हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बड़े बड़े झूठ: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/30/2015 12:49:00 PM



‘पर्याप्त पुनरावृत्ति से लोगों की मनोवैज्ञानिक समझ बनाकर यह साबित करना नामुमकिन है कि एक चौकोर वर्ग, असल में एक गोलाकार चक्र है. ये महज शब्द हैं और शब्दों को तब तक तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है जब तक कि वे विचारों का जामा पहनाकर उन्हें बदल ना दे.’
-जोसेफ गोएबल्स
आईआईटी मद्रास प्रशासन द्वारा आंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल (एपीएससी) पर लगाए गए प्रतिबंध पर छिड़े विवाद के बीच में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर ने प्रतिबंध का विरोध करने वालों को कम्युनिस्ट बताते हुए एक लंबा लेकिन भ्रमित संपादकीय अनमास्किंग स्यूडो आंबेडकराइट्स लिखा. इस प्रतिबंध ने देश और देश के बाहर विरोध को जन्म दिया था. संपादकीय ने विरोध करने वालों पर आंबेडकर को नहीं जानने का इल्जाम लगाया और कहा कि आंबेडकर हिंदूपरस्त थे और कम्युनिस्टों के खिलाफ थे. बेशक इसने एपीएससी पर प्रतिबंध को जायज ठहराया। दिलचस्प बात यह थी कि अपने मूल मुद्दे पर जोर डालने के लिए संपादकीय एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट एक उद्धरण से शुरू होता है, जिसे आखिरकार आंबेडकर डॉट ओआरजी पर मेरे द्वारा पेश किए गए डिजिटल संस्करण से बड़े आलस के साथ उठाया गया था (न कि मूल पाठ से), और उसे मोटे अक्षरों में छापा गया: ‘ब्राह्मणवाद वह जहर है जो हिंदू धर्म को बर्बाद कर देगा. अगर आप ब्राह्मणवाद को खत्म करते हैं तभी आप हिंदू धर्म को बचने में कामयाब हो पाएंगे.’ अगर किसी भी तरह से एक झूठ को दोहराते रहने की गोएबलीय मंशा को परे भी कर दें, तो किसी को भी इस पर हैरानी होगी कि एक ऐसे उद्धरण का इस्तेमाल ही क्यों किया गया, जिसमें हिंदू धर्म के लिए तारीफ या हमदर्दी की झलक तक नहीं है. 1936 में सुधारवादी हिंदुओं से मुखातिब आंबेडकर ने यह समझाने की कोशिश की थी हिंदू धर्म को कौन सी बीमारी खाए जा रही है और कहा था कि ब्राह्मणवाद ही वह बीमारी है. सवाल यह उठता है कि क्या ब्राह्मणवाद को हिंदू धर्म से अलगाया जा सकता है? असल में, वे एक ही चीज के दो अलग अलग नाम हैं, जैसा कि खुद आंबेडकर ने ही कहीं दूसरी जगह साफ भी किया है. ऐतिहासिक तौर पर देखें तो हिंदू धर्म जैसी कोई चीज नहीं है; यह सिंधु नदी की दूसरी ओर मौजूद धर्म यानी ब्राह्मणवाद के लिए इस्तेमाल में लाया गया एक मध्ययुगीन शब्द है.

बड़े बड़े झूठ

बाबासाहेब आंबेडकर: राइटंग्स एंड स्पीचेज के पहले खंड के 78वें पन्ने पर मौजूद उस उद्धरण पर कूद कर जाने से पहले, संपादक को इस किताब की भूमिका में ही आंबेडकर का एक बेहतर उद्धरण मिल सकता था: ‘मुझे तसल्ली होगी अगर मैं हिंदुओं को इस बात का अहसास करा सका कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीयों की सेहत और खुशहाली के लिए खतरे की वजह है.’ यह इतना बता देने के लिए काफी है कि आंबेडकर हिंदुओं और हिंदू धर्म के लिए क्या सोचते थे. अगर आरएसएस सुनने को उत्सुक ही है तो अपने आखिरी दिनों तक खुद को विकसित करते रहने वाले आंबेडकर ने कहा था: ‘अगर हिंदू राज हकीकत बन गया, तो इसमें संदेह नहीं कि यह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ी तबाही होगा. हिंदू लोग चाहे जो कहें, यह लोकतंत्र के साथ नहीं चल सकता है. हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोकना होगा.’ [पूर्वोक्त, खंड 8, पृ.358]. यह बात आंबेडकर ने अपनी किताब थॉट्स ऑन पाकिस्तान ऑर पार्टिशन ऑफ इंडिया में कही थी, जो आंबेडकर में काट-छांट करके उन्हें मुसलमानों से नफरत करने वाला बताने के लिए, आखिरकार आरएसएस की पसंदीदा किताब है. आंबेडकर की एक और किताब, हिंदू धर्म का दर्शन हिंदू धर्म के ‘एक जीवन शैली’ होने के दावे का जायजा लेती है और इसे ‘आजादी, बराबरी, भाईचारे’ के खिलाफ तथा इंसाफ और उपयोगिता के लिहाज से इसकी खामियों के आधार पर इसे पूरी तरह खारिज करते हैं. जब वे यह लिख रहे थे ‘हिंदू धर्म ज्ञान को फैलाने को बढ़ावा देना तो दूर, अंधकार का सिद्धांत है’ या ‘हिंदू धर्म का दर्शन ऐसा है कि इसे इंसानियत का धर्म नहीं कहा जा सकता है’ तो वे यकीनन हिंदुओं की तारीफ तो नहीं ही कर रहे थे. बेशक, ये बातें गोएबल्स के भक्तों को अपना यह झूठ फैलाते रहने से नहीं रोक सकेंगी कि आंबेडकर एक महान हिंदू थे.

