हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कुजान-बुलाक के कालीनसाजों ने लेनिन को सम्मानित किया: ब्रेख्त

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/22/2015 09:58:00 PM

 
आज लेनिन का जन्मदिन है. हालांकि लेनिन खुद इसे कभी पसंद नहीं करते कि उनका जन्मदिन मनाया जाए. उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी इसे पसंद नहीं किया और अक्सर अपने जन्मदिन के आयोजनों को हतोत्साहित करते रहे. तो फिर एक क्रांतिकारी को कैसे याद किया जाना चाहिए? बेर्तोल्त ब्रेख्त की यह कविता एक राह दिखाती है. अनुवाद: रेयाज उल हक.
 

कॉमरेड लेनिन को अक्सर ही
और खूब सम्मान दिया जाता है. उनकी सीने तक ऊंची और आदमकद मूरतें हैं.
शहरों और बच्चों को उनका नाम दिया गया है
लेनिन की शान में, विभिन्न जबानों में भाषण दिए गए हैं
बैठकें हुई हैं, प्रदर्शन हुए हैं
शंघाई से लेकर शिकागो तक.
लेकिन दक्षिणी तुर्किस्तान में कुजान-बुलाक के
कालीनसाजों की एक छोटी-सी बिरादरी ने
उन्हें इस तरह सम्मानित किया.

बीस कालीनसाज रहते हैं वहां, और शाम को
जब वे बुनाई की अपनी छोटी तिपाइयों पर बैठे तो वे बुखार से कांप रहे थे
बुखार बढ़ता जा रहा था: रेलवे स्टेशन
मच्छरों के भनभनाते हुए बादलों से भरा था
जो ऊंटों के पुराने अहाते के पीछे की दलदल से उठते थे.
लेकिन रेल, जो
हर दो हफ्ते में ले आती थी पानी और धुआं, एक दिन
यह खबर भी लाई
कि लेनिन की याद में मनाया जाने वाला दिन आ रहा है.
और कुजान-बुलाक के लोगों ने फैसला किया,
कि उनकी बिरादरी में भी कॉमरेड लेनिन की
सीने तक ऊंची, प्लास्टर की एक छोटी सी मूरत लगनी चाहिए,
क्योंकि वे बेचारे गरीब बुनकर हैं.
लेकिन जब वे
मूरत के लिए पैसे जमा कर रहे थे
सबको बुखार की हरारत थी और मुश्किल से कमाए गए कोपेक
अपने कांपते हाथों से गिन रहे थे.
और लाल फौज का स्तेपा गामेलेव,
जो सावधानी से पैसे गिन रहा था और उनको बारीकी से देख रहा था,
उसने लेनिन को सम्मानित करने की उनकी चाहत देखी और खुश हुआ
लेकिन उसने उनके कांपते हुए हाथ भी देखे.
और अचानक उसने एक पेशकश की
कि वे लेनिन की मूरत के लिए जमा किए गए पैसों से पेट्रोलियम खरीदें
और उसे ऊंटों के अहाते के पीछे की दलदल पर छिड़क दें
जहां से मच्छर उठते हैं
और अपने साथ बुखार लाते हैं.
इस तरह वे कुजान-बुलाक में बुखार से लड़ भी लेंगे और जोरदार तरीके से
मरहूम को सम्मानित भी कर लेंगे,
वे मरहूम कॉमरेड लेनिन, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता.

वे इस पर राजी हो गए. लेनिन की याद में मनाए जाने वाले दिन को
वे अपनी टूटी-फूटी बाल्टियों में काला पेट्रोलियम लेकर आए
एक एक कर
और उसे दलदल के ऊपर उंड़ेल दिया.

इस तरह उन्होंने लेनिन को सम्मानित करते हुए खुद की मदद की
और खुद की और दूसरों की मदद करते हुए लेनिन को सम्मानित किया
और इसी तरह उन्होंने लेनिन की समझ हासिल की.

हमने सुना कि कैसे कुजान-बुलाक के लोगों ने
लेनिन को सम्मानित किया. फिर, दिन ढलने के बाद शाम को
जब पेट्रोलियम खरीदा गया और दलदल के ऊपर ऊंड़ेला गया
उनकी सभा में से एक आदमी उठा और उसने
स्टेशन पर इस घटना के बारे में एक पट्टी लगाने की चाहत जताई
जिसमें दर्ज हों इसकी दोनों योजनाओं के ब्योरे
कि कैसे योजना बदली गई और लेनिन की सीने तक ऊंची मूरत के बदले में
बुखार को जलाने वाला पेट्रोलियम खरीदा गया.
और यह सब लेनिन के सम्मान में किया गया.
और उन्होंने यह भी किया
उन्होंने वह पटरी भी लगाई.


(तस्वीर में बाएं से: एलेक्जेंडर बोग्दानोव, मैक्सिम गोर्की और लेनिन, शतरंज खेलते हुए) 

हम अन्याय को संस्थाबद्ध करते जा रहे हैं - अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/21/2015 11:53:00 PM


गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के दौरान 23 मार्च को मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय से हुई मेरी बातचीत अंग्रेज़ी पाक्षिक  गवर्नेंस नाऊ में छपी है। लेकिन जब लोग यह जान गये हैं कि यह साक्षात्कार हिंदी में लिया गया था तो सभी मूल ही सुनना-पढ़ना चाहते हैं। इससे साबित होता है कि अपनी भाषा के परिसर में अगर ज्ञान-विज्ञान और विचारों की बगिया लहलहाती हो तो कोई अंग्रेज़ी का मुँह नहीं जोहेगा। इस इंटर्व्यू की करीब 40 मिनट की रिकॉर्डिंग मोबाइल फोन पर है, जिसे फ़ेसबुक पर पोस्ट करना मुश्किल हो रहा है। फ़िलहाल पढ़कर ही काम चलाइये-पंकज श्रीवास्तव

गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल में आप दूसरी बार आई हैं। जो शहर गीताप्रेस और गोरखनाथ मंदिर और उसके महंतों की राजनीतिक पकड़ की वजह से जाना जाता है, वहां ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ दस साल का सफ़र पूरा कर रहा है। इसे कैसे देखती हैं?

दूसरी नहीं, तीसरी बार। एक बार आज़मगढ़ फ़ेस्टिवल में भी जा चुकी हूं। दरअसल, ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो सिर्फ गोरखुपर के लिए अहमियत नहीं रखता। यह वाकई प्रतिरोध है जो सिर्फ जनसहयोग से चल रहा है, वरना प्रतिरोध को भी ‘ब्रैंड’ बना दिया गया है। अमेरिका से लेकर भारत तक, जहाँ भी देखो प्रतिरोध को व्यवस्था में समाहित कर के एक ‘ब्रैंड’ बनाने की कोशिश होती है। जब मैंने ‘एंड आफ इमेजिनेशन’ लिखा था, तो पहला रियेक्शन यह हुआ कि बहुत सारे ब्रैंड्स, जिसमें कुछ जीन्स के भी थे, ने विज्ञापन करने के लिए मुझसे संपर्क किया। यह एक पुराना खेल है। अमेरिका में नागरिकों की जासूसी का खुलासा करने वाले एडवर्ड स्नोडेन के बारे में फ़िल्म बनी है जिसके लिए फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन ने पैसा दिया। ‘फ़्रीडम आफ प्रेस फ़ाउंडेशन’ में भी फ़ोर्ड का पैसा लगा है। ये लोग ‘प्रतिरोध’ की धार पर रेगमाल घिसकर उसे कुंद कर देते हैं। भारत में देखिये, जंतर-मंतर पर जुटने वाली भीड़ का चरित्र बदल गया है। तमाम एनजीओ, फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन जैसी संस्थाओं से पैसा लेकर प्रतिरोध को प्रायोजित करते हैं। ऐसे में गोरखपुर जैसे दक्षिणपंथी प्रभाव वाले शहर में प्रतिरोध के सिनेमा का उत्सव मनाना ख़ासा अहमियत रखता है। मैं सोच रही थी कि आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसी संस्थायें अक्सर मेरा विरोध करती हैं, प्रदर्शन करती हैं, लेकिन गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल को लेकर ऐसा नहीं हुआ। इसका दो मतलब है। या तो उन्हें इसकी परवाह नहीं। या फिर उन्हें पता है कि इस आयोजन ने गोरखपुर के लोगों के दिल मे जगह बना ली है। मेरे पास इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब नहीं है। लेकिन इस शहर में ऐसा आयोजन होना बड़ी बात है। कोई कह रहा था कि इस फ़ेस्टिवल से क्या फ़र्क़ पड़ा। मैं सोच रही थी कि अगर यह नहीं होता तो माहौल और कितना ख़राब होता।

आपकी नज़र में आज का भारत कैसा है? मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य क्या बता रहा है ?

जब मई 2014 में मोदी की सरकार बनी तो बहुत लोगों को, जिनमें मैं भी थी, यकीन नहीं हुआ कि यह हमारे देश में हुआ है। लेकिन अगर ऐतिहासिक नजरिये से देखें तो यह होना ही था। 1925 से जब आरएसएस बना, या उससे पहले से ही भारतीय समाज में फ़ासीवादी प्रवृत्तियाँ नज़र आने लगी थीं। ‘घर वापसी’ जैसे कार्यक्रम उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में हो रहे थे। यानी इस दौर से गुज़रना ही था। देखना है कि यह सब कितने समय तक जारी रहेगा क्योंकि आजकल बदलाव बहुत तेज़ी से होते हैं। मोदी ने अपने नाम का सूट पहन लिया और अपने आप को एक्सोपज़ कर लिया। अच्छा ही है कि कोई गंभीर विपक्ष नहीं है। ये अपने आपको एक्सपोज़ करके खुद को तोड़ लेंगे। आखिर मूर्खता को कितने दिनों तक बरदाश्त किया जा सकता है। लोगों को शर्म आती है जब प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी। गणेश के धड़ पर हाथी का सिर ऐसे ही जोड़ा गया था। फ़ासीवाद के साथ लोग ऐसी मूर्खताएं कब तक सहेंगे।
मैं पहले से कहती रही हूं कि जब राजीव गांधी ने अयोध्या में राममंदिर का ताला खुलवाया तो साथ में ‘बाज़ार’ का ताला भी खोला गया। इसी के साथ दो क़िस्म के कट्टरपंथ को खड़ा किया गया। एक इस्लामी आतंकवाद और दूसरा माओवाद। इनसे लड़ने के नाम पर ‘राज्य’ ने अपना सैन्यीकरण किया। कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ने इस रास्ते को अपनाया क्योंकि नव उदारवादी आर्थिक नीतियाँ, बिना सैन्यीकरण के लागू नहीं हो सकतीं। इसीलिए जम्मू-कश्मीर में पुलिस, सेना की तरह काम करती है और छत्तीसगढ़ में सेना, पुलिस की भूमिका में है। यह जो ख़ुफिया निगरानी, यूआईडी, आधार-कार्ड वगैरह की बातें हैं, यह सब उसी का हिस्सा हैं। अदृश्य जनसंख्या को नज़र में लाना है। यानी एक-एक आदमी की सारी जानकारी रखनी है। जंगल के आदिवासियों से पूछा जाएगा कि उनकी ज़मीन का रिकार्ड कहां है। नहीं है, तो कहा जाएगा कि ज़मीन तुम्हारी नहीं है। डिजिटलीकरण का मकसद “अदृश्य” को “दृश्य” बनाना है। इस प्रक्रिया में बहुत लोग गायब हो जाएंगे। इसमें आईएमएफ़, वर्ल्ड बैंक से लेकर फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन तक, सब मिले हैं। वे क़ानून के राज पर खूब ज़ोर देते हैं और क़ानून बनाने का हक़ अपने पास रखना चाहते हैं। ये संस्थायें सबसे ज़्यादा ग़ैरपारदर्शी ढंग से काम करती हैं, लेकिन इन्हें अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए आंकड़ों की पारदर्शी व्यवस्था चाहिए। इसीलिए वे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों की मदद करते हैं। फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन एक नया पाठ्यक्र गढ़ने में जुटा है। वह चाहता है कि पूरी दुनिया एक ही तरह की भाषा बोले। वह हर तरह के क्रांतिकारी विचारों, वाम विचारों को खत्म करने, नौजवानों की कल्पनाओं को सीमित करने में जुटा है। फिल्मों, साहित्यिक उत्सवों और अकादमिक क्षेत्र में कब्ज़ा करके शोषण मुक्त दुनिया और उसके लिए संघर्ष के विचार को पाठ्यक्रमों से बाहर किया जा रहा है।

आपको हालात को बदलने की कोई मज़बूत जद्दोजहद नज़र आती है क्या...भविष्य कैसा लग रहा है?

प्रतिरोध आंदोलन या क्रांति, जो भी शब्द इस्तेमाल कीजिये, उसे पिछले कुछ वर्षों में काफी धक्का लगा है। 1968-70 में जब नक्सलवादी आंदोलन शुरू हुआ, या तमाम सीमाओं के बावजूद जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के दौर की माँगों पर जरा ग़ौर कीजिये। तब माँग थी- “न्याय”। जैसे ज़मीन जोतने वाली की हो या संपत्ति का समान वितरण हो। लेकिन आज जो माओवादी सबसे “रेडिकल” कहलाते हैं, वे बस यही तो कह रहे हैं कि जो ज़मीन आदिवासियों के पास है, उसे छीना ना जाये। ‘नर्मदा आंदोलन’ की माँग है कि विस्थापन न हो। यानी जिसके पास जो है, उससे वह छीना न जाये। लेकिन जिनके पास कुछ नहीं है, जैसे दलितों के पास ज़मीन नहीं है, उनके लिए ज़मीन तो कोई नहीं मांग रहा है। यानी ‘न्याय’ का विचार को दरकिनार कर मानवाधिकार के विचार को अहम बना दिया गया है। यह बड़ा बदलाव है। आप मानवाधिकार के नाम पर माओवादियों से लेकर सरकार तक को, एक स्वर में कोस सकते हैं। कह सकते हैं कि दोनों ही मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं। जबकि ‘अन्याय’ पर बात होगी तो इसके पीछे की राजनीति पर भी बात करनी पड़ेगी।
 

कुल मिलाकर यह इमेजनिशन (कल्पना) पर हमला है। सिखाया जा रहा है कि ‘क्रांति’ यूटोपियन विचार है, मूर्खता है। छोटे सवाल बड़े बन रहे हैं जबकि बड़ा सवाल गायब है। जो सिस्टम के बाहर हैं, उनकी कोई राजनीति नहीं है। तमाम ख़्वाब टूटे पड़े हैं। राज्य, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के हाथ का उपकरण बना हुआ है। दुनिया की अर्थव्यवस्था एक अंतरराष्ट्रीय पाइपलाइन की तरह है जिसके लिए सरहदें बेमानी हो गयी हैं।

तो क्या प्रतिरोध की ताकतों ने समर्पण कर दिया है, ‘इमेजनिशेन’ की इस लड़ाई में?

मेरे ख़्याल में, वे बहुत कमज़ोर स्थिति में हैं। जो सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं, वे सोच ही नहीं पा रहे हैं। ‘राज्य’ लड़ाई को इतना थकाऊ बना देता है कि अवधारणा के स्तर पर सोचना मुश्किल हो जाता है। यहाँ तक कि अदालतें भी थका देती हैं। हर तरह से कोशिश करके लोग हार जाते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर देश में ऐसी कोई संस्था नहीं है जो मानती हो कि उसका काम लोगों की मदद करना है। उन्हें लगता है कि उनका काम “नियंत्रण” करना है। न्याय कल्पना से बाहर की चीज होती जा रही है। 28 साल बाद हाशिमपुरा हत्याकांड का फैसला आया। सारे मुल्ज़िम छोड़ दिये गये। वैसे इतने दिन बाद किसी को सजा होती भी तो अन्याय ही कहलाता।

आपने गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल का उद्घाटन करते हुए गाँधी जी को पहला “कॉरपोरेट प्रायोजित एनजीओ” करार दिया है। इस पर ख़ूब हंगामा भी हुआ। आपकी बात का आधार क्या है?

