आखिर आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं? वो तो सन्देश वाहक को ही मारना चाहता है ताकि खबर ही न रहे और खबरें बनाने और बिगाड़ने के वर्तमान युग में मीडिया निपुण होता जा रहा है, जो बहुत ही शर्मनाक है।

इतिहास और वर्तमान का संबंध: रोमिला थापर

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/24/2015 09:41:00 PM




प्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रोमिला थापर से रणबीर चक्रवर्ती की इतिहास, समाज और संस्कृति पर बातचीत. साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार, अंग्रेज़ी पाक्षिक फ्रंटलाइन में प्रकाशित, रोमिला थापर के लंबे साक्षात्कार “लिंकिंग द पास्ट एंड द प्रेजेंट” का कुछ संपादित रूप है और यहां इसका पहला आधा हिस्सा प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवाद: शुभनीत कौशिक

रोमिला थापर, जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एमेरिटस हैं, भारत के सबसे प्रसिद्ध इतिहासकारों में से एक हैं। आदिकालीन भारत के अपने व्याख्यापरक अध्ययनों के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली है। उनके अनथक प्रयासों से आदिकालीन भारतीय इतिहास का अध्ययन समाज-विज्ञानों की ओर अधिक उन्मुख हुआ है। भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का उनका विशद अध्ययन अतीत के अन्वेषण और व्याख्याओं से पूर्ण है, जो न सिर्फ़ साक्ष्यों में समृद्ध है बल्कि प्राचीन इतिहास के अध्ययन में समाज-विज्ञानों जैसे, समाज शास्त्र, राजनीति विज्ञान, सामाजिक एवं सांस्कृतिक मानव-विज्ञान, भूगोल आदि को भी जोड़ने के लिए विशिष्ट है। जिसका नतीजा हमारे सामने प्राचीन/आदिकालीन इतिहास के ऐसे अध्ययन के रूप में आया है, जिसमें महज़ राजवंशों के विवरण और तिथियों की जगह अतीत के अंतर्दृष्टिपूर्ण अध्ययन ने ली है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान, रोमिला थापर ने हमें बार-बार इन बातों की भी याद दिलाई है: इतिहासलेखन के बदलते पैटर्न, इतिहासकारों द्वारा उठाए जाने वाले सवालों का विश्लेषण, इतिहासकारों की प्रविधियाँ और अतीत के अध्ययन के प्रति उनके दृष्टिकोण, जो अक्सर ही वर्तमान से भी जुड़े होते हैं। रोमिला ने अपने अध्ययनों के जरिये यह भी दिखाया है कि कैसे अतीत के एक अध्ययन-विशेष का प्रभाव वर्तमान की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक दशाओं पर भी पड़ता है। 


रोमिला थापर ने 1958 में लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरियंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ से, प्रो. ए एल बाशम के शोध-निर्देशन में पीएच-डी की उपाधि हासिल की। मौर्यकाल पर आधारित उनका यह शोध ग्रंथ बाद में, अशोक एंड द डिक्लाइन ऑव द मौर्याज़ शीर्षक से पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में प्राथमिक स्रोतों के आलोचनात्मक अध्ययन के आधार पर रोमिला थापर ने, अशोक और मौर्यकाल को उसके सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भ में देखने का प्रयास किया। इस पुस्तक ने आदिकालीन भारत से जुड़े इतिहासलेखन पर अमिट छाप छोड़ी। एंशियंट इंडियन सोशल हिस्ट्री और इंटरप्रेटिंग अर्ली इंडिया जैसी उनकी किताबों ने प्राचीन भारत के सामाजिक इतिहास संबंधी अध्ययन में उल्लेखनीय योगदान दिया। 1980 के दशक में रोमिला थापर द्वारा आरंभिक राज्यों के अध्ययन ने (मसलन, फ़्राम लिनिएज़ टू स्टेट और मौर्याज़ रिविजिटेड), ऐतिहासिक अनुसंधान के नए क्षेत्र खोले। इन पुस्तकों में, उन्होंने राज्य-समाजों के निर्माण के लिए उत्तरदायी जटिल सामाजिक-राजनीतिक और वैचारिक कारकों को रेखांकित करते हुए आदिकालीन भारत में राज्यों के गठन के इतिहास को समझाने की कोशिश की। यद्यपि रोमिला थापर की मुख्य रुचि आदिकालीन भारत के सामाजिक इतिहास में रही है, फिर भी उन्होंने आर्थिक इतिहास से जुड़े विषयों, जैसे जंगलों, व्यापारिक श्रेणियों, और व्यापार पर भी प्रचुर लेखन किया है।
 

हालिया दशकों में, शकुंतला और सोमनाथ: मेनी वायसेज़ ऑव हिस्ट्री जैसी उनकी किताबों में सांस्कृतिक इतिहास के प्रति उनका रुझान स्पष्ट है (यद्यपि, यहाँ यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि सांस्कृतिक इतिहास, उत्तर-आधुनिक एवं उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययनों से प्रभावित और उन्हीं से उपजे ‘सांस्कृतिक अध्ययन’ से कदाचित भिन्न है)। उनके अध्ययन का एक अन्य विशिष्ट क्षेत्र रहा है, इतिहास-पुराण की परंपरा का, आधुनिक विषय के रूप में इतिहास के साथ संबंध और इन दोनों का परस्पर तुलनात्मक अध्ययन। उन्होंने इस यूरोकेंद्रिक अवधारणा का भी सफलतापूर्वक खंडन किया कि आदिकालीन भारत में इतिहास का सेंस नहीं था और इसी प्रक्रिया में उन्होंने चक्रीय समय और रेखीय समय की अवधारणाओं का भी आलोचनात्मक विश्लेषण किया।
उनकी सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली किताबों में अर्ली इंडिया: फ़्राम द ओरिजिंस टू एडी 1300  शामिल है, जो उनकी पहले लिखी गयी किताब, हिस्ट्री ऑव इंडिया खंड (I) का ही परिवर्धित रूप है। इस पुस्तक में जो बदलाव और संवर्धन उन्होंने किए हैं, वह नए आंकड़ों, व्याख्या के नए मॉडलों, और नए परिप्रेक्ष्यों को अपने अध्ययन में शामिल करने को लेकर उनके खुलेपन को दर्शाते हैं। इससे विषय के प्रति उनकी निष्ठा का भी पता चलता है और यह दर्शाता है कि इतिहासकार की धारणाओं और मान्यताओं में भी बदलाव आते हैं – जो इतिहास की सजीवता का परिचायक है। अतीत की सांप्रदायिक और दक़ियानूसी व्याख्याओं की बेबाक आलोचक, रोमिला थापर को इतिहास में उनके योगदान के लिए, क्लुग प्राइज़ फॉर लाइफ़टाईम अचीवमेंट से भी नवाजा जा चुका है। वे वर्ष 1983 में भारतीय इतिहास कांग्रेस की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।
 

इस साक्षात्कार में प्रो. रोमिला थापर बताती हैं कि कैसे अतीत – सुदूर और/या हालिया- वर्तमान से अंतरंग रूप से जुड़ा हुआ है। वे इस बात पर भी चर्चा करती हैं कि अतीत के किसी चरण-विशेष के अध्ययन के चुनाव को वर्तमान परिस्थितियाँ कैसे और किस हद तक प्रभावित और निर्धारित करती हैं। उनके ये वक्तव्य अतीत के अध्ययन के प्रति अधिक संवेदना और जागरूकता पैदा करने वाले हैं। वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर अतीत के समरूपीकरण को लेकर हमें चेताती है और भारत के बहुलतावादी परम्पराओं पर ज़ोर देती हैं। वर्तमान को अधिक बेहतर समझने के दृष्टिकोण से, अतीत संबंधी अध्ययनों में नए सवाल उठाने को भी वे इस साक्षात्कार में बार-बार प्रोत्साहित करती हैं।
 

रणबीर चक्रवर्ती: आपकी हाल में आई किताब पास्ट एज़ प्रीजेंट पढ़ने पर ऐसा लगता है कि भारत में इतिहास के अध्ययन की दशा और इतिहास के प्रति बनी आम धारणा को लेकर आप थोड़ा दुखी हैं। इसे लेकर आप आशावादी नहीं दिखतीं। यद्यपि आप इसे लेकर निराश भी कतई नहीं हैं – जैसा आपने स्पष्ट ही लिखा है। इस बारे में बताएं।  

रोमिला थापर: आपका सवाल यह है कि पिछले कुछ दशकों में भारत में एक विषय के रूप में इतिहास कहाँ पहुँचा है। मुझे स्पष्ट करने दें कि इतिहास के अध्ययन और उस पर चर्चा करने के दो स्तर रहे हैं। एक तो है, अकादमिक इतिहासकारों वाला स्तर जहां मैं समझती हूँ कि पिछले दशकों में इतिहासलेखन में उल्लेखनीय और प्रभावशाली प्रगति हुई है, कम-से-कम उन इतिहासकारों के कार्यों में जो बेहतर विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से जुड़े हुए हैं। जब मैं इस मुद्दे पर विचार करती हूँ कि आज से पचास साल पहले इतिहास कैसे पढ़ाया जाता था, और उस समय इतिहासकारों को इतिहासलेखन को नयी दिशा की ओर उन्मुख करने में, जो संघर्ष करने पड़े, और इसकी तुलना जब आज इतिहास की दिशा-दशा से करती हूँ तो मुझे काफी बदलाव नजर आता है। यद्यपि ये बदलाव विश्वविद्यालयों में सार्वभौम नहीं रहे हैं। फिर भी, अब ऐसे इतिहासकार हैं जो इतिहास को बतौर समाज-विज्ञान ही नहीं देखते बल्कि उसके वैचारिक आधार को भी संज्ञान में लेते हैं।
 

पर इतिहास की एक दूसरी धारा भी है, जिसके बारे में मेरे विचार पहली धारा से बिलकुल विपरीत हैं। मेरा अभिप्राय है लोकप्रिय इतिहास (पापुलर हिस्ट्री) से, जिससे आम लोग अधिक परिचित हैं। इस धारा के अंतर्गत हो रहा लेखन या तो इतिहास ही नहीं है या है भी तो इसकी पद्धति लगभग एक सदी पिछड़ी हुई है। ‘लोकप्रिय इतिहास’ की इन किताबों में अक्सर बेतुके सवाल पूछे जाते हैं, अतीत के बारे में हर तरह का सामान्यीकरण किया जाता है, जो सामान्यतया इतिहास के बारे में ज्ञान के अभाव को ही दर्शाता है। लोक वृत्त में फैल रही इतिहास की यह धारा, जिसका प्रचार-प्रसार ऐसे लोगों द्वारा किया जा रहा है जो पेशेवर इतिहासकार नहीं हैं, कहीं-न-कहीं स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाये जा रहे इतिहास की पद्धति से भी जुड़ी हुई है। हम आज भी इतिहास की ऐसी समझ और इतिहास पढ़ाने की ऐसी पद्धति इस्तेमाल कर रहे हैं, जो पुरानी पड़ चुकी हैं। आज भी पूरा ज़ोर तिथियों और घटनाओं पर है और इतिहास को उन सूचनाओं के संकलन के रूप में देखा जा रहा है, जिसे छात्रों को कंठस्थ करना है। छात्रों को दिये गए इतिहास के नोट्स को देखकर किसी ने सही ही कहा कि वे बिलकुल टेलीफ़ोन डायरेक्ट्री की तरह दिखते हैं, जिसमें एक ओर संख्याएँ होती हैं और दूसरी ओर लोगों के नाम।
 

इतिहास की पद्धति के बारे में.   

यह दुखद है कि लोग आज भी यही सोचते हैं कि इतिहास अतीत के बारे में सूचना भर ही है। यह दृष्टिकोण, बतौर विषय इतिहास की सीमाओं को अत्यंत सीमित कर देने वाला है। इतिहास के शोध में हमारा ज़ोर महज़ ज्ञात स्रोतों से सूचनाएँ जुटाना ही नहीं है। बल्कि इसमें स्रोतों के नए प्रकारों की खोज करना, और अतीत को समझने और उसकी व्याख्या करने के लिए सूचनाओं का इस्तेमाल करने से पूर्व, पहले से कहीं अधिक सजग होकर साक्ष्यों की निर्भरता को जाँचना भी शामिल है। सूचनाएँ हासिल करने के लिए अतीत को खंगालने और फिर अतीत की व्याख्या करने के ये दो पक्ष, जोकि ‘ऐतिहासिक पद्धति’ का निर्माण करते हैं, आज अत्यंत ज़रूरी हो गए हैं।
 

दुर्भाग्य से इस बात पर पर्याप्त ज़ोर नहीं दिया जा रहा है कि स्कूलों और कॉलेजों में यह पद्धति, छात्रों को कैसे पढ़ाई जाये। इस पद्धति का अनिवार्य पहला चरण है: आँकड़े और साक्ष्य जुटाना। दूसरा चरण है इन आँकड़ों की विश्वसनीयता को जांचना और यह सुनिश्चित करना कि इस्तेमाल किए जाने वाले साक्ष्य विश्वसनीय और निर्भर-योग्य हैं। तीसरा चरण, घटनाओं के बीच कार्य-कारण संबंधों को देखना है क्योंकि तार्किक विश्लेषण के लिए यह बहुत ज़रूरी है। अगले चरण में यह सुनिश्चित करना कि हर विश्लेषण आँकड़ों के आलोचनात्मक मूल्यांकन पर आधारित हो। लोकप्रिय इतिहास में अक्सर ही, वास्तविक तार्किक विश्लेषण की जगह फंतासियां ले लेती हैं।
 

इन चरणों से गुजरकर ही आप वह वक्तव्य दे सकते हैं, जिसे हम ऐतिहासिक सामान्यीकरण कहते हैं। आज इस पूरी प्रक्रिया से गुजरने की अपेक्षा इतिहास के हरेक छात्र से की जाती है।
 

तो आप यह सुझा रही हैं कि इतिहास और अतीत में शौकिया रुचि और अतीत की एक इतिहासकार की समझ में, जो तार्किक आधार पर सूचनाओं को एकत्र कर उनके पद्धतिगत व्याख्या से संभव होती है, काफी अंतर है।   

