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बीच सफ़हे की लड़ाई

डियर मोदी, नेपाल में दूसरा प्रयोग क्यों करते हो?

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/07/2015 11:32:00 AM


अपनी अदूरदर्शी और फासिवादी राजनीति का नंगा नाच नाचते हुए भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल में संविधान जारी होने के विषय को लेकर तीव्र असन्तोष व्यक्त किया, जिसका खामियाजा नेपाल की जनता लगभग दो हफ्तों से भुगत रही है। आधिकारिक तौर पर भारतीय सरकार और विदेश विभाग इस बात से इन्कार करते आ रहे हैं कि उन्होंने नेपाल में नाकेबन्दी की है। लेकिन भारत सरकार की नाकेबन्दी का प्रभाव नेपाल के सामान्य से सामान्य क्षेत्रों में देखा जा रहा है। नेपाल में जारी नाकेबन्दी के विरोध में भारत सहित पड़ोसी मुल्कों में नेपाल के पक्ष में आवाजें तेज होते जा रही हैं, जिससे भारत के प्रधानमन्त्री मोदी की नेबरहुड फर्स्ट का ढकोसला का बुलबुला फूटता नजर आ रहा है। नेपाल में भारत द्वारा लगाई गई नाकेबन्दी को लेकर सोशल मीडिया में तीव्र असन्तोष व्यक्त हुआ। ट्विटर में ‘बैक ऑफ इन्डिया’ तीसरे नम्बर पर ट्रेन्ड कर गया तो फेसबुक की दीवार पर भारतीय कूटनीति के अदूरदर्शी निर्णय को निशाना बनाया गया। वहीं नेपाल में आए दिन भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के पुतले फूंके जा रहे हैं। राजधानी काठमांडू सहित देश भर की सड़कों में पेट्रोलियम पदार्थ के रोके जाने के कारण सवारी साधन सिर्फ 30 प्रतिशत ही चल पा रहे हैं तो दवाखानों में दबाई जैसी अत्यावश्यक सामग्री के रोके जाने पर लोगों का इलाज करने वाले अस्पताल खुद मरीज बन गए हैं। उसी संदर्भ में लिखा गया नेपाल के पत्रकार उमेश चौहान का यह लेख नेपाल भर काफी चर्चित रहा। भारतीय प्रधानमन्त्री मोदी को दूसरा असफल प्रयोग न करने का सुझाव देते हुए लिखे गए इस लेख से भारतीय पाठकों को नेपाल के अवाम की धड़कन का पता चल जाता है कि आखिर वे क्या चाहते हैं। हम इस बार देर ही सही लेकिन नेपाल के पिछले हाल के बारे में स्पष्ट विचार रखने वाले चौहान का यह लेख प्रकाशित कर रहे हैं, जिसका अनुवाद नेपाल के ही पत्रकार नरेश ज्ञवाली ने किया है। 

ऋषिमन लेकर संविधान बनाने के लिए नेपाल को सलाह देने वाले नरेन्द्र मोदी आज खुद क्रोधित हैं, दुनिया चकित है। जनता द्वारा चुने गए 89।89 प्रतिशत संसद सदस्यों द्धारा संविधान में हस्ताक्षर करने पर भी, प्रजातान्त्रिक कहे जाने वाले मुल्क के द्वारा तिरस्कार करने पर प्रजातन्त्र खुद लज्जित है। संप्रभु राष्ट्र के विशेषाधिकार का हनन करते हुए नाकाबन्दी लगाकर राष्ट्रसंघीय महासभा में पहुंचे भारतीय प्रधानमन्त्री विश्व भाईचारे के गीत गा रहे हैं, जबकि कूटनीति खुद बदनाम हो चली है। नेपाल की संविधान सभा से पारित हुए संविधान में अपने अधिकारों को ना समेटे जाने के विषय में कितने नागरिक समुदाय और राजनीतिक दल असन्तोष व्यक्त कर रहे हैं, उनकी बातों को सम्बोधित करने के लिए यहाँ के शासक ईमानदार कोशिश करते हैं अथवा नहीं, वह गंभीर प्रश्न है लेकिन देश के भीतर का प्रश्न है। इस विषय में अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के सभ्य सरोकारों से इन्कार भी नहीं किया जा सकता। लेकिन, भारत अपने सरोकार और सुझाव को लेकर नहीं, अपमान करने, दमन करने और सर्वसाधारणों को प्रताड़ित करने के स्तर तक गिर गया है। एक सार्वभौम देश के नागरिक प्रतिनिधियों के द्वारा संविधान लिखने पर पड़ोसी देश के विक्षिप्त होने की घटना विश्व इतिहास में दुर्लभ उदाहरणों में से एक के रूप में दर्ज हो गई है।

