हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मारे जाने के बाद भी जिंदा है लेखक

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/30/2015 05:20:00 PM


भाषा सिंह अपनी इस ताजा रिपोर्ट में बता रही हैं कि कैसे प्रभुत्वशाली विचारों, प्रथाओं और सामाजिक संरचनाओं को चुनौती देने वाले लेखकों की इस मुल्क में जीते जी 'हत्या' कर दी जाती है. यहां वे तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन से हुई अपनी हालिया मुलाकात को पेश कर रही हैं, और साथ ही वे उनके उपन्यास के बारे में हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा पैदा किए गए विवाद और इसकी पृष्ठभूमि की जानकारी दे रही हैं.

अब भी दिमाग मेरे दिमाग में 7-8 उपन्यास हैं। कई का तो पूरा नक्शा भी तैयार है, बस देर है उन्हें उतारने की। इन सभी उपन्यासों की विषयवस्तु एक से बढ़ कर है। मुझे लिखने में वैसे भी ज्यादा समय नहीं लगता। आपको पता है, अभी जनवरी में ही मेरे दो उपन्यास अलावायन और अर्द्धनारी चेन्नई पुस्तक मेले में आए और अच्छी प्रतिक्रिया मिली। ये दोनों उपन्यास मादोरुबागन की अगली कड़ी (सीक्वल) हैं।

यह बताते हुए जबर्दस्त उत्साह में आ जाते हैं 48 वर्षीय पेरुमल मुरुगन। उनके साथ बिताए करीब तीन घंटों में मुरुगन सिर्फ और सिर्फ अपनी लेखनी के बारे में बतियाते रहे। उसी में पूरी तरह से डूबते-उतराते रहे। उनसे कुछ भी और सवाल पूछती, उनका जवाब अपने किसी उपन्यास या कहानी के साथ समाप्त होता। वह धाराप्रवाह अपने रचना संसार के बारे में जिस तरह से बता रहे थे कि विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं तमिलनाडु के उसी चर्चित लेखक के सामने बैठी हूं जिन्होंने अपने लेखक की मृत्यु का ऐलान कर दिया है। उन्होंने किसी भी अपरिचित से मिलना बंद कर रखा है और खुद को अपने परिवार और परिचित दायरे में कैद कर रखा है। मुझसे और मेरे साथ गए कुछ मित्रों से वह सिर्फ इसलिए मिलने को तैयार हो गए क्योंकि हम दिल्ली से हजारों किलोमीटर का सफर तय करके सिर्फ उनसे मिलने पहुंचे थे। हालांकि फोन पर जब हमने उनसे मिलने की ख्वाहिश जताई थी तो उन्होंने कहा कि मिले बिना कोई रचनाकार जिंदा नहीं रह सकता, पर अभी स्थितियां अच्छी नहीं हैं। इस बात का अहसास नामाक्कल में पी. मुरुगन के छोटे से घर के बाहर पहुंचकर हो गया। पुलिस वहां तैनात थी। उनकी पत्नी और दोनों बच्चों के चेहरों पर जबर्दस्त तनाव था। उनकी पत्नी अलिरासी ने, जो खुद तमिल साहित्य की प्राध्यापक और कवि हैं, बस यह कहा कि हमारी जिंदगी में सब कुछ बदल गया। मुरुगन से जब उनकी अगली किताब के बारे में पूछा तो बहुत बोझिल स्वर में उन्होंने जवाब दिया, 'अब कागज नहीं मन पर लिखूंगा, यहां किसी का कोई दखल नहीं हो सकता।'

तमिलनाडु के कोयंबटूर शहर से करीब 200 किलोमीटर दूर है नामाक्कल। बेहद शांत दिखने वाला यह शहर इस समय खदबदाया हुआ है और इसकी खदबदाहट का असर तमिलनाडु की राजनीति से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक में महसूस हो रही है। पेरुमल मुरुगन के तमिल उपन्यास मादोरुबागन (2010) का 2014 में अंग्रेजी में तर्जुमा पेंगुइन प्रकाशन से वन पार्ट वुमन नाम से आया। रातों-रात इस पर आर्श्चयजनक ढंग से हिंदुत्वादी और जातिवादी राजनीति गरमा गई। निश्चित तौर पर इसका संबंध राज्य में भाजपा और उग्र हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा सांप्रदायिक-जातिवादी ध्रुवीकरण तेज करने की कवायदों से है। ये अभियान वॉट्स-अप पर शुरू हुआ। इसकी शुरुआत की, गाउंडर जाति (जिससे खुद लेखक पी.मुरुगन आते हैं) की पार्टी कोंगुनाडू मक्कलकच्छी ने, जिसका राज्य में भारतीय जनता पार्टी से चुनावी गठबंधन रहा है। इस पार्टी के साथ विवादित उग्र संगठन हिंदू मुन्नानी और भाजपा ने नामाक्कल से लेकर चेन्नई तक, लेखक तथा उनकी किताब को निशाने पर लेकर हल्ला बोल दिया। स्थानीय प्रशासन ने इन उग्र संगठनों का साथ देते हुए, लेखक पेरुमल मुरुगन को तीन बैठकों (जनवरी 7, 9 जनवरी और 12 जनवरी) में बुलाया और उन पर दबाव बनाया, किताब वापस लेने और धमकाने की लंबी प्रक्रिया चलाई, जिससे आहत होकर पेरुमल मुरुगन ने 14 जनवरी को फेसबुक पर लिखा, 'लेखक पेरुमल मुरुगन मर गया। वह भगवान नहीं है, लिहाजा वह खुद को पुनर्जीवित नहीं कर सकता। वह पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करता। आगे से, पेरुमल मुरुगन सिर्फ एक अध्यापक के बतौर जिंदा रहेगा, जो वह हरदम रहा है।'

लेखक ने इन शब्दों के माध्यम से जिस गहरी पीड़ा और प्रतिरोध का इजहार किया, उसने साहित्यिक जगत में एक जबर्दस्त बेचैनी का संचार किया। देश भर में पी. मुरुगन के पक्ष में लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी बोलने लगे। चेन्नई में प्रगतिशील लेखक संघ ने मद्रास उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की, जिसमें इस असंवैधानिक बैठकों में मादोरुबागन और वन पार्ट वुमन किताब के बारे में लिए गए फैसलों को खारिज करने की अपील की, अभिव्यिक्त की स्वतंत्रता को बचाने की मांग की गई। चेन्नई, बंगलूर से लेकर दिल्ली, जयपुर, कोलकाता तक में मुरुगन की किताब मादोरुबागन का पाठ किया गया। तमाम भाषाओं के लेखक मुरुगन के पक्ष में खड़े हुए और मैं मुरुगन हूं-जैसे अभियान भी चले।

इस तरह से नामाक्कल शहर इस समय चर्चा के केंद्र में आ गया है। उनकी किताब मादोरुबागन और उसके अंग्रेजी संस्करण वन पार्ट वुमन को कोयंबटूर शहर में दो घंटे ढूंढ़ने में नाकाम रहने के बाद समझ आया कि किसी किताब पर अघोषित प्रतिबंध कैसे लगाया जाता है। हालांकि एक पुस्तक विक्रेता ने कहा, इस हंगामे की वजह से मुरुगन की यह किताब और नामक्कल शहर दुनिया भर में मशहूर हो गया। इन तमाम बातों से बेहद विनम्र स्वर में बात करने वाले पी. मुरुगन वाकिफ हैं और उन्हें लग रहा है कि लेखन पर गहराया संकट जल्द नहीं हटने वाला है। जाति के बारे में पूछने पर वह कहते हैं कि यह मेरे लिए तो बड़ा मुद्दा नहीं है लेकिन समाज में एक बड़ा मुद्दा है। कैसे हम इससे बाहर आ सकते हैं, यह कोई नहीं जान पाया। हालांकि यह पेरियार की जमीन है, जिन्होंने जातिवाद, ब्राह्मणवाद और अंधविश्वास के खिलाफ ऐतिहासिक सफल आंदोलन चलाया लेकिन फिर भी जाति लोगों को संगठित करने का सबसे बड़ा औजार बनी हुई है। मैंने 2013 में पूक्कली (अर्थी) उपन्यास अंतर्जातीय विवाह पर होने वाली राजनीति पर ही लिखा था और इस उपन्यास को तमिलनाडु में अंतर्जातीय विवाह करने के बाद मारे गए दलित युवक इलावरसन और—को समर्पित किया था। यह किताब भी अंग्रेजी में अनुवाद हो रही है।

मुरुगन ने बताया कि तिरुचेंगोड गांव के एक गरीब भूमिहीन परिवार में जन्मे और खानदान के पहले शिक्षित व्यक्ति थे। इसी गांव के अर्धनारीश्वर मंदिर की एक प्रथा का जिक्र पी. मुरुगन ने अपने उपन्यास मादोरुबागन में किया है, जिसमें निस्संतान महिलाओं के लिए सहमति से किसी देवता से शारीरिक संबंध बनाने की छूट होती है। उपन्यास के इसी हिस्से को तिरुचेंगोडु की महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला और उनके चरित्र पर सवाल उठाने वाला बताया गया और इसके खिलाफ आवाज उठाने का आहृवान सभी हिंदुओं से किया गया। इस विवाद के बारे में पी. मुरुगन सीधे कुछ भी बोलने के बजाय, यह कहते हैं, 'मेरे सारे उपन्यास जमीनी हकीकत पर आधारित हैं। कल्पना का पुट साहित्य में होता है, लेकिन मैं हकीकत से जुदा होकर लिखने में विश्वास नहीं करता।'

अब तक 35 किताबें लिख चुके मुरुगम पेरियार, मार्क्स और अंबेडकर की विचारधारा से गहरे रूप से प्रभावित हैं। हालांकि वह किसी वामपंथी पार्टी से नहीं जुड़े हैं लेकिन खुद को मार्क्सवादी मानते हैं। अपने उपन्यासों में उन्हें सबसे प्रिय है सीजन्स ऑफ पाम, जिसमें उन्होंने एक दलित-अरुधंतियार भूमिहीन बंधुआ मजदूर की कहानी लिखी है। उन्होंने अब तक नौ उपन्यास लिखे हैं जिसमें से पांच पिछले पांच साल में आए।

बातचीत के दौरान अनगिनत लोगों की आवाजाही बनी रही। पेरियार के अनुयायी द्रविड़ कयगम के वालिएंटरों का दस्ता काली कमीज में लेखक के साथ मुस्तैद था। मुरुगन अभी इस विवाद पर कुछ बोलना नहीं चाहते, वह संकट कटने का खामोशी के साथ इंतजार करना चाहते हैं। सरकार वहां अन्नाद्रमुक की है और वह इसमें हिंदुत्वादी संगठनों को संरक्षण दे रही है, द्रमुक पार्टी के नेता स्टालिन लेखक के पक्ष में बयान देने तक सीमित रहे, वाम दल समर्थन में हैं। लेकिन मुरुगन की खामोशी उनके कई साथियों को चुभ रही है। तमिल लेखिका वासंती का कहना है कि मुरुगन को इस तरह से हथियार नहीं डालना चाहिए। हालांकि चेन्नई की महिला कार्यकर्ता के. मंजुला का कहना है कि हम मुरुगन के शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने निस्संतान महिला के लिए विषम स्थितियों को उजागर किया। पी. मुरुगन के सहकर्मी प्रो. मुत्तूस्वामी का मानना है कि इस पूरे प्रसंग में जीत लेखक की हुई है। उनकी लेखनी विजयी हुई है। पूरे देश और दुनिया में लोगों का लेखक के पक्ष में आना इसका सबूत है।

तमिल साहित्य के जुझारू इतिहास में पहली बार किसी लेखक ने अपने लेखक की मौत की घोषणा की है। हालांकि इसे भी प्रतिरोध की उस अमर श्रृंखला के साथ ही जोड़ के देखा जा रहा है, जिसमें तमिल के प्रख्यात कवि भारतीयार ने कहा था, 'अगर एक व्यक्ति के पास खाने को अन्न नहीं है तो हम उस दुनिया को जला देंगे।'

मादोरुबागन पर क्यूं हंगामा

यह उपन्यास कोंगू अंचल में एक निस्संतान किसान दंपत्ति पोन्ना (पत्नी) और काली (पति) की दास्तां है, जिनमें बेहद प्रेम है। इस प्रेम पर बच्चा न होने की वजह से समाज और परिवार के ताने तथा दबाव कैसे कहर बरपाते हैं, इसका मार्मिक चित्रण है। इसमें तिरुचेंगोडु में स्थित शिव के अर्दनारीश्वर मंदिर में हर साल लगने वाले एक 14 दिन लंबे मेले का जिक्र है, जिसमें मान्यता है कि अंतिम दिन मेले में उपस्थित सभी पुरुष देवता हो जाते हैं और निस्संतान स्त्रियां किसी भी देवता के साथ समागम कर संतान प्राप्ति कर सकती हैं। मान्यता के अनुसार ऐसी संतानों को देवता का प्रसाद माना जाता है। इस ट्रैजिक उपन्यास में नायिका यहां जाती है। इसी हिस्से पर हिंदुत्वादी संगठनों ने सारा कहर बरपा किया।

हिंदी आउटलुक के 1-15 फरवरी 2015 अंक में प्रकाशित. साभार. 

गणतंत्र दिवस के अतिथि

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/25/2015 01:11:00 AM


अनुज लुगुन ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रतिनिधि, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत आने पर यह कविता लिखी है. ओबामा इसे यकीनी बनाने के लिए आए हैं कि भारतीय राज्य जनता के जल-जंगल-जमीन को छीन कर साम्राज्यवादी कंपनियों को सौंपना जारी रखे और इस तरह अमेरिकी साम्राज्य के वजूद को कायम रखे. साथ में, ब्राह्मणवादी-सामंती-फासीवादी परियोजनाएं भी चलती रहें.

सिर्फ इतना ही कर सकता हूँ
कि आज के तुम्हारे कार्यक्रम में
मैं शामिल नहीं होऊंगा
और कर भी क्या सकता हूँ
तुम्हारे अभेद्य सुरक्षा कवच के सामने.?
वैसे और क्या हो सकता है इससे बेहतर
तुम्हारा लोकतांत्रिक बहिष्कार
कि लोकतंत्र के कथित महाप्रभु को
उसी के जुमलों से जवाब दिया जाए?

जब सारी दुनिया
तुम्हारे ताकत के दंभ और शोहरत की
अंधभक्ति कर रही हो
तब मेरे ही भाई-बन्धु हसेंगे
मेरे इस निर्णय पर
और सीआईए अगर
इसकी भी सूचना दे दे
तो शायद तुम्हें भी
हिंदी के इस आदिवासी कवि पर हंसी आ जाए

आज कार्यक्रम में शामिल नहीं होऊंगा
तो इसका मतलब
तुम मुझसे बेहतर समझते हो कि
मैं तुम्हारे हर उस निर्णय में शामिल नहीं हूँ
जिसने दुनिया को ‘डॉलर’ की जंजीर पहनाई है
जिसने जने हैं दुनिया में
नाटो, खाड़ी, तालिबान, ईराक
लीबिया, उ.कोरिया, ईरान
और भी ऐसी अनगिनत अंधेरी खाइयां
जिनमें मानवता दफ़न की जा रही है

मेरे इस इनकार का मतलब
तुम भली भांति समझते हो
कि मैं तुमसे और तुम्हारे अधिकांश
पूर्वजों से असहमत हूँ
तुम यह भी जानते हो कि
आज तुम जिस जमीन पर खड़े होकर
आतंकवाद और विश्व शान्ति की बात कर रहे हो
उसी जमीन के खिलाफ
तुम्हारे पूर्वजों ने जहाजी बेड़ा भेजा था

मुझे पता है
तुम और तुम्हारा सीआईए
कहेगा कि मैं सोवियतों का पिछलग्गू रहा हूँ
कहोगे कि मैं चे, कास्त्रो या शावेज का गुप्तचर हूँ
कहोगे कि मैं तालिबानी हूँ
कहोगे कि मैं इस्लामिक स्टेट का हूँ
तुम कुछ भी कहोगे और उसे साबित भी कर दोगे
लेकिन तुम कभी नहीं कहोगे कि
मैं ब्लैक हिल्स या डकोटा प्रान्त का वंशज हूँ
नहीं कहोगे कि मैं रेड इंडियनों का वंशज हूँ
ऐसा कहकर तुम और सीआईए
कभी भी अपने इतिहास का
नकाब नोचने की हिमाकत नहीं करेगा

मुझे पता है
तुम कुछ भी ऐसा नहीं करोगे
जिससे साबित हो कि
तुम्हारे सिवाय और भी सभ्यता रही है
और भी मौजूद हैं दूसरे सहजीवी विकल्प

आज तुम बापू को धन्य धन्य कहोगे
मार्टिन लूथर किंग जूनियर की दास्तान कहोगे
और जब कल यहाँ से वापस लौट जाओगे
हथियारों के अंतराष्ट्रीय बाजार में
तुम्हारी रैंकिंग फिर से सबसे ऊपर होगी

फिर से होगी
तीसरी-अश्वेत-अफ़्रीकी-दुनिया में
तुम्हारे लड़ाकू युद्ध पोतों
और जहाजी बेड़ों के उतरने तक
हथियारों की काला बाजारी

आज मेरे देश की
बलिदानी धरती पर होने के बावजूद भी
तुमसे दूसरी छोर पर रहूँगा
मैं यहाँ अपने जंगलों और नदियों के साथ
यहीं अपने जनवादी गणतंत्र का गीत गाऊंगा |

हिंदुत्व का शिकंजा और दलित-जातिवादी राजनीति

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/24/2015 08:00:00 AM


प्रो. तुलसी राम का यह लेख हिंदुत्व के फासीवादी तीखे होते हमलों के दौर में दलित-जातिवादी राजनीति का एक आकलन पेश करता है. 