हाँ, बिलकुल। यह बात सभी इतिहासों के संदर्भ में सही है। पर यह प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में और भी जटिल है, अगर हम इस्तेमाल होने वाले स्रोतों के वैविध्यता को ध्यान में रखें। प्राचीन भारतीय इतिहास की दर्जन भर किताबें पढ़ लेना ही काफी नहीं है, इससे आप विशेषज्ञ नहीं हो जाते। आपको स्रोतों के बारे में पता होना चाहिए और यह भी कि उनका विश्लेषण कैसे करना है। स्रोतों की भाषाओं में भी आपकी दक्षता होनी चाहिए। आपको पुरातत्व, भाषा-विज्ञान की भी जानकारी होनी चाहिए। भाषा-विज्ञान के जरिये ही आप भाषाओं में आने वाले बदलावों, शब्द-भंडारों के निर्माण, व्याकरण के बारे में और भाषाओं के अलगाव और उनके बीच होने वाली अंतःक्रिया के संबंध में अधिक बेहतर समझ बना पाएंगे।
 

उदाहरण के लिए, जब हम छात्र थे तो हमें यह बताया जाता था कि ऋग्वेद की भाषा इंडो-आर्यन भाषा ही है। पर आज यदि आप ऐसा वक्तव्य दें, तो वैदिक काल में विशेषज्ञता रखने वाले कुछ विद्वान इस कथन से जरूर अपनी असहमति जताएंगे क्योंकि भाषा-विज्ञान के सिद्धांतों के प्रयोग ने यह दर्शाया है कि ऋग्वेद में द्रविड़ भाषाओं के भी अंश सम्मिलित हैं। इन जानकारियों से इतिहासकार के प्रत्यक्षीकरण और स्रोतों के प्रति उसके दृष्टिकोण में भी बदलाव आते हैं। अब ऋग्वेद के संदर्भ में ही यह जानकारी इतिहासकार को ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है, जो एकल संस्कृति का न होकर सह-अस्तित्व में विद्यमान उन संस्कृतियों का है, जिनमें एक का प्रभुत्त्व है। तो इतिहासकार को इन अन्य संस्कृतियों के बारे में भी जानकारी जुटानी होगी और उनका अध्ययन करना होगा। इतिहासकार को नदियों के जल तंत्र के अध्ययन (हाइड्रोलॉजी) और आनुवंशिकी के अध्ययन और रिपोर्टों से मिलने वाली जानकारियों का समावेश भी अपने अध्ययन में करना होगा।
 

साक्ष्य से जुड़े इन पक्षों की चर्चा मैं इसलिए कर रही हूँ ताकि मैं यह समझा सकूँ कि इतिहास से जुड़े सवालों के जवाब, यह ज़रूरी नहीं कि हमेशा हाँ या ना में ही हों। क्योंकि इतिहास से जुड़े साक्ष्य वैविध्यता से भरे हुए और विवादित दोनों हो सकते हैं (इस कारण भी मुझे लगता है कि इतिहास में वस्तुनिष्ठ सवाल पूछे जाने का कोई मतलब नहीं बनता)। इतिहासकार को अपनी व्याख्याओं की तार्किकता पर निर्भर रहना होगा। यह भी कि साक्ष्यों में बदलाव होने पर इन व्याख्याओं में भी बदलाव हो सकते हैं। ऐतिहासिक व्याख्याएँ, एक निश्चित समय-बिन्दु पर एक विषय से संबंधित ज्ञान-विशेष की मात्रा पर भी निर्भर होती हैं। ऐसी व्याख्याओं पर प्रयोजन-विशेष के उद्देश्य से एक खास रंग भी चढ़ सकता है।  
 

अब मैं आपका ध्यान एक व्यापक मुद्दे की ओर आकर्षित करना चाहूँगा। वह यह कि आम लोगों के समक्ष कई बार कुछ समूहों द्वारा इतिहास और अतीत का एक समरूपी संस्करण प्रस्तुत किया जाता है। हम जानते हैं कि अतीत घटनाओं का समरूपी प्रस्तुतीकरण भर नहीं है। आप कह रही थीं कि ऋग्वेद में सिर्फ़ इंडो-आर्यन भाषा ही नहीं है! यह एक भाषा में रचा हुआ ग्रंथ नहीं है, इसमें अनेक भाषाएँ शामिल हैं जो विविध संस्कृतियों के अस्तित्व की ओर भी इशारा करती हैं।
 

एक अंतर तो विद्वत्ता के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी है। प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि आर्य भाषा मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत के स्थानीय निवासी ही थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! यह ऐसा तर्क है जो मुझे विभिन्न कारणों से कतई स्वीकार नहीं। भाषाई और पुरातात्विक आधार पर भी यह किसी तरह से संभव नहीं जान पड़ता। हम कहते हैं कि ऋग्वैदिक संस्कृति उत्तर-हड़प्पाकालीन थी, तो जाहिर है कि इसका मतलब हुआ कि इसमें इसकी पूर्वतर संस्कृति परिलक्षित नहीं होगी। हड़प्पा संस्कृति का संपर्क ओमान और मेसोपोटामिया से था, जिनका जिक्र ऋग्वेद में नहीं मिलता। ईसा पूर्व की तीसरी सहस्राब्दी के अंत और दूसरी सहस्राब्दी के आरंभ में, हड़प्पा संस्कृति अन्य समकालीन गैर-हड़प्पाई संस्कृतियों के साथ अस्तित्व में थी। दूसरी सहस्राब्दी के मध्य से अंत तक, जो ऋग्वेद का रचनाकाल भी माना जाता है, अनेक संस्कृतियों की मौजूदगी की जानकारी मिलती है। जैसे, चित्रित धूसर मृदभांड (पेंटेड ग्रे वेयर) संस्कृति, काला एवं लाल मृदभांड (ब्लैक एंड रेड वेयर) संस्कृति, महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति आदि। यह एकल संस्कृतियाँ नहीं हैं, इनमें विविधता भरी हुई है। अपने प्रसार और विस्तार के क्रम में आर्यभाषा भाषी, इन संस्कृतियों के संपर्क में ज़रूर आए होंगे। यह भी याद रखना चाहिए कि जहां एक ओर हड़प्पा संस्कृति एक विकसित नगरीय संस्कृति थी, जो लिखने की कला से भी परिचित थी, वहीं दूसरी ओर ऋग्वेद कालीन समाज नगरीकरण से अपरिचित एक कृषि आधारित समाज था।        
 

पर इस सबके बावजूद आज एक “परिशुद्ध आर्यवाद” (सेनीटाइज्ड आर्यानिज़्म) गढ़ने की कोशिश की जा रही है, जिसमें सब कुछ सरलीकृत होगा और जिसका स्रोत भी बस एक होगा। और समस्या की सारी जटिलताओं को दरकिनार कर दिया जाएगा।
 

ऋग्वेद में दक्षिणी प्रायद्वीप की महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति का भी कोई उल्लेख नहीं मिलता।
 

हाँ, ऋग्वेद में इस रूप में महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति का जिक्र नहीं है। पर इस टेक्स्ट में अन्य समूहों की चर्चा जरूर की गयी है, जैसे असुर, दास, दस्यु आदि। ऋग्वेद दो वर्णों की चर्चा करता है – आर्य और दास। ‘दास’ कौन थे? उनके बारे में ऋग्वेद में जो विवरण मिलता है वह यह है कि वे उन कर्मकांडों और रीति-रिवाजों को मानने वाले थे, जो आर्यों से भिन्न थे। ‘दास’ अलग देवताओं की उपासना करते थे, और वे वैदिक ग्रंथों के लेखकों की भाषा से भिन्न भाषाएँ बोलते थे। वे समृद्ध थे, मवेशियों के रूप में उनकी संपत्ति ईर्ष्या का विषय थी और वे अलग बसावटों में रहते थे। इसलिए कुछ विद्वान यह भी सोचते हैं कि वे अलग संस्कृति के थे। इतिहासकार के रूप में हमें यह सवाल करना होगा कि ‘दास कौन थे’ और उनका मिथकीकरण क्यों किया गया?
 

इसी तरह ‘दासी-पुत्र ब्राह्मणों’ का भी उल्लेख मिलता है। जिन्हें पहले तो अस्वीकार्य माना गया, पर बाद में जब इन लोगों ने अपनी शक्ति दिखाई तो उन्हें ब्राह्मण के रूप में स्वीकार कर लिया गया। ‘दासी-पुत्र ब्राह्मण’ स्वयं में ही एक विरोधाभाषी शब्द है क्योंकि ‘दासी-पुत्र’ (यानि एक दासी से उत्पन्न हुआ पुत्र) होना और ब्राह्मण की हैसियत दोनों में विरोध भाव है। वैदिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि देवों और असुरों में अक्सर संघर्ष होते रहते थे। यह एक स्तर पर मिथक है, पर यह मिथक भी तत्कालीन समाज की अवधारणाओं से बिलकुल अलग नहीं है। इतिहासकारों के मत में, वैदिक ग्रंथों में उत्तर-हड़प्पा काल से लेकर ईसापूर्व पाँचवी सदी के ऐतिहासिक नगरों के रूप में नगरीय संस्कृति के उदय तक का उल्लेख मिलता है। ऐसी स्थिति में क्या यह कहना संभव है कि ये वैदिक ग्रंथ संस्कृति के एक पैटर्न के उद्विकास के परिचायक भर हैं! पाँच हजार वर्षों के ऐतिहासिक गतिविधियों के बाद भी आज हम विविध संस्कृतियों के अस्तित्व के साक्षी हैं।
 

यह न तो एकल संस्कृति थी न एकाश्मी, यह तो संस्कृति के विविध समुच्चयों का संयोग थी। पर समरूपीकरण की इस प्रक्रिया में कहीं-न-कहीं यह दावा भी निहित है कि ‘हमारी सभ्यता अन्य सभ्यताओं से श्रेष्ठ है’।   
 

एक प्रचलित तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए और यूरोप में भी सभ्यता लेकर आर्य ही गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, पर यह आज भी उतना ही लोकप्रिय है। सबसे पहले अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थिओसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थिओसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे।
 

ये वे सिद्धांत हैं जो भारत के प्राचीनतम अतीत से जुड़े ऐतिहासिक विवादों से गहरे जुड़े हुए हैं। इनकी शुरुआत 19वीं सदी में हुई। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि यह वही समय था जब ‘नस्ल विज्ञान’ के अधीन यूरोपीय सर्वोच्चता पर, आर्य उत्पत्ति को आधार बनाकर चर्चा की जा रही थी। इनमें से कुछ सिद्धांत, बीसवीं सदी के यूरोप में ‘आर्यवाद’ को विनाशकारी दिशा की ओर ले गए। अतिरेक राष्ट्रवाद और अस्मिता की राजनीति के साथ ऐतिहासिक सिद्धांतों की जुगलबंदी के भयानक नतीजे हो सकते हैं, इसलिए यह ज़रूरी है इन सिद्धांतों पर चर्चा की जाए।
 

उन सवालों को, जिन पर ऐतिहासिक रूप से मतभेद है, वैसे ही सवाल या मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए, जिन पर विद्वान अलग-अलग मत रख सकें और उनमें से हरेक का दृष्टिकोण साक्ष्यों के आधार पर आँका जाए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में ‘आर्यों’ का मुद्दे पर इतना अधिक राजनीतिकरण हो चुका है कि जो विद्वान ‘आर्यों के भारत में ही उत्पन्न होने’ की अवधारणा पर सवाल उठाते हैं, उन्हें सोशल मीडिया और इंटरनेट का गुस्सा और अपमान झेलना पड़ता है। ऐसी स्थिति ऐतिहासिक परिचर्चा और वाद-विवाद-संवाद की संभावना को घटा देती है।
 

क्या आपको लगता है कि भारत की राजनीतिक संस्कृति में एक रुझान तेजी से बढ़ रहा है जिसमें अतीत को समरूपी बनाने और अतीत तथा वर्तमान के बीच एक निर्बाध निरंतरता दिखाने की कोशिश हो रही है।  
 

अतीत को विविध संस्कृतियों की जटिल अंतःक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए न कि एक सरलीकृत एकल संस्कृति के प्रभुत्त्व के रूप में। पर कुछ लोग अतीत को इसके जटिल रूप में देखना ही नहीं चाहते, वे इससे डरते हैं। हमारे अंदर यह आत्मविश्वास भी नहीं है कि हम अपनी संस्कृतियों को ऐसी संस्कृति के रूप में स्वीकार कर सकें, जिसकी उत्पत्ति विविध स्रोतों से हुई है और जो सदियों में विकसित हुई है और आगे ऐसे ही विकसित होगी। यह बात विश्व की अन्य संस्कृतियों के बारे में भी सच है। इतिहास के हर कालखंड ने संस्कृति-विशेष के उद्विकास को देखा है और हर समय में एकाधिक महत्त्वपूर्ण संस्कृतियाँ विद्यमान रही हैं। इतिहासकार के रूप में हमें इन संस्कृतियों के बीच समानताओं, विभेदों और उनमें होने वाली परस्पर अंतःक्रिया का अध्ययन करना होगा।
 

पर कुछ ऐसे लोग हैं जो चाहते हैं कि राष्ट्रवाद एक ही प्रभुत्वशाली संस्कृति पर आधारित हो, और जो अपनी संस्कृति मात्र को ही देश की सार्वकालिक राजनीतिक अस्मिता के तौर पर देखना चाहते हैं। समस्या की शुरुआत तभी होती है क्योंकि हम एक बहुलतावादी संस्कृतियों के समाज में रह रहे हैं।
 

इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में क्या राष्ट्रीकृत संस्कृति (नेशनलाइज्ड कल्चर) शामिल नहीं है? दूसरे शब्दों में, यह दावा कि केवल एक तरह की संस्कृति भारत में है और सब कुछ समरूप है और था।
 

