हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

तीन कत्ल और पीट-पीटकर एक शख्स की हत्या

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/27/2015 02:00:00 PM


आई.आई.टी. मुंबई में प्राध्यापक रहे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित राम पुनियानी का लेख. अनुवाद: अमरीश हरदेनिया.

प्रकृति के नियम, मानव समाज पर लागू नहीं किए जा सकते। परंतु कई बार इनका इस्तेमाल सामाजिक ज़लज़लों का कारण स्पष्ट करने या उनका औचित्य सिद्ध करने के लिए किया जाता है। ‘‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती है’’ (1984 के सिक्ख कत्लेआम के बाद) और ‘‘हर क्रिया की समान व विपरीत प्रतिक्रिया होती है’’ (2002 के गुजरात दंगों के दौरान), इसके दो प्रसिद्ध उदाहरण हैं। मैं पिछले करीब एक माह से इस बात से हैरान हूं कि जिन विद्वानों और लेखकों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटायें हैं उनसे यह पूछा जा रहा है कि उन्होंने यह तब क्यों नहीं किया था जब आपातकाल लगाया गया था या सिक्ख-विरोधी दंगे हुए थे या कश्मीर से पंडितों ने पलायन किया था या मुंबई ट्रेन धमाकों में सैंकड़ों मासूमों ने अपनी जानें गवाईं थीं। मुझे भौतिकी का ‘‘क्वालिटेटिव ट्रांसफार्मेशन’’ (गुणात्मक रूपांतर) का सिद्धांत याद आता है, जिसके अनुसार पानी को गर्म या ठण्डा करने पर तापमान में बिना कोई परिवर्तन के पानी या तो भाप बन जाता है या बर्फ।

जब डाक्टर दाभोलकर, कामरेड पंसारे और फिर प्रो. कलबुर्गी की हत्याएं हुईं तभी से खतरे के संकेत मिलने लगे थे। परंतु गौमांस के मुद्दे को लेकर मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि हमारा समाज एकदम बदल गया है। इसके बाद साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लौटाने का क्रम शुरू हुआ। राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कार लौटाए गए। यह समाज में बढ़ती असहिष्णुता के प्रति विरोध का प्रदर्शन था। इसी दौरान और इसके बाद, उतनी ही भयावह घटनाएं हुईं। एक ट्रक चालक को इस संदेह में मार डाला गया कि वह वध के लिए गायों को ढो रहा था। भाजपा विधायकों ने कश्मीर विधानसभा में एक विधायक की पिटाई लगाई और देश के कई हिस्सों में गौमांस खाने के मुद्दे को लेकर मुसलमानों पर हमले हुए। आज हमारे देश में हालात ऐसे हो गए हैं कि कोई भी व्यक्ति यदि मटन या कोई और मांस देखकर यह कह भर दे कि यह गौमांस है, तो हिंसा शुरू हो जाएगी। देश में ऐसा माहौल बन गया है कि अगर कोई गाय हमारे बगीचे में घुसकर पौधों को चरने भी लगे तो उसे भगाने में हमें डर लगेगा।

वातावरण में ज़हर घुलने से सामाजिक सोच में भी बदलाव आया है। अल्पसंख्यकों में असुरक्षा के भाव में तेज़ी से बढोत्तरी हुई है। हम सब जानते हैं कि एनडीए के शासन में आने के बाद से, ज़हर उगलने वाले अति-सक्रिय हो गए हैं। हर एक अकबरूद्दीन ओवैसी के पीछे दर्जनों साक्षी महाराज, साध्वियां और योगी हैं। इन भगवा वस्त्रधारी, हिंदू राष्ट्रवादियों की सेना को संघ परिवार में उच्च स्थान प्राप्त है। प्रधानमंत्री ने स्वयं हिंदू युवकों का आह्वान किया है कि वे महाराणा प्रताप के रास्ते पर चलते हुए गौमाता के सम्मान की रक्षा करें। पिछले लगभग एक वर्ष में हरामज़ादे जैसे शब्दों का सार्वजनिक मंचों से इस्तेमाल आम हो गया है। केवल संदेह के आधार पर पुणे के एक आईटी कर्मचारी को मौत के घाट उतार दिया गया, चर्चों पर हुए श्रृंखलाबद्ध हमलों को चोरियां बताया गया, लवजिहाद के भूत को जिंदा रखा गया और उत्तरप्रदेश के शीर्ष भाजपा नेता योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अगर एक हिंदू लड़की, किसी मुसलमान से शादी करती है तो उसके बदले हिंदुओं को सौ मुसलमान लड़कियों को पकड़ कर ले आना चाहिए। मुस्लिम युवकों के नवरात्रि पर होने वाले गरबा उत्सवों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। भाजपा के मुस्लिम चेहरे मुख्तार अब्बास नकवी ने फरमाया कि जो लोग गौमांस खाना चाहते हैं वे पाकिस्तान चले जाएं। महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमामंडन और जोरशोर से शुरू हो गया और उसके मंदिर बनाए जाने के प्रस्ताव सामने आने लगे। केरल के एक भाजपा सांसद ने कहा कि गोडसे ने काम तो ठीक किया था परंतु उसने गलत व्यक्ति को अपना निशाना बनाया। पिछले एक वर्ष में साम्प्रदायिक हिंसा में भी तेजी से वृद्धि हुई।

पुरस्कार लौटाने का सिलसिला शुरू होने के बाद, भाजपा के नेतृत्व ने उन कारणों पर ध्यान देने की बजाए, जिनके चलते पुरस्कार लौटाए जा रहे थे, संबंधित लेखकों व विद्वानों को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश शुरू कर दी। इन लेखकों का मज़ाक बनाने के लिए ‘‘बुद्धि शुद्धि पूजा’’ के आयोजन हुए और भाजपा के प्रवक्ता टीवी कार्यक्रमों में उन्हें अपमानित करने और उनका मज़ाक उड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रख रहे हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री, जो कि एक पुराने आरएसएस प्रचारक हैं, ने कहा कि मुसलमान भारत में रह सकते हैं परंतु उन्हें गौमांस खाना बंद करना होगा। ऐसा बताया जाता है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इन नेताओं को बुलाकर डांट पिलाई। परंतु यह सब नाटक प्रतीत होता है क्योंकि इन नेताओं ने यह दावा किया कि वे अपने अध्यक्ष से किसी और काम के संबंध में मिलने आए थे और इनमें से किसी ने भी न तो अपने कथनों पर खेद व्यक्त किया और ना ही माफी मांगी।

इस घटनाक्रम से व्यथित राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने तीन मौकों पर राष्ट्र का आह्वान किया कि बहुवाद, सहिष्णुता और हमारे देश की सभ्यता के मूल्यों की रक्षा की जानी चाहिए। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने सरकार को याद दिलाया कि नागरिकों के ‘‘जीवन के अधिकार’’ की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। बदलते हुए सामाजिक वातावरण पर देश के दो प्रतिष्ठित नागरिकों की टिप्पणियां काबिले-गौर हैं। जूलियो रिबेरो ने अपने दर्द को बयां करते हुए कहा कि ‘‘मैं ईसाई हूं और मैं अचानक मेरे अपने देश में अपने आपको अजनबी पा रहा हूं’’। जानेमाने कलाकार नसीरूद्दीन शाह ने कहा कि ‘‘मैं अब तक अपनी मुसलमान बतौर पहचान से वाकिफ ही नहीं था’’।

ये सामान्य दौर नहीं है। बहुवाद और सहिष्णुता के मूल्यों को हाशिए पर धकेला जा रहा है। इस सरकार के राज में आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों ने अपने पंख फैला दिए हैं और वे कुछ भी करने पर उतारू हैं। अब साम्प्रदायिकता का मतलब केवल दंगों में कुछ लोगों की हत्या नहीं रह गया है। उसका बहुत विस्तार हो गया है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के बारे में मिथक प्रचारित किए जा रहे हैं। ऐतिहासिक घटनाओं और वर्तमान समाज के चुनिंदा पहलुओं की मानव-विरोधी व्याख्याएं की जा रही हैं। इनका इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैलाने के लिए किया जा रहा है और दंगे भड़काए जा रहे हैं। हिंसा बड़े पैमाने पर हो सकती है, जैसी कि गुजरात, मुंबई, भागलपुर या मुजफ्फरनगर में हुई या फिर जैसा कि दादरी में हुआ-किसी एक व्यक्ति को चुनकर उसकी जान ली सकती है। इससे समाज बंटता है और धीरे-धीरे ध्रुवीकृत होता जाता है। यही ध्रुवीकरण उस पार्टी की सत्ता पाने में मदद करता है जो धर्म के नाम पर राष्ट्र का निर्माण करना चाहती है। येल विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में कहा गया है कि साम्प्रदायिक हिंसा से भाजपा को चुनावों में फायदा होता है।

भारत में सांप्रदायिकता के बीज करीब डेढ़ शताब्दी पूर्व बोए गए थे। अंग्रेज़ों ने अपनी फूट डालो और राज करो की नीति को लागू करने के लिए इतिहास के साम्प्रदायिक लेखन का इस्तेमाल किया। इतिहास की इसी व्याख्या को साम्प्रदायिक संगठनों ने अपना लिया और उसे हिंदू-विरोधी या मुस्लिम-विरोधी जामा पहना दिया। हिंसा की हर घटना के बाद इन संगठनों की ताकत में इजाफा होता है। साम्प्रदायिकता अपने चरम पर है। मंदिर तोड़ने से लेकर लवजिहाद और उससे लेकर गौमांस का इस्तेमाल घृणा को और गहरा करने के लिए किया जा रहा है। जो लोग यह सब कर रहे हैं, वे जानते हैं कि वे सुरक्षित हैं क्योंकि वे ठीक वही कर रहे हैं जो वर्तमान सरकार चाहती है-फिर चाहे सरकार के नुमांइदे सार्वजनिक तौर पर कुछ भी कहें।

एक ओर हिंदू राष्ट्रवाद सरकार का पथप्रदर्शक बना हुआ है तो दूसरी ओर इसी विचारधारा में विश्वास रखने वाले ‘‘कट्टरपंथी’’ तत्व हैं। इन दोनों का विस्तृत जाल है और उनकी पहुंच हर जगह तक है। सत्ताधारी पार्टी को लाभ यह है कि उसे अपने हाथ गंदे नहीं करने पड़ रहे हैं और विभिन्न संगठन व व्यक्ति उसके एजेण्डे को स्थानीय स्तर पर लागू कर रहे हैं। इन ‘‘कट्टरपंथी’’ तत्वों के देश की राजनीति के रंगमंच के केंद्र में आ जाने से स्थिति में ‘‘गुणात्मक’’ परिवर्तन आया है। पुरस्कारों को लौटाने का सिलसिला, समाज के अति-साम्प्रदायिकीकरण का नतीजा है। असहिष्णुता तेजी से बढ़ रही है, बहुवाद पर हमला हो रहा है और अल्पसंख्यक भयभीत हैं। सवाल यह है कि हम इस दौर में भारतीय संविधान के मूल्यों की रक्षा कैसे करेंगे?

दास्ताने सुंबरान: आनंद विंगकर की कविता

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/25/2015 01:04:00 PM

भारतीय समाज बड़ा ही मजेदार है। इस आधुनिक विज्ञान के दौर में जहां चांद-तारे और सूरज, आदि के लोक गीत और भक्ति-भाव को जीवन के साथ लेकर चलने वाला आदिम समाज आज भी मौजूद है। लिहाजा आधुनिक विज्ञान में इस जटिल संबद्धों का विश्लेषण और विकसित कर पाना दूभर कार्य जैसा है। महाराष्ट्र की धनगर जाति सदियों से चली आ रही इस परंपरा का निर्वाह आज भी कर रही है। धनगर जाति को हिन्दी पट्टी में गड़ेरिया कहा जाता है, जो भेड़-बकरियों को जंगल में चराने का काम करती है। रात भर यह समाज गीत, नृत्य आदि की प्रस्तुति करता है ताकि उनका देव उनके प्रकृति की रक्षा कर सकें। उनके लिए प्रकृति ही देव है और देव ही मनुष्य है। यह उनकी परंपरा का अटूट हिस्सा है।

मराठी के कवि आनंद विंगकर ने इस लंबी कविता में आदिवासियों की आदिम संस्कृति का, प्रकृति के साथ उनका सवांद और नागरी संस्कृति की तसवीर को दर्ज किया है। आधुनिक जीवन से हम जैसे-जैसे भूतकाल की ओर जाते हैं प्रकृति के साथ हमारा संवाद बन नहीं पता और अधिक गूढ़ होता जाता है। प्रकृति के साथ संवाद की स्थिति तो दूर की कौड़ी जैसे है। वहीं हर आए दिन प्रकृति नष्ट हो रही है। जो भुक्तभोगी हैं वे जानते हैं इसके परिणाम। उनकी हताशा कितनी कड़वी और असमय होती मृत्यु को उजागर करती है यह कविता।

इस कविता में कवि ने जो तस्वीर उकेरी है वह एक इशारा है आधुनिकता के ढोंग का। यह कविता तो स्थितियों को बदल नहीं सकती है। लेकिन जो प्रकृति को बचाने के लिए लड़ रहे हैं, वे लोग भूमिका के करीब नजर आते हैं।

मराठी साहित्य में आनंद विंगकर का कथा, उपन्यास और कविता के क्षेत्र में एक बड़ा नाम है। वे पश्चिम महाराष्ट्र के कराड़ जिले के छोटे से गांव विंग के है। विचारों से वे मार्क्सवादी हैं और सामाजिक, राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं।
गोपाल नायडू

कविता के प्रस्तोता और अनुवादक गोपाल नायडू जाने-माने कलाकार और शिल्पी हैं।



एक घुमंतु
सायालसिंगे इलाके का ‘गणपा जानकार’  

दो बीघा जमीन’ के बलराज साहनी की तरह
आ बैठा वीटा खानपुर के बस स्टैंड के चबूतरे पर
वह अखबार को उलट-पलटकर देख रहा था एक तस्वीर 
‘तीन बच्चे जनने वाली भेड़ की’
वह खोज रहा था अखबार के कारखाने को।

-‘नहीं जानते क्या पढ़ना आप!
इसे प्रेस कहते हैं।’
:‘वाड़े में रहते समय
आई - बा
रात में झपकी ले रहे थे
उसी समय जन्म हुआ मेरा
तभी आंखों में समा गए घनघोर बादल
कोई समझ नहीं पाता है मेरे आंखों की गहराई
काली परछाई को भी नहीं

मनुष्य के मन को भी ताड़ लेता हूँ।
पूछ रहे थे आप पढ़ाई - लिखाई के बारे में
छोटी उम्र से ही साल के चार-छह महीने हाँकता रहता हूँ भेड़ों को
इसीलिए पढ़ नहीं पाया
मेरी पाठशाला मैंने खुद ही बनाई है।
साथी की तरह एकाध पुस्तक ले हाथ
जंगल को ताकता रहता हूँ काम की तलाश में
बैठ जाता हूँ खाली-पीली समय में
खूंटे पर बंधे जानवर की तरह।
इसलिए पढ़ नहीं पाया एक गुंठा जमीन भर भी
मैं लोटा परेड करते समय तुड़े-मुड़े कागज के अक्षरों को
उत्सुकता से घाई-घाई में पढ़ता था
और बगैर पढ़े चार शब्द सो भी नहीं पाता था।’

मूंगफली के बेतरतीब गिरे दानों की तरह
देर से खिले कपास के बोंड चुनता रहता हूँ
और गिर पड़ता हूँ जमीन पर,
दिखाई देता है काँटों के बीच
असंख्य पखुड़ियों वाला कैक्टस का दुर्लभ फूल
और पके बालों वाली बुढिया के मुंह से निकले
एक-एक शब्द लाख मोल का
इन सभी से मिलता है मुझे ज्ञान।’

‘खाने के इंतज़ार में’
तड़पते हुए रात में
अकेले ही लेट गया वाड़े पर
आकाश में चमकता है केवल हमारे लिए
दूर-दराज एकाध तारा
झट से दिमाग में जागती है रोशनी
हम केवल अकेले नहीं है इस दुनिया में
मेरी ही है यह धरती,
और... और... सब कुछ,
और क्षण भर में होता है आभास अपने ही विशाल हृदय का
इसे क्या कहते है आपकी भाषा में
‘ज्ञान’ या ‘दृष्टिकोण’?
इस तरह है मेरा सृष्टि के जीव
और मनुष्य के बारे में आस्था का अध्ययन।

वह आदमी स्वार्थी है
जो तिरस्कार करता है अपने भाई के बच्चों का।’

वहीं मैं और मेरे सहयोगी
गजब के आत्मकेंद्रित हैं।
शिक्षा से
कितना विस्तारित हुआ है हमारा ज्ञान
कितना विस्तृत हुआ है हमारे इर्द-गिर्द का क्षितिज?
और सामने है यह देहाती अनजान औलिया
‘यह संसार ही मेरा घर’
की कहानी सुनाता है।

बदली होते समय
कहा एक बैंकवाले दोस्त ने,
गांव जा रहे हो, जरा संभलकर!
घातक होते है लोग, मीठा-मीठा बोलते है।
और पकड़ में आ जाओ तो वहीं ठिकाने लगा देते है।
‘कहने का मतलब है दूरी बनाकर रखो
और किसी को भी मत बताओ अपनी कमजोरियों को’

: इस इलाके में नौकरी करते हो
क्या कहीं खाने और रहने का बंदोबस्त हुआ ? 
इसलिए आना-जाना करते हो
और ऊपर से यह इलाका पिछड़ा है
समय पर बस नहीं मिलती, गर्मी में पानी की किल्लत।

:‘मनुष्य यहाँ कैसे रहता है?’
मेरी तीखी प्रतिक्रिया पर वह थोड़ा सहम गया। 

-‘आप जो कह रहे हो उसमें कोई गलती नहीं है  
पिछड़ा हुआ है यह इलाका । 
लेकिन यह तुम्हारे जहन में कैसे नहीं आया
जमीन के बंटवारे पर ही हमारी जातियों का हुआ है विभाजन
पहाड़ी इलाकों में गवली, धनगर, कुपोषित कातकारी आदिवासी,  
मेरे जैसे उपेक्षित ओ.बी.सी, बी.सी., एन.टी.
नदी के किनारे बसे श्रेष्ठ जाति के संभ्रांत शहर
इस श्रेणी के आधार पर हुई हैं बसावट।’

उत्तर देने का कोई मौका नहीं दिया उसने  
किसी ने मुझे पहली बार दुविधा में डाला 
अचानक वह सहज हो गया
कल-कल बहते झरने की तरह बोलता रहा
‘नौकरी कौन से गाँव में करते हो?’
...मैं
: ‘यानी महाराज आपके ही गाँव में
- ‘वैसे गाँव में हम रहते नहीं हैं।

गाँव के बाहर सूर्यास्त की दिशा में
जांभूलवाड़ा बस्ती में हमारे लिए भरपूर जगह है
घर में
बांस की एक बड़ी टोकनी
बरांडे में झूला 
दिली इच्छा से कहीं भी पैर पसार लीजिये
नींद में आभास होता है कोई झुला रहा है
मैं सो जाता हूँ झूले पर
अचानक जागने पर हिलता रहता है अन्धेरा
और जमीन से
मेरा ऐसा गहरा रिश्ता-नाता है।

छायादार नीम के झाड़ की ठंडक इस तरह
कि ‘मायनी तालाब’ के बगुले रात इस बस्ती में आते हैं। 

गर्मी के दिनों में बिंदास नींद लगती है आँगन में
नीचे जमीन ऊपर आकाश
अगर मन में आया तो खेल समझकर गिनते रहो तारे आसमान के 
किसी बात की कोई परवाह नहीं
सिर्फ पानी का उपयोग करो देख-देख कर
क्या स्वाद है गोश्त का,
ऐसा ही मोठ का नाश्ता, बाजरे की रोटी
हर पन्द्रह दिन में किराना और भेड़-बकरियों का चारा
सभी दिन ऐसे नहीं होते और ना ही रातें
एकाध बार तो लोटा भर पानी से ही गुजारनी पड़ती है रात
अक्खे गाँव में सौ-पांच सौ रुपए की कमी नहीं होती
‘वैसे मूल से हम घुमन्तू हैं।
हमारे व्यवहार में पैसा पानी बचाने की आदत नहीं है। 
अगर यह सब ठीक लग रहा है तो ‘हाँ’ कहो
जो कुछ होगा तो ले आओ तुम्हारा बोरा-बिस्तर
तब तक मैं घर साफ-सुथरा कर लेता हूँ’

: ‘बता देना ही ठीक है कि हम बौद्ध है
किसी को पटता हो या न
शुरू में ही कह देना अच्छा है।

चाल चलन से लगता है आप पढ़े-लिखे हो
हमने पूछा तो नहीं कि आप कौन, और कहाँ के हो? 
आपके संस्कार क्या हैं
राहगीर को पानी पिलाने से
पहले ही आप जैसे लोग पूछ लेते हो जाति 
इससे तो पानी अटक जाता है गले में 
हमारे रहन-सहन से पहचाना होगा 
और टूटी-फूटी बोली 
बगैर मात्रा – अल्प-विराम, पूर्णविराम के  
बोलने वाले ‘धनगर’ हैं।’
यह कहकर वह हंस दिया 
बस मिलने तक हमने स्टैंड पर वह रात बिताई
इस तरह शुरू हुआ मेरा और उसका संवाद
इस डेढ़-दो साल में खूब सीखा उससे
बेखौफ प्रकृति में जीते हुए धाराशायी हो गए हैं मेरे मध्यमवर्गीय मूल्य
मुख्यत:, छुपानी नहीं पड़ी मुझे मेरी जात
इनके बीच उठते बैठते
नहीं बढ़ी दूरियां
नहीं आया बीच में परमात्मा,
बगैर अपमान के पानी की तरह 
पारदर्शी रही मेरी भी आत्मा

एकाध आदमी दिन रात मेहनत करके 
कितना करता होगा काम
क्या इसकी कोई है मर्यादा
अनिद्रा से मैं परेशान हूँ
साढ़े बारह एक बजे जैसे तैसे लगती है आँख
और खुल जाती है नींद सुबह पांच बजे
और ग्यारह के बाद भी शुरू रहता है दिन उसी तरह। 
कितने प्रकार के काम होते हैं? 
ऐसे अनेक प्रकार हैं जिन्हें गढ़ा नहीं जा सकता भाषा में
जेब में हाथ डालकर ये सब अनुभव किया है मैंने ।

वह कोल्हू के बैल की तरह जुटा रहता है
इसीके बीच प्रश्न पूछकर किया उसे बेजार
सिर्फ मकसद इतना ही कि 
उसके दुःख दर्द के अनुभव सुनने को मिले मुझे।

उसे याद हैं मुंह-जुबानी तारों की स्थितियां
रात को खेत की रखवाली करते करते
आँखों ही आँखों में सुबह तक
कैसे करवट लेता है आकाश                
कभी टिमटिमाता है जुगनू
दिशा बदलती हवा के प्रवाह से
ठीक ठीक अनुमान लगता है समय का
यह वही समय होता है जब आम के झाड़ों को आती है मौर 
मोगरे के फूल की तरह जब खिल जाता है करवंद 
ठीक उसी समय बारिश का मौसम आ जाता है करीब
वह बोलता है-
‘एक भाषा होती है प्रकृति की भी अपनी
उसे समझ सकता है केवल अनुभवी ही
आधी रात
बंदरों की चिल्लाहट, मोरों का नाच, झाड़ पर कौवों की कांव-कांव
अचानक सभी कुत्तों का एक साथ रोना
इन सबकी वजह होती है एक। 
हम चिढ़ जाते, और उठाते हैं पत्थर
जैसे पूरे परिसर का मालिकाना हक
दे दिया हो तुम्हें किसीने?