पड़ोसी मुल्क में चिन्ता नहीं, हस्तक्षेप करने का परिणाम कितना भारी दर्द पैदा करता है हमें भारत को पड़ाने की जरूरत नहीं, क्योंकि भारत खुद इसका भुक्तभोगी है। श्रीलंका के साथ भारत के संबंध सुमधुर थे जबकि हरेक विषय में श्रीलंका ने भारत के सरोकार और चिन्ता का सम्बोधन किया। लेकिन जब 1977 में अत्याधिक बहुमत के साथ राष्ट्रपति निवास लौटे जयवर्धने ने पश्चिमी लोगों से भी सम्बन्ध बढ़ाने में महत्व दिया, भारत मित्रता को तोड़ दुश्मनी की नीति पर उतर आया। जयवर्धने ने भारत का अपमान नहीं किया था, अपने सम्मान को व्यवस्थित करने का प्रयास भर किया था। लेकिन, वैसा करना इन्दिरा गांधी की नजर में अपराध था। जयवर्धने को दण्डित करने के लिए भारत ने श्रीलंका के तमिल  समुदाय को उत्तेजित और आन्दोलित मात्र नहीं किया, साम्प्रदायिक दंगे के लिए एक खास समुदाय को प्रोत्साहित भी किया। सन 1983 तक आते आते श्रीलंका में जारी सशस्त्र विद्रोह के प्रायोजक के रूप में भारत खुद को सगौरव प्रस्तुत करने लगा। श्रीलंकाई सेना और तमिल टाइगर विद्रोही के बीच जब जब निर्णायक मोर्चे में भिड़ंत होती, भारतीय सेना के जहाज बिना रोक टोक सीमा पार उड़ते और श्रीलंकाई सेना को आतंकित करते। विद्रोही समुदाय के लिए भारतीय सैनिकों ने आसमान से रोटी–सब्जी की वर्षा कराई, विस्फोटक तथा हथियार देकर उसको चलाना सिखाया, बोरों में पैसे भर कर विद्रोहियों को आर्थिक रूप से समृद्ध भी किया। एक सार्वभौम देश श्रीलंका के लिए यह घोर अपमानजनक था, लेकिन हवाई जहाज से तितली की तरह विदेशी भूमि में पैराजंप करने वाले भारतीय सैनिकों के लिए यह रोमांचक नौटंकी से ज्यादा कुछ नहीं था।

अपने देश के विद्रोह का सामना करने, संवाद के मार्फत उसको हल करने और विद्रोह से समझौते करने का उसका सार्वभौम अधिकार श्रीलंका को कभी नहीं मिला। संवाद और समझौता विद्रोहियों से नहीं भारत से करना पड़ता था। श्रीलंका को धाराशायी बनाकर अपमानित करके सन 1987 में भारतीय प्रधानमन्त्री राजीव गान्धी ने श्रीलंका को भारत–श्रीलंका समझौते में हस्ताक्षर कराया। श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी प्रान्तों को मिलाकर एक बनाने के समझौते में भारत ने हस्ताक्षर भर नहीं किया, तमिल विद्रोह समाप्त करने के लिए लिखित ठेका भी ले लिया। कैसा चमत्कार ! एक दिन पहले हथियार लेकर उतरा भारतीय सैनिक दूसरे ही दिन शान्ति का दूत बनकर श्रीलंकाई भूमि में अवतरित हो गया, वैसे ही पैराशूट से।

भारत ने श्रीलंका के घुटने टेका दिए, इतने में उसका इगो समाप्त हो गया। लेकिन, तमिल टाइगर विद्रोही संगठन की महत्वकांक्षा बढ़ गई थी। उसने प्रान्त नहीं अलग देश बनाने की अपनी मांग को जोर शोर से उठाने लगा। खुद द्वारा पाला पोसा और जन्माया गया विद्रोही, बैठने को कहें तो बैठेगा और खड़े होने को कहें तो खड़े होगा, यह कर सोच रहे भारत के लिए ऐसी सोच भ्रम साबित हुई और वही घाव उसके लिए नासुर बन गया। भारत के हथियार डाल देने के आह्वान को छोटे मोटे समूहों ने तो मान लिया लेकिन, तामिल टाइगर समूह ने नहीं मानी। आखिर विवाद उसी के साथ हो गया, शान्ति सेना के नाम में श्रीलंका मैं पैठ बनाने को सफल भारतीय फौज और तमिल टाइगर के बीच गोली-बारी होने लगी जो बाद में घमासान युद्ध में परिणत हो गया। खुद भारत ने जिसको ट्रेनिंग दी थी उसी के साथ सामना ना कर पाने के कारण भारत को लज्जित होकर श्रीलंका से लौटना पड़ा। लेकिन, दुर्भाग्य तीन वर्ष तक चले युद्ध में भारत के 1138 सैनिक शहीद हुए तो 3000 हजार अपंग। इतना बड़ा मूल्य चुकाने के बाद भी भारत चैन की सास नहीं ले पाया, 1991 में चुनावी अभियान में तमिलनाडु पहुंचे राजीव गांधी बम विस्फोट में मारे गए। बम से राजीव गांधी के शरीर को क्षतविक्षत करने वाला आत्मघाती बम हमलावर और कोई नहीं, भारतीय सेना के द्वारा कभी सहायता प्राप्त तामिल टाइगरों में से ही एक लड़ाकू थी। मां के समय में जिन विद्रोहियों को सहायता दी गई, उन्होंने उसके बेटे की दर्दनाक हत्या कर दी। सभ्य समाज ऐसी हिंसा को स्वीकार नहीं करता। लेकिन क्या करें? मिर्च का बीज बोने पर फल सन्तरे के नहीं लगते।

