हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर लगी पाबंदी पर अरुंधति रॉय का बयान

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/30/2015 03:46:00 PM


कार्यकर्ता-लेखिका अरुंधति रॉय ने यह बयान आईआईटी मद्रास द्वारा छात्र संगठन आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर लगाई गई पाबंदी (नामंजूरी) के संदर्भ में जारी किया है. एक दूसरी खबर के मुताबिक, एपीएससी को लिखे अपने पत्र में भी उन्होंने यही बात कही है कि ‘आपने एक दुखती हुई रग को छू दिया है – आप जो कह रहे हैं और देख रहे हैं यानी यह कि जातिवाद और कॉपोरेट पूंजीवाद हाथ में हाथ डाले चल रहे हैं, यह वो आखिरी बात है जो प्रशासन और सरकार सुनना चाहती है. क्योंकि वे जानते हैं कि आप सही हैं. उनके सुनने के लिहाज से आज की तारीख में यह सबसे खतरनाक बात है.’

आखिर एक छात्र संगठन आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल (एपीएससी) में ऐसा क्या है जिसने आईआईटी मद्रास के डीन ऑफ स्टूडेंट्स को इतना डरा दिया कि उन्हें एकतरफा तौर पर उसको ‘डीरेकग्नाइज’ (नामंजूर) करना पड़ा?

इसकी जो वजह बताई गई वह हमेशा की तरह वही बेवकूफी भरा भुलावा है: ‘‘वे समुदायों के बीच में नफरत फैला रहे थे.’’ छात्रों का कहना है कि जो दूसरी वजह उन्हें बताई गई वह यह थी कि उनके संगठन के नाम को बेहद ‘राजनीतिक’ माना गया. जाहिर है कि यही बात विवेकानंद स्टडी सर्किल जैसे छात्र संगठनों पर लागू नहीं होती.

एक ऐसे वक्त में, जब हिंदुत्व संगठन और मीडिया की दुकानें आंबेडकर का, जिन्होंने सरेआम हिंदू धर्म को छोड़ दिया था, घिनौने तरीके से खास अपने आदमी के रूप में प्रचार कर रही हैं, एक ऐसे वक्त में जब हिंदू राष्ट्रवादी घर वापसी अभियान (आर्य समाज के ‘शुद्धि’ कार्यक्रम का एक ताजा चेहरा) शुरू किया गया है ताकि दलितों को वापस ‘हिंदू पाले’ में लाया जा सके, तो ऐसा क्यों है कि जब आंबेडकर के सच्चे अनुयायी उनका नाम या उनके प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं तो उनकी हत्या कर दी जाती है, जैसे कि खैरलांजी में सुरेखा भोटमांगे के परिवार के साथ किया गया? ऐसा क्यों है कि अगर एक दलित के फोन में आंबेडकर के बारे में एक गीत वाला रिंगटोन हो तो उसे पीट पीट कर मार डाला जाता है? क्यों एपीएससी को नामंजूर कर दिया गया?

ऐसा इसलिए है कि उन्होंने इस जालसाजी की असलियत देख ली है और मुमकिन रूप से सबसे खतरनाक जगह पर अपनी उंगली रख दी है. उन्होंने कॉरपोरेट भूमंडलीकरण और जाति के बने रहने के बीच में रिश्ते को पहचान लिया है. मौजूदा शासन व्यवस्था के लिए इससे ज्यादा खतरनाक बात मुश्किल से ही और कोई होगी, जो एपीएससी ने की है- वे भगत सिंह और आंबेडकर दोनों का प्रचार कर रहे थे. यही वो चीज है, जिसने उन्हें निशाने पर ला दिया. यही तो वह चीज है, जिसे कुचलने की जरूरत बताई जा रही है. उतना ही खतरनाक वीसीके का यह ऐलान है कि वो वामपंथी और प्रगतिशील मुस्लिम संगठनों के साथ एकजुटता कायम करने जा रहे हैं.

एपीएससी की नामंजूरी, एक किस्म की मंजूरी है. यह इस बात की मंजूरी है कि ऐसे रिश्ते कायम करना बिल्कुल सही और वाजिब है, जैसे रिश्ते इसने बनाए. और यह भी कि अनेक लोग ये रिश्ते बनाने लगे हैं.

अनुवाद: रेयाज उल हक

नागौर: एक और खैरलांजी

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2015 10:43:00 AM



राजस्थान के नागौर में हुए दलितों के जनसंहार पर भंवर मेघवंशी की यह रिपोर्ट इस मुल्क का चेहरा है, जो रोज ब रोज दलित-मुस्लिम-आदिवासी बस्तियों में देखने को मिलता है. भंवर राजस्थान में दलित, आदिवासी और घुमन्तु समुदाय के लिए संघर्षरत है. प्रतिरोध से साभार.

राजस्थान का नागौर जिला दलितों की कब्रगाह बनता जा रहा है. राजधानी जयपुर से तक़रीबन ढाई सौ किलोमीटर दूर स्थित अन्य पिछड़े वर्ग की एक दबंग जाट जाति की बहुलता वाला नागौर जिला इन दिनों दलित उत्पीडन की निरंतर घट रही शर्मनाक घटनाओं की वजह से कुख्यात हो रहा है. विगत एक साल के भीतर यहाँ पर दलितों के साथ जिस तरह का जुल्म हुआ है और आज भी जारी है, उसे देखा जाये तो दिल दहल जाता है, यकीन ही नहीं आता है कि हम आजाद भारत के किसी एक हिस्से की बात कर रहे है. ऐसी ऐसी निर्मम और क्रूर वारदातें कि जिनके सामने तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों द्वारा की जाने वाली घटनाएँ भी छोटी पड़ने लगती है. क्या किसी लोकतान्त्रिक राष्ट्र में ऐसी घटनाएँ संभव है? वैसे तो असम्भव है, लेकिन यह संभव हो रही है, यहाँ के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचें की नाकामी की वजह से.

नागौर जिले के बसवानी गाँव में पिछले महीने ही एक दलित परिवार के झौपड़े में दबंग जाटों ने आग लगा दी जिससे एक बुजुर्ग दलित महिला वहीँ जल कर राख हो गयी और दो अन्य लोग बुरी तरह से जल गए जिन्हें जोधपुर के सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भेजा गया. इसी जिले के लंगोड़ गाँव में एक दलित को जिंदा दफनाने का मामला सामने आया है. मुंडासर में एक दलित औरत को घसीट कर ट्रेक्टर के गर्म सायलेंसर से दागा गया और हिरडोदा गाँव में एक दलित दुल्हे को घोड़ी पर से नीचे पटक कर जान से मरने की कोशिश की गयी. राजस्थान का यह जाटलेंड जिस तरह की अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहा है, उसके समक्ष तो खाप पंचायतों के तुगलकी फ़रमान भी कहीं नहीं टिकते है, ऐसा लगता है कि इस इलाके में कानून का राज नहीं, बल्कि जाट नामक किसी कबीले का कबीलाई कानून चलता है,जिसमे भीड़ का हुकुम ही न्याय है और आवारा भीड़ द्वारा किये गए कृत्य ही विधान है.



डांगावास: दलित हत्याओं की प्रयोगशाला

नागौर जिले की तहसील मेड़ता सिटी का निकटवर्ती गाँव है डांगावास, जहाँ पर 150 दलित परिवार निवास करते है और यहाँ 1600 परिवार जाट समुदाय के है. तहसील मुख्यालय से मात्र 2 किलोमीटर दुरी पर स्थित है डांगावास… जी हाँ, यह वही डांगावास गाँव है जहाँ पिछले एक साल में चार दलित हत्याकांड हो चुके है, जिसमे सबसे भयानक हाल ही में हुआ है. एक साल पहले यहाँ के दबंग जाटों ने मोहन लाल मेघवाल के निर्दोष बेटे की जान ले ली थी, मामला गाँव में ही ख़त्म कर दिया गया. उसके बाद 6 माह पहले मदन पुत्र गबरू मेघवाल के पाँव तोड़ दिये गए. 4 माह पहले सम्पत मेघवाल को जान से ख़त्म कर दिया गया, इन सभी घटनाओं को आपसी समझाईश अथवा डरा धमका कर रफा दफाकर दिया गया. पुलिस ने भी कोई कार्यवाही नहीं की.

स्थानीय दलितों का कहना है कि बसवानी में दलित महिला को जिंदा जलाने के आरोपी पकडे नहीं गए और शेष जगहों की गंभीर घटनाओं में भी कोई कार्यवाही इसलिए नहीं हुयी क्योंकि सभी घटनाओं के मुख्य आरोपी प्रभावशाली जाट समुदाय के लोग है. यहाँ पर थानेदार भी उनके है, तहसीलदार भी उनके ही और राजनेता भी उन्हीं की कौम के है, फिर किसकी बिसात जो वे जाटों पर हाथ डालने की हिम्मत दिखाये? इस तरह मिलीभगत से बर्षों से दमन का यह चक्र जारी है, कोई आवाज़ नहीं उठा सकता है, अगर भूले भटके प्रतिरोध की आवाज़ उठ भी जाती है तो उसे खामोश कर दिया जाता है.

जमीन के बदले जान

एक और ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि राजस्थान काश्तकारी कानून की धारा 42 (बी) के होते हुए भी जिले में दलितों की हजारों बीघा जमीन पर दबंग जाट समुदाय के भूमाफियाओं ने जबरन कब्ज़ा कर रखा है. यह कब्जे फर्जी गिरवी करारों, झूठे बेचाननामों और धौंस पट्टी के चलते किये गए है, जब भी कोई दलित अपने भूमि अधिकार की मांग करता है, तो दबंगों की दबंगई पूरी नंगई के साथ शुरू हो जाती है. ऐसा ही एक जमीन का मसला दलित अत्याचारों के लिए बदनाम डांगावास गाँव में विगत 30 वर्षों से कोर्ट में जेरे ट्रायल था, हुआ यह कि बस्ता राम नामक मेघवाल दलित की 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन कभी मात्र 1500 रूपये में इस शर्त पर गिरवी रखी गयी कि चिमना राम जाट उसमे से फसल लेगा और मूल रकम का ब्याज़ नहीं लिया जायेगा. बाद में जब भी दलित बस्ता राम सक्षम होगा तो वह अपनी जमीन गिरवी से छुडवा लेगा. बस्ताराम जब इस स्थिति में आया कि वह मूल रकम दे कर अपनी जमीन छुडवा सकें, तब तक चिमना राम जाट तथा उसके पुत्रों ओमाराम और काना राम के मन में लालच आ गया, जमीन कीमती हो गयी. उन्होंने जमीन हड़पने की सोच ली और दलितों को जमीन लौटने से मना कर दिया. पहले दलितों ने याचना की. फिर प्रेम से गाँव के सामने अपना दुखड़ा रखा. मगर जिद्दी जाट परिवार नहीं माना. मजबूरन दलित बस्ता राम को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी. करीब तीस साल पहले मामला मेड़ता कोर्ट में पंहुचा, बस्ताराम तो न्याय मिलने से पहले ही गुजर गया. बाद में उसके दत्तक पुत्र रतनाराम ने जमीन की यह जंग जारी रखी और अपने पक्ष में फैसला प्राप्त कर लिया. वर्ष 2006 में उक्त भूमि का नामान्तरकरण रतना राम के नाम पर दर्ज हो गया तथा हाल ही में में कोर्ट का फैसला भी दलित खातेदार रतना राम के पक्ष में आ गया. इसके बाद रतना राम अपनी जमीन पर एक पक्का मकान और एक कच्चा झौपडा बना कर परिवार सहित रहने लग गया लेकिन इसी बीच 21 अप्रैल 2015 को चिमनाराम जाट के पुत्र कानाराम तथा ओमाराम ने इस जमीन पर जबरदस्ती तालाब खोदना शुरू कर दिया और खेजड़ी के वृक्ष काट लिये. रत्ना राम ने इस पर आपत्ति दर्ज करवाई तो जाट परिवार के लोगों ने ना केवल उसे जातिगत रूप से अपमानित किया बल्कि उसे तथा उसके परिवार को जान से मार देने कि धमकी भी दी गयी. मजबूरन दलित रतना राम मेड़ता थाने पंहुचा और जाटों के खिलाफ रिपोर्ट दे कर कार्यवाही की मांग की. मगर थानेदार जी चूँकि जाट समुदाय से ताल्लुक रखते है सो उन्होंने रतनाराम की शिकयत पर कोई कार्यवाही नहीं की ,दोनों पक्षों के मध्य कुछ ना कुछ चलता रहा.

निर्मम जनसंहार

12 मई को जाटों ने एक पंचायत डांगावास में बुलाने का निश्चय किया, मगर रतना राम और उसके भाई पांचाराम के गाँव में नहीं होने के कारण यह स्थगित कर दी गयी. बाद में 14 मई को फिर से जाट पंचायत बैठी. इस बार आर पार का फैसला करना ही पंचायत का उद्देश्य था. अंततः एकतरफा फ़रमान जारी हुआ कि दलितों को किसी भी कीमत पर उस जमीन से खदेड़ना है. चाहे जान देनी पड़े या लेनी पड़े. दूसरी तरफ पंचायत होने की सुचना पा कर दलित अपने को बुलाये जाने का इंतजार करते हुये अपने खेत पर स्थित मकान पर ही मौजूद रहे. अचानक उन्होंने देखा कि सैंकड़ों की तादाद में जाट लोग हाथों में लाठियां, लौहे के सरिये और बंदूके लिये वहां आ धमके है और मुट्ठी भर दलितों को चारों तरफ से घेर कर मारने लगे. उन्होंने साथ लाये ट्रेक्टरों से मकान तोडना भी चालू कर दिया.

लाठियों और सरियों से जब दलितों को मारा जा रहा था. इसी दौरान किसी ने रतनाराम मेघवाल के बेटे मुन्नाराम को निशाना बना कर फ़ायर कर दिया लेकिन उसी वक्त किसी और ने मुन्ना राम के सिर के पीछे की और लोहे के सरिये से भी वार कर दिया जिससे मुन्नाराम गिर पड़ा और गोली रामपाल गोस्वामी को जा कर लग गयी जो कि जाटों की भीड़ के साथ ही आया हुआ था. गोस्वामी की बेवजह हत्या के बाद जाट और भी उग्र हो गये. उन्होंने मानवता की सारी हदें पार करते हए वहां मौजूद दलितों का निर्मम नरसंहार करना शुरू कर दिया.

ट्रेक्टर जो कि खेतों में चलते है और फसलों को बोने के काम आते है. वे निरीह, निहत्थे दलितों पर चलने लगे. पूरी बेरहमी से जाट समुदाय की यह भीड़ दलितों को कुचल रही थी. तीन दलितों को ट्रेक्टरों से कुचल कुचल कर वहीँ मार डाला गया. इन बेमौत मारे गए दलितों में श्रमिक नेता पोकर राम भी था जो उस दिन अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए अपने भाई गणपत मेघवाल के साथ वहां आया हुआ था. जालिमों ने पोकरराम के साथ बहुत बुरा सलूक किया. उस पर ट्रेक्टर चढाने के बाद उसका लिंग नोंच लिया गया तथा आँखों में जलती लकड़ियाँ डाल कर ऑंखें फोड़ दी गयी. महिलाओं के साथ ज्यादती की गयी और उनके गुप्तांगों में लकड़ियाँ घुसेड़ दी गयी. तीन लोग मारे गए ,14 लोगों के हाथ पांव तोड़ दिये गए, एक ट्रेक्टर ट्रोली तथा चार मोटर साईकलें जलाकर राख कर दी गयी, एक पक्का मकान जमींदोज कर दिया गया और कच्चे झौपड़े को आग के हवाले कर दिया गया. जो भी समान वहां था उसे लूट ले गए. इस तरह तकरीबन एक घंटा मौत के तांडव चलता रहा, लेकिन मात्र 4 किलोमीटर दूरी पर मौजूद पुलिस सब कुछ घटित हो जाने के बाद पंहुची और घायलों को अस्पताल पंहुचाने के लिए एम्बुलेंस बुलवाई, जिसे भी रोकने की कोशिश जाटों की उग्र भीड़ ने की. इतना ही नहीं बल्कि जब गंभीर घायलों को मेड़ता के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां भी पुलिस तथा प्रशासन की मौजूदगी में ही धावा बोलकर बचे हुए दलितों को भी खत्म करने की कोशिश की गयी. यह अचानक नहीं हुआ, सब कुछ पूर्वनियोजित था.