मैं–
गीली लकड़ी ही नहीं,
अलावा इसके,
मात्र स्पर्श से,
मिट्टी के गर्भ में पानी की कल–कल आवाजें सुन लेता हूँ।  
केवल गंध के सहारे ही सांप को खोज निकालना आता है  
इसीलिए नहीं दिखाता हूँ -
शिकारियों को निरपराध प्राणियों के बिल
और एक लंबे से पृथ्वी में जमा हुआ पानी या पेट्रोल
क्यों करें हम इस तरह इसकी बरबादी?
वैसे बाप दादाओं ने हमें यह धरती विरासत में दी है  
सुपुर्द करने आने वाली पीढ़ी को
इसलिये झाड़ की ऊंचाई को कायम रखता हूँ
सूखे पत्तों पर पैर रखते हुए विचार करता हूँ कि
किसने देखा है ‘म्हसोबा-सतिआसरा’[2] को ?
चारों ओर पसरी हुई है जीवन की गंध.
यहाँ-वहाँ, सारे जंगल में,
सबको जीने का अधिकार है। 

मैं भेड़ के पीछे-पीछे बिना रुके चलने वाला   
खूब भटका हूँ उसके साथ
बगैर पानी के बंजर प्रदेश में,
बगैर नहाये-धोए पसीने के जलन की तरह ही है हर दिन
हवा के विपरीत जलाता हूँ चूल्हा
और अध-पकी भाकरी बना ली रात के लिए
रात ज्वार के खेत की सिचाई करते समय
उसने मुझे दिखाया आधी रात में
चांदनी रात में यात्रा पर निकले हुए प्रवासी पक्षी 
करीब से अनुभव हुआ उस धुंधले प्रकाश में
आकार में ढलती लयबद्ध आकृतियों की तस्वीर।  

उसने खुद से कहा,
‘प्रवासी पंछियों के बाद ही मैंने ही खोज निकाली
इस धरतरी को  
एकाध भेड़पालक उम्र भर भेड़ों के पीछे चलते-चलते,
कितनी लंबाई-चौड़ाई नाप लेता होगा जंगलों की
इसका है कोई अंदाज?
पहाड़ियों पर जहाँ-जहाँ से गुजरा वहीं बन गए रास्ते और घाट। 
इंसानों के बीच मैंने ही सबसे पहले 
बकरी, भेड़, घोड़े और कुत्तों को लाया।’
और बता दिया भेड़, बकरी और बंदरों ने
ऐसे कई झाड़ है जिसकी पत्ती
मनुष्य के खाने के लायक नहीं है।  


        झाड़ी–झूड़ी  से जड़ी-बूटी खोजने में मेरी बेतहाशा मेहनत है
        ये ही तो है आयुर्वेद की पहली पाठशाला  
        और मैंने आराम से खोज निकाला है उसके प्रमाण और मात्रा को।
 

आर्थिक और सामाजिक वजह से
मेरा अधिकाँश समाज अज्ञानी और दरिद्र है।
पहले ही योग्य उम्मीदवार नहीं मिलने की वजह से
मेरे बनी बनाई उम्मीद टूटती जाती है
फिर भी आरक्षण को लेकर उन लोगों का हो-हल्ला होता रहता है
ये सब मुझे समझ में नहीं आता ।
चाहे फिर वर्ण से कोई श्रेष्ठ या छोटा हो
मेरे जैसे अन्य गरीबों का मैं क्यों तिरस्कार करूँ ?
फिर भी मेरी मांग है कि सभी को काम मिलना चाहिए।
ये सब बयाँ करते वक्त उसके चेहरे पर कोई आक्रोश और संताप नहीं था। 
अंत में खुद के हाथ को निहारते हुए मन ही मन बुदबुदाने लगा,
‘हमारे हक़ का क्या बचता है
केवल दुःख मेहनत पर ही है पूरा विश्वास !’

और एकदम मुझे ध्यान हो आता है
सही में क्या इस विषय पर मुझे बोलना नहीं चाहिए ?
बाजार, गोदाम और लोहा उठाने वाले हमाल,
कचरे की गाड़ी पर रास्ते और मैला साफ करनेवाले मेहतर,
बैलों की तरह कंधे पर बोरा लादकर,
भीड़ में हाथ गाड़ी खींचने वाले हमाल,
अपने कंधेपर हुक फंसाकर
पृथ्वी को ही पीठ पर लादने के लिए तत्पर है हमाल!
बस में प्रवास करते समय खिड़की से इन सभी को
‘मनुष्य’ समझकर क्या हमने सहज बर्ताव किया है?
क्या यह अपना मुल्क नहीं है?
कबूल है, यह कविता बढ़ रही है अनावश्यक। 

भेड़ों के पीछे घूमने वाला भेड़पालक 
उनके साथ बहुत घूमा हूँ मैं,
बंजर प्रदेश में पानी की तलाश में,
देखा हूँ पूर्व की दिशा में अकाल से ग्रसित गाँव। 

वह लगातार बहती हवा की तरह बड़-बड़ करता रहता है
-‘इस पहाड़ को कुल्हाड़ से काटो मत
रोका जाए प्लास्टिक की थैली को
गाय-बछड़ों के पेट में जाने से,
इस से तैयार होगी 
फसल न देने वाली जमीन के बंजर प्रदेश
जहां बारिश में रहता है आकाश उजड़ा-उजड़ा।  
लुभाने वाले बादल बिन बरसे निकल जाते है
प्रकृति की मार से हवालदिल है मनुष्य
और रात में बीमारी के लक्षण लिए ठहरने आती है हवा.’

वहाँ एक निर्जन पगडंडी पर
झाड़ियों में लटके है दुर्लक्षित प्रेत
उसने कहा,
‘लोगों में संशय हैं,
यह आत्महत्या नहीं है,
यह मनुष्यों के विनाश की योजनाबद्ध सामूहिक सत्र है.
इसलिए ऐसी हरकत कोई क्यों करेगा।
कहते हैं चौरासी लाख योनि के बाद
‘मनुष्य’ के रूप में प्राप्त हुआ दुर्लभ सुन्दर जीवन?’
देखा है,
पानी के लिए भटकने वाले मनुष्य की दबी हुई रुदन?
पानी की खोज में पैर आग की तरह जलने लगे हैं। 
मनुष्य की आँखें धंस गई हैं गहरे सूखे कुएं के खोल की तरह,
जान बचाने के लिए छाँव की तलाश में,
धूप से परेशान कुत्ते की तरह भटका हूँ?

सूखी नदी से रेत में निकलते लावे की उष्मा, 
मृगतृष्णा की तप्त माया,
झाड़ों से छिटक गया है हरा रंग,
पक्षी वहाँ से पलायन कर गए पानी के इंतज़ार में,
बची रह गई कंधों पर आम के झाड़ की सूखी लकड़ी। 

-‘मूक प्राणी जो झुलस रहे हैं वह सृष्टि ही जानती है
तुम्हें इससे क्या, किसे क्या और कैसे बताएं?’
सहन नहीं होती यह गर्मी।
और अंत में खीझकर मैंने कहा,
कीट-पतंगों को नहीं मिलता जहां आसरा
लोगों से दूर, निर्जन वन में भी,
कहाँ छुप गया है तेरा ईश्वर?
क्या पीछे छूट गया पैदल तीर्थ यात्रियों की तरह गुन-गुनाते हुए।  

-‘बेर के इस जंगल में, अरे हिवर (जंगली फल) के इस जंगल में
जीव जन्तु पक्षियों के जंगल’ 
यही ईश्वर है मेरा,
और शाम ढलते हम वहाँ पहुंचे,
बेर, हिवर और पीपरनी के पेड़ों के बीच 
ध्वस्त हो गए उन गाँव में।

: ये कैसे सिन्दूर लगे उबड़-खाबड़ पत्थर है
इसे कहो मत पत्थर
हमें इसी तरह रखना हैं हमारे पूर्वजों को !
जिन्होंने गए-गुजरे दिनों में राह दिखाई है,
जिन्होंने इशारा किया भविष्य के बारे में
और बचाया है बुरी आत्माओं से। 
ये लोग हैं धरती माँ के उपासक।
यहाँ के हरेक पत्थर को रखा है हमने संभालकर,
उनके स्मरणों को जीवित रखा है।
यही है हमारा ‘सुंबरान’ !
गुजरे ज़माने के
जीव-जंतुओं के सुख दुःख और संघर्ष के स्मृतियों की,
आज मुझसे प्रस्तुत करने को कहा जाएगा
अपने समय की ‘भाकनूक’[3]

: भाकनूक क्या होती है ये भाकनूक?
वह केवल मुस्कराया समझदारी से मेरे हाथ को दबाते हुए.

पहले से ही वहाँ लोग बाग़ जमा हो गए थे,
उनके पहनावे में कई रंग की झलक उभर रही थी।
बाल खोलकर घूम रही थी स्त्रियाँ
उन पत्थर के मन्दिर के सामने बज रहे थे ढोल
जैसे हरेक का शरीर झूमने-घूमने लगा हवा की तरह
और उतर आयी थी आसमान से 
परेशानियां से भरे ‘घाया-गजी’[4] के नृत्य
किसके लिए बचाए रखी है ये हाव-भाव,
उन्होंनें अन्तर्मन की लीनता के लिए?
खुले आसमान के नीचे शुरू हो गया है भंडारा,
ढोल की ताल पर 
अचानक उनके हाथ हवा में लहराने और हवा में झूमने लगे हैं। 
लोग इसी की राह देख रहे थे।  
वह बयां करने वाला था उसके समय का ‘भाकनूक’।

उसने अपने शरीर को दी खूब तकलीफ।  
दातों से कच-कचा कर निम्बुओं को तोड़ा,
जलते हुए कपूर को निगल लिया उसने,
पूरी ताकत से अंतर्मन से निशब्द ध्वनि निकाली, 
लोगों ने ईश्वर से कहा मत करिए झाड़ों का बेहाल
कह डालो जो होगा विधी का विधान ।
 
अक्षरशः चिल्लाते, आग-बबूला होते हुए,
हिचकियों के साथ
आँखें मूंद कर आकाश की ओर निहारते हुए
कहा उसने,
- ‘अब नहीं सह पा रहा हूँ यह पीड़ा
कौन अपने निहित हितों के लिए
धरती के विनाश की राह ताकता है?

(साल 1997 में पर्यावरण को लेकर 178 राष्ट्रों के प्रतिनिधियों द्वारा तैयार किए गए क्वेटा प्रोटोकॉल में लिए गए निर्णय के कुछ अंश काव्य रूप में जो इस कविता का ही हिस्सा हैं)

कौन निगल रहा है जमीन,
और आसमां को कर रहा है काबू में?    
कौन कर रहा है समंदर के पानी को प्रदूषित विस्फोटक तत्वों से?
कौन बेच रहा है पहाड़ियों को,
और नदीं नालों को कर रहा है नीलाम?
जहाँ धकेल दिया गया है मनुष्य हाशिए पर,
कहाँ चरायेंगे हमारे जानवर?
कौन फोड़ रहा है हमारी आत्मा पर एटम बम?
कोई है,
है कोई तो रोको इसे
बेवजह बढ़ा रहे हैं उबाऊ तापमान,
तो डूबेंगे सबसे पहले समुद्र किनारे बसे शहर,
जैसे यादव की डूब गई थी समुद्र में द्वारका,
मेरे भोले-भाले शंकर के हिमालय को लगेगी आग,
बर्फों के शिखर भभक उठेगी
और नदियाँ हो जाएगी बाढ़-ग्रस्त
और अच्छे-खासे शहर तहस नहस हो जाएँगे
बढ़ेगा सभी जगह का तापमान,
सूख जाएगी नदियाँ, तालाब और बांध,
धरती के पेट में समा जाएगा
बचे-खुचे पानी का अंतिम तालाब
फिर कहा भटकेंगे मेरे पंछी?
कैसे जिन्दा रहेंगे पेड़ और जानवर?
तब मनुष्य ही मनुष्य की पहचान नहीं कर पाएगा
बाप अपनी बिटिया की,
भाई, बहन की,
पति, पत्नी की,
बेचेगा बाजार में।
सबसे पहले बच्चों को निपटाएगा
और बाद में अपनी थाली में जहर मिलाएगा।
इसलिए
धरती पर मालिकाना हक जतानेवाले
रोको,
रोको उन दुश्मनों को
नहीं तो अटल है, अटल है विनाश’

अंततः वह चूर चूर होकर
गिर पड़ा जमीन पर
जैसे अनजानी हवा ने अलग-थलग कर दिया पेड़ों को
और ‘येरले’ नदी के तट पर बारिश के दिनों में
बगैर पानी के,
रेत में से फूटने लगे है झरने,

सभी के मुँह से अचानक शब्द निकले,
‘बयां किया दास्ताने सुंबरान’
बयां किया सुंबरान
सुंबरान... 


नोट्स

1.सुंबरान महाराष्ट्र के धनगर समाज में रात भर चलने वाले कार्यक्रम को कहा जाता है जिसे हिन्दी पट्टी में ‘जगराता’ कहते हैं.
2. धनगरों का आदि देव।
3. धनगर समाज की भाकनूक सदियों से बोली भाषा है। हिन्दी में इसका अर्थ ‘व्यथा-कथा’ और ‘वीर गाथा’
4. ‘घाया-गजी’ – इन लोगों का आदिम देव।

मेरे लेखको! किसका इंतज़ार है और कब तक?

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/24/2015 04:25:00 PM


दलितों-मुसलमानों और लेखकों पर फासीवादी हमलों और हत्याओं के विरोध में लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाए जाने और अपना सख्त विरोध दर्ज कराने के संदर्भ में कैच के सीनियर असिस्टेंट एडीटर, कवि, गायक और चित्रकार पाणिनि आनंद का लेख. अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्‍तव
 

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत के लेखकों और कवियों ने साहित्‍य अकादमी से मिले पुरस्‍कार (और एक मामले में पद्मश्री) लौटा कर इतिहास बनाया है।

यह इसलिए और ज्‍यादा अहम है क्‍योंकि पुरस्‍कार लौटाने वाले लेखक किसी एक पंथ या विचारधारा के वाहक नहीं हैं, वे किसी एक भाषा में नहीं लिखते और किसी जाति अथवा धर्म विशेष से नहीं आते। इनका खानपान भी एक जैसा नहीं है। कोई सांभरप्रेमी है, कोई गोबरपट्टी का वासी है तो कोई द्रविड़ है।

ये सभी अलग-अलग पृष्‍ठभूमि से आते हैं। इनकी संवेदनाएं भिन्‍न हैं और इनकी आर्थिक पृष्‍ठभूमि भी भिन्‍न है। बावजूद इसके, ये सभी एक सूत्र से परस्‍पर बंधे हुए हैं। यह सूत्र वो संदेश है जो ये लेखक सामूहिक रूप से संप्रेषित करना चाहते हैं, ''मोदीजी, हम आपसे अहमत हैं, हम आपकी नाक के नीचे आपकी विचारधारा वाले लोगों द्वारा अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर किए जा रहे हमलों से आहत हैं।''

कैसे सुलगी चिन्गारी

इस ऐतिहासिक अध्‍याय की शुरुआत कन्‍नड़ के तर्कवादी लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्‍या से हुई थी।  

इस घटना के सिलसिले में हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक उदय प्रकाश के साथ पत्रकार और प्रगतिशील कवि अभिषेक श्रीवास्‍तव की बातचीत हो रही थी। कलबुर्गी और उससे पहले नरेंद्र दाभोलकर व गोविंद पानसारे की सिलसिलेवार हत्‍या पर दोनों एक-दूसरे से अपनी चिंताएं साझा कर रहे थे। नफ़रत और गुंडागर्दी की इन घटनाओं के खिलाफ़ दोनों एक भीषण प्रतिरोध खड़ा करने पर विचार कर रहे थे।

उदय प्रकाश इस बात से गहरे आहत थे कि साहित्‍य अकादमी ने कलबुर्गी की हत्‍या पर शोक में एक शब्‍द तक नहीं कहा। उनके लिए एक शोक सभा तक नहीं रखी गई। प्रकाश कहते हैं, ''आखिर अकादमी किसी ऐसे शख्‍स को पूरी तरह कैसे अलग-थलग छोड़ सकती है जिसे उसने कभी अपने सबसे प्रतिष्ठित पुरस्‍कार से नवाज़ा था? यह तो बेहद दर्दनाक और हताशाजनक है।''

फिर उन्‍होंने विरोध का आगाज़ करते हुए पुरस्‍कार लौटाने का फैसला लिया और अगले ही दिन इसकी घोषणा भी कर दी। इस घोषणा के बाद दिए अपने पहले साक्षात्‍कार में उदय ने कैच को (''नो वन हु स्‍पीक्‍स अप इज़ सेफ टुडे'', 6 सितंबर 2015) इसके कारणों के बारे में बताया था और यह भी कहा था कि दूसरे लेखकों को भी यही तरीका अपनाना चाहिए।

विरोध का विरोध

अब तक कई अन्‍य लेखक और कवि अपने पुरस्‍कार लौटा चुके हैं। बीते 20 अक्‍टूबर को दिल्‍ली के प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया में आयोजित लेखकों व कवियों की एक प्रतिरोध सभा ने अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर हमले की कठोर निंदा की।

फिर 23 अक्‍टूबर को कई प्रतिष्ठित लेखकों, कवियों, पत्रकारों और फिल्‍मकारों की अगुवाई में एक मौन जुलूस साहित्‍य अकादमी तक निकाला गया और उसे एक ज्ञापन सौंपा गया।

इनका स्‍वागत करने के लिए वहां पहले से ही मुट्ठी भर दक्षिणपंथी लेखक, प्रकाशक और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता जमा थे जो ''पुरस्‍कार वापसी तथा राजनीतिक एजेंडा वाले कुछ लेखकों द्वारा अकादमी के अपमान'' का विरोध कर रहे थे।

साहित्‍य अकादमी के परिसर के भीतर जिस वक्‍त ये दोनों प्रदर्शन जारी थे, मौजूदा हालात पर चर्चा करने के लिए अकादमी की एक उच्‍चस्‍तरीय बैठक भी चल रही थी।

बैठक के बाद अकादमी ने एक संकल्‍प पारित किया जिसमें कहा गया है: ''जिन लेखकों ने पुरस्‍कार लौटाए हैं या खुद को अकादमी से असम्‍बद्ध कर लिया है, हम उनसे उनके निर्णय पर पुनर्विचार करने का अनुरोध करते हैं।''

और सत्‍ता हिल गई

जिस देश में क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक और कवि इन पुरस्‍कारों से मिली राशि के सहारे थोड़े दिन भी गुज़र नहीं कर पाते, वहां ''ब्‍याज समेत पैसे लौटाओ'' जैसी प्रतिक्रियाओं का आना बेहद शर्मनाक हैं।

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ और उसकी अनुषंगी संस्‍थाओं के सदस्‍यों और नेताओं की ओर से जिस किस्‍म के भड़काने वाले बयान इस मसले पर आए हैं, उसने यह साबित कर दिया है कि लेखक सरकार का ध्‍यान इस ओर खींचने के प्रयास में असरदार रहे हैं।

और हां, जेटलीजी, जब आप कहते हैं कि यह प्रतिरोध नकली है, तो समझिए कि आप गलत लीक पर हैं। लेखक दरअसल इससे कम और कर भी क्‍या सकता है। सत्‍ता प्रतिष्‍ठान के संरक्षण में जिस किस्‍म की बर्बरताएं की जा रही हैं, हर रोज़ जिस तरह एक न एक घटना को अंजाम दिया जा रहा है और देश का माहौल बिगाड़ा जा रहा है, यह एक अदद विरोध के लिए पर्याप्‍त कारण मुहैया कराता है।

अब आगे क्‍या?

लेखकों व कवियों के सामने फिलहाल जो सबसे अहम सवाल है, वो है कि अब आगे क्‍या?

