हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

पूरी दुनिया एक आधा बना हुआ बांध है-3: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/30/2015 09:04:00 PM


आंबेडकर-गांधी बहस के संदर्भ में राजमोहन गांधी को अरुंधति रॉय के जवाब ‘ऑल द वर्ल्ड’ज अ हाफ-बिल्ट डैम’ के हिंदी अनुवाद की तीसरी किस्त. अनुवाद: रेयाज उल हक

[यहां पढ़ें पहली और दूसरी किस्तें]

जाति और छुआछूत के खिलाफ अभियान

मेरी कमजोरियों की राजमोहन गांधी की फेहरिश्त में सबसे ऊपर यह इल्जाम है कि मुझे ‘इसका सीमित ज्ञान’ भी नहीं है कि ‘जाति, नस्ल और धर्म के मामले में गांधी कहां खड़े थे.’ गांधी जिन लोगों को ‘हरिजन’ कहा करते थे उनके प्रति उनकी हमदर्दी और प्यार को दिखाने के लिए राजमोहन गांधी ने ‘द सिन ऑफ अनटचेबिलिटी’[3] के शीर्षक वाले एक लंबे हिस्से में अनेक मिसालों का हवाला दिया है. ऐसा लगता है कि इस नफरत किए जाने वाले और सरपरस्ती भरे शब्द के इस्तेमाल को लेकर बहसों से राजमोहन गांधी या तो नावाकिफ हैं या बेपरवाह हैं. वे कहते हैं: ‘चूंकि (गांधी ने कहा था) ईश्वर सबसे ऊपर है जो मजबूरों का संरक्षक है और चूंकि ‘अछूतों’ से ज्यादा मजबूर कोई नहीं है, इसलिए ‘हरिजन’ शब्द उन्हें मुनासिब लगा था.’ यह राजमोहन गांधी को भी मुनासिब लगता है.

अपने लेख के इस हिस्से में, वे हमें यह समझाते हैं कि कैसे गांधी ने छुआछूत के खिलाफ तब भी अभियान चलाया, जब उन्हें हिंदू कट्टरपंथ के गुस्साए हुए प्रतिनिधियों द्वारा धमकाया गया था. ‘ऊपर दिए गए पैराग्राफों में जो कुछ कहा गया है, रॉय उनमें से कुछ भी जानने की इजाजत अपने पढ़नेवालों को नहीं देतीं,’ वे कहते हैं. मिसाल के लिए ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ में से इसे देखिए:

पूना समझौते के बाद, गांधी ने अपनी सारी ऊर्जा और जोश को छुआछूत को खत्म करने की तरफ मोड़ दिया. शुरुआत के लिए, उन्होंने अछूतों का नाम बदलते हुए उन्हें एक सरपरस्ती भरा नाम दिया जो हिंदू आस्था से मजबूती से बंधा हुआ था: हरिजन. उन्होंने हरिजन नाम से एक नया अखबार शुरू किया. उन्होंने हरिजन सेवक संघ की शुरुआत की जिसके बारे में उन्होंने जोर दिया कि उसमें सिर्फ विशेषाधिकार प्राप्त सर्वण हिंदू ही काम करें जिन्हें अछूतों के खिलाफ पहले के पापों का प्रायश्चित करना हो. आंबेडकर ने इन सबको ‘दयालुता से अछूतों की हत्या’ करने की कांग्रेस की योजना के रूप में देखा.

गांधी ने छुआछूत के खिलाफ उपदेश देते हुए देश भर का दौरा किया. उन्हें अपने से भी ज्यादा रूढ़िवादी हिंदुओं द्वारा सवाल पूछ-पूछ कर तंग किया गया और उन पर हमले किए गए, लेकिन वे अपने मकसद से नहीं हटे. जो कुछ भी हुआ उसे छुआछूत को खत्म करने के मकसद के इस्तेमाल में लाया गया. जनवरी 1934 में बिहार में एक बड़ा भूकंप आया. तकरीबन बीस हजार लोगों ने अपनी जिंदगियां खो दीं. हरिजन में 24 फरवरी को लिखते हुए गांधी ने कांग्रेस के अपने सहकर्मियों तक को हिला दिया जब उन्होंने कहा कि यह छुआछूत के पाप पर चलने के लिए ईश्वर द्वारा लोगों को दी गई सजा है... (रॉय 2014: 129).

इन सबमें सबसे परेशान कर देने वाली बात यह है कि राजमोहन गांधी (गांधी के साथ साथ हिंदू महासभा और उनके पहले से कुछ हिंदू सुधारवादी संगठनों की तरह) छुआछूत के खिलाफ लड़ाई और जाति के खिलाफ लड़ाई को एक ही चीज बना कर रख देते हैं. ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ इस सियासत पर थोड़े विस्तार से चर्चा करती है (रॉय 2014: 53-58, 98-102). उसमें मैंने जो कुछ कहा है, उसे यहां थोड़े में पेश करने दीजिए:

विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के सुधारवादी संगठनों द्वारा छुआछूत की प्रथा के खिलाफ जोरदार प्रचार की शुरुआत 19वीं शताब्दी के आखिर में शुरू हुई थी. उसके पहले, मातहत जातियों में पैदा हुए करोड़ों लोगों ने जाति के अभिशाप से बचने के लिए इस्लाम, ईसाइयत और सिख धर्म अपना लिए थे. ऐसा नहीं लगता था कि किसी को कोई परवाह थी. हालांकि सदी बदलने के साथ जब साम्राज्य के पुराने विचार राष्ट्र राज्य के नए विचारों की शक्ल लेने लगे और प्रतिनिधित्व पर आधारित सरकार की अवधारणा चलन में आई तो एक नया और विस्फोटक सवाल पैदा हुआ: किसका प्रतिनिधित्व करने का अधिकार किसके पास है? अचानक मुसलमान, सिख, ईसाई, हिंदू ऐसे अलग अलग हिस्सों में बंटने लगे जिन्हें आज हम ‘वोट बैंक’ के नाम से जानते हैं. अचानक आबादी की बनावट (जनसांख्यिकी) अहम हो गई. अचानक ही विशेषाधिकार वाले सवर्ण हिंदुओं के लिए यह जरूरी हो गया कि वे 4.45 करोड़ की मजबूत अछूत आबादी को ‘हिंदू पाले’ में रखते हुए अपनी तादाद को बढ़ा लें (यह ऐसी अवधारणा थी, जो इस दौर के पहले वजूद में नहीं थी). धर्मपरिवर्तन की धारा को रोकने के लिए और अछूतों का दिल और दिमाग जीतने के लिए, विशेषाधिकार प्राप्त सवर्ण हिंदू सुधारवादी संगठनों का एक बेड़ा उभर आया. (उनमें से आर्य समाज से जन्मा जात-पांत-तोड़क मंडल एक था, जिसने आंबेडकर को बोलने के लिए बुलाया और फिर जैसा कि सबको पता है, उन्हें तब मना कर दिया जब उन्होंने उनके भाषण एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट को देखा, जिसमें आंबेडकर ने हिंदू ग्रंथों को खारिज किया था.) इन सुधारवादियों को, जिनमें से ज्यादातर जाति में यकीन रखते थे, एक ऐसा तरीका खोजना था, जिससे अछूत बड़ी हवेली में बने रहें, लेकिन उन्हें नौकरों की कोठरियों में रखा जाए. इस मकसद से 1875 में आर्य समाज की स्थापना हुई थी, जो ‘दूषित लोगों की शुद्धि’ करने की शुद्धि योजना चला रहा था और अछूतों की हिंदू धर्म में ‘घर’ लौटा कर ला रहा था. 1899 में स्वामी विवेकानंद ने कहा, ‘हिंदू बाड़े को छोड़ कर जाने वाला हरेक आदमी न सिर्फ एक कमतर आदमी है, बल्कि एक बड़ा दुश्मन है.’ आज नरेंद्र मोदी की निगरानी में शुद्धि को ‘घर वापसी’ के रूप में फिर से शुरू किया गया है.

बेशक ब्रिटिश सरकार बदमाशी के साथ और खतरनाक तरीके से समुदायों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करते हुए इन सब चिंताओं से खेल रही थी. उसने मनमुटाव की जो आग लगाई थी, उसका अंजाम आखिरकार बंटवारे के खूनखराबे में हुआ.

गांधी के दक्षिण अफ्रीका से (1915) और आंबेडकर के कोलंबिया में अपने अध्ययन के बाद (1917) भारत लौटने के वक्त तक, छुआछूत के खिलाफ सुधारकों का अभियान शिखर पर था. कांग्रेस ने छुआछूत के खिलाफ एक प्रस्ताव मंजूर किया था. गांधी और तिलक ने छुआछूत को एक ऐसी ‘बीमारी’ करार दिया था जो हिंदू धर्म के उसूलों के खिलाफ थी. पहली ऑल-इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कॉन्फ्रेंस (विशेषाधिकार प्राप्त जातियों द्वारा आयोजित) बंबई में रखी गई. ऑल-इंडिया एंटी अनटचेबिलिटी मेनिफेस्टो पर तिलक को छोड़ कर सबने दस्तखत किए. 


आंबेडकर इन सभाओं में नहीं गए. वे अछूतों के लिए सरपरस्ती के इस अस्वाभाविक प्रदर्शन को लेकर शंकित थे. उन्होंने देखा कि ये बदलते वक्त के वे तरीके हैं, जिनके जरिए विशेषाधिकार प्राप्त जातियां अछूत समुदाय पर अपने कब्जे को मजबूत करने की कवायद कर रही थीं. वे मानते थे कि सिर्फ कलंक और छुआछूत के इर्द-गिर्द शुद्धता-दूषण के मुद्दे को नहीं, बल्कि खुद जाति को ही खत्म करना होगा. छुआछूत का क्रूर व्यवहार - दूषित करने वाले कदमों के निशानों को बुहारने के लिए कमर से बंधी झाड़ू, दूषित करने वाले थूक को जमा करने के लिए गले में बंधा घड़ा – तो जाति प्रथा का एक प्रदर्शनकारी, कर्मकांडी सिरा था. वे जानते थे कि जाति की असली हिंसा तो हकदारियों को नकारे जाने से पैदा होती थी: जमीन से, धन से, ज्ञान से, बराबरी भरे मौके से.

हिंदू सुधारवादियों ने बड़ी चालाकी से जाति के सवाल को छुआछूत तक सीमित कर दिया था, जिसका मकसद जाति को ठीक-ठीक राजनीतिक अर्थव्यवस्था से और गुलामी के उन हालात से अलग करना था, जिनमें ज्यादातर अछूत रहने और काम करने के लिए मजबूर किए गए थे. जिसका मकसद ठीक ठीक हकदारी के सवाल को, भूमि सुधारों और धन के फिर से बंटवारे के सवालों को छुपा देना था. उन्होंने इसे एक गलत धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथा के रूप में पेश किया जिसमें सुधार की जरूरत थी. गांधी ने इसे और भी संकीर्ण बनाते हुए इसे ‘भंगियों’ का मुद्दा बना दिया – जो ज्यादातर एक शहरी और इसलिए कुछ हद तक राजनीति में दखल रखने वाला समुदाय है.

जब राजमोहन गांधी इन सबकी अनदेखी करते हैं और गांधी की परोपकारी हमदर्दी और छुआछूत के खिलाफ उनके जोरदार अभियान की एक के बाद एक मिसालें पेश करते हैं, तो मैं नहीं कह सकती कि उनकी नजरों का धुंधलापन असली है या चालाकी से अपनाया हुआ. चाहे जो भी हो, इसका अंजाम परेशान कर देने वाली सियासत है.

आंबेडकर और अलग निर्वाचक मंडल

आंबेडकर मानते थे कि जब तक अछूत अपने खुद के प्रतिनिधियों के साथ एक राजनीतिक जनाधार के रूप में में विकसित नहीं होते, तब तक जाति सिर्फ और ज्यादा गहरी ही होगी. उनका मानना था कि ‘हिंदू पाले’ में या कांग्रेस के भीतर अछूतों के लिए आरक्षित सीटें महज दब्बू उम्मीदवारों को ही पैदा करेंगी – ये ऐसे नौकर होंगे जो जानते हों कि मालिकों को कैसे खुश रखना है. लंदन में 1930 में गोलमेज सम्मेलन होने के बरसों पहले उन्होंने अलग निर्वाचक मंडलों के विचार को विकसित करना शुरू कर दिया था. 1919 में उन्होंने चुनावी सुधारों पर साउथबरो कमेटी को एक लिखित बयान सौंपा था:
प्रतिनिधित्व का अधिकार और राज्य के तहत पद रखने का अधिकार वे दो सबसे अहम अधिकार हैं जो नागरिकता को बनाते हैं. लेकिन अछूतों का अछूतपन इन अधिकारों को पहुंच से बाहर कर देता है. कुछ जगहों पर तो निजी आजादी और निजी सुरक्षा जैसे मामूली अधिकार भी उनके पास नहीं हैं और कानून के आगे बराबरी हमेशा उनको सुनिश्चित नहीं होती है. ये अछूतों के हित हैं. और जैसा कि आसानी से देखा जा सकता है, इनका प्रतिनिधित्व सिर्फ अछूतों द्वारा ही किया जा सकता है. ये खास तौर से उनके अपने हित हैं और कोई भी दूसरा उनकी सचमुच पैरवी नहीं कर सकता...(बीएडब्ल्यूएस 1:256, रॉय 2014: 103 में उद्धृत.)

दूसरी तरफ गांधी उल्टी बात में यकीन रखते थे. वे अछूतों और मजदूर वर्ग के लोगों को ऐसे लोगों के रूप में देखते थे, जिन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व की नहीं बल्कि परोपकारी देखरेख की जरूरत थी. चाहे वह (कारखाना मालिकों की तरफ से) गांधी के नेतृत्व वाले मिल मजदूर संघों की बात हो, या फिर 1924 वायकोम सत्याग्रह की बात हो या गोलमेज सम्मेलन या हरिजन सेवक संघ की, उन्होंने बड़ी सावधानी से इसे यकीनी बनाया कि मजदूरों और अछूतों का प्रतिनिधित्व और उनके बारे में बातचीत विशेषाधिकार प्राप्त जातियों द्वारा ही की जाए, जिसमें भी वे खुद को ही तरजीह देते थे.

1931 में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गांधी ने जोर डाला कि आंबेडकर को नहीं बल्कि खुद गांधी को भारत के अछूतों का वाजिब प्रतिनिधित्व करना चाहिए. उन्होंने आंबेडकर पर (जो भारत में एक अछूत के रूप में पले-बढ़े थे और उन्हें अपमान और सामाजिक अलगाव को जानने के लिए दूर दक्षिण अफ्रीका का सफर करने की जरूरत नहीं थी) ‘अपने [गांधी के] भारत को नहीं जानने’ का इल्जाम लगाया. गांधी इस पर राजी थे कि मुसलमान और सिखों के अलग निर्वाचक मंडल हो सकते हैं लेकिन, हालांकि उन्होंने छुआछूत की प्रथा को नकार दिया था (‘छुआछूत बने रहने से अच्छा है कि हिंदू धर्म खत्म हो जाए’), वे अलग निर्वाचक मंडल के लिए आंबेडकर के प्रस्ताव का समर्थन नहीं करेंगे (देखें रॉय 2014: 124). राजमोहन गांधी मुझ पर तोहमत लगाते हैं कि गांधी इस विचार के मुखालिफ क्यों थे इसकी घोषित वजह को मैंने छोड़ दिया है:

सिख इसी रूप में हमेशा बने रह सकते हैं, मुहम्मडन भी, इसी तरह यूरोपीय लोग भी. क्या अछूत हमेशा अछूत बने रहेंगे? (सीडब्ल्यूएमजी 48:298).

लेकिन आंबेडकर ने अछूतों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की मांग हमेशा के लिए नहीं की थी. उनकी दलील यह थी: चूंकि अछूत आबादी देश भर में हिंदू गांवों के बाहर छोटी बस्तियों में बिखरी हुई थी (और अब भी है), उन्होंने महसूस किया कि एक राजनीतिक चुनाव क्षेत्र के भौगोलिक दायरे में वे हमेशा ही एक अल्पसंख्यक बने रहेंगे और कभी भी अपनी पसंद के एक उम्मीदवार को चुनने की हैसियत में नहीं होंगे. इस वजह से वे यकीन करते थे कि अकेले सभी वयस्कों का मत डालने का अधिकार (सबसे ज्यादा वोट पाने वाले को विजेता घोषित करने की व्यवस्था) अछूतों के लिए बराबर अधिकारों को यकीनी नहीं बना सकता. उन्होंने सुझाव दिया कि अनेक सदियों से जिन अछूतों के साथ नफरत और उनकी बेकद्री की जाती रही है, उन्हें एक अलग निर्वाचक मंडल दिया जाए, ताकि वे हिंदू रूढ़िवाद की किसी दखलंदाजी के बिना, अपने खुद के नेतृत्व के साथ एक राजनीतिक जनाधार के रूप में विकसित हो सकें. और वे मुख्यधारा की राजनीति से अपना रिश्ता बनाए रख सकें, इसलिए इसके साथ ही उन्होंने सुझाया कि उन्हें आम उम्मीदवारों के लिए वोट डालने का अधिकार भी दिया जाए. अलग निर्वाचक मंडल और दोहरे वोटों की व्यवस्था दोनों को सिर्फ दस बरसों की मुद्दत तक ही चलना था (देखें रॉय 2014: 122).

एक बरस बाद, जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडॉनल्ड ने उनके प्रस्ताव को मंजूर कर लिया और अछूतों को 20 बरसों की मुद्दत के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल सौंपते हुए कम्युनल अवार्ड की घोषणा की तो गांधी इस प्रावधान को वापस लेने की मांग करते हुए येरवदा जेल में अपने ऐतिहासिक आमरण अनशन पर बैठ गए. आंबेडकर पीछे हटने को मजबूर कर दिए गए और आखिरकार 24 सितंबर 1932 को उन्होंने पूना समझौते पर दस्तखत कर दिए.

पूना समझौता

यह राजमोहन गांधी की आलोचना का शायद सबसे कमजोर हिस्सा है. बेशक वे खुद इस समझौते को मंजूरी देते हैं:
एक साझे निर्वाचक मंडल में दलितों समेत सभी जातियों के अच्छे लोग कभी कभी अपनी जाति से बाहर के वोटों से हारेंगे और कभी ‘बाहरी’ वोटों की बदौलत जीतेंगे.

यह राय गोलमेज सम्मेलन में आंबेडकर के प्रस्ताव के बारे में नादानी को और चुनावों में जाति के काम करने के तरीकों के प्रति नासमझी को उजागर करती है. मामलों को और बदतर बनाते हुए राजमोहन गांधी यह इशारा करते हैं कि आंबेडकर समझौते से खुश भी थे. वे कहते हैं:
आंबेडकर ने 1945 की अपनी हंगामाखेज किताब में न केवल समझौते की शर्तों की आलोचना करने से परहेज किया, बल्कि जहां तक मैं जान पाया हूं, उन्होंने तब या बाद में कभी उस समझौते को खारिज करने या बदलने की कोई कोशिश नहीं की. समझौते को एक ‘शिकस्त’ मानने के बजाए, ऐसा लगता है कि वो इसे एक ऐसी सुलह के रूप में देखते थे, जिसने दलितों समेत हरेक को फायदा पहुंचाया.

यह है वह बात, जो आंबेडकर ने अपने 1945 की ‘हंगामाखेज’ (अगर आप खोज रहे हों तो मालूम हो कि, अब यह एक अच्छी खूबियों वाला, एक हल्का दाग है) किताब में कही थी:

उपवास में कुछ भी नेक नहीं था. यह एक गंदी और गलीज हरकत थी...यह बेसहारा लोगों को प्रधानमंत्री के अवार्ड से हासिल संवैधानिक सुरक्षाओं को छोड़ देने के लिए मजबूर करने और हिंदू लोगों के रहमोकरम पर जीने के लिए राजी कर लेने का घटिया तरीका था. यह एक घिनौनी और दुष्टता भरी हरकत थी. अछूत एक ऐसे आदमी को कैसे ईमानदार और सच्चा मान सकते हैं?

