हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

दास्ताने सुंबरान: आनंद विंगकर की कविता

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/25/2015 01:04:00 PM

भारतीय समाज बड़ा ही मजेदार है। इस आधुनिक विज्ञान के दौर में जहां चांद-तारे और सूरज, आदि के लोक गीत और भक्ति-भाव को जीवन के साथ लेकर चलने वाला आदिम समाज आज भी मौजूद है। लिहाजा आधुनिक विज्ञान में इस जटिल संबद्धों का विश्लेषण और विकसित कर पाना दूभर कार्य जैसा है। महाराष्ट्र की धनगर जाति सदियों से चली आ रही इस परंपरा का निर्वाह आज भी कर रही है। धनगर जाति को हिन्दी पट्टी में गड़ेरिया कहा जाता है, जो भेड़-बकरियों को जंगल में चराने का काम करती है। रात भर यह समाज गीत, नृत्य आदि की प्रस्तुति करता है ताकि उनका देव उनके प्रकृति की रक्षा कर सकें। उनके लिए प्रकृति ही देव है और देव ही मनुष्य है। यह उनकी परंपरा का अटूट हिस्सा है।

मराठी के कवि आनंद विंगकर ने इस लंबी कविता में आदिवासियों की आदिम संस्कृति का, प्रकृति के साथ उनका सवांद और नागरी संस्कृति की तसवीर को दर्ज किया है। आधुनिक जीवन से हम जैसे-जैसे भूतकाल की ओर जाते हैं प्रकृति के साथ हमारा संवाद बन नहीं पता और अधिक गूढ़ होता जाता है। प्रकृति के साथ संवाद की स्थिति तो दूर की कौड़ी जैसे है। वहीं हर आए दिन प्रकृति नष्ट हो रही है। जो भुक्तभोगी हैं वे जानते हैं इसके परिणाम। उनकी हताशा कितनी कड़वी और असमय होती मृत्यु को उजागर करती है यह कविता।

इस कविता में कवि ने जो तस्वीर उकेरी है वह एक इशारा है आधुनिकता के ढोंग का। यह कविता तो स्थितियों को बदल नहीं सकती है। लेकिन जो प्रकृति को बचाने के लिए लड़ रहे हैं, वे लोग भूमिका के करीब नजर आते हैं।

मराठी साहित्य में आनंद विंगकर का कथा, उपन्यास और कविता के क्षेत्र में एक बड़ा नाम है। वे पश्चिम महाराष्ट्र के कराड़ जिले के छोटे से गांव विंग के है। विचारों से वे मार्क्सवादी हैं और सामाजिक, राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं।
गोपाल नायडू

कविता के प्रस्तोता और अनुवादक गोपाल नायडू जाने-माने कलाकार और शिल्पी हैं।



एक घुमंतु
सायालसिंगे इलाके का ‘गणपा जानकार’  

दो बीघा जमीन’ के बलराज साहनी की तरह
आ बैठा वीटा खानपुर के बस स्टैंड के चबूतरे पर
वह अखबार को उलट-पलटकर देख रहा था एक तस्वीर 
‘तीन बच्चे जनने वाली भेड़ की’
वह खोज रहा था अखबार के कारखाने को।

-‘नहीं जानते क्या पढ़ना आप!
इसे प्रेस कहते हैं।’
:‘वाड़े में रहते समय
आई - बा
रात में झपकी ले रहे थे
उसी समय जन्म हुआ मेरा
तभी आंखों में समा गए घनघोर बादल
कोई समझ नहीं पाता है मेरे आंखों की गहराई
काली परछाई को भी नहीं