पिछले पचीस सालों में दलितों के साथ पिछड़े वर्ग की राजनीति में जातिवाद अपनी चरम सीमा पार कर गया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि विशुद्ध हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा ने अकेले बहुमत पाकर भारत की सत्ता प्राप्त कर ली। भारतीय जाति-व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसे धर्म और ईश्वर से जोड़ दिया गया। यही कारण था कि इसे ईश्वरीय देन मान लिया गया। गांधीजी जैसे व्यक्ति भी इसी अवधारणा में विश्वास करते थे। इस अवधारणा का प्रचार सारे हिंदू ग्रंथ करते हैं। इसलिए हिंदुत्व पूर्णरूपेण जाति-व्यवस्था पर आधारित दर्शन है।

विभिन्न जातियां हिंदुत्व की सबसे मजबूत स्तंभ हैं। इसलिए इन स्तंभों की रक्षा के लिए ही भारत के सभी देवी-देवताओं को हथियारबंद दिखाया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि दलितों पर आज भी वैदिक हथियारों से हमले जारी हैं। ऐसी स्थिति में जब जाति को मजबूत किया जाता है, तो हिंदुत्व स्वत: मजबूत होता चला जाता है। पिछले पचीस वर्षों में ऐसा ही हुआ है।

नब्बे के दशक में कांशीराम ने एक अत्यंत खतरनाक नारा दिया था- ‘अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो’। इसी नारे पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) खड़ी हुई। परिणामस्वरूप डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन की अवधारणा को मायावती ने शुद्ध जातिवादी अवधारणा में बदल दिया। इतना ही नहीं, गौतम बुद्ध द्वारा दी गई ‘बहुजन हिताय’ की अवधारणा को चकनाचूर करके उन्होंने ‘सर्वजन हिताय’ का नारा दिया, जिसका व्यावहारिक रूप सभी जातियों के गठबंधन के अलावा कुछ भी नहीं था। परिणामस्वरूप दलितों की विभिन्न जातियों के साथ-साथ ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के अलग-अलग सम्मेलनों की बसपा ने भरमार कर दी, जिससे हर जाति का दंभी गौरव खूब पनपने लगा।

ब्राह्मण सम्मेलनों के दौरान बसपा के मंचों पर हवन कुंड खोदे जाने लगे और वैदिक मंत्रों के बीच ब्राह्मणत्व का प्रतीक परशुराम का फरसा (वह भी चांदी का) मायावती को भेंट किया जाने लगा। इस दौरान दलित बड़े गर्व के साथ नारा लगाते थे- ‘हाथी नहीं, गणेश हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं’। मायावती हर मंच से दावा करने लगीं कि ब्राह्मण हाशिये पर चले गए हैं, इसलिए वे उनका खोया हुआ गौरव वापस दिलाएंगी। वे इस तथ्य को जरा भी समझ नहीं पार्इं कि ब्राह्मण कभी भी हाशिये पर नहीं जाते हैं। उनका सबसे बड़ा हथियार धर्म और ईश्वर है। इन्हीं हथियारों के बल पर ब्राह्मणों ने हमेशा समाज की बागडोर अपने हाथ में रखी।

इससे पहले मायावती तीन बार भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं और गठबंधन की सरकार चलाई। इतना ही नहीं, भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए मायावती विश्व हिंदू परिषद के त्रिशूल दीक्षा समारोह में भी शामिल हुर्इं। पर जब वे मोदी का प्रचार करने गुजरात गर्इं, तो उन्होंने धार्मिक उन्माद पर खुलेआम ठप्पा लगा दिया। दलित सत्ता के नारे के साथ मायावती ने जातीय सत्ता की प्रतिस्पर्द्धा को जन्म दिया। इस जातीय सत्ता की होड़ में मंडलवादियों ने शामिल होकर धर्म के स्तंभों को और मजबूत किया।

अगर राजनीति में धर्म का इस्तेमाल धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध है, तो धर्म से उत्पन्न जाति का इस्तेमाल कैसे धर्म-निरपेक्ष हो सकता है? इसलिए धर्म का राजनीति में इस्तेमाल जितना खतरनाक है, जाति का इस्तेमाल उससे कम खतरनाक नहीं है। इस तथ्य को न कभी मायावती समझ पार्इं और न ही मंडलवादी। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव और नीतीश कुमार आदि सब ने जातिवादी राजनीति के माध्यम से धर्म की राजनीति को मजबूत किया।

आज नरेंद्र मोदी जो छप्पन इंच का सीना तान कर घूम रहे हैं, उसकी पृष्ठभूमि में जातिवादी राजनीति रही है। उक्त सारे नेताओं द्वारा जाति के साथ-साथ मुसलिम वोटों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने के प्रयास से आम हिंदू नाराज होकर पूरी तरह भाजपा की तरफ चला गया। इसलिए संघ परिवार जिसकी वकालत बरसों से कर रहा था, उसमें वह पूर्णत: सफल रहा। भाजपा ने धर्म और जाति, दोनों का इस्तेमाल बड़ी रणनीति के साथ किया, जिसके पीछे वह चालाकी से ‘विकास’ की बात करके जनता को भ्रमित करने में सफल रही, जबकि असली मुद्दा धार्मिक ध्रुवीकरण का ही था।

मायावती ने डॉ. आंबेडकर की मूर्तियों और पार्कों की आड़ में दलितों को उनके रास्ते से भटकाने का काम बड़ी सफलता से किया। डॉ. आंबेडकर ने दलितों को सामाजिक और धार्मिक भेदभाव से मुक्ति दिलाने के लिए एक दोहरी रणनीति अपनाई थी। एक तरफ उन्होंने जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन का सूत्रपात करके ‘मनुस्मृति’ को जलाया था और दूसरी तरफ जातिवाद को स्थापित करने वाले वैदिक ब्राह्मण धर्म के विकल्प के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाया था। मायावती डॉ. आंबेडकर की दोनों रणनीतियों को दरकिनार करके जातिवादी राजनीति के चंगुल में फंसती चली गर्इं।

एक बार कांशीराम ने घोषणा की थी कि वे डॉ. आंबेडकर से कहीं ज्यादा लोगों के साथ, यानी बीस लाख से अधिक लोगों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण करेंगे, पर स्वास्थ्य की समस्या के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए। बाद में मायावती ने कहा कि बौद्ध धर्म ग्रहण करने से सामाजिक सद्भावना के बिगड़ने की संभावना है, इसलिए जब वे प्रधानमंत्री बन जाएंगी, तो बौद्ध धर्म ग्रहण करेंगी। जाहिर है, जब उन्होंने उक्त बातें कहीं, उस समय मायावती भाजपा के साथ उत्तर प्रदेश की सरकार चला रही थीं।

डॉ. आंबेडकर के दर्शन के बारे में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे भारत के लिए द्वि-दलीय प्रणाली की वकालत करते थे, इसलिए वे दलित नाम से कोई पार्टी नहीं चलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी को प्रस्तावित किया। कांग्रेस का यही विकल्प उन्होंने प्रस्तुत किया था। पर एक बात उन्होंने जोर देकर कही थी कि दलितों को आरएसएस और हिंदू महासभा (वर्तमान विश्व हिंदू परिषद) जैसे संगठनों के साथ कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए।

संघ ने 1951 में जनसंघ की स्थापना की थी, पर आंबेडकर के समय में उसका प्रभाव नगण्य था। इसीलिए सीधे-सीधे उन्होंने संघ से किसी भी तरह का समझौता करने से दलितों को मना किया था। मायावती ने डॉ. आंबेडकर के हर कदम को नजरअंदाज करके संघ-परिवार का हाथ मजबूत किया। डॉ. आंबेडकर का जनतंत्र में अटूट विश्वास था, जिसकी झलक भारत के संविधान में साफ तौर पर मिलती है। उनका मानना था कि जाति-व्यवस्था एक तरह से तानाशाही वाली व्यवस्था थी, जिसके चलते दलित हर तरह के मानवीय अधिकारों से वंचित रहे। इसलिए जनतांत्रिक प्रणाली को वे दलितों के लिए सर्वोत्तम प्रणाली समझते थे।

पर सारी जातिवादी पार्टियां अपनी ही जाति के लोगों को हमेशा जनतांत्रिक अधिकारों से वंचित करती रही हैं। ऐसी पार्टी के नेताओं में मायावती का नाम सबसे ऊपर आता है। यहां तक कि बैठकों के दौरान न सिर्फ मायावती कुर्सी पर बैठा करती थीं और बाकी नेता जमीन पर बैठते थे; विधानसभा हो या संसद, उनके डर से कोई पार्टी विधायक या सांसद कुछ भी बोलने से डरता था। उनका व्यवहार एकदम सामंती हो गया था। उन्हें आम सभाओं में चांदी-सोने के ताज पहनाए जाते थे और उनके हर जन्म दिवस पर लाखों रुपए की भारी-भरकम माला भी पहनाई जाती थी। 1951 में मुंबई के दलितों ने बड़ी मुश्किल से दो सौ चौवन रुपए की एक थैली डॉ. आंबेडकर को उनके जन्मदिन पर भेंट की थी, जिस पर नाराज होकर उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर कहीं भी ऐसा दोबारा किया तो वे ऐसे समारोहों का बहिष्कार करेंगे।

पिछली दफा राज्यसभा का परचा दाखिल करते हुए मायावती ने आमदनी वाले कॉलम में एक सौ तेईस करोड़ रुपए की संपत्ति दिखाई थी। हकीकत यह थी कि मायावती के गैर-जनतांत्रिक व्यवहार के चलते बसपा में भ्रष्ट और अपराधी तत्त्वों की भरमार हो गई थी, जिसके कारण पूरा दलित समाज न सिर्फ बदनाम हुआ, बल्कि इससे दलित विरोधी भावनाएं भी समाज में खूब विकसित हुर्इं। एक तरह से मायावती दलित वोटों का व्यापार करने लगी थीं। पिछले अनेक वर्षों में चमार और जाटव समाज के लोग उत्तर प्रदेश में भेड़ की तरह मायावती के पीछे चलने लगे थे। इसलिए वे भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को चुन कर विधानसभा और संसद में भेजने लगे थे।

बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधानसभा में बोलते हुए एक बार कहा था, ‘धर्म में नायक पूजा किसी को मुक्ति प्रदान कर सकती है, पर राजनीति में नायक पूजा निश्चित रूप से तानाशाही की ओर ले जाएगी।’ मायावती के संदर्भ में यह शत-प्रतिशत सही सिद्ध हुआ। राजा-रानियों की तरह मायावती ने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करते हुए प्रेस सम्मेलन में कहा था, ‘मेरा उत्तराधिकारी चमार जाति का ही होगा, जिसका नाम मैंने एक लिफाफे में बंद कर दिया है। यह लिफाफा मेरी मृत्यु के बाद खोला जाएगा।’ इससे एक बात साफ हो गई कि मायावती के रहते कोई अन्य दलित नेता नहीं बन सकता था।

उनके द्वारा बार-बार चमार जाति के उल्लेख से दलित की गैर-चमार जातियां बसपा से कटती चली गर्इं और उनमें से अधिकतर या तो भाजपा के साथ हो गर्इं या मुलायम सिंह यादव के साथ चली गर्इं। उत्तराधिकारी की घोषणा के बाद एक रोचक घटना हुई। मीडिया वालों ने अंदाजवश आजमगढ़ के राजाराम के रूप में उत्तराधिकारी की पहचान कर ली। परिणामस्वरूप मायावती ने अविलंब राजाराम को पार्टी से बर्खास्त कर दिया।

जब मायावती सामाजिक अभियांत्रिकी (सोशल इंजीनियरी) के नाम पर ब्राह्मणों को सतीश मिश्रा के माध्यम से अपनी तरफ खींचने का अभियान चला रही थीं तो दलितों के विरुद्ध उसका दूरगामी प्रभाव पड़ा। इससे पहले चुनावी राजनीति में ही सही, सारी पार्टियां दलितों को अपनी तरफ खींचने का प्रयास करती थीं और उनके लिए तरह-तरह के वादे भी किया करती थीं, जिसका परिणाम अनेक अवसरों पर काफी सकारात्मक भी हुआ करता था। इसलिए दलित हमेशा एक दबाव समूह का काम करते थे। पर मायावती उस तथाकथित सामाजिक अभियांत्रिकी के चलते हर पार्टी के लिए ब्राह्मण खुद दबाव समूह के लिए दलितों को हाशिये पर डाल दिए। परिणामस्वरूप मायावती के चक्कर में दलित हर पार्टी के लिए दुश्मन बन गए। अब उनके कल्याण के लिए कोई भी पार्टी तत्पर नहीं दिखाई पड़ती। सच ही कहा गया है, ‘माया मिली न राम।’

मायावती के एक अन्य दलित-विरोधी फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ा। किसी गैर-दलित मुख्यमंत्री की कभी हिम्मत नहीं पड़ी कि वह ‘दलित अत्याचार विरोधी अधिनियम’ से छेड़छाड़ करे। पर मायावती जब भाजपा के साथ संयुक्त सरकार चला रही थीन, तो उन्होंने गैर-दलितों को खुश करने के लिए उपरोक्त अधिनियम में संशोधन करके यह प्रावधान कर दिया कि दलित महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे अपराधों को पुलिस तब तक दर्ज न करे, जब तक कि डॉक्टर प्रमाणित न कर दे कि सही मायने में बलात्कार हुआ है। मायावती के इस आदेश का परिणाम यह हुआ कि दलितों पर तरह-तरह के अत्याचार होते रहे, पर पुलिस अधिकतर मामलों में आज भी केस दर्ज नहीं करती है।

इस बार लोकसभा चुनावों में जब बसपा का सफाया हो गया, तो मायावती ने इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा दिया। हकीकत तो यह है कि मायावती अपनी व्यक्तिगत सत्ता के लिए लगातार जातिवादी नीतियां अपनाती रही हैं, जिससे दलित निरंतर सबसे कटते चले गए। पिछले पचीस सालों के अनुभव से पता चलता है कि अब देश को जातिवादी पार्टियों की जरूरत नहीं है, बल्कि सबके सहयोग से जाति-व्यवस्था विरोधी एक मोर्चे की आवश्यकता है, अन्यथा जातियां मजबूत होती रहेंगी, जिससे धर्म की राजनीति को ऑक्सीजन मिलता रहेगा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान डॉ. आंबेडकर ने गांधीजी से कहा था, ‘स्वतंत्रता आंदोलन में सारा देश एक तरफ है, पर जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन सारे देश के खिलाफ है, इसलिए यह काम बहुत मुश्किल है।’ उम्मीद है, दलित इतिहास से कुछ सीख अवश्य लेंगे।

कस्बा के बहाने कुछ बातें

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/22/2015 03:36:00 PM

कस्बा के बहाने कुछ बातें, कुछ यादें और एक टीवी एंकर पर लघु शोध प्रबंध

(मसलन रवीश कुमार के साहित्य में मीडिया चेतना अथवा रवीश कुमार: भाषा एवं सृजन कर्म)

शुभम श्री
 

पटना में भी अलबत्त लोग मिलेंगे । सीधे पूछिए, टेढ़ा बताएंगे । टेढ़ा पूछिए, माथा पर चढ़ के नाचने लगेंगे, मने ननिहाल को दें कि ददिहाल को, सात पुश्त को गरियाएंगे जरूर । जैसे कि आप पूछिए “बेली रोड कहां है ?”  “हम्मर कपार पर ।” “चिड़ैयांखाना केन्ने है हो ?” “हम आमदी बुझाते है कि जेनावर”, “अरे पहिले चिड़ैयांखाना न बताइए”, “नहीं पहिले आप किलियर किजिए आमदी कि जेनावर ।” मतलब अकच्च कर देगे एकदम से । अपने मन से किसी के लिए दो शब्द बढ़िया भले नहीं निकले, दूसरा कोई उरेब बोल दे, फिर देखिए । “अरे बिहार में कहां कोई हीरो हुआ है जी ।“ “हुआ नहीं है आंय । सतरूघ्घन सीन्हा, मनोज बाजपेई का है ।“ “भक्क मनोज बाजपेई हीरो थोड़े हुआ, उ तो सिनेमा में एक्टींग करता है । हीरे मने अमिताबच्चन, सारुक्खान, सन्नी दिओल ।“ “का बात करते है मर्दे । साला सतरूघ्घन सीन्हा बोलता है तो हिला देता है । ब्बात करते हैं ।“ आप नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर लीजिए, कदमकुंआ में आपके पड़ोसी कहेंगे, आही रे दादा, उ चसमुलवा के नोबेल भेट गेलई । एहिजे खेलत रहल हलई । जिसको ठीक से बुझाया नहीं कि आप किए क्या हैं, का जनी कौची करत हलई दिल्ली में, अच्छा पइसा कमाब हई । ऐसे सीन में कुछ लोग गर्दा करने वाले भी होते हैं । जनले कि न, उ नटुलिया के भइबा एसएससी कर गेलऊ । इनकम टेक्स भेतटई सीधे । रेलवे, एसएससी, बेंक पीओ माने गर्दा । बीपीएससी चाहे यूपीएससी तहलका । आइआइटी मने उ सब एभरेज माइंड नहीं न है जी ।

इ सब भूमिका है थोड़ा । छोटू मामा के अनुसार तूम कमीसन में गायरेंटीड फेलियर । टू द पवांइट बोलो, एन्ने ओन्ने मत लसको । लेकिन लसकना परता है । पिछले साल पटना गए तो गप चला कौन क्या, कहां । गुड्डू मामा बताने लगे कि पटना केतना एडभांस हो गया है, फलाई ओभर बन रहा है, उसी में चर्चा चला । अरे इ रबीस कुमार तो गजब नाम कमाया । हां उनका रिपोर्ट बहुत अच्छा होता है । उसको पराइम टाइम न दे दिया जी । तुम समझे नहीं, उ सब रिपोटर रैंक से बहूत उप्पर चल गया की । हम त कहलिक मारले हई जमा कर के । अ जानित हें, अइसेंही बोल हई । हां मामाजी । फिर मामाजी को फील हो गया कि अब रिवर्स गियर में जाना चाहिए । अरे इ लोग तो हम लोग के सामने आया है । उ तो एहिजे साइकिल चलाते रहता था । बंगाली से न सादी किया है ।

कौन जात हई, केकरा से बियाह करले हई, ये कांसटेट वेरियेबल है हर किसी के लिए । ऐसा नहीं था कि पहले बिहार में कम पत्रकार हुए थे लेकिन रवीश कुमार के फेनोमेनन को, फेनोमेनन कहना ज्यादा सही होगा, अलग तरह से देखने की जरूरत है । बिहार में लंबे समय से चल रहे पलायन के इतिहास को देखें तो भोजपुर क्षेत्र से दूर दराज नौकरी की तलाश में गए लोगों की दास्तान मौजूद है । कलकत्ता से लेकर आसाम तक बिहार के मजदूर फैले हुए थे । फिर यह चलन पंजाब, हरयाणा की ओर हुआ । लेकिन नब्बे के बाद पहली बार बड़ी संख्या में बिहार से विद्यार्थियों ने पलायन करना शुरू किया । इसकी एक वजह में बिहार में शिक्षा व्यवस्था का अपंग हो जाना था, दूसरी वजह नौकरी की जरूरत थी । जिनके पास जमीनें थीं, उन पर कब्जा हो रहा था, फसल कटाई के लिए पुलिस बुलानी पड़ रही थी । ले देकर गांव देहात के विद्यार्थियों के लिए एक ठिकाना था पटना लेकिन पटना में महेन्द्रू घाट या बहादुरपुर के लॉज में रहकर एक के बाद एक अटेंप्ट देते छात्रों के लिए दो रास्ते थे, परीक्षा में सेटिंग कराना, पैरवी चलवाना और कुछ ले देकर नौकरी पा लेना वरना प्राइवेट । प्राइवेट की मजबूरी में बड़ी संख्या ने दिल्ली का रुख किया । इसमें एक वर्ग उन छात्रों का था जो तैयारी के लिए पटना के बजाय दिल्ली जाने लगे । ये वो लोग थे जो सो कॉल्ड कमीसन मेटेरियल माने जाते थे ।

अच्छे विद्यार्थी की एक ही निशानी थी- मैथ ठोस । इंग्लिस ठोस का मतलब था ट्रांसलेसन बनाना । जिसने नवोदय निकाला वो अच्छा, सैनिक निकाला वो साइनिंग और जो नेतरहाट कर गया वो क्रीम । इस पैमाने पर चक्रवर्ती ब्याज गणित, रेपीडेक्स, रिजनिंग तीनों घोल कर पी जाने वाले आते थे । लेकिन नेतरहाट क्रैक करने वाले क्रीम तक के लिए इंग्लिस ठोस मतलब ट्रांसलेसन ही था । फर्राटा इंग्लिस वो दुखती रग थी जिसकी कमी पहली बार दिल्ली जाने वालों ने महसूस की । प्राइवेट नौकरियों के लिए बाहर निकले लोगों ने अपने घरों में इस जरूरत को महसूस कराया कि इंग्लिस मीडियम फोकस और फूस फास नहीं है । मैथ में भुसगोल चलेगा, अंग्रेजी कमजोर नहीं चलेगा । हिन्दी माध्यम से पढ़े छात्रों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही थी । चुनोती तो खैर शुद्ध हिंदी बोलना भी थी । शुद्ध मतलब बिना दरभंगा, आरा, छपरा, बेगूसराय के टोन के । हम औयेंगे नै तब तुम जांनां । उ लरका गिड़ गया । वैं उठने नय सका । हम नय जाएंगे । बहुत कोशिश के बाद, नियम कानून बनाने के बाद भी मुंह से रिक्सा निकल जाता था, नय नहीं बंद हो पाता, र ड़ की उलझन तो खैर थी ही । इसलिए पुण्य प्रसून वाजपेयी की नकल का जब क्रेज चला तो नई उमर के लड़के कॉपी मोडडकर कोशिश करते- नमस्कार मैं हूं पुन्य परसून बाजपेई । पुण्य प्रसून मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था । ये नब्बे का आखिरी दौर रहा होगा । जब दिल्ली से लौट कर आने वाले मजदूर फर्राटेदार मैं, मेरे को झाड़ने लगे । यह मध्यवर्गीय घरों के लिए शॉक था । पटना के ऊपरी आमदनी युक्त घरों में मार काट मचा कर माइकल, जोसेफ, नेटरोडम के लिए हात पांव मारे जाने लगे । इसी दौर में घरों में नियम बनाए जाने लगे कि पढ़ने के समय इंग्लिस में बात करना है, फ्लो बनेगा । पापा से इंग्लिस में बात करना है, कोई आया तो इंग्लिस बोलना है । इंग्लिस वर्ड यूज करन है । इस नाजी शासन की मार में आंय और काहे बोलने से तौबा नहीं कर पाने वालों की भारी कुटाई हुई ।