यह लड़ाई सभी के लिए बराबर सम्‍मान बरतने वाले और बहुलता, विविधता व लोकतंत्र के मूल्‍यों में आस्‍था रखने वाले इस देश के नागरिकों तथा कट्टरपंथी गुंडों के गिरोह व उन्‍हें संरक्षण देने वाले सत्‍ता प्रतिष्‍ठान के बीच है।

इस प्रदर्शन ने स्‍पष्‍ट तौर पर दिखा दिया है कि लेखक बिरादरी इनसे कतई उन्‍नीस नहीं है, लेकिन अभी लेखकों के लिए ज्‍यादा अहम यह है कि वे व्‍यापक जनता के बीच अपनी आवाज़ को कैसे बुलंद करें। ऐसा महज पुरस्‍कार लौटाने से नहीं होने वाला है। यह तो फेसबुक पर 'लाइक' करने जैसी एक हरकत है जिससे कुछ ठोस हासिल नहीं होता।

एकाध छिटपुट उदाहरणों को छोड़ दें, तो बीते कुछ दशकों के दौरान साहित्‍य में कोई भी मज़बूत राजनीतिक आंदोलन देखने में नहीं आया है। कवि और लेखकों को सड़कों पर उतरे हुए और जनता का नेतृत्‍व किए हुए बरसों हो गए।

मुझे याद नहीं पड़ता कि पिछली बार कब इस देश के लेखकों ने किसानों की खुदकशी, दलितों के उत्‍पीड़न, सांप्रदायिक हिंसा और लोकतांत्रिक मूल्‍यों व नागरिक स्‍वतंत्रता पर हमलों के खिलाफ कोई आंदोलन किया था। वे बेशक ऐसे कई विरोध प्रदर्शनों का हिस्‍सा रहे हैं, लेकिन नेतृत्‍वकारी भूमिका उनके हाथों में कभी नहीं रही। न ही पिछले कुछ वर्षों में कोई ऐसा महान साहित्‍य ही रचा गया है जिसने किसी सामाजिक सरोकार को मदद की हो।

पिछलग्‍गू न बनें, नेतृत्‍व करें

एक लेखक आखिर है कौन? वह शख्‍स, जो समाज के बेहतर और बदतर तत्‍वों की शिनाख्‍त करता है और उसे स्‍वर देता है।

एक कवि होने का मतलब क्‍या है? वह शख्‍स, जो ऐसे अहसास, भावनाओं और अभिव्‍यक्तियों को इस तरह ज़ाहिर कर सके कि जिसकी अनुगूंज वृहत्‍तर मानवता में हो।

मेरे प्रिय लेखक, आप ही हमारी आवाज़ हैं, हमारी कलम भी, हमारा काग़ज़ और हमारी अभिव्‍यक्ति भी। वक्‍त आ गया है कि आप आगे बढ़कर चीज़ों को अपने हाथ में लें।

अब आपको जनता के बीच निकलना होगा और उसे संबोधित करना ही होगा, फिर चाहे वह कहीं भी हो- स्‍कूलों और विश्‍वविद्यालयों में, सार्वजनिक स्‍थलों पर, बाज़ार के बीच, नुक्‍कड़ की चाय की दुकान पर, राजनीतिक हलकों में, समाज के विभिन्‍न तबकों के बीच और अलग-अलग सांस्‍कृतिक कोनों में।

और बेशक उन मोर्चों पर भी जहां जनता अपने अधिकारों के लिए लड़ रही है- दिल्‍ली की झुग्गियों से लेकर कुडनकुलम तक और जैतापुर से लेकर उन सुदूर गांवों तक, जहां ज़मीन की मुसलसल लूट जारी है।

आपको उन ग्रामीण इलाकों में जाना होगा जहां बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां संसाधनों को लूट रही हैं: उन राजधानियों व महानगरों में जाइए, जहां कॉरपोरेट ताकतों ने कानूनों और नीतियों को अपना बंधक बना रखा है और करोड़ों लोगों की आजीविका से खिलवाड़ कर रही हैं; कश्‍मीर और उत्‍तर-पूर्व को मत भूलिएगा जहां जम्‍हूरियत संगीन की नोक पर है। इस देश के लोगों को आपकी ज़रूरत है।

सबसे कमज़ोर कड़ी

इन लोगों के संघर्षों को महज़ अपनी कहानियों और कविताओं में जगह देने से बात नहीं बनने वाली, न ही आपका पुरस्‍कार लौटाना जनता की अभिव्‍यक्ति की आज़ादी को बहाल कर पाएगा। अगर आप ऐसा वाकई चाहते हैं, तो आपको इसे जीवन-मरण का सवाल बनाना पड़ेगा। आपको नवजागरण का स्‍वर बनना पड़ेगा।

ऐसा करना इसलिए भी ज़रूरी है क्‍योंकि सरकार अब इस सिलसिले की सबसे कमज़ोर कडि़यों को निशाना बनाने की कोशिश में जुट गई है। उर्दू के शायर मुनव्‍वर राणा, जिन्‍होंने टीवी पर एक बहस के दौरान नाटकीय ढंग से अपना साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटा दिया था, कह रहे हैं कि उन्‍हें प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया था और अगले कुछ दिनों में उन्‍हें मोदी से मिलने के लिए बुलाया गया है।

राणा एक ऐसे लोकप्रिय शायर हैं जिन्‍होंने सियासी मौकापरस्‍ती की फसल काटने में अकसर कोई चूक नहीं की है। उनके जैसी कमज़ोर कड़ी का इस्‍तेमाल कर के सरकार लेखकों की सामूहिक कार्रवाई को ध्‍वस्‍त कर सकती है।

ऐसा न होने पाए, इसका इकलौता तरीका यही है कि जनता का समर्थन हासिल किया जाए। लेखक और कवि आज यदि जनता के बीच नहीं गया, तो टीवी की बहसें और उनमें नुमाया लिजलिजे चेहरे एजेंडे पर कब्‍ज़ा जमा लेंगे।

जनता का समर्थन हासिल करने, अपना सिर ऊंचा उठाए रखने, इस लड़ाई को आगे ले जाने और पुरस्‍कार वापसी की कार्रवाई को सार्थकता प्रदान करने के लिए हरकत में आने का सही वक्‍त यही है। मेरे लेखको और कवियो, बात बस इतनी सी है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। किसका इंतज़ार है और कब तक? जनता को तुम्‍हारी ज़रूरत है!

(मूल अंग्रेजी : कैच न्‍यूज़)

सपनों के सरोकार: वेणु गोपाल को याद करते हुए

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/23/2015 02:19:00 PM


वेणु गोपाल को याद करते हुए रुबीना सैफी का लेख. समयांतर (अक्तूबर, 2015) से साभार.

किसी भी रचना या रचनाकार के सामने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जो दो सवाल हमेशा मौजूद होते हैं वे हैं क्यों, और किसके लिए? नक्सलबाड़ी आंदोलन ने न केवल भारतीय राजनीति में इन सवालों को जगह दिलाई बल्कि भारतीय कला, साहित्य और सांस्कृतिक में भी इन सवालों को नए सिरे से सामने रखा। यही वजह है कि वेणु गोपाल की कविता न सिर्फ भारतीय राजनीति को नए सिरे से देखती है बल्कि कविता को भी परिभाषित करने की कोशिश करती है। ‘क्यों लिखूं? किसके लिए लिखूं?’ का सवाल हमेशा उनके सामने बना रहता है। वे कविता की भूमिका पर सवाल खड़े करते हैं, उसकी रचना प्रक्रिया, उसकी जरूरत पर सवाल उठाते हैं।

वेणु गोपाल के काव्य संग्रह और ज्यादा सपने में कविता के नए प्रतिमानों के बनने की छटपटाहट साफ जाहिर है। वेणु गोपाल कविता का नया सौन्दर्यशास्त्र रचते हुए दिखते हैं। कविता क्या कर सकती है और क्या नहीं? उसकी क्या संभावनाएं हैं या सीमाएं? उसकी दशा क्या है और दिशा क्या होनी चाहिए? इस काव्य संग्रह की ज्यादातर कविताओं के केन्द्र में यह सवाल मौजूद हैं। इस काव्य संग्रह से अलग एक जगह वह अपनी कविता में कहते हैं-

सोचता कोई नहीं कोई नहीं सोचता मेरी
ओर से
कि खून की लकीर नहीं खींच सकती मेरी कलम
और स्याही से कभी कोई बात साफ नहीं होती

कवि कलम की सीमाओं से वाकिफ है। वो जानता है कि उसकी कविता ‘कुरसी और मेज के बीच समन्दर खोद कर/बादलों के जन्म की प्रतीक्षा’ की तरह उम्मीद और हकीकत की बारीक लकीर पर खड़ी है। जिसके फर्क को समझना कवि के लिए जरूरी है। वह जानता है कि कविता में आना स्याही की लकीरों के बीच बंधना भी है। वह कहता है कि ‘चारदीवारी में शेर देखो/मेरी कविता में/मुझे देखो’। और जैसे ही कवि इन स्याही की लकीरों को पार कर हकीकत की दुनिया के बीचोबीच पहुंच जाता है कविताई उससे छिन जाती है। ‘फिर यह छलांग देखो.../कि मैं दुनिया के बीचोबीच/ऐसा मेरा आना देखो/कविताई का जाना देखो।’ एक राजनीति कविता के इस अंतरद्वंद्व से कवि वाकिफ है। वह लगातार इस सवाल से जूझता है कि कवि प्रथम दृष्टा नहीं रहा खबरों से आते हुए तथ्य, घटनाएं, दुर्घटनाएं उस तक पहुंचते हैं और वह उन पर कविता लिखता है। उसकी कविता में जगह पाते हैं। वह जिसे कविता में दर्ज करता है वह उस जिन्दगी का भोक्ता नहीं है बल्कि सिर्फ श्रोता है, पाठक है-

अखबारों को
पंखों की तरह फड़फड़ाते हुए
हम
उड़ते हैं और पहुंचते हैं
एक भागलपुर
से दूसरे भागलपुर तक

इसलिए कवि के मन में सवाल आता है -

कवि कविता लिखता है
लेकिन उससे पहले अखबार पढ़ता है
...
तो अखबार छपता है
इसलिए कवि
कविता लिखता है

वेणु गोपाल की कविताओं में उभरे यह सवाल उस वक्त के पैदा किए गए सवाल हैं जब कविता और जनता के बीच की दूरी की माप से कविता का वज़न तय किया जाता था। जो कविता जनता की जिन्दगी के जितनी करीब है वो कविता उतनी ही बेहतर कविता है। नक्सलबाड़ी ने पूरे देश में साहित्य खासकर कविता और जनता के बीच की दूरी को कम किया। इसलिए इन सवालों के बावजूद कि -

या तो कविता लिखूं
या फिर न लिखूं
इस तिलिस्म से बाहर
निकल पाने का
रास्ता
यह भी नहीं!
वह भी नहीं!

कवि कविता का ही रास्ता चुनता है। और वह कहता है कि ‘यह होता रहेगा वह होता रहेग/लेकिन मैं फिर भी कविता लिखता रहूँगा।’

हिंदी की समकालीन कविता में भी हम इस प्रवृत्ति को देख सकते हैं, जहां इस आन्दोलन के बाद जनवादी कविता एक मुख्य प्रवृत्ति के रूप में स्थापित हुई। अब तक कविता जिन विषयों पर विचार कर रही थी वे तो बदले ही कविता की अन्तर्वस्तु में भी बदलाव आये।

जनता और खासकर किसानों, मजदूरों और मध्य वर्ग का जीवन, उसके सुख-दुख उनके सपने और आकांक्षाएं, उनके हित और उद्देश्य बेहतर जीवन के लिए उनके संघर्ष आदि कविता के विषय बने। अब तक जीवन के जो पहलू, रूप और बिंब कविता से बाहर थे वे कविता में दखिल हुए-

‘हर हाल में उसे उगना है
कि वह बीज है
और वह जानता है
कि वह बीज है’

नक्सलबाड़ी के दौर की कविता अपनी भूमिका को तय करने के दौरान कभी वक्त के दस्तावेज़ों को पाठकों के सामने रखती है तो कभी उनकी लड़ाई में साथ खड़ी होती है। इसलिए वेणु गोपाल को अपनी कविता ‘कई बार दस्तावेज़ सी लगती है’ तो कई बार ‘भीतरी-बाहरी लड़ाई की रपट सी’। वेणु गोपाल की कविताओं को समझना दरअसल उस वक्त को समझना भी है जिसने आजादी के नाम पर दिए विकल्प के समानान्तर एक विकल्प को खड़ा किया जो ज्यादा पारदर्शी था, जो ज्यादा जनता की उम्मीदों के साथ था। जो किसी पूंजीपति घराने के दिमाग की उपज नहीं था बल्कि यह विकल्प उन्होंने खुद गढ़ा था। इस विकल्प ने न केवल राजनीति में बल्कि कला, साहित्य और संस्कृति में भी एक समानान्तर धारा खड़ी की। इसमें वेणु गोपाल, कुमार विकल, आलोकधन्वा, गोरख पाण्डेय की बड़ी भूमिका है। महेश्वर, विजेन्द्र अनिल, रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’ भी इसी नक्सलबाड़ी आन्दोलन की देन हैं।

कवियों की यह वो जमात है जिसने कविता में उम्मीद, सृजन और भविष्य के निर्माण की एक दिशा को तब स्थापित किया, जब (सत्ता हस्तांतरण के बाद) के दौर में धीरे धीरे कविता मोहभंग, निराशा और विकल्पहीनता विचारों से भर गई थी. ये वो कवि थे, जिन्होंने सिर्फ आलोचना नहीं की, जैसी कि धूमिल कर रहे थे और न ही रूमानी आशाओं पर उनकी कविता टिकी हुई थी. वेणु गोपाल समेत ये वो कवि थे, जिन्होंने पहली बार हिंदी कविता को जनता के संघर्षों का आधार दिया. हालांकि उनमें इसको व्यक्त करने के तरीके में स्पष्ट अंतर देखा जा सकता है. आलोकधन्वा इस दौर के सबसे चर्चित और उद्धृत कवि हैं, लेकिन उनमें संघर्षों से एक भौतिक अलगाव को साफ महसूस किया जा सकता है, जो उनकी कविताओं को एक भाषाई कारीगरी से लैस करता है. वेणु गोपाल में जवाब के बजाए सवाल ज्यादा हैं, शंकाएं हैं, संदेह हैं, बहस है. इस संग्रह की कविताओं में जनता भी उतनी नहीं है, जितनी आलोकधन्वा की कविताओं में है. यहां कवि ‘मैं’, ‘तुम’ और ‘वह’ की बहस में है. लेकिन यह भी उतना ही साफ है कि कवि जिस जमीन पर खड़ा है, वह ठोस है, उसके सवाल सृजन के सवाल हैं, उसकी शंकाएं रास्ते की ओर बढ़ने की कोशिश का हिस्सा हैं, उसकी बहस हालात को और साफ-साफ देख पाने की चिंता से जुड़ी बहस है. इस मायने में, वेणु गोपाल की कविताएं नक्सलबाड़ी की परिपक्व कविताएं हैं, जिन्हें सीधे सीधे पोस्टरों और बैनरों में इस्तेमाल करना शायद आसान न हो, लेकिन जनता के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए जिन पर बैठ कर सोचना जरूरी है.

नक्सलबाड़ी के दौर के हिंदी कवियों की पहली पीढ़ी में अकेले वेणु गोपाल ही हैं, जो इस नए आंदोलन की संगति में एक नई सौंदर्यदृष्टि को विकसित करने की चिंता करते दिखाई देते हैं. आलोकधन्वा में जो एक सहज आकर्षण है, वह इसलिए है कि वे लीक को और पैना बनाते हुए, उसे साधते हुए कविता रचते हैं. जबकि वेणु गोपाल का सरोकार इससे दिखता है कि वे एक ऐसी दृष्टि को विकसित करें, जो न सिर्फ लेखकों और पाठकों को इस आंदोलन के वैचारिक सरोकारों के करीब ले जाए, बल्कि उसके नजरिए से दुनिया को देखने का चलन भी शुरू करे. उदाहरण के लिए उनकी कविता जड़ें देखिएः

हवा
पत्तों की
उपलब्धि है। खूबसूरती
तो सारी जड़ों की है।

यह नक्सलबाड़ी के दौर के पहले हिंदी कवियों में वेणु गोपाल के ही सरोकार हैं, जो आगे चल कर गोरख पाण्डेय के रचनात्मक सरोकारों से गहराई से जुड़े हुए दिखते हैं. यह वेणु गोपाल की कविताओं का द्वंद्व और उनकी विडंबना है, जो गोरख में और ज्यादा मुखर होकर सामने आई. उदाहरण के लिए वेणु गोपाल अपनी कविता ‘दुर्घटना’ में जिन्दगी और मौत के फर्क को पेश करते हैं। जुल्म के खिलाफ आवाज उठाना ही जिन्दा होने की निशानी है। वे कहते हैं:

उस
अकेले की मुट्ठी खुल गयी थी
रेत ही रेत
बिखर गयी थी
सब तरफ-लेकिन
कई कई मुट्ठियां
और ज्यादा
मज़बूती से
बन्द हो गयी थीं
सड़क पर

इन लड़ाइयों में भी कवि कलम की मशाल के बल पर खुद से भी बराबर लड़ता है। अपने भीतर के ‘मैं’ से बराबर लड़ता है। उसके भीतर का ‘मैं’ जो बराबर ‘तुम’ की तलाश में है। ‘तुम’ के इंतजार में है-

रोशनियाँ
मजबूत सलाखें हैं
जिनके भीतर
कै़द
कवि
अंधेरे के वजूद से
इन्कार करता हुआ
और ज्यादा
भीतरी कोनों की तरफ
जा रहा है
कलम को मशाल की तरह
थामे।

इस कविता संग्रह में कई प्रेम कविताएं भी हैं। वेणु गोपाल की प्रेम कविताएं एक स्त्री की संवेदना तक पहुंचने की कोशिश भर हैं, वे कोई दावा नहीं करतीं। वेणु गोपाल प्रेम और स्त्रियों को लेकर कोई दावा नहीं करते, वे इसकी कोशिश करते हैं कि उन्हें सही से समझ सकें.

सारी कैदें टूट जाती हैं
हम आकाश हो जाते हैं

लैंगिक प्रश्नों पर वे एक सही जगह पर पहुंचने की कोशिश करते हैं, इसलिए यहां भी, उनके पास सवाल ही ज्यादा हैं. लेकिन ये सवाल, ऐसे सही सवाल हैं, जो सही जवाब तक पहुंचने में मदद करते हैं. जैसे कि उनकी कविता ‘वह’

यों वह बेहद शर्मीली है
लेकिन
इस वक्त कितनी
बेखबर है...
अपने स्तन के उघड़े होने से...
वह घूरती सी देख रही है
गोदी में लेटे बच्चे को...
आखिर
वह क्या ढूंढ़ रही है?
वह क्या पा रही है?

नक्सलबाड़ी के दौर की कविताओं को नारेबाजी कहकर खारिज करने का एक आम चलन रहा है. वेणु गोपाल कविता को एक जारी प्रक्रिया की तरह देखते हैं, जिसमें बदलते हुए समय के साथ कविता बदलती है और उसे अपने दौर की आवाज बनना पड़ता है. वे इस युग की पहचान एक ऐसे दौर के रूप में करते हैं, जिसमें ‘बिना शब्द शब्द में आरडीएक्स का/जखीरा बनाए/नहीं लिखी जा सकती कविता आज’।


वह मानते हैं कि जिस दौर में यह कविता लिखी जा रही थी उस दौर में ऐसी ही कविता लिखी जा सकती थी। कोई भी प्रगतिशील विधा अपनी समय की जरूरतों के हिसाब से खुद को बदल लेती है। कविता इस मायने में सबसे लचीली रही है। इस दौर में कविता नारे भी बनी है और चीखें भी। कवि को इस बात से कोई इंकार नहीं, वह खुद कहते हैं कि -

टापों की आवाजों के
समानांतर
ये चीखें हैं - मेरी कविताएं

वे मानते हैं कि कविता कब क्या रूप लेगी इसका निर्णायक पाठक होगा ‘वह पाठक जो लड़ता भी है आखिरी साँस तक/बढ़ता भी है जहाँ तक हो सकता है/ चढ़ता भी उतना जितना मुमकिन हो’ वही ‘पाठक निर्णायक’ होगा।

वेणु गोपाल परंपरा और वर्तमान के द्वंद्व से अपनी कविता को विकसित करते चलते हैं। इस कविता संग्रह के सारे सवाल, सारे ख्याल ‘और ज्यादा सपने’ को हकीकत की जमीन पर खींचकर लाने की जद्दोजहद है। वो सारे सवाल, वो सारे ख्याल वो सारे सपने जो एक आंदोलन ने पैदा किए थे जो न केवल आज के वक्त के लिए, बल्कि भविष्य के लिए भी उतने ही जरूरी हैं जितने उस दौर के लिए थे।

आइए, अगले हब्शी के फंदे में फंसने का इंतजार करते हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/22/2015 01:27:00 PM


Eeny, meena, mina, mo,
Catch a nigger by the toe;
If he hollers let him go,
Eena, meena, mina, mo

(नस्लवादी अर्थ लिए हुए बच्चों के खेल का एक गीत)

''एनी, मीना, मिना मो,
हब्शी को अंगूठा धरके पकड़ो
गर वो चिल्लाए तो जाने दो
एनी, मीना, मिना मो''

फरीदाबाद में जब उनका कत्ल किया गया, दिव्या 11 महीने की थी और उसका भाई वैभव दो साल का था. यह जगह एक औद्योगिक शहर है, जहां कारोबारी दुनिया की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों के मुख्यालय हैं - बाटा, यामाहा, महिंद्रा डिफेंस, लखानी शूज, ओरिएंट फैन्स, एक खत्म न होनेवाली फेहरिश्त जिससे 'शाइनिंग इंडिया' का नाम निकला है.

उन्हें मार दिया गया, क्योंकि वे दलित थे! कत्ल का हथियार कत्ल के इरादे जितना ही जहरीला था: उन्हें जला कर मारा गया.

हममें से कई यह नहीं जानते कि फरीदाबाद हिना बनाने के लिए भी मशहूर है. हिना: इंसानों को जितने रंग मालूम हैं, उनमें सबसे खूबसूरत रंग. एक ऐसा रंग, जो एक दिलेर और जिंदादिल लड़की के हाथों की निशानी है, एक खुशबू जो मुहब्बत की याद दिलाती है. कहा जाता है कि ये भारत में त्योहारों का मौसम है, जैसे उन मुल्कों में क्रिसमस का मौसम होता है, जहां कॉरपोरेट दिग्गजों के मुसाहिब लोग रहते हैं. मुझे यकीन है, दिव्या और वैभव की उस बदकिस्मत मां रेखा ने भी अपनी नन्हीं परी के लिए हिना के मंसूबे बनाए होंगे. लेकिन यह पूछने लायक बात नहीं है. है न? ऐसे में, जब दिव्या और वैभव जैसे धरती के अभागे इस जानलेवा हवा में सांसें लेने की कोशिश करते हैं. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि जब काला धुआं उनके नन्हें, गुलाबी फेफड़ों में दाखिल हुआ होगा तो वे चिल्लाए होंगे...या शायद नहीं भी चिल्लाए हों.

आइए, अगले हब्शी के फंदे में फंसने का इंतजार करते हैं.

प्रो. शाह आलम खान
एम्स, नई दिल्ली 

अतीत की असहजता: जानकी नायर

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/20/2015 09:44:00 PM


जेएनयू में इतिहास की प्राध्यापक जानकी नायर ने यह लेख दक्षिणपंथी हिंदुत्व गिरोह द्वारा इतिहास की वैज्ञानिक समझ, इतिहास लेखन और इतिहासकारों पर किए जानेवाले हमले के संदर्भ में लिखा है. द हिंदू में प्रकाशित इस लेख का अनुवाद शुभनीत कौशिक ने किया है.