राजमोहन गांधी आंबेडकर की 1945 की मशहूर किताब व्हाट द कांग्रेस एंड गांधी हैव डन दू अनटचेबल्स को गंभीरता से काटना जारी रखते हैं:

आंबेडकर के 1945 की किताब की उग्र भाषा का संदर्भ क्या था, जिसे उन्होंने नई दिल्ली में पृथ्वीराज रोड के अपने आधिकारिक निवास में बैठ कर लिखा था? उस वक्त वे वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य थे...1945 की किताब लिख रहा प्रतिभाशाली चिंतक और सदस्य (असल में मंत्री) वह इंसान भी था जो किसी भी नई ब्रिटिश योजना को प्रभावित करने की चाहत रखता था. साथ ही, वे एक ऐसे सियासी नेता थे जो 1937 के चुनावी नतीजों को भूल पाने में नाकाबिल थे...उन्होंने 1945-46 में बेहतर नतीजों की उम्मीद की थी. 1937 के नतीजों से दुखी आंबेडकर ने 1945 की किताब के जरिए, अपना पक्ष ब्रिटेन के नेताओं और साथ साथ भारत के मतदाताओं के सामने पेश किया.

तो राजमोहन गांधी के मुताबिक आंबेडकर के लेख का जो सीधा मतलब है, उसे वैसा नहीं लिया जाना चाहिए, क्योंकि वो चुनावों में जाने को तैयार एक राजनेता थे और क्योंकि वे ब्रिटिश सरकार की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे. तो क्या गांधी एक राजनेता नहीं थे? क्या वे सरकार की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश नहीं कर रहे थे? या फिर यहां, पुराने चलन के मुताबिक उन्हें जलील किया जा रहा है? छुपा हुआ इशारा यह है कि गांधी तो आजादी के लिए लड़ रहे थे और आंबेडकर एक ब्रिटिश पिट्ठू थे. शायद, सिर्फ दलील के इस सिलसिले को खत्म करने के लिए, हमें आंबेडकर के इन शब्दों की याद दिलाए जाने की जरूरत है:


इस तथ्य से खुश होना बेवकूफी है कि चूंकि कांग्रेस भारत की आजादी के लिए लड़ रही है, इसीलिए यह भारत के अवाम और सबसे दबे-कुचले इंसान की आजादी के लिए भी लड़ रही है. कांग्रेस आजादी के लिए लड़ रही है कि नहीं, यह सवाल इस सवाल के मुकाबले कम अहमियत रखता है कि कांग्रेस किसकी आजादी के लिए लड़ रही है? (बीएडब्ल्यूएस 9: 202, रॉय 2014: 43 में उद्धृत)

राजमोहन गांधी बिल्कुल सही हैं. आंबेडकर ने पूना समझौते को खारिज करने की न कोशिश की न खारिज करवाया. उन्होंने कुछ ऐसा किया जो कहीं ज्यादा गहरा असर डालने वाला था. पूना समझौते को अंजाम देने वाली घटनाओं के प्रति उनकी नफरत ने उन्हें इस बात का कायल बना दिया था कि जब तक अछूत ‘हिंदू पाले’ में बने रहेंगे, तब तक वे अपनी गुलामी की बेड़ियों को फेंक पाने के काबिल नहीं हो पाएंगे. इसलिए उन्होंने अपने लोगों से हिंदू धर्म को छोड़ने का आह्वान किया. 13 अक्तूबर 1935 को बंबई प्रेसिडेंसी (अब महाराष्ट्र) में येवला के डिप्रेस्ड क्लासेड कॉन्फ्रेंस में 10,000 से ज्यादा लोगों से मुखातिब आंबेडकर ने कहा:

चूंकि बदकिस्मती से हम खुद को हिंदू कहते हैं, इसलिए हमारे साथ उसी तरह से पेश भी आया जाता है. अगर हम किसी और आस्था [धर्म- अनु.] के सदस्य होते तो कोई भी हमारे साथ इस तरह पेश नहीं आया होता. आप कोई ऐसा धर्म चुन लीजिए जो आपको बराबरी का दर्जा दे और बराबरी से पेश आए. अब हम अपनी गलतियों को सुधार लेंगे. मेरी बदकिस्मती थी कि मैं अछूत होने के दाग के साथ पैदा हुआ. हालांकि यह मेरी गलती नहीं है; लेकिन मैं एक हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा, क्योंकि यह मेरे बूते में है.

अगले साल 1936 में उन्होंने एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट लिखी.
 

79 बरसों के बाद यह शर्मनाक है कि हम इस बहस को थोड़ा भी आगे बढ़ा पाने के काबिल नहीं हो पाए हैं. असल में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने वाली चुनावी व्यवस्था सबके लिए, और खास कर दलित समुदायों के लिए, लोकतंत्र का मजाक बना रही है.
 

राजमोहन गांधी इतिहास की धंसान में गहरे गोते लगाते हैं और फिर आजादी के बाद के भारत में नमूदार होते हैं:
कांशीराम द्वारा आंबेडकर की विरासत पर बनाई गई बहुजन समाज पार्टी ने हमारे सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में एक बार से ज्यादा सरकार का नेतृत्व किया है, जिसके बारे में कोई कह सकता है कि इसका श्रेय कुछ तो पूना समझौते और साझे निर्वाचक मंडल को जाता है.

यह ‘कोई’ वे ‘कौन लोग’ हैं जो यह ‘कह सकते हैं’? यकीनन कांशीराम यह नहीं कह सकते, जो हमेशा ही पूना समझौते के बाद के दौर को ‘चमचा युग’ कहते थे. 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना करने से पहले उन्होंने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति का गठन किया था. 24 सितंबर 1982 को पूना समझौते की 50वीं सालगिरह पर उन्होंने समझौते को खारिज करने के लिए पूना से लेकर जालंधर तक गांवों और शहरों में एक साथ 60 सभाएं बुलाईं. इस समझौते का भारी उत्सव मनाने की योजना बना चुकी इंदिरा गांधी मंसूबे को रद्द करने पर मजबूर हुई थीं. अनेक दलित संगठनों ने 1932 के कम्युनल अवार्ड की बहाली की मांग की थी और अब भी कर रहे हैं. राजमोहन गांधी ने पूना समझौते को लेकर आंबेडकर की जिस खुशी की खोज की है, उसके बारे में उन्हें बसपा से या फिर तकरीबन किसी भी दलित राजनेता, बुद्धिजीवी या कार्यकर्ता से चर्चा करने के पर विचार करना चाहिए. (देखिए एस. आनंद, ‘ए नोट ऑन द पूना पैक्ट’, बी. आर. आंबेडकर, एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट, पृ. 359-72 में, नवयाना 2014.)

(जारी)

संदर्भ

3. यह आरजी (ईपीडब्ल्यू) का शीर्षक है. आरजी.कॉम पर इस हिस्से का शीर्षक है 'गांधी, अनटचेबिलिटी एंड कास्ट.' 

कत्लेआम जब देशभक्ति बन जाए

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2015 07:30:00 PM


याकूब मेमन की अदालती आदेश से होने वाली हत्या के खिलाफ, लेखक और कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी की यह कविता दिखाती है, कि कैसे कानून और अदालतों के पूरे आडंबर के बीच, व्यवस्था कितनी हिंसक, बर्बर और मध्ययुगीन है.

‘फांसीवाद’ के दौर में एक कविता

अदालतें और हत्यारे
दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू
हत्यारे आवेशित हो कर करते हैं
हत्याएं
पर अदालतें बिलकुल भी नहीं
करतीं ऐसा
वे आवेशित नहीं होती
संपूर्ण शांति से
पूरी प्रक्रिया अपना कर
हर लेती हैं प्राण

दोनों ही करते है हत्याएं
हत्यारे-गैर कानूनी तरीके से
मारते हैं लोगों को
अदालतें कानूनन मारती हैं
सबकी सुनते दिखाई पड़ते हैं मी लार्ड
पर सुनते नहीं हैं
फिर अचानक अपने पेन की
निब तोड़ देते हैं
इससे पहले सिर्फ इतना भर कहते हैं
तमाम गवाहों और सबूतों के मद्देनज़र
ताजिराते हिन्द की दफा 302 के तहत
सो एंड सो को सजा-ए-मौत दी जाती है
मतलब यह कि नागरिकों को
मार डालने का हुक्म देती है
अदालतें
राज्य छीन सकता है
नागरिकों के प्राण
वैसे भी निरीह नागरिकों के प्राण
काम ही क्या आते हैं
सिवा वोट देने के?
अदालतें इंसाफ नहीं करतीं
अब सुनाती हैं सिर्फ फैसले
वह भी जनभावनाओं के मुताबिक
फिर अनसुनी रह जाती हैं दया याचिकाएं

हत्यारे, दुर्दांत हत्यारे,
सीरियल किलर, मर्डरर
सब फीके हैं,
न्याय के नाम पर होने वाले
कत्ल के आगे
फिर इस तरह के हर कत्लेआम को
देशभक्ति का जामा पहना दिया जाता है!

और अंध देशभक्त
नाचने लगते हैं
मरे हुए इंसानी जिस्मों पर
और जीत जाता है प्रचंड राष्ट्रवाद
इस तरह फासीवाद
फांसीवाद में तब्दील हो जाता है
और इसके बाद अदालतें तथा हत्यारे
फिर व्यस्त हो जाते हैं
क़ानूनी और गैर कानूनी कत्लों में।

सामूहिक विवेक

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2015 06:46:00 PM

अपमान, बेदखली, जातीय अत्याचार, आगजनी, फौजी कब्जा, मजलूमों की पीट पीट कर होने वाली हत्याएं, जनसंहार, हत्या, जेल, फांसी: यह इस मुल्क का सामूहिक विवेक है. याकूब मेमन की फांसी कुछ घंटे पहले, विष्णु शर्मा ने इस मुल्क में एक मुसलमान और उसमें भी एक कश्मीरी मुसलमान की आजमाइश का एक खाका खींचने की कोशिश की है.

भाग-1

‘अफजल गुरु की फांसी पर तुम क्या कहते हो, यासिर’, उसने पूछ ही लिया। सुबह जब से टीवी में यह समाचार आना शुरू हुआ है तब से अफलज की मौत पर मैंने उतना नहीं सोचा जितना इस सवाल के पूछे जाने के बारे में! मेरे नाम यासिर है और मैं कश्मीरी हूं। क्या इसलिए यह जरूरी है कि कसाब, यासिन मलिक, हाफिज सईद पर मेरे पास हमेशा एक जवाब हो। और यह भी कि जवाब देते वक्त मेरी शक्ल में ‘सॉरी’ शब्द का एक एक हर्फ साफ दिखाई देता हो। SORRY

हमारा एक दफ्तर है। दफ्तर में हम सात लोग हैं। समाचार चैनल के इस ब्यूरो में बस मेरा ही नाम यासिर है और मैं ही कश्मीरी हूं। अब पूरा एक साल होने को है मुझे यहां काम करते हुए और अब मुझे यह पता होता है कि किन खबरों पर चार गर्दनें मेरी ओर घूम जाती हैं। मुझे अहसास हो ही जाता है। मुझे मुड़ कर देखना नहीं पड़ता। मैं कीबोर्ड पर उंगलियां ठकठकता रहता हूं। मुझे पता है इतने दिनों में ये चार गर्दनें भी इतनी ‘संवेदशील’ हो गई हैं कि घूमने के लिए अक्ल के हुक्म की मोहताज नहीं हैं। बस झट से घूम जाती हैं। मेरे पड़ोस में रहने वाले फैज़ के कुत्ते की तरह। हाथ में कुछ हो न हो बस फेंकने का इशारा करो और वो लेने दौड़ पड़ता है।

आपस में ये लोग कैसी बातें करते हैं?

‘तिलक, वो फिल्म देखी?’

‘न मोहन भाई, टाईम ही नहीं मिला।’

‘किसी दिन वल्लभ के घर पार्टी करते है, क्यों जवाहर?’

‘किसी और दिन क्यों आज ही चलों।’

लेकिन मेरे पहुंचते ही जैसे पाकिस्तान ने हमला कर दिया हो। अचानक सब के सब देशभक्त हो जाते हैं।

‘क्यों यासिर, कब तक ऐसा चलेगा यार?’

‘क्या?’

‘यही यार सालों ने सर काट दिए हमारे जवानों के। मतलब ह्यूमन राईट्स कोई चीज है कि नहीं।’

मैंने भी तो सुन रक्खा है इस ह्यूमन राईट्स के बारे में। अक्सर इसे बोलते भी सुना है। पर न जाने क्यों यहां इसकी भाषा हमेशा हिंदी होती है। जैसे ही यह भाषा बदलता है वैसे ही राईट्स का तलफ्फुज़ बगावत हो जाता है। और बागी की सजा मौत है।

फिर ऐसा नहीं है कि तिलक, मोहन, वल्लभ और जवाहर को ह्यूमन राईट्स की, अभिव्यक्ति की आजादी की चिंता नहीं है। है। अभी हाल में इन लोगों ने ‘विश्वरूपम्’ पर लगी रोक के खिलाफ खूब नारेबाजी की थी। मुफ्ती आज़म ने जब कश्मीरी बैंड के खिलाफ फतवा जारी किया था तब भी इन लोगों ने जमीन-आसमान एक कर दिया। ‘कानून से बड़ा कोई नहीं हैं’, वल्लभ ने कहा था। जिसे अन्य तीनों ने हर थोड़े अंतराल के बाद दोहराया था। फिर सबने मिल कहा था, ‘साला इस देश का गृह मंत्री है कि पाकिस्तान का? कुछ नहीं मिला कहने को तो ‘हिंदू आतंकवाद’ कह दिया। ऐसे साले गद्दारों को तो चैराहे पर फांसी देनी चाहिए। क्यों यासिर?’

मैं क्या कहता? कह तो देता कि तुम साले गृह मंत्री के बयान के जीते जागते सबूत हो। पूछ तो लेता कि क्या उस दाढ़ियल गुजराती से, जो हर दशहरा वाले दिन हथियारों की पूजा करता है, जिसके लिए तुम्हारे दिल दिवानों की तरह धड़कते है, असंख्यक लोग आतंकित नहीं रहते हैं। मैं पूछना चाहता था कि कैसे यह आतंकवाद नहीं है, लेकिन मैने जाने दिया। एक बार ऐसा कहा था, तो तिलक चीखने लगा। ‘तो तू क्यों नहीं चला जाता पाकिस्तान। तुम लोग यहां रहते क्यों हो। साले खाते यहां का हो लेकिन सोचोगे वहां के बारे में। कुछ तो शर्म करो बे।’

ऐसा नहीं है कि उसने इस सब के लिए बाद में माफी नहीं मांगी। उसने बाद में आ कर कहा था, ‘सॉरी यार मैंने कुछ ज्यादा ही कह दिया। लेकिन तू देख तो रहा है न, क्या हो रहा है इस देश में? मैं तुझे कुछ नहीं कह रहा। तू तो हमारा अपना है। लेकिन कुछ लोग समझते नहीं कि उनके एक कदम से सारी कौम का नाम खराब होता है।’ मैने इस बार भी कुछ नहीं कहा बस सर हिलाता रहा। शायद उन्हें उम्मीद है कि एक दिन मैं भी ए वेन्सडे फिल्म का नसीरूद्दीन शाह बनूंगा।

भाग-2

इस शहर में यह मेरा दूसरा साल है। मैं तो आना ही नहीं चाहता था। मां ने मिन्नतें कीं तो चला आया। वहां रह भी कहां पाता। गुमशुदा हो जाता, मर जाता या खामोश हो जाता। वहां बाजार जाते वक्त, स्कूल जाते वक्त सतर्क रहना पड़ता है। एक दिन ‘अबे बहनचोद, उधर से निकल’, सुनते ही मैं लौट आया था और फिर कभी बाजार नहीं गया। यहां भी बाजार कभी नहीं जाता। चुपचाप अपने कमरे में लेटा टीवी देखता रहता हूं। वहां पुलिस के हाथों में बंदूक है, यहां के लोग पुलिस की आखें हैं।

जब से आईआईएमसी में दाखिला लिया तभी से ज़ाकिर नगर के इसी कमरे में रहता हूं। जाना चाहता हूं यहां से पर जा नहीं पा रहा हूं। शुरू शुरू में यह शहर कितना खुशनुमा लगता था। बाद में मैं इससे भी डरने लगा। दो चार लोग एक साथ ऊपर नीचे होते हैं तो लगता है किसी की तलाशी हो रही है, किसी को लेने आए हैं। मगर शुरू में ऐसा बिलकुल नहीं था। मैं कॉलेज के बाद अक्सर सीसी बाजार चला जाता था। लोगों से मुलाकात करता था। फिल्म देखने जाता था। लेकिन उस दिन जैसी बात उस रेढ़ी वाले ने की उसके बाद सीसी को मैने अलविदा कह दिया। भाई दिल्ली घूमने आए थे। हम उनके लिए एक पैंट खरीद कर लाए। पैंट पीछे से फटी निकली। लौटाने गए तो साले ने लेने से ही मना कर दिया। मन तो किया कि साले को पीट दूं लेकिन फिर मकान मालिक की वह बात याद आ गई जो उसने मकान किराए से देते हुए कही थी। ‘देखों भाई, सब कुछ करो लेकिन पुलिस घर पर नहीं आनी चाहिए। हमें यहीं रहना है।’ हम दोनों भाई लौट आए। पैंट मैंने रिक्शे में ही छोड़ दी।

हिंदुस्तान में केरल है, मुम्बई है और भी बहुत सी जगहें हैं जहां मैं जाना चाहता हूं। मेरे मुल्क के लोग जाते हैं। लेकिन कोई अकेला नहीं जाता। हमें साथ चलना होता है। अब मैं अकेला रहता हूं इसलिए कहीं नहीं जाता। हर तीन-चार माह में एक बार कश्मीर जाता हूं। फिर आ जाता हूं।

भाग-3

अक्सर मुझे कुछ भले लोग मिलते हैं। मेरे दोस्त बन जाते हैं। लेकिन फिर न जाने क्यों मुझे यह यकीन दिलाने के लिए कि वे मेरे अच्छे दोस्त हैं मुझ से कुरआन मांगते है। कुरआन तो कहीं भी मिल सकता है। पढ़ने के लिए मेरा ही इंतजार कर रहे थे क्या। मैं फिर भी कहीं से ढूंढ़ कर ला देता हूं।

‘यार देखो, सभी धर्मों में एक ही बात है।’ उसने कुरआन हाथ में लेते हुए कहा।

‘जी’, मैंने उसका दिल रखने के लिए कह दिया।

‘कब तक हम आपस में लड़ते रहेंगे, भाई? हमें मिल कर रहना सीखना होगा। हमारे नौजवान भटके हुए है।’

‘मैं आप की इस बात से एकदम सहमत हूं’, मैंने उससे कहा।

‘एकदम’, उसने एक बड़े भाई की तरह मेरे कंधों पर हाथ रख दिया।

मैंने फिर कहना शुरू कर दियाः ‘न जाने क्या पढ़ाया जाता है इन्हें। न इतिहास का पता है, न भूगोल का। बस कश्मीर हमारा, कश्मीर हमारा की रट लगाए रहते हैं।’

‘बिलकुल।’

‘हां। अरे, कब से कश्मीर तुम्हारा हो गया। कश्मीर कश्मीरियों का है। जबरन सेना घुसेड़ दी, कब्जा कर लिया। कलम तुम्हारा, कागज़ तुम्हारा लिख दिया कश्मीर हमारा। खुद ही इन लोगों ने हिंदोस्तान का ऐसा नक्शा बनाया कि वह वह ‘मां’ दिखाई देने लगा। अरे कौन समझाए इन लोगों को कि धरती गोल है। जो तुम्हें सर दिखता है वह दूसरे को पैर दिखता है, तीसरे को...।’ मैं ऐसा कह ही रहा था कि वह उठ कर चला गया। कुरआन ले जाना भी भूल गया।

भाग-4

‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’, तिलक ने कोई आठ-नौ बार कहा था लेकिन ठीक से नहीं हो पाया। भगत सर ने मुझसे कहा कहने के लिए तो मैंने एक ही बार में ठीक से कह दिया। उन्होंने मुझे तिलक का रोल दे दिया। हम सब आईआईएमसी के वार्षिक समारोह की तैयारी कर रहे थे। उस साल के समारोह का थीम ‘1857’ था। भगत सर का लिखा नाटक 1857 से 30 जनवरी 1948 के हिंदुस्तानी इतिहास की झांकी था।

आनंद, जो अंग्रेज बना था, मोहन, जो गांधी बना था, से कहता हैः ‘अगर अंग्रेज हिंदुस्तान से चले गए तो यहां निरंकुशों का राज हो जाएगा। हैंडिल नहीं कर पाओगे तुम।’

गांधी के किरदार में मोहन कहता है, ‘मैं विदेशी दयावान मालिकों की अपेक्षा स्वदेशी निरंकुशों के अधीन रहना अधिक पसंद करूंगा।’

हमने वह नाटक बामुश्किल एक साल पहले खेला था लेकिन इन सालों को कुछ याद ही नहीं है। अभी अभी कुछ ही दिन पहले ये मोहन इसी न्यूज रूम में चीख रहा था, ‘कश्मीर को एक मिनट के लिए हिंदुस्तान से अलग कर दो, साले चला नहीं पाएंगे।’ और इस तिलक के बच्चे के लिए ‘स्वराज’ कहने वाला हर कश्मीरी आतंकवादी है। कभी कभी सोचता हूं इतिहास का कोई मतलब-वतलब होता भी है कि नहीं।

वापस: भाग-1

‘अफजल गुरु की फांसी पर तुम क्या कहते हो, यासिर?’

