हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

इन बेशर्मों को शर्म नहीं आएगी

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/07/2015 06:31:00 PM



आनंद तेलतुंबड़े. अनुवाद: रेयाज उल हक

‘जो हमसे असहमत होते हैं, हम उनसे बहस नहीं करते, उन्हें खत्म कर देते हैं.’
-बेनितो मुसोलिनी [द लासियो स्पीचेज (1936), अंतोनियो सांती द्वारा द बुक ऑफ इतालियन विज्डम में उद्धृत, सितादेल प्रेस, 2003, पृ.88.]

देश में एक सचमुच की क्रांति शुरू हुई है. देश को फासीवादी गिरफ्त में जाने के इस पूरे वक्फे में जो बुद्धिजीवी तबका रीढ़विहीन दिखने की हद तक चुप रहता आया है, वह अचानक जाग उठा और उसने साहित्यिक पुरस्कारों को लौटाना शुरू कर दिया. जो बात 4 सितंबर को उदय प्रकाश द्वारा कुछ दिन पहले ही एक दूसरे साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त साथी लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ पुरस्कार लौटाया जाना जमीर की एक हल्की झलक के रूप में दिखी, वह अब एक तूफान बन गई है, जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी बहा ले गई और उन्हें अपने कुशासन के खिलाफ लोगों की गुहार पर अपनी रणनीति चुप्पी तोड़ने पड़ी. जब उदय प्रकाश ने अपना पुरस्कार लौटाया, उसके करीब एक महीने के बाद दो साहित्यिक दिग्गजों नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी ने अपने पुरस्कार लौटा दिए, जिसने विरोध की बाढ़ को और तेज कर दिया. जब मैं यह लिख रहा हूं, 35 से अधिक उल्लेखनीय लेखक अपने पुरस्कार लौटा चुके हैं और यह गिनती अभी बढ़ती जा रही है. दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा चौतरफा हमलों के माहौल में यह सचमुच उल्लेखनीय है.

मोदी ने अब तक जो कहा है, उससे ऐसा लगता है कि उन्हें यह अंदाजा है कि यह उत्तर प्रदेश में महज इस अफवाह की बिना पर कि उन्होंने गोमांस खाया था और अपने घर में रख रखा था, एक बेकसूर 52 वर्षीय मुसलमान मो. अखलाक की भीड़ द्वारा पीट पीट कर की गई हत्या और उसके 22 साल के बेटे को गंभीर रूप से जख्मी कर देने पर बुद्धिजीवियों के गुस्से की अभिव्यक्ति भर है. डॉ. दाभोलकर या कॉमरेड पानसरे की तो बात ही रहने दें, मोदी ने कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा, जिसने बजाहिर तौर पर लेखकों के विरोध को जन्म दिया है. दादरी की हत्या पर बोलते हुए भी, उन्होंने महज इतना कहा कि यह ‘दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण’ था और उन्होंने अपनी पार्टी के संगीत सोम – जो इत्तेफाक से गोमांस के निर्यात का धंधा चलाते हैं – जैसे साथियों और साधु, साधवियों और अपने परिवार के द्वारा हत्या को मुखर रूप से जायज ठहराने पर कुछ भी नहीं कहा. एक तरफ तो उन्होंने बात को यह कह कर घुमाया कि उनकी सरकार का इससे कुछ लेना-देना नहीं है, वे विपक्षियों पर निशाना साधने की अपनी आदते को नहीं भूले और कहा कि वे सांप्रदायिकता फैला रहे हैं. राष्ट्र के जमीर की रहनुमाई करनेवाले लेखकों के इस जारी विद्रोह पर मोदी में या सरकार में उनके साथियों में रत्ती भर पछतावा या शर्म का जरा सा भी अहसास नहीं था.