अकादमिक दुनिया को और ख़ासकर इतिहास विभागों को आज अप्रासंगिक हो जाने का खतरा सता रहा है। सड़कों, वेबसाइटों, समाचार-पत्र के लेखों, सामुदायिक बैठकों, राजनीतिक दलों और विधायिकाओं, एवं भ्रष्ट तथा विकृत दिमागों द्वारा इतिहास को रोज-ब-रोज दी जाने वाली चुनौती, इस विषय के लिए दुर्दिन बनती जा रही हैं। इतिहास के लिए इस आसन्न संकट में अब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद भी शामिल हो गया है। आज न सिर्फ़ इतिहासकारों की जवाबदेही तय करने की कोशिश की जा रही है, बल्कि उन पर एक ‘सुनिश्चित, स्पष्ट और बगैर किसी विरोधाभास वाले’ इतिहास को लिखने का दबाव भी बनाया जा रहा है। जाहिर है कि ऐसा ‘इतिहास’ लिखना इतिहासकार की वर्तमान क्षमता से परे है।

पिछले कुछ समय से हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथ ने ‘उदार लेफ़्ट’ की ओर झुकाव रखने वाले इतिहासकारों और विद्वानों पर लगातार हमला बोला है। इन विद्वानों को ‘भारतीयता विरोधी, राष्ट्र-विरोधी, और हिन्दू-विरोधी’ भी बताया गया। सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं को समझने पर ज़ोर देने के लिए, और अतीत के महज़ ‘गौरवशाली पक्ष’ पर लिखने की बजाय, उसके आलोचनात्मक विश्लेषण और मूल्यांकन करने के कारण भी, इतिहासकारों को आलोचना झेलनी पड़ रही है। उस ऐतिहासिक पद्धति पर भी अब सवाल उठ रहे हैं, जिसमें कम-से-कम पिछले 40 वर्षों में इतिहासकारों ने एकाश्मी इतिहास की सुनिश्चितताओं से परे जाकर, अब तक उपेक्षित रहे क्षेत्रों, समूहों, संप्रदायों और परिप्रेक्ष्यों के अध्ययन की कोशिश की। इन इतिहासकारों के कार्यों की यह कहकर आलोचना की जा रही है कि उनके कामों में ‘भारतीय दिमाग पर औपनिवेशिक प्रभाव’ की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।

‘नए सिरे’ से शुरुआत

बक़ौल, यल्लप्रगडा सुदर्शन राव, जो भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के चेयरमैन हैं, इन ‘अंतरंग शत्रुओं’ यानी ऐसे इतिहासकारों से निबटने के लिए ‘नए सिरे’ से शुरुआत करनी होगी। इस क्रम में हमें ‘सभी पुरानी व्याख्याओं से निजात पानी होगी’, और एक ओर जहां विज्ञान की प्रविधि का इस्तेमाल करना होगा, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे ही अपरिभाषित पद्धतियों का इस्तेमाल करना भी सीखना होगा। इतिहास को पीछे धकेलने की धुन, ताकि वह निष्ठापूर्वक वर्तमान की सेवा कर सके, भले ही एक बेकार का ऐतिहासिक उद्यम लगे, पर सुदर्शन राव की दृष्टि में यह एक महत्त्वपूर्ण ‘वैज्ञानिक उद्यम’ ज़रूर है। सुदर्शन राव मानते हैं कि विगत ‘8000 वर्षों’ के इतिहास का पुनरुद्धार और डिजिटलीकरण उनका कर्तव्य है और वे इतिहास को इतिहासकारों की पकड़ से निकालकर उसमें वैज्ञानिकों जैसी ‘वस्तुनिष्ठता’ शामिल करने और बच्चों सरीखी कल्पना का पुट डालने पर ज़ोर देते हैं। इसलिए उनका कहना है कि ‘इतिहास-शोध महज पेशेवर इतिहासकारों का ही विषय नहीं है’। बच्चे की कल्पना से प्राप्त होने वाले ‘ऐतिहासिक सच’ का भी, अब इतिहासकारों को स्वागत करना होगा।

यह कथन इतिहासकारों के लिए असल चुनौती पेश करता है: एक ओर तो यह व्याख्या की प्रक्रिया को बाधित करता है और दूसरी ओर यह अतीत के बच्चों सरीखे, अपेक्षाकृत तथ्यरहित और महज़ दावों से भरे हुए, विश्लेषण को स्वीकृति देता है। बकौल प्रो. राव, शाश्वत सत्य वेदों में निहित है क्योंकि उनके अनुसार, ‘हम जानते हैं कि समाज-विज्ञानों में अनुभवजन्य प्रामाणिक अध्ययन वर्तमान और निकट भविष्य के अध्ययन के लिए ही प्रासंगिक हो सकते हैं’।

अगर ‘इतिहासकार का काम’ महज़ पूर्व-निर्धारित निष्कर्षों की पुष्टि करने वाली सामग्री को जुटाना भर है तो सभी इतिहास विभागों को बेकार होते देर नहीं लगेगी। पर पेशेवर इतिहासकारों को सिर्फ बेकारी का भय ही नहीं सता रहा है। इस भय में उनके पेशेवर कौशलों पर हो रहे हमले भी शामिल हैं। ‘लिबरल लेफ़्ट’ के इतिहासकारों ने अतीत में अर्थ ढूँढने, उसके निहितार्थों को समझने और व्याख्याओं पर ज़ोर दिया। अब, अतीत के भूत अपने कब्रों से बाहर निकाल रहे हैं और तथ्य का सम्मान करने वाले इतिहासकारों को चुनौती दे रहे हैं। इतिहासकार का सामना ऐतिहासिक शख़्सियतों, समुदायों, और यहाँ तक कि घटनाओं के बारे में भी सच बताए जाने वाले ‘तथ्यों’ की बाढ़ से हो रहा है। इन मिथ्या धाराओं पर तथ्यपरक होने की कोई ज़िम्मेवारी नहीं है। इस तरह, जब हम अपने को एक पठनीय और पढ़ाये जाने योग्य एकल इतिहास तैयार करने की दशा में पाते हैं (जिस प्रोजेक्ट में हिन्दू दक्षिणपंथी भी लगे हुए हैं)। तो हम यह भी पाते हैं कि कुछ लोग इस बात पर भी बार-बार ज़ोर दे रहे हैं कि अतीत के उन हिस्सों को जो ‘पर्याप्त गौरवपूर्ण’ नहीं हैं, उन्हें संपादित करना होगा या उन्हें दबा देना होगा या ज्यादा बेहतर होगा कि उन्हें भूल ही जाएँ।

इतिहास में सुविधाजनक रद्दोबदल

इस तरह भारतीय इतिहास उन बातों की एक लंबी और उबाऊ फेहरिस्त बनता जा रहा है, जिसमें ये बातें शामिल हैं या होंगी: वे बातें जो हम नहीं जान सकते; वे बातें जिन्हें जानने की हमें ज़रूरत ही नहीं है; वे चीजें जो हमें नहीं जाननी चाहिए; और कुछ ऐसी भी बातें, जिनके बारे में पहले से ही निर्धारित कर दिया गया है कि वे बातें हमें ज़रूर जाननी होंगी। जल्द ही, इतिहास का शिक्षक खुद को केवल उन मुद्दों और विषयों को पढ़ता-पढ़ाता हुआ पाएगा, जिन पर विवाद की गुंजाइश न के बराबर हो। या जिन पर उन असंख्य समूहों को कोई आपत्ति नहीं होगी, जिनकी भावनाएं अत्यंत कोमल हैं और आहत हो जाने को आतुर। ऐसे कुछ विषय होंगे: आरंभिक आधुनिक यूरोप में उपभोग के बदलते पैटर्न; चीन में बॉक्सर विद्रोह आदि।

अब उस मांग का उदाहरण ले लीजिए जिसमें अभिनेता रजनीकान्त को टीपू सुल्तान पर प्रस्तावित फिल्म में मुख्य भूमिका न निभाने के लिए कहा गया और उन्हें ‘चेतावनी’ भी दी गयी। गौरतलब है कि टीपू सुल्तान के जीवन पर आधारित यह बायोपिक कर्नाटक के अशोक खेनी द्वारा प्रस्तावित थी।

टीपू सुल्तान पर ‘हत्यारा’, ‘निर्दयी’ और यहाँ तक कि ‘तमिल-विरोधी’ होने तक के मिथ्या आरोप लगाए जा रहे हैं। भारतीय इतिहास का कोई भी जानकार, यह जानता है कि 18वीं सदी के अनेक भारतीय राजाओं ने अपने राज्य के क्षेत्रीय विस्तार पर हमेशा ज़ोर दिया वह भी किसी भाषाई समूह को वरीयता दिये बिना या उनके भय के बिना। एक पेशेवर इतिहासकार के पास टीपू सुल्तान के योगदान को समझने और उसके मूल्यांकन के लिए कई तरीके हो सकते हैं, जिसके आधार पर वह उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री का अध्ययन करेगा। औपनिवेशिक दस्तावेज़ों के अनुसार टीपू सुल्तान एक ‘निर्दयी’ शासक था, ऐसा इसलिए भी क्योंकि टीपू सुल्तान अंग्रेज़ों का कट्टर शत्रु था। (और जब हम औपनिवेशिक दस्तावेज़ों की बातों को ज्यों-का-त्यों स्वीकार करते हैं, तो हम प्रो. राव के भय को ही स्पष्ट ढंग से जता रहे होते हैं यानि ‘इतिहास पर औपनिवेशिक प्रभाव या पकड़’ का भय।)

टीपू सुल्तान ने अपने अनेक पत्रों में बंदी बनाए गए और मारे गए लोगों के बारे में या धार्मिक पूर्वाग्रह संबंधी अतिशयोक्तिपूर्ण बातें कही हैं। पर दूसरी ओर, मैसूर के किले में मंदिरों के अवशेष, टीपू सुल्तान द्वारा मंदिरों को दिये गए दानपत्र और टीपू सुल्तान के बनवाए भवनों के स्थापत्य में हिन्दू प्रतीकों का इस्तेमाल कुछ और ही कहानी कहता है। इसके साथ ही, लोक-संस्कृति में भी टीपू सुल्तान की वीरता, उसके अदम्य साहस और उसकी स्मृति के किस्से भरे पड़े हैं। कन्नड़, तमिल, मलयालम, मराठी, और तेलुगू भाषा के लोकगीतों में और लावनियों में भी टीपू सुल्तान को समर्पित गीत भरे पड़े हैं।

इनमें से किस सामग्री को इतिहासकार वरीयता देता है? इसका जवाब है इनमें से किसी को भी नहीं। या यह कि इतिहासकार द्वारा इनमें से सभी का, उनके रचे जाने के समय के आधार पर आलोचनात्मक विश्लेषण और मूल्यांकन किया जाना चाहिए। आधुनिकीकरण की ओर कदम बढ़ा रहे राजाओं वाले युग के एक जटिल, विरोधाभासी और अनोखे प्रतिनिधि, टीपू सुल्तान की स्मृति को कम करके आंकना, असल में, भारतीय इतिहास को ही इसकी संपूर्णता में, और इसकी ‘असुविधाजनक’ जटिलताओं को, कम करके आंकना होगा।

1940 के दशक के आखिरी वर्षों में जब हमने अपना संविधान तैयार किया था, तब से अब तक काफी समय बीत चुका है। संविधान की मूल प्रति को कलात्मक बनाने और उसे अपने रेखांकन से सजाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी, प्रख्यात चित्रकार नंदलाल बोस को। नंदलाल बोस ने, टीपू सुल्तान को 18वीं सदी में अंग्रेजों की मुखालफत और अंग्रेज़ी ताकत का प्रतिरोध करने वाली शक्तियों का प्रतिनिधि माना। रजनीकान्त जो स्वयं तीन भाषाई संस्कृतियों, मराठी, तमिल और कन्नड़, के संतान हैं, एक ऐसे ही जटिल नायक यानि टीपू सुल्तान की भूमिका निभाने से नहीं चूकना चाहेंगे। पर इस बात के लिए हमें उन्हीं पेशेवर इतिहासकारों के कौशलों की ज़रूरत होगी, जिन्हें नाहक बदनाम किया रहा है। 

सलीब की तरह क्या ढोना: शिवप्रसाद जोशी

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/19/2015 04:38:00 PM


शिवप्रसाद जोशी की आवाज में दुख है, पीड़ा है, दर्द है. लेकिन सबसे बढ़ कर फासीवाद के प्रतिरोध में सम्मान लौटा रहे लेखकों के साथ मजबूती से खड़े रहने की जिद है.

सुनियोजित हिंसा और हमले का ये पैटर्न बन गया है. इसके लिए किसी भविष्यकथन की थपथपी से रोमांचित होने की ज़रूरत भी नहीं. लोग मारे जाते रहेंगे. एक दर्दनाक मायूसी छा गई है. कौमें उदास हैं. और बद्दुआएं  किन्हीं कोनों से उठने लगी हैं. नाइंसाफ़ी के प्रतिकार की गूंजे वही नहीं जो सिर्फ़ सुनाई दी जाती रहें. कुल विपदा एक साथ नहीं गिरेगी.

जातीय, धार्मिक और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर तो हमले नए नहीं है, वे तो मंटो से बदस्तूर जारी हैं.

हमारे और बहुत सारे युवाओं, नवागुंतकों के इन अति प्रिय कवियों लेखकों की पंक्तियां हम कोट करते हैं और आगे बढ़ाते हैं और बाज़दफ़ा हमला करने वालों की आंखों में टॉर्च की रोशनी की तरह रखने का साहस कर देते हैं. इधर जो स्टैंड या जो निष्क्रिय सा या उदासीन सा रवैया इनमें से कुछ सम्मानीय लेखकों ने दिखाया है, ये हिंदी की युवतर और नई पीढ़ी को चौंकाता है और स्तब्ध करता है. हो सकता है अन्य भाषाओं में भी ऐसा ही सोचा जा रहा हो.

लेकिन सज्जनो, पुरस्कार लौटाने वाले ‘थके हुए लोग’ नहीं हैं. वे प्रतिरोध के ताप से भरे हुए साहसी लोग हैं. ये कोई तात्कालिक नायकत्व थोड़े ही है. ये कोई बॉलीवुड की मसाला फ़िल्म नहीं चल रही हैं. ये कोई अस्थायी संवेग नहीं है, ये वृथा भावुकता और इसके वशीभूत कोई शहादत नहीं है.

ये क्षणभंगुरता नहीं है. क्या आप ऐसा ही मानते हैं?

आज इतिहास पलटकर एक मांग कर रहा था. कुछ लोग कंबल ओढ़कर करवट ले बैठे हैं और सो गए हैं. साहित्य अकादमी को छोड़ दीजिए. आज जो ये लेखकीय संताप अपनी रचनाओं से निकलकर एक निर्णय की तरह प्रकट हो चुका है और फैल रहा है, क्या ये कोई बीमारी है या संक्रमण?

आप किन वक़्तों का इंतज़ार करेंगे? क्या हो जाएगा जब आप कहेंगे- हां, ये हद है? क्या सारी हदें चूर-चूर होने के लिए आपको किसी भारी शक्तिशाली विस्फोट की आवाज़ चाहिए या उससे होने वाली बरबादी?

आप सलीब की तरह इसे क्यों ढोएंगे? ईसा पर सलीब उनकी इच्छा से नहीं लादी गई. उन पर थोपी गई. क्या आप कहना चाह रहे हैं कि ये आप पर थोपा गया है? और आपकी तो सलीब हुई आपको चुभती हुई और हर रोज़ दबाती हुई। और वे जो बाक़ायदा पीट पीट कर मार डाले जा रहे हैं, वे?

क्या उनकी तक़लीफ़ की कोई कील होगी जो सीधे आत्मा में आपके जा चुभ जाए और आप कराह उठें? ग्लानि की और कुछ न कर पाने की छटपटाहट की और अपराधबोध की सलीब ढोने के बजाय क्यों न सामूहिकता की एक जवाबदेही आप भी अपने ऊपर ले लें? आप इसे अपनी वैचारिकता और यातना का एकांत कैसे बना सकते हैं? इन वक़्तों में. आप छिटके हुए क्यों हो सकते हैं?

सलीब को ढोने के मुहावरे में क्यों जा रहे हैं? वो तो आप दैनंदिन व्यथाओं, वेदनाओं, हिंसाओं और संघर्षों के हवाले से ढो ही रहे हैं. ये पुरस्कार कैसे उस अत्यन्त यातना में शुमार हो गया है जो आपके लेखकीय जीवन की धुरी थी?

आपने सलीब ढोने के लिए जन्म नहीं लिया था. आपका मक़सद कविता करना ही था. आप उस पीड़ित और व्याकुल समाज की परवाह करते थे और इसलिए आपने लिखा. फिर सलीब क्योंकर आ गई?

और भाड़ फोड़ना किसे कहते हैं? क्यों प्रिय कवि मुहावरों में जा रहे हैं? क्यों वो एक तरह की ग्रंथि के हवाले से कह रहे है कि उनका कहा ही सही है और सिद्ध है? प्रतिरोध को इतना कमतर और इतना संदेहास्पद क्यों बनाया जा रहा है?

आज जब कन्नड़, पंजाबी, कोंकणी, मराठी जैसी भाषाओं में हम एकजुटता देख रहे हैं तो इधर हिंदी के खेमे- कुंजे क्यों बिखरे हुए हैं? उसके शामियानों पर अलग अलग पताकाएं क्यों लहरा रही है? जैसे ब्रिटिश राज और उसके पूर्व भारत का कोई दृश्य हो. ये एक तंबू क्यों नहीं है, कोई एक कैंप? इन कैंपों पर ये घुसपैठ किसकी है?

कोई हैरानी नहीं कि जो विचार आपके हैं और जो धारणाएं आप ज़ाहिर कर रहे हैं वे कमोबेश इस देश के श्रीमंत भी कर रहे हैं, वही मीडिया के अधिकांश हिस्से के मूढ़मति भी कर रहे हैं. और लेखकों में तो दो फाड़ बता ही दिया गया है. देखिए चेतन भगत कहने वाले हो गए हैं. तो आज चेतन भगत जैसे तत्व भी ज्ञान दे रहे हैं और पीएम निंदा से हमेशा व्याकुल नज़र आते अनुपम खेर जैसे लोग भी. वे लेखकों से ही उनका हिसाब पूछ रहे हैं. एक विवादास्पद और वाद विवाद के लंदन माहिर, शशि थरूर तक कहने से बाज़ न आए. आप लेखक हैं तो लेखक ही रहिए, ख़बरदार, राजनीति पर मत बोलिए. और इस राजनीति पर जो इधर दिल्ली से लेकर भारत भूमि के कस्बों शहरों तक एक भयावह अट्टाहस में कह रही हैं, मुझे मानो मुझे मानो, उस पर कोई कुछ न बोले. सब शरणागत हो जाएं. क्या यही हासिल है?

न जाने क्यों भटके हुए से दिख रहे माननीयो, इस समय हम सही हैं. अहंकार नहीं, आत्मबल है. चतुराई नहीं साहस है. स्वार्थ नहीं विवेक है. हमारा विवेक हमारी अंतरात्मा के साथ पूरे समन्वय में है. ये एक स्थायी दृढ़ता है. प्लीज़ आप इस दृढ़ता में लौट आएं. ये लौट आना भविष्य में दाख़िल होना होगा. भविष्य का निर्माण दृढ़ता ही करती आई है. ये झपटना और ऐंठना नहीं.

अगली रचना आख़िर आप किस हवाले से करेंगे, कौन सा मर्म होगा जो आपकी मुंदी हुई आंखों के सामने थरथरा उठेगा? मुक्तिबोध होते तो हमारी ओर से बेशक कहते पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है. ये क्लिशे नहीं हो जाता जैसा क्लिशे “अंधेरे में” नाम की कुल महान रचना का बना दिया गया है और सब उस पर मानो “तृप्त” होकर बोलते न रहते. “अंधेरे में” को कोल्ड ड्रिंक की तरह या किसी भी अन्य ड्रिंक की तरह पीना बंद कीजिए.

हम क्या कहें. हम सब लोग हुसेन के गुनहगार हैं. उनकी जन्मशती है. क्या ग्लानिबोध इतनी अस्थायी सी भटकन होती है कि जल्द ही बिला जाती है? क्या भारतीय परंपरा के उस्ताद हुसेन के सम्मान में ही ऐसा नहीं हो सकता कि लोग उस ड्योढ़ी पर आ पहुंचें. जहां उस महान कलाकार ने अपनी उदासी और अवसाद में एक छतरी रख छोड़ी है जस की तस?