मनुष्य के मन को भी ताड़ लेता हूँ।
पूछ रहे थे आप पढ़ाई - लिखाई के बारे में
छोटी उम्र से ही साल के चार-छह महीने हाँकता रहता हूँ भेड़ों को
इसीलिए पढ़ नहीं पाया
मेरी पाठशाला मैंने खुद ही बनाई है।
साथी की तरह एकाध पुस्तक ले हाथ
जंगल को ताकता रहता हूँ काम की तलाश में
बैठ जाता हूँ खाली-पीली समय में
खूंटे पर बंधे जानवर की तरह।
इसलिए पढ़ नहीं पाया एक गुंठा जमीन भर भी
मैं लोटा परेड करते समय तुड़े-मुड़े कागज के अक्षरों को
उत्सुकता से घाई-घाई में पढ़ता था
और बगैर पढ़े चार शब्द सो भी नहीं पाता था।’

मूंगफली के बेतरतीब गिरे दानों की तरह
देर से खिले कपास के बोंड चुनता रहता हूँ
और गिर पड़ता हूँ जमीन पर,
दिखाई देता है काँटों के बीच
असंख्य पखुड़ियों वाला कैक्टस का दुर्लभ फूल
और पके बालों वाली बुढिया के मुंह से निकले
एक-एक शब्द लाख मोल का
इन सभी से मिलता है मुझे ज्ञान।’

‘खाने के इंतज़ार में’
तड़पते हुए रात में
अकेले ही लेट गया वाड़े पर
आकाश में चमकता है केवल हमारे लिए
दूर-दराज एकाध तारा
झट से दिमाग में जागती है रोशनी
हम केवल अकेले नहीं है इस दुनिया में
मेरी ही है यह धरती,
और... और... सब कुछ,
और क्षण भर में होता है आभास अपने ही विशाल हृदय का
इसे क्या कहते है आपकी भाषा में
‘ज्ञान’ या ‘दृष्टिकोण’?
इस तरह है मेरा सृष्टि के जीव
और मनुष्य के बारे में आस्था का अध्ययन।

वह आदमी स्वार्थी है
जो तिरस्कार करता है अपने भाई के बच्चों का।’

वहीं मैं और मेरे सहयोगी
गजब के आत्मकेंद्रित हैं।
शिक्षा से
कितना विस्तारित हुआ है हमारा ज्ञान
कितना विस्तृत हुआ है हमारे इर्द-गिर्द का क्षितिज?
और सामने है यह देहाती अनजान औलिया
‘यह संसार ही मेरा घर’
की कहानी सुनाता है।

बदली होते समय
कहा एक बैंकवाले दोस्त ने,
गांव जा रहे हो, जरा संभलकर!
घातक होते है लोग, मीठा-मीठा बोलते है।
और पकड़ में आ जाओ तो वहीं ठिकाने लगा देते है।
‘कहने का मतलब है दूरी बनाकर रखो
और किसी को भी मत बताओ अपनी कमजोरियों को’

: इस इलाके में नौकरी करते हो
क्या कहीं खाने और रहने का बंदोबस्त हुआ ? 
इसलिए आना-जाना करते हो
और ऊपर से यह इलाका पिछड़ा है
समय पर बस नहीं मिलती, गर्मी में पानी की किल्लत।

:‘मनुष्य यहाँ कैसे रहता है?’
मेरी तीखी प्रतिक्रिया पर वह थोड़ा सहम गया। 

-‘आप जो कह रहे हो उसमें कोई गलती नहीं है  
पिछड़ा हुआ है यह इलाका । 
लेकिन यह तुम्हारे जहन में कैसे नहीं आया
जमीन के बंटवारे पर ही हमारी जातियों का हुआ है विभाजन
पहाड़ी इलाकों में गवली, धनगर, कुपोषित कातकारी आदिवासी,  
मेरे जैसे उपेक्षित ओ.बी.सी, बी.सी., एन.टी.
नदी के किनारे बसे श्रेष्ठ जाति के संभ्रांत शहर
इस श्रेणी के आधार पर हुई हैं बसावट।’

उत्तर देने का कोई मौका नहीं दिया उसने  
किसी ने मुझे पहली बार दुविधा में डाला 
अचानक वह सहज हो गया
कल-कल बहते झरने की तरह बोलता रहा
‘नौकरी कौन से गाँव में करते हो?’
...मैं
: ‘यानी महाराज आपके ही गाँव में
- ‘वैसे गाँव में हम रहते नहीं हैं।