यह एक उदाहरण है, जो संसार के किसी भी दम्भी शासक को सोचने, धैर्य करने और दूसरों का सम्मान करने के लिए सिखाता है। अपमान लोगों को चिढ़ाता है, दास नहीं बना सकता। फिर सार्वभौमिकता कितनी प्यारी होती है वह तो भारत खुद को पता होना चाहिए, क्योंकि भारत की सार्वभौमिकता भी अभेद्य नहीं, जिसको इतिहास में विलायत ने रुलाया, वर्तमान में चीन डरा रहा है। ज्यादा पुराना इतिहास भी नहीं है– सन 2008 में अरुणाचल प्रदेश के पूर्वाधार विकास के लिए भारत ने एसियाई विकास बैंक के साथ ऋण की मांग की। कई चरणों में पत्रों के आदान प्रदान के बाद 2 खरब अमेरिकी डॉलर के बराबर का ऋण देने के लिए एडिबी सैद्धान्तिक रूप में तयार भी हो गया। लेकिन, एडिबी ने अचानक वह प्रक्रिया रोक दी। कारण बताते हुए उसने कहा कि चीन असन्तुष्ट है। सार्वभौम भारत ऋण लेने के लिए तैयार है, एडीबी ऋण देने के लिए तयार है लेकिन बीच में चीन कहाँ से आ टपका? अन्तर्राष्ट्रीय रूप में यह बहस का विषय बन गया। चीन ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा– ‘अरुणाचल के कुछ भू–भाग में हमारा दावा है, हमारे साथ समन्वय किए बगैर वहाँ पर संरचनाएं बनाने के विषय में हमारी गंभीर आपत्ति है।’ चीन ने एडिबी के परियोजना में अवरोध मात्र नहीं किया, उसी वर्ष भारतीय राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रधानमन्त्री डॉ मनमोहन सिंह के अरुणाचल प्रदेश के भ्रमण में भी गंभीर आपत्ति जताई। अरुणाचल को विवादित क्षेत्र बताते हुए आइन्दा वहाँ ना जाने के लिए भारत के राष्ट्रप्रमुख और सरकार प्रमुख को चीन ने चेतावनी देने की खबरें अन्तर्राष्ट्रीय खबरें बनीं। खास तौर से, अरुणाचल और अन्य क्षेत्र में चीन और भारत का भू–भाग कितना है, नेपाली जनता को ना तो पता है और ना ही उसमें कोई सरोकार। लेकिन, हमारी सार्वभौमिकता के ऊपर हस्तक्षेप हुआ, यह कह कर भारतीय कूटनीतिक नियोग के उच्च अधिकारियों की चिरौरी हमने पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ी है, टेलिविजन में देखा है। हम इतना ही कह सकते हैं, दूसरों के द्वारा अपमानित करने पर भारत को जितना दर्द होता है नेपाल को उससे कम दर्द क्यों हो?