ऐसी दरिंदगी जो कि वास्तव में एक पूर्वनियोजित जनसंहार ही था, इसे नागौर की पुलिस और प्रशासन जमीन के विवाद में दो पक्षों की ख़ूनी जंग करार दे कर दलित अत्याचार की इतनी गंभीर और लौमहर्षक वारदात को कमतर करने की कोशिश कर रही है. पुलिस ने दलितों की ओर से अर्जुन राम के बयान के आधार पर एक कमजोर सी एफआईआर दर्ज की है जिसमे पोकरराम के साथ की गयी इतनी अमानवीय क्रूरता का कोई ज़िक्र तक नहीं है और ना ही महिलाओं के साथ हुयी भयावह यौन हिंसा के बारे में एक भी शब्द लिखा गया है. सब कुछ पूर्वनियोजित था, भीड़ को इकट्टा करने से लेकर रामपाल गोस्वामी को गोली मारने तक की पूरी पटकथा पहले से ही तैयार थी ताकि उसकी आड़ में दलितों का समूल नाश किया जा सके. कुछ हद तक वो यह करने में कामयाब भी रहे, उन्होंने बोलने वाले और संघर्ष कर सकने वाले समझदार घर के मुखिया दलितों को मौके पर ही मार डाला. बाकी बचे हुए तमाम दलित स्त्री पुरुषों के हाथ और पांव तोड़ दिये जो ज़िन्दगी भर अपाहिज़ की भांति जीने को अभिशप्त रहेंगे, दलित महिलाओं ने जो सहा वह तो बर्दाश्त के बाहर है तथा उसकी बात करना ही पीड़ाजनक है ,इनमे से कुछ अपने शेष जीवन में सामान्य दाम्पत्य जीवन जीने के काबिल भी नहीं रही. इससे भी भयानक साज़िश यह है कि अगर ये लोग किसी तरह जिंदा बच कर हिम्मत करके वापस डांगावास लौट भी गये तो रामपाल गोस्वामी की हत्या का मुकदमा उनकी प्रतीक्षा कर रहा है, यानि कि बाकी बचा जीवन जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगा, अब आप ही सोचिये ये दलित कभी वापस उस जमीन पर जा पाएंगे. क्या इनको जीते जी कभी न्याय हासिल हो पायेगा? आज के हालात में तो यह असंभव नज़र आता है.

कुछ दलित एवं मानव अधिकार जन संगठन इस नरसंहार के खिलाफ आवाज़ उठा रहे है मगर उनकी आवाज़ कितनी सुनी जाएगी यह एक प्रश्न है. सूबे की भाजपा सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है. कोई भी ज़िम्मेदार सरकार का नुमाइंदा घटना के चौथे दिन तक ना तो डांगावास पंहुचा था और ना ही घायलों की कुशलक्षेम जानने आया. अब जबकि मामले ने तूल पकड़ लिया है तब सरकार की नींद खुली है, फिर भी मात्र पांच किलोमीटर दूर रहने वाला स्थानीय भाजपा विधायक सुखराम आज तक अपने ही समुदाय के लोगों के दुःख को जानने नहीं पंहुचा. नागौर जिले में एक जाति का जातीय आतंकवाद इस कदर हावी है कि कोई भी उनकी मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता है. दूसरी और जाट समुदाय के छात्र नेता, कथित समाजसेवक और छुटभैये नेता इस हत्याकाण्ड के लिए एक दुसरे को सोशल मीडिया पर बधाईयाँ दे रहे है तथा कह रहे है कि आरक्षण तथा अजा जजा कानून की वजह से सिर पर चढ़ गए इन दलितों को औकात बतानी जरुरी थी, वीर तेज़पुत्रों ने दलित पुरुषों को कुचल कुचल कर मारा तथा उनके आँखों में जलती लकड़ियाँ घुसेडी और उनकी नीच औरतों को रगड़ रगड़ कर मारा तथा ऐसी हालत की कि वे भविष्य में कोई और दलित पैदा ही नहीं कर सकें. इन अपमानजनक टिप्पणियों के बारे में मेड़ता थाने में दलित समुदाय की तरफ से एफआईआर भी दर्ज करवाई गयी है, जिस पर कार्यवाही का इंतजार है.

अगर डांगावास जनसंहार की निष्पक्ष जाँच करवानी है तो इस पूरे मामले को सीबीआई को सौपना होगा क्योंकि अभी तक तो जाँच अधिकारी भी जाट लगा कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया है कि वह कितनी संवेदनहीन है. आखिर जिन अधिकारियों के सामने जाटों ने यह तांडव किया और उसकी इसमें मूक सहमति रही जिसने दलितों की कमजोर एफआईआर दर्ज की और दलितों को फ़साने के लिए जवाबी मामला दर्ज किया तथा पोस्टमार्टम से लेकर मेडिकल रिपोर्ट्स तक सब मैनेज किया, उन्हीं लोगों के हाथ में जाँच दे कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया कि उनकी नज़र में भी दलितों की औकात कितनी है.




इतना सब कुछ होने के बाद भी दलित ख़ामोश है, यह आश्चर्यजनक बात है. कहीं कोई भी हलचल नहीं है. मेघसेनाएं, दलित पैंथर्स, दलित सेनाएं, मेघवाल महासभाएं सब कौनसे दड़बे में छुपी हुयी है? अगर इस नरसंहार पर भी दलित संगठन नहीं बोले तब तो कल हर बस्ती में डांगावास होगा, हर घर आग के हवाले होगा, हर दलित कुचला जायेगा और हर दलित स्त्री यौन हिंसा की शिकार होगी, हर गाँव बथानी टोला होगा, कुम्हेर होगा, लक्ष्मणपुर बाथे और भगाना होगा. इस कांड की भयावहता और वहशीपन देख कर पूंछने का मन करता है कि क्या यह एक और खैरलांजी नहीं है? अगर हाँ तो हमारी मरी हुयी चेतना कब पुनर्जीवित होगी या हम मुर्दा कौमों की भांति रहेंगे अथवा जिंदा लाशें बन कर धरती का बोझ बने रहेंगे. अगर हम दर्द से भरी इस दुनिया को बदल देना चाहते है तो हमें सडकों पर उतरना होगा और तब तक चिल्लाना होगा जब तक कि डांगावास के अपराधियों को सजा नहीं मिल जाये और एक एक पीड़ित को न्याय नहीं मिल जाये, उस दिन के इंतजार में हमें रोज़ रोज़ लड़ना है, कदम कदम पर लड़ना है और हर दिन मरना है, ताकि हमारी भावी पीढियां आराम से, सम्मान और स्वाभिमान से जी सके.

भूकंप के केंद्र से एक रिपोर्ट और कुछ तस्वीरें

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/20/2015 10:58:00 PM

बिक्किल स्थापित नेपाल में मार्क्सवाद शिक्षण केंद्र के संयोजक और इग्नाइट साउथ एशिया पत्रिका के संपादक हैं. पूजा पंत वॉयसेज ऑफ वुमन मीडिया की सह निदेशक, स्वतंत्र फिल्मकार और फोटोग्राफर हैं. मार्टिन ट्रैवर्स एक विजुअल आर्टिस्ट और म्यूरलिस्ट हैं जो काठमांडू में आर्टिस्ट-इन-रेजिडेंस कार्यक्रम के तहत रह रहे हैं. नेपाल में 25 अप्रैल को आए भूकंप के वक्त वे तीनों इस भूकंप के केंद्र लांगतांग घाटी में नागथाली पहाड़ पर थे. उनकी एक रिपोर्ट, हाशिया पर कुछ विशेष तस्वीरों के साथ, जिनमें से कई अब तक अप्रकाशित हैं.



















हम लोग काठमांडू के उत्तर में लांगतांग घाटी में ट्रेकिंग के लिए गए थे और अभी बस नागथाली पहाड़ के शिखर की तरफ महज 3500 मीटर की ऊंचाई तक ही चढ़ाई की थी. यह चोटियों के बीच एक खड़ी चढ़ाई रही थी, हम थके हुए थे और अभी अभी हमने ठहरने के लिए एक जगह खोजी थी और चाय की चुस्की लेने ही वाले थे कि धरती हिली. यह इतना तेज था कि हमें लगा कि हम पहाड़ से किसी भी समय गिर जाएंगे. यह बात तो बाद में गांव वालों ने बताई कि भले ही हम बुरी तरह झटका खा रहे थे, लेकिन भूकंप के दौरान पहाड़ की चोटी पर होना सुरक्षित था. नीचे की तरफ, भू-स्खलन की वजह से हुई तबाही बहुत बुरी थी.

इत्तेफाक से, नागथली पहले भूकंप के केंद्र के बेहद करीब था और दूसरे भूकंप का केंद्र था.

मौसम खराब था, जमीन धंस रही थी, फोन भी काम नहीं कर रहा था और हम पहाड़ पर करीब 18 घंटे तक फंसे रहे. रात में हम एक बंगले में दूसरे करीब दस लोगों के साथ रुके, और रेडियो पर सुना कि पूरा मुल्क बुरी तरह इसकी चपेट में आया था. स्थानीय लोग रुक कर हमें उस तबाही और मौतों के बारे में बताते, कि जिन गांवों से होकर हम आए थे और जिन गांवों को जा रहे थे, वो पूरी तरह नक्शे से मिट गए हैं.

आखिरकार हम नीचे की ओर आठ घंटे पैदल चल कर सबसे करीब के बड़े शहर और स्याफ्रुबेसी स्थित बेस में पहुंचे जो कि काठमांडू से गाड़ी के सफर पर सात से आठ घंटे दूर है. हम एक आपातकालीन राहत शिविर में ठहरे जहां हमें खाना और पानी मिला. ये सारी जगहें नेपाल के रसुआ जिले में हैं.

पहाड़ को पीछे छोड़ते हुए एक के बाद एक उन गांवों से होकर चलना बहुत मुश्किल था, जो पूरी तरह तबाह हो चुके थे. उनमें से कुछ जगहों में तो हम बस कुछ ही दिन पहले, ऊपर जाते हुए स्थानीय घरों में ठहरे थे. अब वे मलबा बन चुके थे. भूकंप के केंद्र के नजदीक होने के कारण इन इलाकों में मौत की दरें काफी ऊंची थीं. हम खुशकिस्मत थे कि हम बच गए थे.

अगले दिन हम एक खौफनाक इलाके से होकर 50 किमी लंबी का सफर तय किया. ऐसा लग रहा था मानो हम पर कयामत टूट पड़ी हो. सारी राहें वीरान और टूटी पड़ी थीं, हर जगह धरती धंसी हुई थी और टूटे-फूटे वाहन बिखरे पड़े थे. हरेक गांव और शहर एक तबाही बन चुका था, जहां बचे हुए लोग कामचलाऊ शिविरों में रह रहे थे और जख्मियों की देखभाल कर रहे थे. हम काठमांडू लौटने के लिए आखिर में जाकर कालिकास्थान में हमें एक बस मिली. जब हम काठमांडू पहुंचे तो हमें यहां भी खासी तबाही देखने को मिली. यह एक अति-यथार्थवादी, किसी जोंबी फिल्म जैसा नजारा लग रहा था, जिसमें हमारी नजरों के सामने ही शहर गायब हो गया हो. ऐसा था मानो किसी ने हमारे साथ कोई शैतानी खेल खेला हो.

हमने इतनी तबाही और इतनी तकलीफ देखी, खास कर पहाड़ों के जिन दूर दराज के गांवों में हम फंसे थे, कि हम अब भी उस दर्दनाक अहसास को थाहने की कोशिश ही कर रहे हैं. अभी हमें आराम चाहिए.

कविता जंजीरों की कैद को नहीं मानती

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/16/2015 12:26:00 PM

 
रंजीत वर्मा ने हाशिया का ध्यान इस बात की तरफ दिलाया है कि उनकी लिखी जिस पोस्ट को कविता:16 मई के बाद का आधार वक्तव्य बता कर अंजनी कुमार ने 'एक हिस्सेदार के बतौर' उसकी आलोचना अब जाकर लिखी है, वह आठ माह पुरानी है. इसी संदर्भ में उन्होंने हाशिया को उस आधार वक्तव्य की जानकारी दी है, जो इस अभियान की वेबसाइट पर 15 मई 2015 को प्रकाशित हुआ है. यहां पेश है यही आधार वक्तव्य, जो कविता: 16 मई के बाद की मौजूदा राजनीतिक और सांस्कृतिक समझदारी को जाहिर करता है. मालूम हो, कि यह अंजनी कुमार के लेख का, रंजीत वर्मा द्वारा दिया गया जवाब नहीं है, बल्कि पहले से ही तैयार किया जा चुका आधार वक्तव्य है, जिसे ‘17 मई 2015 के कार्यक्रम में पढ़ा जाना है और परिप्रेक्ष्‍य निर्माण के लिए इसका अग्रिम प्रकाशन’ किया गया है. 17 मई को होने वाले कार्यक्रम के बारे में द हिंदू की यह खबर भी देखी जा सकती है.