संपादकीय एक और हास्यास्पद कहानी सुनाता है कि एपीएससी पर प्रतिबंध का विरोध करने वाले कम्युनिस्ट थे. क्या आईआईटी के निदेशक को उनकी इस अलोकतांत्रिक कार्रवाई के खिलाफ लिखने वाले देश के जाने-माने वैज्ञानिक लोग कम्युनिस्ट हैं? जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका में उदारवादियों को कम्युनिस्ट कहा जाता है, यहां आरएसएस तार्किक और लोकतांत्रिक लोगों को कम्युनिस्ट कहता है! भारत के कैंपस कभी भी कम्युनिस्ट नहीं रहे, जैसा कि आरएसएस का इल्जाम है. अगर ऐसा रहा होता तो आरएसएस कभी भी अपने कोटर से निकल पाने में कामयाब नहीं हुआ होता. बहरहाल, आंबेडकर के बारे में यह जो बड़ी बात कहता है वो ये है कि आंबेडकर कम्युनिस्ट विरोधी थे.

यह सही है कि खुद आंबेडकर ने ही कहा था कि वे कम्युनिस्टों के खिलाफ हैं. हालांकि आरएसएस को यह अच्छे से पता होगा कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा था. उन्होंने ऐसा इसलिए कहा था कि उन्होंने देखा कि वे उसी [आरएसएस] के कुल-खानदान से हैं- वे कम्युनिस्ट ब्राह्मण लड़कों का एक गिरोह थे जो मार्क्सवादी उसूलों की रटंत लगाते थे लेकिन जातियों की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करते हुए ब्राह्मणवादी चरित्र दिखाते फिरते थे.

उनका कम्युनिस्ट-विरोधी रुख असल में तब के बंबई के कम्युनिस्टों के साथ हुए उनके कड़वे अनुभव से जन्मा था, जिन्होंने उनके कहने के बावजूद अपने तहत आने वाले कपड़ा मिलों में दलित मजदूरों के खिलाफ भेदभाव के व्यवहार को सुधारा नहीं. तब दलितों के लिए अलग सुराहियां होती थीं और उन्हें बेहतर मजदूरी वाले बुनाई विभाग में काम करने की आजादी नहीं थी, क्योंकि उसमें टूटे हुए धागों को थूक की मदद से जोड़ना पड़ता था. आंबेडकर ने हड़ताल में अपने शामिल होने की पूर्वशर्त के रूप में उनसे इस व्यवहार को रोकने को कहा, लेकिन उन्होंने महीनों तक इसकी अनदेखी की. जब उन्होंने हड़ताल तोड़ने की धमकी दी, केवल तभी जाकर वे माने. इसके बावजूद आंबेडकर 1938 की ऐतिहासिक हड़ताल में उनके साथ शामिल हुए, लेकिन वह खाई पाटी नहीं जा सकी. कम्युनिस्टों ने 1952 के आम चुनाव में एक खुला आंबेडकर विरोधी रवैया अपनाया और इन वजहों से आंबेडकर ने कम्युनिस्ट विरोधी बातें कहीं.

इस तरह जहां आंबेडकर का कम्युनिस्ट विरोध ज्यादातर जाति के मामले में कम्युनिस्टों के व्यवहार से प्रभावित हुआ, वहीं उनके लेखन में इस बात के भी उतने ही सबूत मौजूद हैं जो कम्युनिज्म के लिए उनकी हमदर्दी की तरफ भी इशारा करते हैं. यह सही है कि वैचारिक लिहाज से अपने शुरुआती दिनों से फेबियनवाद से गहरे प्रभावित रहे आंबेडकर मार्क्सवादी नहीं थे. उन्होंने मार्क्सवाद से अपनी असहमतियों को जाहिर किया है, लेकिन कभी भी उन्होंने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, ऐतिहासिक भौतिकवाद और वैज्ञानिक समाजवाद के इसके बुनियादी सिद्धांत के स्तर पर जाकर बहस नहीं की. उन्होंने बजाहिर तौर पर ‘आधार-अधिरचना’ के चुनौती दिए जा सकने वाले जड़ सिद्धांत को भी चुनौती नहीं दी, जिसकी जाति को लेकर कम्युनिस्ट व्यवहार को बनाने में अहम भूमिका है. इसके बजाए, उन्होंने खुद को भी [आधार-अधिरचना के] इस फंदे में गिर जाने दिया और उन्होंने यह साबित करने में भारी मेहनत की कि हमेशा ही, राजनीतिक क्रांतियों से पहले धार्मिक क्रांतियां होती हैं. इस तरह दुर्भाग्य से उन्होंने असल में जातियों को अधिरचना यानी ऊपरी ढांचे का हिस्सा मान लिया. आंबेडकर सिर्फ एक बार अपेक्षाकृत विस्तृत बहस में गए और तभी उन्होंने, अपनी मृत्यु से महज एक महीना पहले, काठमांडु में मार्क्सवाद की बौद्ध धर्म के साथ तुलना की थी. उन्होंने साफ साफ कहा था कि बौद्ध धर्म और मार्क्सवाद, दोनों का मकसद एक ही था, लेकिन उन्हें हासिल करने के रास्ते अलग अलग थे. इसे समझाते हुए उन्होंने मार्क्सवाद में दो मुद्दों पर खामियां देखीं: एक कि मार्क्सवाद अपनी पद्धति के रूप में हिंसा का इस्तेमाल करता है और दूसरा कि यह लोकतंत्र में यकीन नहीं करता. हालांकि यहां भी वे मार्क्सवाद के सिद्धांत के बजाए, उसके व्यवहार को ही ध्यान में रख कर बोल रहे थे, लेकिन इससे यह बात साफ हो जाती है कि उन्हें किन बातों पर मार्क्सवाद से दिक्कत थी. चूंकि मकसद के मामले में मार्क्सवाद से उनकी कोई असहमति नहीं थी, तो उनकी बेकरारी इसकी बराबरी का एक ऐसा विकल्प खोजने की थी, जिसमें मार्क्सवाद की खामियां न हों। उन्होंने खुद को इस बात का कायल किया कि यह विकल्प बौद्ध धर्म था. ऐसे में, आरएसएस के लिए यह साफ हो जाना चाहिए कि आंबेडकर को कम्युनिस्ट-विरोधी और भगवापरस्ती के रंग में रंगना उसी के लिए भारी पड़ सकता है.