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के निर्माण की प्रक्रिया की जड़ संस्कृति के औपनिवेशिक व्याख्याओं में है, बजाय कि संस्कृति के उन व्याख्याओं में जो प्राक-औपनिवेशिक काल में मौजूद थीं। हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि अलग-अलग समयों में, मसलन मौर्य काल, गुप्त काल, चोल युग, मुग़लों के समय में संस्कृति को किस रूप में देखा गया और उसे कैसे परिभाषित किया गया। हम इस मुद्दे पर सोचने से शायद इसलिए कतराते हैं क्योंकि इसकी पुनर्रचना करना आसान नहीं है। पर वे सभी देश, जो कभी उपनिवेश रहे हैं, उन्हें यह बात विचारनी होगी कि जिस रूप में आज वे अपनी पारंपरिक संस्कृति को स्वीकार कर रहे हैं, उसमें से कितना कुछ औपनिवेशिक परियोजना का रचा हुआ और औपनिवेशिक मान्यताओं का अंश है। यह बात जितनी भारत के लिए सच है उतनी ही इंडोनेशिया के लिए भी। और पेरू और मेक्सिको जैसे देशों के लिए तो और भी ज्यादे, जहाँ के पुराने दस्तावेजों को स्पेनिश आक्रमणकारियों ने जला दिया था।
 

इतिहास हमें बताता है कि परम्पराएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी या कुछ विशेष अवसरों पर रची जाती हैं। इसलिए यह कहना बिलकुल निराधार है कि एक खास समकालीन परंपरा पूर्णतः शुद्ध है और उसका इतिहास सहस्राब्दियों पीछे तक जाता है। वे परम्पराएँ भी, जिनका लंबा इतिहास होता है, समय-समय पर खुद में बदलावों का दौर देखती हैं।
 

यही बात शब्दों के इतिहास पर भी लागू होती है। अगर कोई संस्कृत, पालि और प्राकृत ग्रंथों में ‘आर्य’ शब्द के उल्लेख का अध्ययन करे, और यह समझने की कोशिश करे कि कैसे इतिहास में ‘आर्य’ शब्द का अर्थ और अस्मिता समय-समय पर बदले हैं। तो वह इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि ‘आर्य’ शब्द का यह जटिल इतिहास, 19वीं सदी में की जा रही ‘आर्य’ शब्द की व्याख्याओं से कदाचित भिन्न है। इस अध्ययन के दौरान इतिहासकार को यह भी देखना होगा कि संस्कृत, पालि और प्राकृत टेक्स्ट में कौन किसे ‘आर्य’ संबोधित कर रहा है, और क्यों। इस शब्द का इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है? पालि टेक्स्ट में हम पाएंगे कि ‘आर्य’ वह है जो श्रद्धेय है, जैसे एक बौद्ध संन्यासी, और इसका उसकी जाति, उत्पत्ति या पूर्व-व्यवसाय से कोई लेना-देना नहीं है।
 

देशज आर्यवाद (इंडीजेनस आर्यानिज़्म), कुछ अंशों में, धार्मिक राष्ट्रवाद का ही सह-उत्पाद है। धार्मिक राष्ट्रवाद संस्कृतियों की बहुलता को स्वीकार नहीं करता। यह एक धार्मिक संस्कृति को मुख्य ‘राष्ट्रीय’ संस्कृति बनाने की पुरजोर कोशिश करता है। दुनिया भर में राष्ट्रवाद का यह एक प्रमुख लक्षण रहा है, चाहे वह उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रवाद हो या भाषाई, धार्मिक या नृजातीय राष्ट्रवाद हो। राष्ट्रीय आंदोलनों में भी एक संस्कृति की सर्वोच्चता को स्वीकारने की प्रवृत्ति होती है, और यही संस्कृति ‘राष्ट्रीय’ संस्कृति बन जाती है।
 

धार्मिक राष्ट्रवाद एक धर्म, संस्कृति, भाषा आदि के सबसे अलग होने को रेखांकित करता है। यह अक्सर, राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए जान-बूझकर गढ़ा जाता है, जैसा हिंदुत्व के उदाहरण में हमें स्पष्ट दिखता है। जैसा कि बहुत-से विद्वानों ने कहा है कि ‘हिंदुइज़्म’ और हिंदुत्व दोनों एक ही चीज नहीं हैं।‘हिंदुइज़्म’ एक धर्म है, जबकि हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा। हिंदुत्व एक आधुनिक विचारधारा है जो कुछ बातें तो ज़रूर ‘हिंदुइज़्म’ से लेती है, पर यह ‘हिंदुइज़्म’ से बहुत अलग है। हिंदुत्व की अवधारणा 20वीं सदी में अस्तित्त्व में आई, और इसका उद्देश्य था - हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए हिंदुओं को राजनीतिक रूप से संगठित करना। धर्म पर आधारित विचारधारा के निर्माण में ज़रूरत पड़ने पर धर्म की आधारभूत बातों को भी फिर से रचा जा सकता है। यह पुनर्रचना अक्सर धर्म के अभिजात्य और पुरातनपंथी अनुयायियों को ध्यान में रखकर की जाती है। हिंदुत्व एक निश्चित भू-भाग, एकल संस्कृति और नृजातीय उत्पत्ति, एक भाषा और एक धर्म की बात करता है। यह हिंदुओं की साझी ‘पुण्यभूमि, पितृभूमि’ की भी बात करता है और अन्य सभी को विदेशी बतलाता है। हिंदुत्व अपने धार्मिक पक्ष में, सामी (सेमिटिक) धर्मों की रूपरेखा का ही अनुसरण करता है, मसलन, ‘ऐतिहासिकता’ पर ज़ोर और एकाश्मी (मोनोलिथिक) धर्म, एक पवित्र ग्रंथ, चर्च जैसे धार्मिक संगठन। गौरतलब है कि ये बातें सामाजिक और राजनीतिक संगठन में सहायक होती हैं। इसीलिए मैंने इसे ‘सिंडिकेटेड हिंदुइज़्म’ कहा है।
 

हाँ।                        
 

कई बार राष्ट्रीय संस्कृतियाँ उन महाकाव्यों (एपिक) को भी आधार बनाती हैं, जिनसे बहुसंख्यक लोग परिचित होते हैं। जब किसी महाकाव्य के बहुत से संस्करण होते हैं तो समस्या हो जाती है क्योंकि फिर ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ के निर्माण के लिए उनमें से एक ‘सही’ संस्करण का चुनाव करना होता है। जैसे भारत में रामायण के बहुत-से और विरोधाभासी संस्करण मौजूद हैं। पर धार्मिक राष्ट्रवाद को तो उनमें से किसी एक को ही ‘सही’ संस्करण के रूप में प्रोजेक्ट करना है – अब जाहिर है कि इतिहासकार इस पूरे प्रयास को ही अस्वीकार्य मानेंगे। एक टेक्स्ट जो ‘पवित्र ग्रंथ’ बन जाता है, असल में एक क्षेत्र के एक समुदाय के लिए रचा गया होता है। पर अलग-अलग कारणों से अन्य क्षेत्रों के लोगों द्वारा भी उस टेक्स्ट के स्वीकार्य हो जाने की स्थिति में, उस क्षेत्र के लोगों द्वारा उस टेक्स्ट में, या उसके कुछ भागों में अपनी ज़रूरत के हिसाब से आवश्यक बदलाव किए जाते हैं।
 

कई बार इतिहास के एक काल-विशेष को चुनकर उसे ‘क्लासिकल’ बताया जाता है, जिसके अंतर्गत उस समय में एकल प्रभुत्वशाली संस्कृति होने और सब कुछ सकारात्मक होने की अतिशयोक्तिपूर्ण बातें कही जाती हैं। यह राष्ट्रीय आंदोलन का भी केंद्रीय विचार (‘कोर आईडिया’) बन जाता है। पर असल समस्या तब पैदा होती है जब राष्ट्र-राज्य अस्तित्व में आता है, क्योंकि यह एकल संस्कृति अक्सर प्रभुत्वशाली बहुसंख्यक समुदाय की ही संस्कृति होती है। पर अब इस एकल संस्कृति की अवधारणा की ज़रूरत नहीं रह जाती चूँकि राष्ट्र एक धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्र बन चुका होता है, या वैसा बनने की कोशिश कर रहा होता है। अन्य संस्कृतियाँ भी समान दर्जे की मांग करने लगती हैं।
 

और यदि कोई ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ की बात कर रहा है तो स्पष्ट है कि इसमें देश की सभी संस्कृतियों का समावेश होना चाहिए – मसलन, आदिवासी, दलित, मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, पारसी आदि। ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ के निर्माण में बहुलता और विविधता तथा साझे इतिहास का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
 

आज हम संस्कृति के एक खास पक्ष को ही, उस संस्कृति-विशेष का परिचायक बताने का रुझान बढ़ता हुआ देख रहे हैं। यह कोशिश उन लोगों द्वारा की जा रही है जो या तो शक्तिशाली समूह का हिस्सा हैं या किसी तरह की सत्ता/शक्ति पाने की आकांक्षा रखते हैं। और सत्ता की इस आकांक्षा में कोई सांस्कृतिक संदेश या अभिव्यक्ति जैसी बात नहीं है, यह तो महज राजनीतिक सत्ता की आकांक्षा भर है। इससे इतिहास को भी नुकसान पहुँच रहा है।   
 

हाँ, इस पूरी प्रक्रिया में इतिहास को ज़रूर नुकसान पहुँच रहा है। इस बात के बावजूद कि आज इतिहासकार अतीत को इसकी विविधताओं में समझने की कोशिश कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि जब तक कि वह एक समुदाय-विशेष का ही इतिहास न लिख रहा हो, तब तक इतिहासकार को चाहिए कि वह अन्य समुदायों की उपेक्षा करते हुए एक ही समुदाय पर ध्यान न केन्द्रित करे। क्योंकि अतीत की इस विविधता में भी एक-दूसरे से अलग प्रतीत होने वाली इन बातों को, जोड़ने वाले संपर्क सूत्र मौजूद होते हैं।
 

19वीं सदी के सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलनों ने, कुछ सीमा तक ही सही, भारतीय धर्मों के प्रारूप में बदलाव लाये। 20वीं सदी में जब विद्वानों ने बदलाव की इस प्रक्रिया को समझने और इसे समर्थन देने वाले सामाजिक समूहों को पहचानने और समझने की कोशिश की, तो उन्होंने अपना ध्यान उच्च जतियों पर ही केन्द्रित किया। यद्यपि वे अन्य जातियों का भी संदर्भ देते थे, पर उनका मुख्य ज़ोर उच्च जातियों पर ही था। कुछ इतिहासकारों ने अलग-अलग सामाजिक समूहों के राष्ट्रवादी उन्मुखता पर काम करना शुरू किया। सबआल्टर्न स्टडीज़ में इसकी शुरुआत हुई, जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। जल्द ही यह बात भी पता चल गयी कि ‘निम्न’ माने जाने वाले सामाजिक स्तरों ने भी, मसलन, दलित एवं आदिवासी, राष्ट्रीय आंदोलन में अलग-अलग तरीकों से भागीदारी की।
 

इन अध्ययनों में दूसरे किस्म के भी सवाल पूछे गए, जैसे किन समूहों ने राष्ट्रवाद को धार्मिक राष्ट्रवाद में तब्दील किया, जिसका नतीजा हम वर्तमान में अस्मितापरक राजनीति के रूप में भी देख रहे हैं। और किन समूहों ने इस प्रक्रिया का विरोध, यह कहते हुए किया कि राष्ट्रवाद को धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए। तो इस तरह ‘राष्ट्रवाद’ से जुड़े दावों और अवधारणाओं का विधिवत अध्ययन शुरू हुआ।
 

पर ये अध्ययन अपने प्रभावशीलता में अकादमिक दुनिया तक ही सीमित रहे, इसका लोकप्रिय स्तर पर कोई खास प्रभाव नहीं दिखा। कारण यह कि राष्ट्रवाद के इन विश्लेषणात्मक और आलोचनापरक अध्ययनों को, नेताओं और जनता के द्वारा इन विद्वानों में ‘देशभक्ति के अभाव’ के रूप में देखा गया। इसलिए मेरा मानना है कि यदि हमें “धार्मिक राष्ट्रवाद” और “सेकुलर (धर्मनिरपेक्ष) राष्ट्रवाद” में फर्क करना है तो हमें सेकुलरवाद की एक स्पष्ट परिभाषा की भी जरूरत होगी।
 

इस तरह, उत्तर-औपनिवेशिक भारत में धर्मनिरपेक्षता की समझ बनाने के क्रम में विविध संस्कृतियों और बहुलतावाद को संज्ञान में लेना अनिवार्य हो जाता है। इसमें एक समस्या तो, ‘सेकुलरवाद’ शब्द के हमारे प्रयोगों को लेकर ही है। सेकुलरवाद का भारतीय दृष्टिकोण, आमतौर पर केवल धर्मों के सह-अस्तित्व की ही बात करता है। पर मैं इस दृष्टिकोण को अपर्याप्त समझती हूँ। अक्सर इस संदर्भ में, अशोक के शिलालेखों को उद्धृत किया जाता है, जिनमें अशोक ने सभी पंथों (सेक्ट्स) को एक-दूसरे का सम्मान करने और, विशेषतया, अन्य लोगों के पंथ का भी आदर करने की बात कही है। हालिया समय में, अक्सर यह कहा जाता है कि भारतीय सभ्यता ऐसी सभ्यता है, जिसमें हर धर्म का आदर किया जाता था और किया जा रहा है। यह कहना भर काफी नहीं है कि सभी धर्मों के सह-अस्तित्व का मतलब है एक सेकुलर समाज। बल्कि हमें इसके साथ ही सभी धर्मों के बराबरी के दर्जे पर, उनकी एक समान हैसियत पर भी ज़ोर देना होगा। जब हम धर्मों को एक ‘बहुसंख्यक समुदाय’ और ‘अल्पसंख्यक समुदाय’ से जोड़ते हैं, जैसा कि हम अक्सर ही करते हैं, तो हमारे द्वारा किया गया यह अंतर धर्मों के बराबरी के दर्जे के अभाव को भी मान्यता देता है।
 

कुछ विद्वानों ने कई बार यह कहा है कि ‘भारतीय समाज को सेकुलर बनाने और धर्म से अलग करने की सीमाएं हैं’। मेरा यह कहना है कि इसी अर्थ में धर्म की भी सीमाएं हैं, यानि राजनीति और समाज तथा इनसे संबंधित संस्थाओं को प्रभावित करने वाला एकमात्र कारक धर्म ही नहीं हो सकता। समाज की अस्मिता ‘खुली/मुक्त अस्मिता’ (ओपन आइडेंटिटी) होनी चाहिए।
 

क्या आपका तात्पर्य ‘बहु-अस्मिताओं’ (मल्टीपल आइडेंटिटीज़) से है?    
 