पिछले साल 11 अक्टूबर को दिल्ली के प्रेस क्लब में ’कविता: 16 मई के बाद’ का पहला आयोजन हुआ था और तब से अब तक दिल्ली समेत उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पंजाब में कुल नौ कार्यक्रम किये जा चुके हैं। सभी कार्यक्रमों में लोगों की बड़ी संख्या में भागीदारी और उत्साह को देखकर कहा जा सकता है कि यह आयोजन अब एक आंदोलन का रूप ले चुका है और अब समय आ गया है कि पूरे देश में जल-जंगल-जमीन के सवाल के साथ-साथ सांप्रदायिकता, सामाजिक-आर्थिक नाइंसाफी और काॅर्पोरेट लूट के खिलाफ जो आंदोलन चल रहे हैं, उनसे कविता को सीधे जोड़ा जाए ताकि कविता को आचार्यों और मठाधीशों के चंगुल से मुक्ति मिले और वह दूरदराज के गांवों और गलियों की उठती धूल से अपना निर्माण कर सके। कविता अगर रोटी और आजादी पाने की लड़ाई है तो फिर कविता वैसे लोगों के पास क्या कर रही है जिनके पेट और गोदाम अनाजों से भरे पड़े हैं? उसे तो वहां उनके पास होना चाहिए जो रोटी और इंसाफ के मोर्चे पर रात दिन डटे हुए हैं। कविता यदि वहां नहीं है तो क्यों? उन्होंने कविता को जंजीरों में क्यों जकड़ रखा है? ’कविता: 16 मई के बाद’ मानवता और कविता दोनों की मुक्ति की लड़ाई है।

हिंदी साहित्य के इतिहास की यह आमफहम घटना है जहां हम देखते हैं कि जरूरतमंद करोड़ों लोगों को कविता के आसपास भी फटकने नहीं दिया जाता। वे तो वैसी कविताओं को भी बाहर का रास्ता दिखा देते हैं जो कविता मेहनतकशों की बस्तियों की तरफ निकल पड़ती है। यह सब वे कविता की पवित्रता के नाम पर करते हैं जबकि असल मकसद कला और अभिव्यक्ति की दुनिया में अपना वर्चस्व बनाए रखना होता है। ’कविता: 16 मई के बाद’ उनके इस मकसद पर हमले की तरह है। प्रतिरोध की कविता को साहित्य में कभी वह स्थान नहीं दिया गया जो किसी भी साहित्यिक वाद, जैसे कि छायावाद, प्रतीकवाद, प्रयोगवाद, अकवितावाद आदि इत्‍यादि में समा जाने वाले कवियों की खराब कविताओं को भी प्राप्त है। फिर यह सवाल भी दिमाग को मथता है कि एक कवि की तीस, चालीस या पचास साल के अंतराल में लिखी गई तमाम कविताएं क्या एक ही साहित्यिक वाद के अंतर्गत आ सकती हैं? क्या निराला पूरे के पूरे छायावादी हैं? क्या धूमिल को पूरा का पूरा अकवितावाद का कवि माना जा सकता है? मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर या रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना किस साहित्यिक वाद के कवि थे? अंतिम वाद के तौर पर जब अकवितावाद खत्म हुआ और उपरोक्त कवियों के प्रतिरोध का स्वर कविता में मुखर हुआ और आगे चलकर इसी स्वर को आगे बढ़ाते हुए नक्सलबाड़ी आंदोलन से निकले कवि या बाद में उस धारा से जुड़े जो कवि आए, उन सब को कहां रखा जाए?

यह तो तय है कि विशुद्ध साहित्यिक वाद में अंटने वाले कवि ये नहीं हैं। खैर, वे इस प्रतिरोध को किसी वाद का नाम दें या नहीं लेकिन पिछले पचास साल से कविता का मुख्य स्वर राजनैतिक चेतना से लैस जनपक्षधर कविताओं का ही रहा है। भले ही इस दौरान जनपक्षधरता के स्वर को दबा देने की भरपूर कोशिश की जाती रही हो, लेकिन अब 16 मई 2014 के बाद सत्ता में पहुंची फासीवादी सरकार के खिलाफ कविता में प्रतिरोध का जो विस्फोट उभरा है उसे दबा देना सत्ता या साहित्य के किसी भी मठाधीश के लिए संभव नहीं रहा। फिर भी जाहिर है कि कोशिश उनकी जारी रहेगी क्योंकि प्रतिरोध को वे एक साजिश के तहत नकारते हैं। दरअसल, प्रतिरोध की कविता को नकार कर वे सत्ता के प्रति अपनी वफादारी निभाते हैं। सत्ता प्रतिष्ठानों को तब ऐसी कविताओं से बचने में बहुत मदद मिलती है। उसे कविता में पूछे गए सवाल का जवाब देना भी जरूरी नहीं लगता क्योंकि वैसी कविताओं की तो साहित्य के अंदर ही कोई मान्यता नहीं है, फिर वह क्यों परेशान हो। परेशान तो कविता खुद हो जाती है। उसे अपनी ताकत का बड़ा हिस्सा साहित्य के अंदर खुद को साबित करने में झोंक देना पड़ता है। मुक्तिबोध की कविताएं इसका उदाहरण हैं। दूसरी ओर साजिश रचने वाले अपने इस कुकर्म के एवज में सत्ता से हमेशा कुछ न कुछ पाने की स्थिति में होते हैं।    

बहरहाल, अब समय आ गया है कि कविता की इस मुहिम को राजधानियों और शहरों से निकाल कर दूरदराज के इलाकों और वहां की जिंदगानियों के बीच ले जाया जाए। यह कोई आसान काम नहीं है, इसके बावजूद साहित्यकारों को यह काम करना होगा चाहे इसमें जो भी जोखिम हो क्योंकि जोखिम नहीं उठाने वाला जो दूसरा रास्ता है वहां साहित्यकारों को अपनी सफलता, समृद्धि और रोशनी की जगमगाहट भले दिखाई दे लेकिन वहां खुद साहित्य के बचे रहने की संभावना नहीं होती।

इस बात पर शायद ही किसी को संदेह हो कि 16 मई के बाद सब कुछ उसी तरह सामान्य नहीं रह गया है जैसा कि सत्ता की तमाम बुराइयों और राजनीतिक आपदाओं के बाद भी पहले रहा करता था। अब तो यह लगता ही नहीं कि यह कोई चुनी हुई सरकार है जो हमारे भले के लिए कुछ करने का सोच भी रही है। इसका तो एकमात्र काम लगता है हम पर नजर रखना, हमें किसी भी तरह अपराधी साबित करना और जो कुछ भी हमारे पास है उसे किसी भी बहाने छीन लेना। कागज़ात के पुलिंदे तैयार किये जा रहे हैं एक-एक व्यक्ति के लिए। बिना कागज़ात के नागरिक को नागरिक नहीं माना जाएगा, उसकी संपत्ति को उसकी संपत्ति नहीं माना जाएगा, आपको पति-पत्नी होने का प्रमाण भी अपने पास रखना होगा नहीं तो इस देश की सबसे बड़ी अदालत भी आपके संबंध को जायज नहीं ठहरा पाएगी। जाहिर है कि आने वाले दिनों में राज्यसत्ता को यह हक होगा कि वह आपको जब जी चाहे आपकी जमीन से, संबंधों से दर बदर दे। इस सरकार के एक साल पूरे होते-होते जिस तरह के भयानक दृश्य सामने दिखाई दे रहे हैं, उसे देखकर भी किसी की नींद न टूटे तो उसे अपनी नींद पर शर्म आनी चाहिए क्योंकि उसकी यह नींद हजारों-लाखों मौतों की वजह बन सकती है। क्या इन सबके बाद भी आपको लगता है कि जोखिम नहीं उठाने का कोई विकल्प है आपके सामने? जाहिर है कि नहीं है।

फिर भी कुछ साहित्यकार हैं जो चकित होकर पूछते हैं कि ऐसा क्या हो गया 16 मई के बाद कि हम पुरस्कारों, विभिन्न सरकारों द्वारा प्रायोजित साहित्यिक आयोजनों-उत्सवों, संस्थानों-अकादमियों द्वारा दिये जाने वाले वजीफों, विदेश यात्राओं के अवसरों और सरकारी रियायतों को शक की निगाह से देखें और उनका बहिष्कार करें। कुछ लोग तो खैर ऐसे हैं जो जनता के पैसे का हवाला देकर जयपुर और फिर लखनऊ, बनारस, पटना तक चले जाते हैं। उन्हें लगता ही नहीं कि वहां जाकर वे कोई गलत काम कर रहे हैं। वे समझ ही नहीं पा रहे या समझ कर भी नहीं समझना चाह रहे कि इस तरह वे आम जन की पीड़ा से दूर होते जा रहे हैं। बिहार सरकार द्वारा प्रायोजित कथा उत्सव के बीच भूकंप आ जाता है और पचास से ज्यादा लोगों की मृत्यु बिहार में हो जाती है। नेपाल की तो बात ही जाने दीजिए- वहां का तो कहना मुश्किल है कि कितने लोग मरे, बेघर हुए। इस सब के बीच कहानी पाठ अनवरत चलता रहता है। कुछ लेखक कसमसाए, लेकिन सरकार के आश्वासन पर कि सब ठीक है, शांत होकर बैठ गए। एक मिनट के लिए भी उन्होंने नहीं सोचा कि सरकार के आश्वासन पर वे शांत कैसे हो गए। उनकी संवेदना का यह कैसा विचलन है? जनता का लेखक ऐसा नहीं कर सकता। फिर वे किसके लेखक हैं?

क्या 16 मई के बाद जो दूसरी बची खुची सरकारें हैं इस देश में यानि कि जो गैर-भाजपा सरकारें हैं, क्या वे भी ऐसी हैं कि उन पर भरोसा किया जा सके? विकास और सांप्रदायिकता के बीच आज जिस तरह की लय और ताल नजर आ रही है, उसके बीज वहीं तलाशे जाने चाहिए जब भाजपा सत्ता में नहीं थी। यह भी याद रखने की जरूरत है कि इन्हीं स्थितियों ने और इन्हीं दूसरी सरकारों की पार्टियों ने भाजपा के सत्ता में आने की जमीन तैयार की। आज उन्हीं की वजह से पूरा देश अफवाह, घृणा, लूट और हिंसा की भाजपाई गिरफ्त में जा फंसा है। भाजपा बेहद खतरनाक इरादों के साथ आई है सत्ता में, बल्कि कहना यह चाहिए कि उसके खतरनाक इरादों को देखते हुए ही उसके सत्ता में आने की जगह बनाई गई। बीसवीं शताब्दी के शुरू में नीत्‍शे ने कहा था कि ’कोई भी नई व्यवस्था भयानक और हिंसक शुरूआत के बिना पनप नहीं सकती।’ आगे उसने विलाप करते हुए पूछा था ’कहां हैं बीसवीं शताब्दी के बर्बर?’ जवाब के रूप में तब हिटलर सामने आया था। फिर कार्ल जुंग भावावेश में हिटलर का वर्णन करते हुए उसे लगभग भगवान का अवतार ही कह बैठा था। कुछ वैसी ही पृष्ठभूमि और वैसी ही गुहार पर यहां भी मोदी का आगमन हुआ है और अब ऐसे भी लोग आ गए हैं जिनका साफ मानना है कि इस देश का उद्धार मोदी ही कर सकता है। बस समझ लीजिए कि बर्बरता आपके दरवाजे पर खड़ी है, लेकिन आपके लिए उसे चिन्हित कर पाना इतना आसान नहीं होगा। वह हमेशा पर्दे में होता है। यही उसकी सफलता की वजह भी है। ग्राम्शी लिखते हैं, ’’फासीवाद इसलिए सफल हुआ क्योंकि वह अपने अस्पष्ट और धुंधले राजनीतिक आदर्शों पर रंगरोगन के साथ ही आवेश, घृणा और इच्छाओं के हिंसक भावोद्गार को एक बिना चेहरे वाली भीड़ के पीछे छिपाए रखने में समर्थ था।’’   

कन्हर बांध को लेकर समाजवादी सरकार जिस बर्बरता पर उतरी हुई है क्या वह पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार से कहीं से भी कम नजर आती है? ये वही लोग हैं जो जनता परिवार की बात करते हैं। इन्हीं के भाई बंधु बिहार में बैठे हैं। किस जनता को बचा रहे हैं वे? जब राम मंदिर के ताले खोले जा रहे थे, जब शाहबानो केस के फैसले पलटे जा रहे थे, जब भूमंडलीकरण के लिए देश के दरवाजे खोले जा रहे थे, जब दुनिया का एकध्रुवीकरण होना शुरू हो गया था और कम्युनिस्ट आंदोलनों के दिन खत्म होने की घोषणाएं की जाने लगी थीं, उन्हीं दिनों जो जनसंहार हुए थे, दंगे हुए थे उन्हीं सब पर पिछले दो-तीन वर्षों में दसियों फैसले आए लेकिन इतने साल बाद भी एक को भी मुजरिम नहीं ठहराया जा सका। अदालत तक को गुमराह करके अपराधियों को बचा रही हैं तमाम सरकारें! यह पुराने अपराधियों को बचाने और नये अपराधों को अंजाम देने का राजनैतिक वक्त है और इसमें सभी सरकारें समान ढंग से लिप्त हैं। किसी को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। अदालत ले जाते वक्त ये हथकड़ियों में बंधे मासूमों को गोलियों से उड़ा देते हैं, चंदन तस्कर के नाम पर ये गरीब मजदूरों को मार गिराते हैं। आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों और माओवाद के नाम पर आदिवासियों को मारने का सिलसिला अनवरत चल रहा है इस देश में। क्या हिंदी कविता में दर्ज किया किसी कवि ने यह सब? क्या किसी ने सरकार से पूछा कि गोविंद पानसरे के हत्यारे अभी तक क्यों नहीं पकड़े गए? नरेंद्र दाभोलकर के हत्यारे किस बिल में जा छिपे हैं कि सरकार की तमाम खुफिया एजेंसियां और पुलिस उन्‍हें ढूंढ नहीं पा रही? पिछले दिनों भरत पाटनकर को जान से मार डालने की धमकी ठीक वैसे ही दी गई जैसे पानसरे को हत्या से पहले दी गई थी। क्यों नहीं पकड़ में आ रहा धमकी देने वाला? पाटनकर को धमकी देने वाले कहीं दाभोलकर और पानसरे के हत्यारे ही तो नहीं? अभी पिछले दिनों गिरीश कर्नाड को हिंदुत्ववादी शक्तियों ने नाटक खेलने नहीं दिया क्योंकि उन्होंने गोमांस पर महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाये जाने के खिलाफ आवाज उठाई थी। प्रोफेसर साईंबाबा को साल भर पहले दिल्ली की सड़कों से वे उठा ले गए और नागपुर सेंट्रल जेल के अंडा सेल में फेंक आए। तो क्या वे किसी को बोलने नहीं देंगे? क्या किसी को जीने नहीं देंगे? क्या यह बजरंगियों और कोडनानियों का देश है? जयललिता जब कोर्ट से बरी होती हैं तो प्रधानमंत्री मोदी उन्हें मुबारकबाद देने वाले पहले व्यक्ति होते हैं। वे क्यों इतने उतावले होकर चाह रहे थे कि जयललिता बरी हो जाएं? उन्होंने चाहा और वे बरी हो भी गईं, आखिर कैसे? क्या दो करोड़ की चोरी, चोरी नहीं होती? उच्च न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष का काम सिर्फ आरोप लगाना नहीं है बल्कि लगाए गए आरोप को साबित भी करना है जबकि यहां अभियुक्त को ही कहा जा रहा है कि वह साबित करे कि लगाए गए आरोप निराधार हैं। बस इसी बात पर छोड़ दी गईं जयललिता।

क्या उच्च न्यायालय का यह फैसला उन लोगों पर भी लागू होगा जिन्हें माओवादी कह कर उन्होंने जेल में डाल रखा है? वहां भी तो सिर्फ आरोप हैं, कोई पुष्टि नहीं और यहां भी उनसे कहा जा रहा है कि वे खुद को बेगुनाह साबित करें। यहां एक और बात है वो यह कि माओवाद एक विचार है, फिर इसमें अपराधी होने वाली क्या बात हुई? शायद इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि सिर्फ माओवादी कह देने भर से कोई गुनहगार नहीं हो जाता। यह बताना होगा कि उसने किया क्या है। फिर भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग जेल में सड़ रहे हैं। अब तो वे उन्हें अदालत भी पहुंचने नहींं देते। रास्ते में ही मार गिराते हैं। कई बार तो आरोप बाद में लगाते हैं, गोलियों से पहले ही उड़ा देते हैं। आपराधिक न्याय व्यवस्था का यह कैसा लोकतंत्र है? यह क्लास इंटरेस्ट का खुला खेल नहीं तो और क्या है? सलमान खान का मामला ही देखिये- सजा हो जाने के बाद भी वे मिनट भर को जेल नहीं जाते। यह व्यक्ति विशेष का मामला भर नहीं है। सत्ता को सेलेब्रिटी चाहिए, इसलिए वह उन्हें तैयार भी करती है और बचाती भी है। उसे हर क्षेत्र से सेलेब्रिटी चाहिए। खिलाड़ी और अभिनेता से लेकर लेखक-कवि तक। इन दिनों साहित्य में सेलेब्रिटी बनाने का काम जोर-शोर से चल रहा है। बड़ी राशियों वाले पुरस्कारों की घोषणाएं और साहित्यिक उत्सवों में भारी खर्च जो इधर देखने को मिल रहा है, उसके पीछे सरकार की यही मंशा काम कर रही है। सरकार चाहती है कि अब लेखक-कवि भी उसके संरक्षण में रहें। वे बाहर टेरेस पर निकलें और हाथ उठा कर नीचे खड़ी भीड़ का अभिवादन करें।    