और झूठ का कारोबार

एक तरफ आरएसएस आंबेडकर को एक भगवा प्रतीक के रूप में अपनाने के लिए बेकरार रहा है, लेकिन दूसरी तरफ यह उनके रेडिकल विचारों को बर्दाश्त नहीं करता, जैसा कि एपीएससी के वाकए से साफ जाहिर है. संपादकीय ने एपीएससी पर पाबंदी को एक स्वायत्त संस्थान द्वारा की गई एक दंडात्मक कार्रवाई के रूप में जायज ठहराया है, जिसका सरकार से कोई लेना देना नहीं है. इसका यह सोचना पूरी तरह से अपमानजनक है कि भारतीय लोग भाजपा की मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के संदिग्ध तौर-तरीकों के बारे में नहीं जानते. इस पद के लिए पूरी तरह से नाकाबिल, प्रधानमंत्री के ‘विशेषाधिकार’ के रूप में नियुक्त, ईरानी इसी ‘विशेषाधिकार’ का इस्तेमाल करते हुए (अपनी तरह के) उतने ही नाकाबिल लोगों को अकादमिक अहमियत के राष्ट्रीय संस्थानों में नियुक्त करती रही हैं. येल्लाप्रगदा सुदर्शन राव की विवादास्पद नियुक्ति दोहराने के लिहाज से काफी जगजाहिर है: वे आरएसएस के अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना (एबीआईएसवाई) के आंध्र प्रदेश अध्याय के मुखिया थे जिनका शोध का कोई इतिहास नहीं है, उन्हें प्रतिष्ठित भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) का मुखिया बना दिया गया. अपने हिंदुत्व और ब्राह्मणवाद का गर्व से प्रदर्शन करने वाले राव ने आशंका के मुताबिक तीन इतिहासकारों को आईसीएचआर के पैनल का सदस्य बनाया: उनमें सभी एबीआईएसवाई से जुड़े हैं, नारायण राव उसके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, ईश्वर शरण विश्वकर्मा उसके अखिल भारतीय महासचिव हैं और निखिलेश गुहा उसके बंगाल अध्याय के मुखिया हैं. ईरानी धड़ल्ले से शीर्ष संस्थानों में हिंदुत्वपरस्त या भाजपापरस्त व्यक्तियों की नियुक्ति कर रही हैं. आईआईएएस, शिमला के अध्यक्ष के रूप में चंद्रकला पाडिया, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में गिरीश चंद्र त्रिपाठी, वीएनआईटी, नागपुर के अध्यक्ष के रूप में विश्राम जामदार की नियुक्तियां मीडिया में आई कुछेक मिसालें हैं. आईआईटी दिल्ली के निदेशक; आईआईटी मुंबई के निदेशक मंडल के अध्यक्ष अनिल काकोडकर, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति और मंत्रालय के अनेक अधिकारियों के साथ उनके मानव संसाधन विकास मंत्रालय के हालिया विवाद, आरएसएस के हिंदुत्व के एजेंडे को लागू करने में उनके मनमानी से भरे तरीकों को दिखाते हैं. इसको मद्देनजर, एक गुमनाम शिकायत पर उनके द्वारा गौर किया जाना और आईआईटी मद्रास द्वारा भारी सरगर्मी के साथ एपीएससी पर पाबंदी लगाने की कार्रवाई यकीनन ही एक मामूली प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है.