“ओपन आइडेंटिटी” शब्द का इस्तेमाल मैं इसलिए कर रही हूँ क्योंकि एक सच्चे लोकतन्त्र में एक स्थायी बहुसंख्यक समुदाय या अस्मिता का वर्चस्व नहीं हो सकता। हर बदलते मुद्दे के साथ, ‘बहुसंख्यक’ समूह की अवधारणा, उसका स्वरूप और गठन भी बदल जाता है। इसलिए ‘बहुसंख्यक’/बहुमत’ (मेजोरिटी) की अवधारणा, कोई पूर्व-निर्धारित अवधारणा नहीं है। यह एक प्रवाहमान तरल (फ्लुइड) अवधारणा है और लोकतंत्र में ऐसा ही होना चाहिए। जब हम लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं, तो हम एक ऐसी व्यवस्था के बारे में बात कर रहे होते हैं, जिसमें बहुतेरी अस्मिताएं सह-अस्तित्व में तो होती ही हैं, वे प्रवाहमान और वैविध्यतापूर्ण भी होती हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि एक धर्मनिरपेक्ष समाज में, ये अस्मिताएं कोई वर्चस्वशाली धार्मिक अस्मिताएं नहीं हैं।
 

हम भारतीय, अतीतकाल से ही खुद के अत्यंत सभ्य और सहिष्णु होने के दावे करते हैं। पर हम ‘अछूतों’ के साथ किए गए अमानवीय व्यवहार, जिसमें उन्हें अधिकार, प्रतिष्ठा और मानव-अस्तित्व के लिए ज़रूरी बुनियादी चीजों से भी वंचित कर दिया गया, की चर्चा नहीं करते।
 

जब हम ‘हिन्दू’ होने को परिभाषित करते हैं तो सामान्यतया ऐसा उच्च जाति के लोगों के संदर्भ में ही किया जाता है। क्योंकि इस परिभाषा का आधार वे टेक्स्ट होते हैं, जो इन्हीं जाति-समूहों के हैं। चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई या सिख, इस तथ्य की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता कि बहुतेरे धर्मावलंबी ऐसे होते हैं जो अपने धार्मिक ग्रंथों से थोड़ा ही परिचय रखते हैं। उनके लिए धर्म एक अलग ही मसला होता है। असल व्यवहार में, ये लोग अपना खुद का धर्म निर्मित कर लेते हैं, अपने चुने हुए तरीके से अपने देवताओं की पूजा करते हैं। ये लोग भले ही, जनगणना की रिपोर्ट में खुद को हिन्दू या मुस्लिम के रूप में दर्ज़ कराएं, पर असल में तो ये अपना खुद का धर्म ही निभाते है। मुझे लगता है कि इतिहास में हमेशा से ऐसा ही होता आया है। धर्म के इतिहासकारों को इसका मूल्यांकन करना चाहिए कि आखिर लोगों के धर्म और उनके विश्वास किस हद तक धार्मिक टेक्स्ट पर या व्यवहारों पर निर्भर होते हैं।
 

दलित समूहों की आकांक्षाओं और उनकी सामाजिक दशा को लेकर हम बिलकुल हाल ही में अधिक सजग हुए हैं। यद्यपि हम सर्वाधिक सहिष्णु समाज होने का दावा करते जरूर हैं, पर ऐसा है नहीं। हम एक अहिंसक समाज नहीं हैं।
 

एक जुमले के रूप में ‘अहिंसा और सहिष्णुता’ को राष्ट्रवाद के आविर्भाव के साथ ही अधिक लोकप्रियता मिली, जब पारंपरिक मूल्यों पर अधिक ज़ोर दिया जाने लगा। यह कहा गया कि भारतीय आध्यात्मिकता ने खुद को अहिंसा और सहिष्णुता के रूप में अभिव्यक्त किया जबकि पश्चिम में भौतिकवाद के प्रभाव के कारण, इन मूल्यों का अभाव दिखता है। इसके बावजूद जब कोई भारतीय इतिहास का अध्ययन करता है तो पाता है कि दुनिया के किसी अन्य हिस्से की तरह ही भारतीय इतिहास में भी असहिष्णुता और हिंसक संघर्षों के उदाहरण मौजूद हैं। ऐसे उदाहरण अरबों, तुर्कों और मंगोलों के आने से पहले के समय में भी मौजूद हैं। प्राचीन भारत में सेनाओं का जितना बड़ा आकार बताया जाता है, वह अगर अतिरंजित भी हो तो, यह बताता है कि पड़ोसी राज्यों से होने वाले युद्धों में बड़ी सेना की जरूरत होती थी। ऐसे ग्रंथों की भी कोई कमी नहीं है जो युद्धों का बखान करते नहीं थकते।
 

जब हम अतीत के धार्मिक समूहों की बात करते हैं तो अक्सर हम सोचते हैं कि ये समूह समरूपी अथवा समांगी समूह थे, पर असलियत इससे अलग थी। अतीत में बहुत से पंथ अस्तित्व में थे और इन पंथों के बीच प्रतिरोध, मेल-मिलाप, अंतःक्रिया की प्रक्रिया अनवरत चलती थी। पंथों की बहुलतावादी छवि की अक्सर ही उपेक्षा की जाती है। आम लोगों को के समक्ष अतीत की इस बहुलतावादी छवि को प्रस्तुत करने में इतिहास की क्या भूमिका हो सकती है?  
 

असल में धर्मों ने, व्यावहारिक रूप में समाज में कैसे काम (फंक्शन) किया, यह आप तभी पढ़ा सकते हैं, जब आप इतिहास की पाठ्यचर्या में धर्मों के इतिहास को भी शामिल करें। एक विषय के रूप में, धर्मों का इतिहास, सिर्फ टेक्स्ट पर ही निर्भर नहीं होता। इसमें दैनंदिन व्यवहार, धर्म के प्रदर्शन और धर्म के संरक्षकत्व के मसले भी शामिल होते हैं। धर्मों का इतिहास इन बातों को भी समझने की कोशिश करता है: धर्म-विशेष के समर्थकों का समाजशास्त्र, धार्मिक संस्थाओं की संरचना, धर्म को प्राप्त होने वाले समर्थन के कारणों की पड़ताल।
 

हमें धर्मों के इतिहास का अध्ययन जरूर करना चाहिए। कारण कि धर्म और समाज की जो परस्पर निर्भर प्रकृति है, उसकी समझ धर्म और समाज को बेहतर समझने के लिए बेहद जरूरी है। धर्मों के इतिहास के जरिये ही लोग धर्मों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पक्षों को समझ सकेंगे। वे यह जान पाएंगे कि धर्म और धर्म की समझ, महज धार्मिक टेक्स्ट और कुछ अमूर्त मूल्यों तक ही सीमित नहीं है। बल्कि इसमें ये बातें भी शामिल होंगी: धार्मिक शिक्षाओं का इस्तेमाल राजदरबारों द्वारा कैसे किया गया, कुछ सामाजिक संस्थाओं को प्राधिकार (अथॉरिटी) देने में इसका प्रयोग कैसे हुआ, तीर्थस्थलों में, संन्यासियों द्वारा, और भू-स्वामित्व और वाणिज्य जैसी आर्थिक गतिविधियों में धर्म और इसकी शिक्षाओं का उपयोग कैसे हुआ।
 

धर्म लोगों के जीवन से अलग कोई वस्तु नहीं है। धर्म, कुछ लोगों के भावनात्मक जीवन का एक स्पंदित हिस्सा होता है, जबकि कुछ लोगों के जीवन में यह इतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता। पर सामाजिक-राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में धर्म, अक्सर एक धार्मिक समूह के दूसरे धार्मिक समूह के प्रति व्यवहार को निर्धारित करता है। यह पूरी प्रक्रिया इतिहास का हिस्सा रही है, इसलिए सामाजिक-राजनीतिक अभिप्रेरणाओं को उतना ही महत्त्व दिया जाना चाहिए जितना कि धार्मिक भावों को। क्योंकि व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारक अक्सर धर्मेतर होते हैं। अंततः धर्मों को बिना विशेष दर्जे की मांग किए, एक दूसरे के साथ बराबरी के दर्जे में रहना भी सीखना होगा। जाहिर है कि एक ऐसे समाज में जहां एक धर्म सदियों से वर्चस्व में रहा हो, ऐसा होना आसान नहीं है।
 

(यह अंश समयांतर के नवंबर 2015 अंक में प्रकाशित हुआ है. बाकी हिस्सा जल्दी ही हाशिया पर.)

[यहां पढ़ें: भाग 1, भाग 2

पेरिस में आइसिस: तारिक अली

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/15/2015 01:44:00 PM



तारिक अली. वर्सोबुक्स से साभार. ऊपर दी गई तस्वीर बेरुत की है, जहां पेरिस पर हमले से एक दिन पहले गुरुवार को आइसिस ने फिदायीन हमला करके 43 लोगों की हत्या कर दी थी. पेरिस की खबरें दुनिया भर में छाई हैं, लेकिन बेरुत के मातम में कोई शरीक नहीं है. अनुवाद: रेयाज उल हक

तो आइसिस ने दावा किया है कि उनके हमले फ्रांस द्वारा मध्य पूर्व में ‘खिलाफत’ पर की जा रही बमबारी का जवाब हैं. इसमें कोई दोराय नहीं है कि हॉलैंडे/वैले जंगखोर हैं. इसमें विडंबना है कि वे असद हुकूमत को गिराने की तैयारी कर रहे हैं (जब तक वाशिंगटन देर करने के लिए नहीं कहता) और इस तरह वे इस इलाके में आइसिस के सहयोगी हो जाएंगे. असल में सीरिया में विपक्षियों की एक बड़ी जमात असद को टकराव के सबसे बड़े नुक्ते के रूप में देखती है और यह भी उम्मीद कर रही थी कि पश्चिम एक और हुकूमत में तब्दीली लेकर आएगा. अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो एक दूसरे से लड़ रहे जिहादी समूहों के बीच में एक गृह युद्ध छिड़ गया होता और फिर कौन जानता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका/यूरोपीय संघ उनमें से किसकी हिमायत करते.

आइसिस ने फ्रांस की राजधानी पर हमला किया है और एक सौ से ज्यादा नागरिकों की हत्या कर दी है और उससे दोगुने लोग जख्मी हैं. मैं जानता हूं कि पश्चिम ने भी यही किया है, असल में उसने दसियों हजार लोगों को मारा है, लेकिन कट्टरपंथ का यह टकराव कहीं नहीं लेकर जाएगा. पश्चिम नैतिक रूप में जिहादियों से बेहतर नहीं है. आखिर तलवार से सरेआम किसी का गला काटना, ड्रोन हमले में अंधाधुंध हत्याएं करने से खराब क्यों हैॽ इनमें से किसी का भी न तो समर्थन किया जा सकता है और न करना चाहिए.

अक्सर यह दलील दी जाती है कि अल कायदा और आइसिस दोनों ही अफगानिस्तान और इराक में साम्राज्यवादी युद्धों का अंजाम हैं और बेशक बात यही है. लेकिन यह काफी नहीं है. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की खुदकुशी और स्थानीय दमन और लोकप्रिय समर्थन में गिरावट के नतीजे में छोटे छोटे प्रगतिशील समूहों में आए नकारेपन पर भी गौर किया जाना चाहिए. इस प्रक्रिया ने सऊदी हुकूमत को सामने ला दिया है और अल-कायदा और आइसिस दोनों ही वहाबीवाद के भारी असर में हैं, जो सुन्नी इस्लाम के भीतर एक बहुत ही छोटी सी जमात है.

इस इलाके में फिर से स्थिरता बहाल करने के लिए तीन अहम शर्तें हैं: सऊदी शाही परिवार को मिल रहा पश्चिमी समर्थन खत्म हो; इलाके में सारी पश्चिमी दखलंदाजी खत्म हो, एक अकेला इस्राईली/फलस्तीनी राज्य बने जिसके सभी नागरिकों को बराबर के हक हासिल हों. जब तक यह नहीं होता, सियासी सनकी और वहशी अपने पांव पसारते रहेंगे.

पेरिस और पूर्व अरब के किसी भी शहर में बेगुनाहों के कत्ल को किसी भी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता.

छोटा राजन को देश और दलितों का आदर्श मत बनाइए

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/12/2015 11:28:00 AM



अंडरवर्ल्ड के डॉन छोटा राजन की गिरफ्तारी के बाद उसे एक देशभक्त, राष्ट्रवादी के रूप में पेश करने की कोशिशों पर मानव अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी का लेख.

अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन की इंडोनेशिया के बाली शहर में नाटकीय गिरफ्तारी तथा उसका आनन फानन में भारत लाया जाना किसी पूर्व निर्धारित पटकथा जैसा लगता है. संभव है कि यह कवायद काफी दिनों से की जा रही हो, जिसे एक खूबसूरत मोड़ दे कर इस अंजाम तक पंहुचाया गया है. केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह इस बात से इत्तेफाक रखते हैं, वे मानते हैं कि इस दिशा में काफी समय से काम चल रहा था. इसका मतलब यह हुआ कि छोटा राजन की गिरफ्तारी पूर्वनियोजित घटनाक्रम ही था.