हिंदी के कवियों को अपनी मध्यवर्गीय मानसिकता से बाहर निकलना होगा। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्रियों से पुरस्कार पाकर या हाथ मिलाकर खुद को धन्य समझने से ऊपर उठना होगा। उसे शासकों पर अंगुली उठाने का साहस अपने भीतर पैदा करना होगा। पिछले दिनों हिंदी के वयोवृद्ध आलोचक नामवर सिंह को ज्ञानपीठ सम्मान समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हंसते-बतियाते पाया गया। किस बात पर वे हंस रहे थे? क्या उन्होंने प्रधानमंत्री से पूछा कि आपके आने के बाद देश की एक बड़ी आबादी असहज हो गई है, किसान बड़ी संख्या में आत्महत्याएं करने लगे हैं और आप हैं कि ऐसे नाजुक समय में उन्हें ढांढस बंधाने की जगह उनकी जमीन छीनने में लगे हैं? उन्हें कहना चाहिए था कि लोगों को सच बोलने से रोका जा रहा है और फिर भी जो बोलने का हिम्मत दिखा रहे हैं आपके लोग उनकी हत्याएं तक कर दे रहे हैं? इसके बावजूद आपकी चुप्पी क्यों नहीं टूट रही है जबकि आप सबसे ज्यादा बोलने वाले प्रधानमंत्री माने जाते हैं? शिक्षा का भगवाकरण किया जा रहा है, तमाम महत्वपूर्ण पदों पर अयोग्य, बेईमान और यहां तक कि जाति प्रथा मानने वाले लोगों को बिठाया जा रहा है, कला और साहित्य से जुड़ी संस्थाओं तक को नहीं छोड़ा जा रहा है फिर भी आप कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं? ऐसे ही कुछ सवाल नामवर सिंह को पूछने चाहिए थे, लेकिन अगर उन्होंने नहीं पूछे तो वहां जो दूसरे लोग उपस्थित थे वही पूछ लेते। ज्ञानपीठ वालों से तो ऐसी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे पूछते। मीडिया भी अब जड़ पर चोट करने वाले सवाल नहीं पूछता। ऐसे में साहित्यकारों की जवाबदेही और बढ़ जाती है।
  
मोदी सरकार के एक साल पूरे हो रहे हैं। उन्होंने घोषणा करते हुए कहा था कि वे हर रोज एक कानून खत्म करेंगे और इस तरह 1700 कानूनों को वे अपने इस कार्यकाल में समाप्त करेंगे लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि वे किस तरह के कानून को समाप्त करने जा रहे हैं? कहीं उन कानूनों को तो खत्म नहीं किया जा रहा है जो धनकुबेरों, लुटेरों और ताकतवरों के खतरनाक इरादों पर थोड़ा बहुत ही सही लेकिन अंकुश लगाते रहे हैं? वे कानून जो कमजोरों और वंचितों को घनघोर अभावों के बीच जीने के लिए कुछ स्पेस देते हैं? जब ऐसे कानून ही नहीं रहेंगे तो अदालतें भी उन्हें कैसे बचा पाएंगी? क्या संवैधानिक समाज को जंगल राज में बदल देने की योजना पर उन्होंने काम शुरू कर दिया है? देखने में तो यही आ रहा है कि मगरमच्छों से मासूम जान को बचाने वाले जो भी छोटे-मोटे प्रावधान हैं उनको रोज एक-एक कर वे खत्म करते जा रहे हैं और दूसरी ओर वे नित ऐसे नए कानून बनाने में लगे हैं जिससे कॉर्पोरेट घरानों को मुफ्त में करोड़ों का मुनाफा हो जाए। टेलिकाॅम मंत्रालय ने जो नई लाइसेंसिंग व्यवस्था तैयार की है उससे मुकेश अंबानी की रिलायंस जिओ कंपनी को कैग के अनुसार 3,367.29 करोड़ का मुनाफा होगा, वहीं जिस सलवा जुड़ूम को 2011 में सर्वोच्च न्यायालय अवैध और असंवैधानिक ठहरा चुका है उसी सलवा जुड़ूम को 26 मई से फिर शुरू करने की घोषणा कर दी गयी है ताकि आदिवासियों की जान पर बन आए। एक तरफ वे काॅर्पोरेट घरानों को टैक्स में छूट देकर देश पर 62 हजार करोड़ रुपए का बोझ डाल देते हैं और दूसरी तरफ भूमि हथियाने का षडयंत्र रच कर गरीब आदमी का जीना दूभर कर देते हैं।

इस भूमि अधिग्रहण कानून के बहाने स्थितियों की परत दर परत व्याख्या जरूरी है ताकि समझा जा सके कि आखिर इन सबका अभिप्राय क्या है क्योंकि दुश्मन भले ही सामने साफ दिखायी दे, लेकिन लड़ाई उसी तरह सीधी और साफ नहीं है। सूचना अधिकार कार्यकर्ता वेंकटेश नायक के आवेदन पर वित्‍त मंत्रालय ने जवाब दिया कि फरवरी 2015 तक प्राप्त आंकड़े के अनुसार कुल 804 परियोजनाएं रुकी पड़ी हैं जिसका सिर्फ आठ प्रतिशत यानि कि कुल 804 रुकी पड़ी परियोजनाओं में से सिर्फ 66 परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण समस्या के कारण रुकी पड़ी हैं। बाकी के रुके पड़े रहने की वजहें कुछ और हैं। जैसे कि 39 प्रतिशत परियोजनाएं इसलिए रुकी पड़ी हैं क्योंकि या तो फंड की कमी है या कच्‍चा माल उपलब्ध नहीं है। 4.2 प्रतिशत पर्यावरण विभाग से हरी झंडी नहीं मिलने की वजह से रुकी हुई हैं। 34 प्रतिशत क्यों रुकी हैं, यह वित्‍त मंत्रालय को भी नहीं मालूम। सोचिये, इसके बावजूद सरकार सिर्फ इस बात पर जोर दे रही है कि उपयुक्त भूमि अधिग्रहण कानून के न होने के कारण देश आगे नहीं बढ़ रहा है। इसी सरकार के वित्‍त मंत्रालय ने आरटीआई आवेदन पर जो जवाब दिया है क्या उसके बाद कोई यह मानेगा कि भूमि अधिग्रहण कानून को बनने से जो रोक रहे हैं वे विकास के बाधक हैं? नहीं, कोई नहीं मानेगा। फिर विकास के बहाने भूमि अधिग्रहण का यह खेल क्या है? क्या इस बहाने सरकार तमाम प्राकृतिक संसाघनों पर पूंजीपतियों का कब्जा चाहती है? क्या सरकार जनता को दो धड़े में बांटने के लिए यह रास्ता अख्तियार की हुई है? 

जिनके पास कुछ नहीं है, उनको भी वाजिब हिस्सा पृथ्वी पर मिले ऐसी लड़ाई अब कहां है? हर तरफ बचाने की लड़ाई चल रही है यानि कि वे लड़ रहे हैं जिनके पास थोड़ा-बहुत कुछ है और जिसे वे बचाना चाहते हैं। फिर इस लड़ाई में वे क्यों शामिल होंगे जिनके पास कुछ नहीं है बचाने को? क्या करेंगे वे इस बचाने की लड़ाई में शामिल होकर? क्या यह हाशिये पर पड़े लगभग एक ही स्थिति में जी रहे दो लोगों को एक-दूसरे से अलगा कर उन्हें कमजोर करने की साजिश नहीं है जिसे भूमि अधिग्रहण के जरिये सरकार रच रही है? क्या इस तरह यह सरकार लोगों को टुकड़ों में बांट कर संघर्ष को कमजोर नहीं कर रही है? क्या इसके पीछे यह मंशा नहीं है कि जनता आपस में बंट कर कमजोर बने और दूसरी ओर तमाम संसाधनों के मालिक बनकर पूंजीपति मजबूत बनें? यह सरकार का पुराना खेल है। बेहद खतरनाक दौर से गुजर रहा है हमारा समय। कई स्तरों पर बंट जाते हैं हम अनजाने ही। जिनके पेट में भात के दो-चार दाने हैं वे अगर भूखों की लड़ाई को अपने खिलाफ मानेंगे तो जो भूखे हैं वे कैसे अपनी लड़ाई जीत सकते हैं? जमीन की लड़ाई में उन्हें भी शामिल होना होगा जिनके पास अपनी कोई जमीन नहीं है। उर्दू और हिंदी जब तक दो नदियों की तरह मिल कर नहीं बहेंगी वे अपनी लडाई कभी जीत नहीं सकतीं। दलित का सवाल जब तक सिर्फ दलित उठाते रहेंगे तब तक उन्हें मुक्ति नहीं मिल सकती। हो सकता है एक समुदाय के रूप में और अपने समुदाय के भीतर वे मजबूत दिखें लेकिन बाहर उनकी स्थिति नगण्य ही रहेगी। जैसे कि जब यह कहा जाता है कि अमुक दलित कवि श्रेष्ठ हैं तो इसका मतलब सीधा यही होता है कि दलित कवियों में वो श्रेष्ठ हैं। यहीं उनकी सीमा तय हो जाती है। आप जिस भाषा में लिखते हैं, आपको उस भाषा का श्रेष्ठ कवि होना है तो इसके लिए जरूरी है कि आप सबसे पहले खुद को उस भाषा का कवि कहें।

आज की तारीख में रचनाकारों का सबसे बड़ा दायित्व है कि वह लोगों को बताए कि इन सरकारों को ध्वस्त करने का एक ही तरीका है कि वे आपस के सारे भेदभाव भूलकर एकजुट हों क्योंकि ये सारे भेदभाव थोपे हुए हैं और तमाम सरकारों के खिलाफ युद्ध का एलान कर दें। रचनाकार न सिर्फ युद्ध का एलान करने की बात करे बल्कि वह खुद उनके हाथ में झंडा बन कर, उनकी जुबान पर नारा बन कर, उनकी दृष्टि में कविता बन कर दमक उठे और हवा में लहराए उनकी मुट्ठियां बन कर।

एक कत्लेआम, एक फैसला और हाशिमपुरा में दिन और रातें

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/14/2015 11:30:00 PM



मेरठ के मुहल्ले हाशिमपुरा की बेवाओं और अनाथों के संघर्ष और पीड़ा पर रुबीना सैफी की विशेष रिपोर्ट. समयांतर (मई, 2015) से साभार. तस्वीरें: रेयाज उल हक.

दिल्ली से महज 70 किमी दूर मेरठ शहर के दिल में है हाशिमपुरा. बंद पड़े, उजड़े हुए गुलमर्ग सिनेमा के सामने उतना ही उजाड़, उतना ही बंद एक मुहल्ला. गंदी, भरी हुई नालियों के बीच खड़े घरों में जिंदगी का उतना भी शोर नहीं है, जितना पावरलूम और कढ़ाई की भारी मशीनों की खटरपटर.

इन नीचे, छोटे और बंद घरों में चेहरों को रोशन करने भर जो थोड़ी सी रोशनी है, उम्मीद की उतनी भी रोशनी नहीं है.

अदालत का फैसला हाशिमपुरा के सीने में एक धारदार खंजर की तरह पैबस्त है.

लोग सांसें ले रहे हैं, लेकिन उनकी जिंदगी रिस कर बह रही है.
  


65 बरस की हाजरा को याद है, किस तरह वे ईद की तैयारियों में लगी थीं. घर के सभी लोगों के लिए कपड़े सिलने को दिए गए थे. उनके भतीजे नईम की ख्वाहिश थी कि वे इस ईद पर चप्पलें लेंगे. अगले हफ्ते आने वाली ईद, ज्यादातर मुस्लिम परिवारों की तरह हाजरा के घर में भी आनेवाले पूरे साल के लिए नए कपड़े और जूतों का बहाना लेकर आ रही थी.

तब हाजरा का परिवार बहुत संपन्न नहीं था, और उनके राजमिस्त्री पति को जो मजदूरी मिलती थी, वह इतनी थी कि घर का खर्च चल जाए. उनके चार बेटे बड़े हो रहे थे और उम्मीद थी कि वे भी जल्दी ही पिता के काम में हाथ बंटाने लगेंगे.

हाजरा 28 बरस पहले की उस दोपहर को याद करती हैं, जो आनेवाली ईद से महज एक हफ्ते दूर थी. वह शुक्रवार की दोपहर थी और रमजान का आखिरी जुमा (अलविदा) था.  मर्द लोग अभी अभी नमाज पढ़ कर आए थे और घरों में बैठे बातें कर रहे थे. मेरठ शहर में घटी पिछले कुछ दिनों की घटनाओं की वजह से लोग अनहोनी की आशंका से डरे हुए थे.

तीन बजे के बाद का वक्त होगा कि घर के बाहर हलचल और ढेर सारे पैरों की धमक सुनाई दी. हाजरा और उनके घर के लोग कुछ समझ पाते कि उनके घरों की दीवारें और दरवाजे फांदते हुए वर्दीधारी नौजवान घुस आए. उनके सिर पर हेलमेट और हाथों में बंदूकें थीं और उन्होंने बहुत सख्त लहजे में बताया कि उन्हें घरों की तलाशी लेनी है.

उन्होंने यह भी कहा कि मर्दों से 'दो बातें' पूछनी हैं, इसलिए उन्हें उन जवानों के साथ चलना होगा.

हाजरा को यह बात बाद में जाकर पता लगी थी कि वे जवान जिला पुलिस, पीएसी और फौज से आए थे.

वो हैरान रह गईं कि ऐसा क्या पूछना है कि फौज के इतने सारे जवानों को उनके घर पर धावा बोलना पड़ा. तब वे यह नहीं जानती थीं, कि उनके मुहल्ले के ज्यादातर घरों के लोगों में यही सवाल उठ रहे हैं.

बच्चों को छोड़ कर जवान उनके घर के सभी मर्दों को ले गए: नौ लोग, जिनमें उनके पति अब्दुल हमीद, दो बेटे और चार देवर शामिल थे. उन्होंने अपने बेटे जावेद को आखिरी बार तब देखा, जब वह अपने दोनों हाथ उठाए हुए, पैरों से निकल गई चप्पल को पहनने की कोशिश कर रहा था और एक जवान ने उसे धकेल कर कहा था, 'चल, चल, वहीं मिलेंगी चप्पलें.'

उनके लोगों को भर कर ले जानेवाला वह पीला ट्रक जब गुलमर्ग सिनेमा के सामने वाली सड़क पर धुआं छोड़ता हुआ रवाना हुआ, तब शाम ढलने लगी थी. पीछे छूट गई औरतें और बच्चे घर के लोगों के आने के इंतजार में बैठ गए. वे डरे हुए थे, आशंकित थे, रो रहे थे, लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि घर के लोग आ जाएंगे और सब ठीक हो जाएगा.

