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बीच सफ़हे की लड़ाई

पेरिस में आइसिस: तारिक अली

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/15/2015 01:44:00 PM



तारिक अली. वर्सोबुक्स से साभार. ऊपर दी गई तस्वीर बेरुत की है, जहां पेरिस पर हमले से एक दिन पहले गुरुवार को आइसिस ने फिदायीन हमला करके 43 लोगों की हत्या कर दी थी. पेरिस की खबरें दुनिया भर में छाई हैं, लेकिन बेरुत के मातम में कोई शरीक नहीं है. अनुवाद: रेयाज उल हक

तो आइसिस ने दावा किया है कि उनके हमले फ्रांस द्वारा मध्य पूर्व में ‘खिलाफत’ पर की जा रही बमबारी का जवाब हैं. इसमें कोई दोराय नहीं है कि हॉलैंडे/वैले जंगखोर हैं. इसमें विडंबना है कि वे असद हुकूमत को गिराने की तैयारी कर रहे हैं (जब तक वाशिंगटन देर करने के लिए नहीं कहता) और इस तरह वे इस इलाके में आइसिस के सहयोगी हो जाएंगे. असल में सीरिया में विपक्षियों की एक बड़ी जमात असद को टकराव के सबसे बड़े नुक्ते के रूप में देखती है और यह भी उम्मीद कर रही थी कि पश्चिम एक और हुकूमत में तब्दीली लेकर आएगा. अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो एक दूसरे से लड़ रहे जिहादी समूहों के बीच में एक गृह युद्ध छिड़ गया होता और फिर कौन जानता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका/यूरोपीय संघ उनमें से किसकी हिमायत करते.

आइसिस ने फ्रांस की राजधानी पर हमला किया है और एक सौ से ज्यादा नागरिकों की हत्या कर दी है और उससे दोगुने लोग जख्मी हैं. मैं जानता हूं कि पश्चिम ने भी यही किया है, असल में उसने दसियों हजार लोगों को मारा है, लेकिन कट्टरपंथ का यह टकराव कहीं नहीं लेकर जाएगा. पश्चिम नैतिक रूप में जिहादियों से बेहतर नहीं है. आखिर तलवार से सरेआम किसी का गला काटना, ड्रोन हमले में अंधाधुंध हत्याएं करने से खराब क्यों हैॽ इनमें से किसी का भी न तो समर्थन किया जा सकता है और न करना चाहिए.

अक्सर यह दलील दी जाती है कि अल कायदा और आइसिस दोनों ही अफगानिस्तान और इराक में साम्राज्यवादी युद्धों का अंजाम हैं और बेशक बात यही है. लेकिन यह काफी नहीं है. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की खुदकुशी और स्थानीय दमन और लोकप्रिय समर्थन में गिरावट के नतीजे में छोटे छोटे प्रगतिशील समूहों में आए नकारेपन पर भी गौर किया जाना चाहिए. इस प्रक्रिया ने सऊदी हुकूमत को सामने ला दिया है और अल-कायदा और आइसिस दोनों ही वहाबीवाद के भारी असर में हैं, जो सुन्नी इस्लाम के भीतर एक बहुत ही छोटी सी जमात है.

इस इलाके में फिर से स्थिरता बहाल करने के लिए तीन अहम शर्तें हैं: सऊदी शाही परिवार को मिल रहा पश्चिमी समर्थन खत्म हो; इलाके में सारी पश्चिमी दखलंदाजी खत्म हो, एक अकेला इस्राईली/फलस्तीनी राज्य बने जिसके सभी नागरिकों को बराबर के हक हासिल हों. जब तक यह नहीं होता, सियासी सनकी और वहशी अपने पांव पसारते रहेंगे.

पेरिस और पूर्व अरब के किसी भी शहर में बेगुनाहों के कत्ल को किसी भी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ पेरिस में आइसिस: तारिक अली ”

  2. By Kamal Choudhary on November 23, 2015 at 11:38 PM

    Begunaho ke ktl ko kisee bhi trha kisee bhi jgha jayaj nhi tharaya ja skta. Inqlaab jindabaad !!
    - Kamal Jeet Choudhary .
    P.S - Salaam !! Sathi kuchh kavitain bheji hui hain. Dekh Len. Haardik Dhanyavaad!!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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