पटना का वो तबका जो एलीट था, जिनकी पहुंच थी यानी जिनके यहां सेंट माइकेल और सेंट जोसेफ के बाद वीमेंस कॉलेज या साइंस कॉलेज जाने का रिवाज था उसके नीचे पटना के मध्यवर्ग और बाबू समुदाय ही नहीं बिहार भर में बाहर निकलने की लहर चल चुकी थी । बी.एड कॉलेज लालू यादव ने बंद करा दिए थे, बीपीएससी में खुल कर धांधली चल रही थी, उपाय नहीं था । बाहर निकलने का रास्ता था इंग्लिस और टोन से निजात पाना । दोनों ही मुश्किल था ।

रवीश कुमार बिहार के उन ब्यूरोक्रेट या जमींदार परिवारों से नहीं है जिनके लिए आम लोग कहें कि उनका छोडिए ना । रवीश कुमार का प्राइम टाइम में आना उस आहत बिहारी के लिए इगो बूस्टर है जो आंय और काहे से निजात नहीं पा सका । कोई हमारे जैसा, रलवे, बैंक, कमीसन बिरादरी का, जो टीवी में आ गया । यह आपसी रिश्ता है जिसके कारण पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा का कोई भी चौड़ाई लेकर आपको नोएडा फिल्म सिटी में डॉयलॉग मारता मिल जाएगा । अरे उ तो अपना आदमी है । रबीस कुमार को नही जानते हैं, अरे उ जो अएंकर है ।

इस पहचना को बनाने में टीवी ने बड़ी भऊमिका निभाई । बेरोजगारी के जिस दौर में क्रीम स्टूडेंट बाहर निकल रहे थे, उसी दौर में लंबी बेरोजगारी से त्रस्त होकर कई लोग केबल के धंधे में उतर रहे थे । जिनके घरों में कभी अखबार नहीं आया, उनके यहां केबल आया । जिनकी रंगीन टीवी खरीदने की औकात नहीं थी, उनके यहां भी टीवी आया क्योंकि उस दौर में लगभग हर दहेज में हीरो होंडा मोटरसाइकिल और रंगीन टीवी दिए गए । इतिहास में दर्ज होना चाहिए कि भारतीय औरतों ने रंगीन टीवी के लिए सबसे ज्यादा कुर्बानी दी । कितनी बहुओं की हत्याएं रंगीन टीवी के कारण हुईं, यह आंकड़ों में दर्ज है । यही दौर था जब रोहतास में बीडीओ देवरानी को स्टार प्लस देखने वाली क्लर्क जेठानी डाउन मार्केट समझने लगी । बीडीओ और क्लर्क जाहिर है उऩके पति थे लेकिन उस नाते वह खुद को उसी रेंक का मानती थीं । टीवी मध्यवर्गीय घरों में एक एलीट सदस्य था । वह दूसरी भाषा बोलता था, वह दूरदर्शन के कृषि दर्शन से आगे बढ़ कर चमकदार हो गया था । संजीव कपूर के कुकरी शो से कद्दूकस को ग्रेट करना, छीलने को पील करना और मेरिनेट करना सीख कर बी.एन मंडल से फर्स्ट डिवीडन दीदियां अपनी धाक जमाने लगीं और खुद को वीमेस कॉलेज की ग्रेजुएट बताने लगीं । टीवी अपने साथ आत्म विश्वास लाया । अब सरस सलिल की क्लीवेज दिखाती कवर पेज वाली लड़की, सेक्सोलॉजी दर्पण या ब्लू फिल्म का घिर घिर करने वाला वीसीआर नहीं था । अब फैशन टीवी था जहां बिकनी पहन कर मॉडल चलती थीं । नंगी औरतों का तूफान आ गया था, दुनिया बदल गई थी ।

ये दुनिया दिन रात आंखों के सामने थी, यह लालसा थी, मध्यवर्ग टीवी की गिऱफ्त में था । टीवी नीचे पहुंच रहा था । वह मिट्टी के घरों का रुख कर रहा था । चार पांच साल पहले की बात होगी । बासुकीनाथ-देवघर रोड पर आदिवासी घर था । दादी लगातार गाली देती जा रही थी और अपनी पोती को बुलाती जा रही थी । सात फेरे शुरू होने वाला था और पोती गायब । अंत में उस औरत ने अपनी चाय की दुकान में बैठी बोल बम औरतों से सात फेरे देखने की पेशकश की ताकि वे उसे नाहर और सलोनी के डॉयलॉग ठीक ठीक समझा सकें । टीवी ने उन युवाओं को सुविधा दी कि वे रेपीडेक्स और ट्रांसलेसन के चक्कर में पीछे रह गए फ्लो को आगे बढ़ाएं । उनके पास हर्षा भोगले था जो समझ में आता था ।

उस टीवी पर अपनी बिरादरी से निकल कर किसी को देखना, जिसने न टोन ठीक किया, न अंग्रेजी, हीनभावना से ग्रस्त, असफलता से आक्रांत बिहारी के लिए खुद को देखना था, यह उसकी जीत थी । जैसे सचिन का शतक भारतीय अहम के लिए आत्मविश्वास का सबब था । सचिन जैसे तैसे होना नहीं, बेस्ट होना था, और वह भारतीयों के लिए खुद को बेस्ट समझने का सबब था । रवीश कुमार और उन जैसे कई लोगों ने अपनी पहचान कुछ इस तरह बनाई कि अंग्रेजीदां तबकों में कुछ ऐसे परिचय दिया जाने लगा कि अंग्रेजी उनकी कमजोर है पर हिन्दी में बेहतरीन लिखते हैं । यह हिन्दी माध्यम का धारा के विपरीत तैरना था । धारा को बदलने का काम टीवी ने किया । जैसे धारा को बदलने का काम इंटरनेट कर रहा है । भदेस होना स्टाइल हो गया, वह हम्बल और रूटेड होना हो गया । कुछ तो सबआल्टर्न की इज्जत बचाने में बुद्धिजीवी इंपोरियम का गमछा टांग कर घूमने लगे, देसी भाषा बोलने लगे, कुछ उन लोगों ने भदेस को स्टेटमेंट बनाया जिन्होंने सत्ता में समीकरण बदला और अंग्रेजीदां, एलीट वर्चस्व को तोड़ कर खुद को खड़ा किया ।

रवीश कुमार ने पत्रकारिता में वैसा ही स्टेटमेंट खड़ा किया । आप किसी भी आम आदमी से पूछिए, वो रवीश कुमार को जानता है, पी. साईनाथ को नहीं जानता । यह अंतर इसलिए है क्योंकि नीचे के पांच प्रतिशत की बात आप ऊपर के पांच प्रतिशत की भाषा में कहते हैं । इसलिए वही आपको नहीं जानते जिनकी आप बात करते हैं । दुर्भाग्य से भारतीय बुद्धिजीवियों का यही अभिशाप है कि जीवन भर जिनके लिए लिखा, सोचा वही उन्हें नहीं जानते । खैर उन महीन मुद्दों पर बात करने की अपन की औकात नहीं फिलहाल । तो रवीश की रिपोर्ट ने पहली बार टीवी पर उस भाषा को गंभीर रिपोर्ट के लिए इस्तेमाल किया जो बॉलीवुड या छोटे पर्दे पर सिर्फ कॉमेडी के लिए इस्तेमाल होती थी । यह शुद्ध हिंदी नहीं थी, यह टोनरहित भाषा नहीं थी । एलीट एंकर की काया में, न्यूजरूम में पहली बार एक मध्यवर्गीय आत्मविश्वास ने प्रवेश किया था । यह वो क्रीम बच्चा नहीं था जो टप से पनरह पचे पछोतर से बोलना चाहे पर फिफ्टीन फाइव जा सेवेंटी फाइव की हिचक में चुप रह जाए, दब जाए ।

भारतीय न्यूज चैनल पर अफसोस कि ऐसे उदाहरण अपवाद रह गए । अलग अलग जगहों से, अलग अलग भाषाओं की टोन लिए, अलग अलग जातियों के लोग स्क्रीन का समीकरण पूरी तरह बदलने नहीं आ सके । उसकी जगह महंगे मीडिया स्कूलों के अधकचरे ट्रेनी और इंटर्न ने ले ली । जो डिफरेंट है वो एक समय तक ही डिफरेंट रहता है, फिर वो मेनस्ट्रीम हो जाता है, सत्ता खुद में उसे जज्ब कर लेती है । जैसे रवीश कुमार सेलिब्रेटी बनते गए, वे लिखें शुक्रिया या वाह तो उस पर भी पचास लाइक । लेकिन रवीश की रिपोर्ट बंद हो गई । क्रांति करने के लिए आपके हाथ पैर बंधे हुए हैं । यह हिन्दी पब्लिक स्फीयर का अनिवार्य गुण है । वह आपको देवता बनाकर पूजेगा भी और मां-बहन की गाली भी देगा लेकिन वह आपको स्पेस नहीं देगा, वह आपको विकसित होने का मौका नहीं देगा । यह ब्रांड वैल्यू और ग्लैमर का दौर है । एनडीटीवी आपको पहचान देगी, काम को नहीं । जैसे रवीश की रिपोर्ट बंद होने के बाद दिल्ली मेट्रो में बड़े बड़े होर्डिंग लगे, भारत का नं 1 एंकर, प्राइम टाइम । प्राइम टाइम की बहस, उसका कंटेट सीन से बाहर । व्यक्ति को प्रोजेक्ट करना मार्केटिंग की पहली स्ट्रैटेडी होती है क्योंकि विचारधारा उसके पीछे छुप जाती है । जैसे मोदी के पीछे भाजपा और संघ छुप गए, केजरीवाल के पीछे आप की विचारधारा छुप गई । विचारधारा पर बात करना, उसे समझना मुश्किल होता है, कोई दिमाग नहीं लगाना चाहता । इंसान को आगे कीजिए, सब आसान हो जाएगा । उसकी निजी जिंदगी, उसका रहन सहन, बोल चाल, चीजें आसान हो जाती हैं । मीडिया पत्रकार को खत्म कर के सेलिब्रेटी की स्थापना करता है । यही सबसे बड़ी ट्रैजिडी है ।

हम कस्बा पर लिखने के लिए लिखना सुरु किए थे और भयानक डेविएट हो गए हैं । इसलिए अब पकाऊ हो जाएगा लेकिन हम बाज नहीं आएंगे । जय हनुमान ।

कहने का मन करता है

हिन्दुस्तान में कॉलम आता था ब्लॉग पर ब्लॉग वार्ता । वह ब्लॉगिंग का नया नया दौर था । हर हफ्ते कुछ ब्लॉग्स की चर्चा होती थी । कस्बा खुद कॉलम लेखक का ब्लॉग था । लेकिन वह ब्लॉग भर नहीं था । वहां कितनी रिपोर्ट, कविताएं, तस्वीरें, कितने प्राइमरी सोर्स, कितना कुछ था जो हैक हो गया । एक रिसर्चर के लिए फील्ड वर्क में नाक रगड़ कर भी जो कर पाना संभव नहीं था, वो कस्बा पर था । कहानियां थी, लप्रेक था । अंतिका प्रकाशन से रवीश की किताब आई थी देखते रहिए । महा रद्दी छपाई । गोबर जैसा कवर और प्रूफ की भारी गलती हर जगह । जैसे राजकमल ने इश्क में शहर होना छापी है भैयाजी टर्न्ड डूड/ बहनजी टर्न्ड बेब टाइप । मने जींस पहिन लिए लिवाइस का लेकिन दशहरा के मेला का गिलट वाला पायल भी पहनेंगे और नाक में गुलभी भी सोना का । उस पर से चोटी बना लेंगे और टॉप के ऊपर दुपट्टा ओढ़ लेंगे । हाय रे फैसन । कस्बा था जहां उन पोस्ट्स को, कहानियों को पढ़ने का मजा था । अब जब कि वो हैक हो गया है, बानर काव्य से लेकर एंकर काव्य तक सब नहीं है । हमारी वो मुस्कान, हमारी हंसी जो इन्हें पढ़ते हुए आई थी । कस्बा वो जगह थी जहां एक परेशान एंकर अपना दुख सुख लिखता था । सेलिब्रेटी बनने की मार से त्रस्त इंसान अपनी दुविधा साझा करता था । वह उस इंसान के लिए राहत का सबब था जो खुदरा लिख कर संतोष करता था क्योंकि पूरा लेखक होना संभव नहीं था । हिन्दी में संभव नहीं रहा कि आपकी भाषा में संगीत हो, आप लिखना चाहें और सिर्फ लेखक होकर जिंदा रहने की सोच लें । बेरोजगारी और भूख की मार झेलें और महान साहित्य लिखें या नौकरी करें और खुदरा साहित्य लिखें । ऐसा भी नहीं था कि कस्बा पर रोज कोई बम विस्फोट हो रहा था । इन जगहों पर इस तरह के हमले होना दुखद है । जिनको सरकार से तनख्वाह मिल रही है लिखने पढ़ने के लिए, सो कॉल्ड शोधार्थी और शोध निर्देशक, उन्हें ओल में कच्चू पैदा करने से फुरसत नहीं है । ले देकर जो भी स्पेस है, जहां भी नया कुछ लिखा जा रहा है उन्हें बंद करने की कोशिश हो रही है । रवीश की रिपोर्ट बंद हुई, कस्बा बंद हुआ । लेकिन फिर भी उम्मीद ..

(अब हम और नहीं लिख सकते । थक गए । ऊपर जो आलोख है उसको शोधपरक समझा जाए, हालांकि रिसर्च मेथडोलॉजी की हमने बाकायदा क्लास की है पर सीखा यही कि पैरवी कैसे लगानी चाहिए । ज्ञानीजन छिमा करेंगे । नीचे की टीप को हमारा चेपा हुआ फेसबुक पोस्ट समझा जाए।)

जय हिंद जय भारत ।

Of silencing the dissent and strange case of Charlie Hebdo

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/20/2015 02:07:00 PM

Samar Khan
 
The atrocious murderous attacks on more than a dozen French journalists by three gun-wielding assailants killing twelve people is a downright dastardly, reprehensible and condemnable act. Period. No questions asked. But unfortunately this understanding of the incident is taken to be a blasphemous oversimplification by some who have successfully managed to consolidate the  "white- benevolent- majority "against the "ungrateful-barbaric-other". With the seemingly plaintive but extremely volatile chants of 'Je Suis Charlie' by the 'liberals' all around the world, we are yet again seeing the record of 'you are either with us or them' political blackmail being played again by the Western media after the "War on Terror" drama. This deliberate camping is apparently aimed to segregate the advocates of freedom of expression who think “it’s- only- a funny-cartoon” from the ones who are “ not- even- sport- enough- to- take- a-joke.” Now this is a blasphemous over simplification.

With myriads lunging out the tune of freedom of expression after this episode, it is important to recognize that it is the western freedom of speech that  Western governments and institutions like the corporate-controlled media  are championing for. The freedom that belongs only to the powers-that-be to demean and demonize whomever the West requires for Western interests. When the same freedom is exercised to expose hypocrisy and fraudulence, then it stops being a “universal principle.” Censorship comes handy then; as with the case of Press TV, an informative and serious news channel that was banned in France because of its ''inappropriate projection of the State". It’s ironic but not surprising to hear Charlie Hebdo,  the ridiculously racist,  unabashedly sexist and notoriously xenophobic weekly magazine being hailed as 'heroic' by one of the Western war criminal, Sarkozy after the attack took place. Interestingly, the French President Francois Hollande who called last week's  massacre at the Charlie Hebdo magazine  'an attack on civilizaton' ,  last year called for a "fight against the sarcasm of those who purport to be humorists but who are actually professional anti-Semites", referring to the French artist  Dieudonné for publically practicing the Quenelle, the downward hand gesture supposedly an insult to the elite ruling class but what the artist himself calls a refusal to fascism. Similarly, when on  April 24, 1999, NATO (read US) attacked the Serbian state television headquarters by missiles, no inquiries were made, no claims de-rooted and no sardonic comments were made by the likes of Hollande or Obama on who stands for civilization and who for barbarity.  So, Western free speech which is presumed to be a divine inheritance like other values of human rights by the white man with imperial hangover, is nothing but a fictitious chimera, an empty rhetoric to fuel the self-proclaimed   European superiority by those in power to maintain their unlawful positions in the endemic hierarchy.

Back home in India which is supposed to be a 'free and democratic' nation, one sees  the very fabric of this fundamaental right of expression being regularly shredded when groups like Kabir Kala Manch or people like Jeetan Marandi, Arun Farreira, G.N. Sai, Hem Pandey, Sudhir, Seema are vehemently hounded, arrested, tortured and killed by the State when they dare to expose the fangs of the anti-people system through their writings, poems, songs or drawings. This is an absolute state inficted terrorism against the very freedom of expression that we have heard so much  about in the last few days. But the only difference is that the perpetrator here is not some untrustworthy, racially different and dangerous ' other' but the boisterous paternalistic savior State and the victim is the other way round and that completely changes the logics of the argument. Terrorism is not terrorism when a much more severe terrorist attack is carried out by those who are Righteous by virtue of their power. Similarly, there is no assault against freedom of speech when the Righteous curbs the people's right to assert against exploitation, plunder and loot by the machinery established via State-Corporate nexus. It is, indeed, a true satirical cartoon which Charlie Hebdo couldn't EVER think to draw about!

What happened   in Paris on 7th of January this year was wrong, condemnable and shocking but what was more shocking was the disgusting revelation of the racialized “secularism” of the French Republic in particular and the Western world in general that had put up with such an outrageous, self-proclaimed anti-clerical left, satirical magazine since 1960 in the name of “humor”. Equally disturbing is the realization of the suppressed angst, humiliation and pain suffered by the marginalized populace of the country who were  quite literally the butt of all the jokes for all these years. In the name of political ‘satire’, the magazine deliberately targeted the social minorities, shredding away the very nuances and complexities of this genre.

In the name of 'solidarity' with the assassinated we cannot ignore the fact that it has snowballed into a virulent anti-Muslim backlash all over Europe, mainly in Germany, UK and France. Without being obliged to give a 'decent interval' to the attack, criticism on Charlie Hebdo's ideological purposes is essential to dissect the evil power dynamics in Europe. We shouldn’t line up with the inevitable statist backlash against Muslims or any other marginalized group nor concede to the blackmail which forces us into solidarity with a racist institution.

लव जिहाद: एक सांप्रदायिक फैंटेसी का अतीत और वर्तमान

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/18/2015 04:38:00 PM



 प्रतिमान के लिए लिखे गए इस शोध आलेख में दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की प्राध्यापक चारु गुप्ता ने संघ परिवार द्वारा प्रचारित किए जा रहे लव जिहाद के मिथक को अनेक आयामों में समझने की कोशिश की है. वे इसकी ऐतिहासिक जड़ों की पड़ताल करती हैं, स्वाधीनता की लड़ाई के दौरान राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों से लेकर हिंदी साहित्य में वे इसके सूत्रों को तलाशती हैं और फिर हाल के समय में इस झूठ के फिर से नई शक्ल में जन्म लेने की पृष्ठभूमि को समझने की कोशिश करती हैं. साथ ही, एक जातीय और पितृसत्तात्मक समाज में रह रही स्त्री के लिए इस झूठे और प्रतिक्रियावादी प्रचार के क्या मायने हैं – वे इसकी तह में भी जाने की कोशिश करती हैं. इस पूरी छानबीन में वे परत दर परत लव जिहाद के झूठे, फासीवादी प्रचार को तार-तार करती हुई चलती हैं. वे यह दिखाती हैं कि किस तरह यह झूठ असल में सामंती-ब्राह्मणवादी समाज के ढांचे को कायम रखने और स्त्रियों पर पितृसत्तात्मक नियंत्रण को बनाए रखने का एक अभियान है, जो साथ-साथ ही मुसलमानों की झूठी छवियों और उनके खिलाफ नफरत को बढ़ावा देने का भी काम करता है. हाशिया पर इस लेख को प्रकाशित करने की अनुमति देने और इसे उपलब्ध कराने के लिए लेखिका के प्रति आभार के साथ. 
 