फासीवादी दौर में वरिष्ठ कवि मनमोहन का वक्तव्य

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/18/2015 12:18:00 PM


हिंदी के वरिष्ठ कवि मनमोहन का वक्तव्य। उन्होंने हरियाणा साहित्य अकादमी का 2007-08 में मिला महाकवि सूर सम्मान और इसके साथ मिली 1 लाख रुपये की राशि लौटा दी है। हालांकि, यह राशि उन्होंने तभी नवजागरण आंदोलन के काम में लगी एक संस्था हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति को लौटा दी थी।

देश के हालात अच्छे नहीं हैं। जिन्हें अभी नहीं लगता, शायद कुछ दिन बाद सोचें। जिन लोगों ने नागरिक समाज का ख़याल छोड़ा नहीं है और जिनके लिए मानवीय गरिमा और न्याय के प्रश्न बिल्कुल व्यर्थ नहीं हो गए हैं, उन्हें यह समझने में ज्यादा कठिनाई नहीं होगी कि परिस्थिति असामान्य रूप से चिन्ताजनक है।

हममें से अनेक हैं जिन्होंने 1975-76 का आपातकाल देखा और झेला है। साम्प्रदायिक हिंसा और दलित आबादियों पर जघन्य हमलों की कितनी ही वारदातें पिछले 50 वर्षों में हुई हैं। 1984, 1989-1992 और 2002 के हत्याकांड, फ़ासीवादी पूर्वाभ्यास और नृशंसताएं हमारे सामने से गुजरी हैं। ये सरकार और वो सरकार, सब कुछ हमारे अनुभव में है। फिर भी लगता है कुछ नई चीज़ है जो  घटित हो रही है। पहली बार शायद इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि जैसे राज्य, समाज और विचारधारा के समूचे तंत्र के फ़ासिस्ट पुनर्गठन की किसी दूरगामी और विस्तृत परियोजना पर काम शुरू हुआ है। कोई भोला-भाला नादान ही होगा जो आज के दिन इस बात पर यक़ीन कर लेगा कि नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे, एम.एम. कलबुर्गी जैसे बुद्धिजीवियों की हत्याएं या रक्तपिपासु उन्मत्त भीड़ बनाकर की गई दादरी के अख़लाक़ की हत्या में कोई अन्दरुनी रिश्ता नहीं है या ये कानून और व्यवस्था की कोई स्थानीय या स्वतःस्फूर्त घटनाएं हैं। लगता है, ये सब सिलसिला एक उदीयमान फ़ासिस्ट संरचना का अनिवार्य हिस्सा है। 


इसी के तहत साहित्य, कला-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा और शोध की श्रेष्ठ परंपराओं और तमाम छोटे-बड़े संस्थागत ढांचों को छिन्न-भिन्न और विकृत किया जा रहा है और पेशेवराना साख और उत्कृष्टता के मानदंडों को हिक़ारत से परे धकेलकर इन्हें ज़ाहिल और निरंकुश कूपमंडूकों के हवाले किया जा रहा है। और इसी के तहत सार्वजनिक विमर्शों में और लोगों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में साम्प्रदायिक नफ़रत और विद्वेष का जहर घोला जा रहा है, स्त्रियों और दलितों को `सुधारने` के कार्यक्रम चल रहे हैं, इसी के तहत देशभर में अपराधी फ़ासिस्ट गिरोह `धर्म`, `संस्कृति` और `राष्ट्र` के `कस्टोडियन` बनकर घूम रहे हैं। गांवों और कस्बों में अल्पसंख्यकों, स्त्रियों, दलितों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं पर संगठित हमले कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर उन्हें धमका रहे हैं और अपमानित कर रहे हैं।

लगता है, लोगों का खानपान, पहनावा, पढ़ना-लिखना, आना-जाना, सोच-विचार, भाषा, धार्मिक विश्वास, तीज-त्यौहार, यहां तक कि मानवीय सम्बन्ध, जीवन व्यवहार और रचनात्मक अभिव्यक्ति- सब कुछ यही तय करेंगे। यह बहुत साफ है कि ये लंपट तत्व सत्तातंत्र की गोद में खेल रहे हैं। उन्हें नियंत्रित किया जाए, इसके बजाय लगातार संरक्षण मिल रहा है और उनकी हौसला अफजाई की जा रही है।

फ़ासीवाद मानवद्रोह की मुक़म्मल विचारधारा है। हम जानते हैं कि नवजागरणकालीन उदार, मानववादी, विवेकवादी, जनतांत्रिक और आधुनिक मूल्य परम्पराओं के साथ उनकी बद्धमूल शत्रुता है और इन्हें वह गहरी हिक़ारत और नफ़रत से देखती है। अग्रणी बुद्धिजीवियों, लेखकों, फिल्मकारों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और समाजविज्ञानियों को निशाना बनाए बिना उसका काम पूरा नहीं होता। अब यह स्पष्ट है कि बौद्धिक रचनात्मक बिरादरी की नियति उत्पीड़ित आबादियों, स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों इन सभी के साथ एक ही सूत्र में बंधी है। लड़ाई लंबी और कठिन है। पुरस्कार लौटाना प्रतीकात्मक कार्रवाई सही, पर इससे प्रतिरोध की ताकतों का मनोबल बढ़ा है।

यह दुखद और शर्मनाक है कि जाने-माने रचनाकारों और बुद्धिजीवियों के इस देशव्यापी प्रतिवाद के गंभीर अर्थ को समझने के बजाय सत्ताधारी लोग इसका मज़ाक उड़ाने की और इसे टुच्ची दलीय राजनीति में घसीट कर इसकी गरिमा को कम करने की व्यर्थ कोशिशें कर रहे हैं।

अब जरूरत है कि हम और करीब आएं, मौजूदा चुनौतियों को मिलकर समझें और ज्यादा सारभूत बड़े वैचारिक हस्तक्षेप की तैयारी करें। अगर हमने यह न किया तो इसकी भारी क़ीमत इस मुल्क को अदा करनी होगी।

हम बोलेंगे, लब खोलेंगे: रविभूषण की कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/17/2015 01:05:00 PM


ब्राह्मणवादी ताकतों द्वारा मुसलमानों और दलितों पर और बोलने की आज़ादी पर किये जा रहे फासीवादी हमलों के खिलाफ आलोचक रविभूषण ने ये कविताएं लिखी हैं.  

हम बोलेंगे, लब खोलेंगे

हम बोलेंगे, लब खोलेंगे
यह जोर-जुलुम
गंदी हरकत
यह मार-धाड़, गुंडागर्दी
अक्सर दी जाती जो धमकी
चुप रहने को
चुप नहीं रहेंगे, बोलेंगे
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे।

जो कहता है बेशर्मी से
लिखना बंद करो तुम सब
जो लिखने-कहने से हमको
जो बातें करने से हमको
हैं रोक रहे
वे यह जानें, यह समझें भी
हिटलर ही जब नहीं रहा
तो वे फिर कैसे रह लेंगे?
हम बोलेंगे, हां, बोलेंगे.

जो हमें डरानेवाले हैं
जो हमें झुकाने वाले हैं
जो लाज-शरम सब छोड़ चुके
वे यह जानें, यह समझें भी
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.
हम वंशज हैं जिनके देखो
वे कौन रहे हैं, यह देखो
उनकी बानी-मानी देखो
उनका अड़ना-लड़ना देखो
इतिहास पढ़ो, जानो-समझो
उनकी सब कुर्बानी देखो
हम वंशज हैं किनके देखो
वे लड़ते आए हैं, देखो
कलमों की तुम ताकत देखो
अंग्रेजों से बदमाशों से
वे लड़ते आए हैं देखो
उनका भाईचारा देखो
दुश्मन से ललकारा देखो
हम वंशज हैं जिनके देखो

तुम वंशज हो किनके देखो
नाजी-पाजी को भी देखो
जालिम-कातिल को भी देखो
अपनी पैदाइश तो देखो
जो मार-काट के आदी हैं
तुम वंशज हो उनके, देखो
हम बोलेंगे, तुम जुल्मी हो
हम बोलेंगे, तुम झूठे हो
कहते हो कुछ, करते हो कुछ
नकली-असली के भेद सभी
हम खोलेंगे, हां! खोलेंगे
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.

सच कहना अगर बगावत है
तो समझो हम भी बागी हैं
संसद में जो सब बैठे हैं
उनमें अपराधी, दागी हैं.
तुम नहीं कहीं से राष्ट्रभक्त
इतिहासों में तुम नहीं दर्ज
मालूम नहीं है तुम्हें फर्ज
फुसलाते हो, भरमाते हो
गर्जन-तर्जन करते रहते
फिर मौन साध कर रहते हो
हम नहीं रहे हैं कभी मौन
हां बोलेंगे, लब खोलेंगे.

आपस के भाईचारे को
संगी-साथी सब प्यारे को
जो तोड़ रहे, वे यह जानें
हर जोर-जुल्म के टक्कर में
सदियों से हम लड़ते आए
सदियों से हम मरते आए
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.
यह चाल तुम्हारी नहीं चले
यह दाल तुम्हारी नहीं गले
यह दकियानूसी नहीं चले
यह नफरत-फितरत नहीं चले
हम भेद तुम्हारा खोलेंगे
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.

गंदे को गंदा कहने से
झूठे को झूठा कहने से
शातिर को शातिर कहने से
कातिल को कातिल कहने से
हरदम हमको सच कहने से
तुम रोक नहीं सकते हमको
हम बोलेंगे, हां बोलेंगे.

जो हमें लड़ानेवाले हैं
जो हममें, तुममें, उन सबमें
जो मिल कर रहते आए हैं
नफरत फैलानेवाले हैं
वे ये जानें, ये समझें भी
यह सबका वतन है, सबका वतन
सदियों से हम सब एक साथ
रहते आए हैं, यह जानो!
हम नहीं अकेले हैं, जानो!
हम लड़ती फौजें हैं जानो!
हम लाख-करोड़ों हैं, जानो!
हम लाख-करोड़ों एक साथ
कल अपना मुंह जब खोलेंगे
बोलो, फिर तब क्या होगा?
मानो-जानो, समझो-बूझो
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.
हां बोलेंगे, लब खोलेंगे.

वेश बदल कर वह आया है

देखो भाई
वेश बदल कर वह आया है
फुसलाता-भरमाता है वह
झूठ बोलता
मगर नहीं वह
कहीं तनिक भी है शरमाता
सचमुच वह है भाग्य विधाता?
समझो जानो
क्या लाया है, क्या गाया है?
वेश बदल कर वह आया है।

उसको अब कब पहचानोगे?
असली चेहरा कब जानोगे?
हत्यारा है, जालिम है वह
धोखा देकर, झांसा देकर
हमसे, तुमसे, हां. सबसे वह
लंबे-चौड़े वादे कर-कर
वह गद्दी पर बैठ गया है.
वेश बदल कर वह आया है.
झांसे में उसके रहने से
नाम हमेशा ही जपने से
क्या पाए हो, क्या पाओगे
उसका गीत हमेशा गाकर
जीवन भर बस पछताओगे
बड़बोला है, हांकू है वह
सपनों का विक्रेता है वह
लफ्फाजों का है सरदार
जिसको नहीं किसी से प्यार
घुटा हुआ है, छंटा हुआ है
यहां-वहां वह डटा हुआ है
देखो, वह क्या गाया है, क्या लाया है.
वेश बदल कर वह आया है.

उसकी बोली-बानी देखो
जो कहता है, मानी देखो
बीती सभी कहानी देखो
ऊपर कुछ है, भीतर कुछ है
दोरंगा नहीं, बहुरंगा है
जिसने उसको गद्दी सौंपी
देखो, कैसा पछताया है
वेश बदल कर वह आया है.  

झांसा देना उसकी फितरत
फिर भी देखो, कैसी शोहरत
हाथों का लहराना देखो
आंखों का चमकाना देखो
समझो-बूझो
कैसा संदेशा लाया है
वेश बदल कर वह आया है.

घर से हरदम बाहर है वह
लेकिन
घर-घर जपता है वह
कभी नहीं भी थकता है वह
उसका जुमला-हमला देखो
बातूनी की चुप्पी देखो
सब पर भारी, दहला देखो
गरज-गरज कर वह आया है.
वेश बदल कर वह आया है.
उसको देखो, जानो, समझो
चूक गए इस समय अगर तुम
अपना जीवन ही तुम जानो
जो गाया है, पछताया है.
देखो भाई!
वेश बदल कर वह आया है.

ब्राह्मणवाद और श्रमणवाद

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/16/2015 06:45:00 PM



ब्राह्मणवाद और श्रमणवाद की प्रतिद्वंद्वी परंपराओं पर राम पुनियानी का लेख. लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।

हिंदू धर्म और विशेषकर ब्राह्मणवाद व श्रमणवाद के साथ उसके रिश्तों के संबंध में कई भ्रांतियां हैं। ‘हिंदुत्व’ शब्द ने इस भ्रांति में इज़ाफा ही किया है। हिंदुत्व, धर्म के नाम पर की जा रही राजनीति का नाम है।

‘हिंदू’ शब्द, आठवीं सदी ईस्वी में अस्तित्व में आया। मूलतः, यह एक भौगोलिक अवधारणा थी। इस शब्द को गढ़ा अरब देशों व ईरान के निवासियों ने, जो तत्समय भारतीय उपमहाद्वीप में आए। उन्होंने सिंधु नदी को विभाजक रेखा मानकर, उसके पूर्व में स्थित भूभाग को सिंधु कहना शुरू कर दिया। वे सिंधु का उच्चारण हिंदू करते थे और इसलिए, सिंधु नदी के पूर्व में रहने वाले सभी निवासियों को वे हिंदू कहने लगे। उस समय, इस ‘हिंदू’ देश में कई धार्मिक परंपराएं थीं। आर्य-जो कई किस्तों में यहां आए-पहले घुमंतु और बाद में पशुपालक समाज बन गए। वे कभी भी राष्ट्र-राज्य नहीं थे, जैसा कि अब कहा जा रहा है। वेद और स्मृतियां, पशुपालक आर्य समाज के जीवन और उनकी विश्वदृष्टि का वर्णन करते हैं।

उस समय के सामाजिक तानेबाने का वर्णन मनुस्मृति में किया गया है। पहले पदक्रम आधारित वर्ण व्यवस्था और बाद में जाति व्यवस्था, इस सामाजिक तानेबाने का मूल आधार थीं। ब्राह्मणों के वर्चस्व पर इस समाज में कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता था और सामाजिक असमानता, इसका अभिन्न हिस्सा थी। दमित जातियों (दलितों) को अछूत माना जाता था और उनका एकमात्र कर्तव्य ऊँची जातियों की सेवा करना था। दूसरे वर्णों के अधिकार और सामाजिक स्थिति भी सुपरिभाषित थी। ऊँची जातियों के केवल अधिकार थे और दमित जातियों के केवल कर्तव्य। यह स्पष्ट ‘श्रम विभाजन’ था!

इस पृष्ठभूमि में, बौद्ध धर्म का उदय हुआ जो अपने साथ समानता का संदेश लाया। समाज का बड़ा हिस्सा समानता के मूल्य से प्रभावित हुआ और उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। आंबेडकर का मानना है कि बौद्ध धर्म का उदय, एक क्रांति थी। इसने सामाजिक समीकरणों को बदल दिया और जातिगत ऊँच-नीच को चुनौती दी। उस समय ब्राह्मणवाद के समानांतर अन्य धार्मिक परंपराएं भी अस्तित्व में थीं। बौद्ध धर्म द्वारा जाति व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने के कारण, ब्राह्मणवादियों को अपनी रणनीति में परिवर्तन करना पड़ा। ब्राह्मणवाद ने आमजनों को बौद्ध धर्म के आकर्षण से मुक्त करने और अपने झंडे तले लाने के लिए कई धार्मिक अनुष्ठानों, सार्वजनिक समारोहों और उपासना पद्धतियों का आविष्कार किया। इसके बाद से इस धर्म को हिंदू धर्म कहा जाने लगा। जैसे-जैसे बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा, ब्राह्मण भूपतियों का नीची जातियों पर नियंत्रण कमज़ोर होता गया। शंकराचार्य के नेतृत्व में बौद्ध धर्म को वैचारिक चुनौती देने के लिए एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ। आंबेडकर इस आंदोलन को प्रतिक्रांति बताते हैं। बौद्ध धर्म पर इस हमले को पुश्यमित्र शुंग और शशांक जैसे तत्कालीन शासकों का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। इस आंदोलन के फलस्वरूप, बौद्ध धर्म, धरती के इस भूभाग से लुप्तप्राय हो गया और प्रकृति पूजा से लेकर अनीश्वरवाद तक की सारी धार्मिक परपंराएं, हिंदू धर्म के झंडे तले आ गईं। यह एक ऐसा धर्म था, जिसका न कोई पैगंबर था और ना ही कोई एक ग्रंथ। ब्राह्मणवाद ने जल्दी ही हिंदू धर्म पर वर्चस्व स्थापित कर लिया और अन्य धार्मिक परंपराओं को समाज के हाशिए पर खिसका दिया। यह वह समय था जब हिंदू को एक धर्म के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान मिली। हिंदू धर्म में दो मुख्य धाराएं थीं-ब्राह्मणवाद व श्रमणवाद। इन दोनों धाराओं के विश्वास, मूल्य और आचरण के सिद्धांत, परस्पर विरोधी थे।

ब्राह्मणवाद ने, जो जातिगत और लैंगिक पदक्रम पर आधारित था, अन्य सभी परंपराओं का, जिन्हें संयुक्त रूप से श्रमणवाद कहा जा सकता है, दमन करना शुरू कर दिया। इन परंपराओं, जिनमें नाथ, तंत्र, सिद्ध, शैव, सिद्धांत व भक्ति शामिल थे, के मूल्य ब्राह्मणवाद की तुलना में कहीं अधिक समावेशी थे। श्रमणवाद में आस्था रखने वाले अधिकांश लोग समाज के गरीब वर्ग के थे और उनकी सोच व परंपराएं, ब्राह्मणवादी सिद्धांतों, विशेषकर जातिगत ऊँच-नीच, की विरोधी थीं। बौद्ध और जैन धर्म में भी जातिगत पदानुक्रम नहीं हैं व इस अर्थ में वे भी श्रमणवादी परंपराएं हैं। परंतु जैन और बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म का भाग नहीं हैं क्योंकि इन दोनों धर्मों के अपने पैगंबर हैं और उनमें व हिंदू धर्म में सुस्पष्ट विभिन्नताएं हैं।

इतिहासविद रोमिला थापर ("सिंडीकेडेट मोक्ष", सेमीनार, सितंबर 1985) लिखती हैं "ऐसा कहा जाता है कि आज के हिंदू धर्म की जड़ें वेदों में हैं। परंतु वैदिक काल के घुमंतु कबीलों का चाहे जो धर्म रहा हो, वह  आज का हिंदू धर्म नहीं था। इसका (आज का हिंदू धर्म) का उदय मगध-मौर्य काल में प्रारंभ हुआ...।"

उन्नीसवीं सदी के बाद से, ब्राह्मणवाद के वर्चस्व में और वृद्धि हुई। चूंकि ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के लिए विभिन्न स्थानीय परंपराओं और हिंदू धर्म के विविधवर्णी चरित्र को समझना मुश्किल था, इसलिए उन्होंने ब्राह्मणों का पथप्रदर्शन स्वीकार कर लिया और ब्राह्मणवाद को ही हिंदू धर्म मान लिया। धार्मिक मामलों में ब्रिटिश शासकों के सलाहकार वे ब्राह्मण थे, जो अंग्रेज़ों की नौकरी बजाते थे। ये ब्राह्मण अपने गोरे आकाओं को यह समझाने में सफल रहे कि भारत के बहुसंख्यक निवासियों के धार्मिक विश्वासों को समझने की कुंजी, ब्राह्मणवादी ग्रंथों में है। नतीजे में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म को समझने के लिए ब्रिटिश केवल ब्राह्मणवादी ग्रंथों का इस्तेमाल करने लगे। इससे हिंदू धर्म पर ब्राह्मणवाद का चंगुल और मज़बूत हो गया और परस्पर विरोधाभासी मूल्यों वाली विविधवर्णी परंपराओं पर हिंदू धर्म का लेबल चस्पा कर दिया गया। और इस हिंदू धर्म में ब्राह्मणवाद का बोलबाला था। यही कारण है कि आंबेडकर ने हिंदू धर्म को ब्राह्मणवादी धर्मशास्त्र बताया।

ब्रिटिश शासन में उद्योगपतियों व आधुनिक, शिक्षित वर्ग के नए सामाजिक समूहों के उभार ने ज़मींदारों और पूर्व राजा महाराजाओं-जो ब्राह्मणों के हमराही थे-में असुरक्षा का भाव उत्पन्न किया। जैसे-जैसे यह लगने लगा कि देश में देरसबेर समानता पर आधारित प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था लागू होगी, ये वर्ग और सशंकित व भयभीत होने लगे। राष्ट्रीय आंदोलन का उदय हुआ और साथ ही दलितबहुजन आंदोलन का भी। जोतिराव फुले और बाद में आंबेडकर ने इन मुक्तिदायिनी विचारधाराओं को मज़बूती दी। दलित बहुजनों में जागृति, ब्राह्मणवाद के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरने लगी। बुद्ध की शिक्षाएं, पूर्व शासकों, ब्राह्मणों और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा बन गईं। दलितबहुजन विचारधारा को आधुनिक शिक्षा और औद्योगीकरण से और बल मिला।

इस चुनौती से मुकाबला करने के लिए ज़मीदार-ब्राह्मण गठबंधन ने हिंदुत्व को अपना हथियार बनाया। उन्होंने पहले यह कहना शुरू किया कि दलितबहुजनों को शिक्षा प्रदान करना, 'हमारे धर्म' के विरूद्ध है। आगे चलकर उन्होंने अपने सामाजिक-राजनैतिक हितों की रक्षा के लिए धर्म-आधारित राजनैतिक संगठनों का गठन किया। हिंदुत्व, दरअसल, नए कलेवर में हिंदू राष्ट्रवाद और ब्राह्मणवाद का राजनैतिक संस्करण है। ब्राह्मणवादी पहले हिंदू धर्म के नाम पर दलितबहुजनों का दमन करते थे। अब वे यही काम हिंदुत्व के नाम पर कर रहे हैं। सभी गैर-मुस्लिम व गैर-ईसाई परंपराओं जैसे बौद्ध धर्म, जैन धर्म व सिक्ख धर्म को हिंदुत्व में आत्मसात कर लिया गया है। यह हिंदू धर्म का राजनीतिकरण है और इसका धर्म से कोई लेनादेना नहीं है।

बुद्ध से लेकर मध्यकालीन भक्ति परंपरा और वहां से लेकर फुले और आंबेडकर के नेतृत्व में चले आंदोलनों तक, दलितबहुजन, वर्ण और जाति व्यवस्था का विरोध करते आए हैं। आज भाजपा-आरएसएस के सत्ता में आने से हिंदुत्ववादी और खुलकर दमित जातियों के हित में उठाए जाने वाले कदमों का विरोध कर रहे हैं।

दलितबहुजन विचारधारा का विकास तीन प्रमुख चरणों में हुआ और इसके तीन प्रमुख विरोधी थे। बौद्ध धर्म का विरोध शंकराचार्य और तत्कालीन शासकों ने किया; मध्यकालीन संतों का विरोध ब्राह्मण पुरोहित वर्ग ने ब्रिटिश शासकों के सहयोग से किया; और फुले, आंबेडकर की विचारधारा का विरोध, राजनैतिक ब्राह्मणवाद या हिंदुत्व कर रहा है।

दमित जातियों (दलितबहुजन) की गैर-ब्राह्मणवादी परंपराएं, विद्रोह और प्रतिरोध की परंपराएं हैं, जिनकी भाषा, संदर्भ के साथ बदलती रही हैं। आज उनका मुकाबला उस विचारधारा से है, जो उन्हें हिंदुत्व के नाम पर कुचलना चाहती है। वह अलग-अलग तरीकों से दलितबहुजनों के हितों पर चोट करने का प्रयास कर रही है।

दलितों का मंदिर प्रवेश आंदोलन: दिमागी गुलामी या मानवाधिकारों का प्रश्न

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/13/2015 12:04:00 AM

हमीरपुर का वह मंदिर जहां 30 सितंबर को दाखिल होने की कोशिश में दलित बुजुर्ग चिम्मा को जिंदा जला दिया गया.