भारतीय प्रधानमंत्री मोदी वही नेता है जिनको गुजरात में मुस्लिमों के जनसंहार के आरोप में अमेरिका ने 10 वर्ष तक वीसा देने से इन्कार कर दिया। अमेरिका में 34 लाख भारतीयों ने प्रवेश पा लिया लेकिन, गुजरात के मुख्यमन्त्री का प्रवेश निषेध किया गया। विदेशी के द्वारा अपमानित करने पर मन कितना आहत होता है सबसे ज्यादा मोदी को समझना चाहिए। पिछले साल ही न्यूयॉर्क में कार्यरत भारतीय उपमहावाणिज्यदूत देवयानी खोबड़ागढ़े को अमेरिकी पुलिस ने गिरफ्तार किया। वर्किंग वीसा ना होने वाली भारतीय महिला को काम में लगाने के आरोप में उनके विरुद्ध दायर अभियोग में उनको हिरासत में निर्वस्त्र करके पूछताछ किया गया? श्रम कानून तोड़ने के आरोप में गिरफ्तार उच्चपदस्थ कूटनीतिक महिला अधिकारी को निर्वस्त्र क्यों किया गया? पूरे भारत में राष्ट्रवाद उमड़ पड़ा। उच्चपदस्त कूटनीतिक अधिकारी को अपमानित करके भारत की हैसियत को दिखाने का प्रयास किया गया, ऐसा कह भारत का मीडिया, मन्त्री, राजनीतिक दल के नेता तथा कूटनीतिज्ञों ने विश्लेषण किया। ऐसे अपमान का जवाब कैसे दिया जाए, भारत खुद ही जाने। लेकिन, विलायत, चीन और अमेरिका की ओर से आने वाले अपमान का हिसाब का नेपाल की तरफ से भरपाई करने की भारत की प्रवृत्ति किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है।

भारत की कूटनीतिक टीम को सोचना चाहिए, नेपाल के संसद में खड़े होकर मोदी द्वारा ऐसा कहने पर नेपाल के संसद भवन में तालियों की गड़गड़ाहट क्यों हुई थी कि गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल में हुआ था? मोदी के यह कहने पर भी नेपाली सांसदों ने टेबल ठोक कर क्यों खुशी व्यक्त की कि नेपाल एक सार्वभौम देश है? क्योंकि भारत के अपमानित करने की प्रवृत्ति के ऊपर नेपाल में उस स्तर तक अविश्वास फैला हुआ है। इसीलिए भारत के लिए नेपाल की नीयत के ऊपर मनोरंजन करने का नहीं, अपने नीयत की पुनर्समीक्षा करने का समय है। वैसे तो मोदी ने नेपाली का हृदय जीता था जब उन्होंने संसद में मर्मस्पर्शी भाषण किया। और, बानेश्वर की सड़कों में उतर कर सर्वसाधारण के साथ हाथ मिलाया। लेकिन, उन्हीं मोदी ने आज जेब से फन्दा निकालकर नेपालियों के गले में डाल दिया है। भारत के इस व्यवहार से नेपाली प्रताड़ित हुए हैं, लेकिन फायदा भारत का भी नहीं हुआ। संसद में मीठी वाणी बोलकर, सड़क में हाथ मिलाकर, पशुपति में चन्दन लगाकर मोदी द्वारा नेपाल में बनाई छवि का एक वर्ष के भीतर सर्वनाश हो गया है। एक समर्थक और शुभेच्छुक मित्र खोने के विषय में मोदी को देश के भीतर ही नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय फोरम में भी जवाब देना होगा।

भारत की राजनीति के विषय में प्रश्न तो ज्यादा हैं, जिसमें हमनें कभी सरोकार व्यक्त नहीं किए। 2004 में भारत में कांग्रेस गठबन्धन ने चुनाव जीत लिया और संसदीय दल ने सोनिया गांधी को नेता बना दिया। लेकिन, विदेशी बहु प्रधानमन्त्री बनी तो काज किरिया (अंतिम संस्कार) के लिए बैठूंगी कह कर सुषमा स्वराज क्यों सिर मुंडन कराने को बैठ गईं? हमने कभी नहीं पूछा। अमेरिका में खोबरागढ़े कितनी दोषी है और सजा कितनी हुई? नेपाल के सरोकार की बात नहीं। कश्मीर में भारत की भूमि कितनी है, पाकिस्तान की भूमि कितनी है?  नेपालियों को सरोकार नहीं। लद्दाख या अरुणाचल में भारत की सीमा कहाँ तक है, चीन की सीमा कहाँ तक है हमें इससे कोई लेना देना नहीं। अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनाना है अथवा राम मन्दिर, वह भारत जाने। गुजरात में पटेलों को आरक्षण मिले अथवा हार्दिक पटेल जेल जाए, हमें कुछ नहीं बोलना। जब हम तुम्हारी राजनीति, तुम्हारे भूगोल और तुम्हारे समुदाय के विषय में सरोकार नहीं रखते और नहीं बोलते तो तुम हमारे मुद्दे में घुसने क्यों आ जाते हो? भूगोल लांघ कर मिर्च की खेती क्यों करते हो? मोदी से सादर अनुरोध है– श्रीलंका का पाठ पर्याप्त है, दक्षिण नेपाल में दूसरा प्रयोग क्यों करते हो?

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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