आजादी के इतने सालों बाद हममे इतना साहस होना चाहिए कि तथ्यों के आधार पर राय बना सकें। मैंने गांधी को पहला कॉरपोरेट प्रायोजित एनजीओ कहा है तो उसके प्रमाण हैं। उन्हें शुरू से ही पूँजीपतियों ने कैसे मदद की, यह सब इतिहास का हिस्सा है। उन्होंने गाँधी की ख़ास मसीहाई छवि गढ़ने में ताकत लगाई। लेकिन खुद गाँधी का लेखन पढ़ने से सबकुछ साफ हो जाता है। दक्षिण अफ्रीका में गाँधी के कामकाज के बारे में हमें बहुत गलत पढ़ाया जाता है। हमें बताया गया कि वे ट्रेन के डिब्बे से बाहर निकाले गये जिसके ख़िलाफ उन्होंने संघर्ष शुरू किया। यह ग़लत है। गाँधी ने वहाँ कभी बराबरी के विचार का समर्थन नहीं किया। बल्कि भारतीयों को अफ्रीकी काले लोगों से श्रेष्ठ बताते हुए विशिष्ट अधिकारों की मांग की। दक्षिण अफ्रीका में गाँधी का पहला संघर्ष डरबन डाकखाने में भारतीयों के प्रवेश के लिए अलग दरवाज़ा खोलने के लिए था। उन्होंने कहा कि अफ्रीकी काले लोग और भारतीय एक ही दरवाजे से कैसे जा सकते हैं। भारतीय उनसे श्रेष्ठ हैं। उन्होंने बोअर युद्ध में अंग्रेजों का खुलकर साथ दिया और इसे भारतीयों का कर्तव्य बताया। यह सब खुद गाँधी ने लिखा है। दक्षिण अफ्रीका में उनकी ‘सेवाओं’ से ख़ुश होकर ही अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें क़ैसर-ए-हिंद के ख़िताब से नवाज़ा था। 

आप आजकल गाँधी और अंबेडकर की बहस को नये सिरे से उठा रही हैं। आपके निबंध ‘डॉक्टर एंड द सेंट’ पर भी काफी विवाद हुआ था।

यह जटिल विषय है। मैंने इस पर बहुत विस्तार से लिखा है और चाहती हूँ कि लोग पढ़कर समझें। इसकी बुनियाद डॉ.अंबेडकर और गाँधी की वैचारिक टकराहट है। अंबेडकर शुरू से सवाल उठा रहे थे कि हम कैसी आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन गाँधी जाति व्यवस्था की कभी आलोचना नहीं करते, जो गैरबराबरी वाले समाज का इंजन है। वे सिर्फ यह कहकर रुक जाते हैं कि सबके साथ अच्छा व्यवहार होना चाहिए। उन्होंने जाति व्यवस्था को हिंदू समाज का महानतम उपहार बताया। यह सब उन्होंने ख़ुद लिखा है। मैं कोई अपनी व्याख्या नहीं कर रही हूँ। जबकि अंबेडकर लगातार जाति उत्पीड़न और संभावित आज़ादी के स्वरूप का सवाल उठा रहे थे। पूना पैक्ट से पहले गाँधी ने जो भूख हड़ताल की, उसका नतीजा आज भी देश को प्रभावित करता है। हम यह सवाल क्यों नहीं उठा सकते कि क्या सही है और क्या गलत। भारत सरकार की सहायता से रिचर्ड एटनबरो न जो ‘गाँधी’ फ़िल्म बनाई उसमें अंबेडकर का छोटा सा रोल भी नहीं है, जो उनके सबसे प्रभावी आलोचक हैं। अगर हम इतने साल बाद भी बौद्धिक जांच-परख से कतराते हैं तो फिर हम बौने लोग ही हैं। अंबेडकर और गाँधी की बहस बेहद गंभीर विषय है।

भगत सिंह और उनके साथियों के भी गाँधी से तमाम मतभेद थे, लेकिन उन्होंने भी कहा था कि भाग्यवाद जैसी तमाम चीज़ों के समर्थन के बावजूद गांधी ने जिस तरह देश को जगाया है, उसका श्रेय उन्हें न देना कृतघ्नता होगी।

अब बात शुक्रगुज़ार होने या ना होने से बहुत आगे बढ़ गयी। यह ठीक है कि गाँधी ने आधुनिक औद्योगिक समाज में अंतर्निहित नाश के बीजों की पहचान कर ली थी जो शायद अंबेडकर नहीं कर पाये थे। गाँधी की आलोचना का यह अर्थ भी नहीं है कि गाँधीवादियों से कोई विरोध है। या उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ नहीं किया। नर्मदा आंदोलन का तर्क बहुत गंभीर और प्रभावी रहा है, लेकिन सोचना होगा कि वह सफल क्यों नहीं हुआ। आंदोलनों के हिंसक और अहिंसक स्वरूप की बात भी बेमानी है। यह सिर्फ़ पत्रकारों और अकादमिक क्षेत्र की बहस का मसला है। जहां हज़ारों सुरक्षाकर्मियों के साये में बलात्कार होते हों, वहां हिंसा और अहिंसा कोई मायने नहीं रखती। वैसे, अहिंसा के “पोलिटकल थियेटर” के लिए दर्शकवर्ग बहुत ज़रूरी होता है। लेकिन जहां कैमरे नहीं पहुंच सकते, जैसे छत्तीसगढ़, वहां इसका कोई अर्थ नहीं रह जाता।
 

हमें अंबेडकर या गाँधी को भगवान नहीं इंसान मानकर ठंडे दिमाग से समय और संदर्भ को समझते हुए उनके विचारों को कसौटी पर कसना होगा। लेकिन हमारे देश में यह हाल हो गया कि आप कुछ बोल ही नहीं सकते। न इसके बारे में न उसके बारे में। सेंसर बोर्ड सरकार में नहीं सड़क पर है। नारीवादियों को भी समस्या है है, दलित समूहों को भी है। लेफ्ट को भी है और दक्षिणपंथियों को भी। खतरा है कि हम कहीं “बौद्धिक कायरों” का देश ना बन जायें।

आपने पूँजीवाद और जातिप्रथा से एक साथ लड़ने की बात कही है, लेकिन इधर दलित बुद्धिजीवी अपने समाज में पूँजीपति पैदा करने की बात कर रहे हैं। साथ ही, जाति को खत्म न करके अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश पर भी ज़ोर है। जाति को ‘वोट की ताकत’ में बदला जा रहा है। अंबेडकरवादियों के इस रुख को कैसे देखती हैं?

यह स्वाभाविक है। जब हर तरफ ऐसा ही माहौल है तो इन्हें कैसे रोक सकते हैं। जैसे कुछ बुद्धजीवी लोग कश्मीर में जाकर कहते हैं कि राष्ट्रवाद बड़ी खराब चीज़ है। भाई, पहले अपने घर में तो समझाओ। दलित मौजूदा व्यवस्था में अपने लिए थोड़ी सी जगह खोज रहे हैं। सिस्टम भी उनका इस्तेमाल कर रहा है। मैंने पहले भी कहा है ‘दलित स्टडीज’ हो रही है। अध्ययन किया जा रहा है कि म्युनिस्पलटी में कितने बाल्मीकि हैं, लेकिन ऊपर कोई नहीं देखता । कोई इस बात का अध्ययन क्यों नहीं करता कि कारपोरेट कंपनियों पर बनियों और मारवाड़ियों का किस कदर कब्ज़ा है। जातिवाद के मिश्रण नें पूँजीवाद के स्वरूप को और जहरीला कर दिया है।

कहीं कोई उम्मीद नज़र आती है आपको?

मुझे लगता है कि अभी दुनिया की जो स्थिति है, वह किसी एक व्यक्ति के फैसले का नतीजा नहीं हैं। हजारों फैसलों की शृंखला है। फैसले कुछ और भी हो सकते थे। इसलिए तमाम छोटी-छोटी लड़ाइयों का महत्व है। छत्तीसगढ़, झारखंड और बस्तर मे जो लड़ाइयाँ चल रही हैं, वे महत्वपूर्ण हैं। बड़े बाँधों के खिलाफ लड़ाई ज़रूरी है। साथ ही जीत भी ज़रूरी है ताकि ‘इमेजिनेशन’ को बदला जा सके। अभी भी एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसके ख़्वाब ख़्त्म नहीं हुए हैं। वह अभी भी परिवर्तन की कल्पना पर यकीन करती है।

 दिल्ली के निर्भया कांड पर बनी बीबीसी की डाक्यूमेंट्री ‘इंडियाज डॉटर’ पर प्रतिबंध लगा। आपकी राय?

जितनी भी खराब फिल्म हो, चाहे घृणा फैलाती हो, मैं बैन के पक्ष में नहीं हूं। बैन की मांग करना सरकार के हाथ में हथियार थमाना है। इसका इस्तेमाल आम लोगों की अभिव्यक्ति के खिलाफ ही होगा।

मोदी सरकार ने अच्छे दिनों का नारा दिया था। क्या कहेंगी?

अमीरों के अच्छे दिन आये हैं। छीनने वालों के अच्छे दिन आये हैं। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश सबूत है।

आपके आलोचक कहते हैं कि गांधी अब तक आरएसएस के निशाने पर थे। अब आप भी उसी सुर में बोल रही हैं।

आरएसएस गांधी की आलोचना सांप्रदायिक नज़रिये से करता है। आरएसएस स्वघोषित फ़ासीवादी संगठन है जो हिटलर और मुसोलिनी का समर्थन करता है। मेरी आलोचना का आधार गाँधी के ऐसे विचार हैं जिनसे दलितों और मजदूर वर्ग को नुकसान हुआ।

दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार के बारे में क्या राय है?

जब दिल्ली विधानसभा चुनाव का नतीजा आया तो मैं भी खुश हुई कि मोदी के फ़ासीवादी अभियान की हवा निकल गयी। लेकिन सरकार के काम पर कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी। सिर्फ भ्रष्टाचार की बात नहीं है। देखना है कि दूसरे तमाम ज़रूरी मुद्दों पर पार्टी क्या स्टैंड लेती है।

आजकल क्या लिख रही हैं..?

एक उपन्यास पर काम कर रही हूँ। ज़ाहिर है यह दूसरा ‘गॉड आफ स्माल थिंग्स’ नहीं होगा। लिख रही हूँ, कुछ अलग।

देशनिकाला पर सोचते हुए : एडवर्ड सईद

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/21/2015 02:58:00 PM


 एडवर्ड सईद उन बुद्धिजीवियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं में थे, जिन्होंने साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की हमारी समझ को समृद्ध किया और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्षों को ऐसे बौद्धिक औजार मुहैया कराए, जिनकी धार कभी फीकी नहीं पड़ेगी. उन्होंने साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, जियनिज्म और पश्चिमपरस्ती में छुपे हुए नस्लवाद, रंगभेद, मुस्लिम और इस्लाम विरोध तथा कम्युनिज्म के खिलाफ नफरत के बारीक से बारीक रेशों की पड़ताल की और उन्हें उजागर किया. उनकी ओरिएंटलिज्म एक शानदार किताब है, जो अपनी कमियों और सीमाओं के बावजूद समझ की दुनिया के नए दरवाजे खोलती है. इसी तरह कल्चर एंड इम्पीरियलिज्म तथा कवरिंग इस्लाम जैसी किताबों में वे साम्राज्यवादी परियोजनाओं की आलोचना को नए आयाम देते हैं. सईद येरुशेलम में एक ईसाई परिवार में पैदा हुए लेकिन अपनी ज्यादातर जिंदगी एक निर्वासित या प्रवासी के रूप में अमेरिका में बिताई, जहां वे तुलनात्मक साहित्य (कोलम्बिया विश्वविद्यालय) पढ़ाते थे. लिखने के अलावा सईद हमेशा एक सक्रिय कार्यकर्ता की भूमिका में भी रहे और फलस्तीन की आजादी के संघर्ष की हिमायत में बोलते रहे, उसके लिए समर्थन जुटाते रहे. उन्होंने हमेशा इस पर जोर दिया कि बुद्धिजीवियों को राजनीतिक और सामाजिक मामलों और संघर्षों में जरूर एक सक्रिय भूमिका अदा करनी चाहिए. उनकी किताबें पॉलिटिक्स ऑफ डिस्पजेशन, एंड ऑफ द पीस प्रोसेस, द क्वेस्चन ऑफ पैलेस्टाइन आदि एक जुझारू बुद्धिजीवी के दस्तावेज हैं. सईद के लेखन में निर्वासन और बेदखली केंद्रीय तत्वों में से रहे हैं: वे खुद भी एक निर्वासित व्यक्ति थे और वे ऐसी अवाम के लिए बोलते थे, जिसने अपनी जमीन खो दी है और उसके लिए संघर्ष कर रही है. यह अहसास उनकी आत्मकथा आउट ऑफ प्लेस के अलावा उनकी किताब रिफ्लेक्शंस ऑन एक्जाइल में भी बहुत गहरा है. नीचे पेश है, उनकी इसी दूसरी किताब का प्रतिनिधि निबंध, जिसका अनुवाद प्रो. रामकीर्ति शुक्ल ने किया है. हाशिया पर पोस्ट करते हुए कोशिश की गई है कि अनुवाद को मूल लेख के करीब ले जाया जाए, लेकिन किसी दूसरे के अनुवाद के साथ फेरबदल करने की अपनी एक सीमा भी है, जिसका ख्याल भी रखा गया है.
 
चिंतन के एक विषय के रूप में निर्वासन अजीब तौर पर आकर्षक लगता है, लेकिन निर्वासन को अनुभव करना भयावह होता है। यह वो न भरने वाली दरार है जो किसी इंसान और एक जन्मभूमि, उसके अपने स्व और उसके असली घर के बीच जबरन पैदा कर दी जाती है: इसकी बुनियादी उदासी से कभी भी पार नहीं पाया जा सकता. यह बात सच है कि साहित्य और इतिहास में कई ऐसी कहानियाँ दर्ज हैं जिनमें निर्वासित व्यक्ति के साहसिक, किंचित रोमाण्टिक, गौरवपूर्ण, यहाँ तक कि विजयोल्लास से भरे कारनामों का उल्लेख है लेकिन ये सारी कहानियाँ विछोह की मारक पीड़ा पर विजय प्राप्त करने के प्रयासों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। निर्वासित व्यक्ति की सारी उपलब्धियाँ उस चीज की भरपाई नहीं कर सकतीं जिसे उसने हमेशा के लिए गँवा दिया है।

लेकिन यदि यथार्थ निर्वासन अपूरणीय क्षति की स्थिति का नाम है तब फिर आधुनिक संस्कृति के एक शक्तिशाली ही नहीं अपितु समृद्धिकारक मोटिफ के रूप में इसे इतनी आसानी से कैसे रूपांतरित कर लिया गया है? हमें ऐसा सोचने की आदत-सी पड़ गई है कि आधुनिक युग आध्यात्मिक स्तर पर क्षत-विक्षत और अलगावग्रस्त है; यह मानसिक उद्वेलन और विछोह का युग है। नीत्शे ने हमें परंपरा के भीतर असुविधा महसूस करना सिखाया है और फ्रायड के अनुसार जिसे हम पारिवारिक निकटता और स्नेह-सम्बंध कहते हैं वह सत्ता और व्यभिचार-निषेध जनित आक्रोश का चिकना-चुपड़ा चेहरा मात्र है। आधुनिक पाश्चात्य संस्कृति का अधिकांश निर्वासितों, प्रवासियों और शरणार्थियों का दिया हुआ है। अमरीका में अकादमिक, बौद्धिक और सौन्दर्य-चिंतन आज जैसा और जितना है उसमें फासीवाद, साम्यवाद और विरोधियों का दमन और उनको बेदखल करने वाली अन्य शासन-व्यवस्थाओं द्वारा सताये गये लोगों का योगदान सर्वाधिक है। आलोचक जार्ज स्टाइनर ने तो एक बहुत ही समझदारी भरा सिद्धांत ही प्रस्तावित किया है जिसके अनुसार आधुनिक पाश्चात्य साहित्य की एक पूरी विधा ही क्षेत्रेतर (एक्स्ट्राटेरिटोरियल) बन गई है, अर्थात एक ऐसा साहित्य जो निर्वासितों द्वारा निर्वासितों के बारे में लिखा गया है और यह साहित्य शरणार्थी युग का प्रतीक है। स्टाइनर लिखते हैं: यह उचित ही लगता है कि वे जो उस अर्ध-सभ्यता में कला सृजन करते हैं जिसने तमाम लोगों को बेघर कर दिया है स्वयं बेघर कवि और भाषाओं के बीच यात्रा करने वाले यायावर लोग हों। वे झक्की, एकांतप्रिय, अतीत-मोह से ग्रस्त, जान-बूझकर समय की मर्यादा को तोड़ने वाले होते हैं।

दूसरे युगों में निर्वासितों के पास इसी प्रकार की पार-सांस्कृतिक, पार-राष्ट्रीय कल्पना-दृष्टियाँ रही हैं, इसी तरह की निराशाओं और यातनाओं को उन्होंने भोगा था, उन्होंने इसी प्रकार ऐसे व्याख्यापरक, आलोचनायुक्त कर्म संपादित किये थे जिनकी प्रखर संपुष्टि ई.एच. कार द्वारा प्रस्तुत हरजेन के चारों ओर इकट्ठे हुए 18वीं सदी के रूसी बुद्धिजीवियों पर किये गये क्लासिक अध्ययन द रोमांटिक इग्जाइल्स नामक पुस्तक में मौजूद है। लेकिन पहले के युगों के निर्वासितों और हमारे अपने समय के निर्वासितों के बीच संख्या और स्तर का भेद है।

आधुनिकतम हथियारों से लड़े गये युद्धों, साम्राज्यवाद और अधिनायकवादी शासकों की धर्म की सीमाओं को छूनेवाली महत्वाकांक्षाओं के चलते हमारा अपना युग शरणार्थियों, बेदखल लोगों और पारगमन करने वाले विशाल जनसमूहों का युग कहा जा सकता है।

इस प्रकार की विशाल, व्यक्ति-निरपेक्ष पृष्ठभूमि के तहत निर्वासित व्यक्ति से मानववाद की धारणा की सेवा की अपेक्षा नहीं की जा सकती। बीसवीं सदी के स्तर पर निर्वासन की व्याख्या मानववाद अथवा सौन्दर्यशास्त्र के पदों के भीतर नहीं की जा सकती है। अधिक से अधिक निर्वासन पर लिखा गया साहित्य उस यंत्रणा और नियति को वस्तुनिष्ठ रूप से प्रस्तुत करता है जिसे अधिकांश लोगों ने अपने जीवन में शायद ही महसूस किया होगा।
 

लेकिन यह सोचना कि इस साहित्य में रचा-बसा निर्वासन का भाव कल्याणकारी मानववाद है वास्तव में निर्वासन से उपजी क्षत-विक्षत होने की अनुभूति, निर्वासन भोगने वालों पर इसके द्वारा लादे गये विलोपनों, इसे ‘हमारे लिए लाभदायक’ के रूप में समझने के प्रयासों के प्रति इसके विवश मौन का मजाक उड़ाना होगा। क्या यह सच नहीं है कि साहित्य में और उससे भी अधिक धर्म में निर्वासन के बारे में व्यक्त किये गये विचार निर्वासन की भयावहता को धूमिल कर देते हैं? क्या यह भी सच नहीं है कि निर्वासन अंतिम रूप से धर्मनिरपेक्ष और असह्य रूप से इतिहासजन्य होता है, कि यह मनुष्यों द्वारा दूसरे मनुष्यों पर थोप दिया जाता है और उन्हें परंपरा, परिवार और भूगोल से मिलने वाले जीवन-रस से वंचित कर दिया है?