लेकिन उस रात कोई नहीं लौटा. सुबह आई. और फिर बुरी खबरों का जैसे गट्ठर खुल गया.

मुहल्ले का जुल्फिकार जख्मी हालत से अस्पताल से लौटा और तब लोगों को पता चला कि ट्रक में भर कर ले जाए गए लोगों को पीएसी के जवानों ने गोली मार कर मुरादनगर की गंग नहर में फेंक दिया था. वह जैसे तैसे बच कर निकल आया था. बाद में मुहल्ले के चार लोग और बच कर आए. यह भी पता लगा कि काफी लोगों को फतेहगढ़ की जेल ले जाया गया था. लेकिन इसकी कोई पक्की खबर कहीं से नहीं मिल पा रही थी कि कौन लोग मारे गए थे, कौन बच गए थे और कौन जेल में थे.

दिन बीत रहे थे. हाजरा को समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. परेशानी सिर्फ घर के लोगों की खबर के बारे में ही नहीं थी. यह भी थी, कि जो औरतें और बच्चे घर में थे उनका पेट कैसे भरा जाए. हालांकि बाहरी मदद आनी शुरू हो गई थी, मुहल्ले के लोगों को चने, आटा, चायपत्ती, मोमबत्तियां बांटी जा रही थीं. थोड़ी बहुत आर्थिक मदद भी पहुंचाई जा रही थी. लेकिन इससे गुजारा नहीं चलने वाला था. उन्हें लग रहा था, अगर कुछ नहीं किया गया तो बच्चे भूखे मर जाएंगे.

उन्होंने काम की तलाश शुरू की. पहले पहल उन्हें सूट पर नग और सितारे लगाने और कढ़ाई किए हुए कपड़ों में से धागे काटने के काम मिले. इस तरह दिन भर की मेहनत से वे हफ्ते में 30-40 रुपए कमा लेती थीं. जलावन के लिए आरा मशीन से लकड़ियों के टुकड़े उठा कर लाए जाते.

लेकिन जल्दी ही हाजरा को लगने लगा कि यह पर्याप्त नहीं है. तो उन्होंने घरों के निर्माण के काम में मजदूरी करनी शुरू कर दी. मजदूरी थी 2 रुपए रोज.

इस बीच यह साफ हो गया था कि हाजरा के एक बेटे, एक देवर और उनके भतीजे नईम को मार डाला गया था. पुलिस उन्हें अपने परिजनों की शिनाख्त के लिए लेकर गई थी, जहां उन्होंने अपने घर वालों के कपड़ों और हाथ और गले में पहने जानेवाले धागों के जरिए उनकी मौत की तस्दीक की. उनकी लाशें वे कभी नहीं देख पाईं. जो लोग 22 मई की उस दोपहर को छीन लिए गए थे, आखिरी बार उन्होंने उनके कपड़े देखे और पुलिस को लौटा दिए, जिसे अदालती कार्रवाई के लिए सबूत के बतौर उन्हें सील करके रख लेना था. हाजरा को यह भी पता नहीं कि उन्हें दफनाया कहां गया. उन्होंने कभी तलाशने की कोशिश भी नहीं की.




क्योंकि हाजरा को मुर्दों से ज्यादा जिंदा बच रहे लोगों की फिक्र थी. पुलिस की कैद से लौट आए उनके घर के छह लोगों में से उनके पति की जेल में पुलिस ने इतनी पिटाई की थी कि उनके सिर में गहरे जख्म हो गए थे और उनमें कीड़े पड़ गए थे. अगर पर्याप्त इलाज नहीं होता, तो उनका बचना भी नामुमकिन था.

तबसे 28 साल गुजर गए, हाजरा के हाथ से काम नहीं छूटा. उन्होंने अपने घर को संभाले रखा, अपने बच्चों को बड़ा किया. अपने बीमार पति का इलाज कराया.

अब उनके बेटे कय्यूम उनका हाथ बंटाते हैं. वे बच गए, क्योंकि वे तब बारह साल के थे. उनका काम स्थायी नहीं है और जब मिलता है तो उन्हें 300 रुपए की मजदूरी मिलती है. जब कोई काम नहीं मिलता तो वे काम की तलाश करते हैं और यह अपने आप में बहुत थका देने वाला काम है. उनके छह कमरों के घर में उनके बड़े-से परिवार के 80 लोग रहते हैं, जिसमें हमेशा नाले का पानी पाइप के जरिए घुस आता है और गंदगी और बदबू को पूरे घर में भर देता है. उनके पति, पुलिस की यातनाओं के बाद, कोई काम करने लायक नहीं रह गए थे. उन्हें लगता है, अगर चीजें वैसी ही चलती रहतीं, जैसी ईद की तैयारियों वाली उस दोपहर के पहले तक चल रही थीं, तो उनकी जिंदगी कुछ और भी हो सकती थी.

और इतने बरसों के बाद, अब उन्हें याद नहीं कि वह ईद कैसी थी. हाशिमपुरा में किसी को याद नहीं. किसी ने उसका स्वागत नहीं किया, गलियों में पीछे छूटी हुई लावारिस चप्पलों और टोपियों के सिवाए.

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नसीम को ईद के अलावा भी किसी बात का इंतजार था. उनके भाई सिराज अहमद की ईद के अगले हफ्ते में शादी होने वाली थी. सिराज अपनी चार बहनों के अकेले भाई थे. उन्होंने एम.ए. का इम्तहान दिया था और वे टाइपफेस बनाने का काम भी करते थे, जबकि उनके अब्बा चूड़ियां बेचते थे. तब वे लोग शाम के लिए इफ्तार की तैयारियों में जुटे थे, कि हथियारबंद जवानों ने उनके घर में घुस कर उनके भाई को 'गिरफ्तार' कर लिया.

फिर वे कभी नहीं लौटे.

नसीम के अब्बा बीमार पड़ गए. वे हमेशा यही दोहराते रहते थे कि सिराज आएगा. उनकी अम्मी पागल हो गईं और घर चलाने की जिम्मेदारी के साथ नसीम अकेली रह गईं.

उन दिनों सभी बहनों में सिर्फ नसीम की शादी हुई थी। सबके गुजारे के लिए और अपनी बाकी बहनों की शादी के लिए नसीम को बहुत मेहनत करनी पड़ी. उन्होंने किताबों के फर्मे मोड़ने, कपड़े पर सितारे चिपकाने काम किया. आगे चल कर नसीम एक निजी प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने का काम करने लगीं. बहनों की शादी में वे दहेज नहीं दे पाईं, और जैसा कि होता है, इसका असर उनकी बहनों की शादीशुदा जिंदगी पर पड़ा. एक बहन को तो उसके पति ने छोड़ दिया है, जो अब नसीम के साथ रहती है.

नसीम अब अपने पुराने घर की जगह नए कमरे बनवा रही हैं. उन्होंने अपनी और अपनी बहनों की जिंदगी को एक तरतीब देने की कोशिश की है.

लेकिन उनकी यादों में, घरघराते इंजन वाला एक पीला ट्रक अभी भी आता है.

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उसी ट्रक में जरीना के पति और उनका एक बेटा भी गया था. फिर कभी न लौट आने के लिए. तब जरीना के आठ लड़के और दो लड़कियां थीं। घटना के दिन सबसे छोटा बेटा सिर्फ चार दिन का था। इतने बड़े परिवार का गुजारा जिस इंसान की मेहनत पर टिका था, वह मारा जा चुका था।

फिर यह जिम्मेदारी जरीना ने अपने ऊपर ली. उन्होंने सूत कातने का काम शुरू किया। उन्हें अपने बच्चों के भविष्य से भी समझौता करना पड़ना, जिनकी पढ़ाई छुड़ा कर मजदूरी पर लगा दिया गया.

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नसीबन अब अपनी जिंदगी के नब्बे बरस पार कर चुकी हैं, और उस खौफनाक दोपहर को गुजरे हुए भी अब अठाईस साल होने को आए, लेकिन वे अभी भी बुरे सपनों से निजात नहीं पा सकी हैं. रातों में अब भी वो चिल्ला उठती हैं: 'मेरे बेटों को मत लेकर जाओ.'

दो बेटों की मां नसीबन के पास आज उनका एक भी बेटा नहीं है. उस कत्लेआम में बच गए उनके एक बेटे, सलीम ने उन खौफनाक दिनों के छब्बीस साल बाद, 2013 की सर्दियों में एक दिन फंदे से फांसी लगा कर अपनी जान दे दी. उन्हें भी बुरे सपने आते थे, जिनसे छुटकारा पाने के लिए उन्होंने बहुत पीना शुरू कर दिया था. वे उन खौफनाक दृश्यों को अपने जेहन से नहीं निकाल पाते थे, जो उन्होंने अपनी आंखों से देखी थीं. फतेहगढ़ जेल में, उनकी आंखों के सामने, पुलिस ने उनके पिता की पीट-पीट कर जान ले ली थी.

22 मई 1987 को हथियारबंद जवान उनके घर से तीन लोगों को लेकर गए थे, जिनमें से सिर्फ सलीम ही लौट कर आ पाए. उनके पति जमील को जेल में और उनके दूसरे बेटे नसीम को नहर पर मार डाला गया.

उसके दो साल के बाद सलीम की शादी कर दी गई. अंजुम बारहवीं तक पढ़ी-लिखी थीं और उन्होंने घर को संभालने में काफी मेहनत की. वे कहती हैं, 'जब मैं आई तो घर में कोई रौनक नहीं थी. सदमा इतना गहरा था.' उनके आने के बाद घर फिर से पटरी पर चलने लगा था.

परिवार के पास अपना हथकरघा था. लेकिन उसे चलाने वाले नहीं बचे, तो उसे बंद कर दिया गया. सलीम ने बाजार में हार्डवेयर की दुकान चलानी शुरू कर दी. परिवार के पास कार आई, बाइक आई और कढ़ाई की मशीनें आई.

लेकिन उस दिन ने कभी सलीम का पीछा नहीं छोड़ा. गहरा तनाव और अवसाद उनके साथ हमेशा बना रहा और उन्होंने दो बार खुदकुशी करने की कोशिश की. दूसरी बार, वे बच नहीं पाए.



अब पांच बेटियों और दो बेटों के साथ अंजुम को अपनी बूढ़ी सास का खयाल भी रखना था. उन्होंने अपने पति की मौत (5 जनवरी 2013) से इद्दत के चार महीने दस दिन गिनने के बाद अपने पति की हार्डवेयर की दुकान पर बैठना शुरू किया. पहले पहल तो उन्हें काफी शर्म आती थी. मुख्य बाजार में वे शायद पहली औरत थीं, जो दुकान चला रही थीं और वह भी हार्डवेयर जैसी दुकान. लेकिन उन्हें यह देख कर खुशी हुई कि लोगों ने उनकी परेशानी समझी और उनकी मदद की. हालांकि जहां से उन्हें सबसे ज्यादा मदद की उम्मीद थी, वहां से उन्हें सबसे ज्यादा परेशानियां उठानी पड़ी हैं. उनके पति के चाचा, (जो 1987 में घटना के वक्त पाकिस्तान में थे) के परिजनों की मंशा बच्चों समेत उन्हें घर और दुकान से बेदखल करने की है. वे कई बार कह चुके हैं कि अंजुम का अब इस घर में क्या है, उन्हें छोड़ कर चले जाना चाहिए. अंजुम ने पति के रहते कंप्यूटर और एंब्रॉयडरी की मशीन खरीदी थी, लेकिन पति के जाने के बाद उनके चाचा के घरवालों ने एक दिन उन्हें गली में पीटा और उनका काम जबरदस्ती बंद करवा दिया. इसके बाद अंजुम ने उनके खिलाफ एक मुकदमा दर्ज करा रखा है.

लेकिन उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुई हैं. 16 से 19 साल के दोनों बेटे विशेष रूप से सक्षम बच्चे हैं और उन्हें अधिक देख रेख की जरूरत होती है. उम्मीद बस उन्हें अपनी बेटियों से है, जो पढ़ रही हैं. बड़ी बेटी बी.कॉम कर रही है और बाकी सभी भी पढ़ाई कर रही हैं. हालांकि अभी वे जिस दशा में हैं, वे सारे बच्चों का पालन-पोषण नहीं कर सकतीं, इसलिए एक बेटी उन्होंने अपनी बहन को दे रखी है.

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मुश्किल में होने के बावजूद, अंजुम के पास एक उम्मीद है, लेकिन शकीला बेगम जानना चाहती हैं कि 'क्या कोई उम्मीद है भी?' अंधेरा सिर्फ उनके दड़बे जैसे बंद कमरे में ही नहीं है, उनकी जिंदगी में भी है. वे तिरासी बरस गुजार चुकी हैं, लेकिन गुजारे के लिए उन्हें अभी भी घर घर भटकना पड़ता है: वे औरतों की मालिश करती हैं, चूल्हा-चौका करती हैं, बरतन धोती हैं. 22 मई 1987 को जब हथियारबंद फौजी उनके पति मो. हनीफ को लेकर गए, उसके बाद से शकीला को अपनी जिंदगी गुजारने के लिए अपने हाथों का ही सहारा रहा है. यह पक्का हो जाने के बाद, कि मारे गए लोगों में उनके पति भी थे, उन्होंने मालिश सीखी और जिससे उन्हें महीने में दो सौ रु. की आमदनी होती थी. उनके दो छोटे-छोटे बेटे और चार बेटियां थीं. इसी आमदनी से उन्होंने अपनी बेटियों की शादी की और बेटों को अपने पिता का सिलाई का काम शुरू करने के लिए जरूरी पूंजी जुटा कर दी.


आज उनके दोनों बेटे दर्जी का काम करते हैं. लेकिन बीमारी, इलाज और फिर बीमारी का फंदा उनके परिवार पर इस कदर छाया है, कि मौजूदा आमदनियां पूरी नहीं पड़तीं. उनकी बड़ी बहू को सात साल पहले यहां के सरकारी अस्पताल (पी.एल. शर्मा अस्पताल) में इलाज के दौरान खून चढ़ाना पड़ा, जिससे वे एक ऐसी बीमारी से संक्रमित हो गईं कि अब उसके इलाज में ही सारी आमदनी चली जाती है. वे जो दवा खाती हैं, उसका खर्च 3000 रुपए प्रतिमाह आता है. बीमारी की जब भी जांच करानी होती है, उसमें आठ से दस हजार लगते हैं. वे सरकारी अस्पताल से इतनी डरी हुई हैं, कि वे निजी डॉक्टरों के यहां ही जाती हैं, हालांकि यह बहुत महंगा पड़ता है.



शकीला के बड़े बेटे का दम भी फूलने लगा है लेकिन वे अपना इलाज नहीं करा पाते. परिवार को सही से भोजन तक नहीं मिल पाता. घर बहुत छोटा, अंधेरा और बंद सा है, और हर बारिश के वक्त शकीला को डर लगा रहता है कि वह गिर न जाए. 