मुद्दे पर जब बहस तेज हुई, तो इसके सारे तथ्य खुल कर सामने आए. एपीएससी द्वारा जिस तथाकथित दिशा-निर्देश के बारे में बताया जा रहा था कि एपीएससी ने उसका उल्लंघन किया है, वे दिशा निर्देश असल में उस कथित उल्लंघन के वाकए के बाद लागू किए गए. उन्हें एपीएससी की उस बैठक के चार दिनों के बाद, 18 अप्रैल को जारी किया गया था. उनकी मान्यता वापस लेने वाले डीन ने पहले आंबेडकर और पेरियार के नामों पर अपनी नाखुशी जताई थी, और पर्याप्त रूप से अपने ब्राह्मणवादी झुकाव को जाहिर किया था. अजीबोगरीब रूप से यह इल्जाम लगाया गया कि एपीएससी की गतिविधियां छात्रों को दो गुटों में बांट रही थीं. हालांकि यह तथ्य अपनी जगह पर कायम है कि हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार करने वाले विवेकानंद स्टडी सर्किल, आरएसएस शाखाएं, हरे रामा-हरे कृष्णा, वंदे मातरम, ध्रुव जैसे छात्र संगठन खुलेआम सांप्रदायिक आधार पर छात्रों को बांट रहे हैं, जिन्हें आईआईटी प्रशासन से अनेक तरह सरपरस्ती हासिल होती रही है. क्या हिंदुत्व संगठनों के प्रभाव में, अलग शाकाहारी मेस बनाने का आईआईटी मद्रास का फैसला छात्रों को बांटने वाला नहीं हैॽ असल में, एपीएससी ने इस कदम के खिलाफ 2014 में ‘व्हीट ऑर मीट, डोन्ट सेग्रीगेट’ अभियान चलाया था. जो भी हो, इतनी बदनामी के बाद आईआईटी प्रशासन को आरएसएस के फासीवादी खेल के खिलाफ विरोध जताने वालों की मांग के आगे झुकते हुए पीछे हटना पड़ा और एपीएससी की मान्यता को बहाल करना पड़ा.

एपीएससी की जीत ने अनेक कैंपसों में ऐसे ही स्टडी सर्किल की शुरुआत करने और हिंदुत्व के संदेश का प्रतिरोध करने के लिए प्रेरित किया है. प्रतिष्ठित फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया का एक और कैंपस भी ऐसी एक और हिंदुत्व नियुक्ति के प्रतिरोध में सुलग रहा है. शाबास छात्रो, सिर्फ आप लोग ही भारत के लिए सचमुच के अच्छे दिन ला सकते हैं!

अनुवाद: रेयाज उल हक

आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/18/2015 03:40:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े
‘पुलिस की भूमिका राज्य की कानून-व्यवस्था को देखना है, न कि कानून-व्यवस्था की समस्या को पैदा करना है.’
-देबरंजन, ओडिशा के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्माता

संयुक्त राज्य फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआई) के बदनाम मुखिया जे. एडगर हूवर ने 15 जून 1969 को ऐलान किया था, ‘बिना किसी शक के, ब्लैक पैंथर पार्टी देश की आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा है’ और यह प्रतिज्ञा की थी कि 1969 पार्टी का आखिरी साल होगा. करीब छह दशकों के बाद, भारत में हूवर के एक हकीर समकक्ष ही नहीं बल्कि उसके सबसे पढ़े-लिखे बताए जानेवाले प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उस बात को नक्सलवादियों के संबंध में दोहराया. लेकिन उनके लिए उनके खात्मे की तारीख का ऐलान करना मुमकिन नहीं था, भले ही उन्होंने एक व्यापक ऑपरेशन ग्रीन हंट और सबसे असंवैधानिक सलवा जुडूम के जरिए नक्सलवादियों पर एक पूरी की पूरी जंग शुरू कर दी थी, जिसमें आदिवासियों को आदिवासियों के खिलाफ खड़ा किया गया था, क्योंकि वे जानते थे कि नक्सलवादी गरीबों और आदिवासियों में घुले-मिले थे और उनकी अपनी जगहों में उनके वजूद की चिंताओं की रहनुमाई करते थे.

जब एक तरफ अपने ही लोगों के खिलाफ एक खुलेआम जंग और दूसरी तरफ विकृत सलवा जुडूम को नागरिक अधिकार समूहों और सरोकारी बुद्धिजीवियों ने सवाल करना शुरू किया तो सरकार ने बड़े जोर-शोर से यह प्रचार शुरू किया कि नक्सलवादी अपना शहरी जाल बनान में लगे हैं और इस तरह सरकार ने इशारों इशारों में यह धमकी भी दी कि नक्सलवादियों के खिलाफ सरकारी कार्रवाइयों की आलोचना में एक शब्द भी नक्सलवादियों की हिमायत माना जाएगा और उन्हें राज्य के गुस्से का सामना करना पड़ेगा. इसने एक नेकदिल डॉक्टर बिनायक सेन को गिरफ्तार करके और उन्हें आजीवन कारावास देकर एक मिसाल भी पेश की, जिनका अवाम की सेवा करने का एक बेदाग रेकॉर्ड था. उनकी गलत इरादों के साथ कैद के खिलाफ भारी सार्वजनिक निंदा के बावजूद उन्हें जमानत से लगातार महरूम रखा गया. विरोध देश के भीतर और बाहर दोनों तरफ से हुआ, जिसमें नोबेल पुरस्कार विजेताओं का एक समूह भी शामिल था. उन्हें 47 महीनों तक जेल में बिताने के बाद छोड़ गया, लेकिन इस पर भी यह साफ संदेश तो चला ही गया कि ताकतवर राज्य के खिलाफ आवाज उठाने वाले किसी भी इंसान का क्या अंजाम हो सकता है. बेशक, उनके बाद अनेक दूसरे लोगों की गिरफ्तारियां भी हुईं, जिनके मामलों ने साबित किया कि उनकी गिरफ्तारियां पूरी तरह गैरवाजिब थीं, लेकिन यह भी उनके 3-4 साल जेल में बिता चुकने के बाद ही हुआ और जिन्हें मीडिया में ‘खूंखार नक्सलाइट’ होने की बदनामी उठानी पड़ी. जनता से अच्छे दिन का वादा करके भारी जीत की मंजिल तक पहुचने वाले नरेंद्र मोदी ने यह साबित करने में जरा भी वक्त नहीं गंवाया कि वे असल में अपने पहले के शासकों के उसी पुराने बुरे दिन को ही और तेज करने वाले हैं. उनके शासन ने पिछले प्रधानमंत्री से भी आगे बढ़ कर यह ऐलान किया है कि नक्सली बुद्धिजीवी (समझें, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता) हथियारबंद कैडरों से ज्यादा खतरनाक हैं. यह ऐलान उसने किसी और के सामने नहीं बल्कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय में किया है, जो संविधान का सर्वोच्च संरक्षक है. गरीब अवाम के नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ जो लोग आवाज उठाते हैं, उन सभी के खिलाफ साफ साफ धमकियों के रूप में राज्य का आतंक पूरे देश को अपनी चपेट में ले रहा है.