विद्या भूषण रावत

दो वर्ष पूर्व बर्मिंघम में घूमते हुए हमारे मित्र देविन्दर चन्दर जी ने बताया कि कैसे इंग्लैंड के कई पुराने और ऐतिहासिक चर्च अब खाली पड़े हैं और सिख उन्हें खरीद रहे हैं। इन गिरजों में अब कोई क्यों नहीं जाता ये समझना जरूरी है और क्या सिखों द्वारा गुरुद्वारा बना लेने से कोई अंतर उसमें आ जाएगा क्योंकि ये केवल धनाढ्य सिख धार्मिक नेताओं को ही मजबूत करेंगे और उसके अलावा उस समाज के किसी भी सेक्युलर तबके को आकर्षित नहीं कर पाएंगे।

जैसे जैसे कोई समाज सभ्यता और स्वतंत्र सोच की ओर अग्रसर होता है उसे भगवानों, पुजारियों और पूजास्थलों की आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि वह अपनी स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए अपने पसन्दीदा साहित्य और मनोरंजन को ढूंढ़ता है और धर्म और उसकी किताबें उसे अपनी आज़ादी पर बंदिश लगाने वाली नज़र आती हैं। सिख समाज जरूर पैसे से मजबूत है लेकिन धार्मिक नेतृत्व के चलते उनका बहुत नुक्सान भी हुआ है और अभी भी सिख अपने धार्मिक कठमुल्लाओं के खिलाफ बहुत मज़बूती से नहीं बोल पाए हैं। पश्चिम में समाज ने आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक तरक्क़ी की है इसलिए व्यक्ति अपने जीने के लिए पुस्तकों और प्रकृति की ओर ज्यादा दौड़ता है बजाए पूजास्थलों की ओर जाने के।

ये बात लिखने का आशय यह है कि भारत में मंदिरों में प्रवेश को लेकर कई प्रकार के आंदोलन चल रहे हैं। बहुत से 'संतों' और 'क्रांतिकारियों' ने दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए कई स्थानों पर आंदोलन किए लेकिन इन सभी में नेतृत्व करने वाले 'महात्मा' तो पुरस्कृत और महान हो गए लेकिन दलितों को अपमान और हिंसा ही सहनी पड़ी क्योंकि अधिकांश आंदोलन प्रतीकात्मक थे और उनसे बहुत बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि जब धार्मिक विचारधारा और उसमें व्याप्त कुरीतियां, अन्धविश्वास, जातिवाद, छुआछूत पर हमला नहीं होगा तो मंदिर प्रवेश ब्राह्मणवाद और हिन्दूवाद को ही मज़बूत करेगा।

पिछले महीने मैं जौनसार (उत्तराखंड) क्षेत्र में था जहाँ दलितों को कई स्थानीय मंदिरो में प्रवेश पर प्रतिबन्ध है। इस इलाके में दलित अल्पसंख्यक हैं और विकास की धारा से यह क्षेत्र अभी कोसों दूर है। वैसे यहाँ पर राजनीतिक नेतृत्व ने हमेशा से लोगों की अज्ञानता का आनंद उठाया है क्योंकि अविभाजित उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड बनने तक आदिवासी नेतृत्व के नाम पर इस क्षेत्र का एक मंत्री अवश्य बनता है लेकिन उनको भी यहां की असमानता और भेदभाव नज़र नहीं आता। जब हमने वहां मौजूद लोगों से बात की तो अधिकांश साथियों को आंबेडकर नाम का पता तो था लेकिन उनके विचार क्या थे उसका दूर दूर तक अंदाज नहीं था। एक आंबेडकरवादी कम से कम अपनी गरीबी के बावजूद विद्रोह का झंडा बुलंद रखता है लेकिन यहाँ नौजवानों में मैं मंदिर प्रवेश के लिए उतावलापन देख रहा था ना कि वर्ण व्यस्था के लिए कोई घृणा। इसलिए जन समस्याओं को लेकर एक मित्र ने जब बड़ा सम्मेल्लन बुलाया था तो उसमें कई स्थानीय मुद्दे सामने आये लेकिन सभी ने शराबबंदी और मंदिर प्रवेश को मुख्य मुद्दा बताया। मेरी दृष्टि में ये प्रश्न ही नहीं हैं और दलितों को शाकाहारी ब्राह्मणवादी चालों में घसीटने की कोशिश है क्योंकि सांस्कृतिक और स्थानीय आदतों पर हम अपनी वैष्णववादी सोच लागू कर असली समस्याओं से ध्यान भटका देते हैं।

जौनसार का सम्पूर्ण इलाका अनुसूचित जनजाति क्षेत्र घोषित है। देहरादून से करीब 70 किलोमीटर आगे चकराता, कलसी, विकशनगर आदि के इलाके जौनसार कहलाता है। पूरा इलाके में दलितों पर अत्याचार होता है और मंदिरों पर उनके प्रवेश पर पाबंदी है। सबसे खतरनाक बात यह है कि अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम यहाँ लागू नहीं होता क्योंकि पूरा इलाका आदिवासी क्षेत्र माना जाता है लेकिन ये आज से नहीं बल्कि उस समय से है जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था और राज्य सरकारों ने कभी कोशिश नहीं की कि इसे ठीक से समझा जाए और इसमें बदलाव लाया जाए। क्योंकि इलाका आदिवासियों का था इसलिए मांग उठी थी कि इसे आदिवासी इलाका घोषित किया जाए, लेकिन अधिकारियों और राजनेताओं की चालबाजी का नतीजा था कि उन्होंने इस कमी की ओर ध्यान नहीं दिया और लिहाज़ा दलितों और आदिवासियों को इसका नुकसान भुगतना पड़ रहा है क्योंकि आरक्षण का लाभ इस क्षेत्र के सवर्ण उठा रहे हैं लेकिन क्षेत्र के आदिवासी नेता मंत्री कभी इस प्रश्न को नहीं उठाते।

इसीलिए मैं हमेशा से कहता रहा हूँ कि समस्याओं के अति सामान्यीकरण से बहुत नुकसान होता है। जौनसार क्षेत्र का राजनैतिक नेतृत्व अपने को आदिवासी कहता है लेकिन यहाँ के दलितों पर हो रहे अत्याचार और इलाके में मौजूद अन्धविश्वास को अपनी संस्कृति बनाकर इस्तेमाल कर रहा है। पूरे क्षेत्र को आदिवासी जनजाति घोषित करने का अर्थ ये है कि यहाँ रहने वाले हिन्दू सवर्ण सभी संवैधानिक तौर पर आदिवासी घोषित हो गए और वो सारे लाभ ले रहे हैं जो अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष तौर पर संविधान में बनाए गए हैं। दुखद और खतरनाक बात यह है कि सवर्णों के अत्याचार पर दलित अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम का सहारा नहीं ले सकते लिहाज़ा दलितों पर अत्याचारों की कोई रिपोर्टिंग भी नहीं होती। वैसे एक सूचना के मुताबिक एक संसदीय समिति ने पूरे इलाके को आदिवासी घोषित कर सभी लोगों को आरक्षण का लाभ देने का विरोध किया है लेकिन न उस रिपोर्ट का कुछ पता, ना ही सरकार की उसमें कोई दिलचस्पी दिखाई देती है।

जब मैं युवाओं से बात कर रहा था तो मैंने उनसे पूछा कि मंदिर प्रवेश क्यों बड़ा मुद्दा है? भाई, अगर सवर्णों को अपने मंदिरों में गर्व है और वो दलितों को अपने मंदिरों में नहीं आने देना चाहते तो वो यही साबित कर रहे हैं कि दलित हिन्दू नहीं है, क्योंकि आप यदि हिन्दू हैं तो आपको मंदिर प्रवेश का अधिकार है। मैं इस सवाल को दो तरीको से देखता हूँ। एक तो व्यक्ति के अधिकार का मामला क्योंकि आधिकारिक तौर पर दलित हिन्दू हैं और भारत के संविधान ने छुआछूत को गैरकानूनी घोषित किया है इसलिए दलितों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को साफतौर पर क़ानूनी सहमति है और उसे कोई ताकत रोक नहीं सकती क्योंकि धर्मस्थल सार्वजनिक सम्पति हैं और लोगों को पूजा के उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। ये एक मानवाधिकारों की लड़ाई है और भारतीय संविधान की पूरी ताकत उनके साथ है।

लेकिन एक आंबेडकरवादी नज़रिये से जब हम इन चीजों को देखते हैं तो बाबा साहेब के मिशन का ध्यान आता है जब उन्होंने लोगों से गुलामी की जंजीरो को तोड़ने के लिए कहा था, बाइस प्रतिज्ञाएं करवाई थीं और लाखों लोगों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया था। इसलिए बहुत बड़ी जिम्मेवारी लोगों के ऊपर भी है कि वे अपनी मानसिक गुलामी को तोड़ने में कामयाब होते हैं या नहीं। हम अगर सारी उम्मीदें राजसत्ता के ऊपर लगाकर चैन की नींद सोना चाहते हैं तो ये समझना होगा कि मनुवादी सोच के मठाधीशों को मानववादी सोच के संविधान की 'रक्षा' का दायित्व है इसलिए दलितों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को सरकार असहायता से देख रही है क्योंकि सारे जौनसार के हिन्दू अब दलितों के मंदिर प्रवेश को रोकना चाहते हैं।

सवाल इस बात का है कि क्या वाकई हिन्दू दलितों के मंदिर प्रवेश को रोकना चाहते हैं? मैं ये मानता हूँ कि हिन्दू दलितों को भिखारी के तौर पर देखना चाहते हैं न कि इज्जत और बराबरी का हक़ लेकर अपनी शर्तों वाले व्यक्ति के तौर पर। इसलिए अगर झुककर, छुपकर आप मंदिर में घुस गए तो कुछ समस्या नहीं है लेकिन यदि अपनी पहचान के साथ इज्जत के साथ जाओगे तो वर्णव्यवस्था को खतरा है।

खतरा असल में मंदिर प्रवेश से नहीं अपितु दलितों में बढ़ रही जातीय अस्मिता से है क्योंकि ये जानते हैं कि दलितों और पिछड़ों के गए बिना हिन्दुओं के मंदिर खाली पड़ जायेंगे और उनमें जाने वाले नहीं मिलेंगे। आज दलित हिन्दू केवल उनकी आबादी को बड़ा दिखाने के लिए हैं, अन्यथा हिन्दू व्यवस्था में उनका कोई सम्मान नहीं है। इसीलिए बाबासाहेब आंबेडकर ने उन्हें बुद्ध की शरण में जाने की सलाह दी क्योंकि उस जगह जबरन घुसने का कोई मतलब नहीं जहाँ दिल के दरवाजे बंद हैं और दुनियाभर का छलकपट मौजूद हो। आज भी हिन्दू समाज और उनके राजनैतिक संगठनों ने समाज बदलने का कोई प्रयास नहीं किया और न ही छुआछूत के विरुद्ध कोई आंदोलन किया। दलितों के घर में एक दिन आकर मेला लगाने और तथाकथित रोटी खा लेने भर से समाज में व्याप्त कुरीतियां नहीं जाने वाली क्योंकि जातियों को वोट बटोरने तक ही सीमित कर दिया गया है। अभी भी हमारे नेता खाप पंचायतों के विरुद्ध बात करने को तैयार नहीं हैं। आखिर हिन्दुओं को अगर दलितों के साथ रहने में दिक्कत है तो दलित उनके साथ रहने को क्यों लालायित रहें?

आज जौनसार का दलित आरक्षण का लाभ भी नहीं ले पा रहा लेकिन मुझे दुःख हुआ जब मैंने कुछ नौजवानों से कहा कि उन्हें मंदिर में जाने के बजाये संविधान को पढ़ना चाहिए ताकि वे अपनी लड़ाई लड़ सकें। मनुवादियों की शरण में जाकर दलितों का उद्धार नहीं हो सकता। भगवान और पुरोहितवाद बराबरी और मानवता के दुश्मन हैं और वे अब बदलने वाले नहीं हैं और डंडे के बल पर आप मंदिर चले भी गए तो क्या करोगे जब पूरा साहित्य और धर्म ग्रन्थ आपको गरियाते नहीं थकते। इसलिए अगर आप हिन्दू हैं तो आपके मंदिर जाने के हक़ का मैं समर्थन करता हूँ और यदि नहीं तो आप अब चिंता छोड़िए। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों या चर्चों में दलितों की आज़ादी नहीं छिपी है। अगर दलितों की आजादी कही है तो वो है बाबा साहेब के तर्कवादी मानववादी दर्शन में और उनके बनाए संविधान में जो मनुवादी समाज की आँख का कांटा बना हुआ है इसलिए उसको बचाने की हमारी जिम्मेवारी कहीं बड़ी है। यकीन मानिए आप मंदिर प्रवेश करके अपने इमोशन को तो बचा पाएंगे लेकिन आप मनुवाद को ही मज़बूत कर रहे हैं जो दिल से कभी बराबरी नहीं चाहता। यदि उत्तराखंड के जौनसार या किसी भी हिस्से के हिन्दू दलितों को मंदिर प्रवेश के लिए आंदोलन करें तो हम कहेंगे कि बातों पर विचार करो, लेकिन दलितों को अपने मंदिर प्रवेश के लिए खुद ही लड़ाई लड़नी पड़े और फिर मनुवादी ताकतें उनको मार काटने के लिए तैयार खड़ी हों तो ऐसे लड़ाई का कोई लाभ नहीं क्योंकि ये तो ब्राह्मणवाद के हाथों में खेलना है। याद रहे आपका जीवन महत्वपूर्ण है और उसको सही दिशा में ले जाइये। मंदिरों या पूजास्थलों में जाना बंद करें और चढ़ावे को अपने बच्चो की शिक्षा में लगाएं तो भला होगा। यकीन मानिए, दलित जिस दिन पोंगा पंडितों और मंदिरों के पास जाना बंद कर देंगे इन मंदिरो पे ताले पड़ जाएंगे और वे ज्यादा आज़ाद ख्याल रहेंगे और उनपर कोई अत्याचार भी नहीं होगा।

उत्तराखंड की सरकार और दोनों सवर्णवादी पार्टियों से मैं यही कहूँगा के वे दोगली राजनीति बंद करें। वो साफ़ करें कि एक नागरिक क्या अपने धर्मस्थल में नहीं जा सकता? यह सरकार का दायित्व है कि लोगों को भयमुक्त प्रशासन दे ताकि सभी अपनी इच्छा अनुसार पूजा अर्चना कर सके। सरकार लोगों को पूजास्थल में प्रवेश करने से न तो रोक सकती है और ना ही उन्हें धार्मिक गुंडों के हवाले छोड़ सकती है। यदि 60 वर्ष बाद भी एक व्यक्ति अपने पूजा अर्चना के अधिकार से वंचित है तो धिक्कार है इस व्यवस्था का और हमारे राजनेताओं पर। राज्य सरकार का यह उत्तरदायित्व है कि पूरे प्रदेश में छुआछूत और जातिवाद के विरुद्ध एक बड़े कार्यक्रम की घोषणा करे ताकि ऐसी घटिया मानवविरोधी मानसिकता समाज में न पनपे और सभी लोग सम्मान के साथ जीवन यापन कर सकें।

हरियाणा में भगाना के लोगों ने मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर हिन्दू धर्म का परित्याग किया। कई बार उनलोगों को धमकी भी मिली लेकिन लोग डिगे नहीं और उन्होंने अपना रास्ता अख्तियार किया क्योंकि वहां की सरकार दलितों को सम्मान और सुरक्षा देने में पूरी तरह विफल रही। हम केवल इतना कहना कहना चाहते हैं कि स्वतंत्र भारत का संविधान दलितों को मंदिर प्रवेश की आज़ादी देता है और उनकी सुरक्षा और आपसी भाईचारा बनाने की जिम्मेवारी सरकार की है न कि दलितों की। अतः उनको अपनी जायज मांग रखने का हक़ है।

गाँव भीतर गाँव: सत्यनारायण पटेल

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/11/2015 01:08:00 PM


एक ऐसे वक्त में, जब जानवरों के नाम पर फासीवाद के हाथ में खेलती हत्यारी भीड़ इंसानों का पीछा और कत्ल करती फिर रही है, सत्यनारायण पटेल के उपन्यास गांव भीतर गांव का एक अंश.
 
 

-कैसे टाणी करूँ..? क्या टाणी करूँ..? झब्बू सोच में पड़ गयी। पर कुछ भी ढंग-ढोरे का नहीं सूझ रहा ।

वह कैलास के झोपड़े में रहने तो लगी। सिलाई का काम-काज करने लगी। कामकाज भी ठीक-ठाक चलने लगा।। मगर फिर भी सब कुछ ठीक कहाँ ! ज़हन में तो कैलास की यादों की ख़ुशबू महक़ती, मगर झोपड़े में, हर चीज़ पर एक दूसरी ही गँध काबिज़, जो झब्बू को बर्दाश्त नहीं । गँध बहुत तीव्र। ताक़तवर। झब्बू समझ नहीं पा रही। गँध को अपने झोपड़े, घर में आने से कैसे रोके…? कैसे खदेड़े..? गँध ने झब्बू की नाक में दम कर दिया। घर की हर चीज़ पर कब्ज़ा कर लिया। झब्बू नहीं चाहती, कैलास की स्मृति पर, ख़ुशबू पर, गँध या किसी का भी कब्ज़ा हो।

झब्बू सोचती कि क्या करूँ..? नीम से दूर कहीं चली जाऊँ..!  पर कहाँ..? काँकड़ पर झोपड़ा ठोंक लूँ..? पर ज़्यादा दूर जाऊँगी.. तो अकेली पड़ जाऊँगी। फिर वहाँ कपड़े सिलवाने कौन आयेगा..!

फिर एक क्षण को झब्बू के मन में ख़याल आया, होंठ हिले, बुदबुदाने लगी- क्यों न ऎसा करूँ..? श्यामू व रामरति के झोपड़ों से आगे..। तालाब तरफ़..! झोपड़ा ठोंक लूँ..!

फिर दूसरे ही क्षण हवा का तेज़ झोंका आया। झोंका जैसे सीधा रामरति के झोपड़े के आगे से, तालाब किनारे से आया। झब्बू के चेहरे से टकराया। नकसुर में घुसा। झब्बू का जी मिचला उठा। मुँह बनाती। मन ही मन पहले क्षण के ख़याल को ख़ारिज करती- ‘ नी..नी.. उधर ठीक नी ।’ ख़ुद से कहने लगी- उधर मरे ढोरों की चीर-फाड़ करते। खाल उतारते। ढोरों के बड़े-बड़े कँकाल पड़े रहते। गिद्ध मंडराते। भयानक बदबू आती। उधर कैसे रहूँगी..?

जब कैलास था, सब कुछ ठीक था। नीम अच्छा था, नीम की छाँव अच्छी थी। नीम की निबोलियाँ अच्छी थी। जब पकती, तो पीली पट्ट और मीठी चुक हो जाती। झब्बू ही क्या… झोपड़े तरफ़ के छोरे-पोरे सभी नीम की निबोलियाँ खाते। गर्मी के दिनों में नीम की छाँव में खाट ढाल सो जाते।

नीम से कुछ दूर बबूल अच्छा था, उसकी छाँव अच्छी थी। लेकिन अब न नीम, न बबूल और न उनकी छाँव अच्छी थी। गँध ने नीम, बबूल की छाँव पर भी कब्ज़ा कर लिया। निबोलियों का स्वाद बदल दिया। नीम की छाँव में खाट ढाल सोना तो दूर, कोई भला मानुष पल, दो पल रुके भी नहीं..।

वह गँध किसी इत्र की नहीं । न खाळ ( बरसात में बहने वाला नाला ) किनारे खड़ी बेसरम के फूल की, न बबूल, खेजड़ी के जाल्यों पर छायी, तुरई, गिल्की, लौकी, करेले, किकोड़े, तिंदोरी की बेलों और उनके फूलों की, बेलों पर झूलती कच्ची-पकी साग-भाजी की भी नहीं, न लावारिस उगे गेंदों की। न खाळ में शौच के बाद सूखते मल की। न शौच के मल में गये बीजों से उगे टमाटर, बैंगन आदि के फूलों की। गँध थी नयी, और देशी दारू की।

न..! झब्बू दारू न पीती। न छूती। दारू तरफ़ देखती भी नहीं। फिर भी झोपड़े में हर समय, दारू की गँध महसूस होती। उसका घर झोपड़ा था, तो क्या हुआ..! था तो उसका घर..! कैलास की यादों का ताज़महल। घर में पनहरी पर, गारे की गागर में, भाँडे में, गोळी में, चकल्ये ( मिट्टी का एक बर्तन ) में, यानी पनहरी पर रखे हर बर्तन में, जैसे पीने का पानी नहीं, बल्कि दारू भरी हो। घर का आँगन, भींत और सब कुछ पीली मिट्टी से लिपा-छबा था। पर जैसे पीली मिट्टी के लदेड़े को भाँज और देशी दारू में साँध कर लिपाई-छबाई की थी। घर की गुदड़ियाँ, चादर, बारसाख पर झूलता परदा और हरेक कपड़ा जैसे देशी दारू में भीगा हुआ हो। झब्बू का पूरा घर या झोपड़ा, जो भी समझो..। पूरा का पूरा दारू के एक भपके-सा गँधाता। और यह हाल सिर्फ़ झब्बू के घर का ही नहीं, बल्कि उसकी पड़ोसने चँदा, फूँदा, धापू आदि के झोपड़े जैसे घरों के भी थे।

कैलास के रहते, गाँव में कलाली न थी। उसके सिधार जाने के बाद, जब झब्बू मायके गयी थी। तब भी न थी। जब झब्बू मायके से लौटी, तो थी। यानी उसके मायके में रहने के दौरान ही कभी कलाली खुली। खुली, तो खुली। झब्बू के बाप का क्या लेती..! शुरुआत में झब्बू ने यही सोचा, और कलाली को देखी-अनदेखी कर दी। ग़ौर न किया। कलाली झब्बू के झोपड़े के ठीक सामने, या नीम के नीचे न थी। कुछ दूर, बबूल के पास तिकोने पर, धापू बागरन के झोपड़े के ठीक सामने थी। कलाली के पीछे बबूल। बबूल के पीछे खाळ, और खाळ के किनारे, और भीतर जहाँ-जहाँ तक पानी सूखा था, फिर वही सब था।   