गाँव के बाहर सूर्यास्त की दिशा में
जांभूलवाड़ा बस्ती में हमारे लिए भरपूर जगह है
घर में
बांस की एक बड़ी टोकनी
बरांडे में झूला 
दिली इच्छा से कहीं भी पैर पसार लीजिये
नींद में आभास होता है कोई झुला रहा है
मैं सो जाता हूँ झूले पर
अचानक जागने पर हिलता रहता है अन्धेरा
और जमीन से
मेरा ऐसा गहरा रिश्ता-नाता है।

छायादार नीम के झाड़ की ठंडक इस तरह
कि ‘मायनी तालाब’ के बगुले रात इस बस्ती में आते हैं। 

गर्मी के दिनों में बिंदास नींद लगती है आँगन में
नीचे जमीन ऊपर आकाश
अगर मन में आया तो खेल समझकर गिनते रहो तारे आसमान के 
किसी बात की कोई परवाह नहीं
सिर्फ पानी का उपयोग करो देख-देख कर
क्या स्वाद है गोश्त का,
ऐसा ही मोठ का नाश्ता, बाजरे की रोटी
हर पन्द्रह दिन में किराना और भेड़-बकरियों का चारा
सभी दिन ऐसे नहीं होते और ना ही रातें
एकाध बार तो लोटा भर पानी से ही गुजारनी पड़ती है रात
अक्खे गाँव में सौ-पांच सौ रुपए की कमी नहीं होती
‘वैसे मूल से हम घुमन्तू हैं।
हमारे व्यवहार में पैसा पानी बचाने की आदत नहीं है। 
अगर यह सब ठीक लग रहा है तो ‘हाँ’ कहो
जो कुछ होगा तो ले आओ तुम्हारा बोरा-बिस्तर
तब तक मैं घर साफ-सुथरा कर लेता हूँ’

: ‘बता देना ही ठीक है कि हम बौद्ध है
किसी को पटता हो या न
शुरू में ही कह देना अच्छा है।

चाल चलन से लगता है आप पढ़े-लिखे हो
हमने पूछा तो नहीं कि आप कौन, और कहाँ के हो? 
आपके संस्कार क्या हैं
राहगीर को पानी पिलाने से
पहले ही आप जैसे लोग पूछ लेते हो जाति 
इससे तो पानी अटक जाता है गले में 
हमारे रहन-सहन से पहचाना होगा 
और टूटी-फूटी बोली 
बगैर मात्रा – अल्प-विराम, पूर्णविराम के  
बोलने वाले ‘धनगर’ हैं।’
यह कहकर वह हंस दिया 
बस मिलने तक हमने स्टैंड पर वह रात बिताई
इस तरह शुरू हुआ मेरा और उसका संवाद
इस डेढ़-दो साल में खूब सीखा उससे
बेखौफ प्रकृति में जीते हुए धाराशायी हो गए हैं मेरे मध्यमवर्गीय मूल्य
मुख्यत:, छुपानी नहीं पड़ी मुझे मेरी जात
इनके बीच उठते बैठते
नहीं बढ़ी दूरियां
नहीं आया बीच में परमात्मा,
बगैर अपमान के पानी की तरह 
पारदर्शी रही मेरी भी आत्मा

एकाध आदमी दिन रात मेहनत करके 
कितना करता होगा काम
क्या इसकी कोई है मर्यादा
अनिद्रा से मैं परेशान हूँ
साढ़े बारह एक बजे जैसे तैसे लगती है आँख
और खुल जाती है नींद सुबह पांच बजे
और ग्यारह के बाद भी शुरू रहता है दिन उसी तरह। 
कितने प्रकार के काम होते हैं? 
ऐसे अनेक प्रकार हैं जिन्हें गढ़ा नहीं जा सकता भाषा में
जेब में हाथ डालकर ये सब अनुभव किया है मैंने ।

वह कोल्हू के बैल की तरह जुटा रहता है
इसीके बीच प्रश्न पूछकर किया उसे बेजार
सिर्फ मकसद इतना ही कि 
उसके दुःख दर्द के अनुभव सुनने को मिले मुझे।