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निर्वासन को विषय बनाकर लिखी गई कविता पढ़ने के बजाय किसी निर्वासित कवि को देखने का मतलब होता है उस अप्रतिम गहनता को देखना जिसके साथ निर्वासन के विप्रतिषेधों को मूर्तरूप दिया जाता है और उन्हें भोगा जाता है। कई साल पहले मुझे समकालीन उर्दू कविता के महानतम कवि फैज अहमद फैज के साथ कुछ समय बिताने का मौका मिला था। जियाउल हक की सैनिक सरकार ने उन्हें देश-निकाला दे दिया था और संकटों से जूझ रहे बेरूत में उन्होंने शरण मिली थी। स्वाभाविक ही था कि उनके घनिष्टतम मित्रों में फिलिस्तीनी मूल के लोग थे लेकिन मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि फैज और उनके फिलिस्तीनी दोस्तों के बीच आत्मीयतापूर्ण संबंधों के बावजूद उनमें कुछ भी एक-दूसरे जैसा नहीं था - न भाषा, न काव्य-परंपराएं और न ही जीवन-इतिहास। केवल एक ही बार ऐसा हुआ जब फैज अपने विछोह-बोध को कुछ समय तक जीत पाये थे और वह तब हुआ जब उन्हीं की तरह निर्वासित उनके एक पाकिस्तानी दोस्त इकबाल अहमद बेरूत में उनसे मिलने आये थे। एक दिन काफी रात गये हम तीनों बेरूत के एक गंदे से रेस्तरां में बैठे हुए थे जहाँ वे और फैज मेरी खातिर कविताओं का अनुवाद करते रहे लेकिन जैसे-जैसे रात गहराने लगी, अनुवाद की जरूरत ही नहीं रह गई। जो मैं देख रहा था, उसके अनुवाद की जरूरत नहीं थी: जो हो रहा था वह वास्तव में अवज्ञा और क्षति के माध्यम से घर वापसी का अभिनय था मानों दोनों यह कह रहे हों, ‘‘जिया, देखो, हम यहाँ हैं।’’ जबकि असलियत यह थी कि जिया अपने घर में थे और इन दोनों निर्वासित कवियों की उत्सवी मुखरता को सुन ही नहीं सकते थे।

राशिद हुसैन फिलिस्तीनी थे। उन्होंने आधुनिक हिब्रू के महान कवि बिआलिक की कविताओं का अरबी में अनुवाद किया था। हुसैन बहुत ही आकर्षक वक्ता थे और 1948 के वर्षों में एक वक्ता और राष्ट्रभक्त के रूप में उनका कोई सानी नहीं था। पहले वे तेल-अबीब में हिब्रू भाषा के पत्रकार थे और नासिर के प्रखर समर्थक और अरबी राष्ट्रवाद के मुखर प्रवक्ता होने के बावजूद उन्होंने यहूदी और अरबी लेखकों के बीच संवाद को सफलतापूर्वक संभव बनाया था। लेकिन उनके ऊपर दबाव बढ़ रहा था और एक समय ऐसा आया जब यह दबाव असह्य हो गया और वे न्यूयार्क चले गये। उन्होंने एक यहूदी महिला से विवाह किया और संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीनी मुक्ति-संगठन के कार्यालय में काम करने लगे लेकिन वहाँ वे अपने स्वच्छन्द और स्वप्नदर्शी विचारों के कारण अपने वरिष्ठों की आँख की किरकिरी बन गये। 1972 में वे अरब लौट आये लेकिन कुछ ही महीने बाद वे फिर अमरीका वापस चले गये। वे सीरिया और लेबनान तथा काहिरा में बेगाना महसूस करते थे।

न्यूयार्क ने उन्हें शरण दी लेकिन साथ ही अनवरत शराबखोरी और बेकारी ने भी उन्हें शरण दी। उनका जीवन पूरी तरह से बिखर चुका था लेकिन मेहमाननवाजी में उस समय भी उनका कोई जवाब नहीं था। एक रात उन्होंने बहुत ज्यादा शराब पी ली और फिर बिस्तर पर लेट कर सिगरेट पीने लगे। एक रात बहुत ज्यादा शराब पीने के बाद, बिस्तर में सिगरेट पीते हुए उनकी मौत हो गई, जब उनकी सिगरेट से आग लग गई और यह फैल कर उनके आडियो कैसेट की छोटी सी लाइब्रेरी तक पहुंच गई, जिसमें ज्यादातर में अपनी कविताओं का पाठ कर रहे कवियों की आवाजें दर्ज थीं। टेपों से निकलने वाले धुएं ने उनका दम घोंट दिया। उनके शव को इजरायल के छोटे से गाँव में दफनाने के लिए भेज दिया गया जहाँ उनके परिवार के लोग उस समय रह रहे थे।

ये और इन जैसे अनेक निर्वासित कवियों-लेखकों की जीवन-चर्या ने निर्वासन की उस स्थिति को गरिमा प्रदान की है जिसका उपयोग गरिमा छीनने, लोगों से उनकी पहचान छीनने के लिए किया गया था। इन जीवन-चर्याओं के आधार पर अपने समय में राजनैतिक दण्ड की एक विधा के रूप में निर्वासन पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए आपको स्वयं निर्वासन के साहित्य द्वारा क्षेत्रांकित किये गये क्षेत्रों के बाहर पड़े हुए अनुभव के क्षेत्रों का क्षेत्रांकन करना पड़ेगा। आपको पहले ज्वायस और नबाकोव को एक ओर खिसका कर उन असंख्य जन-समूहों के बारे में सोचना पड़ेगा जिनके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने कई एजेन्सियाँ खोल रखी हैं। आपको उन शरणार्थी किसानों के बारे में सोचना पड़ेगा जिन्हें अपने घरों को वापस जाने की कोई उम्मीद नहीं है, जिनके पास केवल राशन-कार्ड और एजेन्सी द्वारा दिये गए नंबर के अलावा कुछ भी नहीं है। पेरिस दुनिया भर के निर्वासितों के लिए मशहूर राजधानी-नगर हो सकता है लेकिन इसी के साथ यह वह शहर भी है जहाँ असंख्य अनाम स्त्री और पुरुषों ने अकेलेपन और पीड़ा के अनेक वर्ष गुजारे हैं - ये स्त्री और पुरुष विभिन्न नागरिकताओं और जातीय समूहों से जुड़े हैं - वियतनामी, अल्जीरियाई, कंबोडियाई, लेबनानी, सेनेगलवासी, पेरूवासी आदि। आपको काहिरा, बेरूत, मेडागास्कर, बैंकाक, मेक्सिको सिटी के बारे में भी सोचना पड़ेगा। अटलांटिक दुनिया से जैसे-जैसे आप आगे बढ़ेंगे वैसे-वैसे भयानक बर्बादी के क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी होती जायेगी और बर्बादी की भयानक मार झेलने वालों की संख्या भी बढ़ती जायेगी। दिल दहला देनी वाली इस बर्बादी के शिकार कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनका नाम शरणार्थी-सूचियों में भी दर्ज नहीं है। वे अचानक गायब हो गये लोग हैं और उनका कोई कहने लायक इतिहास भी नहीं बचा है। भारत से निर्वासित मुसलमानों, अमरीका में रहने वाले हैती निवासियों अथवा ओसियाना में बिकिनियानी अथवा पूरे अरब विश्व में छितराये हुए फिलिस्तिीनियों के बारे में सोचने का मतलब होता है आत्मनिष्ठता द्वारा संभव किये जाने वाले छोटे-मोटे शरर्स्थिलों की छोड़कर आपको जन राजनीति के अमूर्तनों का पल्ला थामना पड़ेगा। समझौता-वार्ताओं, राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम, अपने घर-द्वार से हाथ-धोकर पैदल चलकर अथवा बसों में ठूँसकर दूसरे क्षेत्रों में रहने के लिए जाने को मजबूर लोग: ऐसे अनुभवों का परिणाम क्या होता है? क्या ये अनुभव स्पष्ट रूप से अथवा लगभग जान-बूझकर पहुँच से बाहर नहीं हो जाते?

अब हम राष्ट्रवाद और निर्वासन से इसके तात्विक जुड़ाव पर आते हैं। राष्ट्रवाद किसी स्थान, जनसमूह, किसी विरासत में और से जुड़े होने की उद्घोषणा होता है। यह भाषा, संस्कृति और परंपरा द्वारा सृजित किसी घर की संकल्पना का प्रमाणन होता है, और ऐसा करते हुए यह निर्वासन की संभावना अथवा आशंका को परे हटाता है, निर्वासन से उपजी क्षति से बचने के लिए लड़ता है। कहा जा सकता है कि राष्ट्रवाद और निर्वासन की अन्तरक्रीड़ा हीगेल द्वारा लक्षित स्वामी और सेवक की वह द्वन्द्वात्मकता है जिसमें दोनों में से प्रत्येक विरोधात्मकता से युक्त होता है। सभी राष्ट्रवाद अपने प्रारंभिक दौर में विछोह अथवा पार्थक्य की दशा से आगे विकसित होते हैं। अमरीकी स्वातंत्र्य के लिए, जर्मनी अथवा इटली के एकीकरण और अल्जीरिया की मुक्ति के लिए किये गये संघर्ष उन राष्ट्रीय समूहों द्वारा चलाए गए थे जिनसे वह जीवन-शैली छीन ली गयी थी जिसे वे अपना मानते आये थे और जिसे ऐसा होने की मान्यता प्राप्त हो चुकी थी। उपलब्ध और विजयी राष्ट्रवाद पश्चदर्शी और भविष्यदर्शी दोनों विधियों से एक ऐसे इतिहास को न्यायोचित ठहराता है जिसे एक आख्यानात्मक रूप देने के लिए कुछ चुनी हुयी घटनाओं को संग्रथित करके निर्मित किया गया होता है; सभी राष्ट्रवादों के संस्थापक-जनक होते हैं, उनके आधारभूत अर्ध-धार्मिक ग्रंथ होते हैं, जुड़ाव के आलंकारिक वचन होते हैं, उनके अपने भौगोलिक और ऐतिहासिक सीमा चिन्ह होते हैं तथा उनके घोषित आधिकारिक शत्रु और महानायक होते हैं। इस प्रकार का समुच्चयी आचार-संपुट फ्रांसीसी समाजशास्त्री पियरे बोर्दयू के शब्दों में हेबिटस का निर्माण करता है अर्थात अभ्यासों का एक ऐसा सुयोजित मिश्रण जो आदत को आवास से जोड़ता है। कालांतर में सफल राष्ट्रवाद सत्य पर अपना पूरा कब्जा जमा लेते हैं और झूठ तथा निकृष्टता को बाहरी लोगों के मत्थे मढ़ देते हैं (उदाहरण के लिए पूंजीवादी बनाम साम्यवादी, योरोपीय बनाम एशियायी जैसे वक्तव्य)।

और ‘हम’ और ‘बाहरी लोग’ की सीमा के ठीक बाहर स्थिति है नॉन-बिलांगिग (बेघर बेनाम लोगों) का भयावह क्षेत्र। ऐसे ही स्थानों पर आदिम युगों में मनुष्यों को देश-निकाला देकर भेज दिया जाता था और आधुनिक समय में आज भी इस क्षेत्र में मानव जाति का एक बड़ा हिस्सा शरणार्थियों और बेदखल लोगों के रूप में अपना समय बिता रहा है।

राष्ट्रवादों का संबंध समूहों से होता है लेकिन एक अत्यधिक पीड़ादायक अर्थ में निर्वासन का अनुभव समूह के बाहर भोगा जाता है: सामुदायिक सहवास से कटकर जीने के लिए अभिशप्त वंचन की अनुभूति। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय अभिमान, सामूहिक भावना, समुदायजन्य भावातिरेकों की अपनी ओर खींचने वाली उद्बोधी भाषा में धंसे बिना कैसे कोई निर्वासन के अकेलेपन से निजात पा सकता है? एक ओर निर्वासन की स्थिति और दूसरी ओर राष्ट्रवाद की प्रायः रक्त-पिपासु अभिपुष्टियों के दो अतिवादी छोरों के बीच बचाने और जुड़े रहने लायक आखिर क्या होता है? क्या राष्ट्रवाद और निर्वासन के कुछ आभ्यान्तरिक गुण होते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि दोनों एक ही प्रकार की भ्रमात्मक स्थिति के दो अलग-अलग रूप होते हैं?

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका पूरा जवाब कभी भी नहीं दिया जा सकता क्योंकि प्रत्येक सवाल यह मानकर चलता है कि निर्वासन और राष्ट्रवाद पर बिना एक-दूसरे का जिक्र किये, तटस्थ अथवा निरपेक्ष बहस हो सकती है। लेकिन दोनों परस्पर निरपेक्ष नहीं हैं। क्योंकि दोनों पक्षों में सामूहिक भावनाओं में से सर्वाधिक सामूहिक भावना और व्यक्तिगत संवेगों में से सर्वाधिक व्यक्तिगत संवेग एक-दूसरे में ग्रथित होते हैं, अतः दोनों के अनुकूल शायद ही कोई भाषा हो। लेकिन एक बात निश्चित है कि राष्ट्रवाद की सार्वजनिक और सर्वग्राही महत्वाकांक्षाओं में ऐसा कुछ भी नहीं होता जो निर्वासित व्यक्ति की दुर्दशा के मर्म को छू सके।

राष्ट्रवाद के विपरीत, निर्वासन अस्तित्व की एक असतत अवस्था का नाम है। निर्वासित लोग अपनी जड़ों से, अपनी जमीनों से, अपने अतीतों से कटे हुए होते हैं। सामान्यतः उनका न तो कोई राज्य होता है और न ही कोई सेना हालांकि वे इन दोनों की तलाश में लगे रहते हैं। इसीलिए निर्वासित लोगों की तीव्र और तत्काल इच्छा होती है अपनी टूटी हुई जिन्दगियों को जोड़ने की और इस इच्छा के चलते वे प्रायः अपने को किसी विजयी विचारधारा अथवा पुनरस्थापित जन-समूह के अंश के रूप में देखना पसंद करते हैं। महत्वपूर्ण बात यह होती है कि इस प्रकार की विजयी विचारधारा के अभाव में निर्वासन की स्थिति वस्तुतः असह्य और आज की दुनिया में असंभव हो जाती है। विजयी विचारधारा निर्वासित व्यक्ति के खंडित इतिहास को एक नयी पूरकता अथवा पूर्णता देने के समान होती है। और इस संदर्भ में हम यहूदियों, फिलिस्तीनियों और आर्मेनियाइयों की नियति को उदाहरण के रूप में देख सकते हैं।

नाउबर अकेलेपन से जूझने वाले आर्मेनियाई हैं। वे मेरे मित्र भी हैं। उनके माता-पिता को 1915 में अपने परिवार के कत्लेआम के बाद तुर्की छोड़ना पड़ा था: उनके नाना का सिर काट लिया गया था। नाउबर के माता-पिता पहले तो अलेजो गये और फिर काहिरा आ गये। साठ के दशक के मध्य में गैर-मिस्रियों के साथ एक अन्तर्राष्ट्रीय सहायता संगठन द्वारा बेरुत लाये गये। बेरुत में कुछ दिनों तक वे पेन्शन पर गुजारा करते रहे और फिर उन्हें शहर के बाहर के एक मकान के दो कमरों में स्थानांतरित कर दिया गया। लेबनान में वे पैसे-पैसे के मुहताज थे लेकिन इंतजार करने के अलावा कुछ कर ही नहीं सकते थे। आठ महीने बाद एक अन्य सहायता एजेन्सी ने उन्हें हवाई जहाज से ग्लासगो पहुँचाया, फिर वहाँ से गैण्डर और न्यूयार्क। न्यूयार्क से वे बस में यात्रा करते हुए सिएटल आ गये जहाँ एजेन्सी ने उनके अमरीका प्रवास के इंतजाम कर दिये थे। जब मैंने सिएटल का नाम कुछ आश्चर्य के साथ लिया तो नाउबर ने मुस्कराते हुए कहा कि आर्मेनिया न सही, सिएटल ही सही। आर्मेनिया जिसे उन्होंने कभी देखा ही नहीं था, तुर्की जहाँ इतने बड़े पैमाने पर लोगों की हत्याएं हुई थीं या फिर लेबनान जहाँ उनके परिवार को हमेशा डर के साथ रहना पड़ता। कभी-कभी जलावतनी घर में ही रहने अथवा घर से बाहर न निकल पाने से अच्छी होती है लेकिन बस कभी-कभी ही।

क्योंकि कुछ भी सुरक्षित नहीं है। निर्वासन एक चिन्तायुक्त स्थिति का नाम है। जो कुछ भी आप उपलब्ध करते हैं वह ठीक वही चीज होती है जिसे आप दूसरों के साथ बाँटना नहीं चाहते और अपने और अपने हमवतनों के चारों ओर रेखा खींचने के दौरान ही निर्वासन की स्थिति में होने के सर्वाधिक बदसूरत पहलू उभरकर सामने आते हैं। इसी समय पैदा होता है एकताबद्ध होने का एक अतिशयोक्तिपूर्ण अहसास और साथ ही बाहरी लोगों के प्रति अत्यधिक भावनापरक आक्रोश और इस आक्रोश की चपेट में वे लोग भी आ जाते हैं जो आप जैसी ही स्थिति के शिकार हुए होते हैं। यहूदीवादी यहूदियों और अरबी फिलिस्तीनियों के बीच चलने वाले संघर्ष से अधिक दुराग्रही और क्या चीज हो सकती है? फिलिस्तीनी समझते हैं कि वे अत्यधिक लोकप्रसिद्ध निर्वासितों द्वारा निर्वासित बना दिये गये हैं। लेकिन फिलिस्तीनी यह भी जानते हैं कि राष्ट्रीय पहचान का उनका अपना बोध निर्वासन की स्थिति में ही विकसित हुआ है जहाँ रक्त-संबंधियों को छोड़कर हर कोई उनका दुश्मन है, जहाँ उनसे हमदर्दी रखने वाला हर आदमी किसी शत्रु-शक्ति का एजेण्ट है और समूह की रिवायतों से जरा भी दाएं-बाएं जाने का मतलब होता है अधम कोटि का धोखा और विश्वासघात।

निर्वासन की नियति का शायद यह सर्वाधिक असामान्य पक्ष है: निर्वासितों द्वारा निर्वासित किया जाना, निर्वासितों के हाथों जड़ों से उखाड़े जाने की वास्तविक प्रक्रिया को फिर से जीना। 1982 की गर्मियों में हर फिलिस्तीनी यही सवाल पूछ रहा था कि किस अव्यक्त इच्छा के चलते 1948 में फिलिस्तीनियों को बेदखल करने वाले इजराइल ने फिलिस्तीनियों को लेबनान में उनके शरणार्थी शिविरों से निष्कासित करना प्रारंभ कर दिया। ऐसा लगता है मानों पुनर्संरचित सामूहिक इजराइली अनुभव जिसका प्रतिनिधित्व इजराइल और आधुनिक यहूदीवाद करते हैं, अपने आस-पास बेघरपने और बेदखली की और किसी कहानी को सह ही नहीं सकता था। और यह एक ऐसी असहिष्णुता रही है जो फिलिस्तीनी राष्ट्रवाद के प्रति इजराइल की शत्रुता द्वारा लगातार पुष्ट होती रहती है। यह असहिष्णुता उन फिलिस्तीनियों के प्रति है जो अपनी पहली बेदखली के बाद से सारी पीड़ाओं और यातनाओं को झेलते हुए निर्वासन में एक राष्ट्रीय पहचान बनाने में जुटे हुए हैं।

निर्वासन से उपजी असततताओं और टूटनों के भीतर से पहचान बनाने की आवश्यकता की अभिव्यक्ति महमूद दरवेश की कविताओं में हुई है। इन कविताओं में वंचन के गीतों को घर वापसी के अनिश्चितकाल तक स्थगित नाटक में रूपांतरित करने के महाकाव्यात्मक प्रयास के दर्शन होते हैं। वे अपने बेघर होने के बोध को असमाप्त और अधूरी चीजों की एक सूची द्वारा व्यक्त करते हैं:

लेकिन मैं ही निर्वासित हूँ
अपनी आँखों से मुझे मुहरबंद कर दो
तुम जहाँ भी हो मुझे वहाँ ले चलो
ले चलो मुझे जो कुछ भी तुम हो।
लौटा दो मुझे चेहरे का रंग
और देह की ऊष्मा
हृदय और आँख की रोशनी,
रोटी का नमक और लय
पृथ्वी का स्वाद ... मातृभूमि।
छिपा लो मुझे अपनी आँखों में।
उदासी की हवेली का अवशेष मानों मुझे
मेरी त्रासदी की कुछ पंक्तियों के रूप में मुझे देखो
जानो मुझे एक खिलौने जैसा, घर की ईंट जैसा
ताकि हमारी संतानें घर लौटना याद रखें।
निर्वासन का दर्द धरती के ठोसपन और उसके संतोष के साथ सम्पर्क के टूट जाने में निहित होती है। घर वापसी नामुमकिन हो जाती है।

जोसेफ कॉनरैड की कहानी ‘अमी फॉस्टर’ निर्वासन पर लिखी गई सर्वाधिक समझौता-रहित कहानी है। कॉनरैड हमेशा अपने को पोलैण्ड से निर्वासित के रूप में सोचते थे और उनकी लगभग सारी रचनायें और साथ ही उनका अधिकांश जीवन भी इस बात का असंदिग्ध प्रमाण है कि संवेदनशील निर्वासित व्यक्ति अपनी नियति तथा नये वातावरण से संतोषजनक संपर्क बनाने के अपने असफल प्रयासों में किस प्रकार डूबा रहता है। ‘अमी फॉस्टर’ एक प्रकार से निर्वासन की समस्या पर ही केन्द्रित है, शायद इतना अधिक केन्द्रित कि कॉनरैड की चर्चित कहानियों में इसका उल्लेख बहुत कम किया जाता है। पूरी कहानी की कथावस्तु इसके केन्द्रीय चरित्र यांको गूराल की आप-बीती है जो एक पूर्वी-योरूप का किसान है और जो समुद्री रास्ते से अमरीका जाते हुए इंग्लैण्ड के समुद्र तट पर जहाज डूब जाने का शिकार हो जाता है:

सचमुच ही बहुत मुश्किल होता है जब कोई आदमी अपने को एक खोया हुआ अजनबी, असहाय, समझ में न आ सकने वाला और अपनी जड़ों को हमेशा के लिए गंवा देने वाला व्यक्ति अपने को पृथ्वी के एक अनजाने कोने में पाता है। लेकिन दुनिया के किसी भी भाग में, जहाज के डूबने का शिकार होने वाले सारे साहसिकों में, मेरे विचार से, शायद ही कोई ऐसा रहा हो जो इतना बदनसीब रहा हो जितना यह आदमी जिसकी कहानी मैं कह रहा हूँ। समुद्र द्वारा अस्वीकार कर दिये गये साहसिकों में यह सबसे अधिक मासूम था।

यांको को अपना घर इसलिए छोड़ना पड़ा था क्योंकि वहाँ के दबावों के बीच रहना उसके लिए असंभव हो गया था। अमरीका अपने वादों से उसे ललचाता है। हालांकि वह पहुँच जाता है इंग्लैण्ड। इंग्लैण्ड में उसे बहुत मुश्किलें होती हैं क्योंकि वह वहाँ की भाषा नहीं बोल सकता है और लोग उससे डरते हैं और वह गलतफहमियों का भी शिकार होता है। केवल अमी फॉस्टर ही जो मेहनती तो है लेकिन खूबसूरत नहीं उससे संवाद करने की कोशिश करती है। दोनों शादी कर लेते हैं, फिर उन्हें एक बच्चा होता है लेकिन जब यांको बीमार पड़ता है तो अमी उसकी देख-भाल करने से कतराती है। फिर एक दिन बच्चे को यांकों से छीनकर घर से चली जाती है। अमी के चले जाने से यांको का दुख बढ़ जाता है और वह तकलीफदेह मौत के निकट बहुत जल्दी पहुँच जाता है। यांको की मृत्यु को कॉनरैड बहुत विस्तार से चित्रित करते हैं जैसा कि वे अपने औपन्यासिक चरित्रों के साथ करते रहे हैं। इन बेघर चरित्रों की मृत्यु का कारण निपट अकेलेपन और दुनिया की उनके प्रति उदासी का मिला-जुला परिणाम होता है। यांको की नियति को ‘अकलेपन और निराशा की महाविपत्ति’ के रूप में चित्रित किया गया है।

यांको की स्थिति बहुत विचलित करने वाली है: वह एक ऐसा विदेशी है जो एक अनजान दुनिया में नितांत अकेला और एक प्रकार की प्रेत-बाधा का सताया हुआ है। लेकिन अपने निर्वासन के चलते कॉनरैड ने यांको और अमी के अलगाव को काफी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। यांको फुर्तीला, छरहरा और चमकीली आँखों वाला है जबकि अमी थुलथुल, आलसी और बुद्धि से मंद है। यांको की मौत के समय कॉनरैड ऐसा आभास देते हैं कि यांको के प्रति अमी की शुरुआती हमदर्दी एक प्रकार का छल थी जिसमें यांको को उसने फंसा लिया। यांको की मौत को बड़े रोमांटिक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है: दुनिया बहुत ही बदसूरत है और किसी की प्रशंसा नहीं कर सकती: यांको को कोई भी समझ नहीं पाया, यहाँ तक कि उसके दिल के इतना करीब रहने वाली अमी भी नहीं। कॉनरैड ने यांको की निर्वासन-पीड़ा के आधार पर एक सौन्दर्यमूलक अथवा कलात्मक सिद्धांत ही गढ़ डाला। कॉनरैड का कथा-संसार एक प्रकार का अस्पष्ट, संवाद-शून्य संसार है और इसे विरोधाभास ही कहा जाएगा कि भाषा की संभावनाओं की यह आत्यंतिक सीमा संवाद स्थापित करने के लंबे-चौड़े प्रयासों को रोकती नहीं। कॉनरैड की सभी कहानियाँ अकेलेपन से जूझ रहे ऐसे लोगों की कहानियाँ हैं जो बातूनी तो हैं (सच बात तो यह है कि आधुनिकतावादी लेखकों में कॉनरैड जितना शब्दों के जादू में गिरफ्त और विशेषण-प्रेमी शायद ही कोई अन्य लेखक हो) लेकिन दूसरों को अपनी बातों से प्रभावित करने के उनके प्रयास उनके अकेलेपन के बोध को कम करने के बजाय और बढ़ा देते हैं। कॉनरैड का प्रत्येक निर्वासित चरित्र डरा हुआ होता है और यह कल्पना करने के लिए अभिशप्त कि उसकी मौत एक ऐसे अकेलेपन में होगी जहाँ संवेदना अथवा संवाद के लिए कोई गुंजाइश नहीं होगी। निर्वासित लोग अ-निर्वासित लोगों के प्रति विद्वेष का भाव रखते हैं क्योंकि अ-निर्वासित लोग अपने परिवेश से जुड़े हुए होते हैं जबकि निर्वासित व्यक्ति हमेशा बेघर और उखड़ा हुआ होता है।

निर्वासित व्यक्ति लगातार सोचता रहता है किसी स्थान में पैदा होना, वहीं रहते रहना, अपने को उस स्थान से जोड़े रहने का अहसास बनाए रखना – यह सब कैसे होता है।

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हालांकि यह सही है कि हर आदमी जो अपने घर लौटने से रोक दिया जाता है निर्वासित की ही श्रेणी में आयेगा लेकिन निर्वासितों, शरणार्थियों, प्रवासियों, उत्प्रवासियों के बीच कुछ अंतर किये जा सकते हैं। निर्वासन सदियों पुरानी देश-निकाला की दंड-पद्धति से जुड़ा हुआ है। देश-निकाले के बाद निर्वासित व्यक्ति एक अनियमित और दुखभरी जिंदगी जीता है जिसके ऊपर बाहरी होने का ठप्पा लगा रहता है। दूसरी ओर, शरणार्थी वस्तुतः बीसवीं सदी की राज्य व्यवस्था का परिणाम है। शरणार्थी शब्द के साथ राजनैतिक निहितार्थ जुड़े हुए हैं और यह निर्दोष और हैरान-परेशान लोगों के ऐसे विशाल समूह का संकेत करता है जिन्हें तत्काल अंतराष्ट्रीय अनुदान की आवश्यकता होती है जबकि मेरे विचार से ‘निर्वासन’ शब्द में एक प्रकार के आत्मिक एकाकीपन का भाव छिपा हुआ है।

प्रवासी लोग वे होते हैं जो अधिकांशतः व्यक्तिगत अथवा सामाजिक कारण से अपनी इच्छा से किसी अजनबी देश में रहते हैं। हेमिंग्वे और फिट्जेराल्ड को फ्रांस में रहने के लिए मजबूर नहीं किया गया था। जहाँ तक एकाकीपन और टूटन की अनुभूति का सवाल है यह प्रवासियों और निर्वासितों में समान हो सकता है लेकिन प्रवासियों को निर्वासन के कठोर निषेधों को नहीं झेलना पड़ता है। उत्प्रवासियों की स्थिति बहुत साफ नहीं होती। तकनीकी अर्थ में कोई भी वह व्यक्ति जो किसी नये देश में जा बसता है उत्प्रवासी है। इसमें स्वेच्छित चुनाव की संभावना बनी रहती है। औपनिवेशिक अधिकारी, धर्मप्रचारक, तकनीकी विशेषज्ञ, भाड़े के सैनिक और ऋण पर बुलाये गये सैनिक सलाहकार भी एक अर्थ में निर्वासन की जिंदगी बिताते हैं लेकिन उन्हें देश-निकाले का दण्ड नहीं दिया गया है। अफ्रीका, एशिया के कुछ भागों और अफ्रीका में बसे हुए श्वेत लोग कभी निर्वासित हुए होंगे लेकिन आविष्कारकों और राष्ट्र-निर्माताओं के रूप में वे ‘निर्वासित’ के दाग से बच गये हैं।

निर्वासित व्यक्ति का अधिकांश समय एक ऐसी नई दुनिया सृजित करने में खर्च होता है जिसपर वह शासन कर सके और इस प्रकार वह अपने व्यग्रकारी क्षति के बोध की भरपाई करने का प्रयास करता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इतनी अधिक संख्या में निर्वासित लोग उपन्यासकार, शतरंज के खिलाड़ी, राजनैतिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी हो गये हैं। इस प्रकार के सारे उद्यमों में वस्तुओं में कम से कम निवेश और गतिशीलता और कौशल पर अधिक से अधिक ध्यान की आवश्यकता होती है। निर्वासितों द्वारा रचा गया नया संसार स्वभावतः बनावटी होता है और इसकी अयथार्थता औपन्यासिक कथा से मिलती-जुलती है। अपनी पुस्तक थ्योरी आफ द नॉवेल में जार्ज लुकाच बहुत जोर देते हुए यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि महत्वाकांक्षा और काल्पनिकता के यथार्थ के भीतर से सृजित साहित्य-रूप उपन्यास वास्तव में ‘इन्द्रियेतर गृहहीनता’ (ट्रांन्सेन्डेन्टल होमलेसनेस) का साहित्य रूप है। लुकाच के अनुसार क्लासिकी महाकाव्यों का जन्म ऐसी सुस्थिर संस्कृतियों में होता है जिसके मूल्य स्पष्ट होते हैं, जिससे अस्मिताएं स्थिर होती है और जहाँ जीवन गति में कोई परिवर्तन नहीं होता जबकि योरोपीय उपन्यास की जड़ें इसके ठीक विपरीत किस्म के अनुभव में हैं, यह एक ऐसे समाज का चित्र है जो लगातार बदल रहा है, जिसमें एक घुमक्कड़, सभी प्रकार के दायभाग से रहित मध्यवर्गीय नायक अथवा नायिका एक ऐसी दुनिया रचने के उपक्रम में लगे होते हैं जो हमेशा के लिए पीछे छूट गयी पुरानी दुनिया से थोड़ी-बहुत मिलती-जुलती है। महाकाव्य में कोई ‘वैकल्पिक’ दुनिया नहीं होती; केवल एक दुनिया होती है जिसका अंतिमत्व स्पष्ट होता है। वर्षों तक यात्रा करते रहने के बाद यूलिसिस इथाका लौट आता है, अकिलीज की मृत्यु होगी क्योंकि वह अपनी नियति से बच नहीं सकता। लेकिन उपन्यास का अस्तित्व इसलिए होता है क्योंकि ‘दूसरी’ दुनियाओं का भी अस्तित्व संभव है जो मध्यवर्गीय सिद्धान्तकार, घुमक्कड़ और निर्वासित व्यक्ति के लिए विकल्प बन सकती हैं।

अपने जीवन में वे चाहे जितना सफल हो जाएं निर्वासित लोग ऐसे सनकी व्यक्ति होते हैं जो दूसरे लोगों से अपनी भिन्नता को एक प्रकार के अनाथ होने की स्थिति मानते हैं। ऐसा कोई भी आदमी जो वास्तव में बेघर है, प्रत्येक आधुनिक चीज में अलगाव देखने की आदत को एक प्रकार का बनतूपना अथवा दिखावटीपना मानता है। भिन्नता को दृढ़ इच्छा से प्रयोग किये जाने वाले हथियार को हाथ में पकड़े हुए निर्वासित व्यक्ति जोर-शोर से किसी भी तरह के जुड़ाव से निर्बंध होने के अपने अधिकार पर आग्रह करता है।

इस प्रकार की मानसिकता एक ऐसे दुराग्रह में बदल जाती है जिसे आसानी से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दुराग्रह, अतिशयोक्ति, अतिरंजना: निर्वासित होने के ये चारित्रिक लक्षण हैं; ये ऐसी युक्तियाँ हैं जिनके द्वारा आप दुनिया से अपनी बात मनवा सकते हैं जबकि हकीकत यह होती है कि आप अपनी बात को और अधिक अस्वीकरणीय बना देते हैं क्योंकि आप स्वयं नहीं चाहते कि आपकी बात स्वीकार कर ली जाय। अंततः यह आपकी अपनी और केवल अपनी बात होती है। संतुलन और सौम्यता निर्वासित व्यक्ति के कार्यो के साथ जोड़े जा सकने वाले अंतिम लक्षण हैं। निर्वासित कलाकार निश्चित रूप से अप्रिय होते हैं और उनकी अनमनीयता उनकी उदात्त कृतियों में भी अपनी जगह बना लेती है। द डिवाइन कॉमेडी में दांते की कल्पना अपनी सार्वभौमिकता और विस्तार के कारण अत्यधिक सशक्त है लेकिन पारादिसो तक आते-आते जो स्वर्गिक शान्ति का भाव उत्पन्न होता है उसमें इनफर्नो में रूपायित निर्णय की कठोरता और प्रतिशोधात्मकता के चित्र मौजूद हैं। फ्लोरेंस से निर्वासित दांते ही शाश्वतता का इस्तेमाल प्रतिशोध स्थान के रूप में कर सकते थे। जेम्स ज्वाइस ने अपने लिए ‘निर्वासन’ का चुनाव स्वयं किया: ऐसा करके वे शायद अपनी कलात्मक क्षमता को और अधिक ऊर्जस्वी करना चाहते थे। जैसा कि उनके जीवनीकार रिचर्ड एलमन ने कहा है, बड़े ही रहस्यमय और प्रभावशाली ढंग से उन्होंने अपने देश आयरलैण्ड से झगड़ा मोल ले लिया और इस झगड़े को हमेशा जीवित रखा ताकि वे पूरी क्षमता से उस चीज का विरोध कर सकें जो परिचित और सामान्य हो गयी थी। एलमन कहते हैं कि ‘जब भी अपनी मातृभूमि से संबंध सुधरने का खतरा पैदा होता था तो कोई न कोई ऐसी घटना ज्वाइस के हाथ लग ही जाती थी जिससे उनकी नाराजगी और ठोस हो जाती थी और जो उनकी स्वेच्छित अनुपस्थिति को न्यायोचित ठहरा देती थी।’ ज्वाइस का कथा-साहित्य, जिसे उन्होंने कभी ‘अकेले और मित्रविहीन होने’ की स्थिति कहा था, से जुड़ा हुआ है। और, हालांकि निर्वासन को एक जीवन-शैली के रूप में चुनने के उदाहरण अत्यन्त दुर्लभ हैं, ज्वाइस ने इसकी यातनाओं को बखूबी समझ लिया था।

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लेकिन निर्वासित रचनाकार के रूप में ज्वाइस की सफलता एक सवाल भी उठाती है जो निर्वासन स्थिति की केंद्र में स्थित है: क्या निर्वासन इतना आत्यंतिक और व्यक्तिगत होता है कि हथियार के रूप में इसका कोई भी इस्तेमाल अंततः इसे एक प्रकार से तुच्छ और सतही बना देता है? ऐसा क्यों हुआ है कि निर्वासन के साहित्य ने मानव-अनुभव के एक प्रतीक के रूप में साहसिकता, शिक्षा और खोज के साहित्य के बराबर अपना स्थान बना लिया है? क्या यह वही निर्वासन है जो अक्षरशः यांको गूराल की मृत्यु के लिए जिम्मेदार है और जिसने बीसवीं सदी के निर्वासन और राष्ट्रवाद के बीच व्ययसाध्य और प्रायः अमानवीय संबंध को जन्म दिया है? अथवा यह निर्वासन की कोई अधिक सौम्य अथवा भद्र प्रजाति है?
 