खुद शकीला भी बीमार रहती हैं. उन्हें आंखों से नहीं दिखता. उनकी आंत में कोई खराबी है. लेकिन वे काम बंद नहीं कर सकतीं. एक जनसंहार की विधवा को यह सुख नसीब नहीं होता. वे 75 रुपए की दिहाड़ी पर पोलियो की दवा पिलाने और बरतन धोने निकल पड़ती हैं तथा अपने कुर्ते की जेब में एक छोटी सी नीली पुड़िया में अपने मरहूम पति की छोटी सी तस्वीर की बगल में बीस रुपए का नोट रखना नहीं भूलतीं. वे कहती हैं कि अगर रास्ते में कहीं गिर कर मर जाऊँ, तो कोई भला आदमी उनकी लाश को उनके घर तक पहुंचा जायेगा और उसे अपने पैसे खर्च नहीं करने पड़ेंगे.

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उनका नाम भी शकीला ही है, और बीमारियों ने उन्हें भी नहीं बख्शा है. उनके एक गुर्दे में कभी पथरी हुआ करती थी, जिसे कभी निकाला नहीं गया और आखिर में उस गुर्दे को ही निकाल देना पड़ा. अब उनके दूसरे गुर्दे में दिक्कत है. लेकिन अब शायद वे इसका इलाज नहीं करा पाएं.


शकीला वे अपने पति के घर में ब्याह कर आई थीं तो उनकी उम्र सत्रह-अठारह रही होगी. अब वे 58 साल की हैं. अपनी जिंदगी का करीब आधा हिस्सा उन्होंने एक विधवा के रूप में बिताया है. उनके पति सलीम की कैलेंडरों और छपाई का ब्लॉक प्रिंट का कारोबार था. लेकिन नहर पर पीएसी की गोलियों से अपने पति की मौत के बाद, शकीला के लिए उसे जारी रखना मुमकिन नहीं था. उन्होंने घर में खाली रह गए कमरों को किराए पर उठा दिया, जिससे थोड़ी बहुत आमदनी होने लगी. वे अभी भी किराए पर चलते हैं. जनसंहार के बाद, राहत के बतौर उन्हें एक सिलाई मशीन मिली थी, और उसने भी उनकी काफी मदद की.

शकीला के परिवार में उनकी गोद ली हुई बेटी और उनके देवर का परिवार है. उनकी अपनी कोई संतान नहीं हुई. आज उनके घर में रौनक है, क्योंकि उनके देवर के बेटे और बहू उनसे मिलने आए हैं. वरना, उनकी जिंदगी में, नीचे बंद पड़े छपाई कारखाने की बेरौनकी और अकेलापन पसरा रहता है.


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पति (मो. उस्मान) के मारे जाने के बाद, हनीफा इतनी अकेली पड़ गई थीं कि उन्होंने मानसिक संतुलन खो दिया. उनके बच्चों ने ही उनकी देख भाल की, मेहनत मजदूरी की और अपना खयाल रखा. लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि बच्चे पढ़-लिख नहीं पाए. घर चलाने के लिए पूरा वक्त उन्हें काम करना पड़ा. रेहाना को बहू के रूप में इस परिवार में आए तेईस साल हो गए, लेकिन वे अब भी महसूस करती हैं कि उस कत्लेआम के नतीजों से परिवार अब तक उबरने की ही कोशिश कर रहा है. वे जब आईं, घर संभालने के लिए उन्हें कढ़ाई का काम शुरू करना पड़ा. उन्होंने इस काम के लिए एक मशीन खरीदी, लेकिन आगे चल कर वह भी नकारा हो गई, क्योंकि शहर में कंप्यूटर से चलने वाली, कढ़ाई की बड़ी मशीनें आ गई थीं और उनकी छोटी सी पुरानी मशीन उनके आगे टिक नहीं सकती थी. अब वह मशीन उनके आंगन में एक तरफ खड़ी धूल और जंग खा रही है, क्योंकि उसके लिए अब खरीदार भी नहीं मिलते हैं. रेहाना कहती हैं, 'अब उसे कौन लेगा? उसके लिए रेट (मांग) ही नहीं है.'


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हसीना बेगम रोना नहीं चाहतीं. लेकिन आखिर में वे नाकाम रहती हैं. उनके पति, मो. सदरुद्दीन अपनी छोटी बेटी को बड़ा होता नहीं देख पाए. वे नहीं देख पाए कि उनकी छह बेटियों और एक बेटे ने किस तरह की जिंदगी पाई. वे यह भी नहीं देख पाए, कि हसीना बेगम को, उन बच्चों को जिलाए रखने के लिए कैसे कैसे दिन गुजारने पड़े.



हसीना बेगम जब इस परिवार में आई थीं, तब वे छोटी ही थीं. हालांकि उन्हें ठीक ठीक याद नहीं, लेकिन उनकी शादी 'बचपन' में ही हो गई थी. उनकी सबसे छोटी बेटी के जन्म बारे में भी उन्हें ठीक ठीक याद नहीं, लेकिन वह 22 मई की उस दोपहर से एकाध महीने आगे या पीछे पैदा हुई थी.

हसीना के घर से दो लोग ले जाए गए: मो. सदरुद्दीन और उनके छोटे भाई. हसीना के देवर फतेहगढ़ की जेल से दो महीने के बाद लौट आए थे, लेकिन उनके पति इतने खुशकिस्मत नहीं निकले.

हसीना अब हैरान होती हैं, कि हत्यारों ने क्या यह नहीं सोचा कि वे जिनकी जानें ले रहे हैं, घर पर उनकी बीवियां, उनके छोटे-छोटे बच्चे इंतजार कर रहे हैं. क्या उन्होंने यह नहीं सोचा कि उनके पीछे उनकी देखभाल कौन करेगा?

वह रात हसीना को अब भी याद है, जो उन्होंने अपने घरवालों के इंतजार में गुजारी थी. मुहल्ले में बची रह गई औरतें समझ नहीं पा रही थीं कि वे क्या करें और अपने बच्चों के साथ तब के एक बड़े से मकान में जमा हुई थीं, ताकि एक दूसरे के डर और अकेलेपन को बांट सकें. उन्हें लग रहा था कि फौज उनके घरवालों कों सिर्फ गिरफ्तार करके ही ले गई है, और वे शायद लौट आएं. लेकिन उनकी उम्मीदें, नहर पर से बच कर आने वाले पहले आदमी के साथ ही खत्म हो गईं. उन्होंने बताया कि उनके पति को मार डाला गया था.

तब अपने घर में बच्चों के साथ अकेली रह गईं हसीना बेगम को आम तौर पर आने वाली राहत सामग्री ने, रिश्तेदारों की मदद ने और मुहल्ले की दूसरी औरतों के दुख ने सहारा दिया. लेकिन बच्चों को पालने के लिए उन्हें रात-रात भर, दिन-दिन भर कढ़ाई और सितारों का काम करना पड़ता. वे दूसरों के कपड़ों पर मोती और नग लगातीं, उनके अपने बच्चे फटेहाल कपड़े पहना करते. कई सालों तक ऐसा होता रहा कि कई बार बच्चों को दिन में एक ही बार खाना मिल पाता था, 'वो ऐसे दिन थे, कि हमें चाय तक नसीब नहीं होती थी. दो हंडियां पक जाएं, तो आठ  आठ दिन तक उसी को खाते थे.'

उन्हें मोती और सितारों का जो काम मिलता था, वह मुहल्ले से ही मिलता था. उसकी मजदूरी इतनी नहीं होती कि खास बचत हो पाती. इसी में बीमारियां थीं, घर की मरम्मत थी, उनके दो-दो ऑपरेशन थे. ऐसी हालत में बच्चे पढ़ नहीं पाए. ससुर को फालिज थी, और उनकी देखभाल भी करनी थी.

15 बरस तक बदहाली और मेहनत से भरी जिंदगी गुजारने के बाद हसीना आज उससे थोड़ी बेहतर हालत में हैं. उनके बेटे कपड़ों की कटिंग का काम करते हैं और उन्हें अपेक्षाकृत अच्छी आमदनी हो जाती है. लेकिन अब उनका अपना परिवार है, जिसके अपने खर्चे हैं.

यानी हसीना के लिए फुरसत के दिन अभी नहीं आए हैं.

*

हाशिमपुरा में ऐसी 43 कहानियां मिलेंगी. या शायद इससे भी ज्यादा.

इन औरतों ने बहुत बुरे दिन देखे. अपने सामने अपने पतियों, बेटों और भाइयों को कत्लगाह की तरफ ले जाए जाते देखा. उन्होंने देखा कि किस तरह इंसान की जिंदगियों को ऐसा बना दिया जाता है, कि वो किसी भी लायक नहीं रह जाए. उन्होंने अपमान सहा, बदहाली देखी, अपने आगे पसरते हुए अंधेरे को देखा. लेकिन उन्होंने टूटने से इन्कार किया. उन्होंने अपने कंधों पर जिम्मेदारियां उठाईं और अपनी जिंदगी की लड़ाई खुद लड़ी. दूसरे के हिस्सों की लड़ाई भी. वे आज भी लड़ रही हैं.



हाशिमपुरा में कभी हथकरघे हुआ करते थे, आज पावरलूम है. यहां सिलाई, कढ़ाई और कपड़ों में सितारों और नगों की जड़ाई का काम बहुत मिलता है. इसने ज्यादातर महिलाओं के लिए बहुत बड़े सहारे का काम किया. ये काम मुस्लिम परिवारों में परंपरागत रूप से औरतें ही करती आई हैं और इसी तरह, घर-घर में अलग अलग काम होते हैं. इसने भावनात्मक और आर्थिक रूप से टूटी हुई औरतों को अपनी बिखरी हुई जिंदगी को समेट कर फिर से खड़ा करने में काफी मदद की.

हाशिमपुरा कत्लेआम में कम से कम 43 लोग मार दिए गए, अनेक लोगों ने जेल में यातनाएं सहीं. पीछे रह गई औरतों में से कुछ की कहानियां हमने देखीं. लेकिन तब जो बच्चे थे, उनका भविष्य हमेशा के लिए शारीरिक मेहनत और बदहाली के साथ बंध गया. उनके लिए बाकी सारे दरवाजे बंद हो गए थे. क्योंकि उनको अपने परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ, मजदूरी शुरू करनी पड़ी और उनकी पढ़ाई हमेशा के लिए बंद हो गई. हाशिमपुरा में जो मर्द मारे गए, उनमें अनेक पढ़े लिखे थे. लेकिन उनके घर के बच्चों को यह सुविधा नहीं मिल पाई. हालांकि अब कुछ परिवारों से बच्चे पढ़ने जाते हैं.

हाशिमपुरा में जख्म नहीं भरे हैं. यादें इतनी पुरानी नहीं पड़ीं कि वो मिट जाएं. इंसाफ अभी मिला नहीं, कि नाइंसाफी का बोझ हल्का हो जाए. लेकिन उन्हें कहा जाता है, हसीना बताती हैं, कि 'हाशिमपुरा वालों को दुख किस बात है? सड़कें पक्की बन गईं. एकमंजिला मकान चार-चार मंजिलों वाले बन गए.' हसीना नाराजगी में पूछती हैं, 'क्या इन सब चीजों ने हमारे मार दिए गए लोगों को लौटा दिया है?'

इन औरतों के संघर्ष की कहानियां पढ़ते हुए, यह तथ्य भी ध्यान में रखिए कि उन्होंने यह सब एक हमेशा बने रहने वाली असुरक्षा और आतंक के साए में किया. यह बाबरी मस्जिद के खिलाफ लगातार चल रहे फासीवादी अभियानों का दौर था, जब देश के अलग अलग हिस्सों में अल्पसंख्यक तबके पर हमले चल रहे थे. बेदखली और बलात्कारों की घटनाएं हो रही थीं. आखिर में मस्जिद भी तोड़ दी गई, और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों का एक ताजा दौर शुरू हुआ.

ये औरतें ठीक इस उथल पुथल, हिंसा, असुरक्षा और तबाही के दौर में, अपने परिवारों को फिर से बटोरने और संभालने में लगी हुई थीं. हम सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं, कि वे किस तरह के तनावों से गुजरी हुई होंगी.

और ऐसा करते हुए, उन्होंने उम्मीद को कभी भी छोड़ा नहीं. मेहनत-मजदूरी से, पेट काट कर, बच्चों को भूखा रख कर, बीमार रह कर वो पैसे पैसे जोड़तीं, ताकि अपने परिजनों के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए चल रहे मुकदमे में भागीदारी कर सकें. कि जब जरूरत हो, लखनऊ और दिल्ली में रैलियों में जा सकें. प्रदर्शनों में हिस्सा ले सकें.

और अब, यह सब कर चुकने पर, इतने सारे दिनों के बाद, 'अठाइस साल बाद, वे हमसे पूछते हैं कि क्या हम उन हत्यारों के चेहरों को पहचानते हैं? इतने दिनों के बाद हम उन्हें कैसे पहचान सकते हैं? उन्होंने हेलमेट पहन रखे थे. और फिर हम आतंकित थे. क्या सरकार नहीं जानती कि उसने किनको ड्यूटी पर लगा रखा था?'

अपने भाई को खो चुके कय्यूम कहते हैं, 'आज देश में ऐसा हो गया है कि लोग सोचते हैं, चलो मुसलमानों को मार देते हैं. सजा तो कुछ होनी नहीं है.'

अपने भाई को खो चुकी नसीम कहती हैं, 'ऐसे फैसले आने लगेंगे, तो कानूनी लड़ाई कौन लड़ेगा?'

हसीना और कय्यूम और नसीम जो जानना चाहते हैं, वही पूरा मुल्क जानना चाहता है. कातिलों को सजा. मजलूमों को इंसाफ. इन्हें कब तक मुर्दा चीजों में शुमार किया जाता रहेगा?
-साथ में रेयाज.

कविता: 16 मई के बाद...क्योंकि कविता अकेले नहीं चल सकती

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/14/2015 10:27:00 PM


अंजनी कुमार की यह टिप्पणी कविता: 16 मई के बाद अभियान के सफर में एक ऐसे पड़ाव पर आई है, जब यह अभियान अपने पिछले साल की गतिविधियों के लेखे जोखे पर बात करते हुए अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ने की तैयारी कर रहा है. शायद इस टिप्पणी का इससे माकूल मौका और नहीं हो सकता था, जब पिछली उपलब्धियों के साथ, आने वाले वक्त की चुनौतियों और मौजूदा समझदारी के उन नुक्तों पर बात की जाए, जो इस अभियान के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं.