‘मुझे क्या कहना चाहिए, मालिक?’

‘भाजपा से सारे चुनावी मुद्दे छीन लिए कांग्रेस ने।’

‘यही तो मैं कहना चाहता था। अफजल आतंकी नहीं था। वो एक चुनावी मुद्दा था। कल तक मारा नहीं यह सोच कर कि वोटों पर असर पड़ेगा। आज मार दिया कि वोटों पर असर पड़ेगा। सालों, वह आदमी था, मेंढक नहीं कि उस पर लोकतंत्र का प्रयोग कर रहे थे तुम लोग। साले आतंकियों, कितनी दहशत फैलाओगे बे तुम लोग।’

‘ये क्या बोल रहा है, भाई तू?’

‘चुपबे साले। एक बार और मुझे भाई कहा ना तो तेरा वो हाल करूंगा कि...’

तिलक, जवाहर और वल्लभ सब अपनी अपनी अपनी सीटों पर जा कर बैठ गए। अब साले कम से कम मेरे आगे तो कुछ नहीं बोलेंगे। अब भले एक दिन ये लोग मुझे भी सूली पर लटका ही क्यों न दें।

नेपाल में गायः पवित्र जीव से राष्ट्रीय पशु तक

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2015 12:55:00 PM

पत्रकार विष्णु शर्मा नेपाल के मौजूदा सियासी और समाजी हालात पर लेखों की एक शृंखला लिख रहे हैं. पेश है उसकी पहली कड़ी, जिसमें वे गाय को नेपाल का राष्ट्रीय पशु मानने के संदर्भ से शुरू करके, संविधान बनने की कवायद में निहित प्रतिक्रियावादी राजनीति की पड़ताल कर रहे हैं. 

नेपाल के नए संविधान में भी गाय को राष्ट्र पशु स्वीकार किया गया है। अब एक ‘गणतंत्र’, ‘धर्मनिर्पेक्ष’, ‘समाजवाद उन्मुख’, ‘बहुजातीय’, ‘बहुभाषिक’, ‘बहुधार्मिक’, ‘बहुसांस्कृतिक’ तथा ‘भौगोलिक विविधायुक्त’ देश की मां गाय होगी जो दूध देगी और पंचगव्य से रोगों का निदान होगा। अब नेपाली जनता बिना किसी धार्मिक दबाव के कानूनी तौर पर गाय पर गर्व कर सकेगी। इसके साथ गौ हत्या के आरोपियों को मौत की सजा देने की धर्मनिरपेक्ष मांग का विकल्प खुला रहेगा। अभी गौ हत्या की अधिकतम सजा 12 वर्ष है। एक अध्ययन के अनुसार गौ हत्या के मामले में सारे आरोपी जनजाति, पिछड़ी मानी जाने वाली हिन्दू जातियां या अल्पसंख्यक समुदाय से हैं।

वैसे 1962 से ही नेपाल का राष्ट्रीय जानवार गाय है। और गाय इसलिए है कि 1962 के संविधान में ही पहली बार नेपाल को राजसी हिन्दू राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया गया था। इससे पहले नेपाल में गाय एक पवित्र जानवर था। अधुनिक नेपाली राष्ट्रवाद का जन्म भी इसी समय शुरू हुआ। राजा महेन्द्र ने हिन्दू धर्म को नेपाली राष्ट्रवाद का रूप दिया और गैर हिन्दू आबादी का जबरन हिन्दूकरण करना शुरू किया। राजा महेन्द्र ने ‘एक देश, एक वेष, एक भाषा’ नेपाल की तमाम राष्ट्रीयताओं पर लागू किया। यह अनायास नहीं है कि नेपाली इतिहास के ठीक इसी बिन्दु पर नास्तिक माने जाने वाले कम्युनिष्ट दल नेपाली राजनीति के रंगमंच पर स्थापित होना शुरू हुए।

नेपाल के संदर्भ में गाय का सवाल मात्र एक जानवर का सवाल नहीं है बल्कि यह इतिहास के उस कालखण्ड से जुड़ा है जब वर्तमान नेपाली भू-क्षेत्र में हिन्दू रियासतें स्थापित होना शुरू हुईं। भारत में इस्लामिक सत्ताओं के विस्तार और बढ़ते प्रभाव ने हिन्दू राजाओं को पहाड़ों की और ढकेल दिया। इन लोगों ने पहाड़ों में कई छोटे छोटे राज्यों की स्थापना की। बाद में गोरखा राज्य के राजा पृथ्वीनारायण शाह ने इन्हीं राज्यों का ‘एकीकरण’ करके आधुनिक नेपाल राज्य का निर्माण किया। गोरखा नाम संस्कृत शब्द गौरक्षा से आया है। इसलिए जब गाय को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का राष्ट्रीय पशु माना जाता है तो तमाम भलमनसाहत के बावजूद हिन्दू राष्ट्र के प्रवेश का चोर दरवाजा खुला रह जाता है।

यह दलील दी जा सकती है कि नेपाली राजनीति को भारतीय ढांचे में रख कर नहीं देखना चाहिए या इसका अध्ययन भारतीय संवेदना के साथ नहीं होना चाहिए। यह भी कहा जा सकता है कि शायद नेपाल के लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता। यह सच है कि नेपाल के लोग गाय के सवाल पर वैसी बहस नहीं कर रहे हैं जैसी बहस भारतीय संविधान के निर्माण के वक्त हो रही थी। भारत की संविधान सभा में बहस करते वक्त डॉ आम्बेडकर कहते हैं कि हम पिछले सात दिनों से इस (गाय) पर बहस कर रहे हैं। नेपाल की संविधान सभा ने एक मिनट भी इस पर चर्चा हुई हो ऐसा प्रमाण नहीं मिलता।

लेकिन जरूरी बात इस बात की जांच करना है कि नेपाल के संविधान निर्माता गाय को कैसे देखते हैं। जब वो गाय को राष्ट्रीय पशु कहते हैं तो गाय के कौन से गुणों को चिह्नित करते हैं। बेशक कृषि प्रधान देश में गाय एक उपयोगी पशु है। लेकिन गाय की उपयोगिता सिर्फ दूध, बैल पैदा करने और गोबर देने में नहीं है। गाय स्वस्थ मांस का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। यहीं वह पेंच है जिसकी पड़ताल किए बिना गाय को संविधान को चरने के लिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए था।

इन्टरनेट पर उपलब्ध नेपाली पाठ्यक्रम की पाठ्य पुस्तकों में गाय पर सामग्री का अध्ययन करने से संविधान और नीति निर्माताओं की जिस मानसिक स्थिति का संकेत मिलता वो वाकई देश के धर्मनिरपेक्ष भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। पाठ्यक्रम में जो सामग्री है उसके अनुसार गाय राष्ट्रीय पशु है क्योंकि वह दूध देती है और हिन्दूओं के लिए पूज्य है। यदि पाठ्यक्रम यह भी संदेश होता कि गाय के दूध के साथ उसका मांस भी प्रोटीन का अच्छा स्रोत है तो भी शायद गाय का विरोध नहीं करना पड़ता। गाय और हिंदू धर्म का गहरा संबंध है। एक तरह से ये दोनों शब्द एक दूसरे के पूरक हैं। डॉ आम्बेडकर ने गौ मांस खाने वाले और न खाने वालों को छूत और अछूत की विभाजन रेखा माना है।

राष्ट्रीय प्रतीक क्या है? किसी पशु, पक्षी या चिह्न को राष्ट्रीय घोषित करने के क्या मायने होता है? इन सवालों के कई जवाब हो सकते हैं लेकिन सबसे तार्किक जवाब यही लगता है कि राष्ट्रीय प्रतीक या चिह्न राष्ट्र के इतिहास और संस्कृति के वे चिह्न होते हैं और इनका चुनाव करते समय लोग यह तय करते हैं कि वे राष्ट्र को किस संस्कृति और इतिहास के किस हिस्से से जोड़ कर देखना चाहते हैं। राष्ट्रीय प्रतीकों का चुनाव समावेश और बहिष्कार की एक साथ होने वाली प्रक्रिया हैं। और ठीक इन्ही बिन्दु पर देश का चरित्र स्पष्ट होता है। नेपाल में गाय को इस तरह समझना आज की आवश्यकता है।

इसके साथ यदि नेपाल को उसके इतिहास और दक्षिण एशिया के संदर्भ से अलग करके देखा जा सकता तो भी गाय कोई बहुत गंभीर बहस को पैदा नहीं करती। लेकिन अफसोस कि नेपाल को दक्षिण एशिया और उसके इतिहास के साथ ही समझा जा सकता है। इसलिए यहां गाय एक राष्ट्रीय पशु से बढ़कर एक राष्ट्रीय चुनौती है जिसने अक्सर राष्ट्रीय आपदा को जन्म दिया है।

जैसा कि उपर कहा गया है भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भी गाय पर लंबी बहस की। संविधान सभा में गौ हत्या पर निरपेक्ष (ब्लैंकेट) प्रतिबंध लगाने की मांग भी हुई लेकिन डॉ आम्बेडकर ने इस प्रतिबंध के पक्ष में धार्मिक आस्था वाली दलील को अस्वीकार कर आर्थिक दलीलों को स्वीकार किया और संशोधन में यह रखा गया कि राज्य उपयोगी जानवरों की हत्या पर रोक लगाने का प्रयास करेगा। इस तरह संविधान निर्माताओं ने एक बड़ी आबादी को राहत दिलाई।

द किंग एण्ड काउः ऑन ए क्रूशियल सिंबल ऑफ हिन्दूआईजेशन इन नेपाल में एक्सिल माईकल्स लिखते हैं कि नेपाल में गाय का प्रयोग कतिपय राष्ट्रीय समूहों और दुर्गम क्षेत्रों के एकीकरण और उन पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए किया गया। वे इसी निबंध में लिखते है कि शाह राजाओं और राणाओं ने नेपाल राज्य की विचारधारा को गौ हत्या पर प्रतिबंध से जोड़ कर देखा। 1854 के मुल्की ऐन अथवा सिविल कोड में कहा गया है कि, ‘कलयुग में यही एक मात्र राज्य है जहां गाय, स्त्री और ब्राह्मण की हत्या नहीं हो सकती।’

1939 में जब तत्कालीन राणा प्रधान मंत्री महाराजा जुद्धा शमशेर ने कलकत्ता का भ्रमण किया तो तमाम भारतीय समाचार पत्रों ने उन की यह कह कर प्रशंसा की कि वे एक ऐसे देश के प्रतिनिधि हैं जो हिन्दू राष्ट्र का प्रतीक है। हिन्दू आउटलुक नाम की पत्रिका में छपे एक लेख में जुद्धा शमेशर की प्रशंसा करते हुए लेखक ने लिखा है, ‘एक पवित्र हिन्दू की तरह महाराजा महान गौ पूजक हैं’।

उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में गाय को इस आसानी से राष्ट्रीय पशु स्वीकार कर लेना चिंतनीय होने के साथ निंदनीय भी है। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी ऐसे जानवर को राष्ट्रीय पशु की मान्यता कैसे दे सकता है जिसके हवाले से नेपाली की बहुसंख्य जनता का उत्पीड़न किया जाता रहा है। गाय का राष्ट्रीय पशु हो जाना नेपाल को आज ठीक उसी बिन्दु पर खड़ा कर दे रहा है जहां से असंख्य विद्रोहों का सूत्रपात हुआ था।

(जारी)

पूरी दुनिया एक आधा बना हुआ बांध है-2: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/25/2015 12:52:00 AM


यहां पेश है आंबेडकर-गांधी बहस के संदर्भ में राजमोहन गांधी को अरुंधति रॉय के जवाब ‘ऑल द वर्ल्ड’ज अ हाफ-बिल्ट डैम’ के हिंदी अनुवाद की दूसरी किस्त. पहली किस्त यहां पढ़ें. इस अनुवाद में गांधी की रचनाओं या भाषणों के उद्धरणों के हिंदी अनुवाद के लिए भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा हिंदी में प्रकाशित गांधी के अधिकृत समग्र लेखन संपूर्ण गांधी वांग्मय से मदद नहीं ली जा रही है क्योंकि उसमें हिंदी में दिए गए पाठ और उसके अंग्रेजी संस्करण (सीडब्ल्यूएमजी) के पाठ में काफी फर्क है, जिसका हवाला इस बहस में बार बार दिया जा रहा है. इसलिए बहस को उसकी सही शक्ल में पेश करने के लिए इस अनुवाद में उद्धृत अंशों का भी अनुवाद किया जा रहा है. अनुवाद: रेयाज उल हक

 

अब मुझे राजमोहन गांधी के कुछ खास और बड़े आरोपों पर गौर करने दीजिए:

‘द आइडियल भंगी’

वे कहते हैं,
यहां (अनगिनत संभावित छूटों में से) एक और चीज छोड़ी गई है. वे गांधी की एक रचना ‘द आइडियल भंगी’ के काफी मजे लेती हैं (पृ.132-33) और सफाई को लेकर गांधी की चिंता का मजाक उड़ाती हैं और इसमें से कई वाक्य पेश करती हैं. लेकिन वे बड़ी सावधानी से उस वाक्य को छोड़ देती हैं जो भंगियों के साथ तब/अब होने वाले व्यवहार पर गांधी के गुस्से को जाहिर करता है. यह 28 नवंबर 1936 को हरिजन में प्रकाशित हुआ था: ‘लेकिन मैं इतना जानता हूं कि भंगी को तुच्छ मान कर हम – हिंदू, मुसलमान, ईसाई और सभी – पूरी दुनिया की नफरत के लायक हो गए हैं.’ (सीडब्ल्यू 64:86) हां, गांधी जातीय नाइंसाफियों से और भारत की गंदगी से और बहुत कुछ से परेशान थे (आरजी.कॉम).

नीचे मैं ‘द आइडियल भंगी’ से वह हिस्सा पेश कर रही हूं, जिसे मैंने ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ में अपनी टिप्पणी के साथ उद्धृत किया है (रॉय 2014: 132-33). पढ़नेवाले खुद ही फैसला कर सकते हैं कि जिस वाक्य को मैंने बड़े ‘शरारती तरीके से’ छोड़ दिया था, क्या उसकी गैरमौजूदगी से निबंध के मतलब या उसकी आत्मा पर कोई फर्क पड़ रहा है:

1936 में उन्होंने [आंबेडकर ने] आग लगा देने वाली (और महंगी, जैसा कि गांधी ने सरपरस्ती वाले लहजे में टिप्पणी की थी) रचना एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट प्रकाशित की […] उसी साल गांधीजी ने भी साहित्य में यादगार योगदान दिया. वे अब तक अड़सठ साल के हो चुके थे. उन्होंने ‘द आइडियल भंगी’ नाम से एक प्रतिष्ठित निबंध लिखा: ब्राह्मण का धर्म जैसे आत्मा को साफ रखना है, उसी तरह भंगी का धर्म समाज के शरीर को साफ रखना है...ऐसा होते हुए भी अभागा भारतीय समाज भंगी को सामाजिक अछूत बताता है, उसे पायदान की सबसे निचली सीढ़ी पर रखा जाता है, उसे गाली और लात खाने लायक माना जाता है, वह एक ऐसा जीव है जो जाति के लोगों की जूठन पर पलता है और कूड़े के ढेर पर रहता है.

अगर हमने सिर्फ भंगी की हैसियत को ब्राह्मण के बराबर मान लिया होता, हमारे गांव और उनके निवासी साफ-सफाई और व्यवस्था की तस्वीर बन गए होते. इसलिए मैं बिना किसी हिचक या संदेह के यह कहने का साहस करता हूं कि जब तक ब्राह्मण और भंगी के बीच अपमानजनक फर्क को मिटा नहीं दिया जाता, तब तक हमारा समाज सेहत, समृद्धि और शांति का सुख नहीं उठा सकेगा और खुशहाल नहीं हो पाएगा.

फिर [गांधी ने] उन शैक्षणिक जरूरतों, व्यावहारिक कौशल और हुनर का एक खाका दिया जो एक आदर्श भंगी में होनी चाहिए:

‘तब समाज के ऐसे एक सम्मानित सेवक के व्यक्तित्व में किन गुणों की झलक होनी चाहिए? मेरी राय में एक आदर्श भंगी को सफाई के उसूलों का पूरा ज्ञान होना चाहिए. उसे पता होना चाहिए कि एक सही शौचालय कैसे बनता है और उसे साफ करने का सही तरीका क्या है. उसे पता होना चाहिए कि पेशाब-पाखाने की बदबू से कैसे पार पाएं और उसे खत्म कैसे करें. इसको नुकसान रहित बनाने के लिए विभिन्न असंक्रामकों के बारे में भी उसे पता होना चाहिए. इसी तरह उसे पेशाब और पाखाने को खाद में बदलने के तरीके के बारे में पता होना चाहिए. लेकिन इतना ही काफी नहीं है. मेरे आदर्श भंगी को पाखाने और पेशाब की गुणवत्ता के बारे में पता होगा. वह उन पर नजदीकी से नजर रखेगा और संबद्ध व्यक्ति को सही वक्त पर चेतावनी देगा...’

मनुस्मृति कहती है कि काबिलियत होने के बावजूद शूद्र को धन जमा नहीं करना चाहिए, क्योंकि धन जमा करने वाला शूद्र ब्राह्मण को खटकता है. गांधी एक बनिया थे, जिसके लिए मनुस्मृति सूदखोरी को ईश्वरीय धंधा करार देती है, यही गांधी कहते हैं:

‘ऐसा आदर्श भंगी अपने पेशे से अपनी रोजी हासिल करते हुए, इसे सिर्फ एक पवित्र धर्म मानेगा. दूसरे शब्दों में, वह धनी बनने के सपने नहीं देखेगा.’