उसे याद हैं मुंह-जुबानी तारों की स्थितियां
रात को खेत की रखवाली करते करते
आँखों ही आँखों में सुबह तक
कैसे करवट लेता है आकाश                
कभी टिमटिमाता है जुगनू
दिशा बदलती हवा के प्रवाह से
ठीक ठीक अनुमान लगता है समय का
यह वही समय होता है जब आम के झाड़ों को आती है मौर 
मोगरे के फूल की तरह जब खिल जाता है करवंद 
ठीक उसी समय बारिश का मौसम आ जाता है करीब
वह बोलता है-
‘एक भाषा होती है प्रकृति की भी अपनी
उसे समझ सकता है केवल अनुभवी ही
आधी रात
बंदरों की चिल्लाहट, मोरों का नाच, झाड़ पर कौवों की कांव-कांव
अचानक सभी कुत्तों का एक साथ रोना
इन सबकी वजह होती है एक। 
हम चिढ़ जाते, और उठाते हैं पत्थर
जैसे पूरे परिसर का मालिकाना हक
दे दिया हो तुम्हें किसीने?

मैं–
गीली लकड़ी ही नहीं,
अलावा इसके,
मात्र स्पर्श से,
मिट्टी के गर्भ में पानी की कल–कल आवाजें सुन लेता हूँ।  
केवल गंध के सहारे ही सांप को खोज निकालना आता है  
इसीलिए नहीं दिखाता हूँ -
शिकारियों को निरपराध प्राणियों के बिल
और एक लंबे से पृथ्वी में जमा हुआ पानी या पेट्रोल
क्यों करें हम इस तरह इसकी बरबादी?
वैसे बाप दादाओं ने हमें यह धरती विरासत में दी है  
सुपुर्द करने आने वाली पीढ़ी को
इसलिये झाड़ की ऊंचाई को कायम रखता हूँ
सूखे पत्तों पर पैर रखते हुए विचार करता हूँ कि
किसने देखा है ‘म्हसोबा-सतिआसरा’[2] को ?
चारों ओर पसरी हुई है जीवन की गंध.
यहाँ-वहाँ, सारे जंगल में,
सबको जीने का अधिकार है। 

मैं भेड़ के पीछे-पीछे बिना रुके चलने वाला   
खूब भटका हूँ उसके साथ
बगैर पानी के बंजर प्रदेश में,
बगैर नहाये-धोए पसीने के जलन की तरह ही है हर दिन
हवा के विपरीत जलाता हूँ चूल्हा
और अध-पकी भाकरी बना ली रात के लिए
रात ज्वार के खेत की सिचाई करते समय
उसने मुझे दिखाया आधी रात में
चांदनी रात में यात्रा पर निकले हुए प्रवासी पक्षी 
करीब से अनुभव हुआ उस धुंधले प्रकाश में
आकार में ढलती लयबद्ध आकृतियों की तस्वीर।  

उसने खुद से कहा,
‘प्रवासी पंछियों के बाद ही मैंने ही खोज निकाली
इस धरतरी को  
एकाध भेड़पालक उम्र भर भेड़ों के पीछे चलते-चलते,
कितनी लंबाई-चौड़ाई नाप लेता होगा जंगलों की
इसका है कोई अंदाज?
पहाड़ियों पर जहाँ-जहाँ से गुजरा वहीं बन गए रास्ते और घाट। 
इंसानों के बीच मैंने ही सबसे पहले 
बकरी, भेड़, घोड़े और कुत्तों को लाया।’
और बता दिया भेड़, बकरी और बंदरों ने
ऐसे कई झाड़ है जिसकी पत्ती
मनुष्य के खाने के लायक नहीं है।  


        झाड़ी–झूड़ी  से जड़ी-बूटी खोजने में मेरी बेतहाशा मेहनत है
        ये ही तो है आयुर्वेद की पहली पाठशाला  
        और मैंने आराम से खोज निकाला है उसके प्रमाण और मात्रा को।
 