कविताः 16 मई के बाद के अभियान को अभी साल भर होना बाकी है। लेकिन जिस कारण से यह कविता यात्रा शुरू हुई उसे एक साल हो गया है। हम इसकी तकनीकि पेचीदगी में जाएं तो कई सारे सवाल अनसुलझे, बहस के लिए हमेशा ही बने रहेंगे। इन अनसुलझे सवालों के बीच कई सारे सवाल हैं जिसकी धुरी संसदीय रास्तों से बनती हुई हमारे सामने चुनौती बनकर खड़ी है। इसका जवाब जितना आसान है उतना ही कठिन, शायद कोई बचकर निकलना चाहे तो उसके लिए एकदम से फालतू। लेकिन जब ‘लव जिहाद’ और ‘घर वापसी’ राजनीतिक दांवपेंच से अधिक बड़े खेल का नजारा दिखाने लगा और मोदी बाजार का निर्मित ब्रांड बनकर एक राजनैतिक फैशन बन गया तब निश्चय ही हालात उतने सामान्य नहीं थे जितने के आधार पर हम देश की राजनीति पर चाय की चुस्कियों में बहस को अंजाम तक पहुंचा देते हैं।

मुझसे भी कई सारे मित्रों ने पूछा है कि यह कविताः 16 मई के बाद क्या है? क्या मोदी इतना निर्णायक है? क्या राज्य का चरित्र इसी व्यक्ति में समाहित हो गया है? क्या यह हालात का सरलीकरण नहीं है? क्या यह व्यवस्था को समझने की हद दर्जे की नासमझी नहीं है? आदि आदि। इन सवालों का हमने अपनी ओर से हमेशा ही इतना ही कहा कि ‘यह भयावह दौर के खिलाफ एक छोटा सा प्रयास है’। अपने देश में जनसंहार करते हुए सत्ता हासिल करने का अनुभव बहुत पुराना है। लोकतंत्र और देश के नाम पर संसद में बहुमत हासिल करने का सिलसिला 1947 से चला आ रहा है। कांग्रेस से शुरू होकर यह रणनीति भाजपा तक खत्म नहीं होती। ये रणनीतियां चुनाव तक ही सीमित नहीं हैं। बल्कि एक उलट प्रक्रिया है। यह अर्थव्यवस्था और समाज के भीतर से बनते हुए चुनाव की रणनीति में बदलती है। कारपोरेट समूह और साम्राज्यवादी पूंजी के लिए जिस गुजरात मॉडल को बनाया गया- इसी मॉडल को बनाने के लिए बंगाल की बुद्धदेव सरकार काफी बेचैन थी और जनआंदोलनों की वजह से वह असफल रहा, उसे जब देश के स्तर पर लागू करने की सहमति बनने लगी तब हालात पहले इतने सामान्य नहीं रहे। इस प्रयोग में आरएसएस, भाजपा और इससे जुड़े हजारों देशी-विदेशी संगठन, बुद्धिजीवी, मीडियाकर्मी शामिल थे। कांग्रेस ने जिस जमीन को तैयार कर दिया था उस पर ब्रेख्त के गैंगस्टर नाटक के मंचन का स्टेज तैयार हो चुका था। मोदी इस पूरी राजनीति का निमित्त मात्र नहीं है और भाजपा अर्थव्यवस्था के मालिकों की मजबूरी नहीं है। यह औद्योगिक और वित्तीय पूंजी का लंबे समय से चले आ रहे मंदी से उबरने का एक बेसब्र प्रयास है जिसमें भाजपा, कांग्रेस से लेकर एसोचेम, फिक्की आदि की सहमति थी। यह सहमति गैंगस्टर के मंचन को पेश कर रहा था। यह सहमति गुजरात मॉडल के सारे अपराधों को धार्मिक कर्म की तरह स्वीकार्यता में बदल रहा था। यह सहमति मोदी को नेतृत्व में बदल देने की थी। मोदी का गुजरात से अयोध्या और फिर बनारस तक की यात्रा का निहितार्थ सिर्फ दिल्ली फतह नहीं था। यह रैंप पर चलता मॉडल था और इसकी व्यवस्था फासीवादी संगठन कर रहा था और अर्थव्यवस्था इसके साथ चलने के लिए तैयार बैठी हुई थी। जब पूरी दुनिया का कारोबार का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा वित्तिय कारोबार में डूबा हुआ हो और अपने देश में काला बाजार सामानान्तर अर्थव्यवस्था में बदल गया हो ऐसे में फासीवादी खतरे को समझना उतना कठिन नहीं है जितना वोट के आंकड़ों में लोकतंत्र के बचे रहने के सिद्धांत में बना दिया जाता है।

इस राजनीति और अर्थव्यवस्था में कविताः 16 मई के बाद कहां से आ गई? तब यह भी सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि कविता और साहित्य समारोहों में मोदी और आरएसएस कहां से आ गए? कान्हा रिसार्ट, रायपुर, नागपुर, बनारस, दिल्ली से लेकर जयपुर और कलकत्ता तक साहित्य में मोदी और आरएसएस की चर्चा कहां से आ गई? साहित्य समारोहों में भागीदारी बहस और अनसुलझे सवाल की तरह आकर खड़ा हो गया। कविता में यह घुसपैठ किस रास्ते से हुई है। साहित्य में बड़े पैमाने पर जिन नौदौलतियों की आमद हुई है क्या हम उस ओर देख पा रहे हैं! पैसे के जोर और अंग्रेजी की बदौलत हिन्दी साहित्य में पैर रखने वाले नौकरशाहों, व्यवसायियों, अन्यत्रवासी सामंतों और एनजीओकर्मियों की जो बढ़त हुई है उनके पैरों की जमीन वैश्वीकरण के तल पर जाकर लगती है। जिस तरह मोदी की चाह सुसांस्कृतिक रूप में दिखने की है, वैसी ही चाह इनकी भी है। यह समूह अपने कुकर्मों को साहित्य और संस्कृति की शब्दावली से खूबसूरत बना देना चाहता है और इसके लिए वह कविता को कहीं भी बैठा देने के लिए उतावला है। और, इसका असर हिन्दी साहित्य जगत में खूब दिख रहा है। चेतन भगत बनने की इच्छा हो या साहित्य को राजनीतिक कर्म से उबार लेने का प्रयास हो, सभी जगह साहित्य को कमाऊ और आकर्षक बना देने की बेचैनी है। यहां हमें इस बात को जरूर याद रखना चाहिए कि यह स्थिति रातों रात नहीं बनी है। यदि हम केवल हिंदी क्षेत्र की बात करें तो 1947 के बाद लगभग तीन दशक तक कोई भी वामपंथी साहित्य संगठन सक्रिय नहीं दिखता। नक्सलबाड़ी के बाद ही खासतौर से विप्लव रचयितालु संघम की स्थापना के बाद एक अखिल स्तर पर प्रयास और साहित्य संगठनों को पुनर्जीवन मिलता है। यह प्रयास और पुनर्जीवन भी इतना टूटा बिखरा हुआ था कि वह आम जीवन को संबोधित भी नहीं कर सका। साहित्यकारों को घेटो कलकत्ता और दिल्ली में बनता गया और इलाहाबाद और पटना जैसे शहर उजाड़ में बदलते गये। इस उजाड़ और बसाव में साहित्य प्रवक्ताओं, चुटकलेबाजों, जीहुजूरों का मेला लग गया और विश्वविद्यालय, कॉलेजों में नौकरीशुदा साहित्यकारों की बाढ़ आ गई। दूसरी ओर वैश्वीकरण की नई खेप दिल्ली के केंद्र में कविता को खोजने में लगी हुई थी और जब यह मिलने लगी तब साहित्य का केंद्र भी खिसकने लगा।

कविताः 16 मई के बाद इसी रूप में साहित्य की राजनीति है। पिछले पच्चीस सालों में किसानों की मौत गिनी जाए, जनसंहारों में दलित, आदिवासी और मुसलमानों की मौत को गिना जाए, घर और सड़क पर महिलाओं और बच्चियों की मौत को गिना जाए, फौज और पुलिस के हाथों कार्यकर्ताओं, क्रांतिकारियों, गुरिल्लों और लड़ाकूओं की हत्या को गिना जाए और उससे अधिक सत्ता के स्ट्रक्चरल वायलेंस यानी सत्ता के होने की वजह हुई मौतों को गिना जाए जिसमें बिमारी और भूख, आत्महत्या और पागलपन शामिल है, तब कविता आह के रूप में भी नहीं निकलेगी। यह मानचित्र को चबा जाने की आदिम भूख के रूप निकलेगी।

कविताः 16 मई के बाद की अवधारणा से कोई सहमत हो सकता है और नहीं भी। लेकिन जिस हालात में यह अवधारणा बनी है वह इसके आयोजकों के दिमाग में आसमान से अचानक ही नहीं टपक पड़ा है। यदि वे ऐसा सोचते हैं तब इस अभियान का हस्र संकीर्णता का एक और गढ्ढा बना देने तक सीमित हो जाएगा। हम कह सकते हैं कि पिछले दस सालों में साहित्य और संस्कृति पर जिस तरह का प्रयास चला है, यह अभियान भी उसी की कड़ी है। प्रतिरोध का सिनेमा ऐसा ही प्रयास है। अशोक भौमिक ने कला और अपने लेखन से जैनुल आबदीन, चित्त प्रसाद, कमरुल हसन से लेकर रविन्द्रनाथ टैगोर की पेंटिंग और अपने लेखन से समकालीन कला, रंगमंच, भाषा आदि को जिन प्रयासों से आम लोगों के बीच ले गये हैं उससे जनसंस्कृति की धारा मजबूत हुई है। नक्सलबाड़ी के दौर में उभरे हिंदी कवियों में बहुत से लोग रास्ते की तलाश में अब भी भटक रहे हैं लेकिन नीलाभ की राजनीति में खुली पक्षधरता और उनकी कविता, रंजीत वर्मा का साहित्य लेखन और उनका नवीनतम संग्रह लकीर कहीं एक खींचनी होगी आपको उस धारा को आगे ले जाते दिखते हैं। इस बीच मंगलेश डबराल का काव्य संग्रह नये युग में शत्रु ने अपने समय की चुनौतियों को रेखांकित करने का काम किया है और साहित्य की राजनीति के संकट नए सिरे संबोधित करने का आह्वान किया है। इस दौरान युवा कवियों ने खुलकर कविता को अपने समय को सीधी भाषा में संबोधित करने का साहस किया है। मंच से कविता पढ़ना जिसे हेय दृष्टि से देखा जाने लगा था, अब एक बार फिर अपनी ऊंची आवाज के साथ वापस आया है। कविताः 16 मई के बाद के तहत कविता पाठ चाहे जेएनयू में हुआ हो या पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के खचाखच भरे हाल में, लोगों ने जिस तरह कविता को सुना है उससे दिल के भीतर की बेचैनियों को पढ़ा जा सकता है। यहां चंद कवियों का नाम देना न तो तरफदारी है और न ही किसी के प्रति उदासीनता। अच्छी बात है कि नक्सलबाड़ी धारा का प्रभाव खत्म नहीं हुआ है, अब भी वरवर राव को सुनने के लिए लोग आते हैं। अब भी जनवादी धारा के भीतर उठी बहसें संतुलन में नहीं हैं और बेचैनी बनी हुई है। प्रगतिशील धारा को जनता तक पहुंचने की तड़प है।


जनसंस्कृति का झंडा उठाये लोग अब क्रांति की बात कर रहे हैं। यह सब इसलिए है कि हम सब जनता के प्रति जिम्मेदारी महसूस करते हैं, हम अपनी जिंदगी को जहालत में झोंक देने के लिए तैयार नहीं हैं और हमारे लिए गैंगस्टर राज बर्दाश्त नहीं है।

यह सब कविता :16 मई के बाद के एक साल से भी कम के सफर के दौरान हुआ है. लेकिन चूंकि कविताः 16 मई के बाद को आगे अभी लंबा सफर तय करना है, इसलिए इस मौके पर उपलब्धियों के साथ साथ इस पहलकदमी को अपने उद्देश्य के बारे में और धारदार तथा और भी स्पष्ट समझदारी और सांस्कृतिक उपकरणों से लैस होना है. ठीक ऐसे मौके पर कुछ बातें ऐसी भी हैं, जो इस पहलकदमी के सामने मौजूद चुनौतियों को देखते हुए उचित नहीं जान पड़तीं. जैसे कि कविता: 16 मई के बाद का आधार वक्तव्य, जिसे रंजीत वर्मा ने जारी किया है। इस आधार वक्तव्य में बहुत सारी गड़बड़ियां हैं। फासीवादी अंध-राष्ट्रवाद को पहचान यानी आइडेंटिटी की राजनीति से जोड़ देना और यह दावा करना कि 'न कोई आंदोलन आगे है या पीछे और ऐसे में कविता अकेले निकल पड़ी है' फासीवादी राजनीति और जनआंदोलनों के बारे में नासमझी को ही दिखाता है। कविताः 16 मई के बाद को जिन चुनौतियों के साथ काम करना है उसमें ऐसी उथली समझदारी बाधा बन जाएगी। मैं इस कविता अभियान में एक हिस्सेदार के बतौर ही यह बात रख रहा हूं और उम्मीद करता हूं कि इस अभियान में शामिल होते लोगों को एकजुट किया जाय, एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए मंच का गठन किया जाय और न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर कविताः 16 मई के बाद को उन तक ले जाया जाए जो बेचैनी से उसी कविता को सुनना चाहते हैं जो उनके भीतर आह बनकर अंदर ही अंदर टूट रहा है, बिखर रहा है...।

अवास्तविक आंबेडकर का विखंडन

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/12/2015 02:11:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े
अनुवाद:
रेयाज उल हक

 
अगर मूर्तियां, यादगार निशानियां, तस्वीरें और पोस्टर, गीत और गाथाएं, किताबें और पर्चे या फिर याद में होने वाले जलसों का आकार किसी की महानता को मापने के पैमाने होते, तो शायद इतिहास में ऐसा कोई नहीं मिले जो बाबासाहेब आंबेडकर की बराबरी कर सके. उनके स्मारकों की फेहरिश्त में नई से नई जगहें और रोज-ब-रोज नए आयोजन जुड़ते जा रहे हैं, जहां हर गुजरते साल के साथ ज्यादा जलसे आयोजित किए जा रहे हैं. ये एक ऐसी परिघटना बन गए हैं कि कुछ वक्त बाद लोगों के लिए यह यकीन करना मुश्किल होगा कि ऐसा एक इंसान कभी धरती पर चला भी था, जिसे बिल्लियों और कुत्तों तक के लिए खुले पानी के सार्वजनिक स्रोत से पानी पीने के लिए संघर्ष करना पड़ा था. यहां तक कि स्वर्ग के देवताओं तक को उनसे जलन होगी, बशर्ते कि उनका वजूद हो. इस चमत्कार के पीछे क्या बात हो सकती है? इसमें कोई शक नहीं है कि वे दलितों के मसीहा रहे हैं, शुरू में उनके एक तबके के लिए और अब ज्यादातर के लिए. बाबासाहेब ने अकेले और एक सोच के साथ जो किया, उसे देखते हुए उनके लिए बाबासाहेब का आभारी रहना एक कुदरती बात है. यह बात सच तो है, लेकिन यह सोचना पूरी तरह बचकानापन होगा कि इसकी अकेली और पूरी की पूरी वजह सिर्फ यही है. शासक वर्ग द्वारा आंबेडकर की एक छवि को गढ़ने और उसको बढ़ावा देने में निभाई गई उत्प्रेरक भूमिका महत्वपूर्ण और परस्पर मजबूत करनेवाली रही है.

संघ परिवार ने हाल में आंबेडकर को जिस तरह से हथियाने की मंशाएं जाहिर की हैं, वे इतनी खुली हैं कि दलित को उनके भीतर की चाल को समझने में देर नहीं लगेगी.

