हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

गाँव भीतर गाँव: सत्यनारायण पटेल

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/11/2015 01:08:00 PM


एक ऐसे वक्त में, जब जानवरों के नाम पर फासीवाद के हाथ में खेलती हत्यारी भीड़ इंसानों का पीछा और कत्ल करती फिर रही है, सत्यनारायण पटेल के उपन्यास गांव भीतर गांव का एक अंश.
 
 

-कैसे टाणी करूँ..? क्या टाणी करूँ..? झब्बू सोच में पड़ गयी। पर कुछ भी ढंग-ढोरे का नहीं सूझ रहा ।

वह कैलास के झोपड़े में रहने तो लगी। सिलाई का काम-काज करने लगी। कामकाज भी ठीक-ठाक चलने लगा।। मगर फिर भी सब कुछ ठीक कहाँ ! ज़हन में तो कैलास की यादों की ख़ुशबू महक़ती, मगर झोपड़े में, हर चीज़ पर एक दूसरी ही गँध काबिज़, जो झब्बू को बर्दाश्त नहीं । गँध बहुत तीव्र। ताक़तवर। झब्बू समझ नहीं पा रही। गँध को अपने झोपड़े, घर में आने से कैसे रोके…? कैसे खदेड़े..? गँध ने झब्बू की नाक में दम कर दिया। घर की हर चीज़ पर कब्ज़ा कर लिया। झब्बू नहीं चाहती, कैलास की स्मृति पर, ख़ुशबू पर, गँध या किसी का भी कब्ज़ा हो।

झब्बू सोचती कि क्या करूँ..? नीम से दूर कहीं चली जाऊँ..!  पर कहाँ..? काँकड़ पर झोपड़ा ठोंक लूँ..? पर ज़्यादा दूर जाऊँगी.. तो अकेली पड़ जाऊँगी। फिर वहाँ कपड़े सिलवाने कौन आयेगा..!

फिर एक क्षण को झब्बू के मन में ख़याल आया, होंठ हिले, बुदबुदाने लगी- क्यों न ऎसा करूँ..? श्यामू व रामरति के झोपड़ों से आगे..। तालाब तरफ़..! झोपड़ा ठोंक लूँ..!

फिर दूसरे ही क्षण हवा का तेज़ झोंका आया। झोंका जैसे सीधा रामरति के झोपड़े के आगे से, तालाब किनारे से आया। झब्बू के चेहरे से टकराया। नकसुर में घुसा। झब्बू का जी मिचला उठा। मुँह बनाती। मन ही मन पहले क्षण के ख़याल को ख़ारिज करती- ‘ नी..नी.. उधर ठीक नी ।’ ख़ुद से कहने लगी- उधर मरे ढोरों की चीर-फाड़ करते। खाल उतारते। ढोरों के बड़े-बड़े कँकाल पड़े रहते। गिद्ध मंडराते। भयानक बदबू आती। उधर कैसे रहूँगी..?

जब कैलास था, सब कुछ ठीक था। नीम अच्छा था, नीम की छाँव अच्छी थी। नीम की निबोलियाँ अच्छी थी। जब पकती, तो पीली पट्ट और मीठी चुक हो जाती। झब्बू ही क्या… झोपड़े तरफ़ के छोरे-पोरे सभी नीम की निबोलियाँ खाते। गर्मी के दिनों में नीम की छाँव में खाट ढाल सो जाते।

नीम से कुछ दूर बबूल अच्छा था, उसकी छाँव अच्छी थी। लेकिन अब न नीम, न बबूल और न उनकी छाँव अच्छी थी। गँध ने नीम, बबूल की छाँव पर भी कब्ज़ा कर लिया। निबोलियों का स्वाद बदल दिया। नीम की छाँव में खाट ढाल सोना तो दूर, कोई भला मानुष पल, दो पल रुके भी नहीं..।