लव जिहाद एक ज़ायकेदार राजनीतिक फैंटेसी, एक मारक सांगठनिक रणनीति और जोशो-खरोश से छेड़ा गया मिथक-निर्मिति का एक अभियान है। यह हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा स्त्रियों के नाम पर सांप्रदायिक लामबंदी की एक समकालीन कोशिश है। उनका प्रचार है कि मुसलमान कट्टरपंथी लव जिहाद के बहाने हिंदू महिलाओं को धोखाधड़ी से अपने प्रेम जाल में फँसा कर उनका धर्मांतरण कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो महत्वपूर्ण प्रकाशन पांचजन्य और आर्गनाइज़र के 7 सितंबर, 2014 के अंक इसी विषय पर केंद्रित हैं। इन अंकों का आह्वान है: हमेशा हो प्यार, कभी ना हो लव जिहाद! पांचजन्य के आवरण पर एक पुरुष का कल्पना-चित्र है—पारंपरिक अरब साफा, दिल के आकार की दाढ़ी और कुटिल काले चश्मे में दिल के प्रतिबिंब के साथ। इस पृष्ठ पर सवाल है— प्यार अंधा या धंधा? हमने अगस्त और सितंबर के महीनों में विशेषकर उत्तर प्रदेश के हाल के चुनावों के तुरंत पहले लव जिहाद के इर्द-गिर्द  हिंदुत्ववादी सगंठनों का एक आक्रामक और संगठित अभियान देखा है। इसी दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों कस्बों और शहरों में धर्म जागरण मंच, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने इस मुद्दे पर जागरूकता रैलियों सभाओं और अन्य कायक्रमों का नित्य प्रति सिलसिला बना रखा था। एक इतिहासकार के रूप में मैं इस तरह के मिथकों की जड़ें औपनिवेशिक अतीत में भी देखती हूं जब 1920-30 के दशकों में उत्तर प्रदेश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तीखे विभाजन को परिभाषित और विकसित करने के लिए अपहरण अभियान और स्त्री यौनिकता का सवाल एक महत्वपूर्ण साधन बन गया था। जब भी सांप्रदायिक तनाव और दंगों का माहौल परवान चढ़ा है, तब-तब इस तरह के मिथक और प्रचार हमारे सामने आए हैं। लव जिहाद की राजनीति में वोट बैंक और चुनावी गणित के आलावा एक कामुक  मुसलमान पुरुष की गढ़ंत, तथाकथित हिंदू जनसंख्या में लगातार कमी की चिंता, कर्इ प्रकार की विसंगतियों से परे हिंदू समुदाय और हिंदू राष्ट्र का आह्वान, हिंदू महिला के रोज़मर्रा के जीवन पर चार आंखों और उसकी देह पर नियंत्रण, हिंदू पितृसत्ता का पुनर्गठन और स्त्रियों द्वारा स्वयं अपने निजी निर्णय लेने की चिंताओं जैसे मुद्दे स्पष्ट रूप से जुड़े हुए हैं। इस लेख में मैं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इन मुद्दों को रखने और उसे आज के लव जिहाद संबंधी मिथक के साथ जोड़ने का प्रयास करूँगी। तब और अब, यानी बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उभरे अपहरण प्रचार अभियान और लव जिहाद के बीच कोर्इ  सीधी रेखा खींची नहीं जा सकती, पर एक इतिहासकार के रूप में मैं कुछ मुद्दों के पुनर्जीवन-पुनर्वसन पर चकित हो जाती हूं। मैं देखती हूं कि हिंदू संकीणर्तावादी ताकतों द्वारा स्त्रियों की यौनिकता पर नियंत्रण का आग्रह और मुसलमानों का क्रूर चित्रण बदस्तूर जारी है। कभी-कभी उसके तेवर और ज्य़ादा चढ़ जाते हैं। देखना यह है कि क्या केवल बोतल नयी है और बाकी सब पुराना है, या समानताओं के बीच कुछ अंतर भी झलकते हैं?

हिंदू पुरुष का पराक्रम : समुदाय और हिंदू राष्ट्र का आह्वान

1920-30 के दशकों में उत्तर प्रदेश में हिंदू संगठनों की गति में एक नयी तेज़ी देखी गयी जिसके विभिन्न कारण थे।[1] विश्व-युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार की तरफ से किये गये राजनीतिक एवं संवैधानिक सुधारों में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को आंशिक रूप में मान्यता देने का एक व्यापक संदर्भ था। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि हिंदुत्ववादी प्रचारकों ने खिलाफत आंदोलन और मोपला विद्रोह[2] को एक तरह की एकताबद्ध, संगठित, सुनियोजित और आक्रामक मुसलमान आबादी के उदय के खतरे के रूप में देखा, जो उनकी निगाह में हिंदुओं और उनकी संस्कृति को नष्ट कर सकते थे। मोपलाओं द्वारा कथित बलपूर्वक धर्मांतरण, हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार और अपहरण के किस्सों को विशेष रूप से तरजीह दी गयी।[3] इसके साथ-साथ हिंदू समुदाय तथा हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए उत्तर प्रदेश में स्वामी श्रद्धानंद के सक्रिय नेतृत्व में आर्य समाज और हिंदू महासभा ने बड़े पैमाने पर शुद्धि और संगठन का कार्यक्रम शुरू किया।[4] आर्य समाज की मजबूत जड़ें वैसे तो पंजाब में थीं, लेकिन उत्तर प्रदेश में शुद्धि आंदोलन अधिक असरदार रहा। हालाँकि इस आंदोलन की उत्पति पहले ही हो चुकी थी। आपराधिक जाँच विभाग की एक टिप्पणी में बताया गया कि 1923 में व्यक्तिगत धर्मांतरण की जगह सामूहिक धर्मांतरण के लिए इसके प्रयोग ने इसे विशेष महत्व प्रदान कर दिया।[5] गाँधी शुद्धि आंदोलन के आलोचक थे। उनकी मान्यता थी कि इससे ज़बरदस्त सांप्रदायिक विभाजन पैदा हो सकता है।[6] इन आंदोलनों ने हिंदुओं से बार-बार अपमान का बदला लेने, साहसी बनने और महान हिंदू नस्ल का योद्धा बनने का आह्वान किया। हिंदू महासभा लखनऊ का नारा था :
वह व्यर्थ ही जन्मा जगाया जाति को जिसने नहीं।
हिंदुत्व जीवन की झलक आयी कभी जिसमें नहीं।।[7]

1923 के बाद हिंदू-मुसलमान दंगों की बाढ़ आ गयी। ब्रिटिश टीकाकारों के अनुसार भारत के किसी भी प्रांत की तुलना में उत्तर प्रदेश में उस अवधि में सबसे अधिक दंगे हुए।[8] हिंदू सुधार आंदोलन की राजनीतिक ऊर्जा अधिक कट्टर और लड़ाकू जन-अभिव्यक्ति की शक्ल लेने लगी।[9] इसी दौर में गोरक्षा जैसे मुद्दे के साथ मुसलमानों द्वारा हिंदू महिलाओं के अपहरण के खतरे को उठाया गया, और यह हिंदुओं के एक वर्ग के लिए हिंदू पहचान और चेतना के लिए लामबंदी का एक प्रमुख कारक बन गया।

आज हम देखते हैं कि किस प्रकार, विशेषकर भाजपा की विजय के बाद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े कई संगठनों को ऐसा लगने लगा है कि लव जिहाद का मुद्दा उन्हें न केवल एक नया जीवन देगा, बल्कि इस आक्रामक आंदोलन के ज़रिये वे उत्तर प्रदेश में हिंदुओं को एकजुट कर सकेंगे। इसलिए उन्होंने हर प्रकार के धर्मांतरण को संगठित रूप से चुनौती दी है। ये संगठन मानने लगे हैं कि लव जिहाद आंदोलन अंतर-धार्मिक प्रेम और धर्मांतरण को हिंदू समुदाय की प्रतिष्ठा, सांप्रदायिक संघर्ष में भागीदारी और पुरुषोचित भूमिका निभाने के आह्वान के साथ जोड़ सकेगा। इस मुद्दे ने हिंदुत्ववादी प्रचारकों को एक अहम संदर्भ बिंदु और एकजुटता बनाने के लिए एक भावनात्मक सूत्र प्रदान किया है। इससे न केवल हिंदू पहचान का एक बोध रेखांकित हुआ, बल्कि हिंदुओं के एक वर्ग को सूचना का एक आधार और उनके दैनिक जीवन के अनुभवों को एक व्याख्या भी मिली। लव जिहाद अभियान ने न केवल मुसलमान पुरुषों के खिलाफ भय तथा गुस्सा बढ़ाने का प्रयास किया है, बल्कि हिंदू पितृसत्ता और जातिगत विशिष्टताओं को तेज़ करने की भी कोशिश की है।

हिंदुत्ववादी प्रचारकों को यह भी लगता है कि लव जिहाद का मामला उठा कर वे समाज के जातिगत भेदभाव को दरकिनार करते हुए हिंदू सामूहिकता को एकजुट कर सकते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे गोरक्षा के झगड़े, त्योहारों पर दंगे या मसजिद पर संगीत संबंधी विवाद के मुद्दे उठाएँगे तो वे दलितों को आकर्षित नहीं करेंगे। लेकिन औरतों का मुद्दा ऐसा है जिससे जाति को परे रखकर सभी हिंदुओं को लामबंद किया जा सकता है। इसीलिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हिंदुओं का आह्वान करते हुए इलाके के भाजपा नेता संगीत सिंह सोम ने हाल में घोषणा की है कि वे मेरठ ज़िले के अपने निर्वाचन क्षेत्र सरदाना में लव जिहाद के खिलाफ महापंचायत करेंगे।[10] इस प्रकार स्त्री का शरीर हिंदू प्रचारकों के लिए एक केंद्रीय चिह्न बन जाता है।

कामुक मुसलमान के (कु) कर्म : लव जिहाद के मिथक में मुसलमान पुरुष की छवि

औपनिवेशिक उत्तर भारत में, विशेषकर उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के आरंभ में, मुसलमान पुरुषों का अवमूल्यन खास कर स्त्री संबंधी शब्दावली में किया गया। मुसलमान मर्द बहुत बार बलात्कारी या अपहरणकर्ता दिखाया जाने लगा। इस दौर के अधिकांश हिंदी साहित्यकारों को सांप्रदायिक या राष्ट्रवादी, मुसलमान समथर्क या विरोधी की श्रेणियों में नहीं डाला जा सकता। उनकी रचनाओं में परस्पर विरोधी रुझान देखे जा सकते हैं, पर वे सभी हिंदू और भारतीय दोनों को एक पयार्यवाची मानते लगते हैं। इन साहित्यकारों के घोषित विचार, मकसद और मंज़िल चाहे जो भी रहे हों उनके रुझानों में खतरनाक संभावनाएं निहित थीं और वे एक नए हिंदुत्ववादी राष्ट्रीय संचेतना के निर्माण में खासी मदद कर सकती थीं। भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-85), प्रतापनारायण मिश्र (1856-94) और राधाचरण गोस्वामी (1859-1923) जैसे कर्इ प्रमुख हिंदी लेखक प्राय: मुसलमानों को हिंदू महिलाओं के बलात्कारी और अपहरणकर्ता के रूप में चित्रित करते थे। 1890 के दौर के लोकपिय्र हिंदी रचनाकारों की पहली पीढ़ी— देवकीनदंन खत्री, किशोरीलाल गोस्वामी और गंगाप्रसाद गुप्त— इन्हीं पूर्वाग्रहों का शिकार थी।[11] इनमें मुसलमान मुख्यत: लंपट, व्यभिचारी, अंधकामवासना के शिकार, धार्मिक रूप से कट्टर जैसे नज़र आते थे। अन्यता के इस विमर्श ने इस तरह की प्रभावशाली सांस्कृतिक रूढ़िबद्ध धारणाएं तैयार कीं कि संदर्भ खत्म हो जाने पर भी वे अवचेतन के धरातल पर सक्रिय बनी रहीं।

इस समय, विशेष रूप से 1920-30 के दशकों में, मुख्य रूप से आर्य समाज द्वारा इस्लाम और कुरान की निंदा करते हुए काफी संख्या में निंदात्मक साहित्य का प्रकाशन किया गया। ये पुस्तकें न केवल मुसलमानों पर हमला करती थीं, बल्कि स्पष्ट रूप से लिंगभेद की ओर भी संकेत करती थीं।[12] बरेली और रुहेलखण्ड में वितरित की गयी ऐसी प्रचार-पुस्तिकाओं की एक शृंखला अपमान करने की एक खास शैली में लिखी गयी थी।[13] उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर शहरों में एक प्रचार पुस्तिका इस्लाम की तीली तीली झार थी। कई पुस्तकें गप, पैरोडी और व्यंग्य की शैली में लिखी गयी थीं। 1920 के दशक में प्रकाशित सनसनीखेज़ पुस्तकें रंगीला रसूल और विचित्र जीवन में आर्य समाज ने पैगंबर का अपने नज़रिए से मज़ाक उड़ाया था। रंगीला रसूल पहले उर्दू में मई, 1924 में लाहौर से प्रकाशित हुई और बड़ी लोकप्रिय साबित हो कर खूब बिकी। मुसलमानों ने जल्द ही इसका विरोध शुरू किया और एक मुकदमा दर्ज किया गया।[14] लेकिन पुस्तक का हिंदी अनुवाद कर उसे फिर से प्रकाशित करके बड़े पैमाने पर उत्तर प्रदेश में वितरित किया गया।[15] साथ ही इसका विरोध भी जारी रहा। हिंदी में विचित्र जीवन का लेखन आर्य समाज के एक उपेदशक कालीचरण शर्मा ने किया और नवंबर, 1923 में आगरा से पहली बार लेखक द्वारा इसे प्रकाशित किया गया। इस्लाम धर्म का लगातार ऐसी कई पुस्तिकाओं में मज़ाक उड़ाया गया। एक पुस्तक ने लिखा :

भारतवर्ष में जो इस्लाम का स्वरूप है वह बड़ा संकुचित और दकियानूसी है।... उसका स्वरूप बंध्या स्त्री जैसा है। उसमें से महापुरुष पैदा नहीं हो सकते; किसी प्रकार की उन्नति उससे हो नहीं सकती।... औरतों की इज़्ज़त का भाव भी इस्लाम में नहीं है।[16]

इस दौर में पद्मिनी और अलाउद्दीन से जुड़े किस्से बार-बार दोहराए गये।[17] 1920-30 में लव जिहाद शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ था, लेकिन उस समय में भी कई हिंदू संगठनों— आर्य समाज, हिंदू महासभा आदि— के एक बड़े हिस्से ने मुसलमान गुण्डों द्वारा हिंदू महिलाओं के अपहरण और धर्म परिवर्तन की अनेक कहानियाँ प्रचारित कीं। इन संगठनों ने कई प्रकार के भड़काऊ और लफ्फाज़ी भरे वक्तव्य दिये जिनमें एक कामुक मुसलमान की तस्वीर गढ़ी गयी। इन वक्तव्यों का ऐसा सैलाब आया कि मुसलमानों द्वारा हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार, आक्रामक व्यवहार, अपहरण, बहलाना-फुसलाना, धर्मांतरण और जबरन मुसलमान पुरुषों से हिंदू महिलाओं की शादियों की कहानियों की एक लंबी सूची बनती गयी। लंपटता, अपहरण और धर्मांतरण अब केवल शासकों और पैगंबर तक ही सीमित नहीं रह गए। खलनायक के रूप में अब केवल असाधारण घटनाएँ या मध्ययुगीन अतीत की बुरी चीज़ें ही नहीं रह गयीं। औसत मुसलमान को वैसा ही दर्शाया जाने लगा।[18] 1924 में एक मामला सामने आया जब कानपुर के डिप्टी कलक्टर रज़ा अली पर एक हिंदू स्त्री का अपहरण करने और फिर उसका उत्पीड़न करने का आरोप लगाया गया। यह भी कहा गया कि उन्होंने ज़बरन हिंदू स्त्री का धर्मांतरण किया है। स्थानीय हिंदी अखबार इस वारदात से भरे पड़े थे और उन्होंने रज़ा अली के खिलाफ तीखा अभियान शुरू कर दिया। इस मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि अपहरण की गतिविधियाँ निचली जाति या उद्दंड मुसलमानों तक ही सीमित नहीं रह गयी हैं। उदाहरण के लिए प्रताप और अभ्युदय ने रज़ा अली की हरकत की निंदा करते हुए टिप्पणी की कि रज़ा अली की हरकतें इस बात की परिचायक हैं कि सारे मुसलमान ऐसी गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं। आर्य पुत्र के अनुसार मुसलमानों का, खास तौर पर महिलाओं के मामले में, विश्वास नहीं किया जा सकता और हिंदुओं को इस घटना से सबक लेना चाहिए। आज़ाद ने भी इस घटना की निंदा की।[19] इस मामले में लोगों का गुस्सा बढ़ने का संभवत: एक अन्य कारण यह भी था कि मामले से जुड़ी महिला सुलतानपुर की एक ब्राह्मण विधवा थी। उसकी जाति और हैसियत हिंदुत्ववादी शक्तियों को एकजुट करने में सहायक बनी। अपहरण प्रचार अभियान में मुसलमान पुरुषों की ऐसी चरित्रहीनता प्रदर्शित की गयी जिससे पता चलता था कि हिंदू महिलाओं के प्रति उनमें ज़रा भी आदर भाव नहीं था। मुसलमानों को कुएँ के पास, अस्पताल में और पड़ोस में यानी रोज़ाना जिंदगी से जुड़ी जगहों पर हिंदू नारी को बरगलाते हुए दर्शाया गया।[20] ऐसे दोषारोपण में परंपरावादी हिंदू संगठनों ने आर्य समाज के साथ सहभागिता की और अपहरण अभियान को लेकर इनके बीच एकता दिखार्इ  पड़ी। सनातन धर्म का समर्थक और काशी से प्रकाशित हिंदी साप्ताहिक भारत धर्म लगातार मुसलमान पुरुषों पर नारी का उत्पीड़न करने का आरोप लगाता रहा।[21]

अगस्त, 1924 में प्रतापगढ़ में मुसलमान विरोधी पर्चे बांटे गए जिसमें आरोप लगाया गया कि साधु के पहनावे में मुसलमान हिंदू नारियों के पास जा रहे हैं।[22] उसी समय चंद 'मुसलमानों की हरकतें’ नाम से एक कविता लिखी गयी, जिस पर बाद में प्रतिबंध लगा। कविता के उद्गार कुछ इस प्रकार हैं:

ऐ आर्यो क्यों सो रहे हो पैर पसारे।
मुसलमान ये नहीं होंगे हमराह तुम्हारे।...
तादाद बढ़ाने के लिए चाल चलायी।
मुसलमान बनाने के लिए स्कीम बनायी।....
इक्कों को गली गाँव में ले कर घुमाते हैं।
परदे को डाल मुसलमान औरत बिठाते हैं।।[23]