निर्वासन में समकालीन रुचि का अधिकांश कारण वह बीमार लगने वाली धारणा है कि एक उद्धारकारी मोटिफ के रूप में निर्वासन के लाभों का फायदा गैर-निर्वासितों को भी मिल सकता है। इस विचार में सत्यांश निश्चित रूप से है। मध्यकाल के चलते-फिरते रहने वाले विद्वानों अथवा रोमन साम्राज्य के पढ़े-लिखे यूनानी दासों की भाँति निर्वासित लोग और विशेष रूप से असाधारण प्रतिभा वाले निर्वासित लोग अपने पर्यावरण को निश्चित रूप से प्रभावित करते हैं और स्वभावतः ‘हम’ अपने बीच ‘उनकी’ उपस्थिति के ज्ञानवर्धक पक्षों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं न कि उनकी यातना और मांगों पर। लेकिन व्यापक स्तर पर होने वाले आधुनिक विस्थापनों को निराशाजनक राजनैतिक परिप्रेक्ष्य से देखने पर अलग-अलग निर्वासित लोग हमें एक अनिवार्यतः हृदयहीन दुनिया में बेघर होने की ट्रैजिक नियति को स्वीकार करने के लिए बाध्य करते हैं।

एक पीढ़ी पहले सिमों वील ने निर्वासन की समस्या को बड़े ही सटीक शब्दों में व्यक्त किया था: जड़ों से जुड़ा होना शायद मानवीय आत्मा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण लेकिन सर्वाधिक उपेक्षित आवश्यकता होती है। लेकिन वील को यह भी पता था कि विश्वयुद्धों, देश निकालों और व्यापक जनसंहारों के इस युग में जड़विहीनता से निजात देने वाले अधिकांश उपाय उतने ही खतरनाक हैं जितने कि वे घाव जिन पर ये उपाय मरहम लगाने की कोशिश कर रहे होते हैं। इन उपायों में, राज्य, अथवा कहना चाहें तो कह लें ‘राज्यवाद’, सर्वाधिक कपटपूर्ण उपाय है क्योंकि राज्य की पूजा अन्य सारे मानवीय संबंधों को दरकिनार कर देती है।

वील नए तरीके से निर्वासित व्यक्ति की नियति के केन्द्र के पास के दबावों और अवरोधों से हमारा परिचय कराती है। आधुनिक युग में ट्रैजेडी के सबसे अधिक निकट की कोई स्थिति यदि हो सकती है तो वह है निर्वासन की स्थिति। अकेलेपन और बेदखली के तथ्य हमें आँखें फाड़कर देख रहे हैं और यह एक प्रकार का आत्ममुग्ध परपीड़ावाद (मासोकिज्म) पैदा करता है जो सामुदायिकता, उत्संस्करण और सुधार के सारे प्रयासों को प्रतिरोधित करता है। इस आत्यंतिक बिन्दु तक आकर निर्वासित व्यक्ति निर्वासन को एक पवित्र प्रतीक में बदल लेता है जो एक ऐसी क्रिया होती है जो उसे सारे संबंधों और प्रतिबद्धताओं से दूर कर देती है। ऐसे जीना मानों आपके चारों ओर जो कुछ भी था वह नश्वर और क्षुद्र था, बदमिजाज सनक और झगड़ालू प्रेमहीनता का शिकार बन जाना होता है। और एक चीज जो बहुत प्रचलित होती जा रही है वह है निर्वासितों द्वारा दलों, राष्ट्रीय आन्दोलनों अथवा राज्य व्यवस्थाओं में शामिल होना। निर्वासित व्यक्ति को संबंधों का एक नया अनुक्रम परोस दिया जाता है और वह नई वफादारियाँ विकसित करने लगता है। लेकिन इसमें कुछ खो भी जाता है जैसे आलोची परिप्रेक्ष्य, बौद्धिक नियंत्रण और नैतिक साहस।

यह भी अवश्य ही जान लिया जाना चाहिए कि निर्वासित व्यक्ति का सुरक्षात्मक राष्ट्रवाद प्रायः आत्मज्ञान के साथ ही आत्म-विज्ञप्ति के कुछ कमतर आकर्षक रूपों को भी जन्म देता है। निर्वासन में राष्ट्र को पुनर्संयोजित करने जैसी प्रायोजना में (बीसवीं सदी में यह बात यहूदियों और फिलिस्तीनियों पर लागू होती है) एक राष्ट्रीय इतिहास का निर्माण, किसी प्राचीन भाषा को पुनर्जीवित करना, पुस्तकालयों और विश्वविद्यालयों जैसे राष्ट्रीय संस्थाओं को खोलना जैसी चीजें निहित होती हैं। इसी प्रकार के प्रस्थान-बिन्दुओं से स्व की तलाश की प्रक्रिया शुरू होती है जो निश्चय ही ‘जातीयता’ जैसे सकारात्मक तथ्यों तक ही सीमित नहीं होती। उदाहरण के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की आत्म-चेतना हो सकती है जो यह समझने की कोशिश कर रहा है कि क्यों यहूदियों और फिलिस्तिीनियों के इतिहासों के अपने विशेष पैटर्न हैं, क्यों ऐसा होता है कि दमन और समूल विनाश की धमकियों के बावजूद कोई आचार-परंपरा निर्वासन में भी जीवित बची रहती है।

इस तरह यह जरूरी है कि मैं निर्वासन की बात विशेषाधिकार के रूप में न करके आधुनिक जीवन के ऊपर राज करने वाली जन संस्थाओं के विकल्प के रूप में करूँ। आखिरकार निर्वासन चुना नहीं जाता: आप पैदा ही इसी में होते हैं या यह आपके साथ घटित होता है। लेकिन यदि निर्वासित व्यक्ति किनारे बैठकर अपने घाव को चाटने न लग जाए तो कुछ चीजें सीखने लायक होती हैं: उसे एक कर्तव्यनिष्ठ, न कि मुग्ध अथवा मनहूस, आत्मनिष्ठता सृजित करनी चाहिए।

इस प्रकार की सचेत और सटीक आत्मनिष्ठता का शायद सर्वाधिक अच्छा उदाहरण हमें जर्मन यहूदी दार्शनिक और आलोचक थियोदोर अडोर्नो के लेखन में मिलेगा। अडोर्नो की सफलतम रचना है मिनिमा मोरेलिया जो वास्तव में निर्वासन की अवधि में लिखी गयी उनकी आत्मकथा है। इसका उपशीर्षक है ‘क्षत-विक्षत जीवन से कुछ अनुचिंतन’। एडोर्नो जिसे ‘प्रशासित’ दुनिया कहते हैं उसके प्रति खुला विरोध व्यक्त करते हुए सम्पूर्ण जीवन को बने-बनाये रूपों, पहले से तैयार किये ‘घरों’ में ढला हुआ देखा था। उनका तर्क है कि हम जो कुछ भी सोचते अथवा करते हैं और साथ ही हर एक चीज जो हमारे पास होती है वह अंततः एक पण्य वस्तु होती है। भाषा तो बस अनाप-शनाप होती है, हर चीज बिकाऊ है। इस वस्तु-स्थिति को अस्वीकार करना निर्वासित का बौद्धिक धर्म होता है।

अडोर्नो के अनुचिंतनों से उनका यह विश्वास साफ झलकता है कि सचमुच में आज उपलब्ध घर केवल लेखन में है यद्यपि यह घर बहुत ही भुरभुरा और असुरक्षित होता है। एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं ‘घर अतीत हो चुका है। प्रौद्योगिकी के सर्वव्यापी विकास ने बहुत पहले ही निश्चय कर लिया था कि घरों का हश्र क्या होगा, अतः योरोपीय शहरों पर हुई बमबारी तथा उसके साथ ही श्रम शिविर और यातना शिविर जल्लादों के रूप में इसके पूर्वगामी भर थे। ये बस पुराने भोजन के डिब्बों जैसे रह गये हैं जिन्हें फेंक दिया जाना चाहिये।’ संक्षेप में अडोर्नो एक गंभीर व्यंग्योक्ति के माध्यम से कहना चाहते हें कि ‘‘यह नैतिकता का तकाजा है कि हम अपने घरों में सुकून से न रहें।’’

अडोर्नो का अनुकरण करने का मतलब होगा ‘घर’ से दूर रहना ताकि निर्वासित व्यक्ति की अनासक्ति के साथ ‘घर’ पर निगाह डाली जा सके। विभिन्न अवधारणाओं और विचारों तथा उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं में असंगतियाँ ढूँढ़ने का अपना औचित्य होता है। हम घर और भाषा को बस मान लेते हैं, वे स्वभाव बन जाते हैं और उनमें अन्तर्निहित मान्यताएं मताग्रह और रुढ़ि में ढल जाती हैं।

निर्वासित व्यक्ति जानता है कि एक धर्मनिरपेक्ष और संभावी विश्व में घर हमेशा अस्थायी होते हैं। सीमाएं और बैरियर जो हमें परिचित क्षेत्र की सुरक्षा के बाड़े में घेरे रहते हैं, बंदीगृहों में तब्दील हो सकते हैं जिनकी रक्षा में प्रायः तर्क अथवा आवश्यकता की सीमांएं लांघ ली जाती हैं। निर्वासित व्यक्ति सीमाओं का अतिक्रमण करता है, विचार और अनुभव की घेरेबंदियों को तोड़ता है। बारहवीं सदी के एक ईसाई साधु, ह्यूगो आफ सेण्ट विक्टर, की ये पंक्तियाँ बरबस ध्यान खींचती हैं -

अभ्यस्त मस्तिष्क के लिए यह महान स्रोत होता है यह सीखना कि पहले, थोड़ा-थोड़ा करके, वह अदृश्य और अस्थायी चीजों के बारे में अपने को बदले जिससे बाद में वह उनका पूरा परित्याग करने में सक्षम हो जाये। वह व्यक्ति जो अपने देश के माधुर्य को जानता है अभी एक मुलायम नौसिखिया है, और वह जिसके लिए हर मिट्टी अपनी ही लगती है पहले से ही मजबूत है, लेकिन पूर्णता उसने प्राप्त की है जिसे सारी दुनिया ही परदेश लगती है। मुलायम आत्मा ने दुनिया के एक स्थान पर अपनी आँख जमा रखी है; मजबूत आदमी सभी स्थानों तक अपने प्यार को फैला चुका होता है, पूर्ण व्यक्ति ने अपना प्यार बुझा दिया है।

बीसवीं सदी के महान साहित्यिक विद्वान इरिख आरबाख ने जिन्होंने युद्ध के वर्षों में तुर्की में निर्वासित जीवन बिताया था, इस गद्यांश को एक ऐसे मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया है जो हर उस आदमी के लिए उपयोगी है जो राष्ट्रीय अथवा प्रांतीय सीमाओं का अतिक्रमण करना चाहता है। ऐसे ही दृष्टिकोण को अपना आदर्श बनाकर कोई इतिहासकार मानवीय अनुभवों और इनके लिखित आलेखों को उनकी विविधता के साथ ही उनकी विशिष्टता भी समझ सकता है; अन्यथा वह केवल उन बहिष्करणों और पक्षपात की प्रतिक्रियाओं से ही बँधा रह जायेगा और उस स्वतंत्रता की अनदेखी कर जायेगा जो ज्ञान की सहयात्री होती है। लेकिन ध्यान रहे कि ह्यूगो इस बात को दो बार स्पष्ट करते हैं कि ‘सशक्त’ और ‘पूर्ण’ व्यक्ति आसक्तियों के बीच क्रियाशील होते हुए ही अनासक्ति और आजादी प्राप्त करता है न कि उन्हें नकारते हुए। निर्वासन आधारित होता है अपनी जन्मभूमि के अस्तित्व, उससे प्यार और उसके साथ बंधे होने पर। जो बात सभी निर्वासनों पर लागू होती है वह यह नहीं है कि घर और घर के प्रति प्यार खो जाता है बल्कि दोनों के ही अस्तित्व में खोने का भाव अन्तर्निहित होता है।

अनुभवों को ऐसा जानिये मानो वे खोने वाले हों। वह क्या है जो उन्हें यथार्थ से जोड़े रहता है? उनमें से आप क्या बचाना चाहेंगे और क्या आप त्यागना चाहेंगे? केवल वही व्यक्ति जिसने आजादी और अनासक्ति पा ली है, जिसकी गृह-भूमि ‘मधुर’ है लेकिन जिसकी परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि वह उस मधुरता को दुबारा पा नहीं सकता, ऐसे सवालों का जवाब दे सकता है। (ऐसे आदमी के लिए भ्रम अथवा मताग्रह द्वारा उपलब्ध कराये गये स्थानापन्नों से संतुष्टि प्राप्त कर पाना असंभव होगा।)
 

इस सबसे ऐसा लग सकता है कि यह निदान दृष्टिकोण की कभी न कम हो सकने वाली निराशा के सामने मजबूर है और इसके साथ ही आत्मा की सारी प्रफुल्लता और सारे उत्साह का स्थायी और अवसादपूर्ण नकार ही समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। लेकिन ऐसा जरूरी नहीं। निर्वासन के सुख की बात करना शायद कुछ अटपटा लग सकता है लेकिन यह अवश्य ही कहा जा सकता है कि इसकी स्थितियों में कुछ न कुछ सकारात्मक होता है। ‘पूरी दुनिया को विदेशी भूमि’ के रूप में देखना कल्पना की मौलिकता को संभव बनाता है। अधिकांश लोग, कम से कम सिद्धांत रूप में, एक देश, एक संस्कृति, एक घर को जानते हैं; निर्वासित लोग कम से कम दो देशों, दो संस्कृतियों, दो घरों को जानते हैं और कल्पनादृष्टि की यह बहुलता एक ही समय कई आयामों को जानने की संभावना खोल देती है- एक ऐसी जानकारी जिसे संगीत की शब्दावली में विवादी सुर कहा जा सकता है।

किसी भी निर्वासित व्यक्ति के लिए नये माहौल में जीवन की आदतें, अभिव्यक्ति अथवा क्रिया किसी अन्य माहौल में इन्हीं चीजों की स्मृतियों की पृष्ठभूमि में ही घटित होती हैं। इस प्रकार नये और पुराने माहौल सजीव, वास्तविक और सुरसंगति के साथ घटने-बढ़ने वाले होते हैं। इस प्रकार के बोध में एक विचित्र प्रकार का सुख होता है, विशेष रूप से तब जब निर्वासित व्यक्ति ऐसे अन्य विवादी सन्निधानों के प्रति सचेत होता है जो रूढ़िग्रस्त निर्णयों को घटाता है तथा गुणग्राही सहानुभूति को उत्प्रेरित करता है। हम कहीं भी हों, ऐसा अभिनय करना कि हम अपने ही घर में हैं उपलब्धि के एक विशेष बोध का अनुभव होता है।

जो भी हो, स्थिति खतरों से खाली नहीं रहती: दुराव-छिपाव की आदत थकाने वाली भी होती है और बहुत ही तोड़ने वाली होती है। निर्वासन की स्थिति संतुष्टि, शान्ति और सुरक्षा की स्थिति नहीं होती। वालेस स्टीवेन्स के शब्दों में निर्वासन ‘किसी जाड़े का दिमाग’ होता है जिसे ग्रीष्म और पतझड़ की करुणा तथा वसंत की ऊर्जा नजदीक रहते हुए भी अप्राप्य होती है। शायद इसे ही इस तरह कहा जा सकता है कि निर्वासित व्यक्ति का जीवन किसी अन्य पंचांग के अनुसार चलता है और घर की जिन्दगी की तुलना में कम मौसमों वाला और कम स्थिर होता है। परिचित क्रम के बाहर जीवन जीना ही निर्वासन है। इसमें यायावरी, केन्द्रहीनता और विवादी सुरों का समूह होता है लेकिन जैसे ही आप निर्वासन के आदी होने लगते हैं वैसे ही इसकी बिखराव और विस्थापन की शक्ति का दुबारा विस्फोट हो जाता है।
 

यह अनुवाद मूलत: साखी, अंक 13-14 (जुलाई-दिसंबर 2006) में पृष्ठ 312-327 पर प्रकाशित.

सामाजिक वर्गों की पैदाइश और दूसरी कहानियां

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/16/2015 12:15:00 AM


 उरुग्वे में जन्मे और दुनिया भर में जन पक्षधर लेखक-पत्रकार के रूप में मशहूर एदुआर्दो गालेआनो के निधन के बाद उनके लेखन और जीवन के बारे में बहुत कुछ लिखा और पढ़ा जा रहा है. साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों में उनके जाने से एक तरह की उदासी है और कुछ देर की खामोशी, कि एक आवाज जो झूठ और फरेब के मलबे के बीच फावड़े की तरह अपना रास्ता बनाती थी और परचम की तरह गरदन ताने दुनिया का सफर करती थी, अब चुप हो गई. हालांकि उनके शब्द मौजूद हैं, और उन्हीं में से एक इंतखाब यहां पेश है. उनकी किताब एस्पेखोस: उना इस्तोरिया कासी उनिवेर्साल (आईने: करीब करीब हरेक की कहानी) से कुछ अध्याय. स्पेनिश से अनुवाद: रेयाज उल हक.

सामाजिक वर्गों की पैदाइश

शुरुआती दिनों में, भूख के उन दिनों में, पहली औरत मिट्टी कुरेद रही थी कि सूरज की किरनें  पीछे से आकर उसके भीतर दाखिल हो गईं. पल भर में ही, एक बच्चे का जन्म हुआ.

पचाकमाक देवता को सूरज की यह हरकत बिल्कुल पसंद नहीं आई और उसने अभी अभी पैदा हुए बच्चे के टुकड़े टुकड़े कर दिए. उस मरे हुए बच्चे में से पहले पौधे फूटे. दांतों से अनाज के दाने बने, हड्डियां युका बनीं, मांस आलू, यैम और स्क्वैश में तब्दील हुआ...

फिर तो सूरज को बहुत तेज गुस्सा आया. उसकी किरनों ने पेरु के तट को जला डाला और उसे हमेशा के लिए सूखा बना दिया. बदले की आखिरी हरकत के बतौर उसने मिट्टी में तीन अंडे फोड़े.

सुनहरे अंडे से मालिक पैदा हुए.
रुपहले अंडे से मालिकों की औरतें पैदा हुईं.
और तांबे के अंडे से वे पैदा हुए, जो मेहनत करते हैं.

गुलाम और मालिक

काकाओ को सूरज की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उसके पास अपना सूरज था.

उसकी भीतरी चमक से चॉकलेट का मजा और उससे मिलने वाली खुशी बनती थी.

बुलंदी पर रहनेवाले देवताओं ने गाढ़े रोगन पर कब्जा कर लिया और हम इंसान नादानी में रहने के लिए मजबूर कर दिए गए.

केत्जालकोआत्ल ने उसे तोल्तेक्स के लिए चुरा लिया. जब बाकी के देवता सो रहे थे, उसने कुछ बीज लिए और उन्हें अपनी दाढ़ी में छुपा लिया. फिर वो मकड़ी के जाल के एक बड़े से धागे से सहारे धरती पर उतरा और उन बीजों को उसने तुला शर में पेश किया.

केत्जालकोआत्ल के तोहफे को शहजादों, पुजारियों और जंगी सरदारों ने हड़प लिया.

उनकी पसंद को ही पसंद के लायक समझा गया.

और चूंकि जन्नत के मालिकों ने फानी इंसानों के लिए चॉकलेट को हराम ठहराया था, इसलिए धरती के मालिकों ने इसे आम इंसानों के लिए हराम बना दिया.

एक खतरनाक हथियार

तीस से ज्यादा देशों में रिवाज यह है कि (औरतों के यौनांग) क्लिटोरिस को काट कर हटा दिया जाए.

यह खतना पति को अपनी औरत या अपनी औरतों को अपनी जायदाद मानने के अधिकार की तस्दीक करता है.

औरतों का अंग काटने वाले यह कह कर इस जुर्म को जायज ठहराते हैं कि वे औरतों के मजे को पाक बना रहे हैं और वे बताते हैं कि क्लिटोरिस
 
एक जहरीला तीर है
बिच्छू का एक डंक है
दीमकों का खोता है
यह मर्दों को मार डालता है या उन्हें बीमार बनाता है
औरतों को उकसाता है
उनके दूध में जहर घोलता है
और उनकी प्यास को बुझने नहीं देता
और उन्हें पागल बना देता है

 
वे अपनी इस हरकत को जायज ठहराने के लिए पैगंबर मुहम्मद का हवाला देते हैं, जिन्होंने कभी इस मामले में कुछ नहीं कहा. वे कुरान का भी हवाला देते हैं, जबकि उसमें भी इसका कोई जिक्र तक नहीं है.