इसे ध्यान में रखें कि गांधी नहीं चाहते थे कि ‘भंगी’ (पाखाना साफ करने वालों को वे यही कहना पसंद करते थे) कथित तौर पर ईश्वर द्वारा तय किए गए, दूसरे लोगों के पाखाने को साफ करने के अपने इस पेशेवर धंधे से भी धन जमा नहीं करें, जबकि दूसरी ओर उन्होंने ट्रस्टीशिप का अपना मशहूर उसूल विकसित किया था: ‘अमीर लोगों की दौलत उनकी मिल्कियत में रहने दी जानी चाहिए...’ (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी यानी सीडब्ल्यूएमजी 79:133-34, रॉय 2014: 90 पर उद्धृत). तब की तरह अब भी बनिया लोग ही अमीर हैं. यकीनन गांधी जातीय नाइंसाफियों से परेशान थे, लेकिन खुद जाति से उन्हें कोई परेशानी नहीं थी. उन्होंने एक बार भी साफ साफ और निश्चित शब्दों में इसको खारिज नहीं किया. अपने बाद के जीवन में कुछ मौकों पर जब उन्होंने नरमी के साथ इसकी आलोचना भी की तो उन्होंने सुझाव दिया कि इसकी जगह वर्ण व्यवस्था को लाया जाना चाहिए – जिसको आंबेडकर ने जाति व्यवस्था का
जनक बताया था. गांधी ने वंशानुगत पेशों की परंपरा में अपने यकीन को लगातार दोहराया. और चूंकि राजमोहन गांधी हमें ऐसी तारीफ के साथ ‘द आइडियल भंगी’ पेश करते हैं तो क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि वे अपने दादा के नजरिए से सहमत हैंॽ

इत्तेफाक से, ऐसा एक और इंसान भी है जो इस नजरिए से सहमत है: अपनी किताब कर्मयोगी में (जिसको बाल्मीकि समुदाय के विरोध के बाद उन्होंने वापस ले लिया), नरेंद्र मोदी ने लिखा है:

मैं नहीं मानता कि वो यह काम केवल अपनी आजीविका चलाने के लिए करते रहे हैं. अगर ऐसा होता तो उन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे काम को जारी नहीं रखा होता...किसी समय किसी व्यक्ति को यह ज्ञान प्राप्त हुआ होगा कि समग्र समाज और देवताओं की खुशी के लिए काम करना उनका (बाल्मीकियों का) धर्म है; कि देवताओं द्वारा उन्हें सौंपा गया यह काम करना होगा; और यह काम सदियों से आंतरिक आध्यात्मिक गतिविधि की तरह जारी रहना चाहिए. (शाह 2012 से उद्धृत, रॉय 2014: 133).

महाड सत्याग्रह

राजमोहन गांधी ने मुझ पर इल्जाम लगाया है कि मैंने मार्च 1927 में महाड सत्याग्रह पर गांधी की टिप्पणियों को जानबूझ कर और बेईमानी से महज यह कहते हुए दबा दिया है कि गांधी ने ‘हमले के सामने अछूतों के सब्र बारे में सहमति जताते हुए’ लिखा. उनका कहना है कि मुझे यह जोड़ना चाहिए था कि सत्याग्रह के एक महीने के बाद 28 अप्रैल 1927 में यंग इंडिया में गांधी ने लिखा था कि ‘डॉ. आंबेडकर द्वारा कथित अछूतों को तालाब पर जाकर अपनी प्यास बुझाने की सलाह देते हुए बंबई लेजिस्लेटिव काउंसिल और महाड म्युनिसिपैलिटी के प्रस्ताव को परखना न्यायोचित था.’ यह भी कि महात्मा ने ‘छुआछूत का विरोध करनेवाले हरेक हिंदू’ से कहा कि वे महाड के अछूतों का सार्वजनिक बचाव करें ‘भले ही उनका अपना सिर फूट जाने का जोखिम हो’ (सीडब्ल्यू 33: 268). यह सच है कि मैंने इन उद्धरणों को शामिल नहीं किया था. (हालांकि इसे बेईमानी से दबाया जाना कहना, मेरे ख्याल से, थोड़ा ज्यादा ही है.)

‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ में तथ्यों को इस तरह पेश किया गया है. गांधी पहले महाड सत्याग्रह में मौजूद नहीं थे. आंबेडकर और उनके साथियों ने मंच पर उनकी एक तस्वीर लगाई क्योंकि तब वे उनकी प्रेरणा के स्रोत थे. राजमोहन गांधी ने जिस बात का जिक्र छोड़ दिया है वो यह है कि उस साल बाद में एक दूसरा महाड सत्याग्रह भी हुआ था (दिसंबर 1927) जिसमें पहले के मुकाबले ज्यादा तादाद में लोग जमा हुए थे. उसी महीने में गांधी, लाहौर में ऑल इंडिया सप्रेस्ड क्लासेज कॉन्फ्रेंस में बोले थे, जहां उन्होंने अछूतों से कहा था कि वे अपने अधिकारों की खातिर लड़ने के लिए ‘मीठी मीठी बातों से समझाने-बुझाने से काम लें, न कि सत्याग्रह से क्योंकि जब लोगों के भीतर गहराई तक जड़ें जमाए बैठे पूर्वाग्रहों को झटका पहुंचाने के मकसद से इसका [सत्याग्रह का] उपयोग किया जाता है तो यह दुराग्रह बन जाता है.’ ‘दुराग्रह’ को उन्होंने ‘शैतानी शक्ति’ बताया, जो सत्याग्रह यानी ‘आत्मिक शक्ति’ के ठीक उल्टा है (प्रशाद 1996: 2015 में उद्धृत, सीडब्ल्यूएमजी 16: 126-28 भी देखें – रॉय 2014: 106-07 में उद्धृत).

महाड सत्याग्रह पर गांधी की प्रतिक्रिया पर व्हाट कांग्रेस एंड महात्मा हैव डन टू द अनटचेबल्स (पहली बार 1945 में प्रकाशित) में लिखते हुए आंबेडकर ने कहा था:

अछूत मि. गांधी का नैतिक समर्थन पाने को लेकर नाउम्मीद नहीं थे. असल में उन्हें इसको पाने की बहुत अच्छी वजह भी थी. क्योंकि सत्याग्रह का हथियार – जिसकी बुनियादी बात यह है कि अपनी तकलीफों से अपने विरोधी के दिल को पिघला दिया जाए – वह हथियार था जिसको मि. गांधी ने बनाया था और जिन्होंने स्वराज हासिल करने के लिए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कांग्रेस से इसका अमल कराया था. स्वाभाविक बात थी कि अछूतों ने हिंदुओं के खिलाफ अपने सत्याग्रह में मि. गांधी से पूरी हिमायत की उम्मीद की थी, जिसका मकसद सार्वजनिक कुओं से पानी लेने और हिंदू मंदिरों में दाखिल होने के अधिकार को कायम करना था. हालांकि मि. गांधी ने सत्याग्रह को समर्थन नहीं दिया. सिर्फ इतना ही नहीं कि उन्होंने समर्थन नहीं दिया, बल्कि उन्होंने कड़े शब्दों में इसकी निंदा की (बाबासाहेब आंबेडकर: राइटिंग्स एंड स्पीचेज या बीएडब्ल्यूएस 9: 247, रॉय 2014: 109-10 में उद्धृत).

क्या राजमोहन गांधी की दलील यह हो सकती है कि आंबेडकर सच्चाई को ‘दबा’ रहे थेॽ

(जारी)

पूरी दुनिया एक आधा बना हुआ बांध है: अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/22/2015 04:07:00 PM


पिछले साल अरुंधति रॉय द्वारा डॉ. बी. आर. आंबेडकर की मशहूर किताब एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट की प्रस्तावना ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ (2014) लिखने के बाद से बहसों का एक सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें अब तक अनेक वैचारिक नजरियों, राजनीतिक हलकों और सामाजिक तबकों के लोगों ने भाग लिया है. सतही प्रशंसा और उत्साही निंदा से अलग हट कर जाति उन्मूलन की इस बहस को पूरी जटिलता और एक मजबूत प्रतिबद्धता के साथ पेश करनेवाली अरुंधति रॉय की प्रस्तावना कितनी चुनौतीपूर्ण है, यह बात इससे जाहिर होती है कि इसकी आलोचना करने वालों में से ज्यादातर परस्पर विरोधी विचारधाराओं और नजरियों से जुड़े हुए हैं: आंबेडकराइट कार्यकर्ताओं-विचारकों से लेकर गांधीवादियों तक. आलोचना के इस सिलसिले की हालिया कड़ी में, राजमोहन गांधी ने (जो रिसर्च प्रोफेसर, पूर्व राज्यसभा सांसद और अनेक किताबों के लेखक होने के साथ साथ एम.के. गांधी के पोते भी हैं) इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) के 11 अप्रैल 2015 अंक में एक लंबा निबंध लिखा: ‘इंडिपेंडेंस एंड सोशल जस्टिस: द आंबेडकर-गांधी डिबेट’। अरुंधति रॉय ने थोड़ी देर से इसका जवाब लिखा, जो इसी पत्रिका के 20 जून 2015 अंक में प्रकाशित हुआ है. रॉय के इस निबंध का हिंदी अनुवाद हाशिया पर पेश किया जा रहा है. पढ़ने की आसानी के लिए इस लंबे निबंध को किस्तों में पोस्ट किया जाएगा, जिसकी पहली किस्त नीचे है. अनुवाद: रेयाज उल हक.


मेरे ´द डॉक्टर ऐंड द सेंट’ [1] पर राजमोहन गांधी द्वारा लिखी गई लंबी आलोचना [2] पर जवाब देने में मुझे वक्त लगा. पहले मैंने सोचा कि मेरे निबंध को नजदीकी से पढ़ने पर उन सवालों के जवाब मिल जाएंगे, जो उन्होंने उठाए हैं. मैं कुछ ऐसा लिखने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थी, जो एक लंबा जवाब होने वाला था और जिसमें ज्यादातर मुझे खुद के लिखे हुए से ही उद्धरण देना था - यह सबसे शर्मिंदगी की बात थी. सच कहूं तो, राजमोहन गांधी ने यह सब लिखा तो मुझे खुशी ही हुई थी क्योंकि इसने मेरे इस नजरिए की तस्दीक की है कि बी.आर. आंबेडकर ने अपने वक्त में जो जटिल बौद्धिक और राजनीतिक लड़ाई छेड़ी थी उसका एक मुनासिब ब्योरा देने और आज के भारत में जातीय राजनीति को समझने के लिए हमें एम.के. गांधी द्वारा इसमें निभाई गई भूमिका को सावधानी से देखने की जरूरत है. गांधी के रुतबे को देखते हुए यह ऐसा काम नहीं है, जिसे हल्के-फुल्के तरीके से किया जाए. 

मेरे सामने रास्ता ये था कि या तो गांधी को पूरी तरह से छोड़ दिया जाए या फिर इस मुद्दे से उस सख्ती के साथ पेश आया जाए, जिसकी यह मांग करता है. इसका नतीजा यह हुआ कि हालांकि ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ आंबेडकर की प्रतिष्ठित रचना एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट की प्रस्तावना था, लेकिन उसमें गांधी ने गैरमामूली जगह घेर ली. इसके लिए मेरी तीखी – और कई मायनों में समझ में आने लायक – आलोचना की गई है. अगर मैंने इससे गांधी को बाहर रखा होता, तो मेरा अंदाजा है कि उन्हीं में से कुछ आलोचकों ने मुझ पर बेरहमी से इल्जाम लगाए होते और यह वाजिब ही होता. 

हालांकि राजमोहन गांधी ने इन सारी बातों को सिर के बल खड़ा कर दिया है जब वे दावा करते हैं कि ‘द डॉक्टर एंट दे सेंट’ लिखने में मेरा ‘मकसद’ गांधी को बदनाम करने के लिए आंबेडकर का इस्तेमाल करना था (दीगर कुछ लोगों ने मेरी इस बात पर फटकार लगाई है कि पश्चिमी आधुनिकता के अपरिहार्य और तबाही लाने वाले नतीजों पर गांधी का नजरिया ‘भविष्यद्रष्टा’ का था). चूंकि राजमोहन गांधी के सिर पर उस खानदान के नाम की पगड़ी है, तो कुछ लोग जिनमें से कई अच्छा और अहम काम कर रहे हैं, शायद उनके परचम के नीचे आ खड़े हुए हैं. ऐसा लगता है कि उनमें से किसी ने इस पर गौर नहीं किया है कि उनके अनेक विचार और दावे सचमुच बेचैन कर देने वाले हैं – और मैं उनके द्वारा मेरे बारे में कही गई बातों की तरफ इशारा नहीं कर रही हूं. यही वजह है कि मैंने इस पर जवाब देना जरूरी समझा. हालांकि यह बात अफसोसनाक ही होगी, अगर जल्दबाजी में और खोखले तरीके से पढ़ने के इस दौर में, कुछ मुद्दों पर केंद्रित इस जवाब को ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ की जगह उसके एवज में रख दिया जाए.

राजमोहन गांधी की आलोचना का शीर्षक ‘इंडिपेंडेंस ऐंड सोशल जस्टिस’ बड़ी सफाई से पूरे मामले को उसी पुरानी चाल में ढाल देता है: गांधी आजादी के लिए लड़ रहे थे और आंबेडकर सामाजिक न्याय के लिए. (यह बात कही नहीं गई है लेकिन यह इसमें छुपा हुआ है कि गांधी प्रधान थे.) अमूमन, एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट का एक शुरुआती पाठ भी इस मामले को खारिज कर देता है. जहां तक ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ की बात है, राजमोहन गांधी ने या तो इसे जरा भी गौर से नहीं पढ़ा है या फिर उन्होंने अपनी दलीलों के लिए जानबूझ कर इसे धुंधला बना दिया है. उन्होंने निबंध की सभी बातों की अनदेखी की है, सिवाय उन हिस्सों को छोड़ कर, जो उनके दादा से ताल्लुक रखते हैं (जो मेरा अंदाजा है कि यह एक किस्म की राजनीति भी है). उन्होंने इस निबंध को ऐसे लिया है मानो यह गांधी की एक दोषपूर्ण, आधी-अधूरी जीवनी है और वे इसी आधार पर अपनी आलोचना को आगे बढ़ाते हैं. मुझ पर लगाई गई उनकी तोहमतें तो जानलेवा हैं. वो मुझ पर एक ‘झूठा, आसानी से मजाक उड़ाने लायक, मनगढ़ंत गांधी’ की रचना करने का आरोप लगाते हैं. वे कहते हैं कि मैं बेईमान, ‘रचनात्मक’ रही हूं और ‘मैं उस बात को छुपा गई हूं, जिसके बारे में जानती हूं कि वो सच्ची है’. वे मुझ पर अनदेखी करने, अतार्किकता, सस्ती विद्वत्ता और ‘थोड़े समय के लिए भी गांधी का विद्वान नहीं होने’ के आरोप लगाते हैं. वे ‘जबानी मोर्चेबंदी की जिंदगी पसंद करने’ के लिए मेरा मजाक उड़ाते हैं (मैं अभी तक इसे समझने की कोशिश कर रही हूं कि यह बुरी बात कैसे है. मैं सोचती हूं कि जबानी मोर्चाबंदी एक ऐसी जगह है कि जहां हम अपने बारे में और जिस दुनिया में हम रहते हैं उसके बारे में खुल कर सोचते हैं – और हम ऐसा हमेशा नरमी से ही नहीं करते). वे कहते हैं कि उनका इरादा आंबेडकर या गांधी से मुकाबला करने का नहीं है (हालांकि वे बड़ी कारीगरी से इसके इशारे करते हैं कि आंबेडकर एक औपनिवेशिक सरकार में सार्वजनिक पद पर थे, जबकि गांधी जेल की यात्राएं कर रहे थे). लेकिन फिर वे मुझसे ‘मुकाबला’ करने की एक चाहत कबूल करते हैं – ‘इसे गुस्ताखी कहिए’. यह थोड़ी साहस की कमी है. जो भी हो, ये बड़ी बहसें हैं, जो कुछ के लिए नई हैं और कुछ के लिए नई नहीं है, लेकिन यकीनन वे मेरे बारे में नहीं हैं. (वह सब अब इतिहास का हिस्सा हैं). उनसे नजर चुराने का अब कोई विकल्प नहीं है. पिटारा खुल चुका है. इतिहास हमेशा की तरह मोर्चे पर है. नई किताबें इस दुनिया के सफर पर रवाना हो चुकी हैं: महाड सत्याग्रह पर आनंद तेलतुंबड़े की किताब, अश्विन देसाई और गुलाम वाहेद की द साउथ अफ्रीकन गांधी: स्ट्रेचर-बियरर ऑफ एंपायर और ब्रज रंजन मणि की डि-ब्राह्मनाइजिंग हिस्ट्री का व्यापक तौर पर संशोधित संस्करण. बहरहाल, जहां तक मेरी बात है, मुझे भरसक बेहतरीन तरीके से उन आरोपों को परखने और उन पर जवाब देने दीजिए, जो उन्होंने मुझ पर लगाए हैं. (हालांकि कुछ आरोप ऐसे हैं जो मुझे अवाक कर देते हैं जैसे, ‘रॉय ने आजादी के आंदोलन का जिक्र तक नहीं किया है...’ (आरजी.कॉम, पेज 19).)
 

‘ऐतिहासिक बहस के उसूल’
 

द डॉक्टर एंड द सेंट’ में बातों को शामिल नहीं किया जाना इस रचना की सबसे गंभीर कमी है,’ राजमोहन गांधी कहते हैं. ‘मैं यह भी दिखाना चाहूंगा कि रॉय का हमला ऐतिहासिक बहस के उसूलों का उल्लंघन करता है. ये उसूल मांग करते हैं, कि सबसे पहले तो किसी बयान पर किया जानेवाला हमला उस संदर्भ को मुहैया कराए, जिसमें किसी अलां, या फलां या फिर महात्मा तक ने 50 या 100 साल पहले बयान दिया होगा. दूसरे, कायदा यह मांग करता है कि वह खास सूचना काट कर बाहर न की जाए.’ 

तो मेरा अपराध ऐसा है जिसका इल्जाम विद्वान लोग अक्सर एक दूसरे पर लगाते रहते हैं: संदर्भ से काट कर, चुनिंदा तौर पर उद्धृत करना. जाने कैसे मुझे याद नहीं आता कि राजमोहन गांधी को दुनिया में मौजूद गांधी की तारीफ के सचमुच के अंबारों में से एक से भी ऐसी कोई समस्या रही हो – मिसाल के लिए रिचर्ड ऑटेनबरो की ऑस्कर विजेता फिल्म गांधी (जो तथ्यों के बजाए काल्पनिक रचना ज्यादा है), जिसमें गांधी के सबसे मुखर और अहम आलोचक आंबेडकर को एक मेहमान करदार के रूप में भी पर्याप्त जगह नहीं दी गई है, या फिर रामचंद्र गुहा की जीवनी गांधी बिफोर इंडिया, जो उन सभी समस्याजनक मुद्दों को पूरी तरह दरकिनार कर देती है, जो गांधी की चमक-दमक को धूमिल कर सकते हैं. क्या राजमोहन गांधी ने उन्हें ‘ऐतिहासिक बहसों के उसूलों’ पर व्याख्यान दिया था? इसकी संभावना तो नहीं है.