देबा का ‘दर्दनाक अनुभव’

14 अगस्त को बीस नागरिक अधिकार और जनवादी अधिकार संगठनों के एक संघ, सीडीआरओ (कोऑर्डिनेशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स ऑर्गेनाइजेशन) के सभी सदस्यों को ओडिशा के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्माता देबरंजन की तरफ से एक भयानक ई-मेल हासिल हुआ. उन्हें इस दायरे में देबा के नाम से जाना जाता है. मेल में उनके द्वारा मल्कानगिरि के हालिया दौरे के दौरान हुए भयावह अनुभव के बारे में बड़ी मायूसी से बताया गया था. वहां वे जिले के आदिवासियों की जमीन की समस्या और खेती के हालात पर अपनी डॉक्यूमेंटरी की शूटिंग करने के लिए गए थे. डेबा इस इलाके के लिए अजनबी नहीं हैं, उन्होंने अनेक फैक्ट फाइंडिंग अभियानों में भागीदारी, लेखन (बानगी के बतौर देखिए countercurrents.org और academia.edu) और फिल्मों के जरिए आदिवासी जनता के आंदोलनों के साथ लगातार वाकिफ रहे हैं. उनकी रिपोर्टें पढ़ने और फिल्में देखने वाला कोई भी समझदार इंसान नहीं कह सकता कि वे नक्सलवादियों के प्रति हमदर्दी रखते हैं. लेकिन यह बात राज्य को उन्हें निगरानी में रखने और उनका उत्पीड़न करने से नहीं रोक पाई.

देबा ने खबर दी है कि 8 अगस्त को उनके मल्कानगिरि में पहुंचने के बाद अनेक नक्सल-विरोधी सशस्त्र बलों ने तपोभूमि ट्रस्ट गए, जहां वे ठहरे हुए थे, और इस पर जोर दिया कि वे और ट्रस्ट का एक ट्रस्टी उनके साथ चले. चूंकि उन बलों ने अपनी पहचान को जाहिर नहीं किया था, देबा ने उनकी बात मानने से मना कर दिया और उन्हें कहा कि अगर वे अपने बॉस का नाम-पता दें तो वे उनसे शाम में आकर मिल लेंगे. चूंकि वे उन्हें ‘देबराज’ कह रहे थे, इसलिए देबा ने सोचा कि यह गलत पहचान का मामला हो सकता है. लेकिन अगले दिन जब वे उडुपी गांव में शूटिंग कर रहे थे, तो स्पेशल ब्रांच ऑफ इन्वेस्टिगेशन के कुछ अधिकारी जिनके नाम अशोक पारिदा, जगन्नाथ राव नाम था, और एक सिपाही प्रधान (जैसा उन्होंने अपना परिचय दिया) उनसे दोपहर के करीब 1 बजे मिलने आए और एक घंटे से ज्यादा समय तक उनसे उनकी गतिविधियों, जीएएएस (गणतांत्रिक अधिकार सुरख्या संगठन) से उनके संबंध और मल्कानगिरि दौरे के मकसद के बारे में पूछताछ की. उन्होंने उनके सभी सवालों के जवाब देते हुए उनसे सहयोग किया. लेकिन शाम को जब वे अधिकारी उस जगह पर आए जहां वे कैंप कर रहे थे तो उन्होंने उनकी बात और सुनने से मना कर दिया. बाद में जब वे लौटने की तैयारी कर रहे थे, तो सादी वर्दी में एक महिला पुलिस इंस्पेक्टर (उसने अपना नाम सुनीता दास बताया) अपनी यूनिट के साथ वहां आई. उसने आरोप लगाया कि उन्होंने चंपाखारी गांव में सवेरे एक महिला के साथ छेड़छाड़ की है. उसने दबाव देकर कहा कि वे उसके वाहने में उसके साथ मल्कानगिरि पुलिस थाने चलें. ऐसे आरोप से स्तब्ध देबा ने एफआईआर की प्रति मांगी, लेकिन पुलिसकर्मी ने यह उन्हें नहीं दिया. देबा ने उसके साथ जाने से मना कर दिया और कुछ घंटों के बाद अपनी बाइक पर वहां से रवाना हुए. उस रात करीब 1 बजे अनेक पुलिसकर्मी शिविर में उनके बारे में पूछते हुए आए और उनके कैमरामैन और ट्रस्ट के एक कर्मचारी को उठा लिया. उन्हें एक दिन तक हिरासत में रखा गया. बाद में, पुलिस ने उन्हें इंटरव्यू देने वाले स्थानीय आदिवासियों को, और स्थानीय रूप से सहायता करने वाले शिक्षकों को सताना शुरू कर दिया था. 16 अगस्त को यह मांग करते हुए उन्हें छेड़छाड़ के आरोप के संबंध में एक नोटिस भेजा गया (यू/एस 294 294/341/323/354/354-B/506(ii) आईपीसी) कि वे 23 अगस्त को मल्कानगिरि पुलिस थाने में हाजिर हों. घटनाओं के सिलसिले को देखते हुए कोई भी समझदार इंसान यह देख सकता है कि यह पूरा आरोप ही गढ़ा हुआ था और उन्हें हमेशा की तरह नक्सलियों के साथ संबंध होने के आरोप के बजाए सामाजिक रूप से एक घिनौने आरोप में फंसाने की शायद यह एक बड़ी होशियारी भरी साजिश थी. ऐसा शायद इसलिए क्योंकि उन्हें देबा के खिलाफ ऐसा कुछ नहीं मिलता. लेकिन इसने उनका मकसद तो पूरा किया ही, कि देबा को छुपना पड़ा, अपनी गतिविधियां रोक देनी पड़ी और शायद उन्हें इन आरोपों से लड़ने के लिए बरसों तक इसमें उलझे रहना होगा.