आर्थिक और सामाजिक वजह से
मेरा अधिकाँश समाज अज्ञानी और दरिद्र है।
पहले ही योग्य उम्मीदवार नहीं मिलने की वजह से
मेरे बनी बनाई उम्मीद टूटती जाती है
फिर भी आरक्षण को लेकर उन लोगों का हो-हल्ला होता रहता है
ये सब मुझे समझ में नहीं आता ।
चाहे फिर वर्ण से कोई श्रेष्ठ या छोटा हो
मेरे जैसे अन्य गरीबों का मैं क्यों तिरस्कार करूँ ?
फिर भी मेरी मांग है कि सभी को काम मिलना चाहिए।
ये सब बयाँ करते वक्त उसके चेहरे पर कोई आक्रोश और संताप नहीं था। 
अंत में खुद के हाथ को निहारते हुए मन ही मन बुदबुदाने लगा,
‘हमारे हक़ का क्या बचता है
केवल दुःख मेहनत पर ही है पूरा विश्वास !’

और एकदम मुझे ध्यान हो आता है
सही में क्या इस विषय पर मुझे बोलना नहीं चाहिए ?
बाजार, गोदाम और लोहा उठाने वाले हमाल,
कचरे की गाड़ी पर रास्ते और मैला साफ करनेवाले मेहतर,
बैलों की तरह कंधे पर बोरा लादकर,
भीड़ में हाथ गाड़ी खींचने वाले हमाल,
अपने कंधेपर हुक फंसाकर
पृथ्वी को ही पीठ पर लादने के लिए तत्पर है हमाल!
बस में प्रवास करते समय खिड़की से इन सभी को
‘मनुष्य’ समझकर क्या हमने सहज बर्ताव किया है?
क्या यह अपना मुल्क नहीं है?
कबूल है, यह कविता बढ़ रही है अनावश्यक। 

भेड़ों के पीछे घूमने वाला भेड़पालक 
उनके साथ बहुत घूमा हूँ मैं,
बंजर प्रदेश में पानी की तलाश में,
देखा हूँ पूर्व की दिशा में अकाल से ग्रसित गाँव। 

वह लगातार बहती हवा की तरह बड़-बड़ करता रहता है
-‘इस पहाड़ को कुल्हाड़ से काटो मत
रोका जाए प्लास्टिक की थैली को
गाय-बछड़ों के पेट में जाने से,
इस से तैयार होगी 
फसल न देने वाली जमीन के बंजर प्रदेश
जहां बारिश में रहता है आकाश उजड़ा-उजड़ा।  
लुभाने वाले बादल बिन बरसे निकल जाते है
प्रकृति की मार से हवालदिल है मनुष्य
और रात में बीमारी के लक्षण लिए ठहरने आती है हवा.’

वहाँ एक निर्जन पगडंडी पर
झाड़ियों में लटके है दुर्लक्षित प्रेत
उसने कहा,
‘लोगों में संशय हैं,
यह आत्महत्या नहीं है,
यह मनुष्यों के विनाश की योजनाबद्ध सामूहिक सत्र है.
इसलिए ऐसी हरकत कोई क्यों करेगा।
कहते हैं चौरासी लाख योनि के बाद
‘मनुष्य’ के रूप में प्राप्त हुआ दुर्लभ सुन्दर जीवन?’
देखा है,
पानी के लिए भटकने वाले मनुष्य की दबी हुई रुदन?
पानी की खोज में पैर आग की तरह जलने लगे हैं। 
मनुष्य की आँखें धंस गई हैं गहरे सूखे कुएं के खोल की तरह,
जान बचाने के लिए छाँव की तलाश में,
धूप से परेशान कुत्ते की तरह भटका हूँ?