इस तरह के दुष्प्रचार के परिणामस्वरूप मुसलमानों को निरंतर सार्वजनिक रूप से प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ा। उदाहरण के लिए 1927 में शाहगंज, जौनपुर में एक मुसलमान और उसकी पत्नी को आर्य समाजियों द्वारा दो बार रोका गया। मुसलमान महिला को अपना चेहरा और हाथ दिखाने के लिए बाध्य किया गया ताकि साबित हो सके कि वह कोई अपहृत हिंदू नारी नहीं है। लव जिहाद के मिथक में भी वासना से भरपूर, कामुक मुसलमान पुरुष का हौवा आक्रामक रूप से खड़ा किया गया है। मुसलमानों में मर्दानगी की भावना को अनियंत्रित बताते हुए उस पर प्रतिबंध लगाना उचित घोषित किया गया है। यहाँ तक की कुछ हिंदुत्ववादी संगठन और उनके समर्थक तो लव जिहाद को मुसलमान पुरुषों की गतिविधि का पर्याय समझने लगे हैं। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी का वक्तव्य है : क्या उन्हें लड़कियों के साथ बलात्कार करने का अधिकार मिल गया है क्योंकि वे एक विशेष धर्म से जुड़े हैं? [24] उन्होंने अपना कथन जारी रखते हुए कहा कि नब्बे प्रतिशत बलात्कार मुसलमान करते हैं।[25] लव जिहाद आंदोलन के दौरान हिंदू संप्रदायवादियों के एक बड़े वर्ग ने विभिन्न मीडिया में कामवासना से भरपूर, ललचाए मुसलमान पुरुष की लगातार ऐसी छवि प्रचारित की है जो हिंदू महिलाओं के शरीर की पवित्रता भंग करता है। इसके अलावा लव जिहाद में कई नयी चीज़ें भी शामिल हुई हैं, जिसमें मुसलमानों के साथ आतंकवाद और आतंकवादी हमले, मुसलमान सांप्रदायिकता, आक्रामक मुसलमान नौजवान की छवि, विदेशी फंड और अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र जैसी बातें भी जोड़ दी गयी हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा के प्रवक्ता डॉ. चंद्रमोहन का कहना है कि लव जिहाद अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र का हिस्सा है जिसका निशाना मासूम हिंदू लड़कियाँ हैं। इसके अलावा यह आरोप भी लगाया गया है कि खूबसूरत और सजे-धजे नौजवान मुसलमान लड़के, जिनके नाम गोल-मटोल होते हैं और बाँहों पर पूजा के लाल धागे बँधे होते हैं, लड़कियों के स्कूलों और कॉलेजों के आस-पास मँडराते रहते हैं। यह भी कहा गया है कि ये साज़िश देवबंद में रची गयी है। इस प्रक्रिया में सार्वजनिक यौन हिंसा का संदर्भ बिंदु मुसलमानों की तरफ स्थानांतरित होता गया है और हिंदू पुरुषों को इससे मुक्त कर दिया गया है।[26] नफरत फैलानेवाले अभियानों की एक अन्य विशेषता होती है एक ही बात के दुहराव-तिहराव ताकि लोगों के सामान्य ज्ञान में शुमार हो जाए। लव जिहाद आंदोलन में बलात्कारी मुसलमान पुरुष और असहाय हिंदू स्त्री का झूठा दुहराव बार-बार नज़र आता है जिससे सांप्रदायिकता मज़बूत होती है। इस तरह के मिथक कई बार अवचेतन में समा कर थमाए गये ज्ञान का हिस्सा बन जाते हैं।

हिंदू कोख, मुसलमान संतति

औपनिवेशिक दौर का अपहरण आंदोलन और लव जिहाद, दोनों ही हिंदुओं की संख्या के सवाल से भी जुड़े हैं। औपनिवेशिक काल में जनगणनाओं का हवाला देकर धार्मिक संप्रदायों की वृद्धि और ह्रास का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाने लगा।[27] हिंदू संप्रदायवादियों को आबादी और जनसांख्यिक राजनीति को लेकर काफी चिंताएँ थीं। हिंदुओं की घटती संख्या का हवाला देकर मृतप्राय हिंदुओं का मिथक गढ़ा गया।[28] बार-बार हिंदू आबादी में आ रहे तथाकथित घाटे पर शोक व्यक्त करते हुए विलाप किया गया। यह कहा गया कि 33 करोड़ से घटते-घटते उनकी संख्या अब 20 करोड़ तक आ पहुँची है।[29] एक अन्य स्थान पर कहा गया कि अगर हिंदुओं ने अपनी संख्या जल्दी ही नहीं बढ़ाई तो हिंदुस्तान हिंदुस्तान की बजाय एक दिन मुसलमानस्थान हो जाएगा और हिंदुओं के कुछ भी हक न रह जाएँगे।[30] एक पुस्तक ने 1911 की जनगणना का उदाहरण देते हुए लिखा : 'घटते घटते करोड़पति का कोष भी एक न एक दिन खाली हो ही जाता है, और बढ़ते-बढ़ते छदामीलाल भी करोड़पति हो ही जाते हैं।’ [31] अखबारों, पत्रिकाओं तथा जाति-केंद्रित पत्रिकाओं में भी यह मुद्दा प्रमुखता से छापा जा रहा था।[32] हमारा भीषण ह्रास शीर्षक से छपी एक पुस्तिका, जो प्रताप अखबार में छपे ऐसे अनेक लेखों का संकलन थी, ने बताया कि किस प्रकार बढ़ते धर्मांतरण के कारण हिंदुओं की आबादी में भयंकर गिरावट आ रही है।[33]

लव जिहाद के वितण्डे में भी बार-बार कहा जाता है कि हिंदू महिलाएँ मुसलमान पुरुषों से विवाह कर रही हैं और मुसलमानों की संख्या बढ़ा रही हैं। राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ का दावा है कि लव जिहाद या प्रेम के नाम पर मासूम हिंदू महिलाओं के ज़बरिया धर्मांतरण का एक मुख्य ध्येय है कि हिदुओं की आबादी में गिरावट और मुसलमानों की आबादी में इज़ाफा। और यह एक अंतर्राष्ट्रीय साज़िश का हिस्सा है।

हिंदुत्ववादी संगठनों का नारा है : हम दो, हमारे दो, वो पांच, उनके पच्चीस। लेकिन विभिन्न सर्वेक्षण इस बात को पूरी तरह खारिज कर चुके हैं। ध्यान देने की बात यह है कि ऐसे तर्कों का सहारा लेकर कैसे एक बहुसंख्यक संप्रदाय भी अपने आप को सकंटग्रस्त अल्पसंख्यक के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। असल में हिंदुत्ववादी प्रचारक इस तरह के अभियानों के ज़रिए हिंदू स्त्री की प्रजनन क्षमता पर भी काबू करना चाहते हैं। वे उसे हिंदुत्व की घेरेबंदी के अंदर सुरक्षित रखना चाहते हैं। एक ज़रूरतमंद समुदाय की बेहतर अर्थव्यवस्था के लिए संभावित शिशुधारक गर्भों पर नियंत्रण ज़रूरी समझा जा रहा है।

जबरन धर्मांतरण?

धर्मांतरण जाति के निचले पायदान पर रहने वालों के लिए अपने हालात में बेहतरी, प्रतिरोध, प्रतिवाद, श्रेणीबद्ध जीवन के नकार, और सामाजिक चौहद्दियों के पुनर्गठन के लिए एक आम उपाय रहा है। मध्ययुग में कई निम्न जातियों ने इस्लामी परंपरा को अपनी जि़ंदगी और तहज़ीब में शिद्दत से शामिल किया था।[34] औपनिवेशिक काल में दलितों के एक हिस्से द्वारा ईसाई धर्म में धर्मांतरण एक प्रतिकारात्मक कार्रवाई थी, जिससे वे एक असमान सामाजिक व्यवस्था में आगे बढ़ते हुए समाज के अगले पायदान पर कदम रख सकते थे। उन्हें औपनिवेशिक आधुनिकता अपनाने का मौका मिल सकता था। वे सार्वजनिक हलकों में सम्मान पा सकते थे। अपनी पहचान बदल सकते थे और अपना अतीत पीछे छोड़ सकते थे।[35] साथ ही कई बार उन्हें एकेश्वरवाद, साम्यवाद और उदारतावाद के सिद्धांत, भले ही वे सैद्धांतिक हों, भी आकर्षित करते थे।

कई हिंदू प्रचारकों का तर्क है कि उन्हें स्वैच्छिक धर्मांतरण पर कोई आपत्ति नहीं है, पर वे ज़बरन धर्मांतरण के खिलाफ हैं। लेकिन सवाल यह है कि हमारी ज़बरिया की परिभाषा क्या है? ऐतिहासिक तौर पर जब दलित या हिंदू समाज के हाशिये पर रहनेवाली स्त्रियों— विधवा, नीची जाति की स्त्री या वेश्या ने धर्मांतरण किया है, तो वे प्राय: इस बात से भी प्रभावित और लाभान्वित रहे हैं कि उन्हें अन्य धर्म में सम्मान, शिक्षा, कपड़े, रोज़गार और रोटी-बेटी के संबंध हासिल होंगे। क्या जाति के कठोर अनुशासन के खिलाफ ऐसे रैडिकल प्रतिकार या बेहतर शिक्षा और कपड़े के ज़रिये आधुनिकता में प्रवेश को लालच या ज़बरन कहा जा सकता है? और ऐसे में आदित्यनाथ के एक वीडियो-वक्तव्य का क्या मतलब निकाला जाए : 'हिंदू लड़कियाँ मुसलमान मर्द से क्यों शादी कर रही हैं? इसकी जाँच होनी चाहिए।... हमने फैसला किया है के यदि वे एक हिंदू लडक़ी का धर्मांतरण करेंगे तो हम उनकी सौ लड़कियों का धर्मांतरण करेंगे।’[36] या धर्म जागरण मंच के नेता राजेश्वर सिंह का यह बयान दृष्टव्य है कि 'हम बीसवीं सदी की शुरुआत में शुद्धि आंदोलन के नेता स्वामी श्रद्धानंद के शहादत दिवस, 23 दिसंबर, को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कम-से-कम पचास जगहों पर मुसलमानों का हिंदू धर्मांतरण करेंगे।’

हर बलात्कार या धोखों से धर्मांतरण की छानबीन होनी चाहिए और अपराधियों को दण्डित किया जाना चाहिए। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब अलग-अलग घटनाओं को एक ही चश्मे से देखा जाने लगता है, और हम प्यार, रोमांस और हर अंतर्धर्मी विवाह को जबरन धर्मांतरण के नज़रिये से जाँचने लगते हैं। ऐसे में क्या हिंदुत्ववादी समर्थक भाजपा के नेताओं एम.जे. अकबर, मुख्तार अब्बास नकवी, शाहनवाज़ हुसैन और दिवंगत सिकंदर बख्त को भी लव जिहाद का अपराधी समझा जाएगा क्योंकि उन्होंने हिंदू स्त्रियों से शादी रचाई है? सुब्रमण्यम स्वामी की अपनी बेटी का क्या होगा जो एक मुसलमान से ब्याही हैं? क्या यह सब लव जिहाद है?

हिंदू संगठन यह तर्क भी देते हैं कि यदि कोर्इ प्रेमवश शादी करता है, तो धर्मांतरण क्यों? लेकिन धर्मांतरण कर्इ बार अंतरंग चाहतों और निकटता से जुड़ा होता है। प्यार, सहवास और शादी के लिए कभी- कभी धर्मांतरण एक रास्ता बनता है। इसके अलावा धर्मांतरण एक व्यक्तिगत इच्छा और चुनाव है, जिसकी हमारे संविधान में तसदीक है। साथ ही, विशेष विवाह अधिनियम में जिसके तहत ऐसी शादियां होती हैं, एक माह के सार्वजनिक नोटिस का प्रावधान है। अतंर-धार्मिक प्रेम करनेवाले जोड़े पहले ही काफी विरोधों से गुज़र रहे होते हैं और एक माह के नोटिस की अवधि से बचना चाहते हैं। इन हालात में धर्मांतरण एक रास्ता खोलता है। एक नौजवान जोड़ा हज़ार मुश्किलों और विरोधों के बीच अपनी शादी को जल्दी-से-जल्दी कानूनी जामा पहनाना चाहता है। इस संदर्भ में विशेष विवाह अधिनियम के प्रावधान मुश्किल और रुकावट से भरे हैं। लव जिहाद जैसे मिथक संवैधानिक नैतिकता की बजाए नैतिक घबराहट और सार्वजनिक नैतिकता को तरजीह देते हैं। हिंदू स्त्रियों के व्यक्तिगत धर्मांतरण ने हिंदू संगठनों को उद्वेलित कर दिया है क्योंकि इसमें स्त्रियों द्वारा चुनाव, चाहत और प्रायोगिकता के पुट भी होते हैं। ऐसा लगता है कि हिंदुओं के मुसलमान धर्मांतरण, खासकर हिंदू महिलाओं के धर्मांतरण के संदर्भ में हिंदुओं का एक तबका अपनी तार्किकता खो देता है। भूल-भुलावे और नादानी के मिथक, हमले, अपराध, लालच, बलात्कार के शोर-गुल के बीच सांस्कृतिक शुद्धता की राजनीति की असलियत कर्इ बार छुप जाती है।

पीड़ित और अपहृत हिंदू महिला

हिंदू प्रचारकों द्वारा सामूहिक शत्रु के भय को पहचानने और बढ़ावा देने के लिए हिंदू महिला एक निर्णायक साधन बन गयी है। लव जिहाद की आक्रामक हिंदू राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने एक पीड़ित और अपहृत हिंदू महिला की छवि का लगातार इस्तेमाल किया है। लव जिहाद की फैंटेसी हिंदू महिलाओं की असहायता, नैतिक मलिनता और दर्द को उजागर करते हुए उन्हें अक्सर मुसलमानों के हाथों एक निष्क्रिय शिकार के रूप में दर्शाती है। हिंदू समाज के एक हिस्से में इन पीड़ित स्त्रियों के प्रति सहानुभूति उमड़ पड़ती है। धर्मांतरित हिंदू स्त्री पवित्रता और अपमान, दोनों का प्रतीक बन जाती है। लव जिहाद शब्द और अभियान की ईज़ाद के पहले से ही बजरंग दल 'बहू-बेटियों की इज़्ज़त बचाओ’ अभियान चला रहा था।[37] कर्नाटक में राम सेना के नेता प्रमोद मुत्तालिक ने 'बेटी बचाओ आंदोलन’ छेड़ रखा था। प्रमोद मुत्तालिक ने ही सबसे पहले लव जिहाद नाम चलाया। उनका कहना है कि 2005 में देश भर में आतंकवादी गतिविधियों के दौर में हिंदू संगठनों की बैठक में सबसे पहली बार इसकी चर्चा की गयी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुज़फ्फरनगर दंगों के बाद भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा वितरित पत्रिका भारत : दारुल हरब या दारुल इस्लाम में कहा गया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2008-11 के बीच लव जिहाद की 1611 वारदातें हुईं। हाल-फिलहाल मेरठ में मेरठ बचाओ आंदोलन संगठन की शुरुआत हुई है जिसने लव जिहाद के खिलाफ लड़ने का और अपनी बेटियों को बचाने का बीड़ा उठाया है।[38]

इसके अलावा इस प्रकार के अभियान अक्सर हिंदू स्त्री को कुछ इस तरह दर्शाते हैं जैसे वह आसानी से फुसलार्इ जा सकती हैं। सहारनपुर में भगवान गुरु बाबा रजकदास मोरपंख और पवित्र जल के साथ अतंर्धार्मिक प्यार की बीमारी का इलाज करने का दावा करते हैं। भगवान गुरु के अनुसार मुसलमान लडक़ों के जाल में फंसने वाली भोलीभाली हिंदू लड़कियां अपने शोषण से बेखबर और अनजान रहती हैं। बाबा रजकदास खुद को इस बीमारी के इलाज का विशषेज्ञ बताते हुए दावा करते हैं कि उन्होंने अकेले सहारनपुर में 200 और नज़दीकी मुज़फ्फरनगर और शामली में 500 लड़कियों का इलाज किया है।[39] हिंदुओं की नैतिक ब्रिगेड के लिए यह सोचना असंभव है कि हिंदू लड़कियां खुद भी अपनी मर्जी से अंतर्धार्मिक प्रेम, पलायन, सहवास, विवाह और धर्मांतरण का कदम उठा सकती हैं।

उनका अपना वजदू, अपनी कोर्इ इच्छा, चेतना या एजेंसी हो सकती है—इस सोच को दरकिनार कर दिया जाता है। इसलिए हिंदू संगठन एक हिंदू स्त्री और एक मुसलमान मर्द के बीच हर रोमांस और विवाह को सामूहिक रूप से लव जिहाद की श्रेणी में डाल देते हैं। यह भी हिंदुत्ववादी प्रचारकों की समझ से परे है कि हिंदू स्त्रियाँ अपने हिंदू परिवारों से बाहर जाकर प्रसन्न रह सकती हैं। यह अपने-आप में मान लिया जाता है कि एक मुसलमान के साथ विवाह और जीवन निर्वाह में हिंदू महिला पक्के तौर पर दुखी और परेशान जीवन जीने के लिए अभिशप्त है।

मुसलमान कट्टरवाद

आम तौर पर हिंदू संगठन आरोप लगाते हैं कि लव जिहाद के मिथक को उजागर और उसे झूठा करार देने वाले तस्वीर का केवल एक पहलू देखते हैं। हालाँकि लव जिहाद का हव्वा तो हिंदू संगठनों ने ही पैदा किया है, फिर भी औपनिवेशिक काल का अपहरण अभियान और लव जिहाद जैसे मिथक जहाँ मुसलमानों में डर पैदा करते हैं, वहीं मुसलमान कट्टरवाद को भी बढ़ावा देते हैं। ज़्यादातर नस्ली और जातीय समूहों में मिलावट और विजय-पराजय को लेकर काफी दुश्चिंताएँ पाई जाती हैं। 1920-30 के दशकों में भी मुसलमानों का एक वर्ग अधिक आक्रामक हो गया था और उसने मुसलमानों को संगठित करने के लिए तंज़ीम का, और उनमें शिक्षा व एकता का प्रसार करने के लिए तबलीग का, आह्वान किया था। साथ ही उन्होंने लोगों को इस्लाम में धर्मांतरित करने का बीड़ा उठाया था। इसने आग में घी का काम किया था।[40] आज के दौर में भी, विशेषकर लव जिहाद जैसे आंदोलनों के परिप्रेक्ष्य में मुसलमान कट्टरवादियों ने स्त्रियों पर नियंत्रण के कई प्रयास किये हैं, और वे भी उतने ही पितृसत्तात्मक शब्दावलियों से भरे हैं। इसलिए मेरठ में एक मदरसा चलने वाले मौलाना अमीरुद्दीन कहते हैं कि हमें अवैध संबंधों और शादी पूर्व सेक्स के खिलाफ कड़े कानूनों की ज़रूरत है।[41] हमारे समाज का पितृसत्तात्मक और धार्मिक ढाँचा इतना मज़बूत है कि मुसलमान परिवार भी अपनी लड़कियों और लड़कों के हिंदू लड़कों और लड़कियों से विवाह से उतने ही चिंतित हो जाते हैं। वास्तव में अधिकतर हिंदू और मुसलमान परिवार, दोनों ही, अंतर्धार्मिक विवाह का विरोध करते हैं। इस कारण भी लव जिहाद को एक संगठित साज़िश कहना खोखला लगता है। ये भी गौरतलब है कि बहुसंख्यकों की सांप्रदायिकता कई बार अधिक खतरनाक हो जाती है। हिंदुत्ववादी संकीर्ण ताकतों और प्रचारकों ने पहले से कहीं ज़्यादा उग्र होकर सांप्रदायिक सीमाबंदी के लिए महिलाओं की देह को अपने तर्कों का तीर बनाया है।

मुसलमान औरत— हिंदू मर्द

हिंदू संगठन यह भी कहते हैं कि हिंदू स्त्रियाँ ही अक्सर मुसलमान पुरुषों के जाल में फँसती हैं, जबकि मुसलमान स्त्रियों के साथ हिंदू पुरुष ऐसा कभी नहीं करते, और इस प्रकार के प्रेम और विवाह के उदाहरण भी न के बराबर हैं। लेकिन हमारी हिंदी फिल्में तो अधिकतर जब अंतर्धार्मिक रोमांस चित्रित करती हैं तो वह हिंदू पुरुष और मुसलमान स्त्री के बीच ही होता है, जैसे गदर, वीर ज़ारा, बॉम्बे इत्यादि। इसके अलावा, हमारे पास कई जाने-माने उदाहरण हैं जिसमें एक मुसलमान स्त्री ने एक हिंदू पुरुष से प्यार या शादी की है— जैसे नर्गिस और सुनील दत्त; अलवीरा खान और अतुल अग्निहोत्री; ज़रीना वहाब और आदित्य पंचोली; हृतिक रोशन और सुज़ैन खान, सलमा सिद्दीकी और प्रसिद्ध उर्दू लेखक कृष्ण चंदर; मुनैरा जसदनवाला और मुंबई के भूतपूर्व शेरिफ नाना चूड़ासामा जो एक हिंदू गुजराती राजपूत हैं; फातिमा घड़ीयाली और क्रिकेट खिलाड़ी अजीत अगरकर, जो महाराष्ट्र के ब्राह्मण हैं; साराह अब्दुल्ला और कांग्रेस के विधायक सचिन पायलट। नायरा मिर्जा, जो मिस इण्डिया 1967 की फाइनलिस्ट थीं, ने विवाह के बाद हिंदू धर्म में धर्मांतरण किया और अपना नाम नलिनी पटेल रख लिया। मुसलमान समाज से आयी कई पत्रकारों ने हिंदू पुरुषों से विवाह किया है।