वैसे तो यह माना जाता रहा है कि भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियां उसकी लम्बे वक़्त से मददगार रही हैं तथा उसे मोस्टवांटेड अंडरवर्ल्ड माफिया दाउद इब्राहीम के विरुद्ध एक तुरूप के पत्ते के रूप में संभाल कर रखे हुए थीं, मगर यह भी एक सम्भावना हो सकती है कि वर्तमान केंद्र सरकार में भी छोटा राजन के प्रति हमदर्दी रखनेवाले कुछ लोग हों, जिन्होंने उसकी ससम्मान गिरफ्तारी का प्रबंध करने में अहम भूमिका अदा की हो. फ़िलहाल किसी भी सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है. जैसा कि हम जानते हैं कि अपराध जगत के सत्य उजागर होने में थोड़ा समय लेते हैं, इसलिए वक़्त का इंतजार करना उचित होगा.

छोटा राजन की गिरफ्तारी होते ही सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन के एक प्रमुख सहयोगी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के नेता रामदास अठावले की प्रतिक्रिया आई, उन्होंने कहा कि छोटा राजन को इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि वह दलित है, जबकि दाउद को नहीं. अठावले के बयान से देश को छोटा राजन की जाति का पता चला. तथ्यात्मक रूप से यह बात सही है कि उसका जन्म 1956 में मुंबई के चेम्बूर इलाके में एक मध्यमवर्गीय दलित परिवार में हुआ था. वह मात्र 11 कक्षा तक पढ़ा क्योंकि उसके पिता की नौकरी छूट गयी, जो एक मिल में नौकरी करते थे. आर्थिक तंगी के चलते उसने पढ़ाई छोड़ दी और सिनेमा के टिकट ब्लैक करने लगा. यह काम उसके लिए अपराध जगत का प्रवेश द्वार बना. यहीं से वह राजन नायर नामक माफिया की नजर में चढ़ा जो उस वक्त बड़ा राजन कहलाता था. उसके साथ मिलकर छोटा राजन ने अवैध वसूली, धमकी, मारपीट और हत्याएं तक कीं. 1983 में जब बड़ा राजन को गोली का शिकार हो गया तब उसका अपराध का साम्राज्य राजेन्द्र सदाशिव निखिलांजे उर्फ़ छोटा राजन को संभालना पड़ा. फिर उसकी माफिया किंग दाउद से दोस्ती हो गयी. दोनों ने मिलकर इस कारोबार और अपराध में जमकर भागीदारी निभाई. उनकी दोस्ती इतनी प्रगाढ़ हो गयी थी कि जब पुलिस के शिकंजे से बचने के लिए दाउद दुबई भागा तो वह अपने साथ छोटा राजन को भी ले गया.

दाउद और छोटा राजन का रिश्ता 1992 तक गाढ़ी दोस्ती का रहा, लेकिन छोटा राजन की मुंबई पर बढ़ती पकड़ से सतर्क हुए दाउद ने उसके साथ विश्वासघात करना शुरू कर दिया. एक तरफ तो साथ में सारे बुरे कारोबार, दूसरी तरफ छोटा राजन के खास सहयोगियों पर अपने शूटरों द्वारा प्रहार, दो तरफ़ा खेल खेल रहा था दाउद. शुरू शुरू में तो छोटा राजन को यह महज़ संयोग लगा लेकिन जब उसके खास साथी बहादुर थापा और तैय्यब भाई की हत्या में दाउद का हाथ होने की पुष्टि हुई तो दोनों के मध्य दरार आ गई जो 1993 के मुंबई बम विस्फोट से एक ऐसी खाई में बदल गयी, जिसे फिर कभी नहीं पाटा जा सका. एक ज़माने के खास दोस्त अब जानी दुश्मन बन चुके थे. फिर जो गैंगवार मुंबई में चला उसने पुलिस का काम सरल कर दिया. माफिया एक दूसरे को ही मार रहे थे. पुलिस का काम वो खुद ही करते रहे और एक दूसरे को निपटाते रहे. इस तरह मुंबई से माफिया का सफाया होने लगा. दाउद मुंबई बम धमाकों के बाद कराची में रहने लग गया तथा वह आई एस आई के हाथों की कठपुतली बन गया और छोटा राजन अपनी सुरक्षा के लिहाज़ से बैंकाक भाग गया. भारत से दूर दुनिया के दो अलग अलग देशों से दोनों के बीच दुश्मनी और जंग जारी रही. भारत सरकार दोनों को भारत लाने की वचनबद्धता दोहराती रही पर कामयाब नहीं हो पाई. और अब अचानक अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन सहजता से बाली पुलिस के हत्थे चढ़ गया. वहां की सरकार भी बिना कोई हील हुज्जत किये आराम से इतने बड़े अपराधी को भारत को परोसने को एकदम से राज़ी हो गयी!

अंततः 27 साल के लम्बे समय के बाद 6 नवम्बर 2015 की सुबह 5 बजकर 45 मिनट पर 55 वर्षीय अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन की भारत में वापसी हो गई. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक डॉन ने दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर उतरते ही भारत भूमि को चूमा, धरती माता (भारत माता!) को प्रणाम किया. छोटा राजन के इस एक कारनामे से राष्ट्र निहाल हो गया और देश में उसके लिए सकारात्मक माहौल बनने लग गया. संभव है कि आने वाले समय में उसे आतंकवाद के खिलाफ ज़िन्दगी भर लड़नेवाला योद्धा भी मान लिया जाए. जिस तरह से उसकी गिरफ्तारी की पूरी घटना अमल में लाई गई है, वह इसी तरफ कहानी के आगे बढ़ने का संकेत देती है.

क्या यह महज़ संयोग ही है कि छोटा राजन का एक भाई दीपक निखिलांजे उस रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया का बड़ा नेता है, जिसके नेता ने छोटा राजन के प्रति सबसे पहले हमदर्दी जताई है. दीपक हाल ही में प्रधानमंत्री की मुंबई यात्रा के दौरान उनके साथ मंच पर भी दिखाई दिया था, उसी पार्टी के नेता और भाजपा के सहयोगी दलित नेता रामदास अठावले छोटा राजन को दलित बता कर एक वर्ग की सहानुभूति बनाने का प्रयास करते हैं. क्या इसे भी सिर्फ इत्तेफाक ही माना जाये कि छोटा राजन का साला राहुल वालनुज सिर्फ एक महीने पहले शिवसेना छोड़कर भाजपा में शामिल होता है और भाजपाई श्रमिक संगठन राष्ट्रीय एकजुट कामगार संगठन का उपाध्यक्ष बनाया जाता है. छोटा राजन के परिजनों की भाजपा से लेकर प्रधानमंत्री तक की परिक्रमा और रामदास अठावले का दलित सम्बन्धी बयान सिर्फ संयोग मात्र नहीं हो सकते हैं. इतना ही नहीं बल्कि छोटा राजन के एक भाई आकाश निखिलांजे का अब यह कहना कि वह कोई आतंकी नहीं है और अब खुद छोटा राजन द्वारा मीडिया के समक्ष अपने आपको मुंबई पुलिस का प्रताड़ित पीड़ित बताना और यह कहना कि मुंबई पुलिस ने दाउद के इशारों पर उस पर बहुत अत्याचार किए हैं. बकौल छोटा राजन मुंबई पुलिस में दाउद के बहुत सारे मददगार हैं, जिनके नामों के खुलासे होने के दावे किए जा रहे हैं.

ऐसा लग रहा है कि छोटा राजन के साथ एक अपराधी सा बर्ताव नहीं करके उसे भारत के खास देशभक्त हिन्दू डॉन के रूप में प्रस्तुत करके उसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया जा रहा है, उसके पक्ष में हवा बनाई जा रही है. छोटा राजन के बयान और भारत सरकार के बयान सब एक खास तरह का माहौल और कहानी बनाई जा रही है. छोटा राजन ने कह दिया है कि वह ज़िन्दगी भर आतंकवाद के खिलाफ लड़ा है और आगे भी लड़ता रहेगा. तो इसका मतलब यह निकाला जाए कि अब 70 आपराधिक मामलों में वांछित अपराधी आतंक से लड़ने वाला हीरो बना दिया जाएगा (ऐसे अपराध जिनमें 20 हत्या के और 4 आतंक निरोधक कानून के अंतर्गत भी मामले हैं) यह आतंकवाद को धर्म, सम्प्रदाय और रंग के चश्मों से देखनेवाली एक खास किस्म की विचारधारा की सफलता नहीं है?

वैसे तो सत्तासीन गठबंधन के लिए छोटा राजन हर दृष्टि से मुफीद है, वह दलित है, उसका परिवार आम्बेडकरी नवबौद्ध परिवार रहा है, उसकी माँ लक्ष्मी ताई निखिलांजे ने मुंबई के तिलकनगर में एक बुद्ध विहार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी, वह मुंबई पुलिस से प्रताड़ित एक स्वधर्मी डॉन है, जिसने बाबरी मस्जिद ढहा दिये जाने के बाद मुंबई धमाकों का बदला लेने वाले धर्मांध और देशद्रोही दाउद के खिलाफ लम्बी जंग लड़ी, सन्देश साफ है कि जो काम भारत की सरकारों और सुरक्षा एजेंसियों को करना चाहिए था वह अकेले छोटा राजन ने किया है. वह कथित इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाला वतनपरस्त भारतीय है, उसका सम्मान होना चाहिए, उसकी सुरक्षा होनी चाहिए और उसकी मदद से हमें दाउद जैसे दरिन्दे को धर दबोचना चाहिए. उसकी नाटकीय गिरफ्तारी के तुरंत बाद से ही भक्तगण ऐसा माहौल बनाने में लगे हुए हैं. इस बीच महाराष्ट्र पुलिस ने सीबीआई की अन्तराष्ट्रीय अपराधों के अनुसन्धान में विशेष दक्षता को देखते हुए छोटा राजन के खिलाफ सारे मामल उसे सौंप दिए हैं. अब छोटा राजन केंद्र सरकार का विशिष्ट अतिथि है तथा उसके जान माल की सुरक्षा करना इस कृतज्ञ राष्ट्र की ज़िम्मेदारी है!

छोटा राजन की तयशुदा गिरफ्तारी, उसके लगभग पूर्वनिर्धारित प्रत्यर्पण और वायुसेना के विशेष विमान गल्फस्ट्रीम -3 से भारत पदार्पण और दीवाली से ठीक पहले स्वदेश आगमन को एक उत्सव का रूप देना और उसे आतंकवाद के खिलाफ आजीवन लड़नेवाला एक दलित यौद्धा निरूपित कर दिया जाना जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की तरफ इशारा कर रहा है वह वर्तमान के जेरेबहस असहिष्णु राष्ट्र से भी कई ज्यादा भयानक है. राष्ट्रभक्ति के नाम पर, आतंकवाद से लडाई के नाम पर एक अपराधी को राष्ट्रनायक बनाने के हो रहे प्रयास निसंदेह डरावने हैं. हत्यारे को नायक बनाया जा रहा है. एक माफिया डॉन को दलितों का मसीहा बना कर पेश किया जा रहा है. क्या यह देश इतना कमजोर हो गया है कि हमें आतंकवाद के विरुद्ध लडाई भी आतंकियों को देशभक्ति का चोला पहना कर लड़नी पड़ रही है?

हमें याद रखना होगा कि आतंक को धर्म के चश्मे से देखने की यह अदूरदर्शी नीति एक दिन देश विभाजन का कारक बन सकती है. लोग जवाब चाहेंगे कि एक दिन इसी तरह ख़ुफ़िया एजेसियों के द्वारा याकूब मेमन भी लाया गया था, सरकारी साक्षी बनने के लिए, फिर वो समय भी आया जब उसे लम्बे समय तक कैद में सड़ाने के बाद फांसी के फंदे पर लटका दिया गया और जिसने इसका विरोध किया वो सभी राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिये गये, क्या इस इतिहास की पुनरावृत्ति छोटा राजन मामले में नहीं होगी, इसकी कोई गारंटी है? आज यह सवाल खड़ा हो रहा है कि यह किस तरह का देश हम बना रहे है, जहां पर अक्षम्य अपराधों और दुर्दांत जालिमों को राष्ट्रवाद के उन्माद चादर तले ढंक कर सुरक्षित करने की सुविधा निर्मित कर ली गई है. हम कितनी आत्मघाती सोच को अपना चुके हैं जहाँ अगर आतंक का रंग हरा है तो वह खतरनाक और आतंक का रंग गेरुआ है तो वह राष्ट्रवाद मान लिया जाएगा. निर्मम सत्ता का यह स्वभक्षी समय है, हम खुद नहीं जानते कि हम कहां जा रहे हैं, पर इतनी सी गुजारिश तो की ही जा सकती है कि छोटा राजन जैसे अपराधी को देश और दलितों का आदर्श बनाने की भूल मत कीजिए.
 

इन बेशर्मों को शर्म नहीं आएगी

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/07/2015 06:31:00 PM



आनंद तेलतुंबड़े. अनुवाद: रेयाज उल हक

‘जो हमसे असहमत होते हैं, हम उनसे बहस नहीं करते, उन्हें खत्म कर देते हैं.’
-बेनितो मुसोलिनी [द लासियो स्पीचेज (1936), अंतोनियो सांती द्वारा द बुक ऑफ इतालियन विज्डम में उद्धृत, सितादेल प्रेस, 2003, पृ.88.]

देश में एक सचमुच की क्रांति शुरू हुई है. देश को फासीवादी गिरफ्त में जाने के इस पूरे वक्फे में जो बुद्धिजीवी तबका रीढ़विहीन दिखने की हद तक चुप रहता आया है, वह अचानक जाग उठा और उसने साहित्यिक पुरस्कारों को लौटाना शुरू कर दिया. जो बात 4 सितंबर को उदय प्रकाश द्वारा कुछ दिन पहले ही एक दूसरे साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त साथी लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ पुरस्कार लौटाया जाना जमीर की एक हल्की झलक के रूप में दिखी, वह अब एक तूफान बन गई है, जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी बहा ले गई और उन्हें अपने कुशासन के खिलाफ लोगों की गुहार पर अपनी रणनीति चुप्पी तोड़ने पड़ी. जब उदय प्रकाश ने अपना पुरस्कार लौटाया, उसके करीब एक महीने के बाद दो साहित्यिक दिग्गजों नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी ने अपने पुरस्कार लौटा दिए, जिसने विरोध की बाढ़ को और तेज कर दिया. जब मैं यह लिख रहा हूं, 35 से अधिक उल्लेखनीय लेखक अपने पुरस्कार लौटा चुके हैं और यह गिनती अभी बढ़ती जा रही है. दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा चौतरफा हमलों के माहौल में यह सचमुच उल्लेखनीय है.