सूखी नदी से रेत में निकलते लावे की उष्मा, 
मृगतृष्णा की तप्त माया,
झाड़ों से छिटक गया है हरा रंग,
पक्षी वहाँ से पलायन कर गए पानी के इंतज़ार में,
बची रह गई कंधों पर आम के झाड़ की सूखी लकड़ी। 

-‘मूक प्राणी जो झुलस रहे हैं वह सृष्टि ही जानती है
तुम्हें इससे क्या, किसे क्या और कैसे बताएं?’
सहन नहीं होती यह गर्मी।
और अंत में खीझकर मैंने कहा,
कीट-पतंगों को नहीं मिलता जहां आसरा
लोगों से दूर, निर्जन वन में भी,
कहाँ छुप गया है तेरा ईश्वर?
क्या पीछे छूट गया पैदल तीर्थ यात्रियों की तरह गुन-गुनाते हुए।  

-‘बेर के इस जंगल में, अरे हिवर (जंगली फल) के इस जंगल में
जीव जन्तु पक्षियों के जंगल’ 
यही ईश्वर है मेरा,
और शाम ढलते हम वहाँ पहुंचे,
बेर, हिवर और पीपरनी के पेड़ों के बीच 
ध्वस्त हो गए उन गाँव में।

: ये कैसे सिन्दूर लगे उबड़-खाबड़ पत्थर है
इसे कहो मत पत्थर
हमें इसी तरह रखना हैं हमारे पूर्वजों को !
जिन्होंने गए-गुजरे दिनों में राह दिखाई है,
जिन्होंने इशारा किया भविष्य के बारे में
और बचाया है बुरी आत्माओं से। 
ये लोग हैं धरती माँ के उपासक।
यहाँ के हरेक पत्थर को रखा है हमने संभालकर,
उनके स्मरणों को जीवित रखा है।
यही है हमारा ‘सुंबरान’ !
गुजरे ज़माने के
जीव-जंतुओं के सुख दुःख और संघर्ष के स्मृतियों की,
आज मुझसे प्रस्तुत करने को कहा जाएगा
अपने समय की ‘भाकनूक’[3]

: भाकनूक क्या होती है ये भाकनूक?
वह केवल मुस्कराया समझदारी से मेरे हाथ को दबाते हुए.

पहले से ही वहाँ लोग बाग़ जमा हो गए थे,
उनके पहनावे में कई रंग की झलक उभर रही थी।
बाल खोलकर घूम रही थी स्त्रियाँ
उन पत्थर के मन्दिर के सामने बज रहे थे ढोल
जैसे हरेक का शरीर झूमने-घूमने लगा हवा की तरह
और उतर आयी थी आसमान से 
परेशानियां से भरे ‘घाया-गजी’[4] के नृत्य
किसके लिए बचाए रखी है ये हाव-भाव,
उन्होंनें अन्तर्मन की लीनता के लिए?
खुले आसमान के नीचे शुरू हो गया है भंडारा,
ढोल की ताल पर 
अचानक उनके हाथ हवा में लहराने और हवा में झूमने लगे हैं। 
लोग इसी की राह देख रहे थे।  
वह बयां करने वाला था उसके समय का ‘भाकनूक’।

उसने अपने शरीर को दी खूब तकलीफ।  
दातों से कच-कचा कर निम्बुओं को तोड़ा,
जलते हुए कपूर को निगल लिया उसने,
पूरी ताकत से अंतर्मन से निशब्द ध्वनि निकाली, 
लोगों ने ईश्वर से कहा मत करिए झाड़ों का बेहाल
कह डालो जो होगा विधी का विधान ।
 
अक्षरशः चिल्लाते, आग-बबूला होते हुए,
हिचकियों के साथ
आँखें मूंद कर आकाश की ओर निहारते हुए
कहा उसने,
- ‘अब नहीं सह पा रहा हूँ यह पीड़ा
कौन अपने निहित हितों के लिए
धरती के विनाश की राह ताकता है?