लेकिन यह कितना विरोधाभासी है कि हिंदुत्ववादी प्रचार में जब हिंदू स्त्री मुसलमान पुरुष के साथ विवाह करती है तो उसे हमेशा अपहरण के तौर पर व्यक्त किया जाता है, पर जब मुसलमान स्त्री हिंदू पुरुष के साथ विवाह करती है तो उसे प्रेम की संज्ञा दी जाती है।

औपनिवेशिक उत्तर प्रदेश में भी इस तरह की कई कहानियाँ और उपन्यास लिखे गये जिनमें हिंदू पुरुष को, जो किसी मुसलमान नारी से प्यार करने में सफल होता था, एक अद्भुत नायक के रूप में पेश किया गया। एक न्यायोचित हिंदू पुरुष की छवि बनाई गयी, जो मुसलमान महिला को अपहरण नहीं, प्यार से आकर्षित करता था। एक मशहूर उपन्यास शिवाजी व रोशनआरा इस समय प्रकाशित हुआ, जिसे अप्रामाणिक सूत्रों के हवाले ऐतिहासिक बताया गया। इसमें मराठा परंपरा का रंग भरकर दर्शाया गया कि शिवाजी ने औरंगजेब की बहन रोशनआरा का दिल जीता और उससे विवाह कर लिया।[42] यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है। उपन्यास एक आवेगपूर्ण प्रेम कहानी की तरह है जिसमें मध्ययुगीन भारतीय इतिहास में हिंदू सांप्रदायिक निर्माण के केंद्रीय चरित्र के रूप में शिवाजी का विस्तार से चित्रण किया गया है। वह नाटकीय रूप से सत्रह वर्षीया रोशनआरा के सामने आकर्षक हिंदू मर्द के उदाहरण के रूप में, गठीला शरीर, गोरा रंग और चमकती आँखें लिए आते हैं और रोशनआरा को उनसे धीरे-धीरे प्यार हो जाता है।[43] उपन्यास में एक स्थान पर बताया गया है कि किस प्रकार रोशनआरा तुलना करने लगी और बादशाह की बेटी कहलाने की जगह एक छोटे राजा की रानी कहलाने में ज़्यादा खुशी महसूस करने लगी।[44] हिंदू पुरुषों से अपेक्षा की जाने लगी कि वे भी शिवाजी के उदाहरण का अनुकरण करें। तर्क दिया गया कि हिंदू पुरुष बेहतरी के लिए मुसलमान नारी का उद्धार कर रहे थे, जबकि मुसलमान पुरुष बलपूर्वक ऐसा करते थे और हिंदू नारी की तकलीफ बढ़ा देते थे।

हिंदू स्त्रियों की दैनिक जिंदगी पर चार आँखें

बीसवीं सदी के आरंभ में हिंदुत्ववादी प्रचारकों ने हिंदू स्त्रियों को मुसलमान पुरुषों से और इस्लामिक ठहराए गये प्रतीकों, तौर-तरीकों और संस्कृति से अलग रखने के लिए कई प्रयास किये। उस समय मुसलमानों के साथ केवल घनिष्ठ संबंध ही नहीं, बल्कि रोज़मर्रा का व्यवहार भी हिंदू पितृसत्तात्मक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा समझा जाने लगा था। रोज़मर्रा के जीवन के साथ स्त्रियों का एक खास रिश्ता होता है और इस संदर्भ में यह डर बढ़ रहा था कि वे अपने जीवन के अनेक पहलुओं के बारे में खुद निर्णय ले रही हैं। रोज़मर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं का मोल-भाव करते हुए स्त्रियाँ नौकरों, सफाई कर्मचारियों, मनिहारों और कुंजड़ों के साथ अन्योन्यक्रिया करती थीं और इस प्रक्रिया में अपने भौतिक और सामाजिक जीवन को अभिव्यक्त भी करती थीं। अपहरण अभियान के दौरान स्त्रियों के जीवन का हर क्षण, घर के अंदर और बाहर लोगों के साथ बातचीत, रोज़मर्रा का रिश्ता, उनके मनोरंजन के रूप, सांस्कृतिक जीवन और धार्मिक भावनाएँ, उन लोगों से व्यवहार जिनसे वे प्रतिदिन के उपभोग की वस्तुएँ खरीदती थीं, पहले से कहीं ज़्यादा हिंदुत्ववादी प्रचारकों की पड़ताल के दायरे में आ गया।

हिंदुत्ववादी प्रचारक इन प्रक्रियाओं से रूबरू हुए और उन्हें अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने का रास्ता सोचने लगे। हिंदू स्त्रियों को मुसलमानों से संबधित हर चीज़ से दूर रहने का निर्देश देना उनके हाथों में एक उम्दा हथियार बन गया। समाचार पत्रों और पुस्तिकाओं ने हिंदुओं को सचेत किया कि वे अपनी स्त्रियों को मुसलमान व्यापारियों, अध्यापकों और नौकरों से कोई भी व्यवहार रखने की इजाज़त न दें।[45] उन्हें चेतावनी दी गयी कि वे अपनी स्त्रियों को मुसलमान सब्जी-विक्रेताओं, दुकानदारों और सफाई कर्मचारियों से बात न करने दें।[46] उदाहरण के लिए हिंदू महिलाओं के लिए उचित आचरण बताने वाली एक आर्य समाजी पुस्तिका स्त्री शिक्षा के ज़रिये प्रचारित किया गया ताकि उन्हें मुसलमानों के संपर्क से दूर रखा जा सके। इस पुस्तक के लेखक उतर प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा के एक प्रमुख पण्डित थे। हिंदू स्त्रियों के लिए निर्देश इस पुस्तक में कुछ इस प्रकार थे:

(1) कभी किसी कब्र को पूजने मत जाओ। (2) ताजियों, अलमों और भण्डों को मत पूजो। (3) गण्डे, ताबीज़ झाड़ा-फूँकी मुसलमान से मत कराओ। (4) उनकी मसजिदों पर नमाज़ पढ़ने वाले मुल्लाओं से फूँक लगवाने मत जाओ। (5) विवाह आदि पर मियाँ की कढ़ाई मत करो। (6) मियाँ की फातियाँ मत दिलाया करो। (7) पीरों की मिन्नत मत मानो। (8) समय-समय पीरों के नाम से टके निकालना छोड़ दो।... (10) मुसलमानी मेलों में भूल कर भी मत जाओ। (11) कभी अकेली किसी मुसलमान की सवारी पर न बैठो। (12) अपने बच्चों को मुसलमानों से मत पढ़वाओ।... (15) मुसलमान मर्द मनिहारों के हाथ से चूड़ी मत पहनो। (16) मुसलमान बिसातियों से घर पर या बाहर कोई सौदा मोल मत लो। (17) सुनसान स्थानों पर मत जाओ।... (19) पागल, नशेबाज़ और व्यभिचारी हाकिम के आगे मत निकलो। (20) भुरारे तालाब पर स्नान करने मत जाओ।... (24) एक पैनी कटार बाँध कर बाहर निकलो।... (29) मुसलमान फकीरों को कभी भीख मत दो। (30) न मुसलमान नौकर के सामने बेपर्दा होकर बातचीत करो, न उनके सामने निकलो।[47]

ऐसे विस्तृत और सूक्ष्म निर्देश सामाजिक और आर्थिक अलगाव के माध्यम से धार्मिक और संप्रदाय विशेष के अलगाव के एजेण्डे की पुष्टि करते हैं। लव जिहाद के तथाकथित खतरे से निपटने के लिए भी विभिन्न हिंदुत्ववादी संगठनों ने हिंदू महिलाओं के लिए एक कठोर आचार संहिता तैयार की है। मुसलमानों के बाबत हिंदू महिलाओं के लिए एक समग्र भाषा का इस्तेमाल किया गया है।

हमारी रोज़ाना की सार्वजनिक जगहों, जैसे स्कूल, कॉलेज, थियेटर, आइसक्रीम और जूस की दूकान, मोबाइल फोन चार्ज करने की जगहें, टीवी और इंटरनेट कैफे, आदि को ऐसी खतरनाक जगहें बताया गया है जहाँ हिंदू लड़कियों को फुसलाया जाता है।[48] प्रमोद मुत्तालिक ने एक किताब लिखी है लव जिहाद : रेड एलर्ट फॉर हिंदू गर्ल्स। इस किताब में ऐसे निर्देश और बचाव वाले उपाय सुझाए गये हैं जिससे हिंदू स्त्रियों को पीड़िता होने से बचाया जा सके। निर्देश इस प्रकार के हैं : लड़कियाँ हेड स्कार्फ न पहनें क्योंकि ऐसी लड़कियाँ जब दोपहिये पर बैठती हैं, तो उन्हें पहचानना मुश्किल हो जाता है; कई मामलों में लव जिहाद मोबाइल फोन के ज़रिये होता है, इसलिए माता-पिता अपनी बेटियों के मोबाइल फोन पर आने वाली काल और नंबर पर नज़र रखें; यह भी याद रखें की नंबर जाली नाम से भी हो सकता है; मुश्किल हालात में हिंदू की मदद लेने के लिए अपने ललाट पर कुमकुम लगाएँ।[49] ये अनेक निषेध हिंदू महिलाओं के जीवन, अनुभवों और पहचानों को निर्देशों के दायरे में लाते हैं। इस तरह हिंदू महिलाओं के सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन के किसी भी पहलू, जिसे हिंदू समाज के नियंत्रण से बाहर समझा जाता है, को संदेह के दायरे में रख दिया गया है। उन्हें बताया जा रहा है कि वे कैसे चलें, कैसे नहीं, किससे बात करें, किससे नहीं, कहाँ जाएँ, कहाँ नहीं, क्या करें और क्या नहीं। हिंदू महिलाओं और मुसलमान पुरुषों के बीच संपर्क के सभी स्थान, चाहे वे सार्वजनिक हों या निजी, इस दायरे में आ गये हैं।

मुसलमान मर्द के प्रलोभन या बहलावे से हिंदू स्त्रियों के बचाव के लिए दिये जाने वाले तर्कों में यह निहित है कि स्त्रियों की दिनचर्या पर रोज़ाना नज़र रखनी होगी। वे कहाँ जाती हैं, किससे मुलाकात करती हैं, सभी सार्वजनिक जगहों आदि पर सघन ध्यान देना होगा। और यदि यह माना जाता है कि लव जिहादी हिंदू स्त्रियों को बेवकूफ बनाने के लिए हिंदू नाम धारण कर लेते हैं, तो इस तर्क से सारे प्रेम प्रसंग संदेह के दायरे में आ जाते हैं क्योंकि एक हिंदू दिखने वाला प्रेमी उनके हिसाब से लव जिहादी हो सकता है। इसका मतलब यह है कि लव जिहाद वास्तव में प्यार के खिलाफ जिहाद छेड़ कर ही रोका जा सकता है। इस प्रकार लव जिहाद और प्रेम या प्रेम-विवाह के बीच का अंतर वास्तव में खतम हो जाता है। लव जिहाद का झूठ जबरन अंतर-धार्मिक विवाह या धर्मांतरण की घटनाएँ अक्सर मनगढ़ंत और काल्पनिक होती हैं। कई मामलों में अनाप-शनाप सामान्यीकरण करके अफवाहों के ज़रिये मिर्च-मसाला लगाया जाता है। जाँच-पड़ताल के बाद सच्चाई सामने आ जाती है। भाजपा शासित कर्नाटक में अगस्त, 2009 में लव जिहाद के खिलाफ अभियान चलानेवाले सांप्रदायिक संगठनों ने एक प्रेम विवाह की धज्जियाँ उड़ा दीं। बंगलूर से 180 किमी दूर एक छोटे शहर चमराजनगर में 18 वर्षीय सिल्जा राज 24 वर्षीय असगर नज़र के साथ भाग गयी, लेकिन इसे हिंदू संगठनों द्वारा लव जिहाद की संज्ञा दी गयी। इसके अलावा जून, 2009 में कर्नाटक के बंतवाल तालुक में अनीता गायब हो गयी। संघ परिवार के संगठनों ने आरोप लगाया कि एक पाकिस्तान समर्थित पेशेवर जिहादी प्रेमी ने जबरिया अनीता का मुसलमान धर्मांतरण करा दिया है। हिंदू संगठनों ने 4 अक्टूबर, 2009 को विरोध सभाएँ की। पर 21 अक्टूबर, 2009 को एक पेशेवर अपराधी मोहन कुमार गिरफ्तार किया गया जिसने अनीता की हत्या करने का अपराध कबूल किया। 2010 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने एक पर्चा भी जारी किया और इसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में वितरित किया। इसमें कहा गया था कि अब तक 4,000 लड़कियों का धर्मांतरण किया गया है।

हिंदू जागरण समिति, कर्नाटक ने एक दूसरे पर्चे में कहा था कि यह संख्या सालाना 30,000 है। कर्नाटक उच्च न्यायालय की एक डिवीज़न बेंच ने 2002-09 के बीच गुमशुदा 21,890 लड़कियों की सीआइडी छानबीन के आदेश भी दिए थे। इस जांच में पाया गया कि 229 लड़कियों ने दूसरे धर्म के पुरुषों से शादी की है, पर केवल 63 मामलों में धर्मांतरण हुआ था। अतंर्धार्मिक विवाहों के मामले हर तरह और हर धर्म  के थे। सीआइडी के महानिदेशक गुरु प्रसाद ने उच्च न्यायालय को 31 दिसबंर, 2009 को सुपुर्द अपनी रपट में कहा : किसी व्यक्ति या समूह द्वारा हिंदू या ईसाई लड़कियों को बहला कर मुसलमान लड़कों से शादी और फिर धर्मांतरण कराने की कोर्इ साजिश या संगठित कोशिश नहीं है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अंतत: नवंबर, 2013 को लव जिहाद की छानबीन खत्म कर दी क्योंकि तथाकथित साज़िश का कोर्इ  साक्ष्य नहीं पाया गया। उच्च न्यायालय ने सिल्जा राज को अपनी मर्जी से कहीं भी जाने की आज़ादी दी और सिल्जा ने अपने पति के पास जाने का फैसला किया।[50]

मेरठ की कुख्यात बलात्कार और तथाकथित लव जिहाद की घटना और भी पेचीदा हो गयी है। कई तरह की रपटें हैं। शायद एक स्वैच्छिक संबंध बाद में बिगड़ गया; एक गर्भपात को अपेंडिसाइटिस बताया गया और पुलिस ने पीड़िता के बयानों को भी विरोधाभासी बताया। निशानेबाज़ तारा सहदवे की भी जटिल पारिवारिक कहानी है जिसमें उसके पति ने दावा किया है कि वह एक सिख पिता और मुसलमान माँ की औलाद है और खुद भी बाद में धर्मांतरित है। मुजफ्फरनगर के एक मामले में पुलिस ने 7 सितंबर, 2014 को एक मुसलमान युवक परवेज को बेकसूर करार दिया। परवेज पर एक 18 वर्षीय लडक़ी को अगुवा और जबरन धर्मांतरण करने का आरोप लगाया गया था। लड़की ने स्थानीय अदालत में बयान दिया कि वो अपनी मर्जी से परवेज के साथ गयी थी। उन्होंने 25 अगस्त, 2014 को अपने परिवारों के विरोध के कारण पलायन किया था।[51] 5 सितंबर, 1914 को मेरठ में हिंदुत्ववादी कट्टरपंथी संगठनों ने यह खबर फैलार्इ  कि एक मुसलमान लड़के ने लव जिहाद के लिए एक नाबालिग हिंदू लड़की का अपहरण किया है। रास्ते जाम कर दिए गए और दो मुसलमान दुकानों – ब्यूटी सलैनू और हेयर ड्रेसिंग सैलून - को लूटा गया। दोनों लड़के-लड़की जल्दी ही गिरफ्तार कर लिए गए और हिंदू संगठनों ने इसे लव जिहाद का मामला करार किया। पर लडक़ी ने पुलिस थाने में दर्ज कराए अपने बयान में साफ कहा कि वह अपनी मर्जी से लड़के के साथ गयी थी और लड़के ने उसके साथ कोर्इ दुर्व्यवहार नहीं किया था। वह लड़के के साथ मुंबई अपना कैरियर बनाने के खयाल से घर से भागी थी।[52] इस प्रकार यह तय है कि लव जिहाद को लेकर कोई मुकम्मल प्रमाण हमारे सामने नहीं है और यह पूरी तरह एक झूठा मिथक है।

चिंता सागर में हिंदू पुरुषार्थ के गोते : स्त्रियाँ स्वयं फैसले ले रही हैं!

अपहरण और लव जिहाद जैसे आंदोलन हिंदू स्त्री की सुरक्षा करने के नाम पर असल में उसकी यौनिकता, उसकी इच्छा, और उसकी स्वायत्त पहचान पर नियंत्रण लगाना चाहते हैं। हिंदू सगंठनों को भय है कि औरतें अब खुद अपने फैसले ले रही हैं। गौरतलब है कि 1920-30 के दशकों में कर्इ ऐसे मामले सामने आए जिनमें स्त्रियों ने अपनी मर्जी से मुसलमान पुरुषों के साथ विवाह किया। इनमें विशेष तौर पर वे स्त्रियाँ थीं जो हिंदू समाज के हाशिये पर थीं, जैसे विधवाएँ, दलित स्त्रियाँ और कुछ वेश्याएँ भी। तब हिंदुओं में विधवा विवाह नाममात्र का था, और ऐसे में कर्इ विधवाओं ने मुसलमानों के साथ विवाह रचाया। इनकी जानकारी हमें उस समय की कर्इ पुलिस और सीआईडी रपटों से भी मिलती है। लव जिहाद भी स्त्री की स्वतंत्र इच्छा-शक्ति को लेकर पैदा हुर्इ दुश्चिंताओं को दर्शाता है।

इस तरह के दुष्प्रचार से सांप्रदायिक माहौल में तो इज़ाफा हुआ है, पर यह भी सच है कि स्त्रियों ने अंतर्धार्मिक प्रेम और विवाह के ज़रिये इस सांप्रदायिक लामबंदी की कोशिशों में सेंध भी लगाई है। अतंर्धार्मिक रोमांस और शादी कर्इ दीवारों को लांघने का एक प्रयास भी है। ऐसे पल स्त्रियों के दिल और दिमाग के अंतरंग हलकों में संभावित स्वायत्तता के झरोखे खोल सकते हैं। आंबेडकर के अनुसार जाति प्रथा बनाए रखने और उसे मज़बतू करने के लिए सजातीय विवाह एक अनिवार्य अंग है। इसीलिए आंबेडकर का मानना था कि अतंर्जातीय विवाह जाति के उन्मलून के लिए एक कारगर उपाय है। इसी प्रकार अतंर्धार्मिक विवाह धार्मिक पहचान को कमज़ोर कर सकता है। स्त्रियों ने अपने स्तर पर इस तरह के सांप्रदायिक प्रचारों पर ध्यान देने से इनकार किया है। अतंर्धार्मिक विवाह करने वाली स्त्रियाँ कहीं न कहीं सामुदायिक और सांप्रदायिक किलेबंदी में सेंध लगाती हैं। रोमांस और प्यार परंपरा के बंद दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक दे रहा है। प्यार का अधिकार जीवन के अधिकार के समान है। इस आंदोलन में कोर्इ साज़िश अगर है भी, तो वह है हिंदू सांप्रदायिक संगठनों द्वारा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने और उसके ज़रिए स्त्रियों को और नियंत्रित करने की। सितंबर माह में उत्तर प्रदेश के कर्इ राज्यों में चुनावों के नतीजों से यह भी साबित हुआ है कि लव जिहाद जनित सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से चुनाव जीतने के मंसूबों पर आम तौर पर लोगों ने पानी फेर दिया है और स्त्रियों ने भी लोकतांत्रिक तरीकों से इस दुष्प्रचार को नकारा है। आज लव जिहाद को सच और तथ्य के आईने में देखने की ज़रूरत है।