फिर से हूवर

ह्यूई न्यूटन के जीवन पर एक फिल्म थी अ ह्यूई पी. न्यूटन स्टोरी (2001) जिन्होंने बॉबी सील के साथ मिल कर अक्तूबर 1966 में वामपंथी ब्लैक पैंथर पार्टी फॉर सेल्फ डिफेंस की स्थापना की थी. फिल्म में न्यूटन ने, जिनकी भूमिका एक एकल अभिनेता रॉजर गुएनवर स्मिथ ने निभाई थी, अनुभव पर आधारित बयान दिया था जो शायद सच पर आधारित था, ‘अगर आप एफबीआई फाइलें पढ़ें तो आप देखेंगे कि खुद मि. जे. एडगर हूवर को भी कहना पड़ा था कि संयुक्त राज्य अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बंदूकें नहीं थीं...सबसे बड़ा खतरा था फ्री चिल्ड्रेन्स ब्रेकफास्ट प्रोग्राम...’। यह फ्री चिल्ड्रेन्स ब्रेकफास्ट प्रोग्राम एक सीधा-सादा लगने वाली सामुदायिक योजना थी, जिसको एक ओकलैंड चर्च में कुछेक बच्चों को खाना देते हुए ब्लैक पैंथर्स ने जनवरी 1969 में शुरू किया था लेकिन यह साल के अंत तक यह इतना मशहूर हो गया था कि यह 19 शहरों में फैल गया था, जिसमें 20,000 से ज्यादा बच्चों को अपने ग्रेड या जूनियर हाई स्कूल जाने से पहले पूरी तरह से मुफ्त नाश्ता (ब्रेड, बेकन यानी सुअर नमक लगा मांस, अंडे और ग्रिट्स) मिलता था. हालांकि यह मुख्यत: काले मुहल्लों में ही संचालित होता था, लेकिन इसमें सिएटल के आंशिक रूप से मध्यवर्गीय मुहल्ले समेत दूसरे समुदायों के बच्चों को भी खाना मिलता था.

इसने अमेरिका में भूख और गरीबी के बारे में जनता की चेतना में इजाफा किया और यह उन्हें ब्लैक पैंथर पार्टी की विचारधारा के करीब ले आया. इसने काले समुदाय की गहरी जरूरतों और पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच और क्षमता दोनों को ही अपनी आवाज दी. हूवर ने असल में इसे एक ‘घुसपैठ’ के रूप में दर्ज किया. भारत सरकार ठीक ऐसा ही सोचती है; प्रगतिशील अभिव्यक्तियां जिन प्रतिकूल विचारों की रहनुमाई करती हैं, उनकी घुसपैठ से सरकार चिंतित है. यह नक्सलवादियों की बंदूकों से नहीं डरती, बल्कि यह डरती है कि उनका वजूद ही इस समाज की गैर बराबरी को उजागर कर देता है. यह नक्सलवादी विचारधारा नहीं, वह चाहे जो भी हो; बल्कि यह निरी असहमति है, सरकार की जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ समझौताविहीन विरोध है, जो सरकार को डराता है. यह सब पूरे मामले को गरीबों का संबल बनने, जनवादी अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ बोलने, सरकारी कार्रवाइयों की संवैधानिकता पर सवाल उठाने तक सीमित कर देता है. यह सीधी-सादी अवाम में खौफ की एक मानसिकता पैदा करना चाहती है कि शहरी इलाकों में नक्सलवादियों का जाल है. असल में ऐसा कोई जाल शायद नहीं ही हो, क्योंकि अनेक लोग नक्सलवादियों की विचारधारा और उनके तौर-तरीकों से शायद सहमत न हों. लेकिन फिर भी ऐसे अनेक लोग हैं जो गरीब अवाम पर सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ बोलते हैं, जिससे उन पर नक्सलवादी होने का लेबल लग जाता है.