वह गाँव के इतिहास में पहली कलाली थी। वह अकेली झब्बू का नहीं, बल्कि पूरी बाखल की औरतों का सिर दर्द थी। फिर भी झब्बू कुछ ज़्यादा परेशान थी, क्योंकि उसके घर सामने नीम था। कलाली के सामने जगह तो चौड़ी थी, पर छाँव न थी। ठीक पीछे बबूल था, जिसकी छाँव खाळ तरफ़ ज़्यादा रहती। कुछ लोग जो आड़े-छुपके पीने वाले थे, या नयी उम्र के किशोर जो पीना सीख रहे थे, वे भले ही कलाली के पीछे आड़ में चले जाते। वे खाळ से उठती सूखते मल, कीचड़, गोबर और लावारिस झाड़ियों की गँध की परवाह न करते और बबूल की छाँव में पीने बैठ जाते।

लेकिन जो जमे-ठमें और पुराने पियक्कड़ थे, वे बबूल की छाँव में न बैठते। वे अद्धा-पव्वा ख़रीदते और नीम नीचे आकर बैठ जाते। पीने वाले न सुबह, दोपहर और साँझ देखते। जब फुरसत होती। मज़दूरी मिली होती, या गाँव के किसी ठाकुर, पटेल आदि ने मेहरबानी की होती। पीने का जिसे मौक़ा मिलता, न चुकता। नीम की छाँव में बोतलें खुलती- किचिर्रर्र किर्रर्र..। हवा में गँध घुलती। हवा के साथ झोपड़े में घुसती, और फिर..फिर पहले से मौजूद गंध को और समृद्ध करती। एक मज़मा उठता, दूसरा जमता। दूसरा उठता, तीसरा जमता।

झब्बू को मज़मे पसंद नहीं, क्योंकि जब मज़मा जमता। नीम नीचे का महौल ही बदल जाता। फिर आदमी अमीर हो या ग़रीब हो। किसान हो या मज़दूर हो। अद्धा पीता या पाव। पाँव और ज़िबान लड़खड़ाते। खोपड़ी पर अजीब-अजीब से ख़याल तारी होते। आदमी बेख़याली की खाई में गिरता-उठता। ज़ोर-ज़ोर से उघड़ी-उघड़ी बातें करता। आदमी से कुछ कम रह जाता आदमी।

चूँकि झब्बू कपड़े सिलती। उसके पास औरतों का आना-जाना लगा रहता। दारूकुट्टे आती-जाती पर फिकरा मारने से भी न चुकते। जब फिकरे की चोंट किसी की छाती या कूल्हे पर पड़ती। काँटा-सा चुभता। कोई सोचती कि दारूकुट्टों के मुँह कौन लगे ! और अपना काम कर लौट जाती। कोई आने से कतराती। कोई फिकरे के जवाब में तुरंत ख़री-खोटी सुना भी देती।

उस दोपहर तो हद ही हो गयी। वह दोपहर बहुत सुनसान थी। नीम की छाँव ठन्डी, और गहरी थी। हमेशा की तरह नीम की छाँव में कुछ मोर, काबर, गिलहरियाँ, होला, चिकी अपना भोजन खोज रही थी। उन्होंने भी देखा, और एक-दूसरे तरफ़ देखते हुए जैसे आँखों ही आँखों में कहा कि हद है।

दरअसल नीम की छाँव में दामू जाटव  और दया बागरी बैठे दारू पी रहे थे। दोनों हम्माल थे। हम्माली जाम सिंह के यहाँ करते थे। उस दिन कोई काम नहीं था। या हो सकता है कि काम निपटाकर आये थे। उनके सामने प्लेन दुबारे की एक अद्धी। गिलास और भुगड़े की पुड़िया खुली रखी थी। झब्बू के झोपड़े की भींत में लगी खिड़की बन्द थी। किवाड़ के पल्ले खुले थे। बारसाख पर पुरानी साड़ी का परदा झूल रहा था। झोपड़े के बीच एक चौड़ी ओटली पर टीवी थी। टीवीब्लैक एण्ड व्हाइट थी। उन दिनों कलर टीवी जाम सिंह, माखन शुक्ला, और संतोष पटेल जैसों के घर में ही थी। झब्बू के घर में टीवी के सामने सिलाई मशीन थी। झब्बू स्टूल पर बैठ, मशीन पर कुछ सील रही थी।

तभी क्या हुआ ! कलाली तरफ़ से श्यामू ढोलन आ रही थी। चँदा, फूँदा का झोपड़ा पार करती। धापू के झोपड़े सामने पहुँची। उसके हाथ में टू बायल कपड़ा था। वह पोलका सिलवाने आ रही थी। दामू ने तभी श्यामू ढोलन को देखते हुए दया का घूटना छुआ। दया भी उधर हसरत भरे भाव से देखने लगा। अब तक श्यामू ढोलन, और आगे आ चुकी थी। झब्बू के झोपड़े और नीम की छाँव के बीच धूप का एक रेंगाला था। श्यामू ढोलन उसी रेंगाले में दाख़िल हो चुकी थी। श्यामू ने उन्हें छाँव में बैठे देख अनदेखे कर दिये। पर उनका अपने पर क़ाबू न था। उनकी नज़रों के फीते श्यामू का बदन नापने लगे। फिर श्यामू मुड़ी तो चेहरा झब्बू के झोपड़े तरफ़, और पीठ नीम की छाँव तरफ़ हो गयी। छाँव में बैठे-बैठे ही दोनों बागड़ बिल्लों की तरह उसे घूरने लगे। श्यामू किवाड़ के क़रीब थी। दामू अपने दाएँ पैर के घुटने पर धीरे-धीरे हथेली फिराने लगा। मानो वह  घुटना नहीं, श्यामू का कूल्हा हो। कूल्हे पुष्ट, और पीछे को उभरे हुए। दामू की आँखों और चेहरे पर एक ख़ास भाव तारी होने लगा। बदन में सिहरन दौड़ने लगी। यही हाल दया बागरी का भी। फिर दामू के होंठ हिले। गँधाते मुँह से शब्दों के बाण छूटे-  काश…, अपनी क़िस्मत में भी ढोलक के पुड़ पे दो थाप मारना लिख देता भगवान !

शब्द बाण श्यामू के कूल्हे में चुभे। श्यामू के क़दम ठिठके। उसने आवाज़ भी पहचान ली। शब्द बाण बिच्छू के डंक लगे। मस्तिष्क तक झनझनाहट कौंध गयी। कहने को मन में बहुत कुछ उबल आया। मगर कड़वा घूँट पीते हुए सोचा कि कुत्तरे को काँकरा मारो तो, और ज़्यादा भौंकता।

श्यामू के ठिठके क़दम, फिर चल पड़े। तभी फिर डंक चुभे। अब आवाज़ दया बागरी की थी- भगवान भी पटेलों का साथी, उनके  लिए एक से एक ढोलक हाज़िर करता। दिन में अलग, रात में अलग। बजाओ, जितना ज़ोर हो, उतनी बजाओ। 

-हाँ भई ….अपनी क़िस्मत का तो पूड़ ही फूटा ! दामू ने भुगड़े फाँकते हुए कहा।

श्यामू बारसाख पर झूलते परदे तरफ़ हाथ बढ़ा चुकी थी। परदा हटा झब्बू के झोपड़े में दाख़िल होने को थी। लेकिन फिर रुक गयी। जहाँ रुकी, वहीं पैरों पर पलटी। हाथ की उँगलियाँ नचाती। भौहों को ऊपर-नीचे करती। आँखों में व्यंग्य की फूलझड़ी सुलगाती। शब्दों को तेज़ाब में भीगोती, बोली- कैसे मिलेगी.. ढोलक बजाने को..? अपनी माँ, बहन और लुगाई, सभी को तो गिरवी धरके बैठे हो..!

 -ऎ छिनाल…. दया सुलगता हुआ चीख़ा- ज़िबान संभाल, नी तो हींच लूआँ।

-सच्ची तो कह री हूँ, मिर्चां क्यों लग रही ? श्यामू ने व्यंग्य मिश्रित हँसी के साथ कहा। फिर बारी-बारी से दोनों की आँखों में सुलगती नज़रों से घूरती बोली- पहले उन्हें गिरवी से छुड़ाओ… फिर सवेरे माँ की ढोलक बजाओ, दोपहर में बहन की;  और रात में लुगाई की बजाओ। फिर आपस में अदल-बदल कर बजाओ..। बजाओ..और बजाते-बजाते ही मर जाओ।

श्यामू इतने पर ही शांत न हुई। भीतर पानी की तरह खौलती। दो-तीन क़दम और आगे बढ़, भौंहें उछाल, गरदन को झटका दे, और हथेली पर हथेली रगड़ती, बोली- फिर भी कस बचे अगर, आना श्यामू ढोलन की डगर। चरखी में से निकले साँटे के चौथे-सा हाल न कर दूँ, तो श्यामू ढोलन नाम पलट दूँ।  

दया बागरी और दामू जाटव फनफना कर रह गये। कभी सोचा  न था कि श्यामू यूँ वार करेगी। सच में, श्यामू ने भौंकते कुत्तों को काँकरा न मारा। ज़ोर से भौंकने को न उकसाया, भौंकते के मुँह में बल्ली घुसेड़ चुप कर दिया। दोनों का नशा ऎसे यूँ छू मंतर हुआ, जैसे गधे के सिर से सिंग गायब हुआ।

लेकिन ग़ुस्सा बरकरार रहा। दारू की ख़ाली बोतल दामू ने कसकर पकड़ी। एक पल को उसके ज़हन में काल्पनिक दृश्य उभरा, और उसने देखा- उसने ख़ाली बोतल से श्यामू का भाल फोड़ दिया। ख़ून बहने लगा। श्यामू का चेहरा यूँ लाल हो गया। मानो होली हो, और संतोष पटेल ने गुलाल मल दिया हो।

लेकिन काल्पनिक दृश्य काल्पनिक ही रहा। संतोष पटेल का नाम याद आते ही तंद्रा टूटी। असल में बोतल पर पकड़ ढीली पड़ गयी। क्योंकि दया और दामू ही नहीं, बल्कि पूरा गाँव जानता। श्यामू के सिर पर संतोष पटेल का हाथ है।   

फिर दोनों मन मसोसकर उठने लगे। तभी झब्बू बाहर आयी, और चिंता से भीगे स्वर में पूछा- क्या हुआ ?

धापू बागरन भी बाहर आकर देखने लगी कि कैसा शोर-शराबा ?

-भइया..यहाँ पीकर, उधम मत करा करो।  झब्बू ने धीरपई से कहा। 

-हमारे पीने  से तेरा जी कड़वा होता, तो जा कलाली हटवा दे।  दामू ने उपहास उड़ाते हुए कहा। दामू जानता था, गाँव में झब्बू के आगे-पीछे कोई बड़ा-बूढ़ा न था।

दामू और दया की निर्लज्जता, ढीटता चरम की ओर बढ़ने लगी। झब्बू ने चुप रहना ही ठीक समझा। श्यामू को भी फिर से ताव आने लगा। लेकिन झब्बू ने मामला ख़त्म करने की सोची। वह श्यामू की बाँह पकड़ती बोली- चल..भीतर चल इनके मुँह मत लग।

-भीतर चलने से क्या होगा झब्बू..! ये कुत्तरे हर आती-जाती को सूँघते। मैं कहती हूँ कि कुछ टाणी कर,  नी तो दाल रोटी से छेटी पड़ जायेगी !  श्यामू बड़बड़ाती हुई भीतर चली गयी। झब्बू ने उसे छादरी पर बैठायी, और पीने को पानी दिया।

दामू और दया वहीं जमे रहे। उनकी पहली अद्धी ख़ाली हो गयी। दामू ने ख़ाली बोतल को पीठ पीछे खाळ तरफ़ सन्ना दी, और दया दूसरी अद्धी खोलने लगा। किचिर्रर कर्र…।

नीम के पीछे खाळ किनारे। खाळ के सूखे हिस्से में। पुंवाड़लिये में, टमाटर, बैंगन के पौधो में, बबूल के पीछे। बेसरम में, जाल्यों, झाड़ी में,   अक्सर ख़ाली बोतल पड़ी मिल जाती। झोपड़े तरफ़ के छोटे बच्चे ख़ाली बोतलें ढूँढ़ते रहते। बच्चे बोतलें बेच चॉकलेट या बिस्किट खाने का बन्दोबस्त करते। उधर उस वक़्त भी दो लड़के बोतलें ढूँढ रहे थे। लड़के ग्यारह से बारह की उम्र के। दोनों नंगे पैर, साँवले और दुबले-पतले, और चड्डी-बनियान पहने।

दामू की फेंकी बोतल, दोनों के बीच गिरी। दोनों उसे हथियाने झपटे। एक ने बोतल का मुँह पकड़ा। दूसरे ने पैंदा पकड़ा। बोतल न पहला छोड़ने को तैयार। न दूसरा छोड़ने को राज़ी। थोड़ी खींच-तान हुई। फिर तू-तू, मैं-मैं होने लगी। पहले ने दूसरे को ग़ाली दी। दूसरे ने पहले को ग़ाली दी। पहले ने दूसरे की छाती पर धक्का मारा, और झटके से बोतल छुड़ा ली। दूसरा खाळ के सूखे हिस्से में गिरा। उसके हाथ पत्थर लग गया। पत्थर को मुट्ठी में भींच। हाथ को पीछे खींच। चेहरे पर ग़ुस्सा ला। पत्थर से पहले के भाल का निशाना साधा। पहला नीचे झुकता, एक बाजू हटा। पत्थर बबूल तरफ़ चला गया।

फिर पहले ने दूसरे को ग़ाली दी। उसे तत्क़ाल कोई पत्थर न सूझा। उसने वह बोतल ही फेंक कर मारी। दूसरा नीचे बैठ गया। बोतल जाकर दामू की भौंह पर लगी- ‘ फट्ट ’

दामू के हाथ से दारू का पैग छूटा। मुँह से ग़ाली छुटी। अपना कपाल हथेली से दाबने लगा। दया को सम्पट न पड़ी कि क्या हुआ..? वह बैठे-बैठे ही इधर-उधर देखता। ज़ोर से ग़ाली देता चीख़ा- कौन है रे तेरी माँ की..? सामने आ..।

फिर दया खड़ा हुआ। इधर-उधर देखने लगा। लेकिन खाळ में हिरण हो चुके लड़के, दया को नज़र न आये। दया और दामू के मन में संदेह ने कुंडली मारी, झब्बू या श्यामू के किसी चाहने वाले ने छुप कर हमला किया होगा ! दया चोट देखने लगा। दामू की भौंह के ऊपर की चमड़ी कट गयी। ख़ून निकलने लगा। दया और दामू चौगान तरफ़ बढ़ने लगे। दोनों ग़ालियाँ बकते, बाद में देख लेने की धमकी देते जाने लगे। 

झब्बू और श्यामू ने ग़ालियाँ, और हाप-हुप सुनी। लेकिन तुरंत बाहर न आयी। थोड़ा रुक कर आयी। लेकिन नीम नीचे कोई न दिखा। दया और दामू जा चुके थे। हाँ ! धापू अपने झोपड़े के बाहर खड़ी नज़र आयी। झब्बू ने सोचा, ‘ धापू को पूरी बात मालूम होगी। और पूछा- क्या हुआ..?

धापू उनके पास चली आयी। बताने लगी कि पता नी कैसे, क्या हुआ..!  मैं कलाली तरफ़ से आ री थी। क्या हुआ नी देखा। हाँ ! दामू को ख़ून निकलता देखा। पी के गिर पड़ा होगा ! या किसी से झगड़ लिया होगा ! राम जाने क्या हुआ ! दोनों बड़बड़ाते हुए चौगान तरफ़ गये।

फिर तीनों खड़ी देखने लगी। नीम नीचे की शान्ति। लुढ़की पड़ी दारू की ख़ाली बोतलें। आड़े पड़े गिलास। खुली पड़ी भुगड़े की पुड़िया। मोर, गिलहरी और कौआ आदि पार्टी मनाने लगे। खुली हवा में नीम की डालियाँ हिलने लगी। पत्तियाँ जैसे कुछ गुनगुनाने लगी।

-निकलने दे ख़ून… नाशमिटे के करम ही आकर माथे से टकराये होंगे…! उनसे झगड़ा कौन करेगा..! श्यामू ने लापरवाही से कहा।

-पर ऎसा कैसे चलेगा..? धापू ने कुछ सोचते हुए कहा। फिर सवालिया निगाह से झब्बू और श्यामू तरफ़ देखती बोली- कैसे भी करके कलाली का पाप काटना पड़ेगा।

-पर फिर भी कैसे धापू..? झब्बू ने चिंता और जिग्यासा भरे स्वर में पूछा- क्या कर सकती हैं अपन..?

-तू सोच झब्बू..। जैसे तू कहे वैसे..हम तेरे साथ है.. श्यामू ने कहा।

-हाँ.. पेपर तू बाँचती। टीवी तू देखती। कोई गली भी तू ही खोज..। धापू ने कहा, और फिर बोली कि हमारा क्या..? हम तो अंगूठा टेक..। तू कहेगी.. सूखे कुएँ में कूद जाओ… हम कूद जायेंगे।

कलाली जाम सिंह की। जाम सिंह के माथे पर राजा साब का हाथ। अपनी सारी समस्या की जड़ कलाली। गाँव में सरपँच भी तो जाम सिंह का बेटा। कलाली को हटवाने के बारे में सोचे भी, तो कैसे सोचे..? फिर भी जब कोई झब्बू से कहती- ‘ कुत्तरों की टाणी कर,  नी तो दाल रोटी से छेटी पड़ जायेगी। ’ या कहती- ‘ कैसे भी करके कलाली का पाप काट..।’ झब्बू नये सिरे से सोच में पड़ जाती-‘ क्या टाणी करूँ..? कैसे पाप काटूँ..! जाम सिंह से लड़ने-भिड़ने का मतलब, आत्महत्या करना। मैं कैलास के अहसास के साथ, उसके सपनों की ख़ातिर जीने आयी हूँ। पर झोपड़े में कैलास का अहसास ही न बचा। हर तरफ़, हर चीज़ में दारू की गँध। झोपड़े में रहूँ भी तो कैसे..? किवाड़ खोल बैठना तक मुश्किल..! बग़ैर कलाली हटे, पाप कैसे कटे ! ’

बात झब्बू के दिमाग़ में हिलग गयी। उठते-बैठते दिमाग़ में चलती। जैसे बात न थी, दिमाग़ के पतले और घने तारों में फँसी पतंग थी। ज़रा भी हवा चलती, पतंग फड़फड़ाती। धीरे-धीरे पतंग का फड़फड़ाना बढ़ता जाता। पतंग में लगी बाँस की कीमचियाँ चुभती। पतंग से झब्बू तंग आ गयी। पोलका, परकुल, पेटीकोट या कुछ भी सिलते वक़्त, यदि कुछ सोचती, तो सोचती कि पोलके की सिवन में, पेटीकोट की चीण में पतंग की फड़फड़ाहट सील दूँ। फड़फड़ाहट का शोर सील दूँ। सील दूँ..। सील दूँ..। भीतर उठती हुँकार का बीज। पर कैसे..? भीतर रह-रह वही बात गूँजती। ‘ झब्बू,  कुत्तरों की टाणी कर। कलाली का पाप काट..!

झब्बू यही-यही उधेड़ती-सिलती। जैसे कुछ और सिलना-उधेड़ना भूल गयी। फिर एक रात क्या हुआ ? झब्बू के बिस्तर पर काँटे उग आये। खजूर, करमंदी, बबूल के मज़बूत और बड़े-बड़े काँटे। धतुरे, बोर के छोटे-छोटे काँटे। काँटों पर करवट बदलने लगी। दिमाग़ में पतंग फड़फड़ाने लगी। तभी किसी ने किवाड़ की साँकल खड़खड़ायी। झब्बू ने काँटों की चुभन की सिसकी को रोकते हुए पूछा- कौन है..?

-मैं हूँ फूँदा..। फूँदा ने अपनी रुलायी को रोक कर कहा। मगर उसके स्वर से झब्बू समझ गयी कि फूँदा रो रही है। फूँदा धापू की पड़ोसन। भग्या की पत्नी। फ़िल्म अभिनेत्री नंदिता दास की तरह साँवली, और साधारण-सी क़द-काठी की थी। लेकिन आँखें, और नाक-नक़्श नंदिता से कुछ बेहतर था।

झब्बू ने जैसे ही किवाड़ खोला, घबरायी हुई फूँदा जल्दी से भीतर आ गयी। उसका पोलका फटा। साँवले चेहरे पर लाल-नीले चकते उभरे। भग्या ने दारू के नशे में उसे मारी-पीटी थी। एक बार, जब चँदा को उसके आदमी माँग्या ने पीटी थी। चँदा ने भी झब्बू के झोपड़े में ही शरण ली थी। जब भी कोई औरत को मार-पीट अपने झोपड़े से भगाता। औरत झब्बू के झोपड़े में ही आती। जैसे झब्बू का झोपड़ा, उसका घर नहीं, कोई सराय हो। फिर रात भर सिसक-सिसक कर अपनी व्यथा-कथा सुनाती। कलाली और दारूकुट्टे पति को कोसती। झब्बू तरफ़ उम्मीद से देखती। फिर वही-वही दोहराती, जो पहले भी कई औरतें दोहरा चुकी होती। झब्बू की नींद फाक्ता हो जाती। कभी बुदबुदाती कि डोकरा-डोकरी और भाई की ही बात मान लेती। ठीक रहता। मायके में रहती। दारूकुट्टों से परेशान तो न होती..!  बग़ैर कलाली हटे, पाप न कटे !  पर कलाली कैसे हटे..? मेरी कौन सुनेगा..? मैं क्या हूँ, जो कोई मेरी सुने भी..?

भले ही झब्बू को ख़ुद पर भरोसा न था। लेकिन अपनी पड़ोसनों पर था। एक दोपहर, झब्बू के साथ उसी के झोपड़े में, धापू और श्यामू भी बैठी थीं। तीनों की बातचीत का विषय और चिंता एक ही थी- कलाली। फिर तभी धापू तपाक से बोली- चलो.., फिर जाम सिंह के पास ही चलें..! कलाली उसकी, सरपँच उसका, तो उसी से बात करें..!