मोदी ने अब तक जो कहा है, उससे ऐसा लगता है कि उन्हें यह अंदाजा है कि यह उत्तर प्रदेश में महज इस अफवाह की बिना पर कि उन्होंने गोमांस खाया था और अपने घर में रख रखा था, एक बेकसूर 52 वर्षीय मुसलमान मो. अखलाक की भीड़ द्वारा पीट पीट कर की गई हत्या और उसके 22 साल के बेटे को गंभीर रूप से जख्मी कर देने पर बुद्धिजीवियों के गुस्से की अभिव्यक्ति भर है. डॉ. दाभोलकर या कॉमरेड पानसरे की तो बात ही रहने दें, मोदी ने कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा, जिसने बजाहिर तौर पर लेखकों के विरोध को जन्म दिया है. दादरी की हत्या पर बोलते हुए भी, उन्होंने महज इतना कहा कि यह ‘दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण’ था और उन्होंने अपनी पार्टी के संगीत सोम – जो इत्तेफाक से गोमांस के निर्यात का धंधा चलाते हैं – जैसे साथियों और साधु, साधवियों और अपने परिवार के द्वारा हत्या को मुखर रूप से जायज ठहराने पर कुछ भी नहीं कहा. एक तरफ तो उन्होंने बात को यह कह कर घुमाया कि उनकी सरकार का इससे कुछ लेना-देना नहीं है, वे विपक्षियों पर निशाना साधने की अपनी आदते को नहीं भूले और कहा कि वे सांप्रदायिकता फैला रहे हैं. राष्ट्र के जमीर की रहनुमाई करनेवाले लेखकों के इस जारी विद्रोह पर मोदी में या सरकार में उनके साथियों में रत्ती भर पछतावा या शर्म का जरा सा भी अहसास नहीं था.

गोमांस पर पाबंदी

गोमांस पर पाबंदी इन सबसे गंदे दिमागों की सीधी सियासत है, क्योंकि यह मुसलमानों को निशाना बना कर देश में बिखराव लाने के लिए इस्तेमाल की जाती है, मानो बुनियादी तौर पर वे ही गोमांस खाते हैं. जब लालू प्रसाद यादव ने कहा कि हिंदू भी गोमांस खाते हैं, तो यह तथ्य पर आधारित एक बयान था, लेकिन उसे मीडिया के बेवकूफों ने भड़का कर एक बड़ा विवाद बना दिया. अगर कोई नाम ही लेना चाहे तो दलित, आदिवासी, गैर-खेतिहर अन्य पिछड़ी जातियां, मुसलमान, ईसाई और पूरा का पूरा पूर्वोत्तर गोमांस खाता है और अगर इस पूरी आबादी को जोड़ लिया जाए तो देश की कुल आबादी के आधे से भी ज्यादा होगा. जिन तबकों के नाम लिए गए हैं, न तो उनमें से आनेवाला हरेक इंसान गोमांस खाता है और न ही बाकी के सभी तथाकथित हिंदू गोमांस से परहेज करते हैं. इसलिए गोमांस पर पाबंदी लगाना लोगों की जिंदगी के बुनियादी अधिकार पर हमला है. हिंदुत्व ब्रिगेड संविधान ‘राज्य के नीति-निर्देशक उसूलों’ के तहत अनुच्छेद 48 से अपनी बेशर्मी ढंक रहा है, जिसमें लिखा है कि ‘राज्य खेती और पशुपालन को आधुनिकी और वैज्ञानिक पद्धतियों पर संगठित करने की कोशिश करेगा और खास तौर से नस्लों के संरक्षण और बेहतरी के लिए कदम उठाएगा और गायों और दूसरे दुधारू तथा वाहक पशुओं की हत्या पर पाबंदी लगाएगा.’ यह शासक वर्गों के जनविरोधी चरित्र का एक सबूत है, जिन्होंने व्यवस्थित रूप से सभी नीति-निर्देशक उसूलों की अनदेखी की है, जिसमें से एक 10 साल के भीतर 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और सार्वभौम शिक्षा देने की बात कही गई है और सिर्फ गाय के मुद्दे पर ही इतनी पाबंदी दिखाता है. गाय, इस मुल्क के भविष्य से ज्यादा अहम हो गई है. असल में, इस अनुच्छेद का मतलब आंख मूंद कर हर तरह की गाय की हत्या पर पाबंदी नहीं है, लेकिन इसको ऐसे तोड़ा-मरोड़ा गया है कि इसका यही मतलब निकले और यहां तक कि अदालतों ने भी बिना कोई सवाल उठाए इसे कबूल कर लिया है. इसके बावजूद, संविधान गाय की हत्या पर पाबंदी की बात करता है, गोमांस खाने पर पाबंदी की नहीं और गैर दुधारू मवेशियों का मांस खाने पर पाबंदी की तो और भी नहीं.

इस अनुच्छेद के जन्म के बारे में, गोमांस पर पाबंदी के पैरवीकारों को यह बात जरूर पता होनी चाहिए कि संविधान सभा के मुसलमान प्रतिनिधियों (संयुक्त प्रांत के एम/एस जेड.ए. लारी और असम के सैयद मुहम्मद सादुल्ला) ने हिंदुओं की धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करते हुए खुद अपनी मर्जी से इसको मंजूरी दी थी. हालांकि रूढ़िवादी हिंदुओं की अतार्किकता इसे बुनियादी अधिकारों का हिस्सा बना देने की हद तक बढ़ गई थी. इसका श्रेय डॉ. आंबेडकर को जाता है कि एक जानवर के अधिकार को बुनियादी अधिकारों में शामिल करने से दुनिया में मुल्क का जो मखौल उड़ता, उससे उन्होंने मुल्क को बचा लिया. उन्होंने इस अनुच्छेद को इस तरह लिखा कि आनेवाली पीढ़ियों के लिए इसकी एक वैज्ञानिक समीक्षा की गुंजाइश रहे. रूढ़िवादी हिंदू सदस्यों ने अपनी दलीलों को भगवत गीता के आध्यात्मिक अर्थशास्त्र के रंग में रंग कर पेश किया था. वे नहीं जानते थे कि प्राचीन दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में गो हत्या पर पाबंदी का चलन था, जहां खेती में बोझ ढोनेवाली ताकत के रूप में बैलों को इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन तकनीक और खानपान के तौर-तरीके में बदलाव के साथ (मांस के थोड़े में ज्यादा पौष्टिक भोजन होने के कारण) गाय की हत्या के असली अर्थशास्त्र ने गाय की रक्षा के ‘आध्यात्मिक’ अर्थशास्त्र की जगह ले ली. जहां तक तथ्यों की बात है, ब्राह्मण पुरोहित सबसे बड़े गोहत्यारे थे, जिसने मवेशियों की रक्षा करने के लिए बुद्ध को विद्रोह करने के लिए उकसाया. हिंदुत्व ताकतों की दलील एक गलत वक्त में दी जा रही, बेईमान और विकास विरोधी दलील है जो मुल्क को गीता के दौर में धकेल रही है.

गाय बनाम इंसान

इसे साफ साफ कहा जाए कि दक्षिणपंथियों की गाय की सियासत, इंसानों के कत्लेमाम की सियासत है. यह महज झज्झर में पांच दलितों या दादरी में एक मुसलमान या उधमपुर में एक कश्मीरी ट्रकचालक के कत्लेआम की बात नहीं है, बल्कि यह मवेशीपालने वाले उन दसियों लाख किसानों के कत्लेआम की बात है, जो खेती में चल रही पहले से ही नुकसानदेह रुझानों और सामाजिक डार्विनवादी नवउदारवाद की वजह से तंगी में हैं. वे गायों को पालने के नकारात्मक आर्थिक इंतजाम के इस बढ़े हुए बोझ से पूरी तरह दब जाएंगे. मौजूदा माली इंतजाम इस पर निर्भर करता है कि अपनी उत्पादक उम्र पूरी कर लेने के बाद गायों को कत्लखाने को बेच दिया जाता है. आमतौर पर एक गाय को 3-4 बार बच्चे देने के बाद बेच दिया जाता है, क्योंकि इसके बाद उसकी दूध की पैदावार और उसकी गुणवत्ता दोनों में गिरावट आती है. भारत में, इसे 8-10 बार बच्चे देने तक खींचा जा सकता है, जिसके बाद वह कम से कम 3-4 साल जिंदा रहेगी. अगर इसके बाद उसे बेचा नहीं गया, तो पूरा माली इंतजाम उलट-पुलट हो जाएगा. और सिर्फ इतना ही नहीं. किसानों के अलावा, ऐसे दसियों लाख लोग और हैं जो गाय के कत्ल और खाल के कारोबार से अपना गुजर-बसर चलाते हैं, जिनमें उनमें सबसे ज्यादा दलित लोग हैं. वे लोग बेरोजगार हो जाएंगे. इसके साथ साथ यह भी होगा कि दूसरे मांस की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी उनके भोजन के संकट को बढ़ा देगी. पहले से ही भारतीयों में प्रोटीन की गंभीर कमी पाई जाती है, जो उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को नुकसान पहुंचाती है. इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो (आईएमआरबी) द्वारा किए गए एक उपभोक्ता सर्वेक्षण के मुताबिक 91 फीसदी शाकाहरियों और 85 फीसदी मांसाहारियों में प्रोटीन की कमी थी, जिसको प्रतिदिन शरीर के कुल वजन में, प्रति किलो वजन पर 1 ग्राम से कम प्रोटीन होने के आधार पर मापा जाता है. गरीब लोगों के लिए गोमांस प्रोटीन का एक अहम स्रोत है और इस पर पाबंदी का मतलब उनकी जान ले लेना होगा. इस खतरनाक भूत के बारे में हिंदुत्व की दलील एक जालसाजी है और सिर्फ भावनात्मक उत्पीड़न ही है जब वे यह पलटकर पूछते हैं कि क्या आपकी मां की बूढ़ी उम्र हो जाने के बाद आप उसे छोड़ देते हैं.

गोरक्षा के आर्थिक पहलू पर पिछले दशक में अकादमिक क्षेत्र में शोध किए गए हैं. सबसे हालिया रिपोर्ट एस्थर गेहर्के और माइकल ग्रिम द्वारा प्रकाशित की गई है, जो हमारे अपने एम.वी. दांडेकर और के.एन. राज की खोजों की तस्दीक करती दिखाई पड़ती है. दांडेकर और राज दोनों ही हिंदू और शायद ब्राह्मण थे और जिन्होंने अपना शोध 1969 में प्रकाशित कराया था. दोनों की यह पक्की राय थी कि गाय की पूजा का चलन असल में भारत के मवेशी संसाधन के अधिक तर्कसंगत उपयोग के आड़े आता है. राज ने यहां तक सुझाव दिया था कि धर्म सिर्फ यही अकेली भूमिका निभाता था कि उसने अवांछित मवेशियों से छुटकारा पाने के तरीके तय किए. उन्होंने राय जाहिर की कि गायों को कत्लखाने भेजने के बजाए उत्तर भारतीय किसान जानबूझ कर भूखा रख कर या उसे खुला छोड़ कर, जिससे वे बांग्लादेश के कत्लखानों में चली जाती थीं, धीरे धीरे मौत देने के तरीके को तरजीह देते थे. जाहिर है कि पवित्र गाय के बारे में हिंदुत्ववादी उन्माद में इन तथ्यों पर कोई गौर नहीं किया गया है.

अबाध अतार्किकता

हिंदुत्व गिरोह की मक्कारी और बेईमानी इसके हजार सिरों में बसती है, जो एक ही साथ अनेक आवाजों में बात करता है. एक तरफ जबकि मोदी-शाह बिहार चुनावों की वजह से दादरी में पीट पीट कर की गई हत्या पर नापंसदगी के लहजे में बोलने को मजबूर हुए तो दूसरी तरफ हिंदू दक्षिणपंथ की मूर्खता के महास्रोत आरएसएस ने अपने मुखपत्र पांचजन्य के जरिए इसे जायज ठहराया. आवरण कथा के रूप में छापे गए एक लेख में कहा गया, ‘वेदों ने उस पापी की हत्या का आदेश दिया है, जो गाय की हत्या करता है. दादरी पीड़ित ने शायद अपने पापों के प्रभाव में गाय की हत्या की थी.’ इसने उन लेखकों को फटकारा गया, जिन्होंने दादरी हत्या पर विरोध जताते हुए साहित्य अकादेमी पुरस्कार लाटाए. उन्हें हिंदू भावनाओं के प्रति असंवेदनशील कहा गया. जैसी की आशंका थी, आरएसएस ने इस मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए कह दिया कि यह लेख संपादकीय नहीं था. इसने तो ऐसा कह दिया, लेकिन इसके बंदरों के गिरोह ने उनकी अतार्किकता के साथ असहमति जताने का साहस करनेवाले लोगों को धमकाने में अपनी बहादुरी दिखानी जारी रखी. साक्षी महाराज, साध्वी प्राची और दूसरे अनेकों ने लोग जहर फैलाते रहे और घिरने पर भाजपा इसकी रट लगाए रहती कि ‘वे हमारे लोग नहीं हैं.’