एफटीआईई विवाद

जब मैं यह लिख रहा हूं, पुणे में एफटीआईआई के आंदोलनकारी छात्रों पर आधी रात में होने वाली कार्रवाई और उनमें से पांच की गिरफ्तारी की खबर टीवी पर आ रही है. जो लोग सरकार द्वारा ‘नक्सलवादियों के शहरी आधारों’ को निशाना बनाने और एफटीआईआई छात्रों की गिरफ्तारी के बीच कोई संबंध नहीं देखते, उन्हें भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा पिछले महीने (10 जुलाई) को दिया गया एक बयान याद दिलाया जा  सकता है कि एफटीआईआई के आंदोलनकारी छात्र नक्सलवादी हैं. असल में इस नवउदारवादी वक्त में उनके प्रतिरोध की मजबूती को देखते हुए सरकार के सूंघनेवाले जीवों को उसमें से यकीनन नक्सलवाद की ही गंध आएगी. जो भी हो, गजेंद्र चौहान, जिसकी प्रतिष्ठित एफटीआईआई के समाज का मुखिया बनने की काबिलियत की सबसे बड़ी कमी अब सार्वजनिक जानकारी बन गई है, ऐसी कोई तोप हस्ती नहीं है जिसको बचाने के लिए सरकार इतने लंबे समय तक इतनी भारी बदनामी मोल लेना चाहेगी. फिल्म उद्योग और प्रगतिशील भारत की सारी शख्सियतें छात्रों की मांगों की हिमायत में सामने आई हैं और सरकार से उनको मान लेने की मांग की है. भारी चर्चा में रहीं देवी राधे मां के भक्त के रूप में चवण का भंडाफोड़ से भी सरकार की शर्मिंदगी में इजाफा ही होना चाहिए. लेकिन इन सबके बावजूद सरकार ‘नक्सलवादियों’ को जीत जाने की छूट नहीं देगी. यह साफ है. एफटीआईआई के छात्रों का आंदोलन एक असहमति का प्रतिनिधित्व करता है, यह सरकारी फैसले के औचित्य पर सवाल उठाता है, यह संस्थानों का भगवाकरण के बदनीयत मंसूबे को उजागर करता है और फासीवादी मानसिकता के खिलाफ एक जनवादी चुनौती खड़ी करता है. अगर इसे छूट दी गई, तो यह संक्रामक हो सकता है, सैन्यवादी शासकों के मकसद को ही खतरे में डाल देगा.

बुरा तर्क नहीं है! बस इसमें यही एक खामी है कि उनका सामना छात्रों से है, जो उस ‘सबसे बड़े खतरे’ से कहीं ज्यादा बड़ा खतरा हो सकते हैं, जिसे उन्होंने अब तक जाना है.


अनुवाद: रेयाज उल हक

औरंगजेब रहेगा लेकिन आप नहीं रहेंगे

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/13/2015 12:38:00 AM

कवि रंजीत वर्मा की कविताएं हमारे वक्त की राजनीति और समाज में मजबूत दखल हैं. एक बयान हैं. उन्होंने हाल के राजकाज पर यह कविता हाशिया के लिए भेजी है.

मैं खड़ा हूं औरंगजेब रोड पर
औरंगजेब की क्रूरता यहां कराहती है
तेज भागते हजार पहियों के नीचे
अब इन पहियों के नीचे
एपीजे अब्दुल कलाम की मृदुलता होगी
अब यहां मृदुलता की कराह सुनाई देगी

तो क्या अब इस बदली कराह से
तेज भागते पहियों को आराम मिलेगा
कोई गिरेगा कभी टकरा कर या फिसल कर
तो उसे चोट पहले से कम आएगी
क्या उसकी हड्डियां नहीं टूटेंगी
क्या भिखारियों को यहां
दूसरी सड़कों के मुकाबले ज्यादा भीख मिलेगी
क्या कलाम साहब के नाम
हो जाने से यह औरंगजेब रोड
किसी भटकते राही को अचानक रास्ता बताने लगेगा
क्या यहां अब कभी कोई वारदात नहीं होगी
क्या बच्चों के लिए यह
घास से भरे मैदान की तरह हो जाएगा
क्या औरंगजेब से सड़क छीन लिये जाने के बाद
समाज से कट्टरता खत्म हो जाएगी
तो क्या इस समाज में जो भी कट्टरता थी
वह सिर्फ इसलिए थी
कि दिल्ली में एक सड़क का नाम औरंगजेब रोड था
क्या एक सड़क पर से नाम मिटा देने भर से
सत्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध मिट जाएगा इतिहास से

उन्चास साल शासन करने के बाद
1707 में जब उसकी मृत्यु हुई
पूरी दुनिया की संपत्ति का पच्चीस प्रतिशत
अकेले औरंगजेब के शाही खजाने में था
फिर भी वह अपना खर्च राजकोष के पैसे से नहीं
बल्कि कुरआन लिख कर और टोपियां सिल कर चलाता था
यह थी कट्टरता उसकी
क्या यह कट्टरता वर्तमान निजाम दिखा सकता है
कभी चाय बेचते थे यह कोई बात नहीं
बात तो तब है जब वह आज भी चाय बेच कर
अपना खर्च चलाएं
सच पूछिए तो देश को ऐसे
राजनेताओं की जरूरत भी है
आखिरकार भारत एक गरीब मुल्क है
आज भारत सरकार के खजाने में
पूरी दुनिया के खजाने का पच्चीस प्रतिशत नहीं
एकाध प्रतिशत है मुश्किल से 