मैं उनके इल्जामों के नुक्तों की ओर जाऊं, उसके पहले मुझे चुनिंदा तौर पर उद्धृत करने की बात पर थोड़ी बात कर लेने दीजिए. हरेक इंसान को जब किसी के लेखन से उद्धृत करना हो तो उसे चुनना ही पड़ता है – शिक्षक हों या गुणगान करने वाले, निंदक हों या खानदान की थाती के पहरेदार. वे जो चुनते हैं और जो छोड़ते हैं, यह बात उनकी अपनी राजनीति के बारे में भी काफी कुछ उजागर करती है. मैं कबूल करती हूं कि मैंने गांधी को चुनिंदा तरीके से उद्धृत किया. मेरा चयन गांधी द्वारा जाति पर जाहिर की गई राय को तलाश करने की कोशिशों पर आधारित था. यह सिलसिला मुझे नस्ल (रेस) के बारे में उनकी राय तक लेकर गया. मेरा चयन गांधी को बदनाम करने के लिए नहीं किया गया था या, जैसा कि कुछ लोगों ने इशारा किया है, गांधी और आंबेडकर की ‘तुलना’ करने के लिए नहीं किया गया था. बल्कि गांधी ने आंबेडकर के संघर्ष में जो अहम और चिंताजनक भूमिका अदा की, ये उस कहानी को कहने का जरिया था. ऐसा करने के लिए उन बातों को प्रमुखता से पेश करना जरूरी बन गया, जिनको प्रभुत्वशाली ऐतिहासिक कहानी ने गैरमुनासिब तरीके से छुपा रखा है. मैं कबूल करती हूं कि मैंने काले अफ्रीकियों के बारे में, मजदूरों, ‘अछूतों’ और औरतों के बारे में गांधी की कही और लिखी गई सबसे विचलित कर देने वाली बातों में से कुछ को चुनिंदा तौर पर उद्धृत किया. मैं यह पूरी तरह जानती थी कि यह कुछ हलकों में भारी हैरानी पैदा करेगा (मुझे कबूल करने दीजिए कि इसने मुझे भी निराश किया था), मैंने उन्हें लंबाई में उद्धृत करने की सावधानी बरती. ‘ओह वे बदल गए थे’ का सामना करने के लिए मैंने उनके राजनीतिक जीवन के पूरे दौर (1893-1946) से बातों को उद्धृत किया. ‘वे अपने वक्त के इंसान थे’ जैसी दलीलों का सामना करने के लिए मैंने उनके समकालीनों और उनसे पहले के लोगों की राय को उद्धृत किया था. मैंने अपने हवालों को बड़ी सावधानी के साथ पेश किया था. मैंने हरेक उद्धरण को उसके अपने ऐतिहासिक संदर्भ में पेश किया. ‘द डॉक्टर एंट द सेंट’ की अनेक जाने-माने इतिहासकारों द्वारा औपचारिक रूप से समीक्षा की गई है, जिनके बारे में मुझे यकीन है कि वे ऐतिहासिक बहस के उसूलों को समझते हैं. राजमोहन गांधी के पास इस बेहद चिंताजनक सामग्री के बारे में कहने के लिए कुछ भी ठोस बात नहीं है. उनकी मुख्य शिकायत यह है कि मैंने साथ ही साथ गांधी की कुछ ऐसी अच्छी-भली बातें क्यों उद्धृत नहीं की है, जिन्हें उन्होंने चीजों को हल्का करने या ‘संतुलित करने’ की खातिर विभिन्न मौकों पर कहा होगा. (असल में मैंने ऐसा किया भी, हालांकि इसकी अलग वजहें हैं). फिर यह बात भी मायने रखती है कि हम सबमें गांधी की कही और की गई सभी अच्छी और महान बातें बातें कूट कूट कर भरी गई हैं, नहीं क्या? यह हमारी इतिहास की किताबों में है, हमारे राजनेताओं के भाषणों में है, यहां तक कि उस हवा तक में है जिसमें हम सांस लेते हैं. दिमाग में भर दी गई इन बातों के खिलाफ या उससे हट कर कुछ लिखने के लिए यह जरूरी है कि पहाड़ को थोड़ा खिसकाया जाए.

चलिए, इसके बारे में एक कल्पना करते हैं.

दलील के लिए मान लीजिए कि एक जानी-मानी शख्सियत अलां ने अपने राजनीतिक जीवन के अनेक दशकों में ऐसी गंभीर और खूबसूरत बातें कही हैं जो सार्वजनिक रेकॉर्ड में हैं. ऐसी बातें मसलन:

सभी इंसान पैदाइशी तौर पर बराबर हैं
गरीब ही धरती के वारिस हैं
गरीबी हिंसा की सबसे बदतरीन शक्ल है

और मान लीजिए कि उसी शख्सियत अलां ने समांतर (लेकिन सार्वजनिक रेकॉर्ड से कमोबेश छिपे हुए) ट्रेक में ऐसी बातें भी कही हों:

जाति हिंदू सभ्यता का कौशल है
काफिर कायदे से ही असभ्य होते हैं
ज्यादातर मजदूरों की नैतिक क्षमताएं नष्ट हो गई हैं
कुछ अछूत अपनी बुद्धि में गायों से भी बदतर हैं
मेहतरों (स्वीपर्स) को हड़ताल पर जाने का अधिकार नहीं है

राजमोहन गांधी के मुताबिक, इनमें से एक ट्रेक को सहेज कर रखना और दूसरे को मिटा देना ऐतिहासिक बहस के उसूलों का पालन करना है. लेकिन इससे उल्टी बात उसका उल्लंघन है. यह चालाकी भरा नुक्ता अपनी जगह, क्या पहले ट्रेक में कही गई अच्छी अच्छी बातें, दूसरे ट्रेक के पक्षपात और उसकी संकीर्ण समझदारी को हल्का करती है? या यह पूरे मामले को ही और भी परेशान कर देने वाली बात नहीं बना देती? मेरा जवाब, यही दूसरी संभावना है. 


(जारी)
 

नोट्स:
 

1. अरुंधति रॉय, ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’, (प्रस्तावना), बी.आर. आंबेडकर, एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट में, (नवयाना 2014).
2. इस निबंध के दो संस्करण हैं, एक छोटा संस्करण ईपीडब्ल्यू के 11 अप्रैल 2015 अंक में प्रकाशित हुआ जिसका हवाला मैं आरजी (ईपीडब्ल्यू) के रूप में दूंगी. दूसरा, लंबा ऑनलाइन संस्करण (http://www.rajmohangandhi.com/sites/default/files/Independence%20and%20Social%20Justice%20-%20Jan%202015.pdf) है जिसका हवाला मैं आरजी.कॉम के रूप में दूंगी.

नेपाल: जैसा तैसा कैसा संविधान, ब्रूटस

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/19/2015 03:17:00 PM



विष्णु शर्मा

ऐसा लगता है नेपाल के मामले में रुचि रखने वाले भारतीय वाम ‘चिंतक’ भी पूंजीवादी का दबाव सहन नहीं कर पा रहे हैं। वे घुटन महसूस करने लगे हैं। और यही वजह है कि वे भी जो स्वयं को नेपाली जनता का हितैषी बताते हैं उसी तर्क को, उसी भाषा में दोहराने लगे हैं जो बात न जाने कब से ‘उदार’ और ‘भले’ चिंतक दोहरा रहे हैं कि ‘बस एक बार जैसा तैसा संविधान बन जाए और आगे का रास्ता खुले’।

ऐसी घटिया दलील करते हुए भी वे यह मनवाना चाहते हैं कि वे जनता के असली शुभचिंतक हैं। वे लगातार यह साबित करने की कोशिश में रहते हैं कि संविधान के न बनने से जनता बर्बाद हो रही है, वो मर रही है और वो गिड़गिड़ा रही है ‘हे भगवान कोई हमें संविधान दे दे’। सच तो यह है कि अगर जनता को ‘जैसा तैसा संविधान’ ही चाहिए था तो वो तो उसके पास सदियों से नहीं तो दशकों से है ही। क्या कोई जनता 13 हजार अपने सबसे उत्तम बच्चों का बलिदान ‘जैसा तैसा’ संविधान के लिए करती है?

ये ‘जैसा तैसा’ संविधान’ कितना लिजलिजा शब्द है और कितना गिलगिली होती है इसको कहने वाली जुबान। मवाद से भरी पीली गिलगिली जुबान।

संविधान का एजेण्डा यकीनन माओवादियों का था। और यह होता भी किसका। हालाकि यह एक सफेद झूठ है कि संविधान सभा के लिए माओवादी जनयुद्ध हुआ। संविधान सभा को जनयुद्ध के एक पड़ाव की तरह ही प्रस्तुत किया गया था न कि जनयुद्ध के अंतिम लक्ष्य की तरह। बाद में नेपाली क्रांति के गद्दारों और उनके दलालों ने इसे छल से साध्य का रूप दे दिया। नेपाल की जनता ने तो इस छल के पकड़ लिया और खुल कर इसके खिलाफ खड़ी हो गई। लेकिन भारत में इन वर्षों में लगभग इस झूठ को स्वीकारता मिल गई। दुख तो इस बात का है कि हमारे ‘ब्रूटसों’ ने ऐसा किया। ‘एट टू, ब्रूटस’।

अपनी कमजोरियों और डर को ढंकने के लिए कथित रेडिकल पार्टियों और वाम चिंतकों ने इन 9 वर्षो में संविधान सभा के इर्द-गिर्द भारतीय क्रांतिकारी जनता को गोलबंद किया। नेपाल से बुद्धिजीवियों और नेताओं को बुला कर संविधान को जनता का संघर्ष दिखाने का षड्यंत्र किया गया। ‘एट टू, ब्रूटस’।

बाबुराम और प्रचण्ड आते रहे और रेडिकल बुद्धिजीवी इन्हें एकतर्फा ढंग से जनता के बीच ले जाते रहे। कोई सवाल नहीं सिर्फ एकतर्फा कुतर्क। और सवाल पूछने वालों पर तंज और व्यंग। फेंकने वाला क्रांतिकारी और जवाब मांगने वाला ‘बेचारा’ साबित किया जाता रहा। ‘एट टू, ब्रूटस’।

नेपाली क्रांति के भारतीय ‘शुभचिंतक’ नेपाल और भारत के सच्चे माओवादियों और क्रांतिकारियों को ‘जड़’ साबित करते रहे और राजा को नंगा कहने वालों को किनारे लगाते रहे। इन सालों में उन्हें ‘रूमानी’, ‘100 साल पीछे चलने वाला’, ‘24 कैरेट क्रांतिकारी’ और न जाने क्या क्या नहीं कहा गया। लेकिन इससे क्या हुआ? होता भी क्या?

हाल में ग्रीस में एक गद्दार पर जनता ने विश्वास किया। उसने कहा ‘तुम मुझे अपना लो, मैं तुम्हें युरो जेल से आजादी दूंगा’। जनता ने उसे चाबी दी। चाबी हाथ में आते ही वो जेलर के साथ खड़ा हो गया और बोला ‘मुझ पर विश्वास करो, तुम्हारे भले के लिए तुम्हें यहां रहना होगा’। वो मालिक बन गया। फैसला करने लगा। ‘एट टू, ब्रूटस’।

ऐसे ही नेपाल में जनता ने चाबी दी प्रचण्ड को लेकिन चाबी हाथ में आते ही वो उसे लेकर साउथ ब्लॉक भाग गया और फरियाद करने लगा, ‘मालिक नेपाल की चाबी मेरे हाथ लग गई है अब मुझे प्रधान मंत्री बना दो’। राजतंत्र के खात्मे के बाद जिस किसी भी नेता के पास नेपाल की चाबी आई उसने सबसे पहले जेलर के आगे सर झुकाया और तर्क दिया ‘हम क्या कर सकते हैं, हम लैण्डलॉक्ड हैं’। जनता ‘मरने’ से नहीं डरती नेता डरते हैं। इस डर को छिपाने के लिए वे मार्क्सवाद में सुधार करते हैं, उसे समयानुकूल और प्रासंगिक बनाते हैं। मवाद की लिजलिजी तरलता ‘जड़ता’ के खिलाफ उनका तर्क है। और उनके वफादार बुद्धिजीवी बार बार उन्हें हमारे सामने पेश करते है। साल में दो बार महफिलें सजाई जाती हैं जहां ‘महानता’ के शोर में सच्चाई को मिममियाने के लिए मजबूर किया जाता है। सच्चाई पर समझदार होने का दवाब बनाया जाता है। बार बार गद्दारों को शहीद बनाया जाता है। ‘एट टू, ब्रूटस’।

उसे अलेंदे मूर्ख लगता है। उसे खुशी है कि वो अलेंदे नहीं बना। वो अलेंदे न होने को अपनी प्रतिभा बता रहा है। और तुम ब्रूटस उसका मुंह नहीं नोच ले रहे हो। सहमति में सर हिला रहे हो। ‘एट टू, ब्रूटस’।

एक अदद संविधान बन जाए तो क्या होगा? इससे क्या रास्ता खुलेगा और क्या ही रास्ता बंद होगा। नेपाल में जो संविधान जारी होने वाला है उसको अपने नहीं पढ़ा। उसे देखा तक नहीं। यदि देखा होता तो बैठ सकते थे उसके साथ? सहानुभूति हो सकती थी उसके साथ? ‘कोई बात नहीं कॉमरेड’, क्या यह वाक्य आ सकता था तुम्हारी जुबान में? लेकिन मैंने देखा है तुम्हें उससे उसी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाते जैसा कि तुम मिलते थे उससे जब वो ठीक उलटा था। इसमें मेरे लिए क्या सबक है? ब्रूटस, नेपाल की जनता को अब शुभचिंतक नहीं चाहिए जो इस संविधान को उन के गले में डाल कर उनका गला घोंट देना चाहता है। उसे चाहिए एक बेरहम साथी जो कहे जला दो इस संविधान को इससे पहले कि ये संविधान तुम्हें जला दे। 


तस्वीर: पूजा पंत 

आशीष नंदी: ग़फलत-में-सुकून का उल्लास

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/17/2015 01:15:00 PM

आशीष लाहिड़ी की बांग्ला निबंधों की किताब भद्रलोकि जुक्तिबादेर दक्षिणावर्त (भद्रलोक तर्कशीलता का दक्षिण को मुड़ना) में संकलित लेख 'आशीष नंदी: भ्रांति-सुखेर उल्लास' का अनुवाद। आशीष लाहिड़ी विज्ञान के इतिहास पर शोध करते हैं और कोलकाता के एसियाटिक सोसायटी और राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय में अध्यापन करते रहे हैं। उन्होंने बांग्ला और अंग्रेज़ी में कई किताबें लिखी हैं। वे कोलकाता के पावलोव इंस्टीट्यूट के सदस्य हैं। अनुवाद हिंदी के जानेमाने कवि लाल्टू का है। 
 
एक
'अभ्यास की सीमाओं में बँधी चेतना के संकीर्ण संकोच' की वजह से कहीं अधिकतर बंगाली चिंतकों के ज़ेहनों में जाले तो नहीं पड़ गए? क्या उन्हें कायनात जीर्ण दिखती है? ऐसी आशंका कभी-कभी होती है। इसकी एक पहचान यह है कि सवाल उठाने की जगह तुरंत जवाब ढूँढ़ने में उनका आग्रह अधिक है, वह जवाब कैसा भी क्यों न हो। ऐसी समझ आजकल कम दिखती है कि यह ज़रूरी है कि सही सवाल उठाया जाए, सही सवाल उठे तो जवाब भी किसी न किसी तरीके से ज़रूर मिल जाएगा।

बंगाली चिंतकों की चेतना की इस जड़ता पर आशीष नंदी जैसे लेखकों ने सख्त चोट की। उन्होंने खाकों में बँधे जवाब की तलाश छोड़कर खाका तोड़ते सवालों की खोज की। उन्होंने ऐसे कोणों से सवाल उठाए जो व्यवहार की सीमाओं में बँधी हमारी चेतना को झटका देते हैं, हमें हिल-डुल कर बैठने को मजबूर कर देते हैं। इस नज़रिए से आशीष बाबू की किताब The Savage Freud (1995) (जंगली फ्रायड) थोड़े ही वक्त में छोटे-मोटे क्लासिक का दर्ज़ा अख्तियार कर चुकी है। इस किताब में वे जिन विषयों को ले आए हैं और ज्ञान के कई सारे क्षेत्रों को मिलाकर जिस पद्धति से उन्होंने उन पर चर्चा की है, उसकी नवीनता को मानना ही होगा।

समर्पण के पन्ने से ही यह किताब चौंकाती है। तीन प्रसिद्ध भारतीयों को यह किताब समर्पित है : विनायक दामोदर सावरकर (1880-1965), दामोदर धर्मानंद कोसंबी (1907-1960) और नीरदचंद्र चौधरी (1897-1997)। उन्नीसवीं सदी के बीच से 'भारतीय' पहचान को नया स्वरूप देने की जिस प्रक्रिया की शुरुआत हुई, नंदी जी के अनुसार ये तीन उस प्रक्रिया के तीन पहलुओं के खाँटी प्रतिनिधि हैं। सावरकर हिंदू राष्ट्रवाद के प्रतीक हैं। वे हिंदुओं को और अधिक जंगी, अधिक पौरुषमय, अधिक ठोस और संगठित करना चाहते थे। दूसरी ओर कोसंबी 'अनथक तर्कशील' थे। वे और अधिक वैज्ञानिक चेतना, अधिक भौतिकतावदी सोच, अधिक इतिहास-बोध से भारतीयों को लैस करना चाहते थे। और 'गोरों का बोझ' ढोने के काम में खुद को लगाने वाले नीरद बाबू भारत को 'एडवर्ड युग' की आधुनिकता में बाँध रखने के आखिरी प्रवक्ता थे। मोटामूटी इन तीन धाराओं में आज के भारतीयों की सोच-समझ को ढालकर आशीष बाबू उसकी एक चीरफाड़ करना चाहते हैं। एक ओर इस सोच का सजा-सँवरा प्रकाशित रूप है (उनके शब्दों में 'language of public life' – सार्वजनिक जीवन की भाषा) और दूसरी ओर अवचेतन में मौजूद उसका छिपा स्वरूप है (उनके शब्दों में 'secret selves' – छिपे आत्म), इन दोनों में द्वंद्व ढूँढ निकालने की कोशिश उन्होंने की है।

नंदी जी ने जिन तीन धाराओं का उल्लेख किया है, उन्हें थोड़ा हटकर, ज़रा पारंपरिक ढाँचे में यूँ समझ सकते हैं:
 

1) जंगी हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद, 2) आधुनिक विज्ञानमना तर्कशीलता (सेक्युलरिज़्म जिसका हिस्सा है), और 3) दलाल संस्कृति। इन तीन धाराओं में हरेक को लेखक ने अपने विश्लेषण के औजारों से ध्वस्त करने की कोशिश की है, मकसद यह कि इस ध्वंस-पर्व को पार कर आधुनिक भारतीय आत्म-पहचान की कोई एक या एकाधिक राह ढूँढ़ी जा सकती है या नहीं, इसकी पड़ताल की जाए; वह राह सँकरी भी हो तो उन्हें कोई हर्ज़ नहीं है। आज के हिंदुस्तान में, जिसे वे 'सामान्य ज्ञान की संस्कृति (the culture of common sense)' कहते हैं, इसके पीछे 'ज़बर्दस्त तकरीबन वैश्विक-चेतना (dominant quasi-global consciousness)' है। चाहे टूटा-फूटा या तोड़ा-मरोड़ा सही, एक ग्लोब आज हिंदुस्तानी ज़ेहन की मेज पर सजा रहता है। भारत के आम लोगों को लेकर एक के बाद एक जो तर्क-वितर्क सामने आ रहे हैं, वे उस quasi-global consciousness के ढाँचे में ही सक्रिय हैं। उनके विचार में उस तकरीबन वैश्विक-चेतना का बीज-कोश कुछ मूल विचारों के इर्द-गिर्द पनपा है: 1) राष्ट्र-राज्य, 2) राष्ट्रवाद, 3) सेक्युलरिज़्म, 4) तरक्की, 5) इतिहास, 6) तर्कशीलता और 7) बिल्कुल रूमानी एक 'रीयलपोलिटिक' की धारणा जो कि 'विषयवस्तु के नज़रिए से न तो वास्तविकता से मेल खाता है, न सही मायने में राजनैतिक' है। उनके विचार में ये धारणाएँ भारतीय राष्ट्र की संस्कृति के विविध 'ढाँचे या साँचे' हैं। उनका मकसद यह है कि वे राष्ट्र के इन साँचों और ढाँचों से भारतीय जनजीवन को बाहर निकालकर दिखलाएँ कि इन सबकी नींव में असल में कुछ 'वर्चस्व की नीतियाँ' काम कर रही हैं। उन्हीं नीतियों ने ही इन धारणाओं को राजनैतिक मायनों में बनाए रखा है।

यह बात माननी होगी कि आधे-गोरे मेट्रोपोलिटन भारतीयों की राजनैतिक चेतना में कुछ-कुछ अछूत, नितांत चिढ़ पैदा करती समझी जाने वाली बातें आज भी ऐसे हिंदुस्तानियों के लिए काफी मायने रखती हैं जो उस चेतना टेबिल के बाहर जी रहे हैं। आशीषबाबू इन्हीं हस्तक्षेपों से जन्मी 'भ्रांतियों' पर ही चर्चा करते हैं। सिर्फ चर्चा करना कहना कम होगा, क्योंकि दरअसल उनकी यह किताब इसी ग़फलत-में-सुकून के उल्लास में रची गई है: 'This book celebrates that ability to confuse and exasperate (यह किताब भ्रांति और परेशानी पैदा करने की उस क्षमता का जश्न मनाती है)'।

इन भ्रांतियों पर चर्चा के लिए उन्होंने भारतीय समाज और संस्कृति के एक विशाल क्षेत्र से समस्याओं को चुना है। किताब के सात निबंधों में पहला 1984 में दो हवाई जहाजों के अपहरण पर है, जिसे खालिस्तानियों ने किया था। दूसरे निबंध का विषय रूपकँवर का 'स्वेच्छा' से किया सतीदाह है। तीसरे का विषय अंतर्राष्ट्रीय अदालत में युद्ध-अपराधों पर राधाविनोद पाल की अलग राय पर है। चौथा, किताब का शीर्षक निबंध है - The Savage Freud: The first non-western psychologist and the politics of secret selves in colonial countries (जंगली फ्रॉयड: पहला गैर-पश्चिमी मनोविश्लेषक और औपनिवेशिक मुल्कों में छिपी आत्म-पहचानें), विषय है - फ्रॉयड के विचारों से मेल खाता पर फ्रॉयड से आगे जाता गिरीन्द्रशेखर बसु का मनोविश्लेषण सिद्धांत। छठा और सातवाँ निबंध दो भारतीय फिल्मों पर हैं; एक का विषय सत्यजित राय है, दूसरे का विषय आम 'लोकप्रिय' भारतीय सिनेमा है। तीसरे और चौथे निबंधों को अलग कर दें तो बाकी हरेक ऐसी किसी 'घटना' पर रचित है, जिसकी 'लोकमानस' में ज़बर्दस्त मौजूदगी है। और इस ज़बर्दस्त मौजूदगी की जड़ में मीडिया नामक 'सत्ता' के कार्यकलाप हैं। यह मीडिया, खासकर अंग्रेज़ी भाषा में प्रचारित 'सर्वभारतीय' मीडिया नंदी जी कथित इस तकरीबन वैश्विक चेतना का सबसे प्रकट रूप है।

इन निबंधों के अलग-अलग मकसद से और अलग-अलग तरीकों से लिखे जाने के बावजूद, इनके संयोजन और संपादन में सोच की विशिष्ट दिशा साफ उभर आती है। इसे एक लाइन में यूँ बयाँ कर सकते हैं - अपने भविष्य के बारे में हम कैसे सोचें?