वह गँध किसी इत्र की नहीं । न खाळ ( बरसात में बहने वाला नाला ) किनारे खड़ी बेसरम के फूल की, न बबूल, खेजड़ी के जाल्यों पर छायी, तुरई, गिल्की, लौकी, करेले, किकोड़े, तिंदोरी की बेलों और उनके फूलों की, बेलों पर झूलती कच्ची-पकी साग-भाजी की भी नहीं, न लावारिस उगे गेंदों की। न खाळ में शौच के बाद सूखते मल की। न शौच के मल में गये बीजों से उगे टमाटर, बैंगन आदि के फूलों की। गँध थी नयी, और देशी दारू की।

न..! झब्बू दारू न पीती। न छूती। दारू तरफ़ देखती भी नहीं। फिर भी झोपड़े में हर समय, दारू की गँध महसूस होती। उसका घर झोपड़ा था, तो क्या हुआ..! था तो उसका घर..! कैलास की यादों का ताज़महल। घर में पनहरी पर, गारे की गागर में, भाँडे में, गोळी में, चकल्ये ( मिट्टी का एक बर्तन ) में, यानी पनहरी पर रखे हर बर्तन में, जैसे पीने का पानी नहीं, बल्कि दारू भरी हो। घर का आँगन, भींत और सब कुछ पीली मिट्टी से लिपा-छबा था। पर जैसे पीली मिट्टी के लदेड़े को भाँज और देशी दारू में साँध कर लिपाई-छबाई की थी। घर की गुदड़ियाँ, चादर, बारसाख पर झूलता परदा और हरेक कपड़ा जैसे देशी दारू में भीगा हुआ हो। झब्बू का पूरा घर या झोपड़ा, जो भी समझो..। पूरा का पूरा दारू के एक भपके-सा गँधाता। और यह हाल सिर्फ़ झब्बू के घर का ही नहीं, बल्कि उसकी पड़ोसने चँदा, फूँदा, धापू आदि के झोपड़े जैसे घरों के भी थे।

कैलास के रहते, गाँव में कलाली न थी। उसके सिधार जाने के बाद, जब झब्बू मायके गयी थी। तब भी न थी। जब झब्बू मायके से लौटी, तो थी। यानी उसके मायके में रहने के दौरान ही कभी कलाली खुली। खुली, तो खुली। झब्बू के बाप का क्या लेती..! शुरुआत में झब्बू ने यही सोचा, और कलाली को देखी-अनदेखी कर दी। ग़ौर न किया। कलाली झब्बू के झोपड़े के ठीक सामने, या नीम के नीचे न थी। कुछ दूर, बबूल के पास तिकोने पर, धापू बागरन के झोपड़े के ठीक सामने थी। कलाली के पीछे बबूल। बबूल के पीछे खाळ, और खाळ के किनारे, और भीतर जहाँ-जहाँ तक पानी सूखा था, फिर वही सब था।   

वह गाँव के इतिहास में पहली कलाली थी। वह अकेली झब्बू का नहीं, बल्कि पूरी बाखल की औरतों का सिर दर्द थी। फिर भी झब्बू कुछ ज़्यादा परेशान थी, क्योंकि उसके घर सामने नीम था। कलाली के सामने जगह तो चौड़ी थी, पर छाँव न थी। ठीक पीछे बबूल था, जिसकी छाँव खाळ तरफ़ ज़्यादा रहती। कुछ लोग जो आड़े-छुपके पीने वाले थे, या नयी उम्र के किशोर जो पीना सीख रहे थे, वे भले ही कलाली के पीछे आड़ में चले जाते। वे खाळ से उठती सूखते मल, कीचड़, गोबर और लावारिस झाड़ियों की गँध की परवाह न करते और बबूल की छाँव में पीने बैठ जाते।

लेकिन जो जमे-ठमें और पुराने पियक्कड़ थे, वे बबूल की छाँव में न बैठते। वे अद्धा-पव्वा ख़रीदते और नीम नीचे आकर बैठ जाते। पीने वाले न सुबह, दोपहर और साँझ देखते। जब फुरसत होती। मज़दूरी मिली होती, या गाँव के किसी ठाकुर, पटेल आदि ने मेहरबानी की होती। पीने का जिसे मौक़ा मिलता, न चुकता। नीम की छाँव में बोतलें खुलती- किचिर्रर्र किर्रर्र..। हवा में गँध घुलती। हवा के साथ झोपड़े में घुसती, और फिर..फिर पहले से मौजूद गंध को और समृद्ध करती। एक मज़मा उठता, दूसरा जमता। दूसरा उठता, तीसरा जमता।