नोट्स

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8. 140/1927, होम पोल, नैशनल आर्काइव्ज़ ऑफ इण्डिया.
9. ज्ञानेंद्र पाण्डेय (1990), द कंस्ट्रक्शन इन कोलोनियल नॉर्थ इण्डिया, ऑक्सफर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली : 233-35.
10. लालमनी वर्मा (2014),'बीजेपी एमएलए काल फॉर लव जिहाद महापंचायत’, द इण्डियन एक्सप्रेस, 8 सितंबर : 1-2.
11. उन्नीसवीं सदी के आधुनिक हिंदी साहित्य की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करने के लिए देखें : वसुधा डालमिया (1997), द नेशनलाइज़ेशन ऑफ हिंदू ट्रेडिशंस : भारतेंदु हरिश्चंद्र ऐंड नाइंटीथ सेंचुरी बनारस, नयी दिल्ली; सुधीर चंद्र (1992), द ऑप्रेसिव प्रज़ेंट : लिटरेचर ऐंड सोशल कांशसनेस इन कोलोनियल इण्डिया, नयी दिल्ली; मीनाक्षी मुखर्जी (1985), रियलिज़म ऐंड रियलिटी : द नॉवेल ऐंड सोसाइटी इन इण्डिया, नयी दिल्ली.
12. मैंने इस तरह की असंख्य पुस्तिकाएँ देखी हैं : शिव शर्मा उपदेशक (आर्य प्रतिनिधि सभा), मुसलमान की जिंदगानी, मुरादाबाद, 1924; महात्मा प्रेमानंद (हिंदू धर्म रक्षक), मुसलमानी अँधेर खाता, अवध, 1928; आदर्श पुस्तक भण्डार, कुरान की खूनी आयतें, बनारस, 1927; पं. लेखारामजी, जिहाद, कुरान व इस्लामी खुंखारी, इटावा 1924; प्रेमसरन जी (आर्य प्रचारक), देवदूत दर्पण, आगरा, 1926; स्वामी सत्यदेव परिब्राजक, संगठन का बिगुल, देहरादून, 1926, तृतीय संस्करण.
13. इनमें से कुछ थीं : यवनों का घोर अत्याचार, मुँहतोड़, लालझण्डी, तराना-इ-शुद्धि, मलाक्ष तोड़ और इस्लाम का भाण्डा फूट गया. देखें, 140/1925, होम पोल, नैशनल आर्काइव्ज़ ऑफ इण्डिया.
14. जी.आर. थर्सबी (1975), हिंदू मुस्लिम रिलेशंस इन ब्रिटिश इण्डिया : अ स्टडी ऑफ कंट्रोवर्सी, कन्फ्लिक्ट ऐंड कम्युनल मूवमेंट्स इन नॉर्दर्न इण्डिया, 1923-28, लीडेन : 40-62; 10/50/1927, होम पोल, एनएआई; 132/I/1927, होम पोल, एनएआई; 103/1928, होम पोल, एनएआई.
15. 132/II/1927, होम पोल, एनएआई.
16. परिब्राजक, संगठन का बिगुल : 29.
17. राधाकृष्ण दास (1903), महारानी पद्मावती, काशी, 1903, दूसरा सं.; कन्या मनोरंजन, खण्ड 1, अंक 2, अक्टूबर, 1914: 2-5.
18. संपादकीय विचार, 'मुसलमान मनोवृत्ति का व्यापक स्वरूप’, चाँद, खण्ड 6, अंक 3, जनवरी, 1928 : 315-21.
19. यूपी नेटिव न्यूज़पेपर रिपोर्ट्स, 12 जुलाई, 1924.
20. फाइल सी-6/1934-35, हिंदू महासभा पेपर्स, एनएमएमएल.
21. भारत धर्म, 29 जुलाई, 1924 : 1; भारत धर्म, 5 अगस्त, 1924 : 12.
22. यूपी सीक्रेट पुलिस एक्सट्रेक्ट ऑफ इंटेलिजेंस, नं. 34, 30 अगस्त, 1924 : 276.
23. रघुबर दयालु (1928), चंद मुसलमानों की हरकतें, कानपुर : 2-9. यह भी देखें, महात्मा प्रेमानंद (हिंदू धर्म रक्षक) (1928), मुसलमानी अँधेर खाता, अवध.
24. लालमनी वर्मा (2014), 'बीजेपी पुट्स यूपी कैंपेन इनटू गियर, आस्क्स, 'डज़ रिलीजन गिव देम लाइसेंस टू रेप?', द संडे एक्सप्रेस, 24 अगस्त : 1.
25. वर्गीज़ के. जॉर्ज (2014), 'बीजेपी, परिवार आउटिफट्स टू इंटेसिफाइ कैंपेन अगेंस्ट 'लव जिहाद’, द हिंदू, 8 अगस्त : 1.
26. अंजलि मोदी (2014), ''लव जिहाद’, द संघ परिवार्स सेक्सुअल पॉलिटिक्स बाइ अदर नेम’, कारवाँ, अगस्त, (http://www.caravan magazine.in/vantage/love-jihad-sangh-parivar-sexual-politics-another-name).
27. अर्जुन अप्पादुरै (1997), 'नंबर्स इन कोलोनियल इमेजिनेशन’, अर्जुन अप्पादुरै (संपा.), मॉडर्निटी एट लार्ज : कल्चरल डाइमेंशंस ऑफ ग्लोबलाइज़ेशन, नयी दिल्ली : 114-38; बर्नार्ड एस. कोह्न (1987), एन एंथ्रोपोलॅजिस्ट अमंग हिस्टोरियंस ऐंड अदर एसेज़, नयी दिल्ली : 224-54; कैनेथ डब्ल्यू. जोंस (1981), 'रिलीजस आइडेंटिटी ऐंड द इण्डियन सेंसस’, एन.जी. बैरियर (संपा.), 73-101.
28. पी.के. दत्ता (1999), कारविंग ब्लॉक्स : कम्युनल आइडियोलॅजी इन अर्ली ट्वेंटियथ सेंचुरी बंगाल, नयी दिल्ली.
29. चंद्रिका प्रसाद (1917), हिंदुओं के साथ विश्वासघात, अवध : 14.
30. कृष्णानंद (1927), हिंदुओं की उन्नति का उपाय अर्थात शुद्धि और संगठन संबंधी उपदेश, शाहजहाँपुर : 19.
31. गंगाप्रसाद उपाध्याय (1927), विधवा विवाह मीमांसा, इलाहाबाद : 227.
32. संपादकीय, 'हिंदुओं का भयंकर ह्रास' चाँद, खण्ड 7, अंक 1, जनवरी, 1929 : 450-60; कुँवर चाँदकरण शारदा (1924), 'हिंदू जाति की दुर्दशा के कारण और उसके निवारण के उपाय', माधुरी, खण्ड 3, अंक 1, अक्टूबर : 290-95.
33. मनन द्विवेदी (1924), हमारा भीषण ह्रास, कानपुर, तीसरा सं. : 26, 35.
34. रिचर्ड ईटन (1993), द राइज़ ऑफ इस्लाम ऐंड बंगाल फ्रंटियर बंगाल, 1204-1760, बर्कले : 113-34.
35. चारु गुप्ता (2013), 'रूप-अरूप, सीमा और असीम : औपनिवेशिक काल में दलित पौरुष’, प्रतिमान समय समाज संस्कृति, जनवरी-जून 2013: 118-19; दिलीप एम. मेनन (2006), द ब्लाइंडनेस ऑफ इनसाइट : एसेज़ ऑन कास्ट इन मॉडर्न इण्डिया, पाण्डिचेरी.
36.  http://www.dailymail.co.uk/indiahome/indianews/article-2736259/.
37. अंजलि मोदी, वही.
8 लालमनी वर्मा (2014), 'साइटिंग 'लव जिहाद’, संघ ग्रुप्स इन यूपी यूनाइट टू फाइट’, द इण्डियन एक्सप्रेस, 31 अगस्त : 1-2.
39. वलुधा वेणुगोपाल (2014), 'द मोंक हू सोल्ड अ लव 'क्यौर’, संडे टाइम्स ऑफ इण्डिया, 10 अगस्त.
40. 6/IX/1924, होम पोल, एनएआई; 150/1934, होम पोल, एनएआई.
41. वर्गीज़ के. जॉर्ज (2014), 'इनकांग्रुइटी इन मेरठ विक्टिम्ज़ स्टोरी’, द हिंदू, 8 अगस्त 11.
42 कालीचरण शर्मा (1926), शिवाजी व रोशनआरा, तीसरा सं., बरेली.
43. शर्मा, वही : 9-17.
44. शर्मा, वही : 21.
45. आर्य पुत्र, 12 जुलाई, 1924; पण्डित बृज मोहन झा, हिंदुओं जागो, इटावा, तारीख नहीं : 12-15.
46. महात्मा प्रेमानंद बानप्रस्थी (1927), गाजी कौन है, इलाहाबाद : 5.
47. पण्डित शिव शर्माजी महोपदेशक (1927), स्त्री शिक्षा, बरेली : 5-11. बाद में इस पुस्तिका को अवैध घोषित कर दिया गया था.
48. 'की फाइंडिंग्ज़ ऑफ द वॉयस ऑफ जस्टिस रिपोर्ट,’ ऑर्गनाइज़र, 7 सितंबर, 2014.
49. टी.ए. जॉनसन और लालमनी वर्मा (2014), 'हू लव्ज़ लव जिहाद’, द इण्डियन एक्सप्रेस, 7 सितंबर में उद्धृत.
50. जॉनसन और वर्मा, वही.
51. स्टाफ रिपोर्टर, 'लव जिहाद : गर्ल डिनाइज़ कनवर्जन’, द हिंदू, 8 सितंबर, 2014: 1.
52. अमित शर्मा (2014), 'बीजेपी मेन बीट अप मुस्लिम्स ओवर इलोपमेंट,’ द इण्डियन एक्सप्रेस, 7 सितंबर, 2014 : 10; एम. कौनेन शरीफ और अमित शर्मा (2014), 'टू स्कूल स्टूडेंट्स विद बॉलीवुड़ ड्रीम्ज़ वर्सेस 'लव जिहाद’ नाइटमेयर’, द इण्डियन एक्सप्रेस, 11 सितंबर : 1-2.

मैं चुपके से कहता अपना प्यार: जॉन बर्जर

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/17/2015 07:45:00 PM


फ्रांस के दक्षिणी इलाके के एक गांव में रहने वाले ब्रिटेन के चर्चित लेखक जॉन बर्जर का यह लेख सिर्फ नाजिम हिकमत की याद को ही ताजा नहीं करता, एक नाउम्मीदी भरे वक्त में उम्मीद की पड़ताल भी करता है. प्रतिलिपि-9 में प्रकाशित यह अनुवाद भारत भूषण तिवारी का है और यह निबंध बर्जर के निबंधों की किताब होल्ड एवरीथिंग डियर में संकलित है. बर्जर अपनी किताब वेज ऑफ सीइंग के लिए जाने जाते हैं, जो मूलत: बीबीसी पर प्रसारित एक डॉक्युमेंटरी है.

(जनवरी 2002)

शुक्रवार.

नाजिम, मैं मातम मना रहा हूँ और इसे तुमसे साझा करना चाहता हूँ, जिस तरह तुमने बहुत सी उम्मीदें और बहुत से ग़म हमसे साझा किये थे.

रात में तार मिला
सिर्फ तीन लफ्ज़:
‘वह नहीं रहा.’[1]

मैं मातम मना रहा हूँ अपने दोस्त ह्वान मून्योस के लिए. वह नक्काशियाँ और इन्स्टलेशन बनाने वाला एक अद्भुत कलाकार था.कल अड़तालीस की उम्र में स्पेन के किसी समुद्र-तट पर मर गया.

एक बात जो मुझे हैरान करती है वह मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ. किसी चीज़ का शिकार हो जाने, मार दिए जाने या  भूख से मर जाने से अलहदा एक कुदरती मौत के बाद पहले तो एक झटका लगता है. और अगर मरने वाला लम्बे समय तक बीमार न रहा हो, तो फिर भयावह किस्म का हानि-बोध होता है खासकर जब मरनेवाला जवान हो-

दिन निकल रहा है
पर मेरा कमरा
एक लम्बी रात से बना है.[2]

- और उसके बाद आता है दर्द जो अपने बारे में कहता है कि वह कभी ख़त्म न होगा.फिर दर्द के साथ चोरी-छुपे कुछ और आता है जो लगता तो मज़ाक है मगर है नहीं (ह्वान बहुत मजाकिया था). कुछ ऐसा जो छलावा पैदा करे, करतब दिखाने के बाद के किसी जादूगर के रूमाल जैसा कुछ, एक किस्म का हल्कापन जो सर्वथा विपरीत है उसके जो आप महसूस कर रहे होते हैं. तुम समझ रहे हो न कि मैं क्या कह रहा हूँ? यह हल्कापन एक ओछापन है या कोई नई हिदायत?

तुमसे यह पूछने के पाँच मिनट बाद ही मेरे बेटे इव का फैक्स आया जिसमें कुछ पंक्तियाँ हैं जो उसने ह्वान के लिए अभी-अभी लिखी हैं.

तुम हमेशा एक हँसी
एक नई तरकीब के साथ
नमूदार हुए.

तुम हमेशा गायब हुए
अपने हाथ
हमारी मेज़ पर छोड़ कर.
तुम गायब हुए
अपने ताश के पत्ते
हमारे हाथों में छोड़कर.

तुम फिर दिखाई दोगे
एक नई हँसी के साथ
जो होगी एक तरकीब.

शनिवार

मुझे पक्का यकीन नहीं है कि मैं नाजिम हिक्मत से कभी मिला हूँ. मैं सौगंध उठा लूँगा कि मिल चुका हूँ पर ब्यौरेवार सबूत नहीं दे सकता. मुझे लगता है मैं उनसे लन्दन में 1994 में मिला था. उनके जेल से रिहा होने के चार सालों बाद, उनकी मृत्यु से 9 साल पहले. रेड लायन स्क्वेयर में हुई एक राजनीतिक बैठक में वे बोल रहे थे. पहले उन्होंने कुछ शब्द कहे और फिर चंद कविताएँ पढीं. कुछ अंग्रेजी में, और कुछ तुर्की में. उनकी आवाज़ दमदार, शांत, अत्यंत आत्मीय और बेहद सुरीली थी. मगर ऐसा नहीं लग रहा था कि आवाज़ उनके गले से आ रही है- या उस क्षण तो आवाज़ उनके गले से आती नहीं लग रही थी. लगता था जैसे उनके सीने में कोई रेडियो रखा है जो वे अपने चौड़े, हल्के काँपते हाथों से शुरू और बंद कर रहे थे. मैं इसे ठीक तरह बयान नहीं कर रहा हूँ क्योंकि उनकी उपस्थिति और निश्छलता एकदम ज़ाहिर थी. अपनी एक लम्बी कविता में वे छह लोगों का वर्णन करते हैं जो तुर्की में चालीस के दशक के किसी शुरूआती साल में रेडियो पर शोस्ताकोविच की एक सिम्फ़नी सुन रहे हैं. उन छह में से तीन व्यक्ति (उन्हीं की तरह) जेल में है. सीधा प्रसारण हो रहा है, उसी वक़्त हजारों किलोमीटर दूर मास्को में वह सिम्फ़नी बजाई जा रही है. रेड लायन स्क्वेयर में उन्हें अपनी कविताएँ पढ़ते हुए सुनकर मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके शब्द दुनिया के दूसरे हिस्से से भी आ रहे हैं. इसलिए नहीं कि उन्हें समझना मुश्किल था (ऐसा बिल्कुल नहीं था), इसलिए भी नहीं कि वे अस्पष्ट और सुस्त थे (वे धैर्य की क्षमता से भरपूर थे), बल्कि इसलिए क्योंकि वे शब्द कहे जा रहे थे किसी भी तरह दूरियों पर फतह पाने के लिए और बेअंत हिज्रों पर मात करने के लिए. उनकी सभी कविताओं का यहीं और कहीं है.

एक टमटम प्राग में-
एक ही घोड़े वाली गाड़ी
पुराने यहूदी कब्रगाह के आगे से गुज़रती है.
टमटम भरी है किसी दूसरे शहर की हसरतों से

गाड़ीवान मैं हूँ.[3]

बोलने के लिए खड़े होने से पहले जब वे चबूतरे पर बैठे हुए थे, तब भी यह देखा जा सकता था कि वे असामान्य तौर से लम्बे-चौड़े आदमी हैं. ‘नीली आँखों वाला दरख्त’ यह नाम उन्हें यूं ही नहीं दिया गया था. जब वे खड़े हुए, तो ऐसा महसूस होता था कि वे बहुत हल्के भी हैं, इतने हल्के कि उनके हवा में उड़ जाने का खतरा है.

शायद मैंने उन्हें कभी नहीं देखा. क्योंकि यह मुमकिन नहीं कि लन्दन में इंटरनेशनल पीस मूवमेंट द्वारा आयोजित बैठक में हिक्मत को कई जहाज़ी तारों की मदद से चबूतरे से बाँध कर रखा गया हो जिससे कि वे ज़मीन पर बने रहें. फिर भी यह मेरी स्पष्ट स्मृति है. उनके शब्द बोले जाने के बाद आसमान में ऊपर उठ जाते थे – वह बैठक बाहर खुले में हो रही थी- और उनका शरीर मानो उनके लिखे शब्दों के पीछे पीछे जाने के लिए ही बना था, जैसे वह शब्द उठाते जाते थे स्क्वेयर के ऊपर और थियोबाल्ड्स रोड की उन पूर्ववर्ती ट्रामों की चिंगारियों से ऊपर जो तीन-चार साल पहले चलनी बंद हो गई थीं.

तुम अनातोलिया के
एक पहाड़ी गाँव हो,
तुम मेरे शहर हो,
बेहद खूबसूरत और अत्यधिक दुखी
तुम हो मदद की एक गुहार- यानी तुम मेरे देश हो;
तुम्हारी और दौड़ते कदम मेरे हैं.[4]

सोमवार की सुबह

मेरे लम्बे जीवन में मेरे लिए महत्त्वपूर्ण रहे लगभग सभी समकालीन कवियों को मैंने अनुवाद में और कदाचित ही उनकी मूल भाषा में पढ़ा है. मैं सोचता हूँ कि बीसवीं सदी से पहले किसी के लिए ऐसा कहना असंभव होता. कविता के अनुवादयोग्य होने या न होने पर बहस सदियों तक चली – पर वे सब चेम्बर आर्ग्युमेंट्स थे – चेम्बर म्यूज़िक की तरह. बीसवीं सदी के दौरान बहुत सारे चेम्बर्स धराशायी हो गए. संचार के नए माध्यम, वैश्विक राजनीति, साम्राज्यवाद, विश्व बाज़ार वगैरह ने अंधाधुंध और अप्रत्याशित तरीके से लाखों लोगों को साथ ला दिया और लाखों लोगों को दूर कर दिया. नतीजतन कविता की अपेक्षाएँ बदलीं; श्रेष्ट कविता ने और भी ज्यादा उन पाठकों पर भरोसा किया जो दूर-बहुत दूर थे.

हमारी कवितायें
मील के पत्थरों की तरह
रास्ते के किनारे खड़ी रहे.[5]

बीसवीं सदी के दौरान, कविता की कई विवस्त्र पंक्तियाँ अलग-अलग महाद्वीपों के बीच, परित्यक्त गाँवों और दूरस्थ राजधानियों के बीच टाँगी गई थीं. तुम जानते हो यह बात, तुम सभी; हिक्मत, ब्रेष्ट, वायेखो, अतिल्ला योज़ेफ़, अदोनिस, ह्वान गेलमन…

सोमवार की दोपहर

जब मैंने पहली बार हिकमत की कुछ कविताएँ पढ़ीं तब मैं किशोरावस्था के आखिरी दौर में था. ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के तत्त्वावधान में छपने वाली एक गुमनाम सी अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिका में वे कविताएँ प्रकाशित हुई थीं. कविता के बारे में पार्टी की नीति बकवास थी, पर प्रकाशित होने वाली कविताएँ और कहानियां अक्सर प्रेरक होती थीं.

उस समय तक मायरहोल्ड को मास्को में मौत की सजा दे दी गई थी. अब मैं खासकर मायरहोल्ड के बारे में सोचता हूँ तो इसलिए कि हिक्मत उनके प्रति श्रद्धा भाव रखते थे, और 1920 के दशक के शुरूआती सालों में जब वे पहली बार मास्को गए थे तब वे मायरहोल्ड से खासे प्रभावित भी थे.

‘मायरहोल्ड के थिएटर का मैं बहुत ऋणी हूँ. 1925 में जब मैं तुर्की वापिस लौटा तो मैंने इस्तंबुल के एक औद्योगिक जनपद में पहले श्रमिक रंगमंच का गठन किया. इस थिएटर के साथ निर्देशक और लेखक के तौर पर काम करने पर मुझे महसूस हुआ कि दर्शकों के लिए और उनके साथ काम करने की नई संभावनाएं हमारे लिए मायरहोल्ड ने खोलीं.’

1937 के बाद, उन नई संभावनाओं की कीमत मायरहोल्ड को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी, पर उस पत्रिका के लन्दन स्थित पाठकों को यह बात मालूम नहीं हुई थी.

जब मैंने पहले-पहल हिक्मत की कविताएँ पढ़ीं तो जिस चीज़ ने मुझे आकृष्ट किया वह थी उनकी स्पेस; तब तक मेरी पढ़ी हुई अन्य कविताओं में मुकाबले उनमें सबसे ज़्यादा स्पेस मौजूद  थी. उनकी कविताएँ स्पेस को बयान नहीं करती थीं बल्कि उस स्पेस से होकर आती थीं, वे पहाड़ों को लाँघती थीं. वे एक्शन के बारे में भी थीं. वे संदेहों, तन्हाई, वियोग, उदासी को जोड़ती थीं. ये भावनाएँ कर्त्तव्य का एवज नहीं थीं, बल्कि कर्त्तव्य उन भावनाओं का अनुगमन करता था. स्पेस और एक्शन साथ साथ चलते हैं. जेल उनकी प्रतिपक्षता है, और तुर्की की जेलों में ही राजनीतिक कैदी के तौर पर हिक्मत ने अपना आधा साहित्य रचा.

बुधवार

नाजिम, मैं जिस मेज़ पर लिख रहा हूँ उसका वर्णन मैं तुम्हें सुनाना चाहता हूँ.  यह बगीचे  में रखी जाने वाली सफ़ेद धातु की बनी हुई टेबिल है, ठीक वैसी जैसी बोस्फोरसi पर बनी किसी यालीii के मैदान में नज़र आती है. यह टेबिल तो पेरिस के दक्षिण-पूर्वी उपनगर के छोटे से घर के ऊपर से ढँके बरामदे में रखी हुई है. यह घर 1938 में बना था, यहाँ उस समय दस्तकारों, कारीगरों, कुशल श्रमिकों के लिए बनाये गए अनेक घरों में एक घर. 1938 में तुम जेल में थे. तुम्हारे बिस्तर के ऊपर दीवार पर एक घड़ी कील के सहारे लटक रही थी. तुम्हारे ऊपर वाले वार्ड में ज़ंजीरों में बँधे तीन कैदी मौत की सजा का इंतज़ार कर रहे थे.

इस टेबिल हर समय बहुत सारे कागज़ पड़े होते हैं. हर सुबह सबसे पहले मैं कॉफ़ी की चुस्कियां लेते हुए इन कागज़ों को तरतीब से रखने की कोशिश करता हूँ.  मेरी दाहिनी तरफ गमले में एक पौधा है, जो मुझे यकीन है तुम्हें पसंद आएगा. इसकी पत्तियाँ बेहद गहरे रंग की हैं.  नीचे की तरफ पत्तियों का रंग डैम्सन जैसा है, ऊपर की तरफ रौशनी ने रंग को थोडा मटमैला कर दिया है. पत्तियां तीन-तीन के समूह में हैं, जैसे कि वे रात को मंडराने वाली तितलियाँ हों- उनका आकार तितलियों जितना ही है- जो उस फूल से अपना खुराक हासिल करती हैं.  इस पौधे के फूल छोटे-छोटे, गुलाबी रंग के और गाना सीखते प्राइमरी स्कूल के बच्चों कि आवाज़ों की तरह मासूम हैं. यह एक बड़े से तिपतिया घास की तरह है. खासकर यह पोलैंड से मँगाया गया है जहाँ इस पौधे को कोनिकज़िना कहा जाता है. यह मुझे एक मित्र की माँ ने दिया था जिन्होंने यूक्रेन की सरहद के पास स्थित अपने बगीचे में इसे उगाया था. उनकी नीली आकर्षक आँखें हैं और वे बगीचे में टहलते हुए और घर में चहलकदमी करते हुए पौधों को वैसे ही छूती रहती हैं जैसे कुछ दादियाँ अपने नन्हे नाती-पोतों के माथों को छुआ करती हैं.

मेरे  महबूब, मेरे  गुलाब
पोलैंड  के मैदानों  से  होकर गुजरने वाले मेरे सफ़र का  हो चुका आग़ाज़:
मैं हूँ एक छोटा सा बच्चा  खुश और हैरतज़दा
लोगों
जानवरों
चीज़ों, पौधों
वाली  अपनी पहली तस्वीरों की किताब को देखता हुआ
एक छोटा सा बच्चा.[6]

दास्तानगोई में सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि क्या पहले आएगा और क्या बाद में. वास्तविक क्रम तो शायद ही ज़ाहिर हो पाता है. ट्रायल एंड एरर. कई कई बार.  और इसलिए कैंची और स्कॉच टेप की एक रील भी टेबिल पर है. टेप की  रील उस चीज़ में नहीं फिट की गई है जिससे टेप की पट्टी को काट कर अलग करना आसान हो जाता है. मुझे टेप पट्टी कैंची से काटनी पड़ती है. मुश्किल काम है टेप का सिरा खोजना और फिर उसे खींचना.

मैं बेसब्री से, खीजते हुए अपने नाखूनों से खुरचकर ढूँढता हूँ. नतीजतन जब मुझे सिरा मिल जाता है तो उसे टेबिल के सिरे से चिपका देता हूँ और रील को तब तक खुलने देता हूँ जब तक वह फर्श को न छूने लगे. और फिर उसे वैसे ही लटकता छोड़ देता हूँ.

कभी कभी मैं इस बरामदे से उठकर बगल वाले कमरे में चला जाता हूँ जहाँ मैं बतियाता हूँ, खाता हूँ या अखबार पढता हूँ.  कुछ दिनों पहले इसे कमरे में जब मैं बैठा तो एक हिलती सी चीज़ की और मेरा ध्यान गया.  टेबिल के सामने रखी मेरी खाली कुर्सी के पैरों के पास बरामदे की फर्श पर टपक रहा था झिलमिलाते पानी का बेहद छोटा सा सोता, हिलोरे लेता हुआ. आल्प्स  से निकलने वाली नदियों का उद्गम भी इस टपकन से ज़्यादा कुछ नहीं होता.

खिड़की से अन्दर आते हवा के झोंके से झकझोरी जाने वाली टेप की रील भी कभी कभी पहाड़ों को हिला देने के लिए काफी होती है.

गुरुवार की शाम

दस साल पहले इस्तंबुल में हैदर-पाशा स्टेशन के पास वाली एक इमारत के सामने मैं खड़ा था जहाँ संशयितों से पुलिस पूछ-ताछ कर रही थी. इमारत की सबसे ऊपर वाली मंजिल पर राजनीतिक कैदियों को रखा जाता था और उनसे सवाल पूछे जाते थे, कभी कभी हफ़्तों तक. 1938 में वहाँ हिक्मत से भी पूछ-ताछ की गई थी.

उस इमारत का ढाँचा किसी कैदखाने की तरह नहीं बल्कि एक विशाल प्रशासकीय दुर्ग की तरह बनाया गया था. यह  इमारत अविनाशी प्रतीत होती है और ईंटों और ख़ामोशी से बनी है. वैसे तो कैदखानों की मनहूस मगर अक्सर मायूस कामचलाऊ सी फिजा भी होती है. मसलन, बुर्सा के जिस कैदखाने में हिक्मत ने दस साल बिताये उसे अपनी अजीब सी बनावट के कारण ‘पत्थर के हवाई जहाज़’ के नाम से जाना जाता था. इसके विपरीत इस्तंबुल में स्टेशन  के पास वाले  जिस अचल दुर्ग को मैं देख रहा था उसमें  मौन के स्मारक  की तरह एक निश्चय और प्रशांति थी.

यह इमारत संयत स्वरों में घोषणा करती है कि जो भी इसके  अन्दर है या इसके भीतर जो कुछ  भी होता है, वह भुला दिया जाएगा, रिकार्ड से हटा लिया जायेगा, योरप और एशिया के बीच की दरार में दफन कर दिया जाएगा.

और उस वक़्त मैंने उनकी कविता की अनोखी और अनिवार ऊर्जा को समझा; उसे लगातार अपने कारावास से पार पाना होता था. दुनिया भर के कैदियों ने हमेशा ग्रेट एस्केप के ख्वाब देखे हैं, मगर हिक्मत की कविता ने कभी नहीं.

उनकी कविता ने, शुरू होने से पहले ही, कैदखाने को दुनिया के नक़्शे पर एक बिंदु की तरह रख दिया.

सबसे खूबसूरत समंदर
अब तक पार नहीं किया गया.
सबसे खूबसूरत बच्चा
अब तक बड़ा नहीं हुआ.
सबसे खूबसूरत दिन हमारे
हमने अब तक देखे ही नहीं.
और सबसे खूबसूरत लफ्ज़ जो मैं तुमसे कहना चाहता था
वो मैंने अब तक कहे ही नहीं.

उन्होंने हमें कैद कर लिया है,
बंद कर दिया है:
मुझे दीवारों के अन्दर
और तुम्हें बाहर.

मगर यह कुछ भी नहीं है.
सबसे बुरा तब होता है
जब लोग- जाने अनजाने
अपने अन्दर कैदखाने लिए चलते हैं
बहुतेरे लोगों को ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया है.

ईमानदार, मेहनतकश, भले लोग
जिन्हें प्यार किया जाना चाहिए
उतना ही जितना कि मैं तुमसे करता हूँ.[7]

उनकी कविता ज्यामितीय कम्पास की तरह वृत्त बनाती थी, कभी नज़दीकी तो कभी चौड़े और वैश्विक, जिसका सिर्फ नुकीला बिंदु जेल की कोठरी में गड़ा होता था.

शुक्रवार की सुबह

एक बार मैं मद्रीद के एक होटल में ह्वान मून्योस का इंतज़ार कर रहा था. वह लेट हो गया था क्योंकि जैसा मैंने बताया रात में मेहनत करते वक़्त वह कार सुधारते मैकेनिक की तरह होता, और समय का हिसाब नहीं रखता.

आख़िरकार जब वह आया, मैंने उसे कारों के नीचे पीठ के बल लेटने की बात कहकर छेड़ा. और बाद में उसने मुझे एक चुटकुला फैक्स किया जो मैं तुम्हें सुनाना चाहता हूँ, नाजिम. पता नहीं क्यों. क्यों यह जानना शायद मेरा काम नहीं. मैं तो सिर्फ दो मृत व्यक्तियों के बीच के एक डाकिये का काम कर रहा हूँ.

‘आपको मैं अपना परिचय देना चाहूँगा – मैं एक स्पैनिश मैकेनिक हूँ (सिर्फ कारें, मोटर-साइकिलें नहीं) जो अपना ज़्यादातर समय इंजिन के नीचे पीठ के बल लेटे हुए उसे देखने में गुजारता है. मगर, और यह महत्त्वपूर्ण मुद्दा है, मैं कभी कभी कलाकृतियाँ भी बना लेता हूँ. ऐसा नहीं कि मैं कोई कलाकार हूँ. ना. मगर मैं चीकट कारों के अन्दर और नीचे रेंगने का बकवास काम छोड़ना चाहता हूँ और कला की दुनिया का कीथ रिचर्ड बनना चाहता हूँ. और अगर यह संभव न हो तो मैं पादरियों की तरह काम करना चाहूँगा, केवल आधे घंटे के लिए, और वह भी वाइन के साथ.

यह ख़त मैं तुम्हें इसलिए लिख रहा हूँ क्यों कि मेरे दो दोस्त (एक पोर्टो में और एक रोतेर्दम में) तुम्हें और मुझे पुराने शहर पोर्टो के बॉयमंस कार म्यूजियम और दीगर बेसमेंट्स ( उम्मीद है जो अधिक मदिर होंगे) में आमंत्रित करना चाहते हैं.

उन्होंने लैंडस्केप  के बारे में भी कुछ कहा था जो मेरी समझ में नहीं आया. लैंडस्केप. मुझे लगता है शायद वह गाड़ी में घूमने और यहाँ वहाँ भटकने के बारे में था, या गाड़ी चलाते हुए इधर उधर निहारने के बारे में…

सॉरी सर! अभी अभी कोई दूसरा ग्राहक आया है. वाह! ट्रायम्फ स्पिटफ़ायरiii.

मुझे ह्वान की हँसी सुनाई देती है, उस स्टूडियो में गूँजती हुई जहाँ वह अपनी निशब्द आकृतियों के साथ तनहा है.

शुक्रवार की शाम

कभी कभी मुझे लगता है कि बीसवीं सदी की महानतम कविताएँ – चाहे वे पुरुष द्वारा लिखी गई हों या स्त्री द्वारा- शायद सर्वाधिक भ्रातृत्व वाली भी हैं. अगर ऐसा है तो इसका राजनीतिक नारों से कोई लेना-देना नहीं है.  यह बात लागू होती है रिल्के के लिए जो अराजनीतिक थे, बोर्हेस के लिए जो प्रतिक्रियावादी थे और हिक्मत के लिए जो ताउम्र कम्युनिस्ट रहे.  हमारी सदी अभूतपूर्व नरसंहारों वाली रही, फिर भी जिस भविष्य की इसने कल्पना की (और कभी कभी उसके लिए संघर्ष भी किया) उसमें भाईचारे का प्रस्ताव था. पहले की बहुत कम सदियों ने ऐसा प्रस्ताव रखा.

यह लोग, दीनो
जो रोशनी के तार-तार चीथड़े उठाये हैं
इस अँधेरे में
वे कहाँ जा रहे हैं, दीनो?
तुम, मैं भी:
हम उनके साथ हैं, दीनो.
नीले आसमान की झलक
हमने भी देखी है दीनो.[8]

शनिवार

नाजिम, शायद इस बार भी मैं तुमसे मिल नहीं रहा हूँ.  फिर भी सौगंध खा लूँगा कि मिल रहा हूँ. बरामदे में तुम मेरी मेज़ की दूसरी तरफ बैठे हो. कभी गौर किया है कि अक्सर सिर की बनावट उसके अन्दर आदतन चल रही विचार पद्धति की ओर इशारा करती है. कुछ सिर हैं जो लगातार गणनाओं की गति दर्शाते हैं. कुछ हैं जो खुलासा करते हैं पुरातन विचारों के दृढ़ अनुसरण का. इन दिनों कई सारे तो अनवरत हानि की अबोध्यता को धोखा देते हैं. तुम्हारा सिर- इसका आकार और तुम्हारी त्रस्त सी नीली आँखें- मुझे दिखाती हैं अलग अलग आसमानों वाली कई सारी दुनियाओं का सह-अस्तित्व, एक के भीतर दूसरा, अन्दर; डरावना नहीं शांत, मगर भीड़-भड़क्के का आदी.

मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ इस दौर के बारे में जिस में हम जी रहे हैं. जो कुछ भी तुम मानते थे कि इतिहास में हो रहा है, या समझते थे कि होना चाहिए, वह भ्रामक साबित हुआ. तुम्हारी कल्पना का समाजवाद कहीं नहीं बनाया जा रहा. कार्पोरेट पूँजीवाद बेरोक आगे बढ़ रहा है- यद्यपि उत्तरोत्तर प्रतिरोध के साथ – और वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर के टावर उड़ा दिए गए हैं. अत्यधिक भीड़ से भरी दुनिया दिन पर दिन गरीब होती जाती है. अब कहाँ है वह नीला आसमान जो तुमने दीनो के साथ देखा था?

तुम जवाब देते हो, हाँ, वे उम्मीदें तार-तार हैं, फिर भी वास्तव में इससे फ़र्क क्या पड़ता है? न्याय अब भी एक शब्द वाली प्रार्थना है, जैसा कि आज के तुम्हारे समय में ज़िगी मारली गाता है. सारा इतिहास ही उम्मीदों के बचे रहने,खो जाने और फिर नए होने का है. और नई उम्मीदों के साथ आते हैं नए विचार.

मगर भारी भीड़ के लिए, उनके लिए जिनके पास बहुत थोड़ा है या कभी-कभी साहस और प्यार के सिवाय कुछ भी नहीं है, उनके लिए उम्मीद अलग तरह से काम करती है. फिर उम्मीद दाँतों के बीच रखकर चबाने की चीज़ हो जाती है. यह बात मत भूलो. यथार्थवादी बनो. दाँतों के बीच में उम्मीद रखे हुए ताक़त आती है उस वक़्त आगे बढ़ने की  जब थकन उठने नहीं देती. ताक़त आती है ज़रुरत पड़ने पर असमय न चीख पड़ने की. और सबसे बढ़कर ताक़त मिलती है किसी पर न गुर्राने की. ऐसा व्यक्ति जो अपने दाँतों के बीच उम्मीद रखे है, उस भाई या बहन की  सभी इज्ज़त करते हैं. वास्तविक दुनिया में बिना उम्मीद वाले लोग अकेले होने के लिए अभिशप्त हैं. वे ज्यादा से ज्यादा दया दिखा सकते हैं. और जब रातें काटने और एक नए दिन के तसव्वुर की बात आती है तो क्या फर्क पड़ता है कि दाँतों के बीच रखी उम्मीदें ताज़ा हैं यार तार-तार. तुम्हारे पास थोड़ी कॉफ़ी होगी?
मैं बनाता हूँ.

मैं बरामदे से निकलता हूँ. जब तक मैं दो कप लिए रसोईघर से लौटता हूँ- और कॉफ़ी तुर्की है- तुम जा चुके हो. मेज़ पर, जहाँ स्कॉच टेप चिपका है उसके एकदम पास, एक किताब है जिसमें उघरी है एक कविता जो तुमने 1962 में लिखी थी.

गर मैं होता गूलर का पेड़ तो उसकी छांह में दम लेता
गर मैं किताब होता
बिन ऊबे पढ़ता उन रातों में जब आँखों में नींद न होती
गर होता कलम तो खुद की उँगलियों के बीच भी नहीं चाहता फँसना
गर दरवाज़ा होता
तो खुलता भलों के लिए और बुरों के लिए बंद हो जाता
गर मैं होता खिड़की, बिना पर्दों वाली खुली चौड़ी खिड़की
अपने कमरे में सारे शहर को ले आता
गर मैं लफ्ज़ होता
तो पुकारता खूबसूरत को सच्चे को खरे को
गर मैं लफ्ज़ होता
मैं चुपके से कहता अपना प्यार.[9]

मूल नोट्स

1.नाजिम हिक्मत, दि मास्को सिम्फ़नी, अनुवाद, तनेर बायबार्स, रैप एंड व्हिटिंग लि. 1970.
2.वही.
3.हिक्मत, प्राग डॉन, अनुवाद, रैंडी ब्लासिंग और मुतेन कोनुक, पेर्सिया बुक्स, 1994.
4.हिक्मत, यू, अनुवाद, ब्लासिंग और कोनुक, वही.
5.अनुवाद, जॉन बर्जर.
6.हिक्मत, लेटर फ्रॉम पोलैंड, अनुवाद जॉन बर्जर.
7.हिक्मत, 9-10पीएम. पोएम्स. अनुवाद ब्लासिंग और कोनुक.
8.हिक्मत, ऑन अ पेंटिंग बाइ अबिदीन, एंटाइटल्ड दि लॉन्ग मार्च. अनुवाद जॉन बर्जर.
9.हिक्मत, अंडर दि रेन. अनुवाद ओज़ेन ओज़ुनर और जॉन बर्जर.

अनुवादक के नोट्स

i.तुर्की के यूरोपीय हिस्से और एशियाई हिस्से को जोड़ने वाला जलडमरू मध्य जिसे इस्तंबुल स्ट्रेट भी कहा जाता है.
ii.इस्तंबुल की समुद्र तट से सटी विशाल कोठियाँ.
iii.एक ब्रिटिश स्पोर्ट्स कार का मॉडल

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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