वैसे आशीष जी ने बड़ी अच्छी तरह जता दिया है कि वे खुद 1) ग्रामीण भारत में पैदा नहीं हुए हैं, 2) गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं और 3) शहरों के भ्रष्टाचार में लिप्त चरित्रहीनता के खिलाफ आंदोलन करने वाले अधीर पर्यावरणवादी नहीं हैं। यानी कि ध्यान रहे कि 'आधुनिक' भारतीयों के 'मनन टेबिल' पर हाजिर रहकर ही वे अपना बयान पेश कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बतलाया है कि इस किताब में शामिल निबंध 'अतीत का ऐतिहासिक पुनर्निर्माण नहीं हैं', ये 'इंसान के बहुलतावादी भविष्य के राजनैतिक पूर्वाख्यान के हिस्से हैं'। यहाँ बुनियादी सक्रिय दो लफ्ज़ हैं - 'बहुलतावादी भविष्य'।

2. बहुलतावाद, सेक्युलरिज़्म और राष्ट्र-राज्य: नंदी और सेन

राष्ट्र-राज्य, राष्ट्रवाद, सेक्युलरिज़्म, तरक्की, इतिहास, तर्कशीलता और 'रीयलपोलिटिक' – इन पाँच घटकों को नंदी जी ने आज के हिंदुस्तान की तकरीबन वैश्विक चेतना के प्रधान अंग कह कर चिह्नित किया है।

यही विषय अमर्त्य सेन की चर्चा के विषय भी हैं। बहुलतावाद अमर्त्य सेन का बहुत प्रिय विषय है। दरअसल भारतीय इतिहास, दर्शन और संस्कृति का मुख्य झुकाव हमेशा ही बहुलतावाद की ओर रहा है। साफ तर्कों और तथ्यों के जरिए इस बात को उन्होंने साबित किया है। पर उनके और आशीष नंदी के बहुलतावाद में ज़मीन आस्मान का फर्क है। सेक्युलरिज़्म अमर्त्य की योजनाओं का मुख्य आधार है। उन्होंने गौर किया है कि हाल के वक्तों में सेक्युलरिज़्म पर कई दिशाओं से चोट आ रही है। हिंदुत्ववादी हमलों की बात तो हर कोई जानता है। पर अमर्त्य खेद के साथ गौर करते हैं कि यह हमला सिर्फ हिंदुत्ववादियों में ही सीमित नहीं है, बल्कि 'भारतीय समाज और संस्कृति के मसलों पर उच्च-स्तरीय चर्चाओं' (high theory of Indian culture and society)1 में भी तकलीफदेह रूप से दिखता है। जिनमें यह दिखता है, उनमें सबसे बड़े नाम आशीष नंदी हैं। दरअसल आशीष बाबू के विचार में सेक्युलरिज़्म ही सभी बुराइयों की जड़ है। 'आधुनिक' युग में धर्म नहीं, सेक्युलरिज़्म ही जनता का 'नया अफीम' है। उनके सोच की दिशा इस तरह की है - भारत जितना 'आधुनिक' हो रहा है, मजहब आधारित फिरकापरस्ती की मारकाट बढ़ रही है। जबकि प्राक-आधुनिक भारतीय लोकसमाज में युगों से पारंपरिक जीवन-यात्रा में ही समुदायों के बीच आपस में अंतरसामुदायिक सहिष्णुता की नीति विकसित हुई थी। सेक्युलरिज़्म नामक नए विचार की मदद करते हुए राष्ट्र-राज्य ने समुदायों के बीच की सहिष्णुता के उस सिद्धांत को खत्म कर दिया। सेक्युलरिज़्म, 'आधुनिकता' और 'तरक्की' में अंतरंग जुड़ाव है। आधुनिकता और तरक्की के विचारों का आदर्श ही सेक्युलरिज़्म के विचार के आदर्श की मदद करता है और ऐसा करते हुए राष्ट्र-राज्य के जरिए बल-प्रयोग कर लोगों पर एक अजीब धारणा थोप देता है। किस्म-किस्म के लोकसमाजों की गहराइयों में से अपने आप पनपी विविधता को मिटाकर वह ज़बरन स्टीमरोलर चलाकर 'सभ्य समाज' गढ़ना चाहता है। बिना बल-प्रयोग के, बिना हिंसा के यह सेक्युलरिज़्म टिक नहीं सकता है। इसलिए इस आधुनिकता, यह तरक्की, यह राष्ट्र-राज्य, इस सेक्युलरिज़्म का त्याग करना होगा।

अमर्त्य सेन ने आशीष बाबू के इस सिद्धांत पर कुछ साफ सवाल उठाए हैं - 1) 'आधुनिकता' क्या चीज़ है, इसे आशीष बाबू ने इतनी निश्चितता से कैसे जान लिया? आधुनिकतावादी और उत्तर-आधुनिकतावादी क्या खुद जानते हैं कि आधुनिकता का मतलब क्या है? 2) अलग-अलग लोक-समुदायों में फ़र्क मिटाकर भारतीय राष्ट्र-राज्य असल में अपनी धौंस जमाना चाहता है, यह बात सही है, पर एक मजहब आधारित फिरके की जगह दूसरे को मदद देना रोकते ही राष्ट्रीय हिंसा प्रकट हो उठती है, क्या यह बात सही है? 3) सेक्युलरिज़्म को खासकर 'आधुनिक' युग का विचार ही क्यों माना जाए? अशोक या अकबर के जमाने में भी राष्ट्र धर्म-समभाव की नीति मानकर चलता था। उस नीति के लागू होने पर राष्ट्रीय हिंसा बढ़ी हो, ऐसा कोई प्रमाण नहीं है। इसलिए सेक्युलरिज़्म को राष्ट्रीय स्तर पर हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराना, या जनता का 'नया अफीम' कहना तर्क और इतिहास के धरातल पर टिकता नहीं है।

आशीष नंदी राष्ट्र-राज्य के विपरीत लोकसमाज को खास महत्व देते हैं। इस बारे में भी अमर्त्य बाबू का बयान खास ध्यान देने योग्य है। लोकसमाज-पंथी 'बड़ी तीखी आवाज़ में यह बखान रहे हैं कि कोई भी लोकसमाज आधारित (केवल धर्म-संप्रदाय आधारित नहीं) पहचान ही आमतौर पर बहुत महत्वपूर्ण है। बहुत दूर के किसी नेशन की सामूहिकता का हिस्सा बनने की तुलना में किसी 'खंड टुकड़े' का हिस्सा बनने में जिस अंतरंग आत्मीयता का अहसास होता है, जो प्रासंगिकता और जो बड़े पैमाने की समृद्धि होती है, उस पर ये जोर दे रहे हैं।'2 'नेशन' (कौम) और राष्ट्र-राज्य (नेशन-स्टेट) एक बात नहीं है, इस बयान को ठोस बनाते हुए अमर्त्य सेन ने लिखा है: 'राष्ट्र वर्चस्व और हिंसा थोपने का दोषी है, यह बात सही है। पर परंपराओं में बँधे कई लोकसमाज भी अपने कमजोर सदस्यों पर (जैसे स्त्री, कन्याशिशु या निम्न-जाति-वर्ग के लोग) निरंतर कई तरह के जोर-ज़ुल्म और अत्याचार करते हैं। और फिर इन मामलों में राष्ट्र ही कभी-कभी रक्षक की भूमिका अदा करता है।'3 इसलिए चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि लोकसमाज और राष्ट्र में कैसा संबंध होना चाहिए। पर इसके विपरीत आशीष नंदी ने राष्ट्र के विलोम के रूप में लोक समाज को पेश किया है और सेक्युलरिज़्म को राष्ट्र द्वारा थोपा हुआ अन्याय कह कर चिह्नित किया है। इसके अर्थ बहुमुखी हैं और यथार्थ में भयंकर स्वरूप लेने की संभावना से भरे हुए हैं। 


3.बहुलतावाद, विज्ञान और तरक्की

जो राष्ट्र-राज्य को लोकसमाज को तबाह करती भयंकर आफत करार देना चाहते हैं, वे साथ ही 'पश्चिमी विज्ञान' के बारे में भी नापसंदगी पालते हैं। पर 'पश्चिमी विज्ञान' कथन का कोई मतलब नहीं होता। जोसेफ नीडहैम ने दिखलाया है कि विज्ञान ऐसी एक हरकत है जो सात घाट का पानी पिए बिना बचता नहीं है। इसलिए वे 'एक्यूमेनिकल (विश्वप्रसारी) साइंस' मुहावरा इस्तेमाल करते थे। अमर्त्य ने भी नीडहैम से प्राभावित होकर लिखा है, 'दरअसल जिसे 'पश्चिमी' विज्ञान और प्रौद्योगिकी कहा जाता है, उसका बहुत बड़ा हिस्सा कई घाटों के पानी से सिंचा बढ़ा था - भारत की गणितविद्या उनमें मुख्य है, जिसके बारे में माना जाता है कि वह अरब लोगों के हाथ होते हुए पश्चिम में पहुँची थी।'(4)

आशीषबाबू ने भी प्रचलित 'पश्चिमी' विज्ञान का विरोध कर उसके बाहर 'अन्य विज्ञान' की विरासत ढूँढ़ी है। इस खोज में लगने पर कहीं कोई उन पर भारतीय संस्कृति के 'रोमांटिक आवाहन' का दोष लगा न दे, इसलिए भूमिका में ही उन्होंने राग अलापा है कि 'एनलाइटेनमेंट (प्रबोधन) के वक्त आधुनिक विज्ञान की शुरुआत के बारे में किसी भी इतिहास चर्चा में ग्रीक कल्चर में लौटने का रिवाज है; कहाँ, उनके खिलाफ तो कोई कभी 'चर्चा को रूमानी करने का' इल्ज़ाम नहीं लगाता है।' वैसे वे 'सब बेद में बा' पार्टी के सदस्य नहीं हैं, वह शुरू में ही साफ तरीके से समझा देते हैं। साथ ही उनका कहना है, विज्ञान और तर्कशीलता के बारे में प्रतिष्ठित 'पश्चिमी' पैराडाइम के बाहर दूसरे पैराडाइमों की भी जाँच करना बहुत ज़रूरी है - यह खास तौर पर इस वजह से ज़रूरी है कि आधुनिक विज्ञान की तथाकथित जययात्रा के हर कदम पर अनेक चट्टानें आती हैं, यहाँ तक कि उनमें से कइयों पर तो खून के धब्बे हैं [पैराडाइम – ज्ञान की किसी विधा में विद्वानों द्वारा स्वीकृत मान्यताओं, धारणाओं, मूल्यों, नज़रिए आदि का विशेष समूह -अनु.]। यह जाँच कर देखना ज़रूरी है कि सैद्धांतिक पैराडाइम क्या विज्ञान के अंदरूनी ढाँचे से स्वत:चालित प्रक्रियाओं में बनते गए हैं या सत्तासीन वर्गों की सुविधाओं के अनुसार विचारों को 'वैज्ञानिक' विचार मानकर निरंकुश कह कर उनका प्रचार किया गया है। कहना गैरज़रूरी है कि इस सवाल के जवाब ढूँढ़ने का सबसे आसान तरीका यह है कि प्रतिष्ठित पैराडाइमों के विपरीत दूसरे पैराडाइमों को तयशुदा ऐतिहासिक धरातल पर रख कर तुलना की जाए। आशीषबाबू ने अपनी किताब में यही काम किया है। इस काम का परिणाम क्या हुआ, इस पर चर्चा करने के पहले बिल्कुल सहज तरीके से एकबार हम देखें कि 'आधुनिक विज्ञान' और 'तरक्की' में अंतरंगता पर हमारे विचार कैसे विकसित हुए हैं।

वैश्विक (एक्यूमेनिकल) विज्ञान के सात घाटों का पानी पीकर विकसित होने के बावजूद यह बात सही है कि सत्रहवीं सदी के बाद वह मुख्यत: यूरोप में ही केंद्रीभूत हुआ था (जैसे आजकल काफी हद तक अमेरिका में केंद्रीभूत हुआ है)। इसलिए इस विज्ञान पर यूरोपी समाज, यूरोप के विभिन्न दर्शन और यूरोपी राजनीति (उपनिवेशवाद जिसका प्रधान हिस्सा रहा है) का गहरा प्रभाव रहा है। न्यूटन के दोस्त और अनुयायी दार्शनिक जॉन लॉक ने कानून के शासन का स्वागत किया था - एक ओर न्यूटन के वैज्ञानिक सिद्धांत थे, दूसरी ओर थे ब्रिटेन में 1688 में संवैधानिक क्रांति के जरिए प्रतिष्ठित दीवानी (सिविल) कानून के नियम। ये नियम आगे बढ़ चलते बुर्ज़ुआ समाज के नियम हैं। एनलाइटेनमेंट युग के बाद से ही विज्ञान और प्रगति पर्याय बन गए। यह प्रगति बुर्ज़ुआ वर्गों की प्रगति है। आँसीक्लोपेदी (encyclopaedic) समूह के चिंतकों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी को हर तरह के पिछड़ेपन की दवा मान लिया था। मार्क्स ने इसे और आगे बढ़ाया और इसे क्रांतिकारी अर्थ दिया। मार्क्स बुर्ज़ुआ क्रांतिकारियों के परवर्ती मनीषी थे। मार्क्स को याद करते हुए कार्ल लीबनेख्त ने 1850 के दशक में विज्ञान और समाज के आपसी संबंध पर मार्क्स के दृष्टिकोण पर लिखा है [कार्ल लीबनेख्त (1871-1919) – जर्मन समाजवादी जिन्होंने रोज़ा लक्सेमबर्ग के साथ जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की – अनु]:

थोड़ी देर में ही हम कुदरत संबंधी विभिन्न वैज्ञानिक विषयों पर चर्चा करने लगे। ... यूरोप की तब की विजयी प्रतिक्रियाशील ताकतें सोचती थीं कि वे क्रांति का गला घोंटकर पूरी तरह खात्मा करने में सफल हो गई हैं। उनके इस दिवास्वप्न पर व्यंग्य करते हुए मार्क्स ने कहा, 'वे समझ नहीं पा रहे कि प्रकृति विज्ञान फिर नई क्रांति को घनीभूत कर रहा है। जिस महामहिम भाप ने पिछली (अठारहवीं) सदी में धरती में उथल-पुथल ला दी थी, अब उसके राज के बारह बज गए; उसकी जगह बिजली ने ले ली है, जिसकी क्रांतिकारी क्षमता में बढ़त को मापा नहीं जा सकता।

ऐसा कहकर मार्क्स ने असाधारण जोश के साथ मुझे बतलाया कि कुछ दिनों से रीजेंट स्ट्रीट में बिजली चालित इंजिन के छोटे माडल की प्रदर्शनी लगी है और उससे छोटी रेलगाड़ी खींचने का काम लिया जा रहा है। ...

आत्महंता दृष्टिहीनता की वजह से बुर्ज़ुआ समाज आधुनिक समय के इस ट्रॉय के घोड़े को प्राचीन ट्रॉयवासियों की तरह ही जोश के साथ खींच लाए हैं, पर यही उनके निश्चित विनाश का कारण भी होगा।

[ट्रॉय का घोड़ा: होमर के महाकाव्य 'ओडिसी' और वर्जिल की कविता 'ईनिड' में लिखे मिथक के अनुसार ट्रॉय पर जीत हासिल करने के लिए ग्रीक सिपाहियों ने लकड़ी का घोड़ा बनाया, जिसे ट्रॉय के सिपाही अपनी दीवारों के अंदर ले आए तो घोड़े में छिपे सिपाहियों ने निकल कर वहाँ तबाही मचा दी और ग्रीक जंग जीत गए- अनु.]।

सूत्र साफ है: प्रकृति विज्ञान में क्रांति हो रही है, होती रहेगी और वह क्रांति प्रौद्योगिकी के जरिए समाज को बदलने का हथियार बन जाएगी। समाज में यह बदलाव मजदूर वर्ग लाएगा। बुर्ज़ुआओं ने विज्ञान रचा, पर वही विज्ञान मजदूरों का शस्त्र बन जाएगा। इसी शस्त्र का इस्तेमाल कर वे बुर्ज़ुआ समाज का पतन लाएँगे। स्वाभाविक रूप से विज्ञान मेहनती इंसान का स्वार्थ पूरा करेगा, निहित स्वार्थों का विरोध करेगा। जो केवल बुर्ज़ुआ वर्ग की प्रगति थी, वह मजदूर वर्ग के हाथों इंसान की तरक्की हो जाएगी - यही उम्मीद थी।

समाजवाद = सोवियत शासन = बिजली की राहें, इस सूत्र के साथ लेनिन ने भी तकरीबन यही बात कही है। वर्ष 1939 में 'सोशल फंक्शन ऑफ साइंस (विज्ञान की सामाजिक भूमिका)' – में बर्नाल ने यह बात भी कही थी कि 'In its endeavour, science is socialism (अपनी कोशिशों में विज्ञान समाजवाद है)'। भारत जैसे औपनिवेशिक देश के लोगों की विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी के बिना मुक्ति संभव नहीं है, साफ शब्दों में मेघनाद साहा ने ऐसा कहा [मेघनाद साहा - 20वीं सदी के विश्व-विख्यात भारतीय वैज्ञानिक – अनु.]। 1959 साल में द टू कल्चर्स किताब में स्नो ने आँकड़ों के द्वारा दिखलाया कि सोवियत राष्ट्र ने विज्ञान शिक्षा को कितना महत्व दिया और और इस वजह से उसकी अग्रगति में कैसी तेजी आई है। 1957 के स्पुटनिक ने चौंधियाते ढंग से दुनिया के लोगों से सामने इस बात को पेश किया। स्पुटनिक की सबसे बड़ी चोट अमेरिका के महाकाश शोध पर नहीं, उनकी शिक्षा व्यवस्था पर पड़ी। तैयारी की भेड़ियाँ बजने लगीं। बिल्कुल स्कूली स्तर से ही विज्ञान को नए साज में ढालने की योजनाएँ बनीं। यानी कि हर तरक्की की जड़ में विज्ञान है, बुर्ज़ुआ और मजदूर, हर वर्ग ने बिना फर्क इस बात को मान लिया। शीतयुद्ध का एक पैमाना यह भी बना - विज्ञान में कौन कितना आगे है। विज्ञान को ही प्रगति का पैमाना माना गया।