सवाल यह भी है कि
अगर किसी शासक के नाम पर कोई रोड हो सकता है
तो औरंगजेब के नाम पर क्यों नहीं
फिर भी अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो
जाहिर है कि इतिहास को लेकर आपका नजरिया सांप्रदायिक है
आप इतिहास को हिंदू और मुसलमान समझ रहे हैं
1925 के बाद जो पैदा की है आपने यह दृष्टि
वह औरंगजेब के दरबार में बैठे
पंडित जगन्नाथ के पास नहीं थी
वह तो पूरे इत्मीनान से
काव्यशास्त्र मीमांसा ‘रसगंगाधर’
साथ ही ’गंगालहरी’ ’लक्ष्मीलहरी’ ’अमृतलहरी’
और भी न जाने कितना कुछ रच रहे थे
फिर भी औरंगजेब के मन में उनकी हत्या करने का
विचार कभी आया तक नहीं
जबकि भाषा संस्कृति और विचार के मामले में
पंडित जगन्नाथ उलटी वाणी ही बोल रहे थे
आपके लोग कहां बर्दाश्त कर पाते हैं
अलग हट कर बोलने वालों को
हत्यारों की तरह पेश आते हैं वो ऐसे लोगों के साथ

अब्दुल कलाम निर्मम नहीं थे
इसलिए कि उन्हें निर्मम होने की जरूरत नहीं थी
लेकिन उनके द्वारा तैयार किया गया मिसाइल
बिना निर्मम हुए नहीं चलाया जा सकता है
औरंगजेब की आधी जिंदगी घोड़े पर बीती थी
साइकिल पर नहीं
उसके अंदर घोड़े की तरह खून दौड़ता था
और फिर हाथ में लहराती चमकती नंगी तलवार से
निर्ममता नहीं तो क्या करुणा टपकेगी
चाहे वह शिवाजी की तलवार हो या वह
लक्ष्मीबाई की ही तलवार क्यों न हो
निर्ममता और चपलता ही उन्हें दुश्मनों के वार से बचा सकती थी
मध्ययुगीन काल की राजनीति थी वह
अदालतें भी दरबार में ही लगती थी
फैसले वही सुनाता था
जिसकी तलवार के आगे कोई टिक नहीं पाता था
यानी कि वह जो सिंहासन पर बैठा होता था

संविधान की शपथ खाकर नहीं आया था
औरंगजेब शासन करने
न जनता के मताधिकार की कोई कल्पना थी उसके पास
मैग्नाकार्टा से वह पूरी तरह अनभिज्ञ था
जैसे उसका समकालीन शिवाजी अनभिज्ञ था
जैसे उसके समय की जनता अनभिज्ञ थी
मौलिक अधिकारों को तो खैर
औरंगजेब के मरने के बाद भी
ढाई सौ साल और इंतजार करना पड़ा
इस देश में आने के लिए
उस वक्त तो इन बातों को लेकर
कोई बहस भी नहीं चल रही थी जनपदों में
राजनीति सिर्फ राजा और उसके दरबार तक सीमित होती थी
बाहर षड्यंत्रों की कुछ खबरें ही होती थीं गप्प के लिए
जिनसे इतिहास के पन्ने रंग कर आपने
घोटाने की पूरी तैयारी कर रखी है स्कूलों में

औरंगजेब को जानना है तो
औरंगजेब के पास आपको जाना होगा
वह चल कर नहीं आएगा आपके पास सफाई देने

वह अपने भाइयों को मार कर पहुंचा था तख्त तक
नहीं मारता तो खुद मारा जाता अपने उन्हीं भाइयों के हाथों
लेकिन इस बात को याद रखिए कि
किसी दंगे में मासूमों को मार कर वह नहीं आया था
जैसा कि 2002 में किया आपने
न किसी मंदिर को गिरा कर पहुंचा था सत्ता तक
जैसे कि आप आए
बाबरी मस्जिद ढहाते हुए

मैं औरंगजेब के पक्ष में नहीं हूं
लेकिन रोड का नाम बदले जाने पर विचलित हूं

अपनी चौथी जन्म शताब्दी से सिर्फ तीन कदम दूर
औरंगजेब रोड पर दिखता है हमें औरंगजेब
टोपियां बेचता हुआ
लोगों को कुरआन की आयतें सुनाता हुआ
उसकी आवाज के पीछे
चार सौ साल की गहराई लिए
कोई तेज बवंडर सा आता सुनायी देता है हमें

आप सब चाहे एकतरफा वोट डाल दें
फिर भी आप औरंगजेब को इतिहास और स्मृति से
अपदस्थ नहीं कर सकते महोदय
आप किस रोड की बात कर रहे हैं
रोड तो कल भी रहेगा और उसके बाद भी
और औरंगजेब भी रहेगा
और हम भी रहेंगे पुकारने के लिए
बस आप कहीं नहीं होंगे महोदय

आपका समय इतना ही था
जैसे 1914 से 1919
प्रथम विश्वयुद्ध का समय
उसी तरह 2014 से 2019
आपका समय
इसके बाद आपका जाना तय है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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