गोमांस पर पाबंदी

गोमांस पर पाबंदी इन सबसे गंदे दिमागों की सीधी सियासत है, क्योंकि यह मुसलमानों को निशाना बना कर देश में बिखराव लाने के लिए इस्तेमाल की जाती है, मानो बुनियादी तौर पर वे ही गोमांस खाते हैं. जब लालू प्रसाद यादव ने कहा कि हिंदू भी गोमांस खाते हैं, तो यह तथ्य पर आधारित एक बयान था, लेकिन उसे मीडिया के बेवकूफों ने भड़का कर एक बड़ा विवाद बना दिया. अगर कोई नाम ही लेना चाहे तो दलित, आदिवासी, गैर-खेतिहर अन्य पिछड़ी जातियां, मुसलमान, ईसाई और पूरा का पूरा पूर्वोत्तर गोमांस खाता है और अगर इस पूरी आबादी को जोड़ लिया जाए तो देश की कुल आबादी के आधे से भी ज्यादा होगा. जिन तबकों के नाम लिए गए हैं, न तो उनमें से आनेवाला हरेक इंसान गोमांस खाता है और न ही बाकी के सभी तथाकथित हिंदू गोमांस से परहेज करते हैं. इसलिए गोमांस पर पाबंदी लगाना लोगों की जिंदगी के बुनियादी अधिकार पर हमला है. हिंदुत्व ब्रिगेड संविधान ‘राज्य के नीति-निर्देशक उसूलों’ के तहत अनुच्छेद 48 से अपनी बेशर्मी ढंक रहा है, जिसमें लिखा है कि ‘राज्य खेती और पशुपालन को आधुनिकी और वैज्ञानिक पद्धतियों पर संगठित करने की कोशिश करेगा और खास तौर से नस्लों के संरक्षण और बेहतरी के लिए कदम उठाएगा और गायों और दूसरे दुधारू तथा वाहक पशुओं की हत्या पर पाबंदी लगाएगा.’ यह शासक वर्गों के जनविरोधी चरित्र का एक सबूत है, जिन्होंने व्यवस्थित रूप से सभी नीति-निर्देशक उसूलों की अनदेखी की है, जिसमें से एक 10 साल के भीतर 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और सार्वभौम शिक्षा देने की बात कही गई है और सिर्फ गाय के मुद्दे पर ही इतनी पाबंदी दिखाता है. गाय, इस मुल्क के भविष्य से ज्यादा अहम हो गई है. असल में, इस अनुच्छेद का मतलब आंख मूंद कर हर तरह की गाय की हत्या पर पाबंदी नहीं है, लेकिन इसको ऐसे तोड़ा-मरोड़ा गया है कि इसका यही मतलब निकले और यहां तक कि अदालतों ने भी बिना कोई सवाल उठाए इसे कबूल कर लिया है. इसके बावजूद, संविधान गाय की हत्या पर पाबंदी की बात करता है, गोमांस खाने पर पाबंदी की नहीं और गैर दुधारू मवेशियों का मांस खाने पर पाबंदी की तो और भी नहीं.

इस अनुच्छेद के जन्म के बारे में, गोमांस पर पाबंदी के पैरवीकारों को यह बात जरूर पता होनी चाहिए कि संविधान सभा के मुसलमान प्रतिनिधियों (संयुक्त प्रांत के एम/एस जेड.ए. लारी और असम के सैयद मुहम्मद सादुल्ला) ने हिंदुओं की धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करते हुए खुद अपनी मर्जी से इसको मंजूरी दी थी. हालांकि रूढ़िवादी हिंदुओं की अतार्किकता इसे बुनियादी अधिकारों का हिस्सा बना देने की हद तक बढ़ गई थी. इसका श्रेय डॉ. आंबेडकर को जाता है कि एक जानवर के अधिकार को बुनियादी अधिकारों में शामिल करने से दुनिया में मुल्क का जो मखौल उड़ता, उससे उन्होंने मुल्क को बचा लिया. उन्होंने इस अनुच्छेद को इस तरह लिखा कि आनेवाली पीढ़ियों के लिए इसकी एक वैज्ञानिक समीक्षा की गुंजाइश रहे. रूढ़िवादी हिंदू सदस्यों ने अपनी दलीलों को भगवत गीता के आध्यात्मिक अर्थशास्त्र के रंग में रंग कर पेश किया था. वे नहीं जानते थे कि प्राचीन दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में गो हत्या पर पाबंदी का चलन था, जहां खेती में बोझ ढोनेवाली ताकत के रूप में बैलों को इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन तकनीक और खानपान के तौर-तरीके में बदलाव के साथ (मांस के थोड़े में ज्यादा पौष्टिक भोजन होने के कारण) गाय की हत्या के असली अर्थशास्त्र ने गाय की रक्षा के ‘आध्यात्मिक’ अर्थशास्त्र की जगह ले ली. जहां तक तथ्यों की बात है, ब्राह्मण पुरोहित सबसे बड़े गोहत्यारे थे, जिसने मवेशियों की रक्षा करने के लिए बुद्ध को विद्रोह करने के लिए उकसाया. हिंदुत्व ताकतों की दलील एक गलत वक्त में दी जा रही, बेईमान और विकास विरोधी दलील है जो मुल्क को गीता के दौर में धकेल रही है.