झब्बू को मज़मे पसंद नहीं, क्योंकि जब मज़मा जमता। नीम नीचे का महौल ही बदल जाता। फिर आदमी अमीर हो या ग़रीब हो। किसान हो या मज़दूर हो। अद्धा पीता या पाव। पाँव और ज़िबान लड़खड़ाते। खोपड़ी पर अजीब-अजीब से ख़याल तारी होते। आदमी बेख़याली की खाई में गिरता-उठता। ज़ोर-ज़ोर से उघड़ी-उघड़ी बातें करता। आदमी से कुछ कम रह जाता आदमी।

चूँकि झब्बू कपड़े सिलती। उसके पास औरतों का आना-जाना लगा रहता। दारूकुट्टे आती-जाती पर फिकरा मारने से भी न चुकते। जब फिकरे की चोंट किसी की छाती या कूल्हे पर पड़ती। काँटा-सा चुभता। कोई सोचती कि दारूकुट्टों के मुँह कौन लगे ! और अपना काम कर लौट जाती। कोई आने से कतराती। कोई फिकरे के जवाब में तुरंत ख़री-खोटी सुना भी देती।

उस दोपहर तो हद ही हो गयी। वह दोपहर बहुत सुनसान थी। नीम की छाँव ठन्डी, और गहरी थी। हमेशा की तरह नीम की छाँव में कुछ मोर, काबर, गिलहरियाँ, होला, चिकी अपना भोजन खोज रही थी। उन्होंने भी देखा, और एक-दूसरे तरफ़ देखते हुए जैसे आँखों ही आँखों में कहा कि हद है।

दरअसल नीम की छाँव में दामू जाटव  और दया बागरी बैठे दारू पी रहे थे। दोनों हम्माल थे। हम्माली जाम सिंह के यहाँ करते थे। उस दिन कोई काम नहीं था। या हो सकता है कि काम निपटाकर आये थे। उनके सामने प्लेन दुबारे की एक अद्धी। गिलास और भुगड़े की पुड़िया खुली रखी थी। झब्बू के झोपड़े की भींत में लगी खिड़की बन्द थी। किवाड़ के पल्ले खुले थे। बारसाख पर पुरानी साड़ी का परदा झूल रहा था। झोपड़े के बीच एक चौड़ी ओटली पर टीवी थी। टीवीब्लैक एण्ड व्हाइट थी। उन दिनों कलर टीवी जाम सिंह, माखन शुक्ला, और संतोष पटेल जैसों के घर में ही थी। झब्बू के घर में टीवी के सामने सिलाई मशीन थी। झब्बू स्टूल पर बैठ, मशीन पर कुछ सील रही थी।

तभी क्या हुआ ! कलाली तरफ़ से श्यामू ढोलन आ रही थी। चँदा, फूँदा का झोपड़ा पार करती। धापू के झोपड़े सामने पहुँची। उसके हाथ में टू बायल कपड़ा था। वह पोलका सिलवाने आ रही थी। दामू ने तभी श्यामू ढोलन को देखते हुए दया का घूटना छुआ। दया भी उधर हसरत भरे भाव से देखने लगा। अब तक श्यामू ढोलन, और आगे आ चुकी थी। झब्बू के झोपड़े और नीम की छाँव के बीच धूप का एक रेंगाला था। श्यामू ढोलन उसी रेंगाले में दाख़िल हो चुकी थी। श्यामू ने उन्हें छाँव में बैठे देख अनदेखे कर दिये। पर उनका अपने पर क़ाबू न था। उनकी नज़रों के फीते श्यामू का बदन नापने लगे। फिर श्यामू मुड़ी तो चेहरा झब्बू के झोपड़े तरफ़, और पीठ नीम की छाँव तरफ़ हो गयी। छाँव में बैठे-बैठे ही दोनों बागड़ बिल्लों की तरह उसे घूरने लगे। श्यामू किवाड़ के क़रीब थी। दामू अपने दाएँ पैर के घुटने पर धीरे-धीरे हथेली फिराने लगा। मानो वह  घुटना नहीं, श्यामू का कूल्हा हो। कूल्हे पुष्ट, और पीछे को उभरे हुए। दामू की आँखों और चेहरे पर एक ख़ास भाव तारी होने लगा। बदन में सिहरन दौड़ने लगी। यही हाल दया बागरी का भी। फिर दामू के होंठ हिले। गँधाते मुँह से शब्दों के बाण छूटे-  काश…, अपनी क़िस्मत में भी ढोलक के पुड़ पे दो थाप मारना लिख देता भगवान !