शैतान गरीब है

आज शहर एक बहुत बड़ी जेल हैं, जिसमें खौफ के कैदी रहते हैं, जहां मोर्चेबंदियों को घरों की शक्ल दी गई है और कपड़े बख्तरों की शक्लें हैं.

एक घेरेबंदी. अपना ध्यान भटकने मत दो, अपनी चौकसी को कभी ढीला मत पड़ने दो, कभी भरोसा मत करो, इस दुनिया के मालिक यह कहते हैं. बेधड़क मालिक जो आबोहवा से बलात्कार करते हैं, देशों को अगवा करते हैं, मजदूरियां छीन लेते हैं और सामूहिक जनसंहार करते हैं. वे चेतावनी देते हैं, खबरदार, बुरे लोग भरे पड़े हैं, बदनसीब झुग्गियों में ठसमठस, अपनी अदावत को अपने भीतर सुलगाते हुए, अपने जख्मों को बेकरारी से कुरदते हुए.

गरीब: हर तरह की गुलामी के लिए एक फटेहाल कंधा, सभी जंगों के लिए लाशें, सभी जेलों के लिए मांस, सभी नौकरियों के लिए मोलभाव के हाथ.

भूख, जो खामोशी से मारती जाती है, खामोश लोगों को भी मार डालती है. विशेषज्ञ उनके लिए बोलते हैं, गरीबी के माहिर, जो हमें बताते हैं कि गरीब क्या नहीं करते हैं, कि वे क्या नहीं खाते हैं, कि वे कितने वजनी नहीं हैं, कि वे किस बुलंदी तक नहीं पहुंच सकते, कि वे क्या नहीं सोचते, कि वे किन पार्टियों को वोट नहीं देते, कि वे किसमें यकीन नहीं करते.

अकेला सवाल, जिसका जवाब नहीं दिया जाता कि गरीब लोग गरीब क्यों हैं. क्या शायद ऐसा इसलिए है कि हम उनकी भूख पर पलते हैं और उनकी बेपर्दगी से अपना तन ढंकते हैं?

शासक और शासित

येरुशेलम का बाइबल कहता है कि बनी इस्राइल खुदा के चुने हुए लोग थे. वे खुदा की औलाद थे.
दूसरी आयत के मुताबिक, चुने हुए लोगों को राज करने के लिए दुनिया बख्शी गई थी:
मुझसे मांगो, और मैं विरासत में तुम्हें काफिर दूंगा, और तुम्हारी मिल्कियत में धरती का सबसे ऊपरी हिस्सा.

लेकिन बनी इस्राइल ने खुदा को बहुत नाराज किया, वे नाशुक्रे और गुनहगार थे. और अनेक धमकियों, बद्दुआओं और सजाओं के बाद खुदा का सब्र तमाम हुआ.

तब से दूसरे लोगों ने तोहफे पर दावा ठोंक रखा है.

सन 1900 में, संयुक्त राज्य के सीनेटर अलबर्ट बेवेरिज ने कहा: 'सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने चुने हुए लोगों के रूप में हमारी निशानदेही की है,  आगे से दुनिया को फिर से पैदा करने में रहनुमाई के लिए.'

मेहनत के बंटवारे की शुरुआत

कहते हैं कि यह राजा मनु थे, जिन्होंने भारत की जातियों को दैवीय बनाया.

उसके मुंह से पुरोहित पैदा हुए. उसकी बांहों से राजा और योद्धा. उसकी जांघों से व्यापारी. उसके पैरों से गुलाम और कारीगर.

और इस बुनियाद पर एक सामाजिक पिरामिड खड़ा हुआ, भारत में जिस पर तीन हजार से ज्यादा कहानियां हैं.

हरेक वहीं पैदा होता है, जहां उसे पैदा होना चाहिए. वही करने के लिए, जो उसे करना चाहिए. पालने में ही कब्र है, पैदाइश ही मंजिल है: हमारी जिंदगियां हमारी पहले की जिंदगियों का मुआवजा हैं या वाजिब सजा और यह विरासत ही हमारी जगह और हमारी भूमिका को तय करती है.

भटकावों को ठीक करने के लिए राजा मनु ने सिफारिश की: 'अगर निचली जाति का कोई इंसान पवित्र ग्रंथों के श्लोकों को सुन लेता है, तो उसके कानों में पिघला हुआ शीशा डाला जाए; और अगर वह उनका पाठ करता है, तो उसकी जीभ काट ली जाए.' ऐसी सीख अब चलन में नहीं है, लेकिन जो कोई भी अपनी जगह से हिलता-डुलता है, प्यार में, काम में, या चाहे जिस भी वजह से, वह सरेआम कोड़ों से पीटे जाने का जोखिम उठाता है, जिसका अंजाम उसे मुर्दा बना सकता है या वह बच भी गया तो मुर्दा ही ज्यादा बचता है.

जातिहीन (अवर्ण) लोग, हरेक पांच में से एक भारतीय, सबसे नीचे हैं. उन्हें 'अछूत' कहा जाता है, क्योंकि उनसे छूत फैलती है: वे घिनौनों में भी घिनौने हैं, वे दूसरों से बात नहीं कर सकते, उनके रास्तों पर चल नहीं सकते, उनका गिलास या प्लेटें नहीं छू सकते. कानून उनकी हिफाजत करता है, लेकिन हकीकत उन्हें छांट कर अलग करती है. मर्दों को कोई भी जलील कर सकता है, औरतों के साथ कोई भी बलात्कार कर सकता है, और सिर्फ तभी ये अछूत, छूने लायक बन जाते हैं.

2004 के आखिर में, जब सुनामी ने भारत के तटों पर रौंद डाला, वे मलबा और लाशें उठा रहे थे.

हमेशा की तरह.

अन्याय की पहली सीख: एदुआर्दो गालेआनो

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/14/2015 02:34:00 AM


 आज एदुआर्दो गालेआनो नहीं रहे। दुनिया में हर तरह के शोषण, गैरबराबरी और नाइंसाफी के खिलाफ लिखने-बोलने वाले इस बहादुर योद्धा पत्रकार और लेखक गालेआनो का एक और लेख। दुनिया जिस ढांचे पर चल रही है और इसके बारे में जो झूठ प्रचारित किया जाता है गालेआनो ने पूरे जीवन अपने लेखन में उसको रेशा रेशा उधेड़ दिया है- चाहे उनकी डायरीनुमा किताबें हों या लातीन अमेरिका (मेमोरीज ऑफ फायर) और दुनिया (मिरर्स) के इतिहास का पुनर्लेखन। उनका लेखन विडंबनाओं और व्यंग्यों का एक लंबा सिलसिला है। यहां पेश लेख यह उनकी किताब पातास आरीबा से लिया गया है। अनुवाद पी. कुमार मंगलम का है। गालेआनो के दूसरे लेखों और साक्षात्कारों को यहां पढ़ा जा सकता है।

रंग-रंगीले विज्ञापन बुलाते हैं कि आओ खरीदो और खर्च करो, वहीँ आज की आर्थिक व्यवस्था यूँ रोकती है, मानो कहती हो, चलो पास भी न फटको! खरीदने-खर्चने के ये बुलावे, जो हम सभी पर थोप दिए गए हैं, ठीक उसी वक्त ज्यादातर लोगों की पहुँच से बाहर भी रखे गए हैं। न्योता देकर दुत्कार देनेवाले बाजारी हिसाब-किताब का कुल जोड़ फिर यह निकलता है कि कुछ और कदम अपराध की तरफ बढ़ जाते हैं। अखबारों में आए दिन छप रही अपराध की ख़बरें हमारे समय की ऐसी ही विडंबनाओं को किसी आर्थिक और राजनीतिक रपट से कहीं ज्यादा उजागर करती हैं!

अपने बाजारी सज-धज की दावत में यह दुनिया सबको मोहती और बुलाती तो है, लेकिन बहुतों के लिये अपना दरवाजा बंद ही रखती है। इस तरह, यहाँ एक ही समय बराबरी और गैरबराबरी दोनों का खेल खेला जाता है। सभी को एक ही तरह की सोच और आदतों में ढालते हुए जहाँ ‘बराबरी’ का डंडा चलाया जाता है, वहीं बात जब सबको समान अवसर देने की आती है, तो यहाँ मौजूद गैरबराबरी छिपाए नहीं छिपती!

‘बराबरी’ का डंडा और गैरबराबरी

सिर्फ खरीदने और खर्च कर देने का हुक्म देनेवाली सोच आज हम सब पर बुरी तरह हावी है। पूरी दुनिया में आज जो गैरबराबरी की ‘व्यवस्था’ कायम की जा रही है, वह इस सोच से अलग देखी ही नहीं जा सकती। इस तरह एक-दुसरे की जड़ें सेंकती और चेहरा बनाती-छुपाती इन दो जुड़वा बहनों की हुकूमत बिना किसी भेदभाव के हम सब के ऊपर थोप दी गयी है।

सबको एक जैसा बना देने पर तुली यह पूरी व्यवस्था इंसानियत के सबसे खूबसरत अहसास को ख़त्म किए दे रही है। वही अहसास जिसके हम सबमें मौजूद कई-कई रंग आपस में कहीं गहरे जुड़े भी हुए हैं। आखिर, इस दुनिया का सबसे बड़ा खजाना इसी एक दुनिया में बसी बहुत सारी अलग-अलग दुनियायें ही तो हैं, जिनके अपने अलग-अलग संगीत, दुख-दर्द, रंग, जीवन जीने, कुछ कहने, सोचने, कुछ बनाने, खाने, काम करने, नाचने, खेलने, प्यार करने, पीड़ा झेलने और खुशी मनाने के हजारों तरीके हैं, जिन्हें हमने धरती पर अपने लाखों साल के सफर में ढूंढ़ा है।

हम सबको सिर्फ मुंह बाए तमाशा देखते रहने वालों में तब्दील कर देने वाली ‘बराबर’ व्यवस्था किसी हिसाब में नहीं समाती। ऐसा कोई कम्प्यूटर नहीं बना, जो यह बता सके कि कैसे ‘मास कल्चर’ का कारोबार हमारी सतरंगी दुनियाओं और अस्मिता के बिलकुल बुनियादी हक़ पर रोज ही हमले कर रहा है। हकीकत, हालांकि, यही है कि इस कारोबार के टूजी-थ्रीजी फाड़[1]  ‘तरक्की’ ने हमारा देखना-सोचना ख़त्म कर दिया है। हाल यह है की समय अपने इतिहास से तथा जगहें अपनी अद्भुत विविधताओं से खाली और अनजान होने लग गई हैं। दुनिया के मालिक लोग, माने वही जिनके पास संचार-सूचना के ‘बड़े’ माध्यमों की लगाम है, हमें खुद को हमेशा एक ही आईने में देखते रहने की हिदायत देते हैं। वही आईना, जहां दूसरी तरफ से सिर्फ खरीदने और खर्च डालने की सीखें निकलती हैं।

जिसके पास कुछ नहीं है, वह कुछ नहीं है। जिनके पास कार नहीं है, जो ब्रांडेड जूते या विदेशी परफ्यूम इस्तेमाल नहीं करते वे तो जीने का दिखावा ही कर रहे हैं। आयात पर पलती अर्थव्यवस्था और पाखण्ड फैलाती संस्कृति! ऐसे ही बकवासों के राज में हम सभी ठेल-ठेलकर एक बड़े और भड़कीले जहाज पर बिठा दिए गए हैं। उपभोक्तावाद का पाठ रटाता यह जहाज बाजार की उठती-मचलती लहरें नापता है। जाहिर है, ज्यादातर लोग इस जहाज से बाहर फेंक दिए जाने को अभिशप्त हैं। लेकिन सफर का पूरा मजा लेने वालों का खर्च, जो विदेशी कर्जे लेकर चुकाया जाता है, सबके मत्थे चढ़ता है। कर्जे की रकम से यह इंतजाम किया जाता है कि एक बहुत ही छोटा-सिमटा तबका अपने-आप को ‘नए फैशन’ की तमाम गैरजरूरी चीजों से भर ले। यह हमारे उस मध्यवर्ग के लिए होती है, जो कुछ भी खरीद कर ‘बड़ा’ और हाई-फाई दिख जाना चाहता है। और उस ऊँचे तबके के लिए भी, जो अपने जैसे लोगों की नकल कर उनसे भी ऊँचा हो जाने की जुगत भिड़ाए रहता है। फिर टीवी तो है ही इन सारे तबकों को यह भरोसा देने के लिए कि वे तमाम मांगें कितनी जरुरी है जो, दरअसल, दुनिया का उत्तर बिना रूके बनाता और पूरी कामयाबी से दक्षिणी हिस्से को भेजता रहता है।[2]

लातिन अमेरिका के उन करोड़ों बच्चों के इस जिंदगी के क्या मायने हैं जो इस पूरे दौर में बड़े हो रहे हैं और बेकारी और भुखमरी देखने के लिये जवान हो रहे हैं। विज्ञापनों दुनिया विचित्र दुनिया। मांग बढ़ाती है या हिंसा? टेलीविजन भी बाजार को अपनी पूरी सेवा देता है। यह हमें सामानों के विज्ञापन के ढेर बिठाकर हमें जिंदगी के अच्छी-भली चलने का भ्रम पालना सिखाता है, साथ ही रोज हिंसा की ऑडियोविजुअल’खुराक भी देता है। जिसकी लत ‘विडियोगेम्स’ से हमें पहले ही लग चुकी होती है। अपराध टी।वी। पर आने वाला सबसे मनोरंजक कार्यक्रम बन गया है। विडियोगेम्स की हिंसा से भरी दुनिया हमें रोज और ज्यादा हिंसक और बर्बर होने के नए मंत्र देती है। जैसे कि ‘मारो उन्हें, इससे पहले कि वे तुम्हें मारें’ या ‘आप अकेले हैं, सिर्फ खुद पर भरोसा करें’। इस सब उथल-पुथल की गवाह बन रहे आधुनिक शहर बढ़ रहे हैं। लातिन अमेरिका के शहर बढ़कर दुनिया के बड़े शहरों में शुमार हो रहे हैं। बढ़तो शहरों के साथ अपराध भी उससे या उससे कहीं ज्यादा घबरा देने वाली, रफ्तार से बढ़ रहे हैं।

आज की आर्थिक व्यवस्था को बढ़ते उत्पादन की खपत और फायदा बनाए रखने के लिये बाजार बढ़ाते जाने की जरूरत है। साथ ही लागत कम बनाए रखने के लिये यह सबसे सस्ते मजदूर और कच्चा माल भी चाहता है। यह अंतर्विरोध ही बाजार का मूलमंत्र है जो हम हर दिन बढ़ते दामों और मजदूरों को उनकी न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दिये जाने के आम होते मामलों में देख सकते हैं। यह अंतर्विरोध ही दुनिया के दो गैरबराबर हिस्सों में बंटे रहने के मूल में है, जब विकसित उत्तरी भाग साम्राज्यवाद दक्षिणी और पूर्वी भागों को अपनी कंपनियों के लिये खरीदार बना रहा है। यह साम्राज्यवाद का नया रूप है जो बड़े और विकसित देशों की बाजारवादी धौंस से जाहिर होता है। खरीददार बढ़ाते रहने की इस अंधाधुन्ध रफ्तार से बढ़ाया है तो तो सिर्फ हाशिये पर खड़े लोगों की संख्या जो अपराधी बनने को मजबूर है। सब कुछ खरीद लेने की इस सनक में हर आदमी वो सब कुछ खरीद लेना चाहता है, जो वह दूसरों के पास देखता है और इसके लिये उसे हिंसा से भी कोई परहेज नहीं है। सभी इस आपधापी और मुठभेड़ के लिये खुद को तैयार कर रहे हैं। कोई भी कभी भी मार दिया जा सकता है, वे लोग जो भूख से मर रहे हैं और वे भी जिनके पास खाने को जरूरत से ज्यादा है।

सांस्कृतिक विविधताओं को खत्म कर सबको एक जैसा खरीदार बना देने की यह पूरी प्रक्रिया कैसे काम कर रही है, इसे आंकडों से नहीं दिखाया जा सकता। हालांकि इसके उलट व्यवस्था की आर्थिक गैरबराबरी बयां करने को कई आंकड़े हैं। हम इसे देख सकते हैं। इस पूरी व्यवस्था को बनाए रखने के लिये विश्वबैंक इस कड़वी सच्चाई को स्वीकारता है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र के कई संगठन भी इसकी पुष्टि करते हैं। दुनिया की अर्थव्यवस्था कभी भी इतनी गैरबराबरी बढ़ाने वाली नहीं रही और न कभी दुनिया इतनी क्रूर अन्याय की गवाह बनी थी। 1960 में दुनिया की आबादी का सबसे धनी 20 फीसदी हिस्सा सबसे गरीब 20 फीसदी के मुकाबले 30 गुना ज्यादा धनी और साधन सम्पन्न था। इसके बाद तो यह खाई और चैड़ी होती रही है। सन 2000 तक यह अंतर बढ़कर 90 गुना हो जाएगा।

अनुवादकीय टिप्पणी

1. मूल लेख में “demoledores progresos” phrase का उपयोग हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ विध्वंसक विकास होगा। लेकिन भारत के सन्दर्भ में बात को और मौजूं बनाने के लिए “टूजी-थ्रीजी फाड़ तरक्की” का प्रयोग किया गया है।
2. उत्तर और दक्षिण से यहां तात्पर्य धरती पर मौजूद संसाधनों के वितरण से है और यह सभी मामलों में भौगोलिक संकल्पना नहीं है।

‘मर्द’ तैयार करती सोच की पहली सीख: एदुआर्दो गालेआनो

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/13/2015 08:16:00 PM


आज उरुग्वे निवासी, लातीन अमेरिकी लेखक-पत्रकार एदुआर्दो गालेआनो का निधन हो गया. वे लेखकीय और पत्रकारीय साहस की मिसाल थे. राजकीय दमन को बहुत करीब से देखने वाले, प्रतिरोध और जनसंघर्षों के साथ अडिग रूप से खड़े और बदलाव की उम्मीद को हमेशा जिंदा रखनेवाले और गालेआनो का जाना मायूस कर देनेवाला है. उनके निधन पर उनकी किताब पातास आरीबा (अपसाइड डाउन) का एक अंश। इस किताब का अनुवाद अनुवाद जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में लातीनी अमरीकी साहित्य के शोधार्थी पी. कुमार मंगलम कर रहे हैं। साथ में दिए गए नोट्स अनुवादक के हैं।

नजरिया 1

जरा सोचिए अगर ईसाई उपदेश धर्मप्रचारिकाओं की कलम से निकले होते तो क्या होता! ईसा युग की पहली रात का बखान कैसे होता? उनकी कलम यही बताती कि संत खोसे उस रात कुछ उखड़े-उखड़े से थे। भीड़भाड़ और होहल्ले से भरी उस जगह में घास-फूस और पंखों के पालने में झुलते नवजात ईसा के करीब होकर भी वह अनमने ही बने रहे। वर्जिन मेरी, फरीश्तों, चरवाहों, भेड़ों, बैलों, खच्चरों, पूरब से आए जादूगरों और बेलेन तक का रास्ता दिखाते सितारे के मदमस्त झुंड में वह अकेले ही, उदास खड़े थे। कुरेदे जाने पर कुछ अस्पष्ट-सी आवाज़ में उन्होंने कहा: “मुझे तो एक बच्ची चाहिए थी”!


