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बीच सफ़हे की लड़ाई

हम बोलेंगे, लब खोलेंगे: रविभूषण की कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/17/2015 01:05:00 PM


ब्राह्मणवादी ताकतों द्वारा मुसलमानों और दलितों पर और बोलने की आज़ादी पर किये जा रहे फासीवादी हमलों के खिलाफ आलोचक रविभूषण ने ये कविताएं लिखी हैं.  

हम बोलेंगे, लब खोलेंगे

हम बोलेंगे, लब खोलेंगे
यह जोर-जुलुम
गंदी हरकत
यह मार-धाड़, गुंडागर्दी
अक्सर दी जाती जो धमकी
चुप रहने को
चुप नहीं रहेंगे, बोलेंगे
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे।

जो कहता है बेशर्मी से
लिखना बंद करो तुम सब
जो लिखने-कहने से हमको
जो बातें करने से हमको
हैं रोक रहे
वे यह जानें, यह समझें भी
हिटलर ही जब नहीं रहा
तो वे फिर कैसे रह लेंगे?
हम बोलेंगे, हां, बोलेंगे.

जो हमें डरानेवाले हैं
जो हमें झुकाने वाले हैं
जो लाज-शरम सब छोड़ चुके
वे यह जानें, यह समझें भी
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.
हम वंशज हैं जिनके देखो
वे कौन रहे हैं, यह देखो
उनकी बानी-मानी देखो
उनका अड़ना-लड़ना देखो
इतिहास पढ़ो, जानो-समझो
उनकी सब कुर्बानी देखो
हम वंशज हैं किनके देखो
वे लड़ते आए हैं, देखो
कलमों की तुम ताकत देखो
अंग्रेजों से बदमाशों से
वे लड़ते आए हैं देखो
उनका भाईचारा देखो
दुश्मन से ललकारा देखो
हम वंशज हैं जिनके देखो

तुम वंशज हो किनके देखो
नाजी-पाजी को भी देखो
जालिम-कातिल को भी देखो
अपनी पैदाइश तो देखो
जो मार-काट के आदी हैं
तुम वंशज हो उनके, देखो
हम बोलेंगे, तुम जुल्मी हो
हम बोलेंगे, तुम झूठे हो
कहते हो कुछ, करते हो कुछ
नकली-असली के भेद सभी
हम खोलेंगे, हां! खोलेंगे
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.

सच कहना अगर बगावत है
तो समझो हम भी बागी हैं
संसद में जो सब बैठे हैं
उनमें अपराधी, दागी हैं.
तुम नहीं कहीं से राष्ट्रभक्त
इतिहासों में तुम नहीं दर्ज
मालूम नहीं है तुम्हें फर्ज
फुसलाते हो, भरमाते हो
गर्जन-तर्जन करते रहते
फिर मौन साध कर रहते हो
हम नहीं रहे हैं कभी मौन
हां बोलेंगे, लब खोलेंगे.

आपस के भाईचारे को
संगी-साथी सब प्यारे को
जो तोड़ रहे, वे यह जानें
हर जोर-जुल्म के टक्कर में
सदियों से हम लड़ते आए
सदियों से हम मरते आए
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.
यह चाल तुम्हारी नहीं चले
यह दाल तुम्हारी नहीं गले
यह दकियानूसी नहीं चले
यह नफरत-फितरत नहीं चले
हम भेद तुम्हारा खोलेंगे
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.

गंदे को गंदा कहने से
झूठे को झूठा कहने से
शातिर को शातिर कहने से
कातिल को कातिल कहने से
हरदम हमको सच कहने से
तुम रोक नहीं सकते हमको
हम बोलेंगे, हां बोलेंगे.

जो हमें लड़ानेवाले हैं
जो हममें, तुममें, उन सबमें
जो मिल कर रहते आए हैं
नफरत फैलानेवाले हैं
वे ये जानें, ये समझें भी
यह सबका वतन है, सबका वतन
सदियों से हम सब एक साथ
रहते आए हैं, यह जानो!
हम नहीं अकेले हैं, जानो!
हम लड़ती फौजें हैं जानो!
हम लाख-करोड़ों हैं, जानो!
हम लाख-करोड़ों एक साथ
कल अपना मुंह जब खोलेंगे
बोलो, फिर तब क्या होगा?
मानो-जानो, समझो-बूझो
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.
हां बोलेंगे, लब खोलेंगे.

वेश बदल कर वह आया है

देखो भाई
वेश बदल कर वह आया है
फुसलाता-भरमाता है वह
झूठ बोलता
मगर नहीं वह
कहीं तनिक भी है शरमाता
सचमुच वह है भाग्य विधाता?
समझो जानो
क्या लाया है, क्या गाया है?
वेश बदल कर वह आया है।

उसको अब कब पहचानोगे?
असली चेहरा कब जानोगे?
हत्यारा है, जालिम है वह
धोखा देकर, झांसा देकर
हमसे, तुमसे, हां. सबसे वह
लंबे-चौड़े वादे कर-कर
वह गद्दी पर बैठ गया है.
वेश बदल कर वह आया है.
झांसे में उसके रहने से
नाम हमेशा ही जपने से
क्या पाए हो, क्या पाओगे
उसका गीत हमेशा गाकर
जीवन भर बस पछताओगे
बड़बोला है, हांकू है वह
सपनों का विक्रेता है वह
लफ्फाजों का है सरदार
जिसको नहीं किसी से प्यार
घुटा हुआ है, छंटा हुआ है
यहां-वहां वह डटा हुआ है
देखो, वह क्या गाया है, क्या लाया है.
वेश बदल कर वह आया है.

उसकी बोली-बानी देखो
जो कहता है, मानी देखो
बीती सभी कहानी देखो
ऊपर कुछ है, भीतर कुछ है
दोरंगा नहीं, बहुरंगा है
जिसने उसको गद्दी सौंपी
देखो, कैसा पछताया है
वेश बदल कर वह आया है.  

झांसा देना उसकी फितरत
फिर भी देखो, कैसी शोहरत
हाथों का लहराना देखो
आंखों का चमकाना देखो
समझो-बूझो
कैसा संदेशा लाया है
वेश बदल कर वह आया है.

घर से हरदम बाहर है वह
लेकिन
घर-घर जपता है वह
कभी नहीं भी थकता है वह
उसका जुमला-हमला देखो
बातूनी की चुप्पी देखो
सब पर भारी, दहला देखो
गरज-गरज कर वह आया है.
वेश बदल कर वह आया है.
उसको देखो, जानो, समझो
चूक गए इस समय अगर तुम
अपना जीवन ही तुम जानो
जो गाया है, पछताया है.
देखो भाई!
वेश बदल कर वह आया है.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ हम बोलेंगे, लब खोलेंगे: रविभूषण की कविताएं ”

  2. By Kamal Choudhary on October 18, 2015 at 6:22 AM

    Sarokaar aur chintain maayane rkhti hain...is samay kavya ki udaat-ta zaroori nhi...
    Salaam Kavi aur Haashiya ke sathiyon ko!
    .................................................................................Dear Bloger, Maine bhi aapko kuchh Kavitain bheji thi...Email ka koi uttar nhi diya gya..
    Aapka Sathi ,
    Kamal Jeet Choudhary
    Jammu & Kashmir.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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