शब्द बाण श्यामू के कूल्हे में चुभे। श्यामू के क़दम ठिठके। उसने आवाज़ भी पहचान ली। शब्द बाण बिच्छू के डंक लगे। मस्तिष्क तक झनझनाहट कौंध गयी। कहने को मन में बहुत कुछ उबल आया। मगर कड़वा घूँट पीते हुए सोचा कि कुत्तरे को काँकरा मारो तो, और ज़्यादा भौंकता।

श्यामू के ठिठके क़दम, फिर चल पड़े। तभी फिर डंक चुभे। अब आवाज़ दया बागरी की थी- भगवान भी पटेलों का साथी, उनके  लिए एक से एक ढोलक हाज़िर करता। दिन में अलग, रात में अलग। बजाओ, जितना ज़ोर हो, उतनी बजाओ। 

-हाँ भई ….अपनी क़िस्मत का तो पूड़ ही फूटा ! दामू ने भुगड़े फाँकते हुए कहा।

श्यामू बारसाख पर झूलते परदे तरफ़ हाथ बढ़ा चुकी थी। परदा हटा झब्बू के झोपड़े में दाख़िल होने को थी। लेकिन फिर रुक गयी। जहाँ रुकी, वहीं पैरों पर पलटी। हाथ की उँगलियाँ नचाती। भौहों को ऊपर-नीचे करती। आँखों में व्यंग्य की फूलझड़ी सुलगाती। शब्दों को तेज़ाब में भीगोती, बोली- कैसे मिलेगी.. ढोलक बजाने को..? अपनी माँ, बहन और लुगाई, सभी को तो गिरवी धरके बैठे हो..!

 -ऎ छिनाल…. दया सुलगता हुआ चीख़ा- ज़िबान संभाल, नी तो हींच लूआँ।

-सच्ची तो कह री हूँ, मिर्चां क्यों लग रही ? श्यामू ने व्यंग्य मिश्रित हँसी के साथ कहा। फिर बारी-बारी से दोनों की आँखों में सुलगती नज़रों से घूरती बोली- पहले उन्हें गिरवी से छुड़ाओ… फिर सवेरे माँ की ढोलक बजाओ, दोपहर में बहन की;  और रात में लुगाई की बजाओ। फिर आपस में अदल-बदल कर बजाओ..। बजाओ..और बजाते-बजाते ही मर जाओ।

श्यामू इतने पर ही शांत न हुई। भीतर पानी की तरह खौलती। दो-तीन क़दम और आगे बढ़, भौंहें उछाल, गरदन को झटका दे, और हथेली पर हथेली रगड़ती, बोली- फिर भी कस बचे अगर, आना श्यामू ढोलन की डगर। चरखी में से निकले साँटे के चौथे-सा हाल न कर दूँ, तो श्यामू ढोलन नाम पलट दूँ।  

दया बागरी और दामू जाटव फनफना कर रह गये। कभी सोचा  न था कि श्यामू यूँ वार करेगी। सच में, श्यामू ने भौंकते कुत्तों को काँकरा न मारा। ज़ोर से भौंकने को न उकसाया, भौंकते के मुँह में बल्ली घुसेड़ चुप कर दिया। दोनों का नशा ऎसे यूँ छू मंतर हुआ, जैसे गधे के सिर से सिंग गायब हुआ।

