हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

दुश्मन देश नहीं है भारतीय मुसलमान!

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/31/2015 11:34:00 AM


‘राष्ट्रवाद’, हिंदुत्व, ‘गाय’ और ‘आतंकवाद’ के नाम पर मुसलमान समुदाय को निशाना बनाने के फासीवादी मंसूबों पर मानव अधिकार कार्यकर्ता  भंवर मेघवंशी की रिपोर्ट. भंवर राजस्थान में दलित, आदिवासी और घुमन्तु समुदाय के लिए संघर्षरत है.

राजस्थान के दौसा में पाकिस्तानी झण्डा फहराये जाने, टौंक के मालपुरा में आईएसआईएस के पक्ष में नारे लगाये जाने तथा जयपुर में आतंकी नेटवर्क खड़ा करने में जुटे मोहम्मद सिराजुद्दीन को गिरफ्तार किये जाने के बाद यह चर्चा बहुत आम हो गई है कि क्या प्रदेश आतंकवादी गतिविधियों को संचालित करने की सबसे सुरक्षित जगह बन गया है?

उत्तरप्रदेश के एक स्वयंभू हिन्दू महासभाई कमलेश तिवाड़ी द्वारा हजरत मोहम्मद को अपमानित करने वाली टिप्पणी करने के विरोध में हुए देशव्यापी प्रदर्शन राजस्थान के भी विभिन्न शहरों में आयोजित किए गये.साम्प्रदायिक रूप से अतिसंवेदनशील मालपुरा कस्बे में भी मुस्लिम युवाओं ने अपने बुजुर्गों की मनाही के बावजूद एक प्रतिरोध जलसा किया.हालांकि शहर काजी और कौम के बुजुर्गों ने बिना मशवरे के कोई भी रैली निकालने से युवाओं को रोकने की भी असफल कोशिस की.जैसा कि मालपुरा के निवासी वयोवृद इकबाल दादा बताते हैं कि हमने उन्हें मना कर दिया था और शहर काजी ने भी इन्कार कर दिया था, मगर रसूल की शान के खिलाफ की गई अत्यंत गंदी टिप्पणी से युवा इतने अधिक आक्रोशित थे कि वे काजी तक को हटाने की बात करने लगे.


अंतत: मालपुरा के युवाओं की अगुवाई में 11 दिसम्बर को एक रैली जामा मस्जिद से शुरू हो कर कोर्ट होते हुए तहसीलदार को ज्ञापन देने पहुंची.शांतिपूर्ण तरीके से ज्ञापन दे दिया गया मगर दूसरे दिन सोशल मीडिया में वायरल हुए एक ऑडियो के मुताबिक रैली से लौटते हुये मुस्लिम नवयुवकों ने आरएसएस मुर्दाबाद तथा आईएसआईएस जिन्दाबाद के नारे लगाए.

जब मुस्लिम समाज के मौतबर लोगों को पुलिस के समक्ष यह वीडियो दिखाया गया तो उन्हें पहले तो यकीन ही नहीं हुआ, फिर उन्होंने अपने बच्चों की इस तरह की हरकत के लिये तुरंत माफी मांग ली और मामले को तूल नहीं देने का आग्रह किया.

मालपुरा के हिन्दुवादी संगठनों ने मांग की कि दोषियों को गिरफ्तार किया जाये.सत्तारूढ़ विचारधारा के राजनैतिक दबाव के चलते किसी व्यक्ति विशेष द्वारा बनाये गये वीडियो को आधार बना कर मुकदमा दर्ज कर लिया गया तथा सलीमुद्दीन रंगरेज, फिरोज पटवा, वसीम, शाहिद, शाकिर, अमान तथा वसीम सलीम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

60 वर्षीय राशन डीलर सलीमुद्दीन के बेटे नईम अख्तर का कहना है कि उनके वालिद एक जमीन के सौदे के सिलसिले में कोर्ट गये थे, वे रैली में शरीक नहीं थे, मगर पुलिस कहती है कि उनका चेहरा वीडियो में दिख रहा है जहां नारे लगाये जा रहे थे, इसलिये उन्हें गिरफ्तार किया गया है.

मुस्लिम समुदाय का आरोप है कि पुलिस जानबूझकर बेगुनाहों को पकड़ रही है.इतना ही नहीं बल्कि धरपकड़ अभियान के दौरान सादात मौहल्ले में पुलिस द्वारा मुस्लिम औरतों के साथ निर्मम मारपीट और बदसलूकी भी की गई.

पुलिस दमन की शिकार 50 वर्षीय बिस्मिल्ला कहती हैं कि हम बहुत सारी महिलाएं कुरान पढ़कर लौट रही थीं, तब घरों में घुसते हुए मर्द पुलिसकर्मियों ने हमें मारा, वह चल फिरने में असहाय महसूस कर रही है.सना, जमीला, फरजाना, फहमीदा, नसीम आदि पर भी पुलिस ने लाठियां भांजी, किसी को चोटी पकड़ कर घसीटा तो किसी को पैरों और जंघाओं पर मारा एवं भद्दी गालियां दे कर अपमानित किया.फरजाना, साजिदा और आरिफा को पुलिस पथराव और राजकार्य में बाधा उत्पन्न करने के जुर्म में गिरफ्तार कर ले गई.जहां से फरजाना को शांतिभंग के आरोप में पाबंद कर देर रात छोड़ दिया गया, वहीं आरिफा और साजिदा को जेल भेज दिया गया.मालपुरा में आतंकवादी संगठनों के पक्ष में नारे लगाने के वीडियो को वायरल किए जाने के बाद राज्य भर में इसकी प्रतिक्रिया हुई.हिन्दुत्ववादी संगठनों ने कुछ जगहों पर इसके विरुद्ध ज्ञापन भी दिये और देशविरोधी तत्वों पर अंकुश लगाने की मांग की.

जो वीडियो लोगों को उपलब्ध है उसे देखने पर ऐसा लगता है कि वापस लौटती रैली में नारे लगाते एक युवक समूह पर ये नारे सुपर इम्पोज किये गये हैं.क्योंकि नारों की घ्वनि और रैली में चल रहे लोगो के मध्य कोई तारतम्य ही नहीं दिखाई पड़ता है.

जिस जगह का यह वीडियो है, वहां के दुकानदारों का जवाब भी स्पष्ट नहीं है.वे यह तो कहते हैं कि मालपुरा में पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे आम बात है, मगर ये नारे कब और कहां लगते हैं तथा उस दिन क्या उन्होंने आईएसआईएस के नारे सुने थे? इसका जवाब वे नहीं देते, इतना भर कहते हैं कि शायद आगे जा कर लगाये हों या कोर्ट में लगा कर आये हों.

विचार योग्य बात यह है कि ज्ञापन के दिन ना किसी समाचार पत्र, ना  टीवी चैनल और ना ही पुलिस को ये नारे सुनाई पड़े. अगले दिन अचानक एक वीडियो को, जिसकी प्रमाणिकता ही संदिग्ध है, आधार बना कर पुलिस मालपुरा के मुस्लिम समाज को देशप्रेम की तुला पर कमतर पाने लगती है और फिर गिरफ्तारियों के नाम पर दमन और दशहत का जो दौर चलता है, वह दिन ब दिन बढ़ते ही जाता है. हालात इतने भयावह हो जाते हैं कि लोग अपने आशियानों पर ताले लगा कर दर बदर भागने को मजबूर कर दिये जाते हैं.

मालपुरा का घटनाक्रम चर्चा में ही था कि एक बड़े समाचार पत्र में दौसा के हलवाई मोहल्ले के निवासी खलील के घर की छत पर पाकिस्तानी झण्डा फहराये जाने की सनसनीखेज खबर साया हो गई. खलील को तो प्रथम दृष्टया ही देशद्रोही घोषित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई, मगर दौसा के मुस्लिम समाज ने पूरी निर्भीकता से इस शरारत का मुंह तोड़ जवाब दिया और पुलिस तथा प्रशासन को बुलाकर स्पष्ट किया कि यह चांद तारा युक्त हरा झण्डा इस्लाम का है, ना कि पाकिस्तान का! अंतत: पुलिस अधीक्षक गौरव यादव को उन्माद फैलाने वाली हरकत करने की इस घटना पर स्पष्टीकरण देना पड़ा तथा उन्होनें माना कि यह गंभीर चूक हुई है, एक धार्मिक झण्डे को दुश्मन देश का ध्वज बताना शरारत है. मुस्लिम समुदाय की मांग पर चार मीडियाकर्मियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया गया और खबर लिखने वाले पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया गया. खबर प्रकाशित करने वाले मीडिया समूह ने इसे पुलिस की नाकामी करार देते हुए स्पष्ट किया कि उनकी खबर का आधार पुलिस द्वारा दी गई सूचना ही थी, पुलिस ने अपनी असफलता छिपाने की गरज से मीडिया के लोगों को बलि का बकरा बना दिया है.

इन दिनों ईद मिलादुन्नबी की तैयारियों के चलते घरों पर चांद तारे वाला हरा झण्डा लगभग हर जगह लगा हुआ दिखाई पड़ जाता है, उसे पाकिस्तानी झण्डे के साथ घालमेल करके मुसलमानों के खिलाफ दुष्प्रचार का अभियान चलाया जा रहा है.

भीलवाड़ा में पिछले दिनों एक मुस्लिम तंजीम के जलसे के बाद ऐसी ही अफवाह उड़ाते एक शख्स को मैंने जब चुनौती दी कि वह साबित करे कि जिला कलेक्टरेट पर प्रदर्शन में पाकिस्तानी झण्डा लहराया गया है तो वह माफी मांगने लगा. इसी तरह फलौदी में पाक झण्डे फहराने सम्बंधी वीडियो होने का दावा कर रहे एक व्यक्ति से वीडियो मांगा गया तो उसने ऐसा कोई वीडियो होने से ही इन्कार कर दिया. तब ये कौन लोग है जो संगठित रूप से 'पाकिस्तानी झण्डे' के होने का गलत प्रचार कर रहे हैं? यह निश्चित रूप से वही अफवाह गिरोह है जो हर बात को उन्माद फैलाने और दंगा कराने में इस्तेमाल करने में महारत हासिल कर चुका है.

इन कथित राष्ट्रप्रेमियों को मीडिया की बेसिर पैर की खबरें खाद पानी मुहैया करवाती रहती है. भारत का कॉरपोरेट नियंत्रित  जातिवादी मीडिया लव जिहाद, इस्लामी आतंतवाद, गौ तस्करी, पाकिस्तानी झण्डा, जासूसी और आतंकी नेटवर्क के जुमलों के आधार पर चटपटी खबरें परोस कर मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध नफरत फैलाने के विश्वव्यापी अभियान का हिस्सा बन रहा है. आतंक की गैर जिम्मेदाराना  पत्रकारिता का स्वयं का चरित्र ही अपने आप में किसी  आतंकवाद से कम नहीं दिखता है. हर पकड़ा ग़या 'संदिग्ध' मुस्लिम 'दुर्दांत आतंकी' घोषित कर दिया जाता है और उसका नाम 'अलकायदा', 'इंडियन मुजाहिद्दीन', 'तालिबान' तथा इन दिनों 'इस्लामिक स्टेट ऑफ ईराक एण्ड सीरिया' से जोड़ दिया जाता है. आश्चर्य तो तब होता है जब मीडिया गिरफ्तार संदिग्ध को उपरोक्त में किसी एक आतंकी नेटवर्क का कमाण्डर घोषित करके ऐसी खबरें प्रसारित व प्रकाशित करता है, जैसे कि सारी जांच मीडियाकर्मियों के समक्ष ही हुई हो. अपराध सिद्ध होने से पूर्व किसी को आतंकी घोषित किए जाने की यह मीडिया ट्रायल एक पूरे समुदाय को शक के दायरे में ले आई है. इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि आज इस्लाम और आतंकवाद को एक साथ देखा जाने लगा है.इसी दुष्प्रचार का नतीजा है कि आज हर दाढ़ी और टोपी वाला शख्स लोगों की नजरों में संदिग्ध के रूप में चुभने लगा है.

हाल ही में जयपुर में इण्डियन ऑयल कार्पोरेशन के मार्केटिंग मैनेजर सिराजुद्दीन को एन्टी टेरेरिस्ट स्क्वॉयड ने आईएसआईएस के नेटवर्क का हिस्सा होने के आरोप में गिरफ्तार किया. मीडिया के लिए यह एक महान उपलब्धि का क्षण बन गया. पल पल की खबरें परोसी जाने लगी, आतंकी नेटवर्क का सरगना सिराजुद्दीन यहां रहता था, यह करता था, 13 देशों के चार लाख लोगों से जुड़ा था, अजमेर के कई युवाओं के सम्पर्क में था. सुबह मिस्र, इंडोनेशिया रिपोर्ट भेजता था, शाम को खाड़ी देशों तथा दक्षिणी अफ्रिकी देशों को रिपोर्ट भेजता था. फिदायीन दस्ते तैयार कर रहा था, आदि इत्यादि.

दस दिन आतंक की खबरों का बाजार गर्म रहा, सिराजुद्दीन को इस्लामिक स्टेट का एशिया कमाण्डर घोषित कर दिया गया, जबकि जांच जारी है और जांच एजेन्सियों की ओर से इस तरह की जानकारियों का कोई ऑफिशियल बयान जारी नहीं हुआ है.गिरफ्तार किये गये सिराजुद्दीन के पिता सरवर कहते हैं कि उनका बेटा पक्का वतनपरस्त है, वह अपने मुल्क के खिलाफ कुछ भी नहीं कर सकता है. उसकी पत्नी यास्मीन के मुताबिक उसने कभी भी सिराजुद्दीन को कुछ भी रहस्यमय हरकत करते हुए नहीं देखा, वह एक नेक धार्मिक मुसलमान के नाते लोगों की सहायता करनेवाला इंसान है. उसके बारे में यह सब सुनकर मैं विश्वास ही नहीं कर पा रही हूं.


खैर, सच्चाई क्या है, इसके बारे में कुछ भी कयास लगाना अभी जल्दबाजी ही होगी और जिस तरह का हमारी खुफिया एजेन्सियां, पुलिस और आतंकरोधी दस्तों का पूर्वाग्रह युक्त साम्प्रदायिक व संवेदनहीन चरित्र है, उसमें न्याय या सत्य के प्रकटीकरण की उम्मीद सिर्फ एक मृगतृष्णा ही है.ज्यादातर मामलों में बरसों बाद कथित आतंकवादी बरी कर दिए जाते हैं, मगर तब तक उनकी जवानी बुढ़ापा बन जाती है.परिवार तबाह हो चुके होते हैं. 


कुछ अरसे से पढ़े लिखे, सुशिक्षित, आईटी एक्सपर्ट मुसलमान नौजवान खुफिया एजेन्सियों और आतंकवादी समूहों के निशाने पर हैं, उन्हें पूर्वनियोजित योजनाओं के तहत तबाह किया जा रहा है. इसके विरुद्ध उठने वाली कोई भी आवाज देशद्रोह मान ली जा रही है, इसलिए राष्ट्र राज्य से भयभीत अल्पसंख्यक समूह अब बोलने से भी परहेज करने लगे हैं और बहुसंख्यक तबका मीडियाजनित विभ्रमों का शिकार हो कर राज्य प्रायोजित दशहतों को 'उचित' मानने लगा है.यह अत्यंत निराशाजनक स्थिति है.

राजस्थान में गोपालगढ़ में मुस्लिमों के जनसंहार के आरोपी खुलेआम विचरण करते हैं. नौगांवा के होनहार मुस्लिम छात्र आरिफ के, जिसे पुलिस ने घर में घुसकर एके सैंतालीस से भून डाला, हत्यारे पुलिसकर्मियों को सजा नहीं मिलती है. भीलवाड़ा के इस्लामुद्दीन नामक नौजवान की जघन्य हत्या करने वाले हत्यारों का पता भी नहीं चलता है. गौ भक्तों द्वारा पीट पीट कर मार डाले गए डीडवाना के गफूर मियां के परिवार की सलामती की कोई चिन्ता नहीं करता है. हर दिन होने वाली साम्प्रदायिक वारदात की आड़ में मुस्लिमों को लक्षित कर दमन चक्र निर्बाध रूप से जारी है. कहीं भी कोई सुनवाई नहीं है. लोग थाना, कोर्ट कचहरियों में चक्कर काटते काटते बेबस है और उपर से शौर्यदिवस के जंगी प्रदर्शनों में 'संघ में आई शान-मियांजी जाओ पाकिस्तान' या 'अब भारत में रहना है तो हिन्दू बन कर रहना होगा' जैसे नारे जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं.

हर दिन दूरियां बढ़ रही है, बेलगाम बयानबाजी, दिन प्रतिदिन गांव गांव में बढ रहे संचलन और हथियारों को लहराती हुई रैलियां किसी गृहयुद्ध के बीज बोती दिख रही है.

आश्चर्य की बात तो यह है कि हम अपना घर नहीं सम्भाल पा रहे हैं, अपने ही लोगों का भरोसा नहीं जीत पा रहे हैं और हमारे रक्षामंत्री अमेरिका की सैर से लौट कर कह रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र कहेगा तो हम इस्लामिक स्टेट से लड़ने को तैयार हैं. समझ नहीं आता कि हम आ बैल मुझे मार का निमंत्रण क्यों देना चाहते है.हथियार सौदागर अमेरिका कभी किसी का यार हुआ है. उसके बहकावे में आकर हमें किसी युद्ध में अपनी सेना को झोंकने की गलती क्यों करनी चाहिए. हमारी असफल विदेश नीति के चलते हमने नेपाल जैसे  पड़ोसी मित्र तक को चीन को दोस्त बना डाला है. अब हम क्या मुस्लिम दुनिया को भी दुश्मन बना लेंगे? गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि हम अमेरिका जैसे देशों के बिछाए जाल में तो नहीं फंसते जा रहे है.हमारा अमेरिका प्रेम हमें डुबो भी सकता है. स्थिति यह होती जा रही है कि वाशिंगटन ही पूरा विमर्श तय कर रहा है. इस्लामिक आतंकवाद जैसी शब्दावली से लेकर किनसे लड़ना है और कब लड़ना है? ईराक से लेकर अफगानिस्तान तक और सीरिया से लेकर लीबिया तक आतंकी समूहों का निर्माण, उनके सरंक्षण संवर्धन में अमेरिका की हथियार उद्योग और सत्ता सब लगे हुए हैं. वैश्विक वर्चस्व की इस लड़ाई में पश्चिम का नया दुश्मन मुसलमान है, मगर भारतीय राष्ट्र राज्य के लिए मुसलमान दुश्मन नहीं है. वे देश के सम्मानिक नागरिक हैं. राष्ट्र निर्माण के साथी हैं, उनसे दुश्मनों जैसा सलूक बंद करना होगा. उनके देशप्रेम पर सवालिया निशान लगाने की प्रवृति से पार पाना होगा. झण्डा, दाढ़ी, टोपी, मदरसे, आबादी, मांसाहार जैसे कृत्रिम मुद्दों के द्वारा उनका दमन रोकना होगा.उन्हें न्याय और समानता के साथ अवसरों में समान रूप से भागीदार बनाना होगा, ताकि हम एक शांतिपूर्ण तथा सुरक्षित विकसित राष्ट्र का स्वप्न पूरा कर सकें.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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