(साल 1997 में पर्यावरण को लेकर 178 राष्ट्रों के प्रतिनिधियों द्वारा तैयार किए गए क्वेटा प्रोटोकॉल में लिए गए निर्णय के कुछ अंश काव्य रूप में जो इस कविता का ही हिस्सा हैं)

कौन निगल रहा है जमीन,
और आसमां को कर रहा है काबू में?    
कौन कर रहा है समंदर के पानी को प्रदूषित विस्फोटक तत्वों से?
कौन बेच रहा है पहाड़ियों को,
और नदीं नालों को कर रहा है नीलाम?
जहाँ धकेल दिया गया है मनुष्य हाशिए पर,
कहाँ चरायेंगे हमारे जानवर?
कौन फोड़ रहा है हमारी आत्मा पर एटम बम?
कोई है,
है कोई तो रोको इसे
बेवजह बढ़ा रहे हैं उबाऊ तापमान,
तो डूबेंगे सबसे पहले समुद्र किनारे बसे शहर,
जैसे यादव की डूब गई थी समुद्र में द्वारका,
मेरे भोले-भाले शंकर के हिमालय को लगेगी आग,
बर्फों के शिखर भभक उठेगी
और नदियाँ हो जाएगी बाढ़-ग्रस्त
और अच्छे-खासे शहर तहस नहस हो जाएँगे
बढ़ेगा सभी जगह का तापमान,
सूख जाएगी नदियाँ, तालाब और बांध,
धरती के पेट में समा जाएगा
बचे-खुचे पानी का अंतिम तालाब
फिर कहा भटकेंगे मेरे पंछी?
कैसे जिन्दा रहेंगे पेड़ और जानवर?
तब मनुष्य ही मनुष्य की पहचान नहीं कर पाएगा
बाप अपनी बिटिया की,
भाई, बहन की,
पति, पत्नी की,
बेचेगा बाजार में।
सबसे पहले बच्चों को निपटाएगा
और बाद में अपनी थाली में जहर मिलाएगा।
इसलिए
धरती पर मालिकाना हक जतानेवाले
रोको,
रोको उन दुश्मनों को
नहीं तो अटल है, अटल है विनाश’

अंततः वह चूर चूर होकर
गिर पड़ा जमीन पर
जैसे अनजानी हवा ने अलग-थलग कर दिया पेड़ों को
और ‘येरले’ नदी के तट पर बारिश के दिनों में
बगैर पानी के,
रेत में से फूटने लगे है झरने,

सभी के मुँह से अचानक शब्द निकले,
‘बयां किया दास्ताने सुंबरान’
बयां किया सुंबरान
सुंबरान... 


नोट्स

1.सुंबरान महाराष्ट्र के धनगर समाज में रात भर चलने वाले कार्यक्रम को कहा जाता है जिसे हिन्दी पट्टी में ‘जगराता’ कहते हैं.
2. धनगरों का आदि देव।
3. धनगर समाज की भाकनूक सदियों से बोली भाषा है। हिन्दी में इसका अर्थ ‘व्यथा-कथा’ और ‘वीर गाथा’
4. ‘घाया-गजी’ – इन लोगों का आदिम देव।

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ दास्ताने सुंबरान: आनंद विंगकर की कविता ”

  2. By भारत भूषण तिवारी on October 26, 2015 at 3:45 AM

    यह कविता शायद भारत ज्ञानविज्ञान समिति के महाराष्ट्र चैप्टर ने पुस्तिका के रूप में छापी है. मैंने एक प्रति भारत ज्ञानविज्ञान समिति के पुणे ऑफिस से उठाई थी. गोपाल जी ने इसका अनुवाद करके एक ज़रूरी काम किया है.
    एक प्रतिबद्ध साहित्यकार होने के साथ-साथ आनंद जी बहुत ही अच्छे इंसान हैं. पुणे में उनसे कुछ ही देर की मुलाक़ात और उनके साथ पी गई चाय प्रतिमा (मेरी पत्नी) और मुझे अच्छी तरह याद है.
    शुक्रिया आपका भी, रेयाज़.

  3. By भारत भूषण तिवारी on October 26, 2015 at 5:50 AM

    एक बात और, महाराष्ट्र के कृषि संकट की पृष्ठभूमि वाला उनका उपन्यास 'अवकाळी पावसाच्या दरम्यानची गोष्ट' भी हिन्दी में आ पाए तो क्या ही अच्छा हो.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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