भाजपा एक तरकीब यह भी अपनाती है कि कांग्रेस से शासनकाल में हुई ऐसी ही घटनाओं को चुन ले, ऐसा करते हुए यह इस तथ्य को भूल जाती है कि लोगों ने इसे कांग्रेस की गलतियों को दोहराने या उससे भी आगे निकल जाने के लिए वोट नहीं दिया था. जहां तक लेखकों के विरोध का सवाल है, एक ओर यह जरूर दादरी में पीट पीट कर की गई हत्या से तेज हुआ, लेकिन यह उसी तक सीमित नहीं है. यह संस्थानों को व्यवस्थित रूप से खत्म करने और राजनीति को बेशर्मी से जहरीला बना देने के खिलाफ है, जिस पर वे हिंदू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए अमल कर रहे हैं. लेखकों द्वारा उठाया गया यह कदम बेहद अहम है, लेकिन शायद इसे उठाने में बड़ी देर कर दी गई. पूरी दुनिया ने उनके विद्रोह पर गौर किया, लेकिन बेशर्म हिंदुत्व परिवार को जरा भर भी शर्म दिलाने में नाकाम रहा. अहम बात यह समझना है कि बुनियादी तौर पर वे ऐसी किसी भी बात की समझदारी से परे हैं. मुसोलिनी की राह पर चलनेवाले सिर्फ असहमत लोगों की हत्या करने की भाषा ही जानते हैं. इसलिए सिर्फ एक ही जवाब है जो इन कायरों के गिरोह को उनकी मांद में धकेल सकता है और वह है अवाम की मजबूत ताकत, उस अवाम की ताकत जो ब्राह्मणवाद की सताई हुई है और जो जटिल अक्लमंदी से दूर है. उनको यह समझना ही होगा कि हिंदू राष्ट्र बुनियादी तौर पर ब्राह्मणों के एक गिरोह की पुनरुत्थानवादी परियोजना है, जो अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करने के बेवकूफी भरे सपने देख रहे हैं. इसे बस मिनटों में हराया जा सकता है, अगर ब्राह्मणवाद द्वारा परंपरागत रूप से सताई गई इस दलित-शोषित जनता में सिर्फ कुछेक दलीलों की बजाए अपनी मुट्ठी तान कर खड़े हो जाएं!

लोकतंत्र बचाने के लिए जरूरी है पुरस्कार वापसी

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/06/2015 05:08:00 PM


आई.आई.टी. मुंबई में प्राध्यापक रहे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित राम पुनियानी का लेख. अनुवाद: अमरीश हरदेनिया.

“पिछले कुछ हफ्तों में लेखकों, वैज्ञानिकों और कलाकारों के सम्मान लौटाने की बाढ़ देखी गई। पुरस्कार लौटाने के जरिये ये सम्मानित और पुरस्कृत लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए खड़े हुए हैं। बढ़ती असहिष्णुता और हमारे बहुलतावादी मूल्यों पर हो रहे हमलों पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए इन शिक्षाविदों, इतिहासकारों, कलाकारों और वैज्ञानिकों के कई बयान भी आए हैं। जिन्होंने अपने पुरस्कार लौटाए हैं  वे सभी साहित्य, कला, फिल्म निर्माण और विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले लोगों में से हैं। इस तरह सम्मान लौटाकर उन सभी लोगों ने सामाजिक स्तर पर हो रही घटनाओं पर अपने दिल का दर्द बयान किया है।

बढ़ती असहिष्णुता की वजह से दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी की हत्या कर दी गई। गोमांस खाने के मुद्दे पर एक मुस्लिम की पीट-पीट कर हत्या कर दिए जाने की घटना भी हुई है, जिसने समाज के विवेक को हिलाकर रख दिया। समाज के विभिन्न वर्गों के इस तरह का कड़ा संदेश देने के कारण भाजपा से जुड़े लोग, उसके मूल संगठन आरएसएस और उससे संबंधित कई संगठन तथ्यहीन आधार पर इन लोगों की कड़ी आलोचना कर रहे हैं।

इन घटनाओं से चिंतित भारत के राष्ट्रपति बार-बार देश को बहुलतावादी सामाजिक मूल्यों की याद दिला रहे हैं। उपराष्ट्रपति ने भी कहा है कि नागरिको के जीने के अधिकार की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है। मूडीज जैसी अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ने कहा है कि अगर मोदी अपने सहयोगियों पर लगाम नहीं लगाते हैं तो भारत अपनी विश्वसनीयता खो देगा। हाल के दिनों में असहिष्णुता के बढ़ते माहौल से चिंतित देश के प्रबुद्ध नागरिक बेचैनी महसूस कर रहे हैं। जुलियस रिबेरो का यह बयान इसकी बानगी है कि भारत में एक ईसाई होने की वजह से वह परेशान महसूस कर रहे हैं। अब नसीरुद्दीन शाह ने कहा है कि देश में पहली बार उन्हें उनके मुस्लिम होने का एहसास कराया जा रहा है। शायर और फिल्मकार गुलजार ने कहा कि आज ऐसा वक्त आ गया है कि लोग आपका नाम पूछने से पहले आपका धर्म पूछते हैं। नारायण मूर्ति और किरण मजूमदार शॉ जैसे प्रख्यात उद्यमियों ने भी बढ़ती असहिष्णुता पर अपनी चिंता जाहिर की है। इसी तरह आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन जैसे लोग भी बहुलता के मूल्यों को संरक्षित करने के लिए आवाज उठाने वालों के साथ खड़े हैं।
   
सत्ताधारी समूह भाजपा के नेताओं द्वारा इन रचनाकारों-वैज्ञानिकों पर हमला बोलते हुए इनके कदम को बनावटी विद्रोह करार दिया गया है, जैसा कि अरुण जेटली ने किया। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि जो लोग पुरस्कार लौटा रहे हैं वे वामपंथी हैं या कांग्रेस के सत्ता में रहने के दौरान विशेषाधिकारों के लाभार्थी रहे हैं और अब पिछले एक साल से भाजपा के सत्ता में आ जाने की वजह से ये लोग चकित होकर हाशिये पर हैं इसलिए यह विरोध हो रहा है। आरोप यह लगाया जा रहा है कि ये लोग नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा द्वारा लिखी जा रही विकास की कहानी को पटरी से उतारने या बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। जेटली तो यहां तक कह गए कि खुद नरेंद्र मोदी इन सम्मान लौटाने वालों की असहिष्णुता का शिकार रहे हैं। राजनाथ सिंह जैसे कुछ लोगों का कहना है कि ये लोग मोदी सरकार को निशाना बना रहे हैं जबकि ये कानून व्यवस्था की मामूली घटनाएं हैं जो राज्य सरकार की जिम्मेवारी है।

जो घटनाएं हुई हैं वे न तो कानून व्यवस्था की समस्याएं हैं न ही वह संरक्षण के विश्वास के खत्म होने से संबंधित हैं क्योंकि ये घटनाएं समाज के तीव्र सांप्रदायिकरण की अधिक वृहद प्रक्रिया से संबंधित हैं। इस बार सांप्रदायिकरण की सीमा ने सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर दिया है। पुरस्कार लौटाने वालों पर आपातकाल, सिख विरोधी दंगों, कश्मीरी पंडितों के पलायन और 1993 के मुंबई बम धमाकों के वक्त अपना पुरस्कार नहीं लौटाने का जो आरोप लगाया जा रहा है वह बढ़ती असहिष्णुता की प्रकृति और इसकी सीमा के स्तर पर होने वाली सामाजिक प्रतिक्रिया से निबटने का एक कृत्रिम प्रयास है। वापस किए गए पुरस्कारों और विभिन्न वर्गों द्वारा जारी बयान में इसके जो कारण बताए गए हैं वे कारण इस तरह की सभी घटनाओं में मौजूद हैं। जेटली और उनकी मंडली द्वारा रेखांकित की गईं ये सभी घटनाएं भारत के हालिया इतिहास के दुखद हिस्से हैं। बहुत सारे लेखकों ने इन घटनाओं के खिलाफ प्रतिरोध किया था। उनमें से कई लोग तो उस समय तक पुरस्कृत भी नहीं हुए थे।

आज के समय की घटनाओ की तुलना कई वजहों से पहले की घटनाओं से नहीं की जा सकती। उदाहरण के लिए आपातकाल के मामले को देखें। आपातकाल भारतीय इतिहास का काला अध्याय था, यह मुख्य रुप से ऊपर से थोपी गई तानाशाही थी। वर्तमान समय में सबसे खतरनाक बात सत्ताधारी पार्टी से संबंधित संगठनों का सघन जाल या तंत्र है जिसके कार्यकर्ता या तो खुद ही समाज में नफरत फैलाते हैं या वे जहर भरे भाषण के जरिये सामाजिक वर्गों को उद्वेलित करते हैं। जिसका नतीजा हिंसा होती है। वर्तमान समय में सहिष्णुता के मूल्यों और और उदार विचारों के ऊपर दोहरा हमला हो रहा है। सत्ताधारी समूह में योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति जैसे नेता हैं जो सत्ता का मजा लेते हुए लगातार नफरत भरे भाषण दे रहे हैं और सामाजिक स्तर पर इस तरह के तोड़ने वाले बयान प्रचलित हो रहे हैं।     
 
इसका दूसरा स्तर, सांप्रदायिक विचारधारा के द्वारा सांस्थानिक नियंत्रण करना है। हमारे विज्ञान और तकनीक के अग्रणी क्षेत्रों को दिन रात बर्बाद किया जा रहा है। अंधविश्वास को बढावा देना इस नीति का एक उपफल है। वर्तमान राजनीतिक सत्ता में अंधविश्वास और धार्मिक उद्यमियों (बाबा और आधुनिक गुरु) का बड़ा प्रभाव है। आरएसएस द्वारा फैलाई जा रही हिंदू राष्ट्र की विचारधारा सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों पर हावी है। और अंतत: घर वापसी, लव जिहाद और गोमांस जैसे मुद्दों का इस्तेमाल कर विभिन्न जरियों से समाज की सोच में दूसरों से नफरत की विचारधारा फैलाई जा रही है। ये घटनाएं धार्मिक अल्पसंख्यकों में सामाजिक असुरक्षा की तीव्र भावना पैदा कर रही हैं। इसी की वजह से दादरी जैसी घटनाएं घट रही हैं। लोकतांत्रिक क्षेत्रों में हो रहे अतिक्रमण को जानबूझकर नजरअंदाज करते हुए इन घटनाओं को कानून व्यवस्था की समस्या साबित किया जा रहा है।

मूलतः सांप्रदायिक हिंसा के पागलपन की जड़ें उस पूर्वाग्रह में हैं जो धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत पैदा करती हैं। और यही जहर हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा या किसी भी धर्म या जाति के नाम की अन्य सांप्रदायिक राष्ट्रवाद से बहता है। वर्तमान समय में हिंदू राष्ट्रवाद क स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है जो एक प्रमुख ताकत है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि मुस्लिम सांप्रदायिकता के अंदर खुद अपना ही विभाजनकारी और अनुपूरक प्रभाव है। अन्य जरियों के माध्यम से इस तरह की विचारधारा दूसरों से नफरत की भावना पैदा करती है और गोहत्या और गोमांस खाना लोगों की हत्या करने का आधार बन जाता है। सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के कारकून संकल्प लेते हैं कि अपनी पवित्र मां, गौमाता की हिफाजत करते हुए हम मारेंगे और मारे जाएंगे।

इस तरह का यह सिर्फ एक मामला है। आज के माहौल का प्रमुख कारण दूसरों के लिए नफरत के गुणात्मक परिवर्तन में निहित है। अल्पसंख्यकों को एक खास छवि में पेश करने का चलन जो हिंदू राष्ट्रवाद के साथ शुरू हुआ था भीषण तरीके से बढ़ चुका है, जहां गुलजार जैसे लोगों को वो सब कहना पड़ा जो उन्होंने कहा है। इसलिए जब जेटली जैसे लोगों द्वारा इन लोगों के उठाए गए कदमों को कमतर आंका जा रहा है और राजनाथ सिंह जैसे लोग इसे कानून और व्यवस्था की समस्या के रूप में दोहरा रहे हैं तो लोकतंत्र की आवाज उठा रहे लोगों के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है और उदारवादी सोच और सहिष्णुता सिकुड़ती जा रही है। हमारे लोकतांत्रिक समाज पर मंडराते सांप्रदायिक प्रचार और लोकतांत्रिक विचारों की दमघोंटू राजनीति के बड़े खतरे की ओर समाज के बड़े वर्गों का ध्यान आकर्षित करने के लिए हमें और अधिक तरीकों के बारे में सोचना जारी रखना होगा। और ये कोई मामूली समय नहीं हैं, विभाजनकारी प्रक्रियाओं ने खतरनाक अनुपात ले लिया है और उन्हें भ्रामक विकास की कहानी से छिपाया नहीं जा सकता है। 

मैं यह सम्मान क्यों लौटा रही हूं: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/06/2015 03:09:00 AM


एक पुरस्कार लौटाते हुए अरुंधति रॉय यहां उन सब बातों को याद कर रही हैं जिन पर हमें नाज करना चाहिए और उन सब पर भी, जिनसे हमें शर्म आनी चाहिए और जिसके खिलाफ उठ खड़े होना चाहिए. अनुवाद: रेयाज उल हक.

हालांकि मैं इसमें यकीन नहीं करती कि सम्मान हमारे किए गए कामों का पैमाना हैं, लेकिन मैं लौटाए जा रहे सम्मानों की बढ़ती हुई तादाद में सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए मिले राष्ट्रीय सम्मान (नेशनल अवार्ड फॉर बेस्ट स्क्रीनप्ले) को शामिल करना चाहूंगी, जो मुझे 1989 में मिला था. मैं यह साफ भी करना चाहूंगी कि मैं इसे इसलिए नहीं लौटा रही हूं कि उस सबसे मैं ‘हिल’ गई हूं जिसे मौजूदा सरकार द्वारा फैलाई जा रही ‘बढ़ती हुई असहिष्णुता’ कहा जा रहा है. सबसे पहले, अपने जैसे इंसानों को पीट-पीट कर मारने, गोली मारने, जलाने और सामूहिक कत्लेआम के लिए ‘असहिष्णुता’ एक गलत शब्द है. दूसरे कि हमारे सामने जो आने वाला था, उसके काफी आसार हमारे पास पहले से थे – इसलिए भारी बहुमत से डाले गए उत्साही वोटों के साथ सत्ता में भेजी गई इस सरकार के आने के बाद से जो कुछ हुआ है, उससे मैं हिल जाने का दावा नहीं कर सकती. तीसरे, ये खौफनाक हत्याएं एक कहीं गहरी बीमारी के ऊपर से दिखने वाले आसार भर हैं. जो लोग जिंदा हैं, जिंदगी उनके लिए भी जहन्नुम है. पूरी की पूरी आबादी, दसियों लाख दलित, आदिवासी, मुसलमान और ईसाई खौफ की एक जिंदगी में जीने के लिए मजबूर कर दिए गए हैं और कुछ पता नहीं कि कब और कहां से उन पर हमला हो जाए.