गाय बनाम इंसान

इसे साफ साफ कहा जाए कि दक्षिणपंथियों की गाय की सियासत, इंसानों के कत्लेमाम की सियासत है. यह महज झज्झर में पांच दलितों या दादरी में एक मुसलमान या उधमपुर में एक कश्मीरी ट्रकचालक के कत्लेआम की बात नहीं है, बल्कि यह मवेशीपालने वाले उन दसियों लाख किसानों के कत्लेआम की बात है, जो खेती में चल रही पहले से ही नुकसानदेह रुझानों और सामाजिक डार्विनवादी नवउदारवाद की वजह से तंगी में हैं. वे गायों को पालने के नकारात्मक आर्थिक इंतजाम के इस बढ़े हुए बोझ से पूरी तरह दब जाएंगे. मौजूदा माली इंतजाम इस पर निर्भर करता है कि अपनी उत्पादक उम्र पूरी कर लेने के बाद गायों को कत्लखाने को बेच दिया जाता है. आमतौर पर एक गाय को 3-4 बार बच्चे देने के बाद बेच दिया जाता है, क्योंकि इसके बाद उसकी दूध की पैदावार और उसकी गुणवत्ता दोनों में गिरावट आती है. भारत में, इसे 8-10 बार बच्चे देने तक खींचा जा सकता है, जिसके बाद वह कम से कम 3-4 साल जिंदा रहेगी. अगर इसके बाद उसे बेचा नहीं गया, तो पूरा माली इंतजाम उलट-पुलट हो जाएगा. और सिर्फ इतना ही नहीं. किसानों के अलावा, ऐसे दसियों लाख लोग और हैं जो गाय के कत्ल और खाल के कारोबार से अपना गुजर-बसर चलाते हैं, जिनमें उनमें सबसे ज्यादा दलित लोग हैं. वे लोग बेरोजगार हो जाएंगे. इसके साथ साथ यह भी होगा कि दूसरे मांस की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी उनके भोजन के संकट को बढ़ा देगी. पहले से ही भारतीयों में प्रोटीन की गंभीर कमी पाई जाती है, जो उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को नुकसान पहुंचाती है. इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो (आईएमआरबी) द्वारा किए गए एक उपभोक्ता सर्वेक्षण के मुताबिक 91 फीसदी शाकाहरियों और 85 फीसदी मांसाहारियों में प्रोटीन की कमी थी, जिसको प्रतिदिन शरीर के कुल वजन में, प्रति किलो वजन पर 1 ग्राम से कम प्रोटीन होने के आधार पर मापा जाता है. गरीब लोगों के लिए गोमांस प्रोटीन का एक अहम स्रोत है और इस पर पाबंदी का मतलब उनकी जान ले लेना होगा. इस खतरनाक भूत के बारे में हिंदुत्व की दलील एक जालसाजी है और सिर्फ भावनात्मक उत्पीड़न ही है जब वे यह पलटकर पूछते हैं कि क्या आपकी मां की बूढ़ी उम्र हो जाने के बाद आप उसे छोड़ देते हैं.

गोरक्षा के आर्थिक पहलू पर पिछले दशक में अकादमिक क्षेत्र में शोध किए गए हैं. सबसे हालिया रिपोर्ट एस्थर गेहर्के और माइकल ग्रिम द्वारा प्रकाशित की गई है, जो हमारे अपने एम.वी. दांडेकर और के.एन. राज की खोजों की तस्दीक करती दिखाई पड़ती है. दांडेकर और राज दोनों ही हिंदू और शायद ब्राह्मण थे और जिन्होंने अपना शोध 1969 में प्रकाशित कराया था. दोनों की यह पक्की राय थी कि गाय की पूजा का चलन असल में भारत के मवेशी संसाधन के अधिक तर्कसंगत उपयोग के आड़े आता है. राज ने यहां तक सुझाव दिया था कि धर्म सिर्फ यही अकेली भूमिका निभाता था कि उसने अवांछित मवेशियों से छुटकारा पाने के तरीके तय किए. उन्होंने राय जाहिर की कि गायों को कत्लखाने भेजने के बजाए उत्तर भारतीय किसान जानबूझ कर भूखा रख कर या उसे खुला छोड़ कर, जिससे वे बांग्लादेश के कत्लखानों में चली जाती थीं, धीरे धीरे मौत देने के तरीके को तरजीह देते थे. जाहिर है कि पवित्र गाय के बारे में हिंदुत्ववादी उन्माद में इन तथ्यों पर कोई गौर नहीं किया गया है.