नजरिया 2

क्या होता अगर हव्वा ने जेनेसिस[1] लिखी होती! इंसानी सफर की पहली रात तब कैसी होती ! उसने किताब की शुरुआत ही यह बताते हुए की होती कि वह न तो किसी जानवर की हड्डी से पैदा हुई थी न ही वह किसी सांप को जानती थी; उसने किसी को सेब भी नहीं दिए थे। ईश्वर ने उससे यह नहीं कह था कि बच्चा जनते समय उसे दर्द होगा और उसका पति उसपर हुकूमत करेगा। वह बताती कि यह सब तो सिर्फ़ झूठ और झूठ है जिसे आदम ने प्रेसवालों को बताकर ‘इतिहास’ और ‘सच’ का रूप दे दिया था।

‘‘अरे छोड़ो भाई, ये सब औरतों की बाते हैं।’’ अक्सर हम यह कह-सुन लेते हैं। दुनिया में रंगभेद और मर्दों की हुकूमत का सिलसिला साथ ही शुरू हुआ और चलता रहा है। अपनी धमक बनाए रखने के उनके दावे-हवाले भी एक जैसे ही होते हैं। इस दोहरे लेकिन घुले-मिले खेल को उजागर करते एउखेनिओ राउल साफ्फारोनि स्पेन में 1546[2]  में बने कानून ‘एल मार्तिल्यो दे लास ब्रुखास’ का हवाला देते हैं। ‘डायन’ करार दी गई औरतों को ‘ठीक’ करने वाला यह फरमान बाद में आधी आबादी के खिलाफ़ कई कानूनों का आधार बना। वह यह भी बताते हैं कि धर्म-ईमान के ‘पहरेदारों’ ने कैसे यह पूरा पोथा ही औरतों पर जुल्म को जायज़ ठहराने और मर्दों के मुकाबले उनकी  ‘कमजोरी’ बार-बार साबित करने के लिए लिख डाला था!

वैसे भी, बाइबिल और यूनानी किस्सों-कहावतों के जमाने से ही औरतों को कमतर बताने-बनाए जाने की शुरुआत हो चुकी थी। तभी से यह याद दिलाया जाता रहा है कि वो हव्वा ही थी जिसकी बेवकूफी ने इंसान को स्वर्ग से धरती पर ला पटका। और, दुनिया को मुसीबतों से भर देने वाले पिटारे का ठीकरा भी एक औरत पांडोरा पर ही फोड़ा जाता है। अपने चेलों को संत पाब्लो यही सबक रटाया करते थे कि ‘‘औरत के शरीर का एक ही हिस्सा मर्दों वाला होता है, और वह है उसका दिमाग’’! वहीं, उनसे उन्नीस सौ साल बाद सामाजिक मनोविज्ञान के आरंभकर्ताओं में रहे गुस्ताव ले गोन भी इसी धूर्त खेल को बढ़ाते रहे। और तो और, वह यह भी फरमा गए कि ‘‘किसी औरत का अक्लमंद होना उतना ही अजूबा है, जितना दो सिरों वाले चिम्पांजी का पाया जाना ’’!  घटनाओं का अंदाजा लगा सकने की औरतों की खूबियां गिनाने वाले चार्ल्स डार्विन भी इसे ‘नीची’ नस्ल की खासियत ही बताते रहे।

अमरीकी महादेशों पर यूरोपीय हमलों के समय से ही वहां समलैंगिकों को मर्दानगी के ‘कुदरती ढांचों’ के खिलाफ़ ठहरा दिया गया था। अपने नाम से ही पुरूष जान पड़ते ईसाई भगवान के लिए मूलवासियों में मर्दों का औरतों की तरह होना सबसे बड़ा पाप था। ऐसे  ईश्वर के ‘सभ्य’ सेवकों के लिए मूलवासी मर्द “बिना स्तन और प्रजनन क्षमता वाली स्त्री” ही रहे। इसी वजह से कि वे व्यवस्था के लिए जरूरी मजदूर नहीं पैदा करतीं, आजकल भी समलैंगिक औरतें ‘स्त्री’ होने के ‘कायदों’ के उलट बता दी जाती हैं।

गढ़ी और बार-बार दुहराई गई धारणाओं में एक औरत बच्चे पैदा करने, नशेड़ियों को आनंद देने और ‘महात्माओं’ के पापों को अपनी चुप्पी से ढंकने वाली ही रही है। यही नहीं, वह मूलवासियों और अश्वेतों की तरह ही स्वभाव से पिछड़ी भी बताई जाती रही है। आश्चर्य नहीं कि इन्हीं तबकों की तरह वह भी इतिहास के हाशिए पर फेंक दी गई है! अमरीकी  महादेशों के सरकारी इतिहास में आज़ादी के ‘महान’ जंगबाजों की मांओं और विधवा औरतों की बहुत धुंधली मौजूदगी यही साबित करती है। इस इतिहास में मर्द नए मुल्कों के झंडों की अगुवाई हासिल करते हैं और औरतों को कढ़ाई और मातम की घरेलू सीमाओं में बांध दिया गया है।

यही इतिहास यूरोपीय हमलों में आगे-आगे रही औरतों और फिर आज़ादी की लड़ाईयों की क्रियोल[3] महिला योद्धाओं को विरले ही याद करता है। युद्ध और मार-काट का बखान करने वाले इतिहासकार इन औरतों की ‘मर्दाना’ बहादुरी का जिक्र तो कर ही सकते थे![4] इतना ही नहीं, गुलामी के खिलाफ़ खड़ी हुई अनगिनत मूलवासी और अश्वेत नायिकाओं का तो यहां कोई जिक्र ही नहीं है। इतिहास से गायब कर दी गईं इनकी आवाज़ें कभी-कभार और अचानक ही किसी जादू की तरह सामने आती, बहुत कुछ कह जाती हैं। मसलन, हाल ही में सूरीनाम पर लिखी एक किताब पढ़ते हुए,  मैंने मुक्त हुए गुलामों की नेता काला को जाना। पूजे जाने वाले अपने डंडे से वह दूर-दूर से भाग कर आते गुलामों की अगुवाई किया करती थी। उसकी एक और खास बात यह लगी कि उसने अपने निहायत ही नीरस पति को छोड़ा और पीट-पीट कर मार डाला था।

अश्वेतों और मूलवासियों की तरह ही औरत का ‘पिछड़ापन’ भी सभी तरह से साबित कर दिया गया है।  हालांकि, वह एक संभावित “खतरा” भी रही है। ‘‘भाई, एक औरत की तमाम अच्छाइयों से एक मर्द की बुराई कहीं अच्छी’’, यह सीख ईसाई गुरू एक्लेसियास्तेस की थी! वहीं, सुनी-सुनाई कहानियां यही गाती आई हैं कि यूनानी लड़ाका उलिसेस कैसे मर्दों को भरमाने वाली सुरीली आवाज़ों को बखूबी भांप लेता था। वहां सभी मानते थे कि ये आवाज़ें जलपरी का रूप धर मर्दों को गायब करने वाली औरतों की ही होती हैं। हथियारों और शब्दों पर मर्दों का कब्जा जायज़ ठहराती ऐसी ही रीतियों की दुनिया में कोई कमी नहीं है। फिर, उन्हें नीचा दिखाए जाने या एक खतरा बताए जाने की हामी भरने वाली मान्यताएं भी अनगिनत हैं। पीढ़ियों से चले आ रहे मुहावरे सबक देते हैं: ‘‘औरत और झूठ इस दुनिया में एक ही दिन आए थे’’। यह और जोड़ा जाता है कि ‘‘औरत के बात की कीमत एक रत्ती भी नहीं होती’’ । ऐसे ही विश्वासों के साथ पले-बढ़े लातीनी अमरीकी किसान  मानते आए हैं कि रात में राहगीरों पर घात लगाए, बदले की प्यासी बुरी आत्माएं औरतों की ही होती हैं। बातों से होकर चौकन्नी आंखों और सपनों तक पसरे इन भ्रमजालों का आखिर मतलब क्या है! यह सब कुछ आनंद और सत्ता के मौकों पर औरतों के संभावित दावे से उपजती मर्दाना बेचैनी ही जाहिर करता है।

बात की बात में ‘डायन’  बतलाकर सरेआम मार दिया जाना औरतों की नियति रही है। और यह स्पेनी ‘धर्म अदालतों’ तक ही सीमित नहीं रहा है। अपनी यौनिकता और, सबसे बढ़कर, इसका अपनी मर्जी से इस्तेमाल कर सकने की संभावनाएं औरतों को बौखलाई निगाहों, धमकियों और कड़वे बोल का ‘तोहफ़ा’ देती आई हैं। तमाम पहरों-पाबंदियों से छिटकती ऐसी ‘विस्फोटक’[5] संभावनाओं को कुचलने के उपाय भी सदियों पुराने हैं। इनका हौवा खड़ा कर औरतों को शैतान का रूप बताया जाना, इसी सिलसिले की शुरुआत है। फिर, मानो यह दिखाते हुए कि आग की सजा आग ही होती है, इन ‘गंदी’ औरतों को ईश्वर की ‘मर्जी’ से जिंदा भी जलाया जाता रहा है।

इस तरह की तमाम करतूतों में जाहिर होती बौखलाहट को यही डर हवा देता आया है कि औरत भी जिंदगी खुल कर और मजे से जी सकती है।  सालों-साल से अलग-अलग जगहों की कई संस्कृतियों में दुहराई गई एक खास मान्यता के मायने कुछ यही हैं। योनि को मुंह फाड़े किसी भयंकर मछली की तरह पेश करता इसका ‘सच’ यह सिखाता है: "औरत तो नरक का द्वार होती है"[6]।और आज भी जब एक सदी खत्म होकर नई शुरू हो चुकी है, करोड़ों औरतों के यौनांगों पर हमला बदस्तूर जारी है।

ऐसी कोई भी औरत नहीं मिलेगी जिसपर बुरी “चाल-चलन” का ठप्पा न लगा हो। लातीनी अमरीका के लोकप्रिय नृत्यों बोलेरो और तांगो में सभी औरतें धोखेबाज और वेश्या (मां को छोड़कर) ही रही हैं। वहीं, दुनिया के दक्षिणी देशों में हर तीसरी शादीशुदा औरत रोज़ाना घरेलू हिंसा झेलती है। “सात जन्मों के बंधन” का यह ‘तोहफ़ा’ उसे उन सब कामों की सजा देता है, जो वह करती है या फिर कर सकती है।

मोंतेवीदियो[7] की बस्ती कासाबाये की एक मजदूरिन बताती है :

“सोते में ही किसी बड़े घर का लड़का आकर हमें चूमता और हमारे साथ सोता है। जगने पर वही हमें मारता-दुत्कारता है”।
 

वहीं, दूसरी कहती है:

“मुझे अपनी मां से डर लगता है, मेरी मां भी मेरी नानी से डरा करती थी।”

समाज और परिवार में ‘संपत्ति के अधिकार’ को मनवा लिए जाने की ऐसी मिसालें और भी हैं। जैसे,  मार-पीटकर औरत  पर अपनी हुकूमत चलाते मर्द  और बच्चों पर अपनी जबर्दस्ती थोपते औरत-मर्द दोनों। और क्या बलात्कार इसी हुकूमत को मनवा लेने की सबसे हिंसक और खौफ़नाक नुमाईश नहीं है?

एक बलात्कारी को सिर्फ आनन्द नहीं चाहिए। वह तो उसे मिलता भी नहीं। उसे चाहिए औरत के शरीर पर अपना पूरा और मनमाना कब्जा। हर बार और बर्बर होता बलात्कार अपने शिकारों की देह पर संपत्ति के ऐसे ही दावों के कभी न भरने वाले घाव छोड़ जाता है। और, यह हमेशा से तीर, तलवार, बंदूक, मिसाइल और दूसरे साजो-सामान के साथ चले सत्ता के मर्दाना खेल का सबसे भयानक चेहरा है। संयुक्त राज्य अमेरिका में हर छ्ह मिनट और मेक्सिको में हर नौ मिनट में एक औरत सत्ता का यह ‘अधिकार’ झेलती है। मेक्सिको की एक महिला कहती हैं:

‘‘बलात्कार का शिकार होना और किसी गाड़ी के नीचे आ जाना एक बराबर ही है, सिवाय इसके कि बलात्कार के बाद मर्द यह पूछते हैं कि जो हुआ उन्हें पसंद आया कि नहीं।’’

आंकड़ों से बलात्कार के सिर्फ़ उन मामलों का पता चलता है, जिनकी रपट लिखाई जाती है। लातीनी अमरीका में ऐसे मामले सच्चाई के आंकड़ों से हमेशा बहुत कम होते हैं। बलात्कार झेलने वाली ज्यादातर औरतें तो डर की वजह से चुप रह जाती हैं। अपने ही घर में  बलात्कार का शिकार हुई बच्चियां  ‘अवैध’ संतानों को किसी सड़क पर जन्म देती हैं। यहीं पलने वाले लड़कों की तरह, इन ‘सस्ती’ देहों का आसरा भी यह सड़कें ही रह जाती हैं। रियो दी जानेइरो[8]  की गलियों में "भगवान भरोसे" पली-बढ़ी चौदह साल की लेलिया बताती है:

“हाल यह है कि चारों ओर लूट है। मैं किसी को लूटती हूं, और कोई मुझे।“

देह बेचने के एवज में लेलिया को या तो बहुत कम मिलता है या फिर मिलती है सिर्फ़ मार और दुत्कार।  और जब कभी गुजारे की गरज से वह चोरी करती है, तब पुलिस उससे वह भी  झपट लेने के अलावा उसकी इज्जत भी लूटती है। मेक्सिको सिटी[9] की गलियों में भटकते हुए बड़ी हुई सोलह साल की आंखेलिका बताती है:

‘‘मेरे यह बताने पर कि मेरा भाई मेरा शारीरिक शोषण कर रहा है, मां ने मुझे ही घर से बाहर कर दिया। अब मैं एक लड़के के साथ रह रही हूं और पेट से हूं। वह कहता है कि अगर लड़का हुआ तो  मेरी मदद करेगा। लड़की होने की सूरत में उसने कुछ भी वायदा नहीं किया।’’

यूनिसेफ[10] की निदेशिका का मानना है: ‘‘आज की दुनिया में लड़की होना खतरों से खाली नहीं है”। यहां वह नारीवादी  आंदोलनों की तमाम सफल मांगों के बावजूद बचपन से ही  औरतों के खिलाफ़ चले मारपीट और भेदभाव को भी सामने लाती हैं। 1995 में बीजिंग में स्त्री-अधिकारों पर हुई अंतर्राष्ट्रीय बैठक में यह बात खुली कि एक ही काम के एवज में उन्हें मर्दों के मुकाबले तिहाई मजदूरी ही मिलती है। किन्हीं दस गरीबों में सात तो औरतें ही होती हैं, वहीं सौ में से बमुश्किल एक  के पास कोई संपत्ति होती है। यह सब ‘तरक्की’ और ‘खुशहाली’ के रास्ते पर इंसानियत की अधूरी उड़ान ही जाहिर करता है।  वहीं, संसदों की बात करें तो औसतन दस सांसदों में एक  और कहीं-कहीं तो एक भी महिला सांसद नहीं है।

जब औरतों की जगह घर, कारखानों तथा  दफ्तरों में थोड़ी-बहुत  और रसोई घर तथा बिस्तर में पूरी तरह पक्की कर दी गई है, सत्ता और युद्ध की चाभी मर्दों के हाथ ही है। ऐसे में यूनिसेफ की निदेशिका कारोल बेल्लामी जैसी मिसालें इक्का-दुक्का ही हैं। संयुक्त राष्ट्र समानता के अधिकारों की बात करता है, उसे खुद के ऊपर लागू नहीं करता। दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत में हर दस अहम पदों में आठ पर मर्द काबिज हैं।

अनुवादक के नोट्स

1. बाईबिल की पहली किताब
2. यह मध्ययुग में कायम रहे तथाकथित धर्म अदालतों ‘इन्किसिसीयोन’ के दौर की बात है। ये कचहरियां नए ईसाई बने मुस्लिमों और यहूदियों की ‘पवित्रता’ जांचने के साथ-साथ ‘अधर्मियो’ की पहचान कर उन्हें सजा भी देती थीं।
3. लातीनी अमरीका में गुलामी के दौर में स्पेनी, पुर्तगाली, मूलवासी और अफ्रीकी समुदायों के मेल से कई जाति और उपजातियां बनी थीं। ‘शुद्ध’ यूरोपीय खून के अपने दावे के साथ क्रियोल खुद को इस बहुरंगी सामाजिक सीढ़ी के सबसे ऊपर रखते थे।
4. ठीक उसी तरह जैसे झांसी की रानी की वीरता समझने-समझाने के लिए उनकी बहादुरी को मर्दाना होने का तमगा दिया जाता रहा है। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता बताती है: "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी"
5. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, हिंदू लड़कियों व मुस्लिम लड़कों की शादियों को देश की एकता-अखंडता के लिए गंभीर खतरा मानने वाले बाबू बजरंगी ने यह बयान दिया था "हिंदू घरों में बैठी हर कुंवारी लड़की एक बम है जो अपनी मर्जी से चल जाए तो हिंदू समाज के लिए बड़ा खतरा है"।
6. हाल में बिहार में लोगों की जुबान पर चढ़े एक गाने के बोल थे "मिस काल करताड़ु किस/देबू का हो, अपना मशीनिया में पीस देबू का हो"।
7. लातीनी अमरीकी देश उरुग्वे की राजधानी।
8. ब्राजील का सबसे बड़ा शहर
9. लातीनी अमरीकी देश मेक्सिको की राजधानी
10. UNICEF (UNITED NATIONS CHILDREN EMERGENCY FUND) संयुक्त राष्ट्र की एक महत्वपूर्ण संस्था जो बच्चों के हित में काम करती है।

'हिंदू राज को रोकना होगा'- बाबासाहेब आंबेडकर

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/13/2015 12:41:00 AM


आरएसएस, भाजपा और भारतीय राज्य एक बार फिर बाबासाहेब आंबेडकर को अपनी राजनीति को जायज ठहराने के लिए उनको 'अपनाने' की कोशिश कर रहा है. उन्हें एक 'हिंदू राष्ट्रवादी' बताना इसी साजिश का हिस्सा है. लेकिन जातियों के उन्मूलन और ब्राह्मणवाद के ध्वंस के लिए लड़ने वाले  बाबासाहेब का जीवन, चिंतन, उनके संघर्ष और उनका लेखन उन सभी चीजों के खिलाफ खड़ा है, जिनका प्रतिनिधित्व संघ, भाजपा या भारतीय राज्य करते हैं. मिसाल के लिए देखिए कि उन्होंने हिंदू राज के बारे में क्या कहा था. उनकी किताब पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इंडिया से. बाबासाहेब की जयंती पर उन्हें याद करते हुए.