पर इसी के साथ-साथ दूसरे आलमी जंग के दिनों से ही (जिसे कभी 'भौतिक विज्ञानियों की जंग' कहा जाता था) सुर टूटना शुरू हो गया था। ऐटम बम का आतंक और उसके साथ अग्रणी वैज्ञनिकों का अंतरंग संबंध कइयों की आँखें खोल रहा था। जनरल आइज़नहावर ने जिस 'मिलिटरी इंडस्ट्रियल-सायंटिफिक' कॉम्प्लेक्स की बात की थी, उसके सबको निगल डालने वाले तरीके संवेदनशील लोगों के सामने लगातार खुलते जा रहे थे। विज्ञान से, खास तौर पर सभी विज्ञानों की रानी भौतिक शास्त्र से जिस बुनियादी समझ विकसित होने की अपेक्षा थी, वह कहाँ तक पूरी हो पाएगी, इस बारे में शंका बढ़ती जी रही थी। भौतिक विज्ञान के सभी निष्कर्ष आखिर जंग के मैदान तक पहुँच जाते हैं, यह देखकर कई भौतिकविज्ञानी अपराध बोध में दबे भौतिक विज्ञान का काम छोड़ कर आणविक जैवविज्ञान के क्षेत्र में चले आए। क्रिक और वाटसन की क्रांतिकारी खोज के जरिए जीवविज्ञान के भी आखिर एग्ज़ैक्ट साइंस के दायरे में आ जाने से एक ओर समझ की दुनिया में कुहरा कम हुआ, दूसरी ओर इसी जीवविज्ञान के नैतिकता की दृष्टि से खतरनाक होने की संभावना बढ़ गई [फ्रांसिस क्रिक (1916–2004) और जेम्स वाटसन (1928–जीवित) – डी एन ए की द्वि-हेलिकीय संरचना की खोज करने वाले वैज्ञानिक – अनु.]। हाल में इंसान की क्लोनिंग पर हुए विवाद के बहुत पहले ही बीसवीं सदी के सत्तर के दशक में जोसेफ नीडहैम ने बड़े विस्तार से इस पर चर्चा की थी। कुल मिलाकर विज्ञान = प्रगति, इस सूत्र से सुकून मिलना संभव नहीं रहा। इंसान को और दीगर कामकाज की तरह विज्ञान भी किस वर्ग के स्वार्थ में किस काम आता है, उसे देखकर ही इस बारे में सही-ग़लत की राय लेनी चाहिए, यह विचार बढ़ता चला। विज्ञान में तरक्की के बावजूद सोवियत राष्ट्र की ताकत में कमी आने और साम्राज्यवादी अमेरिका के शासक वर्गों के पैरों पर कुछ वैज्ञानिकों के लंबलेट आत्म-समर्पण ने (जिसके सबसे मूर्त रूप एडवर्ड टेलर थे) इस धारणा को मजबूत किया। कइयों ने कहना शुरू किया कि संस्थागत विज्ञान की जो प्रतिष्ठा और महत्व है, शासकवर्गों के लिए इसकी उपयोगिता ही उसकी जड़ है। इस नज़रिए से प्राक-विज्ञान जमाने के संस्थागत धर्म में और विज्ञान की भूमिका में कोई फर्क नहीं है।

हाल की नवउदारवादी अर्थव्यवस्था की जड़ें मजबूत होने के बाद, जिसका बाजारी वाहन वैश्वीकरण है, बाकी हर कुछ की तरह विज्ञान भी खुले आम संयुक्त राज्य अमेरिका के साम्राज्यवादी स्वार्थ-साधन का अंग बन गया। अब विज्ञान सत्य की खोज का रास्ता नहीं रहा। अब विज्ञान साफ तौर पर साम्राज्यवादी ताकतों के सामरिक, राजनैतिक और आर्थिक एकाधिपत्य को बनाए रखने का माध्यम है।

इसलिए सवाल उठता है कि विज्ञान को दीगर इंसानी कामकाज से अलग किसी निर्णायक भूमिका का महत्व क्यों दें? इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या विज्ञान की संरचना में ऐसा कुछ है जो स्वभावत: शासक-वर्गों के हित में है, या फिर शासक वर्गों की स्वार्थ-सिद्धि में नियोजित उसका यह रूप उसके स्वाभाविक स्वरूप का अपवाद है?

जंगली फ्रॉयड?

अब हम देखें कि नंदी जी इस सवाल के कौन से जवाब कैसे ढूँढ़ते हैं। उन्होंने इस सवाल पर दोतरफा हमला किया है। एक तो फ्रॉयड के 'पश्चिमी' सिद्धांत के साथ गिरीन्द्रशेखर बसु के 'पूरबी' विचारों की मुठभेड़ है। दूसरा, भारत में उपनिवेशवाद के साथ लागू हुई आधुनिक चिकित्सा-पद्धति के साथ देसी चिकित्सा-पद्धति की मुठभेड़ है।

फ्रॉयड के सिद्धांतों के साथ गिरीन्द्र के अपने विचारों के मुकाबले (मुठभेड़) में नंदी दो खासियत देखते हैं: एक उनका कट्टर क्लिनिकल अनुभववादी दृष्टिकोण है। उनके लिए मानसिक रोगी कभी भी किताबी पढ़ाई से मिली सीख या मिसाल या 'आँकड़े' नहीं थे। बिल्कुल शाब्दिक अर्थ में रोगी के बिस्तर के पास बैठकर अवलोकन के आधार पर सिद्धांतों तक पहुँचते थे। चिकित्साशास्त्र के इतिहास में इन दो दृष्टिकोणों का आपसी विरोध बहुत पुराना है। बिना जाँच किए दूर से की गई कल्पना के आधार पर कपोल-कल्पित दर्शन को हकीमों के ऊपर थोपने के खिलाफ हिपोक्रेटिस घराने ने संघर्ष किया था - हालाँकि यह संघर्ष असफल रहा था। इसी तरह चरक-संहिता में ज़बरन बकवास डालकर वैद्य-विरोधी ब्राह्मणों ने आयुर्वेद के अनुभव पर आधारित वैज्ञानिक रीतियों का विरोध किया था। यूरोप में नवजागरण के जमाने में घावों के इलाज में क्रांति लाने वाले शल्य-चिकित्सा के माहिर फ्रांसीसी आँब्रोआज़ पारे (Ambroise Pare) जो कुछ भी अपनी आँखों से देखते या जो कुछ अपने हाथों करते थे, उसी का विवरण प्रचलित ज़ुबान में वे लिखते रहे। फ्रांसीसी ज़ुबान में लिखने का कोई विकल्प नहीं था, क्योंकि उन्हें लातिन भाषा में लिखी पोथियों वाली विद्या नहीं मिली थी। जॉन लॉक के गुरु डॉक्टर सिडेनहैम के चिकित्सा-दर्शन में यह क्लिनिकल दृष्टिकोण शिखर पर पहुँच गया था। लॉक खुद कुशल सर्जन थे। लिवर का सिस्ट काट-फेंक कर रोगी को स्वस्थ कर पाने के वास्तविक अनुभव ने उनके विज्ञान दर्शन पर खास छाप डाली थी। उन दिनों यह मान्य तरीका नहीं था। यह महज मान्यता से अलग एक तरीका था।

देह-चिकित्सा के क्षेत्र में ही अगर इन दो दृष्टिकोणों में मुठभेड़ इतनी प्रचंड और टिकाऊ रही तो मनोरोग के उपचार में इसके तीखेपन का अंदाज़ा आसानी से मिल सकता है, क्योंकि प्रत्यक्ष अनुभवों को माननेवाले फ्रॉयड के आविर्भाव के पहले तक मनोविज्ञान आध्यात्मिक तत्व-मीमांसा और धर्म-शास्त्रों की पकड़ में फँसा था। पर फ्रॉयड को पढ़ने के पहले ही गिरीन्द्रशेखर दूर से की गई यादृच्छ कल्पना को महत्व न देकर रोग के प्रत्यक्ष अवलोकन के जरिए मनश्चिकित्सा में जुट गए। उनकी असली मौलिकता यहीं है। उनमें दो पद्धतियों की जो मुठभेड़ हमें दिखती है, वह दरअसल हर सभ्यता में युगों-युगों से चली आ रही है: एक ओर दार्शनिक अपनी अन-जाँची, पर शासकों के समर्थन में फलते-फूलते दर्शन को चिकित्सा-वैज्ञानिकों के काम करने के तरीकों पर थोपते रहे, दूसरी ओर चिकित्सा-वैज्ञानिक अपने तज़ुर्बों की रोशनी में जी जान से उससे टक्कर लेना चाहते रहे।

आशीष नंदी ने जो दूसरी विशेषता कही है, वह यह है कि गिरीन्द्रशेखर ने 'यूरोपी विरासत' से बाहर निकलकर काम करने की हिम्मत दिखलाई थी। सवाल यह है कि क्या 'यूरोपी विरासत' कहने मात्र से कोई बात बनती है? बर्कली और बेकन, दोनों यूरोपी दार्शनिक थे; पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने बर्कली को छोड़कर बेकन और मिल को माना - ऐसा करते हुए बैलेंटाइन जैसे प्रमुख प्राच्यवादियों के घोर विरोध को नज़रअंदाज़ किया। इसी तरह पावलोव भी मनोविज्ञान स्नायुतंत्र पर आधारित घराना में से हैं, पर गिरीन्द्रशेखर ने पावलोव के प्रति कोई रुचि नहीं दिखलाई, क्योंकि पश्चिमी यूरोप में मनोविज्ञान की विरासत में पावलोव का प्रभाव बहुत बाद में माना गया। यानी कि दरअसल वे यूरोपी मुख्यधारा से ही प्रभावित थे। वे फ्रॉयड के ढाँचे से उतना ही अलग हो पाए हैं जितना कि यूरोपी मुख्यधारा ने उन्हें जाने दिया है।

उनके अपने मन की दार्शनिक प्रवृत्ति ने यहाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वेदांती पिता के प्रभाव में उनका अपना दार्शनिक झुकाव अ-वस्तुवादी व्याख्याओं की ओर था। इस प्रवृत्ति को बड़ी आसानी से अनुभववाद विहीन मायावादी या पूरी तरह तर्क आधारित सांख्य दर्शन में जगह मिल गई। वेदांतिक प्रमाण पद्धति का सहारा लेकर, भय से मुक्ति पाने का औपनिवेशिक हल लेकर, आत्मा की क्रियापद्धति लेकर, गिरीन्द्रशेखर ने बड़े ऊँचे स्तर की चर्चा की थी, पर उन्होंने कभी भी लोकायत या चार्वाक दर्शन की चर्चा नहीं की। यह भी तो पश्चिमी प्राच्यवाद (ओरिएंटलिज़्म) के ढर्रे में बँधा थोपा हुआ साँचा है। बैलेंटाइन ने भी तो विद्यासागर को ऐसी ही बातें कही थीं। क्या इसमें कोई खास मौलिकता है? भूदेव मुखोपाध्याय, विवेकानंद, राधाकृष्णन आदि के हाथों बार-बार इस्तेमाल होकर क्या यह पैटर्न जरा मलिन या थोथा, यहाँ तक कि बेकार नहीं हो गया था? गिरीन्द्रशेखर की कुछ टिप्पणियाँ हूबहू विवेकानंद की प्रतिध्वनि लगती हैं। जैसे, 'हिन्दू शास्त्रों के आदर्शों के नज़रिए से देखा जाए तो... मनोविज्ञान की जगह हर तरह के विज्ञान से ऊपर है। आत्मा के साथ मिलन की कोशिश ही हिन्दू धर्म का चरम उपदेश है।... सभी विज्ञानों में से मनोविज्ञान ही सात्विक विद्या है, बाकी सभी राजसिक हैं। वे मन को बहिर्मुखी कर कर्म की ओर ले जाते हैं। मनोविद्या मन को अंतर्मुखी करती है और अपने बारे में जानने में सहायता करती है।' यहाँ संज्ञान के बिना ही (प्रमाण का तो सवाल ही नहीं है) कुछेक entity (तत्वों) को गिरीन्द्र मान ले रहे हैं। कठोर वैज्ञानिक सिद्धांत या नियमनिष्ठा से जो बात बनती है, उनके दूसरे लेखों में जिसके उदाहरण भरे पड़े हैं, उसका लेशमात्र भी यहाँ नहीं है। समझ में आता है कि यहाँ विज्ञान की जगह किसी और बात पर वे चर्चा करना चाहते हैं, हालाँकि मुखौटा विज्ञान का है। इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है:

हमारे दिमाग में दया, सहानुभूति आदि मनोभावों का अनुभव हमें नहीं होता है। इन सब मनोभावों के साथ जो संवेदनाएँ जुड़ी होती हैं, कहते हैं कि उनकी जगह दिल में है, इसलिए दयालु को 'सहृदय' व्यक्ति कहते हैं। हिन्दू शास्त्रकारों ने भी हृदय को रागद्वेष आदि का उद्गम कह कर निर्देश दिए हैं। इससे पता चलता है कि शरीरशास्त्र के जानकार के लिए जो सच है, मनोविद् के लिए वह सच नहीं भी हो सकता है।

इससे क्या समझ बनती है? तो क्या दया, सहानुभूति आदि मनोभावों के साथ जुड़ी संवेदनाएँ दिल में बैठी हुई हैं? तो क्या सहृदय शब्द को शाब्दिक अर्थ में ही समझना चाहिए? और केवल हिन्दू शास्त्रकार ही क्यों, सही वैज्ञानिक विचारों के अभाव में पैरासेल्सस के जमाने में यूरोप के लोग भी तो ऐसे ही सोचते थे, हालाँकि पैरासेल्सस ने सार्वजनिक रूप से गैलन की आत्मा का गला घोंटा था [पैरासेल्सस - (1493–1541) स्विस जर्मन चिकित्सक; गैलन (129–200/216) ग्रीक चिकित्सक – अनु.]। आज भी lily livered, chicken/ lion-hearted (लिली-लिवर यानी फीके रंग के जिगर वाला या कायर, चिकन यानी मुर्गा या कायर, लायन-हार्टेड यानी शेरदिल) जैसे अलंकारों वाली वाक-शैली में पुरानी सोच देखी जा सकती है ।

जबकि यही इंसान जब सही ढंग से क्लिनिकल तज़ुर्बों के आधार पर या किसी विशुद्ध वैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर लेख लिखते हैं, तब उनके तर्क और भाषा की ठोस बनावट और बंधन हमें बाँध लेते हैं, जिसकी अमिट पहचान स्वप्न शीर्षक किताब में लिपिबद्ध है।

एक और बात है, जीवन की संध्या में जब फ्रॉयड ने चिकित्सा से अर्जित अपने खयालों और विचारों को मानव-विज्ञान और धर्म के आँगन में लागू करने की कोशिश की, तो उनकी व्याख्याएँ खुलेआम पुराण कथाओं पर निर्भर हो गईं। क्या वे भी टोटेम और टाबू (कुनबे का प्रतीक) का इतिहास घोंट कर मानव-विज्ञान पर चर्चा करते हुए गिरीन्द्रशेखर की तरह ही मनोविज्ञान-पुराण को मिलाकर एक ढाँचा तैयार करना नहीं चाह रहे थे? अर्थात इस प्रक्रिया का भारत या यूरोप से कोई संबंध नहीं था। अपने-अपने मुल्कों में अपनी तयशुदा फलसफे की ज़मीं सोच की राहें तय कर रही थी।

वैसे यह बात सही है कि मनोविश्लेषणवादी गिरीन्द्रशेखर का गीता-विश्लेषण बिल्कुल अनोखा है, यह अलग से ध्यान देने की माँग रखता है। यहाँ उसकी जगह नहीं है, पर संक्षेप में दो एक बातें कही जा सकती हैं। उनके अनुसार गीता समेत जितनी भारतीय दार्शनिक कृतियाँ हैं, उनकी जड़ में जितनी दार्शनिक जिज्ञासा है, उससे कहीं अधिक विशेष ऋषियों की विशेष मनोवैज्ञानिक दशा का बिना किसी सजावट के हूबहू प्रक्षेपण है। इसी वजह से बड़ी गहरी अंतर्दृष्टि से भरी उपलब्धि के साथ ही हास्यास्पद बचकानी (childish and even silly) बातें भी मिलती हैं। उनके विचार में गीता में विशुद्ध वैज्ञानिक कौतूहल को चरितार्थ करने की कामना को ईश्वर की खोज में सही ताड़ना माना गया है। विभिन्न उपनिषदों में से ऐसी ईश्वर की खोज की कई मिसालें देते हुए उन्होंने दिखलाया कि इनमें से हरेक कोई न कोई सवाल उठाता है, जैसे हम कहाँ से आए हैं? हम किस तरह जीवन धारण करते हैं? मौत के बाद क्या होता है? कितनी शक्तियों की क्रियाओं से जीवदेह सजीव रहता है और उनमें से कौन सी मुख्य हैं? सोते वक्त कौन सी इंद्रियाँ जगी रहती हैं? सपने कहाँ से आते हैं? शरीर में सुख के अहसास का आधार क्या है? मन को कौन नियंत्रित रखता है? इंद्रियों को सजीव रखने का भार किसके ऊपर दिया गया है? 'इन सवालों में से अधिकतर मनोविज्ञान या शरीरविज्ञान के दायरे में आते हैं। कुछेक भौतिक विज्ञान और दर्शन के दायरे में आते हैं। इसलिए हम देख सकते हैं कि ऋषियों ने ब्रह्म के बारे में पहले से निर्धारित विचारों से साथ सोचना शुरू नहीं किया था ... और सभी नश्वर इंसानों की तरह ही वे इन समस्याओं के बोझ से पीड़ित थे।' गिरीन्द्रशेखर ने यह भी कहा कि मनोविज्ञान के अध्यापक होते हुए अक्सर अपने छात्रों से इन्हीं सवालों को उन्होंने सुना है। इन सवालों में 'there is nothing of mysticism (कोई रहस्यवाद नहीं है)'। फिर भी इन सवालों के जवाबों ने आखिर में ब्रह्म जैसी धुँधली सत्ता की ओर संकेत किया, गिरीन्द्रशेखर के अनुसार इसकी वजह यह थी कि उस प्राक-विज्ञान युग में यही स्वाभाविक था। उनके अनुसार सिर्फ सत्व, रस, तम ही नहीं, सारे भारतीय दर्शन को अलग-अलग इंसानों के, यानी विभिन्न ऋषि-व्यक्तियों के नज़रिए से परखना चाहिए। इसके लिए भौतिक विज्ञान के पद्धति-तंत्र की व्यक्ति निरपेक्ष परख की ज़रूरत नहीं है। अर्थात यह विभिन्न समय पर विभिन्न व्यक्तियों की विभिन्न मानसिक स्थितियों को दिखलाता है - यह प्रकृति और इंसान के बारे में वैज्ञानिक खोज नहीं है। ध्यान रहे, यहाँ मनोविज्ञान से मतलब है कि वे प्राक-विज्ञान युग के इंसान की 'अनछुई' उपलब्धि को ही समझा रहे हैं - 'his own sophisticated experience. He had no Newton or Einstein to consult... Whatever the Rishi said is absolutely true psychologically (उनका अपना जटिल अनुभव। कोई न्यूटन या आइंस्टाइन मौजूद न था, जिससे वे सलाह-मशविरा कर पाते... ऋषि ने जो भी कहा, वह मनोवैज्ञानिक रूप से ध्रुव सत्य है)'। सच-झूठ का प्रमाण पेश करने का जिम्मा उस ऋषि का नहीं है। अपने मन की उपलब्धि को जस का जस प्रकट कर के वे बरी हो जाते हैं। जाहिर है, यहाँ उन्होंने तथाकथित 'पश्चिमी' पैमाने से ही गीता के 'दर्शन' पर विचार किया है।

