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बीच सफ़हे की लड़ाई

हरे जख्म दिलाएंगे उनकी याद: ब्रेख्त की दो कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/04/2015 01:48:00 PM


दादरी में मार दिए गए अखलाक की याद में. हमीरपुर में जलाए गए दलित बुजुर्ग चिम्मा की याद में. उन सारी हत्याओं, हमलों, हत्या और बदनाम करने की कोशिशों, परेशान किए जाने और लोगों को फंसाने की कोशिशों के खिलाफ, जिनके पीछे एक सनक, एक दक्षिणपंथी उन्माद, इंसानों और इंसानी तबकों से बदला लेने का प्रतिक्रियावादी खयाल और एक फासीवादी हत्यारी भीड़ की जहनियत छुपी हुई है. बेर्तोल्त ब्रेख्त की दो कविताएं. अनुवाद: रेयाज उल हक.

क्या जनता से कभी गलती नहीं होतीॽ

1.
लंबे कद वाले और रहमदिल
मेरे उस्ताद को
जासूस बता कर
जनता की अदालत में सुनाई गई सजा
और गोली मार दी गई. उसका नाम दागदार हुआ.
उसकी किताबें नष्ट कर दी गईं. उसके बारे में बातों पर
शक किया जाने लगा और वे बंद करा दी गईं.
लेकिन मान लो अगर वह बेगुनाह होॽ

2.
जनता के बेटों ने उसे कसूरवार पाया
दुनिया के सबसे बहादुर संस्थानों
मजदूरों के कारखानों और सामूहिक फार्मों ने
उसको बताया एक दुश्मन.
उसके लिए कोई आवाज नहीं उठी.
लेकिन मान लो अगर वह बेगुनाह होॽ

3.
जनता के अनेक दुश्मन हैं.
ऊंची जगहों पर
बैठे हैं दुश्मन. सबसे उपयोगी प्रयोगशालाओं में
बैठे हैं दुश्मन. पूरे महाद्वीप की
भलाई के लिए बनाते हैं वे बांध और नहरें, और नहरें
भर जाती हैं गाद से और बांध
टूट जाते हैं. जिसके कंधों पर थी उनकी जिम्मेदारी, उसे गोली मारी जानी है.
लेकिन मान लो अगर वह बेगुनाह होॽ

4.
दुश्मन भेस बदलता है.
अपनी आंखों पर डाल लेता है वह एक मजदूर की टोपी. उसके दोस्त
जानते हैं उसे एक ईमानदार मजदूर की तरह. उसकी बीवी
दिखाती है उसके रिसनेवाले जूते
जो फट गए अवाम की खिदमत में.
और तब भी वह एक दुश्मन है. क्या मेरा उस्ताद उनमें से एक थाॽ
लेकिन मान लो अगर वह बेगुनाह होॽ

5.
यह बात करना खतरनाक हो सकता है कि जनता की अदालतों में
दुश्मन बैठे हो सकते हैं, क्योंकि अदालतों की इज्जत बनी रहनी चाहिए.
अखबारों से यह पूछना बेमानी है कि वे कसूर को स्याह और सफेद में बताएं
क्योंकि ऐसे अखबारों की कोई जरूरत ही नहीं है.
अपराधियों के पास हरवक्त होते हैं बेगुनाही के सबूत.
बेगुनाहों के पास अक्सर नहीं होते कोई सबूत.
तो क्या खामोश रह जाना ही बेहतर हैॽ
लेकिन मान लो अगर वह बेगुनाह होॽ

6.
जिसे 5000 लोगों ने बनाया है उसे एक इंसान तबाह कर सकता है.
कसूरवार बताए गए 50 लोगों में
हो सकता है कि एक बेकसूर हो.
लेकिन मान लो अगर वह बेगुनाह होॽ

7.
मान लो अगर वह बेगुनाह होॽ
तब वह कैसे जाएगा अपनी मौत की जानिबॽ


बेहिसाब जुल्म के दौर में

एक बार आपको पीट दिया गया
तो क्या बचा रहेगा?
भूख और ओले और
तूफानी बारिश.

कौन है जो बताएगा सबक के बारे मेंॽ
ठीक बुजुर्गों की तरह
भूख और ठंड
बताएगी सबक के बारे में.

तब क्या लोग नहीं कहेंगे
कि यह कभी कारगर नहीं रही होतीॽ

इसके जिम्मेदार लोग
चाहेंगे कि वे बच कर निकल भागें.

कौन सी चीज उन्हें याद दिलाएगी
उन सबकी जो मार दिए गएॽ
अभी तक हरे जख्म
दिलाएंगे उनकी याद.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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