लेकिन ग़ुस्सा बरकरार रहा। दारू की ख़ाली बोतल दामू ने कसकर पकड़ी। एक पल को उसके ज़हन में काल्पनिक दृश्य उभरा, और उसने देखा- उसने ख़ाली बोतल से श्यामू का भाल फोड़ दिया। ख़ून बहने लगा। श्यामू का चेहरा यूँ लाल हो गया। मानो होली हो, और संतोष पटेल ने गुलाल मल दिया हो।

लेकिन काल्पनिक दृश्य काल्पनिक ही रहा। संतोष पटेल का नाम याद आते ही तंद्रा टूटी। असल में बोतल पर पकड़ ढीली पड़ गयी। क्योंकि दया और दामू ही नहीं, बल्कि पूरा गाँव जानता। श्यामू के सिर पर संतोष पटेल का हाथ है।   

फिर दोनों मन मसोसकर उठने लगे। तभी झब्बू बाहर आयी, और चिंता से भीगे स्वर में पूछा- क्या हुआ ?

धापू बागरन भी बाहर आकर देखने लगी कि कैसा शोर-शराबा ?

-भइया..यहाँ पीकर, उधम मत करा करो।  झब्बू ने धीरपई से कहा। 

-हमारे पीने  से तेरा जी कड़वा होता, तो जा कलाली हटवा दे।  दामू ने उपहास उड़ाते हुए कहा। दामू जानता था, गाँव में झब्बू के आगे-पीछे कोई बड़ा-बूढ़ा न था।

दामू और दया की निर्लज्जता, ढीटता चरम की ओर बढ़ने लगी। झब्बू ने चुप रहना ही ठीक समझा। श्यामू को भी फिर से ताव आने लगा। लेकिन झब्बू ने मामला ख़त्म करने की सोची। वह श्यामू की बाँह पकड़ती बोली- चल..भीतर चल इनके मुँह मत लग।

-भीतर चलने से क्या होगा झब्बू..! ये कुत्तरे हर आती-जाती को सूँघते। मैं कहती हूँ कि कुछ टाणी कर,  नी तो दाल रोटी से छेटी पड़ जायेगी !  श्यामू बड़बड़ाती हुई भीतर चली गयी। झब्बू ने उसे छादरी पर बैठायी, और पीने को पानी दिया।

दामू और दया वहीं जमे रहे। उनकी पहली अद्धी ख़ाली हो गयी। दामू ने ख़ाली बोतल को पीठ पीछे खाळ तरफ़ सन्ना दी, और दया दूसरी अद्धी खोलने लगा। किचिर्रर कर्र…।

नीम के पीछे खाळ किनारे। खाळ के सूखे हिस्से में। पुंवाड़लिये में, टमाटर, बैंगन के पौधो में, बबूल के पीछे। बेसरम में, जाल्यों, झाड़ी में,   अक्सर ख़ाली बोतल पड़ी मिल जाती। झोपड़े तरफ़ के छोटे बच्चे ख़ाली बोतलें ढूँढ़ते रहते। बच्चे बोतलें बेच चॉकलेट या बिस्किट खाने का बन्दोबस्त करते। उधर उस वक़्त भी दो लड़के बोतलें ढूँढ रहे थे। लड़के ग्यारह से बारह की उम्र के। दोनों नंगे पैर, साँवले और दुबले-पतले, और चड्डी-बनियान पहने।

दामू की फेंकी बोतल, दोनों के बीच गिरी। दोनों उसे हथियाने झपटे। एक ने बोतल का मुँह पकड़ा। दूसरे ने पैंदा पकड़ा। बोतल न पहला छोड़ने को तैयार। न दूसरा छोड़ने को राज़ी। थोड़ी खींच-तान हुई। फिर तू-तू, मैं-मैं होने लगी। पहले ने दूसरे को ग़ाली दी। दूसरे ने पहले को ग़ाली दी। पहले ने दूसरे की छाती पर धक्का मारा, और झटके से बोतल छुड़ा ली। दूसरा खाळ के सूखे हिस्से में गिरा। उसके हाथ पत्थर लग गया। पत्थर को मुट्ठी में भींच। हाथ को पीछे खींच। चेहरे पर ग़ुस्सा ला। पत्थर से पहले के भाल का निशाना साधा। पहला नीचे झुकता, एक बाजू हटा। पत्थर बबूल तरफ़ चला गया।