''अगर हिंदू राज असलियत बन जाता है, तो इसमें संदेह नहीं कि यह इस देश के लिए सबसे बड़ी तबाही होगी. हिंदू चाहे जो कहें, हिंदू धर्म स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे के लिए खतरा है. इस लिहाज से यह लोकतंत्र के साथ नहीं चल सकता. हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोकना होगा.''- डॉ. बी.आर. आंबेडकर

पवित्र गाय और भाजपा की पवित्रता की सनक

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/10/2015 09:19:00 AM


आनंद तेलतुंबड़े

चर्चों पर हमले, 'घर वापसी' के रूप में चालबाजी से भरे धर्मांतरण, हिंदू धर्म को बचाने के लिए अनेक बच्चे पैदा करने के उपदेशों और मुसलमानों पर लगातार हमलों और उनको अपमानित करने जैसे कदमों की एक लंबी फेहरिश्त में, विकास-केंद्रित भाजपा ने अब अपने हिंदुत्व के पिटारे से 'पवित्र गाय' को भी इसमें जोड़ दिया है.  3 मार्च को महाराष्ट्र सरकार को इसके उस कठोर विधेयक पर राष्ट्रपति की सहमति मिल गई, जिसमें गाय और इसके वंश की न सिर्फ हत्या करने पर बल्कि किसी भी रूप में उनके मांस को रखने पर भी सजा का प्रावधान है. असल में, महाराष्ट्र में हमेशा से ही गाय के मांस की कुछ किस्मों पर पाबंदी और रोकथाम रही है. महाराष्ट्र एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट 1976 नामक कानून में गाय की हत्या पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई थी, जिसमें दूसरे जानवरों और उनके वंश की हत्या पर नियंत्रण है. 1995 में, भाजपा-शिवसेना सरकार ने इस अधिनियम में संशोधन पारित किया और गाय के पूरे परिवार और नर और मादा समेत भैंस के बछड़ों को प्रतिबंधित सूची में शामिल कर लिया और उसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा. हालांकि न तो केंद्र में उसके बाद आई राजग समेत किसी भी सरकार ने, और न ही अगले 15 वर्षों में राज्य में बनी कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों ने इस पर अमल किया. अब जब भाजपा ने राज्य और केंद्र दोनों ही जगहों पर सत्ता पर कब्जा कर लिया है, तो विधेयक को इसके विवादास्पद और कठोर प्रावधानों के बावजूद बड़ी आसानी से लागू कर दिया गया है. इसने हिंदुत्व गिरोह के शासन वाले राज्यों में एक होड़ पैदा कर दी है और हरियाणा तो गाय की हत्या को इंसान की हत्या के बराबर रखने का प्रस्ताव भी ला चुका है.

ऐसे कानून, लोग जो चाहते हैं उसे खाने के बुनियादी जनवादी अधिकार का उल्लंघन तो करते ही हैं, साथ ही साथ ऐसे कानून सचमुच आर्थिक तबाही ला सकते हैं, यह बात बहुत कम महसूस की जाती है. एक देश जहां 18.30 लाख बच्चे अपने पांचवे जन्मदिन से पहले मर जाते हैं, जहां हर दिन दो दलितों की हत्या की जाती है, जहां हर साल हजारों किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं, जहां सांप्रदायिक हिंसा में सालाना औसतन 130 लोग मारे जाते हैं और जहां जन विरोधी नीतियों में नहित हिंसा से दसियों लाख लोग पीड़ित हैं, वहां गाय कैसे एक भारी प्राथमिकता में आ सकती है? यह गरीब गाय कब एक पवित्र गाय बन गई? जहां एक तरफ यह सही है कि हम जिन बुराइयों का सामना कर रहे हैं, उनकी जड़ें हमारे बहुप्रशंसित संविधान में हैं, लेकिन क्या यह प्रतिबंध भी संवैधानिक है? क्या परंपरागत रूप से पेश की जानेवाली हिंदू बहुसंख्या जैसी कोई चीज सचमुच वजूद में है, जबकि यह तथ्य बना हुआ है कि हिंदू और कुछ नहीं बल्कि जातियों का एक झुंड है जो भारत को अल्पसंख्यकों का एक देश बनाता है.

पवित्र गाय का मिथक

हिंदू गाय का मांस खाते हैं या नहीं, इसका निर्णायक जवाब बाबासाहेब ने अपनी रिडल्स ऑफ हिंदुइज्म (हिंदू धर्म की पहेली) में दिया है. ऋग्वेद में दूध देने वाली गाय हत्या के योग्य नहीं (अघन्य) थी. भारतीय-आर्य जैसे प्राचीन खेतिहर समुदायों में गाय संपदा का प्रतीक थी और इस तरह उसे आदर दिया जाता था और पूज्य माना जाता था. हालांकि यह उपयोगिता और आदर आर्य लोगों को खाने के मकसद से गाय की हत्या करने से नहीं रोकती थी. बल्कि गाय की हत्या इसी लिए की जाती थी कि वह पवित्र थी. आंबेडकर ने पांडुरंग वामन काणे को उद्धृत किया है जिन्होंने मराठी में धर्मशास्त्र विचार लिखा था: 'ऐसा नहीं है कि वैदिक युग में गाय पवित्र नहीं थी, यह उसकी पवित्रता ही थी कि वजसनेयी संहिता में यह व्यवस्था दी गई कि गोमांस खाया जाना चाहिए.' आपस्तंब धर्म सूत्र (15, 14, 29) भी कहता है: 'गाय और बैल पवित्र हैं और इसलिए उन्हें खाया जाना चाहिए.' ऋग्वेद के आर्य खाने के मकसद से गायों को तलवार या कुल्हाड़ी से मारते थे और गोमांस खाते थे कि नहीं,  यह बात खुद ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं से साफ हो जाती है. अहम मेहमानों के आने पर उनकी खातिर करने के प्राचीन तरीके में मधुपर्क शामिल था, जिसमें बुनियादी तौर पर गोमांस शामिल है. मेहमानों के लिए गायों की हत्या इस सीमा तक बढ़ चुकी थी कि मेहमानों को 'गोघ्न' यानी गाय का हत्यारा भी कहा जाने लगा था. यह बात कि अतीत में हिंदू गायों की हत्या करते और गोमांस खाते थे, उसका भरपूर वर्णन बौद्ध सूत्रों में दिए गए यज्ञों के वर्णन से साबित होता है, जो वेदों और ब्राह्मण ग्रंथों से कहीं बाद के काल से ताल्लुक रखते हैं.

एक और जानेमाने विद्वान डीडी कोसंबी ने अपनी किताब प्राचीन भारत (1965) में लिखा कि क्यों 'एक आधुनिक रूढ़िवादी हिंदू गोमांस खाने को इंसान का मांस खाने जैसा मानता है, जबकि वैदिक ब्राह्मण बलि पर चढ़ाए गए गोमांस के भरपूर भोजन को खा खाकर मोटे होते थे.' यहां तक कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन वे अपनी रचना 'रिलीजन एंड सोसायटी' में यह कबूल किया है कि प्राचीन काल में ब्राह्मणों द्वारा भी मांस खाया जाता था और सिर्फ बौद्ध, जैन और वैष्णव धर्मों के प्रभाव में यह चलन खत्म हुआ. असल में, अनेक दूसरे इतिहासकारों और विद्वानों ने भी यह कहा है कि हिंदू, खास कर ब्राह्मणों में गोमांस खाने का रिवाज था. जैसा कि आंबेडकर दावा करते हैं, यह बौद्ध धर्म के साथ अपने प्रभुत्व के संघर्ष में ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म के कुछ उसूलों को एक रणनीति के तहत अपना लिया और उत्साही शाकाहारी बन गए और गायों के पूजक बन गए. हाल में, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के एक प्रोफेसर द्विजेंद्र नारायण झा ने एक पूरी किताब ही इस पर लिखी है, जिसमें प्राचीन हिंदुओं, बौद्धों और यहां तक कि शुरुआती जैन लोगों में गोमांस खाने की आदतों को उजागर किया गया है. इस किताब का नाम द मिथ ऑफ होली काऊ (पवित्र गाय का मिथक) है. कहने की जरूरत नहीं है कि उन्हें धमकी देने वाले हिंदू उत्साहियों के मद्देनजर पुलिस सुरक्षा में चलना पड़ता है.

खान-पान पर घिनौना फासीवाद

यह एक ऐसा मिथक है, जो बिना कोई सवाल किए आंख मूंद कर यह मान लेता है कि हिंदू बहुसंख्या में हैं और इसलिए उनकी मर्जी ही चलनी चाहिए. हिंदू असल में अनेक जातियां हैं, जो एक दूसरे के ऊपर प्रभुत्व के लिए दावा ठोकने वाली, ऊंच-नीच के क्रम में एक दूसरे से बंधी हुई हैं. हालांकि पूंजीवाद ने औपनिवेशिक काल से ही द्विज गिरोह के आनुष्ठानिक अंतरों को मिटा दिया है, जिससे बंधा हुआ उत्तर औपनिवेशिक काल में शूद्र समुदायों का बाजा-गाजा बंधा हुआ है. इसने जाति व्यवस्था को दलित और गैर दलित जातियों के बीच एक कुछ-कुछ वर्गीय विभाजन बना दिया है. इनके बीच में खान-पान की आदतों को लेकर अनेक फर्क हैं. भारतीयों के शाकाहारी होने का मिथक दोमुंहे, वर्चस्वशाली ऊंची जाति के हिंदुओं द्वारा फैलाया हुआ है, जो आबादी में 15 फीसदी से अधिक नहीं हैं. आम तौर पर दिलत, आदिवासी और शूद्र समुदाय के निचले तबके मांस खाते हैं, भले ही उनका हिंदूकरण हो गया हो, और उनमें गोमांस खाने को लेकर भी उनको ऐतराज नहीं है. बल्कि गोमांस के अपेक्षाकृत सस्ता होने के कारण वे इस पर ज्यादा निर्भर करते हैं. अगर हम बहुत कम अंदाजा लगाते हुए भी यह मानें कि आधी शूद्र जातियां इस वर्ग में आएंगी, तो इसका मतलब यह होगा कि 45 फीसदी हिंदू गोमांस खाते हैं. इसमें 13.4 फीसदी मुसलमानों और 2.3 फीसदी ईसाइयों को जोड़ लीजिए तो 60.7 फीसदी भारतीयों की भारी तादाद गोमांस खाती है. इसल में कथित द्विज जातियों से जुड़े आधुनित युवाओं का भी अच्छा-खासा हिस्सा गोमांस खाता है. इसीलिए, तमाम पाबंदियों के बावजूद, भारत यों ही दुनिया में गोमांस खाने वाले देशों में सातवें स्थान पर है.
 

अपनी व्यापक बहुसंख्या की इच्छा को नजरअंदाज करते हुए, 24 राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में मवेशियों की हत्या पर पाबंदी लगाने वाले भिन्न भिन्न कानून हैं, जो रेस्टोरेंटों के लिए कानूनी तौर पर गोमांस हासिल करने, रखने और परोसने को मुश्किल बना देते हैं. 2012 में कैंपसों में गोमांस पर प्रतिबंध के खिलाफ विरोध में उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद के दलित छात्रों ने खान-पान के अपने अधिकारों पर सार्वजनिक दावेदारी जताई और कैंपस में बीफ बिरयानी बनाकर तथा खाकर दलितों तथा मुस्लिमों की खाने-पीने की आदतों के बारे में एक राजनीतिक बयान पेश किया. यह एक समारोह के साथ होना था, लेकिन नहीं हो पाया. आशंका के मुताबिक हिंदुत्व गुंडों ने इस पर हमला किया, चेन्नई से मेहमान के बतौर आमंत्रित एक युवा कार्यकर्ता मीना कंदासामी को सामूहिक बलात्कार और एसिड हमले की धमकी दी गई. हिंदुत्व गिरोह जिस तरह की घटिया हरकतें करता है, वह भारतीय जनता के खिलाफ उसके फासीवादी पंजों को ही उजागर करते हैं.

आर्थिक बेवकूफी

गायों का आदर प्राचीन खेतिहर अर्थव्यवस्था में उनके इस्तेमाल की वजह से था और इसमें धर्म का खास कोई लेना देना नहीं था, जैसे कि बाबर, हैदर अली, अकबर, जहांगीर और अहमद शाह जैसे मुस्लिम शासकों ने भी गायों की हत्या पर पाबंदी लगाई. हिंदुओं को राजनीतिक रूप से गोलबंद करने के लिए ऊंची जातियों के नेतृत्व वाले आजादी के आंदोलन में भावनाओं को बढ़ाया गया और उसका इस्तेमाल किया गया. गांधी ने इसमें एक बड़ी भूमिका अदा की, जिन्होंने कहा, 'मैं इसकी [गाय की] पूजा करता हूं और मैं सारी दुनिया के खिलाफ इसकी पूजा का बचाव करूंगा.' आज, सामाजिक डर्विनवादी होड़ वाले नवउदारवादी पूंजीवाद के दौर में, आदर और पवित्रता की सामंती भावनाओं पर कारगरता और उत्पादकता के सरोकार हावी हो गए हैं. मवेशियों की अर्थव्यवस्था में परिष्कृत विज्ञान, तकनीक और प्रबंधन के तरीके शामिल हैं, जिसमें उत्पादन काल के बाद हत्या करना इसका एक अभिन्न हिस्सा है.

दुनिया में भैंसों की कुल संख्या का 57 फीसदी हिस्सा भारत में है और दुनिया के कुल मवेशियों में से 16 फीसदी भारत में हैं. यह मवेशी उत्पादन में दुनिया में सबसे अव्वल नंबर पर है और इसमें भारी आर्थिक संभावनाएं हैं. हालांकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश भी है, जो 13.24 करोड़ टन तरल दूध का उत्पादन करता है, जिसका मूल्य 290000 (दो लाख नब्बे हजार) करोड़ है और यह दूसरे बड़े खेतिहर उत्पादों जैसे धान, गेहूं और ईख के मूल्यों को मिला देने पर भी उनसे ज्यादा है. एक भारतीय गाय यूरोपीय संघ की गाय के 6,212 किलो और संयुक्त राज्य अमेरिकी गाय के 9,117 किलो की तुलना में बस औसतन 1,284 किलो दूध देती है.  देश में मवेशीपालन सबसे अहम खेतिहर गतिविधि है, जो खेतिहर सकल घरेलू उत्पाद में 24.8 फीसदी का योगदान देता है. मवेशी पालन सबसे ज्यादा दूध उत्पादन के लिए किया जाता है, जिससे 1.8 करोड़ लोगों को सीधा रोजगार मिलता है और उन्हें गरीबी से बाहर आने में मदद मिलती है. इनमें से ज्यादातर लोग निचली जातियों से आने वाले भूमिहीन या हाशिए के किसान हैं. शायद इसीलिए कुलीन नीति निर्माताओं द्वारा इसकी पूरी तरह अनदेखी की जाती है. जबकि पश्चिमी देशों ने वैज्ञानिक तरीके विकसित किए हैं, भारत अभी भी मवेशी पालन के 'वैदिक तकनीक' का पालन करता है. गहन दूध उत्पादन का सबसे कारगर तरीका है कि गायों को सेहतमंद स्थितियों में घरों के भीतर रखा जाए, उन्हें 'डेयरी बैल' या 'बीफ बैल' से कृत्रिम रूप से गर्भाधान कराया जाए और उनसे सिर्फ शुरू के दो जन्म के दौरान ही दूध लिया जाए, जो सबसे ज्यादा उत्पादक होता है. दो बार बच्चे पैदा करने के बाद दूध की मात्रा और गुणवत्ता घट जाती है. 4-5 साल के बाद दूध देने वाली गायों को हैंबर्गर बनाने के काम में लाया जाता है और युवा बछिया उसकी जगह ले लेती है. भारत में, दुधारू गाएं नालायकी भरे तरीके से 6-8 बार और इससे भी ज्यादा बार बच्चे पैदा करने तक, लगभग जीवन भर दूही जाती हैं. ऐसा नहीं है कि किसान यह बात नहीं जानते कि यह महंगा पड़ता है, लेकिन उनके पास बेकार मवेशियों से छुटकारा पाने के विकल्प नहीं होते हैं. ऊंची जाति का हिंदुत्व गिरोह गायों के प्रति प्यार का दिखावा करता है लेकिन इसका खामियाजा निचली जाति के मवेशी पालकों को उठाना पड़ता है, जो उन्हें काटे जाने के लिए बेचना चाहते हैं जैसा कि चोरी छिपे किए जानेवाले कारोबार से बखूबी जाहिर होता है.

जरूरी नहीं कि गायों को काटा जाना अनिवार्य रूप से क्रूरता हो; बल्कि उन्हें दर्द भरी स्थितियों में जिंदा रखना क्रूरता है. सन 2000  में गोमांस का अंतरराष्ट्रीय कारोबार 3000 करोड़ डॉलर था और दुनिया के गोमांस उत्पादन के महज 23 फीसदी का प्रतिनिधित्व करता था. भारत में गायों की भारी तादाद है और मानव शक्ति है जो इसे इस बाजार पर कब्जा करने में कुदरती तौर पर बढ़त देती है. गायों के काटे जाने पर हिंदुत्ववादी प्रतिबंध न केवल इस प्राकृतिक राष्ट्रीय बढ़त को बेकार कर देगा, बल्कि ज्यादातर निचली जातियों से ताल्लुक रखने वाले लोगों की एक भारी तादाद की जिंदगियों को गहरे संकट में डाल देगा, जो गोमांस के उत्पादन, वितरण और उसके उपयोग में लगे हुए हैं.

अनुवाद: रेयाज उल हक

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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