अबाध अतार्किकता

हिंदुत्व गिरोह की मक्कारी और बेईमानी इसके हजार सिरों में बसती है, जो एक ही साथ अनेक आवाजों में बात करता है. एक तरफ जबकि मोदी-शाह बिहार चुनावों की वजह से दादरी में पीट पीट कर की गई हत्या पर नापंसदगी के लहजे में बोलने को मजबूर हुए तो दूसरी तरफ हिंदू दक्षिणपंथ की मूर्खता के महास्रोत आरएसएस ने अपने मुखपत्र पांचजन्य के जरिए इसे जायज ठहराया. आवरण कथा के रूप में छापे गए एक लेख में कहा गया, ‘वेदों ने उस पापी की हत्या का आदेश दिया है, जो गाय की हत्या करता है. दादरी पीड़ित ने शायद अपने पापों के प्रभाव में गाय की हत्या की थी.’ इसने उन लेखकों को फटकारा गया, जिन्होंने दादरी हत्या पर विरोध जताते हुए साहित्य अकादेमी पुरस्कार लाटाए. उन्हें हिंदू भावनाओं के प्रति असंवेदनशील कहा गया. जैसी की आशंका थी, आरएसएस ने इस मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए कह दिया कि यह लेख संपादकीय नहीं था. इसने तो ऐसा कह दिया, लेकिन इसके बंदरों के गिरोह ने उनकी अतार्किकता के साथ असहमति जताने का साहस करनेवाले लोगों को धमकाने में अपनी बहादुरी दिखानी जारी रखी. साक्षी महाराज, साध्वी प्राची और दूसरे अनेकों ने लोग जहर फैलाते रहे और घिरने पर भाजपा इसकी रट लगाए रहती कि ‘वे हमारे लोग नहीं हैं.’

भाजपा एक तरकीब यह भी अपनाती है कि कांग्रेस से शासनकाल में हुई ऐसी ही घटनाओं को चुन ले, ऐसा करते हुए यह इस तथ्य को भूल जाती है कि लोगों ने इसे कांग्रेस की गलतियों को दोहराने या उससे भी आगे निकल जाने के लिए वोट नहीं दिया था. जहां तक लेखकों के विरोध का सवाल है, एक ओर यह जरूर दादरी में पीट पीट कर की गई हत्या से तेज हुआ, लेकिन यह उसी तक सीमित नहीं है. यह संस्थानों को व्यवस्थित रूप से खत्म करने और राजनीति को बेशर्मी से जहरीला बना देने के खिलाफ है, जिस पर वे हिंदू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए अमल कर रहे हैं. लेखकों द्वारा उठाया गया यह कदम बेहद अहम है, लेकिन शायद इसे उठाने में बड़ी देर कर दी गई. पूरी दुनिया ने उनके विद्रोह पर गौर किया, लेकिन बेशर्म हिंदुत्व परिवार को जरा भर भी शर्म दिलाने में नाकाम रहा. अहम बात यह समझना है कि बुनियादी तौर पर वे ऐसी किसी भी बात की समझदारी से परे हैं. मुसोलिनी की राह पर चलनेवाले सिर्फ असहमत लोगों की हत्या करने की भाषा ही जानते हैं. इसलिए सिर्फ एक ही जवाब है जो इन कायरों के गिरोह को उनकी मांद में धकेल सकता है और वह है अवाम की मजबूत ताकत, उस अवाम की ताकत जो ब्राह्मणवाद की सताई हुई है और जो जटिल अक्लमंदी से दूर है. उनको यह समझना ही होगा कि हिंदू राष्ट्र बुनियादी तौर पर ब्राह्मणों के एक गिरोह की पुनरुत्थानवादी परियोजना है, जो अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करने के बेवकूफी भरे सपने देख रहे हैं. इसे बस मिनटों में हराया जा सकता है, अगर ब्राह्मणवाद द्वारा परंपरागत रूप से सताई गई इस दलित-शोषित जनता में सिर्फ कुछेक दलीलों की बजाए अपनी मुट्ठी तान कर खड़े हो जाएं!

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ इन बेशर्मों को शर्म नहीं आएगी ”

  2. By jaydevbarua on November 7, 2015 at 7:01 PM

    सटीक लेखन |

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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