यह ध्यान देने योग्य है कि गिरीन्द्रशेखर उन प्रज्ञासंधानी ऋषियों का तिरस्कार नहीं कर रहे कि प्राचीन भारत के ये चिंतक आधुनिक विज्ञान का इस्तेमाल नहीं कर सके, उल्टा वे यह कह रहे हैं कि वे बड़ी हिम्मत के साथ अपने 'मनोवैज्ञानिक इंद्रिय अहसासों' के आधार पर अवरोही (deductive) तर्क की राह पर आगे बढ़े थे। उनके तर्क आम लोगों को सही लगते हैं या नहीं, इसकी परवाह उन्होंने नहीं की। बेशक ऐसे विश्लेषण में उनकी मौलिकता है, पर इसे 'पश्चिमी पैराडाइम' के पार नहीं कहा जा सकता है। इसके अलावा एक और सवाल यहाँ उठना चाहिए, पर उठाया नहीं गया। गिरीन्द्रशेखर द्वारा बतलाए इन ऋषियों के विपरीत राह पर चलते हुए चार्वाक लोकायतिकों ने 'मदशक्ति' की तुलना लाकर देह और मन के संबंधों की व्याख्या करने की कोशिश की थी। गिरीन्द्रशेखर इस बारे में चुप हैं, आशीष नंदी भी चुप हैं।

कोई शक नहीं कि गिरीन्द्रशेखर उपनिवेशकाल में पले 'पश्चिमी' विज्ञान शिक्षित भद्रलोक बंगाली चिंतनजीवियों की पराकाष्ठा थे। आशीष जी के लेखन में उनकी यही पहचान लाजवाब ढंग से सामने आती है, पर उनके विश्लेषण के बुनियाद को लेकर शंकाएँ रह जाती हैं। हो सकता है कि वे खुद इस बारे में सचेत थे। गिरीन्द्रशेखर के बारे में उनका लेख इस तरह खत्म होता है: 'क्या सचमुच 'हिंदू शास्त्रों के आदर्शों के नज़रिए से... मनोविज्ञान की जगह सभी विज्ञानों से ऊपर है? क्या औपनिवेशिक भारत उस पुराने भारत का 'सच्चा उत्तराधिकारी' है? जब वे 'अन्य फ्रॉयड' के बारे में विचार गढ़ते हैं तब 'what empirical and conceptual clues did he use (किन प्रत्यक्ष अवलोकन और अवधारणात्मक सूत्रों का इस्तेमाल उन्होंने किया)?' नंदी को इन सवालों में से किसी के भी जवाब नहीं मालूम हैं। और वह मानते भी हैं कि ये सवाल विवादास्पद हैं। फिर भी वे विज्ञान और पुराणों के बीच झूला झूल रहे इस मनीषी के कर्मकांड की इस तरह व्याख्या करने की कोशिश करते हैं कि एक पेशेदार मनोसमीक्षक होते हुए गिरीन्द्रशेखर का काम 'स्मृत अतीत' पर था - 'objective past (नि:शंक अतीत)' को लेकर नहीं। पर मनोविज्ञान को विज्ञान मानना हो तो वैज्ञानिक पद्धतियों के तंत्र के सवाल को नज़रअंदाज नहीं कर सकते। अगर वह नज़रअंदाज नहीं होता तो objective past का मुकाबला वह किस तरह से करेगा, इस सवाल का जवाब देना ज़रूरी हो जाता है। इस सवाल का जवाब देना हो तो स्नायुतंत्र आधारित मनोविज्ञान के साथ उसका क्या संबंध है, इस बारे में चर्चा ज़रूरी हो जाती है। इस बारे में गिरीन्द्रशेखर क्या सोचते थे - और क्या नहीं सोचते थे - इस पर नंदी जी कोई चर्चा नहीं करते हैं।

इस सबके बावजूद यह बात बिना झिझक माननी पड़ेगा कि गिरीन्द्रशेखर को केंद्र में रखते हुए आशीष बाबू ने जिन सवालों को उठाया है, वे मूल्यवान हैं। जवाबहीन इन सवालों के हवाले से ही हमें खुद को इस तरह पहचानने के काम को बढ़ाते है।

चिकित्साविज्ञान: देसी बनाम औपनिवेशिक

इसके बाद के सवाल पर आशीष बाबू ने बड़े निष्पक्ष ढंग से अपनी बात रखी है। मुख्यत: उन्होंने चार आख्यान सुनाए हैं:

1) विज्ञान-शिक्षा और वैज्ञानिक शोध में जानवरों को काटने-चीरने के खिलाफ थीओसोफिस्टों (ब्रह्मविद्यावादियों) ने जो आंदोलन किया, उनके कागज़ात की जाँच कर आधुनिक चिकित्साविज्ञान के तथाकथित व्यक्ति-निरपेक्षता के खिलाफ आधुनिक विज्ञान-विरोधियों के बयान ढूँढे हैं, 2) विश्वविद्यालय और विज्ञान-चर्चा को बिल्कुल एक-आयामी करने की जगह सौ फूल खिलाने की जो कोशिश पैट्रिक गेडेस ने की थी, उसका वर्णन किया है [पैट्रिक गेडेस (1854 –1932) – स्कॉटिश जीवविज्ञानी और शिक्षाविद-अनु.] । गेडेस ने चाहा था कि उनके 'विज्ञान संबंधी ग्रामीण दृष्टिकोण' की ज़मीन शांतिनिकेतन में हो, 3) गाँधीजी के हिंद-स्वराज में उन्हें ' a fascinating science policy document of the post-Swadeshi era (उत्तर-स्वदेशी युग में विज्ञान नीति का अद्भुत दस्तावेज)' ढूँढ़ मिला है। इंसान के जिस्म को राष्ट्र-यंत्र के प्रतीक की तरह पेश कर गाँधीजी ने दिखलाया था कि 'आधुनिक यंत्रनिर्भर सभ्यता बीमारी है, क्योंकि वह देह की समग्रता को नुकसान पहुँचाती है। सच्चा औजार तो ... वही होगा जो शरीर का स्वाभाविक विस्तार है, शरीर से अलग कुछ नहीं है।' 4) सन 1923 मे जी श्रीनिवासमूर्ति ने आयुर्वेद चिकित्सापद्धति के बारे में जो प्रतिवेदन दिया था, उस पर नंदी जी ने विस्तार से चर्चा की है। इस भाग में यही सबसे मूल्यवान दलील है। श्रीनिवासमूर्ति के विचार में, आयुर्वेद में जीवाणु को रोग का एक कारण मानने को महत्व ज़रूर दिया गया है, पर इसे अनेक कारणों में से सिर्फ एक माना जाता है, जबकि ऐलोपैथी में जीवाणुओं का रोग के कारण रूप में बहुत ज्यादा महत्व है। बात ज़रूर सोचने लायक है। पर सवाल है: पास्तूर और कोख़ के बाद से जीवाणु का जो मतलब हम जानते हैं, क्या आयुर्वेद के विज्ञानियों को इसी अर्थ में जीवाणुओं की समझ थी [लुई पास्तूर (1822–1895) फ्रांसीसी रसायनविद और सूक्ष्मजीवविज्ञानी; रॉबर्ट हाइनरिख़ हर्बर्ट कोख़ (1843–1910) जर्मन चिकित्सक और सूक्ष्मजीवविज्ञानी - अनु.]? कोई वजह नहीं है कि हम देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की इस बात को न मानें, “... विज्ञान के इतिहास में जीव-कोष और जीवाणु की खोज के पहले तक शरीर के ढाँचे और अधिकतर रोगों के असली कारणों की जानकारी नहीं थी (संदर्भ: आयुर्वेद में विज्ञान, उत्स मानुष प्रकाशन, पृ. 34)।

इस संदर्भ पर श्रीकृष्णचैतन्य ठाकुर ने भी चर्चा की है, हालाँकि भाषा में अवांछित टेढ़ेपन से उनकी बातें समझने में दिक्कत आती है [श्रीकृष्णचैतन्य ठाकुर – बांग्ला में आयुर्वेद पर कई किताबों के लेखक – अनु.]। ठाकुर जी ने लिखा है, “वाइरस, बैक्टीरिया, अमीबा जैसे भी रोग पैदा करते हैं, जो तथ्य सुश्रूत के सूत्र स्थान 19/23 सूत्रश्लोक और 20/28 की उक्तियाँ हैं, वे शतपथ ब्राह्मण 11/4 सूक्ति में स्पष्ट है (यह ब्राह्मण यजुर्वेद की माध्यंदिन शाखा का सौवाँ अध्याय है), पर इस बारे में पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान के सामने हमारी दीनता नंगी खड़ी दिखती है (संदर्भ: कविराज (वैद्य) ब्रजेंद्रनाथ नाग संपादित चरक संहिता की भूमिका, पृ. 6)।' क्या इसका मतलब यह निकलता है कि आयुर्वेद विज्ञानियों ने वाइरस, बैक्टीरिया, अमीबा आदि की खोज बहुत समय पहले ही कर ली थी, पर बाद में यह ज्ञान खो गया? अगर ऐसा ही है तो सवाल है: यह खोज किस पद्धति से, कैसे परीक्षण-निरीक्षणों के आधार पर हुई थी? क्या ये सारी खोजें अणुवीक्षण यंत्र (माइक्रोस्कोप) के बिना ही हो गई थीं? अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसे सैद्धांतिक अनुमान ज़रूर कहा जा सकता है, पर क्या इसे प्रमाणयोग्य या खंडनयोग्य (फॉल्सिफायबल) सिद्धांत कहा जा सकता है? अगर यह नहीं होता तो तथाकथित आयुर्वेद को ऐलोपैथी का वैकल्पिक 'सिस्टम' मानकर कैसे खड़ा किया जा सकता है?

दरअसल आयुर्वेद के बारे में बुनियादी सवाल यह है कि लोक-समाज में सैकड़ों सालों से तथाकथित आयुर्वेदिक चिकित्सा के नाम से जो चला आ रहा है, उसके साथ असली आयुर्वेद शास्त्र का कितना संबंध है? श्रीकृष्णचैतन्य ठाकुर के 'पूज्यनीय अध्यापक वैद्यरत्न वाराणसीगुप्त और महामहोपाध्याय गणनाथसेन महाशय ने मजाक करते हुए कहा था - बेटे! कलियुग में पाँच आयुर्वेदी चिकित्सक हैं -

मालाकारश्चचर्मकार: नापितो रजकस्थता।
वृद्धारंडा विहेषणे कलौ पंच चिकित्सा:।

यानी फूलमाली, कर्मकार (लोहार), नाई, धोबी और मुहल्ले की बूढ़ी राँड़ – ये ही चिकित्सक हैं'। गणनाथ सेन ने उन्हें कहा था, 'आज आम लोगों को मन में आयुर्वेद के प्रति जो उदासीनता दिकती है, वह एक दिन या एक साल में नहीं पनपी है, यह कम से कम ईसा की पाँचवीं-छठी सदी में शुरू हुई थी, क्योंकि किसी जटिल रोग के लिए सही आयुर्वेद ज्ञान और दवाओं का अनुभव अर्जित करने लायक वैद्य है ही नहीं। वे अपने तज़ुर्बे से मिले आयुर्वेदी चिंतन से जो कुछ सीखते हैं, उसी का प्रयोग करते हैं। दरअसल तांत्रिकों द्वारा खोजी दवाओं के असर का सहारा लेकर वे ग़लत राह पर चल पड़ते हैं। इसके पीछे आयुर्वेद के बुनियादी ग्रंथ पर चर्चा का अभाव है और बस दो चार मुट्ठी भर शरीर-चर्चा के ग्रंथों का पाठ मात्र है (वही, पृ.1)।'

हम जो विशेषज्ञ नहीं हैं, इसे पढ़कर इतना कह सकते हैं कि फलित आयुर्वेद पैराडाइम-विहीन मामला है। और यह बात अंग्रेज़ों के आने के बहुत पहले से ही चल रही है। कुछ लोग 'अपने तज़ुर्बों से मिली धारणाओं' के साथ-साथ काम करते जा रहे थे, पर इन धारणाओं को किसी मान्य, किसी हद तक व्यापक, वैज्ञानिक रीति से प्रमाणित होने का मौका नहीं मिला। इसलिए ये अलग-थलग रीतियाँ बनकर रह गईं। उसके ऊपर 'तांत्रिकों द्वारा खोजी दवाओं के असर का सहारा लेकर वे ग़लत राह पर चल पड़ते हैं'। ऐसे हाल में क्या आयुर्वेदिक 'सिस्टम' नामक किसी चीज़ के होने का दावा किया जा सकता है? इसलिए बाज़ार में व्यवहार में 'अंग्रेज़ी दवा' के उलट जो आयुर्वेद-चिकित्सा चलती है, वह महज 'टोटका चिकित्सा या जड़ीबूटी चिकित्सा' है (वही, पृ. 2)।

इसलिए ऐलोपैथी के साम्राज्यवादी उद्गम की बात को याद रखते हुए भी कहा जा सकता है, एक्यूमेनिकल विज्ञान की कुछ मान्य पद्धतियों को मान चलने की कोशिश उसमें है, जैसे तयशुदा नियमों के मुताबिक परीक्षण-निरीक्षण, खंडनयोग्यता (फॉल्सिफायबिलिटी) आदि। इसके उलट, प्रचलित आयुर्वेद में 'फूलमाली, कर्मकार, नाई, धोबी और मुहल्ले की बूढ़ी राँड़' के कुछ निजी लोकतथ्य मिलते हैं, जिसमें से बहुत कुछ बेशक प्रयोगों द्वारा सिद्ध है और लाभदायक है, पर वह कभी भी वैज्ञानिक पद्धति के नियमों से परखे नहीं गए हैं। देसी टीका या मोतियाबिंद काटना इसकी परिचित मिसालें हैं। इसलिए यह बात मान लेने पर भी कि साम्राज्यवादियों ने पूरी तरह अपने स्वार्थों के लिए इस देश पर खर्चीली चिकित्सा-पद्धति थोपी है, यह कहना बाकी रह जाता है कि जो उन्होंने थोपा है, वह कुछ हद तक प्रमाणित, खंडनयोग्य और मान्य पद्धति है। पद्धति खंडनयोग्य हो तो उसके लगातार बेहतर होने की संभावना रहती है - जो फलित, अप्रमाणित, अखंडनयोग्य, प्रचलित आयुर्वेद के बारे में नहीं कहा जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं है कि आयुर्वेद शास्त्र अपनी खोई मर्यादा वापस पा ले, और खंडनयोग्यता की माँग पूरी कर दिखाए तो वह मान्य चिकित्सापद्धति का सिस्टम हो जाएगा। पर जब तक यह नहीं होता, तब तक इस हीनस्तर के आयुर्वेद को ऐलोपैथी का विकल्प मानना अतार्किक है।

चूँकि साम्राज्यवाद से ऐलोपैथी आई, इसलिए ऐलोपैथी और रोग के होने में जीवाणु के होने के सिद्धांत की उपयोगिता को कम कर आँकना द्वंद्वहीन एकआयामी सोच को बढ़ावा देता है। यह ऐसा है, जैसे संस्थागत विज्ञान साम्राज्यवाद का पिछलग्गू हो गया है, इस वजह से विज्ञान के सिद्धांत ग़लत नहीं हो जाते, बल्कि साम्राज्यवादियों के मुनाफालोलुप हाथों से विज्ञान को वापिस छीन लाना और आम लोगों के हित में उसे अपने दम पर खड़ा करना एक बड़ी लड़ाई है। बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के हाथ बिक चुके चिकित्सा-विज्ञान को सचमुच के विज्ञान में बदलना उसी लड़ाई का हिस्सा है। इसके लिए बुनियादी विज्ञान को ही नकारने का मतलब, विलायती मुहावरे में, बाथटब के पानी के साथ शिशु को भी बहा देना है। नंदी जी की मेहनत से की गई खोज में मानो इसी बहाव का बाजा सुनाई पड़ता है।

नंदी के विचार में इसमें से 'आधुनिक चिकित्साविज्ञान के दर्शन' के खिलाफ तीन किस्म के विरोध फले फूले हैं। इन तीनों की उन्होंने इस तरह पहचान की है।  थियोसोफिस्टों का 'तर्कहीनता-आधारित अस्वीकार', गाँधीजी का 'संस्कृति आधारित प्रतिरोध' और श्रीनिवासमूर्ति का 'स्वदेहजात सिद्धांत ही बहिरागत सिद्धांत की बुनियाद है (indigenous-as-the-theory-of-the-exogenous)।' इसमें कोई शक नहीं है कि आधुनिक विज्ञान आज संकट से गुजर रहा है। नंदी की उम्मीद है कि ऊपर कही गई तीन किस्म की आलोचनाएँ, उनमें 'आपस में जितनी भी दूरी हो, शायद उस संकट से उबरने में मदद करेंगी।' यह कैसे होगा, वह उन्हें मालूम नहीं है।

उपसंहार

तुरंत जवाब ढूँढ़ने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण सही सवाल पूछना है - यह कहकर मैंने चर्चा शुरू की थी। आशीष नंदी ने अपनी प्रगाढ़ विद्वत्ता और मुक्त चिंतन की मिठास में घोलकर कई सारे सवाल उठाए हैं। जिन बातों को सोचकर हम आश्वस्त हो जाते हैं, उनके अंदर बड़े गड्ढों को उन्होंने दिखलाया है। अधिकतर बीमारी को पहचानने में वे सफल हुए हैं। फिर भी शंका होती है, वे किनके पक्ष में खड़े होकर सवाल उठा रहे हैं? उनका मूल हमला सेक्युलरिज़्म और आधुनिक विज्ञान पर आ फूटता है। दार्शनिक नज़रिए से उनके तर्क बेशक सोचने लायक हैं, पर हमारे जैसे मुल्क में, जहां ठीक इन दो बातों के अभाव से इंसान की दुनियावी तकलीफों का अंत नहीं है, वह उनका अति-परिशीलित दर्शन-चिंतन राष्ट्र-राज्य की उन ताकतों को ही मजबूत करेगा, जो इंसान को जड़ मीडिया पशु के स्तर पर उतार गिराना चाहते हैं। कई तरह के मूलवाद आज इस तरह के सैद्धांतिक सहारे की उम्मीद में बैठे हैं। निश्चित ही ऐसी बात आशीष बाबू नहीं चाहेंगे।

अमर्त्य सेन का एक बयान उद्धृत कर इस चर्चा को विराम दें। 'भारत की वयस्क जनता में अधिकतर (और वयस्क स्त्रियों का दो-तिहाई) आज भी निरक्षर है। दो एक खास इलाकों को छोड़ दें तो तालीम और विज्ञान को भारतीय नागरिकों के बड़े हिस्से तक ले जाने की कोई ईमानदार कोशिश दिखती नहीं है। इस भयंकर असफलता को ध्यान में रखकर विज्ञान के महत्व को कम करने का मतलब गैरबराबरी और अन्याय के खिलाफ नहीं, उनके पक्ष में काम करना है। भारत में सबको तालीम देने की नीति की असफलता चूँकि राष्ट्र-यंत्र की असफलता का हिस्सा है, इसलिए ज़रूरी है कि शासन-प्रणाली के खिलाफ आवाज़ उठाएँ, विज्ञान के खिलाफ नहीं।5

संदर्भ:
पहली पंक्ति में 'अभ्यास की सीमाओं में बँधी चेतना के संकीर्ण संकोच' कथन रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 'नीलमणिलता' से उद्धृत है।
1. अमर्त्य सेन, द आर्गुमेंटेटिव इंडियन, ऐलेन लेन, पेंगुइन, लंदन, 2005, पृ. 194।
2. अमर्त्य सेन, भारतेर अतीत-व्याख्या प्रसंगे (मूल से बांग्ला में अनुवाद, आशीष लाहिड़ी), एशियाटिक सोसायटी 1999, पृ. 20।
3. वही, पृ. 22।
4. वही, पृ. 29।
5. वही, पृ. 31।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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