एक प्रतीक की रचना

राजनीतिक हिंदू की नुमाइंदगी करने वाली कांग्रेस आंबेडकर की मुख्य विरोधी थी. याद कीजिए किस तरह 1932 में गोलमेज सम्मेलन के दौरान दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र हासिल करने की आंबेडकर की कोशिश का गांधी ने तीखा विरोध किया था और आखिर में उन्हें ब्लैकमेल करते हुए पूना समझौते पर दस्तखत कराए थे और इस तरह दलितों के एक आजाद राजनीतिक अस्तित्व की गुंजाइशों को जड़ से खत्म कर दिया था. सत्ता के हस्तांतरण के बाद, कांग्रेस ने पक्षपात करते हुए इसको सुनिश्चित किया कि आंबेडकर संविधान सभा में दाखिल न होने पाएं. जल्दी ही, उसने पाला बदला. लोग इसको समझाते हुए चाहे जो बातें करते रहे हों, यह गांधी की रणनीतिक महारत थी कि उन्होंने आंबेडकर को संविधान सभा में चुना जाना मुमकिन बनाया, जब उनके पास इसमें दाखिल होने का कोई रास्ता नहीं बचा था और फिर उन्हें इसकी मसौदा समिति का अध्यक्ष बनाया. हालांकि इसके बदले में आंबेडकर ने एक सधे राजनीतिज्ञ की तरह व्यवहार करते हुए संविधान में दलितों के लिए कुछ सुरक्षात्मक उपाय हासिल किए, लेकिन यह नई नई बनी नजदीकी लंबे समय तक नहीं चल सकी. आंबेडकर को हिंदू कोड बिल के ऊपर पीछे हटने के मुद्दे पर नेहरू की कैबिनेट से इस्तीफा देना पड़ा. बाद में, आंबेडकर ने संविधान को यह कहते हुए नकार तक दिया कि उन्हें नौकर (हैक) की तरह इस्तेमाल किया गया था कि यह (संविधान) किसी के लिए भी किसी काम का नहीं है और इसको जलाने वाला मैं पहला इंसान हूंगा. उन्होंने कांग्रेस को ‘दहकता हुआ घर’ कहा था जिसमें दलितों के लिए खतरा ही खतरा है. लेकिन यह अनगिनत ‘आंबेडकरियों’ को ‘आंबेडकरवाद’ की सेवा करने के लिए उसमें शामिल होने से नहीं रोक पाया.

कांग्रेस ने भूमि सुधारों और हरित क्रांति जैसी अच्छे नाम वाली नीतियों के जरिए देहाती इलाकों में सबसे बड़ी आबादी वाली शूद्र जातियों में से धनी किसानों के एक वर्ग को अलग निकाल लिया. जबकि यह वर्ग ज्यादातर कांग्रेस का सहयोगी बना रहा, इसकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी विकसित हुईं, जिससे क्षेत्रीय दल उभरे और धीरे धीरे उन्होंने स्थानीय और राज्य के सत्ता के आधारों पर कब्जा कर लिया. चुनावी राजनीति में होड़ पैदा हुई, जिससे जातियों और समुदायों के रूप में वोट ब्लॉकों को अहमियत मिलने लगी. जातियों और समुदायों को क्रमश: सामाजिक न्याय और धार्मिक सुधारों के नाम पर संविधान में ही बड़ी महारत के साथ बचा कर रखा गया था. यही वह मुकाम था, जहां से शासक दलों द्वारा आंबेडकर को अपने भीतर समोने की सोची-समझी कोशिश शुरू हुई. बेशक, इसकी शुरुआत कांग्रेस ने की. आंबेडकर के मुख्य सरोकारों को अंधेरे में डाल दिया गया और उन्हें व्यवस्थित तरीके से एक राष्ट्रवादी, कुछ-कुछ कांग्रेसी, एक राजनेता और संविधान के निर्माता की छवि में ढाल दिया गया. इस प्रचार ने एक ही तीर से अनेक निशाने साधे: इसने आंबेडकरी जनता को जीत लिया, मौकापरस्त दलित नेताओं की कांग्रेस में शामिल होने की दौड़ को तेज किया, दलित आंदोलन को पहचान की राजनीति की में भटका दिया और धीरे-धीरे आंबेडकर को उनके उग्र सुधारवाद से वंचित (डी-रैडिकलाइज) कर दिया. धीरे-धीरे, दूसरे दल भी अपने आंबेडकर की छवियों को पेश करने की होड़ में शामिल हो गए.

आंबेडकर का भगवाकरण

हिंदू श्रेष्ठतावादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने सार्वजनिक दायरे के मुख्य क्षेत्रों के लिए ( जैसे कि राजनीतिक क्षेत्र के लिए जन संघ, धार्मिक क्षेत्र के लिए विहिप आदि) संगठन गठित कर संघ परिवार बनाया और मुख्य सामाजिक श्रेणियों को अपना लक्ष्य बनाते हुए (जैसे कि महिलाओं के लिए राष्ट्रीय सेविका संघ, छात्रों के लिए एबीवीपी, मजदूरों के लिए बीएमएस, आदिवासियों के लिए वीकेए) अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए अगली पीढ़ी के ऐसे संगठनों की भी शुरुआत की, जो रणनीतिगत और उभर रहे मुद्दों से निबट सकें. सामाजिक समरसता मंच दलितों को अपने पक्ष में लुभा कर ले आने के लिए बना था. आरएसएस 1925 में बना था, उन्हीं दिनों जब दलित और कम्युनिस्ट आंदोलन पैदा हुए थे, और यह शुरू में अपनी खयाली दुनिया की हिंदू बहुसंख्या पर आधारित था, लेकिन यह 1977 तक कोई सामाजिक या राजनीतिक छाप छोड़ने में नाकाम रहा, जब उसके कांग्रेस विरोधी लहर पर सवार होकर 94 सांसद जीते थे. शुरू में आंबेडकर की हिंदू धर्म विरोधी बातों से नाराज संघ परिवार उनसे सख्ती से नफरत करता रहा और ज्यादातर उन दलितों पर ही भरोसा करता था, जिन्हें बाद में बाल ठाकरे ने गैर-आंबेडकरी दलित घोषित किया. हालांकि राजनीतिक सत्ता का मांस मुंह लग जाने के बात इसे यह महसूस हुआ कि यह आंबेडकर की अनदेखी नहीं कर सकता जो एक अखिल भारतीय दलित प्रतीक के रूप में विकसित हो चुके थे. इसने आंबेडकर के लेखन और भाषणों में से यहां वहां से कुछ (बिखरी हुई) पंक्तियां उठाईं, फिर उन्हें उनके संदर्भों से काटकर और अपने गोएबलीय सफेद झूठ में मिलाकर आंबेडकर का भगवाकरण करने की रणनीति बनाई. आंबेडकर पर भगवा गिरोह का पहला हमला दो ऐसे लोगों की तुलना करना था, जिनकी आपस में तुलना ही नहीं हो सकती: हेडगेवार के साथ आंबेडकर को बिठाकर उन्हें ‘दो डॉक्टर’ कहना, हालांकि हेडगेवार और आंबेडकर में कोई तुलना ही नहीं हो सकती थी, क्योंकि हेडगेवार मात्र एक लाइसेंसधारी मेडिकल डॉक्टर थे, यह एक डिप्लोमा है जो मैट्रिक के बाद मिल जाता है, जबकि आंबेडकर ने दुनिया के एक जानेमाने संस्थान से दो डॉक्टरल डिग्रियां हासिल की थीं. उनके बीच कौन सी समान बात हो सकती थी?

हालांकि आंबेडकर के व्यवहारवाद के कारण अनगिनत असंगतियां रह गई थीं लेकिन कोई भी उनके जीवन के केंद्रीय मुद्दे को देखने से चूक नहीं सकता जो कि उन्हीं के शब्दों में एक ऐसे समाज में दाखिल होना था, जो ‘आजादी, बराबरी और भाईचारे’ पर आधारित हो. उन्होंने इन तीनों की एक साथ एक ही जगह पर मौजूदगी पर जोर दिया. उन्होंने जातियों के जड़ से खात्मे और समाजवाद (वर्गों के जड़ से खात्मे) को इसकी बुनियादी शर्त के रूप में देखा; उन्होंने जनवाद को इसे बनाने वाली ताकत और बौद्ध धर्म को इसकी नैतिकताएं तय करने वाली ताकत माना. आरएसएस दुनिया को जिस तरह देखता है, वह इसमें से हरेक बात का ठीक उल्टा है. भगवा आंबेडकर एक राष्ट्रवादी है; सच्चे आंबेडकर ने भारत को एक राष्ट्र मानने से इन्कार किया था, और खास तौर से यह चेताया था कि ‘हिंदू राष्ट्र’ तबाही लाने वाला होगा. आरएसएस का आंबेडकर एक महान हिंदू है, बावजूद इसके कि आंबेडकर ने यह शपथ ली थी कि वे एक हिंदू के रूप में नहीं मरेंगे. आरएसएस उस बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म के एक संप्रदाय के रूप में पेश करता है, जिसे आंबेडकर ने हिंदू धर्म को नकारने के बाद अपनाया था. इस तरह आरएसएस बौद्ध धर्म के उस पूरे इतिहास को परे धकेल देता है कि यह हिंदू धर्म के खिलाफ श्रमणों के विद्रोह का प्रतीक है और हिंदू धर्म की खूनी प्रतिक्रांति ने बौद्ध धर्म को इसकी जन्मभूमि से मिटा दिया था. यह कहा जाना कि आंबेडकर संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा, एक भगवा झंडे को राष्ट्रीय झंडा बनाना चाहते थे और यह कि उन्होंने अच्छे कामों के लिए आरएसएस की तारीफ की थी और वे ‘घर वापसी’ के पक्ष में थे, ऐसे बयान आंबेडकर को विहिप के बंदरों जैसा बौना बनाने की कोशिश करते हैं और वे इस लायक भी नहीं हैं कि उन पर टिप्पणी की जा सके. वे यह कहते रहे हैं कि आंबेडकर मुसलमानों के खिलाफ हैं, इसके लिए वे उनकी किताब थॉट्स ऑन पाकिस्तान में से यहां वहां से वाक्यों को उठा कर पेश करते हैं. यह किताब वाद-विवाद शैली में लिखी गई थी, आंबेडकर हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों के वकील का बाना पहने हुए हैं. जब तक कोई इसे मेहनत से नहीं पढ़ता, वह उनकी कई दलीलों को उनकी अपनी राय मानने की गलती कर सकता है. मैंने इस 2003 में लिखी गई अपनी किताब आंबेडकर ऑन मुस्लिम्स: मिथ्स एंड फैक्ट्स में झूठ की धज्जियां उड़ाने की कोशिश की है. उनकी उदारवादी शख्सियत और ऐसे दीगर हवालों की भरमार को देखते हुए, जिनमें वे मुसलमान समुदाय की इस हद तक तारीफ करते हैं कि इस्लाम, धर्मांतरण के लिए उनके पसंदीदा धर्म के रूप में दिखता है (मुक्ति कोण पथे, 1936), उन्हें एक तुच्छ विचारों वाले मुस्लिम विरोधी इंसान के रंग में नहीं रंगा जा सकता. आरएसएस के लिए यह समझ लेना बेहतर होगा कि वह सस्ते तरीके से किसी दलित पिट्ठू को अपने मंच पर भले परोस ले जाए, लेकिन यह आंबेडकर को एक मामूली सांप्रदायिक के रूप में दिखाने में कभी कामयाब नहीं हो पाएगा.

नवउदारवादी मजबूरियां

भारत के चुनावी बाजार में राजनीतिक निर्माताओं द्वारा तैयार किए गए और एक दूसरे से होड़ लगाते आंबेडकर के प्रतीक, सच्चे आंबेडकर पर छा गए हैं और उन्होंने दलितों की मुक्ति के एक संभावित हथियार को बरबाद कर दिया है. हालांकि ये प्रतीक अलग अलग रंगों के हैं, लेकिन उन सबने आंबेडकर को नवउदारवादी रंग में रंगा हुआ है. आंबेडकर के इस प्रतीक ने राज्य के शुभंकर के रूप में गांधी को करीब-करीब बेदखल ही कर दिया है, जो 1947 से 1980 के दशकों तक कारगर रहा था. गांधी, नीतियों के प्रबंधन में, जन निरोधी रणनीतिगत इरादों को छुपाने में, इसकी कल्याणकारी लफ्फाजी और इसकी वृद्धि की हिंदू दर के दौर के अनुकूल थे. इसकी चमक-दमक खत्म होने लगी, जब पैदा हुए पूंजीवादी संकट ने शासकों को नवउदारवादी सुधारों को अपनाने पर मजबूर किया. उग्र विकास, आधुनिकता, खुली होड़, मुक्त बाजार आदि की लफ्फाजियों ने एक नए प्रतीक की जरूरत पैदा की, जो लोगों को भरोसा दिला सके, खास तौर से निचले तबके को जिनको इससे सबसे ज्यादा नुकसान होने वाला था, यह उम्मीद पैदा कर सके कि मुक्त बाजार के विचार के तहत ‘गरीब भी अमीर’ बन सकते हैं. किसी और में नहीं, बल्कि आंबेडकर में ये सारी खूबियां थीं. यह वैसी ही रणनीतिक जरूरत थी, जैसी गांधी को अभी अभी पैदा हुए एक बीमार भारत के लिए संविधान तैयार करने के वक्त महसूस हुई थी. नवउदारवाद के सामाजिक डार्विनवादी तौर-तरीकों के सुर, श्रेष्ठतावादी आरएसएस की विचारधारा से खास तौर पर मिलते रहे हैं, जिसने भाजपा को राजनीतिक सत्ता सौंपी है.

 जहां सभी दलों के लिए दलितों को रिझाने के लिए आंबेडकर के प्रतीक की जरूरत है, आरएसएस को सबसे ज्यादा है. इसीलिए नब्बे के दशक से भाजपा आरक्षित सीटों पर कांग्रेस से ज्यादा जीतती आई है. नवउदारवादी शासन को बुरी तरह से, दलितों के बीच से गाथा गानेवालों की जरूरत है और वे उन्हें मिल गए हैं. एक खासे प्रभावशाली दलित मध्यम वर्ग ने, जिनका नेतृत्व उनके कुछ नायक कर कर रहे हैं, शुरुआती दिनों में जबरदस्ती दलितों को यह समझाने की कोशिश की कि कैसे नवउदारवाद उनके लिए फायदेमंद होगा, कैसे आंबेडकर एक नवउदारवादी थे और कैसे दलितों ने इन नीतियों के तहत कमाल की तरक्की की है और दलित बुर्जुआ की एक ‘क्रांति’ शुरू की है. उन्हें भाजपा से एक खास नजदीकी मिलती है और वे कभी कभी इसके मंचों पर पाए जाते हैं. इसीलिए ज्यादातर दलित नेता आज भाजपा के पाले में हैं (देखें मेरा तीन दलित राम बने भाजपा के हनुमान, हाशिया, 06.04.2014). इस साल कमाल की महारत के साथ भाजपा ने लंदन में एक नुकसान रहित घर को 44 करोड़ में महज इसलिए खरीदा क्योंकि आंबेडकर उसके अनेक अपार्टमेंटों में से एक में छात्र के बतौर रहे थे; इसने मुंबई में भव्य आंबेडकर स्मारक के लिए इंदु मिल की जमीन के मुद्दे को निबटाया और दिल्ली में उतने ही भव्य आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर की योजना बनाई है.

यह सब दलितों में जहर भर रहा है, जिनमें से 90 फीसदी वहीं हैं, जहां वे पिछली सदी की शुरुआत में थे या शायद उससे भी बदतर क्योंकि उनके पास तब उम्मीदें थीं और आज उनके पास कोई उम्मीद नहीं है. वे यह नहीं समझेंगे कि आंबेडकर का ‘समता’, ‘समरसता’ नहीं है या आंबेडकर का दुनिया को देखने का नजरिया नवउदारवादी सामाजिक डार्विनवाद नहीं है, जो असल में उनकी हत्या करने ही निकला है. वे यह भी नहीं समझेंगे कि आंबेडकर स्मारक पर कुछ सौ करोड़ रुपए तो 5 लाख करोड़ की उस रकम की तुलना में कुछ भी नहीं है, जिसे सरकार ने पिछले महज एक दशक में बजट में, उनके हिस्से से चुराया है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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