-हाँ.. वो भी है तो आदमी ही, नहार तो है नी, जो खा जायेगा..! श्यामू ने भी हिम्मत दिखायी।

-मगर उससे कहेंगे कैसे.. कि कलाली हटा लो..! झब्बू ने पूछा।

-ये तू जान…। क्या बात करेगी..? कैसे करेगी..? धापू ने कहा।

-पर तू जो करेगी,  हमे मंजूर होगा। श्यामू ने कहा।

-चलो फिर.. चलें..। अपनी दुःख-तकलीफ़ ही तो बतानी है ! झब्बू ने भी साहस करते कहा कि कौन-सी राज-काज की बातें करनी हैं..! या फिर गीत-भजन सुनाने हैं..!

जब तीनों जाम सिंह ठाकुर के घर सामने पहुँची। ठाकुर बुलैट पर कहीं से लौटा ही था। साथ में दुबे मास्टर भी था। ठाकुर बुलैट को स्टैण्ड पर टिकाने लगा। दुबे मास्टर स्कूल तरफ़ रवाना हो गया। जाम सिंह नाम का ही ठाकुर न था। ठाकुर जैसा था भी। कटारबँध मूँछें। भौंहें चौड़ी। आँखें खलनायक प्राण की आँखों की तरह बड़ी-बड़ी। गोल-गोल। यूकोलिप्टस के तने की तरह सुडोल और लंबा क़द। ठाकुरों वाले ही ठाट भी। दोपहर की धूप में कहीं से आया था। तानकी गरम थी। अधपके बालों में से पसीने की तीरपन गालों पर रिस रही थी। उसने अपने गले में लिपटा गुलाबी गमछा खींचा और पसीना पोछने लगा। पसीना पोंछते हुए ही उन तीनों तरफ़ देखा। पहले भौंहें उछाली। फिर गरदन उचकायी, जैसे पूछा कि ‘ क्या बात है..? ’

जाम सिंह ने उन्हें पहनावे से ही पहचान लिया था कि औरतें झोपड़ों तरफ़ की हैं।  अगर उनके चेहरों पर घूँघट न होते, तो उनके मन की  जान लेता मगर, तीनों के चेहरों पर घूँघट थे। फिर भी जाम सिंह ने श्यामू को डील-डोल से पहचान लिया, और मन ही मन अँदाज़ा लगाया- ‘ ढोलन कुछ माँगने-टुँगने आयी होगी ! झोपड़े वाले उसके दर पर, और क्यों आयेंगे..? ’

-क्यों ढोलन.. मुझे यूँ धूप में कब तक सेंकेगी..! कुछ बोल भी… क्या चाहिए..? जाम सिंह ने पूछा।

-बोलती क्यों नी है झब्बू..! बता न ! श्यामू ने कहा।

जाम सिंह के सामने झब्बू पहली बार आयी थी। वह भीतर ही भीतर छुई-मुई-सी सिमटी खड़ी थी। कुछ सोचती । कुछ मन ही मन तौलती। झब्बू के कुछ बोलने से पहले, जाम सिंह ने पूछा- ये कौन है ढोलन..?

-वो कैलास था न… सोसोसायटी में हम्माल.. उसकी लाड़ी है झब्बू..। श्यामू ने कहा।

-ठाकुर साब.. एक अरज़ है। झब्बू ने सधे किन्तु, विनम्र लहज़े में कहा, और आगे बताने लगी- मैं नीम सामने रहती हूँ। लोग सवेर-साँझ कुछ नी देखते। जब तब दारू पीते। बैराँ माणस को उल्टा-सीधा बोलते। आप कलाली को गाँव बाहर कहीं भी खोल लो..पर वाँ से हटा लो।

जब झब्बू बोल रही थी। तब जाम सिंह को याद आ रहा था। उसे कलाली का ठेका कितनी सेटिंग से मिला था ! महानगर के पंडिजी के साथ कितनी बार राजा साब के बंगले पर धौक दी। कलेक्टर, एस.पी. और आबकारी के किन-किन को भोग चढ़ाया। हालाँकि भाग-दौड़ से जो सम्बन्ध बने, उनकी बदौलत रेती, गिट्टी, मुरम की खदानों के ठेके भी मिले। लेकिन माखन और मुझे कितनी छाछ करनी पड़ी। तब जाकर ये मक्खन निकला।

-और ये बिना श्यान की जाने कहाँ से उठकर चली आयी ! कहती है कि कलाली हटवा लो..! मैं कोई दानी कर्ण हूँ !  समाज सुधारक हूँ !  जो कहूँ भूल हो गयी। दारू बुरी चीज़ ! चलो..समाज से ही हटवाते ! अरे गैलचौदी.. हटवानी होती तो लगाता ही क्यों..? जाम सिंह ने मन ही मन कहा और प्रकट में बोला- तू सुसाइटी क्यों नी हटवाती..! या वो खाळ हटवा, या उस पर पुलिया बनवा !

जाम सिंह का माथा ठनक उठा। अपनी मूँछ की तरह ही नुकीले शब्दों में उसका बोलना ज़ारी रहा-  ताकि फिर कोई ट्रेक्टर न पलटे। कोई विधवा न हो ! कैलास तो ट्रेक्टर पलटने से मरा था न ! दारू पीकर तो नी मरा ! जो मुँह उठा चली आयी, कलाली हटवा लो..! मालूम भी है..! कितनी झक मारनी पड़ती..! तब खुलती है कलाली..! ऎं..! 

-ट्रॉली पलटने से तो.. मेरी ही माँग उजड़ी..। दारू जाने कितनी औरतों की माँग उजाड़ेगी ! घर उजाड़ेगी ! झब्बू ने धीरज न खोया, और गुज़ारिश के लहज़े में ही कहा- जिन बच्चों की खेलने खाने की उमर है.. वे भी आड़े-छुपके पीने लगे। दूर रहेगी.. तो कम से कम बच्चे न बिगड़ेंगे। मैं सिलाई करती हूँ। मेरे याँ आने वाली बहू-बेटियाँ तानो-तिसनो से भी बचेगी..। 

-देख झब्बू… कलाली तेरी या मेरी मर्ज़ी से नी हटेगी…जाम सिंह ने सख़्त लहज़े  में कहा, और धमकाता बोला- दूबारा कलाली के बारे में मत आना।

-तो ये बता दो.. किसकी मर्ज़ी से.. और कैसे हटेगी..? झब्बू ने बेझिझक पूछा।

जाम सिंह की गाँव में धाक थी। यूँ समझ लो, खाल बासती। कोई भी उससे ऎसी बात न करता। झब्बू ने की, तो उसे मन में खुटका हुआ। हो सकता है कि संतोष पटेल ने इन औरतों के कान भरे हों..! वह गणपत का सरपँच बनना पचा न सका हो..! हरामी.. सामने मिलता.. तो काकाजी..काकाजी करता.... और पीठ पीछे अपनी रखैलों के ज़रिए चाल चलता..! वाह रे..लोमड़ी की औलाद !

जाम सिंह के मन में उपजी आशंका ने चिंता और झेंप के बीज डाल दिये थे। वह बीजों को अंकुरित होने और पेड़ बनने का मौक़ा नहीं दे सकता। वह तत्क़ाल रौंदने वाले अंदाज़ में बोला- वो तेरा खसम है न.. कलेक्टर ! उसके आदेश से हटेगी..। वो ज़िले में बैठता..। जा आदेश करा ला ।

झब्बू और साथिने लौट चली। उन्होंने देखा कि नीम की छाँव में माँग्या, और दो-तीन लोग दारू पी रहे। झब्बू और साथिनो ने उन्हें अनदेखा किया। झब्बू अपने झोपड़े का किवाड़ खोलने लगी। मगर माँग्या एक आदमी तरफ़ देख फुसफुसाया- जाने कहाँ से नेतागीरी करके लौटी है !

झब्बू और साथिनो ने न सुना। झब्बू ने छादरी बिछायी। साथिनो को पिलाने के लिए पानी लेने पनेहरी तरफ़ जाने लगी। धापू बोली- ले ज़रा टीवी का खटका दबा दे.. ।

झब्बू ने खटका दबाया। टीवी ने कहा- ‘ पोखरण में परीक्षण।’ और बिजली गुल हो गयी। टीवी बन्द। पँखा बन्द।

-कोढ़िया का मूत, उनाले ( गर्मी ) में तो लेण मत काटा कर। श्यामू ने कहा, और  साड़ी के पल्लू से अपने सीने, और चेहरे पर हवा करने लगी।

-दौणीफूटे कलेक्टर को कहाँ ढूँढेंगे…और जब  अपने गाँव के ठाकुर ने ही अपनी न सुनी… तो वो क्यों सुनेगा..? धापू ने पूछा।

-अब कहीं किसी के पास नी जाना अपन को.. झब्बू ने पानी का गिलास देते हुए कहा। उसके भीतर कुछ और पकने लगा था।

-तो फिर ये दारूकुट्टे…यूँज धींगा-मस्ती करते रहेंगे..? आती-जाती को छेड़ते रहेंगे..। धापू ने पूछा।

-एक तरक़ीब है। करके देखें.. शायद सबकी पक्की टाणी हो जाये..! झब्बू ने कहा।

-क्या..? श्यामू ने पूछा

-एक फ़िल्म देखी थी। जाँ सिलाई सीखने जाती थी वाँ।

-कैसी फ़िल्म..? श्यामू ने पूछा।

-दारू बन्दी पर…। झब्बू बताने लगी- उसमें औरतों ने..पूरे ज़िले में ..पूरे प्रदेश में दारू बन्द करा दी थी। रुपा ने भी फ़िल्म देखने के बाद.. अपने डोकरे की दारू छुड़ा दी थी। पर उसमें पूरे प्रदेश की औरतें इकट्ठी थीं। अपन तो तीन ही हैं..।

-तो क्या हुआ.. तीन औरतें पूरे प्रदेश की न सही... एक कलाली तो हटा सकती। श्यामू हिम्मत बंधाती बोली- तू तो तरक़ीब बता..!

-हाँ..और क्या.. ? और तीन ही क्यों..? पूरी बाखल की औरतें आ जायेंगी… धापू ने कहा- सभी तो जूते खाती हैं..!

-तो एक बार बाखल की औरतों से बात कर लें… सब राज़ी हों.. तो सवेरे ही कलाली का पाप काट दें..? झब्बू ने कहा।

-हो.. चलो पूछ लें.. श्यामू ने कहा।

उसी क्षण तीनों बाक़ी औरतों का मन टटोलने लगी। रात तक चँदा, फूँदा, रामरति, माँगी और पच्चीस-तीस औरतों ने हामी भर ली। बस..झब्बू को सुबह का इंतज़ार, और सुबह तो समय पर होनी ही थी। हुई भी। औरतें रोज़ के कामों से जल्दी ही फ़ारिग़ हो गयी। कलाली खुलने से पहले ही नीम नीचे जमा हो गयी। झब्बू भी तैयार थी। सबकी सब जाकर कलाली के किवाड़ सामने बैठ गयीं।

कलाली में काम करने वाले दो-तीन लोग भीतर सोते। एक-दो बाहर से आते। औरतों ने न भीतर वालों को, न बाहर वालों को कलाली खोलने दी। कलाली के भीतर फ़ारिग़ होने की व्यवस्था नहीं थी। कलाली वाले बाहर खाळ में या तालाब तरफ़ ही जाते। भीतर वाले भीतर दम साधे बैठे रहे। बाहर वालों ने ठाकुर के घर तरफ़ दौड़ लगायी।

जाम सिंह ख़बर सुन चौंक उठा, और बड़बड़ाया- एँ… स्साली.. बलाट्टी की ये हिम्मत..! चींटी हाथी का शिकार करने चली..!

ठाकुर के दोनों लड़के गणपत सिंह और अर्जुन सिंह भी वहीं थे। ख़बर सुन उनकी भी त्यौरियाँ चढ़ गयीं। गणपत सिंह ने फ़ोन कर माखन शुक्ला को भी ख़बर दी। ठाकुर लूँगी और बनियान पहने ही बैठा था। उसने बदन पर कुर्ता पहना, और पाँव में मोजड़ियाँ पहनता बोला- चलो.. देखते हैं..।

जाम सिंह दारू की भट्टी-सा धधकता पहुँचा, और  देखा, कलाली के सामने जितनी औरतें बैठी थीं, वो तो बैठी ही थीं। वहाँ बूढ़े, बच्चे और जवान भी खड़े देख रहे थे। दौलत पटेल का लड़का संतोष पटेल भी अपने चंगु-मंगुओं के साथ खड़ा। माखन शुक्ला भी आ गया। जाम सिंह के लौंड़े-लपाड़ी दया, दामू आदि भी जमा हो गये।

जाम सिंह समझाते हुए बोला-  देखो, मैंने कहा था ! कलाली कलेक्टर के आदेश से हटेगी..। आदेश करा लाओ.. हटा लेंगे…। कलाली सरकारी .. कोई बकरी नी.. जो चाहे जिधर हाँक दो..।

झब्बू धीरज भरे स्वर में घूँघट के पीछे से बोली- कलाली सरकारी .. नी खुलेगी तो… सरकार आवेगी खोलाने…। जब तक सरकार नी आवेगी… हम याँज बैठाँगा।

-काका आप बोलो… तो हम अभी कूल्हे बजा दें...। अर्जुन सिंह ने उतावला होते हुए माखन से कहा।

-पागल है क्या..? देख नी रहा, कितनी औरतें हैं। कितने लोग खड़े हैं… क़ायमी होगी, तो ये सब गवाह बनेंगे..! माखन ने डपटते हुए समझाया।

-मेरे को तो ये संतोष की कारस्तानी लग री… देखो.. कैसा हँस रहा। गणपत सिंह ने आशंका जताते हुए जाम सिंह से कहा।

-हाँ.. आज कल फूल छाप पार्टी के गायक विधायक के तलवे चाटने जाता है… तो ज़्यादा उड़ रहा है..। जाम सिंह ने कहा।

-क्या करें..?  जाम सिंह ने माखन तरफ़ भौंहे उछालते हुए पूछा।

-देखो.. कलाली सरकारी… पुलिस भी सरकारी… माखन धीमे स्वर में सुझाव देने लगा। जाम सिंह और गणपत सिंह गरदन हिलाते हुए सुनने लगे- थानेदार रमेश जाटव कब काम आयेगा…बुलाओ उसको..। दो-चार सिपइंयो को लेकर आयेगा। दारियों के पोंद पर सटके मारेगा… तो घाघरी ऊँची करती भागेगी..!

जाम सिंह ने गणपत सिंह तरफ़ देखा। गणपत सिंह भीड़ से एक तरफ़ गया। रमेश जाटव को मोबाइल फ़ोन लगाया। पूरी बात समझायी, और जल्दी बुलाया।

रमेश जाटव थाने पर ही था। जाम सिंह के मामले में लेत-लाली कैसे करता ? कभी सरकारी तनख्वाह में देर हो जाती। पर जाम सिंह ने जब से दारू का धंधा शुरू किया, कभी बंदी देर से न भेजी। रमेश जाटव ने थाना हाज़िरी में बैठे पुलिसवालों को जीप में बैठाला, और धरना स्थल पर आ धमका।

झब्बू और साथिनो से ख़ुद मुखातीब हुआ। उनकी बात सुनी। अपनी क़ाबिलियत के मुताबिक़ समझाने की कोशिश करने लगा। लेकिन झब्बू और साथिन न समझने को राज़ी। न हटने को तैयार। हर बात का एक ही जवाब- जब तक ये कलाली नी हटेगी, हम भी नी हटाँगा। न आज हटाँगा, न काल हटाँगा।

रमेश जाटव ने कहा- अगर कलाली से कोई दिक़्क़त है। कलेक्टर , एस.पी. को ग्यापन दो।

-हम न एस.पी. को जाने, न कलेक्टर को पेचाने..। झब्बू ने विनम्रता से कहा, और आगे बोली- जो याँ आयेगा… उससे हाथ जोड़ी के ये ही कहेंगे.. याँ से कलाली हटा लो… हटा ले तो ठीक… नी तो हम खोलने नी देंगे। 

-ये छिनालें यूँ मानने वाली नी है..। रमेश जाटव को एक तरफ़ ले जाकर जाम सिंह ने कहा- इनको सटके जमाओ अच्छे… तो अभी भैंसों की तरह चळक..चळक.. मूतती हुई भागेगी।

-ठाकुर साब बात तो ठीक है। पर मारने की कोई वजह तो हो। रमेश जाटव ने बेबसी जताते हुए कहा, और समझाता बोला- मैं जब से कोशिश कर रहा हूँ। औरतें हमारे साथ झूमा-झटकी करे। ग़ाली बके। पत्थर फेंके। हमारी वर्दी फाड़ दे। कुछ तो ऎसा करे ! हम इनको मारें..। ये तो मादर... सब राँडें हाथ जोड़ कर बात कर रही। मैंने एक-दो को धक्के मारे.. तो भी वे हाथ जोड़ती रही..। अब ऎसे में कैसे मारें..?

-फिर..? जाम सिंह ने पूछा।

-एस.पी., कलेक्टर को सूचना देनी पड़ेगी..! रमेश जाटव ने कहा।

-दे दो फिर…माखन शुक्ला ने कहा।

गाँव में जैसे-जैसे बात फैलने लगी। कलाली सामने दर्शकों की भीड़ भी बढ़ने लगी। कलाली के सामने चार गलियाँ आकर मिलती। एक गली वह-  जहाँ रमेश जाटव, जाम सिंह, माखन आदि खड़े बात कर रहे । दूसरी गली के मुँह पर रमेश जाटव के मातहत पुलिस वाले खड़े। दो गली के मुँह औरतों के धरने पर बैठने, और भीड़ के जमा होने से बन्द हो गये।

गाँव में किसी भी तरह का वह पहला धरना। सभी के लिए अजूबा। संतोष पटेल भी अपने चंगु-मंगुओं के साथ खड़ा ही था। वह कलाली के बायीं बाजू खड़ा था। वह श्यामू और झब्बू पर नज़र जमाये था। श्यामू तो उसकी पटी हुई थी ही। वह झब्बू की भी ताक में था। जब से झब्बू राँडी हुई, संतोष पटेल की उस पर नज़र थी।

झब्बू की बग़ल में धापू बैठी थी। धापू की लड़की छोटी थी। धापू उसे साथ नहीं लायी थी, सोचा था कि धूप में नन्हीं जान को लेकर कैसे बैठूँगी..?

वह लड़की को अपने आदमी नाथ्या के पास झोपड़े में ही छोड़ आयी। नाथ्या को मालूम नहीं। धापू कहाँ जा रही। जब काफ़ी देर तक धापू न लौटी। झोपड़े सामने नाथ्या ने भीड़ देखी। वह लड़की को गोदी में उठाये आ गया, और उधर ही खड़ा हो गया, जिधर संतोष पटेल खड़ा था।

वहाँ बैठी लगभग सभी औरतों ने घूँघट काढ़ा हुआ। धापू ने भी काढ़ा। पर नाथ्या की नज़रों से छुप न सकी। उसने लूगड़ी से पहचान लिया-  ‘ धापू तो औरतों में धरने पर बैठी ! ’

नाथ्या ने सोचा कि धापू को कैसे बुलाऊँ..? आँख मिले तो इशारा कर दूँ। पर उसकी आँख पर लूगड़ी का पर्दा पड़ा है।

नाथ्या को और कुछ न सूझा, केवल ये सूझा- लड़की को नाख़ून से चिमटी खोड़ लूँ। चिमटी खोड़ूँगा.., लड़की रोएगी। धापू उठ कर चली आयेगी।

नाथ्या लड़की की जाँघ में चिमटी खोड़ने लगा। कुछ महीने की मासूम लड़की रोने लगी। धापू ने लड़की का रोना सुना भी। घूँघट के पीछे से देखा भी, और सोचा कि लड़की को भूख नी है। मैं दूध पिलाकर आयी हूँ। फिर रो क्यों री ! उसका रोना भी भूख का रोना नी है !

तभी उसकी नज़रों ने नाथ्या को चिमटी खोड़ते पकड़ लिया। धापू का जी तोड़ाया। वह कुछ बड़बड़ायी भी। धापू की अस्पष्ट बड़बड़ाहट सुन झब्बू बोली- जा तेरी छोरी को ले ले…भूखी होगी..।

-वो भूखी नी है । मैं दूध पिला के आयी हूँ। वो साँड उसके पैर में चिमटी खोड़ रहा है। ताकि मैं उठ जाऊँ..! कहते हुए धापू ने दूसरी तरफ़ मुँह फेर लिया।

चँदा का आदमी माँग्या दाँत पिसता हुआ भीड़ में खड़ा था। माँग्या नज़रों से चँदा का घूँघट चीरने की कोशिश करता। मन ही मन बुदबुदाने लगा- आज झोपड़ा में आ, फिर नेतागिरी का भूत उतारता हूँ।

श्यामू का आदमी परबत ढोली। फूँदा का भग्या गारी। रामारति का जग्या भंगी भीड़ में न थे। उन्हें मालूम भी न था ।  कलाली के सामने क्या हो रहा..!  पर गाँव में ही, झोपड़ों की गलियों में ही थे।

परबत और भग्या तो बकरा-बकरी के पीछे उधर ही चले आ रहे। उन दोनों की आपस में अच्छी दोस्ती थी। दोनों रोज़ साथ-साथ बकरा-बकरी चराने जाते। सवेरे दस-साढ़े दस बजे बासी रोटी की सिरावणी-कलेवा कर जाते। साँझ को पाँच-साढ़े पाँच बजे तक लौटते। अँधेरा होने पर कलाली पर पीने जाते। उन दोनों का यही रुटिन था। कलाली पास खुल गयी, तो उन्हें जैसे आराम हो गया था।

रमेश जाटव, जाम सिंह, माखन आदि जहाँ खड़े थे। उसके सामने वाली गली में वे दोनों आ रहे थे। उनके आगे उनके बकरा-बकरी चल रहे। उस गली के कलाली तरफ़ के मुँह पर रमेश जाटव के मातहत पुलिस वाले खड़े थे। बकरा-बकरी उन्हीं तरफ़ बढ़ते आ रहे। दूर से पुलिस को देख भग्या फुसफुसाया- कलाली के सामने पुलिस क्यों खड़ी है..?

-उधर ही तो चल रहे.. देख लेंगे ..? परबत बोला।

जब बकरा-बकरी पुलिस वालों के नज़दीक पहुँचने वाले थे, तब सिपाही नत्थू लाल भदोरे गली में आगे बढ़ा। भग्या और परबत को माँ-बहन की ग़ालियाँ देने लगा। बकरा-बकरी को दूसरी तरफ़ से ले जाने का कहने लगा।  


(उपन्यास को आधार प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.)

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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