आज हम एक ऐसे मुल्क में रह रहे हैं, जहां नए निजाम के ठग और कारकुन ‘गैरकानूनी हत्याओं’ की बात करते हैं, तो उनका मतलब एक काल्पनिक गाय से होता है जिसको मारा गया है – उनका मतलब एक सचमुच के इंसान की हत्या से नहीं होता. जब वे अपराध की जगह से ‘फोरेंसिक जांच के लिए सबूतों’ की बात करते हैं तो उसका मतलब फ्रिज में रखे गए खाने से होता है, न कि पीट पीट कर मार दिए गए इंसान की लाश से. हम कहते हैं कि हमने ‘तरक्की’ की है, लेकिन जब दलितों का कत्ल होता है और उनके बच्चों को जिंदा जलाया जाता है, तो आज कौन ऐसा लेखक है जो हमले, पीट-पीट कर मारे जाने, गोली या जेल से डरे बिना आजादी से यह कह सकता है कि ‘अछूतों के लिए हिंदू धर्म सचमुच में खौफ की एक भट्टी है’ जैसा बाबासाहेब आंबेडकर ने कभी कहा थाॽ कौन सा लेखक वह सब लिख सकता है, जिसे सआदत हसन मंटो ने ‘चचा साम के नाम’ में लिखा थाॽ यह बात मायने नहीं रखती कि जो कहा जा रहा है उससे हम सहमत हैं कि नहीं. अगर हमें आजादी से बोलने का हक नहीं है, तो हम एक ऐसा समाज बन जाएंगे, जो बौद्धिक कुपोषण का शिकार, बेवकूफों का राष्ट्र होगा. इस पूरे उपमहाद्वीप में नीचे गिरने की होड़ मची हुई है – और यह नया भारत बड़े जोशोखरोश के साथ इसमें शामिल हुआ है. यहां भी अब भीड़ को सेंसरिशप का जिम्मा दे दिया गया है.

मुझे इससे खुशी हो रही है कि मुझे (अपने अतीत में किसी वक्त का) एक राष्ट्रीय सम्मान मिल गया है, जिसे मैं लौटा सकती हूं, क्योंकि यह मुझे इस मुल्क के लेखकों, फिल्मकारों और अकादमिक दुनिया द्वारा शुरू की गई सियासी मुहिम का हिस्सा बनने की इजाजत देता है, जो एक तरह की विचारधारात्मक क्रूरता और सामूहिक समझदारी पर हमले के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं. अगर हम अभी उठ खड़े नहीं हुए तो यह हमें टुकड़े-टुकड़े कर देगा और बेहद गहराई में दफ्न कर देगा. मैं यकीन करती हूं कि कलाकार और बुद्धिजीवी जो अभी कर रहे हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ, और उसकी तारीख में कोई मिसाल नहीं मिलती. यह भी सियासत का एक दूसरा तरीका है. इसका हिस्सा बनते हुए मुझे बहुत फख्र हो रहा है. और इतनी शर्म आ रही है उस सब पर जो आज इस मुल्क में हो रहा है.

आखिर में: ताकि सनद रहे कि मैंने 2005 में साहित्य अकादेमी सम्मान को ठुकरा दिया था जब कांग्रेस सत्ता में थी. इसलिए कृपया मुझे कांग्रेस-बनाम-भाजपा की पुरानी घिसी-पिटी बहस से बख्श दीजिए. बात इससे काफी आगे निकल चुकी है. शुक्रिया.

फिर देश बोलेगा और आपको सुनना होगा!

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2015 07:46:00 PM


देश चला रहे शख्स के संवेदनशील मामलों पर चुप रहने और उनके सहयोगियों की गैरजिम्मेदाराना बयानबाज़ी पर मानव अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी का लेख.

आज देश के हर क्षेत्र के नामचीन लोग यह कह रहे है कि देश में सहिष्णुता का माहौल नहीं है, लोग डरने लगे हैं. अविश्वास और भय की स्थितियां बन गई हैं, फिर भी सत्ता प्रतिष्ठान के अधिपति इस बात को मानने को राजी नहीं दिखाई दे रहे हैं. साहित्यकारों द्वारा अवार्ड लौटाए जाने को उन्होंने साज़िश करार दिया है. उनका कहना है कि ये सभी साहित्यकार वर्तमान सत्ता के शाश्वत विरोधी रहे हैं तथा एक विचारधारा विशेष की तरफ इनका रुझान है, इसलिए इनकी नाराजगी और पुरस्कार वापसी कोई गंभीर मुद्दा नहीं है.

सत्ताधारी वर्ग और उससे लाभान्वित होने वाले हितसमूह के लोग हर असहमति की आवाज़ को नकारने में लगे हुए हैं. ऐसा लगता है कि नकार इस सत्ता का सर्वप्रिय लक्षण है. शुरुआती दौर में जब वर्तमान सत्ता के सहभागियों के अपराधी चरित्र पर सवाल उठे और एक मंत्री पर दुष्कर्म जैसे कृत्य का आरोप लगा तो सत्ताधारी दल ने पूरी निर्लज्जता से उसका बचाव किया और उन्हें मंत्रिपद पर बनाए रखा. इसके बाद मानव संसाधन जैसे मंत्रालय में अपेक्षाकृत कम पढ़ी लिखी मंत्री महोदया के आगमन पर बात उठी तो वह भी हवा में उड़ा दी गयी. ललित गेट का मामला उठा और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तथा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का इस्तीफ़ा माँगा गया तब भी वही स्थिति बनी रही. व्यापमं में मौत दर मौत होती रही मगर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान निर्भयता से शासन का संचालन करने के लिए स्वतंत्र बने रहे.

महंगाई ने आसमान छुआ. सत्ता के सहयोगी बेलगाम बोलते रहे, मगर फिर भी प्रधानमंत्री ने कुछ भी कहना उचित नहीं समझा दहाड़ने वाले मोदी लब हिलाने से भी परहेज़ करने लगे. गोमांस के मुद्दे पर जमकर राजनीति हुई, सिर्फ संदेह के आधार पर देश भर में तीन लोगों की जान ले ली गयी. एक पशु जिसे पवित्र मान लिया गया, उसके लिए तीन तीन लोग मार डाले गए. पर इसका सिंहासन पर कोई असर नहीं पड़ा. सत्ताधारी दल के अधिकृत प्रवक्ता इन हत्याओं की आश्चर्यजनक व्याख्याएं करते रहे, कई बार तो लगा कि वे हत्याओं को जायज ठहराने का प्रयास कर रहे है. भूख और गरीबी के मुद्दे गाय की भेंट चढ़ गए, फिर भी प्रधानमंत्री नहीं बोले. शायद मारे गए लोगों की हमदर्दी के लिए मुल्क के वजीरे आज़म के पास कोई शब्द तक नहीं बचे थे, इस सत्ता का कितना दरिद्र समय है यह?

तर्कवादी, प्रगतिशील, वैज्ञानिक सोच के पैरोकार और अंधविश्वासों के खिलाफ़ जंग लड़ रहे तीन योद्धा नरेंद्र दाभोलकर, कामरेड गोविन्द पानसरे एवं प्रोफेसर कलबुर्गी मारे गये. यह सिर्फ तीन लोगों का क़त्ल नहीं था, यह देश में तर्क, स्वतंत्र विचार और वैज्ञानिक सोच की हत्या थी, मगर प्रधानमंत्री फिर भी नहीं बोले.

देश भर में दलित उत्पीड़न की वारदातों में बढ़ोतरी हुई, दक्षिण में विल्लपुरम से लेकर राजस्थान के डांगावास तथा हरियाणा के सुनपेड़ तक दलितों का नरसंहार हुआ, दलित नंगे किए गए, महिलाओं को बेइज्जत किया गया, दलित नौजवान मारे गए, मोदी जी को उनके आंसू पूंछने की फुर्सत नहीं मिली. हर जनसंहार पर सत्ता के अहंकारियों ने या तो पर्दा डालने की कोशिश की या उससे अपने को अलग दिखाने की कवायद की. एक केन्द्रीय मंत्री ने तो मारे गए दलित मासूमों की तुलना कुत्तों से कर दी और हंगामा होने पर यहाँ तक कहने में भी कोई संकोच नहीं किया कि जब मैं मीडिया से बात कर रहा था, तब वहां से कुत्ता गुजरा, इसलिये मैंने उसका नाम ले लिया, अगर भैंस निकल आती तो भैंस का नाम ले लेता! यह गाय, भैंस सरकार है या देश की सरकार है?

महिलाओं की अस्मत पर खतरे कम नहीं हुए, बल्कि बढ़े हैं. डायन बता कर हत्या करने, अपहरण, बलात्कार के मामलों में कई प्रदेश भयंकर रूप से कुख्यात हुए. मासूमों से दुष्कर्म और उनकी निर्मम हत्याओं की देशव्यापी बाढ़ आई हुई है, जिनकी जिम्मेदारी है इन्हें रोकने की, वो सत्तासीन लोग उलजलूल बयानबाज़ी करके पीड़ितों के घाव कुरेदते रहे फिर भी हमारे महान देश के पंतप्रधान मौनी बाबा बने रहे. लोग यह कह सकते है कि उनका ज्यादातर समय बाहर के मुल्कों की यात्रा में बीता है, इसलिए वो पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाए. मगर जब घर में आग लगी हो तो कोई घूमने नहीं जाता सिवाय हमारे प्रधानमंत्री जी के.

मोदीजी आप किस तरह के प्रधानमंत्री हैं. क्या वाकई आपको कुछ भी पता नहीं है, या आपको सब कुछ पता है और आप ऐसा होने देना चाहते हैं. आपके देश में साहित्यकार धमकियों के चलते लिखना छोड़ देते हैं, तर्क करने वाले मार दिये जाते हैं. पड़ोसी मुल्क के कलाकार अपने फन की प्रस्तुति नहीं कर सकते हैं. कहीं खेल रोके दिये जाते हैं तो कहीं किसी के चेहरे पर स्याही छिड़की जाती है. प्रतिरोध के स्वरों को विरोधी दल की आवाज कह कर गरियाया जाता है. जाति और धर्म के नाम पर मार काट मची हुई है. वंचितों के अधिकार छीने जा रहे हैं. अल्पसंख्यकों को भयभीत किया जा रहा है. बुद्धिजीवियों को हेय दृष्टि से देखा जा रहा है, मगर आप है कि 'मेक इन इंडिया', 'डिजिटल इंडिया' और 'विकास' का ढोल पीट रहे हैं. जब पूरा मुल्क ही अशांत हो तो वह कैसे विकास करेगा? कैसा विकास और किनका विकास? किनके लिए विकास? सिर्फ नारे, भाषण और नए नए नाम वाली योजनाओं की शोशेबाजी, आखिर इस तरह कैसे यह देश आगे बढ़ेगा. यह देश एक भी रहेगा या बांट दिया जायेगा. कैसा मुल्क चाहते हैं आपके नागपुरी गुरुजन? शुभ दिनों के नाम पर कैसा अशुभ समय ले आए आप? और आपके ये बेलगाम भक्तगण जिस तरह की दादागिरी पर उतर आये हैं वे आपातकाल नामक सरकारी गुंडागर्दी से भी ज्यादा भयानक साबित हो रही है.

बढ़ती हुई असहिष्णुता और बिगड़ते सौहार्द पर देश के साहित्यकार, चित्रकार, फ़िल्मकार, उद्योगपति, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, रिजर्व बैंक के गवर्नर और यहाँ तक कि राष्ट्रपति तक बोल रहे हैं. आप कब बोलेंगे? कब आपकी ये अराजक वानर सेना नियंत्रित होगी? चुप्पी तोड़िए पीएम जी, केवल रेडियो पर मन की बात मत कीजिए, देश के मन की बात भी समझिए और उसके मन से अपने मन की बात को मिला कर बोलिए, ताकि देशवासियों का भरोसा लौट सके. देश के बुद्धिजीवी तबके की आवाज़ों को हवा में मत उड़ाइए. असहमति के स्वरों को कुचलिए मत और अपने अंध भक्तों को समझाइए कि सत्ता का विरोध देशद्रोह नहीं होता है, और ना ही प्रतिरोध करने वालों को पड़ोसी मुल्कों में भेजने की जरूरत होती है. एक देश कई प्रकार की आवाज़ों से मिलकर बनता है. हम सब मिलकर एक देश है, ना कि नाम में राष्ट्रीय लगाने भर से कोई राष्ट्र हो जाता है.

भारत अपनी तमाम बहुलताओं, विविधताओं और बहुरंगी पहचान की वजह से भारत है. इसलिए यह भारत है क्योंकि यहाँ हर जाति, धर्म, पंथ, विचार, वेश, भाषा और भाव के व्यक्ति मिलकर रह सकते हैं. तभी हम गंगा जमुनी तहज़ीब बनाते हैं. सिर्फ गाय का नारा लगाने और गंगा की सफाई की बातें करने और देश विदेश के सैर सपाटे से राष्ट्र नहीं बनता, ना ही आगे बढ़ता है. सबको साथ ले कर चलना है तो भरोसा जीतिएगा. डर पैदा करके सत्ताई दमन के सहारे दम्भी शासन किसी भी मुल्क को ना तो कभी आगे ले गया है और ना ही ले जा पाएगा.  उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर फैलाया जा रहा कट्टरपंथ हमें एक तालिबानी मुल्क तो बना सकता है मगर विकसित राष्ट्र नहीं. यह आप भी जानते है और आपके आका भी, फिर भी अगर आप चुप रहना चाहते हैं तो बेशक रहिये, फिर यह पूरा देश बोलेगा और आप सिर्फ सुनेंगे.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें