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बीच सफ़हे की लड़ाई

नैरोबी डब्ल्यूटीओ: कयामत के आसार

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/04/2015 05:05:00 PM


पिछले एक महीने से पहले जेएनयू और फिर देश के दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्र अपनी स्कॉलरशिप को बढ़ाने और इसका विस्तार कर राज्य विश्वविद्यालयों में भी लागू करने की मांग के लिए आंदोलन कर रहे हैं. यह आंदोलन यूजीसी द्वारा स्कॉलरशिप की समीक्षा के फैसले से शुरू हुआ था, जिसके नतीजे में अभी मिल रही स्कॉलरशिप के बंद होने या उसमें मेरिट और आर्थिक स्थिति जैसे मानदंडों को लागू किए जाने की आशंका पैदा हो गईं. धीरे-धीरे यह आंदोलन बढ़ कर शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ आंदोलन में विकसित हो गया है और दिसंबर में नैरोबी में होनेवाली डब्ल्यूटीओ की बैठक के दौरान सेवाओं और सुविधाओं के व्यापक निजीकरण के हक में लिए जानेवाले फासलों की आशंका के खिलाफ उठ खड़े आंदोलनों का एक हिस्सा बन गया है. आनंद तेलतुंबड़े इस बार बता रहे हैं कि इस बैठक के नतीजे और शिक्षा का निजीकरण किस तरह बराबरी पर आधारित एक जनवादी के सपने के खिलाफ है. अनुवाद: रेयाज उल हक

केन्या के नैरोबी में 15-18 दिसंबर को होने वाली डब्ल्यूटीओ की 10वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में उच्च शिक्षा पर यह सार्वजनिक विमर्श आखिरकार खत्म हो जाएगा कि उच्च शिक्षा सार्वजनिक/प्रतिभा/निजी सुविधा है और पिछले दो दशकों में उच्च शिक्षा से सरकार द्वारा अपने हाथ खींच लेने की खुली और छुपी हुई कार्रवाइयों का भी अंत हो जाएगा. इसी बैठक में मौजूदा दोहा दौर की वार्ताओं के नतीजे पर पहुंचने की योजना भी है. ये वार्ताएं 2001 में शुरू हुईं लेकिन सबसे कम विकसित और विकासशील देशों के लगातार विरोध के कारण वे कभी पूरी नहीं हो पाईं. डब्ल्यूटीओ की महापरिषद की एक विशेष बैठक नवंबर 2014 में जेनेवा में बुलाई गई थी, जिसने प्रतिरोध को दबाने की प्रक्रिया पर फैसला लिया था और नैरोबी वार्ताओं को अंजाम तक पहुंचाने के लिए ‘कार्य योजना’ को आखिरी शक्ल दी थी. एक बार इसके अमल में लाए जाने के बाद गरीब देशों के लोगों के लिए इसके तबाही भरे नतीजे होंगे क्योंकि बहुत सारी वस्तुएं और सेवाएं अचानक ही उनकी पहुंच से बाहर हो जाएंगी.

भारत के लिए इसके कोई कम गंभीर नतीजे नहीं होंगे. अगस्त 2005 में इसने हांग कांग में उच्च शिक्षा का जो प्रस्ताव रखा था, वह दोहा दौर के अंजाम तक पहुंचने के साथ ही एक ऐसी प्रतिबद्धता बन जाएगा, जिससे पीछे नहीं हटा जा सकेगा. हालांकि यह प्रस्ताव कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने रखा था, लेकिन इसके अंजाम को भाजपा के नेतृत्व वाली मौजूदा राजग सरकार फख्र से दिखाएगी और यह एक बार फिर से इन दलों के बुनियादी जनविरोधी चरित्र को उजागर करता है. सिर पर खड़ी इस तबाही के असर जनता पर अभी भी जाहिर नहीं हुए हैं, हालांकि ऑल इंडिया फोरम फॉर राइट टू एजुकेशन (एआईएफआरटीई) के तहत देश भर में विरोध का सिलसिला जारी है. एआईएफआरटीई, केजी से लेकर स्नातकोत्तर तक सबके लिए मुफ्त और समान शिक्षा की मांग करने के लिए 2009 में शुरू की गई सैकड़ों संगठनों और कार्यकर्ताओं की एक संघबद्ध संस्था है.

जाली अर्थव्यवस्था

उच्च शिक्षा के बाजारीकरण के पैरवीकार, लोगों को यह कह कर गलतफहमी पैदा करते हैं कि उच्च शिक्षा एक सार्वजनिक सुविधा नहीं है. अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक सुविधा को बहुत ही संकीर्ण तरीके से दोहरे मानकों के आधार पर तय किया गया है: बिना होड़ वाली और बाहर न किए जा सकने लायक, मतलब यह कि एक इंसान द्वारा उस सुविधा का इस्तेमाल किया जाना एक दूसरे इंसान द्वारा उसके इस्तेमाल में रुकावट न डाले और उस सुविधा को किसी भी इंसान द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने से रोका नहीं जा सकता. सार्वजनिक सुविधा की इस दोहरी प्रकृति उनकी मांग को पूरा करने के लिहाज से बाजार के प्रतिकूल बना देती है. और इसीलिए, उनके बारे में यह अपेक्षा की जाती है कि उनको बिना लाभ वाले संगठनों और सरकार द्वारा मुहैया कराया जाएगा. परंपरागत रूप से, लाइटहाउस (रोशनीघर) और राष्ट्रीय सुरक्षा अर्थव्यवस्था की किताबों में सार्वजनिक सुविधा के सबसे बेहतरीन मिसालें हैं. लेकिन अर्थव्यवस्था इस पर भी गौर करती है कि अमल में ऐसी मिसालें बहुत कम हैं और ज्यादातर सुविधाएं एक न एक मानक पर खरी उतरती हैं, या कभी वे सार्वजनिक सुविधा होती हैं और कभी नहीं, अपनी अलग अलग किस्मों के कारण वे बदलती रहती हैं. एक सार्वजनिक नजरिया ही अक्सर किसी सुविधा को सार्वजनिक या निजी बनाता है. मसलन लंदन की नेशनल पोर्ट्रेट गैलरी में हेनरी अष्टम का आधिकारिक पोर्ट्रेट सार्वजनिक सुविधा बनाया जाता है लेकिन लूवर में मोना लीजा की पेंटिंग नहीं. जैसा कि हम देखते हैं, अनेक ऐसी सुविधाएं हैं जिन्हें परंपरागत रूप से सार्वजनिक सुविधा माना गया था, जैसे कि सार्वजनिक सड़कें, जो अब तेजी से निजी सुविधा में बदलती जा रही हैं और टोल मार्गों के रूप में हाल में बाजार के दायरे में लाई गई हैं.

उच्च शिक्षा की क्या बात करें, यहां तो प्राथमिक शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं भी इस दलील के साथ निजी सुविधाएं बताई जा सकती हैं. यह पानी और हवा समेत हर चीज को मुनाफे के लिए बाजार में बेचे जाने के लिए वस्तु के रूप में बदलने की एकदम ठेठ नवउदारवादी तरकीब है. सार्वजनिक नजरिए में आम तौर पर शिक्षा और खास तौर से उच्च शिक्षा के चार बड़े काम हैं: नए ज्ञान का विकास (शोध का काम), उच्च गुणवत्ता वाले व्यक्यितों का प्रशिक्षण (सिखाने का काम), समाज को सेवाएं मुहैया कराना (सेवा का काम) और सामाजिक आलोचना (आचार संबंधी काम). अगर हम इनमें से हरेक कामों पर बिना होड़ वाले और बाहर न किए जा सकने वाले आर्थिक मानकों के मुताबिक भी गौर करें तो उच्च शिक्षा का झुकाव निजी सुविधा के बजाए एक सार्वजनिक सुविधा होने की ओर ही होगा. मिसाल के लिए नया ज्ञान पुराने ज्ञान पर बनता है; आइंस्टीन के सिद्धांत न्यूटन के आधारों के बिना मुमकिन नहीं होंगे. नवउदारवादियों द्वारा बौद्धिक संपत्ति अधिकार (आइपीआर) के जरिए शोध को निजी सुविधा के रूप में सीमित कर देने की पैरवी अदूरदर्शी है. लंबी दौड़ में, सैद्धांतिक ज्ञान नहीं पैदा होने या फिर आईपीआर या फिर डब्ल्यूटीओ की किसी दूसरी तरकीब के कृत्रिम औजारों के जरिए इसको अभिजात दायरे में सीमित कर देने का नए ज्ञान के उत्पादन की गति पर और इस तरह इंसानी भविष्य पर बहुत ही बुरा असर पड़ेगा.

फिर मैकाले के समय से ही दी जा रही एक और सदाबहार दलील शिक्षा के लिए संसाधनों की कमी के बारे में है. राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने अंदाजा लगाया है कि भारत को 2020 तक उच्च शिक्षा में 30 % ग्रॉस एनरॉलमेंट राशन (जीईआर: कुल नामांकन राशन) के लक्ष्य को पूरा करने के लिए करीब 19 हजार करोड़ डॉलर के निवेश की जरूरत है और उसने अपेक्षित रूप से सलाह दी है कि चूंकि सरकार के पास संसाधनों की कमी है इसलिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिए इसको पूरा किया जाए. साल 2012-13 के महज एक साल में सरकार ने कंपनियों के जो कर माफ किए थे, उनकी गिनती 5,73,627 करोड़ रुपए की गई थी (तब की विनिमय दर के मुताबिक 10 हजार करोड़ डॉलर से ज्यादा). सरकार कॉरपोरेट क्षेत्र को हर साल ऐसी रकम तोहफे में दे रही है, जिसके महज कुछेक बरसों की रकम को जोड़ दिया जाए तो इस तरह की अनेक जरूरतें पूरी हो सकती हैं.

भारी मुनाफे की काबिलियत

ये दलीलें दुनिया में उच्च शिक्षा के सबसे बड़े बाजार में वैश्विक पूंजी के खुले हितों के लिए महज एक मुखौटा हैं, जहां 15-24 साल की उम्र के 23.4 करोड़ लोग रहते हैं, जो अमेरिकी आबादी के बराबर है (फिक्की, 2011). यह बाजार सालाना 6500 करोड़ डॉलर का है जो 18 % से ज्यादा की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ रहा है और जो शिक्षा के 59.7 % ऐसे बाजार से बना है, जिसकी कीमतों में बढ़ोतरी होने से भी उसकी मांग पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. इसको ठीक ही निवेश के लिए ‘उभरता हुआ क्षेत्र’ करार दिया गया है. भारत के अकेले ऑनलाइन शिक्षा बाजार के ही 2017 तक 4000 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है, जिसमें संयुक्त राज्य (अमेरिका) ने भारी रुचि जाहिर की है. ‘बूमिंग डिस्टेंस एजुकेशन मार्केट आउटलुक 2018’ शीर्षक वाली आरएनसीओएस (एक बाजार शोध कंपनी) रिपोर्ट उम्मीद करती है कि भारत में दूर शिक्षा बाजार 2013-14 से 2017-18 के बीच 34 % की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ेगी.

इस क्षेत्र को निजी हाथों में सौंप देने की तैयारियां 1986 से ही शुरू हो गई थीं, जब नई शिक्षा नीति ने उच्च शिक्षा में निजी निवेश की इजाजत दी थी और जिसके नतीजे में शैक्षिक संस्थानों के भेष में निजी दुकानें पनप आईं जो भारी मांग वाली प्रोफेशनल शिक्षा बेच रही हैं. तब से लेकर अब वृद्धि करते हुए उन्होंने सचमुच के साम्राज्य खड़े कर लिए हैं. 1991 से, जब नवउदारवादी सुधारों को औपचारिक रूप से लागू किया गया, एक के बाद एक कमेटियों के जरिए लगातार कोशिशें की गईं और जिनका अंजाम मुकेश अंबानी-कुमारमंगलम बिड़ला कमेटी के रूप में हुआ जिसने अप्रैल 2000 में इस पर जोर डालने के लिए ‘अ पॉलिसी फ्रेमवर्क फॉर रिफॉर्म्स इन एजुकेशन’ तैयार किया कि उच्च शिक्षा को बाजार की ताकतों के भरोसे छोड़ दिया जाए. हालांकि तब से सरकार ने फीस में भारी बढ़ोतरी करते हुए अपने खर्च पर पढ़ने (स्व-वित्त) की प्रक्रिया को तेज किया है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह मुमकिन नहीं रहा था कि उच्च शिक्षा में राजकीय वित्त पोषण को पूरी तरह खत्म किया जाए. हालांकि इन कदमों ने निश्चित रूप से 2005 में डब्ल्यूटीओ को दिए गए उच्च शिक्षा प्रस्ताव की दिशा में जमीन तैयार किया था. इसके बाद, तब की संप्रग-दो सरकार ने विभिन्न (छह) बिलों के जरिए उच्च शिक्षा को गैट्स के हवाले करने में आनेवाली सारी बाधाओं को दूर करने की कोशिश की, जिसमें उच्च शिक्षा विधेयक और शोध विधेयक शामिल हैं जिनमें यूजीसी, एमसीआई, एआईसीटीई, एनसीटीई, बीसीआई आदि को पूरी तरह खत्म कर देने की पैरवी की गई थी. लेकिन सरकार इन्हें राज्य सभा में पास नहीं करा पाई. फिर सरकार ने संसद को दरकिनार करने की अपनी जानी-पहचानी तरकीब अपनाई और सितंबर 2013 में एक राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान की शुरुआत की, ताकि यूजीसी को खोखला करते हुए और निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) को बढ़ावा देते हुए उच्च शिक्षा के पूरे ढांचे को बदला जा सके. च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम, कॉमन सिलेबस वगैरह संभावित विदेशी खिलाड़ियों के लिए राह आसान बनाने की दिशा में उठाए गए कुछ कदम थे.

एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने उच्च शिक्षा के आंकड़ों को बेहतर बना कर दिखाने की होड़ भरी रणनीति अपनाई और इस प्रक्रिया में इसके तेजी से गिरते हुए मानकों की तरफ से आंखें मूंदे रखा. यहां तक कि आईआईटी और आईआईएम जैसे बेहतर शिक्षा के एकाध मानक भी बख्शे नहीं गए और अपने बुनियादी ढांचे और फैकल्टी का ख्याल किए गए बगैर उनकी तादाद बढ़ाई गई. इसने निश्चित रूप से जीईआर को 17-18% के दावे तक बढ़ा दिया लेकिन यह 26% के विश्व औसत और चीन (26.70 %), ब्राजील (36%) और रूस (76%) जैसे उभरते हुए देशों से काफी नीचे है. भारत के महाशक्ति बनने की हसरत के लिहाज से यह तो पूरी तरह निराशाजनक आंकड़ा है. यह फर्क वैश्विक पूंजी के लिए भारी निवेश और मुनाफे के मौकों के संकेत देता है.

नतीजे जिनको बदला नहीं जा सकेगा

थोड़े व्यंग्यपूर्वक कोई यह सोच सकता है कि भारत दुनिया के सबसे निजीकृत उच्च शिक्षा वाला देश बन चुका है; जहां कुल शैक्षिक संस्थानों में से 64% संस्थान निजी हैं. भारत में शिक्षा क्षेत्र में सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को इजाजत पहले ही मिल चुकी है, अप्रैल 2000 से 117.11 करोड़ अमेरिकी डॉलर से ज्यादा की रकम आ चुकी है. एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज के मुताबिक, देश में 631 विदेशी विश्वविद्यालय/संस्थान हैं, जिनमें से ज्यादातर ‘जुड़ कर काम करने (ट्विनिंग)’ (भारतीय विश्वविद्यालयों के साथ साझे उपक्रम के रूप में या अकादमिक साझेदारी के रूप में) की अवधारणा के साथ काम कर रहे हैं. ऐतिहासिक रूप से उच्च शिक्षा को हमेशा ही वित्तीय समर्थन की कमी रही है; इस पर सार्वजनिक खर्च 406 डॉलर प्रति छात्र रहा है जो मलेशिया (11,790 डॉलर), ब्राजील (3,986 डॉलर), इंडोनेशिया (666 डॉलर) और फिलीपींस (625 डॉलर) जैसे विकासशील देशों से भी कम है. गुणवत्ता के लिहाज से उच्च शिक्षा कहीं नहीं ठहरती; हमारे बेहतरीन शिक्षा संस्थान भी 240 की वैश्विक रैंकिंग से बाहर हैं. इसलिए अगर उच्च शिक्षा गैट्स के हवाले हो गई तो और ज्यादा नुकसान क्या हो सकता है? सबसे छोटा जवाब यह होगा कि मौजूदा नीति का अटपटा सा ‘मुनाफे के लिए नहीं’ का प्रावधान खत्म हो जाएगा; भारत की उच्च शिक्षा को लेकर भविष्य की सारी नीतियों की ट्रेड पॉलिसी रिव्यू मैकेनिज्म द्वारा वार्षिक समीक्षा की जाएगी जो डब्ल्यूटीओ के तहत एक कानूनी उपकरण है और उसके द्वारा सुझाए गए बदलावों को जरूरी तौर पर अपनाना होगा – यह भारत की आजादी और संप्रभुता का एक खुला उल्लंघन होगा – और बेशक अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए लागू आरक्षण और दूसरी रियायतें भी खत्म हो जाएंगी. कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए कभी खत्म न होने वाला चारा पैदा करने के मकसद के साथ उच्च शिक्षा व्यापार के लायक एक सुविधा बन जाएगी जिसे छात्रों द्वारा एक उपभोक्ता के रूप में खरीदना होगा.

नरेंद्र मोदी द्वारा भारतीय युवाओं के लिए बेहतर मौके पैदा करने के दावे पूरी तरह उजागर हो गए हैं, जब वे नैरोबी में अपने पिछले प्रधानमंत्री के नक्शेकदम पर चलते हुए उन्हें उच्च शिक्षा तक पहुंच से स्थायी रूप से बाहर कर देने की बंदोबस्त कर रहे हैं. कांग्रेस के लिए यह एक तरकीब थी, मोदी के लिए यह विचारधारात्मक मामला है. उनके परिवार की ब्राह्मणवादी श्रेष्ठतावादी विचारधारा के सुर इस प्रक्रिया में उदारवाद की सामाजिक डार्विनवाद के साथ बखूबी मिलते हैं, जिसके तहत अवाम की बहुसंख्या के पास जो कुछ भी थोड़ा बहुत है उसे उनसे छीन कर मुट्ठी भर अभिजातों के हाथ सौंप दिया जाता है ताकि वे उन पर प्रभुत्व स्थापित कर सकें. उन मुट्ठी भर लोगों के लिए उच्च शिक्षा में गैट्स की हुक्मरानी का मतलब शायद एक कभी न खत्म होने वाला एक मौका हो, लेकिन व्यापक अवाम के लिए इसका मतलब खतरे की घंटी होगी. आखिर इस दुनिया में किस तरह वे उच्च शिक्षा के लिए कीमत चुका पाएंगे, जिनसे 20 रु. रोज पर गुजर-बसर करने की उम्मीद की जाती है, जिनका कैलोरी सेवन चिंताजनक स्तर तक गिर चुका है, जो स्थायी अकाल की दशा में रह रहे हैं? उनके लिए सिर पर खड़ी इस कयामत को रोकने के लिए बस यही हफ्ता बचा हुआ है.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ नैरोबी डब्ल्यूटीओ: कयामत के आसार ”

  2. By indian matrimony on December 18, 2015 at 5:54 PM

    very nice information ,you have posted on this blog.thanks for sharing such blog with us.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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