फिर पहले ने दूसरे को ग़ाली दी। उसे तत्क़ाल कोई पत्थर न सूझा। उसने वह बोतल ही फेंक कर मारी। दूसरा नीचे बैठ गया। बोतल जाकर दामू की भौंह पर लगी- ‘ फट्ट ’

दामू के हाथ से दारू का पैग छूटा। मुँह से ग़ाली छुटी। अपना कपाल हथेली से दाबने लगा। दया को सम्पट न पड़ी कि क्या हुआ..? वह बैठे-बैठे ही इधर-उधर देखता। ज़ोर से ग़ाली देता चीख़ा- कौन है रे तेरी माँ की..? सामने आ..।

फिर दया खड़ा हुआ। इधर-उधर देखने लगा। लेकिन खाळ में हिरण हो चुके लड़के, दया को नज़र न आये। दया और दामू के मन में संदेह ने कुंडली मारी, झब्बू या श्यामू के किसी चाहने वाले ने छुप कर हमला किया होगा ! दया चोट देखने लगा। दामू की भौंह के ऊपर की चमड़ी कट गयी। ख़ून निकलने लगा। दया और दामू चौगान तरफ़ बढ़ने लगे। दोनों ग़ालियाँ बकते, बाद में देख लेने की धमकी देते जाने लगे। 

झब्बू और श्यामू ने ग़ालियाँ, और हाप-हुप सुनी। लेकिन तुरंत बाहर न आयी। थोड़ा रुक कर आयी। लेकिन नीम नीचे कोई न दिखा। दया और दामू जा चुके थे। हाँ ! धापू अपने झोपड़े के बाहर खड़ी नज़र आयी। झब्बू ने सोचा, ‘ धापू को पूरी बात मालूम होगी। और पूछा- क्या हुआ..?

धापू उनके पास चली आयी। बताने लगी कि पता नी कैसे, क्या हुआ..!  मैं कलाली तरफ़ से आ री थी। क्या हुआ नी देखा। हाँ ! दामू को ख़ून निकलता देखा। पी के गिर पड़ा होगा ! या किसी से झगड़ लिया होगा ! राम जाने क्या हुआ ! दोनों बड़बड़ाते हुए चौगान तरफ़ गये।

फिर तीनों खड़ी देखने लगी। नीम नीचे की शान्ति। लुढ़की पड़ी दारू की ख़ाली बोतलें। आड़े पड़े गिलास। खुली पड़ी भुगड़े की पुड़िया। मोर, गिलहरी और कौआ आदि पार्टी मनाने लगे। खुली हवा में नीम की डालियाँ हिलने लगी। पत्तियाँ जैसे कुछ गुनगुनाने लगी।

-निकलने दे ख़ून… नाशमिटे के करम ही आकर माथे से टकराये होंगे…! उनसे झगड़ा कौन करेगा..! श्यामू ने लापरवाही से कहा।

-पर ऎसा कैसे चलेगा..? धापू ने कुछ सोचते हुए कहा। फिर सवालिया निगाह से झब्बू और श्यामू तरफ़ देखती बोली- कैसे भी करके कलाली का पाप काटना पड़ेगा।

-पर फिर भी कैसे धापू..? झब्बू ने चिंता और जिग्यासा भरे स्वर में पूछा- क्या कर सकती हैं अपन..?

-तू सोच झब्बू..। जैसे तू कहे वैसे..हम तेरे साथ है.. श्यामू ने कहा।

-हाँ.. पेपर तू बाँचती। टीवी तू देखती। कोई गली भी तू ही खोज..। धापू ने कहा, और फिर बोली कि हमारा क्या..? हम तो अंगूठा टेक..। तू कहेगी.. सूखे कुएँ में कूद जाओ… हम कूद जायेंगे।

कलाली जाम सिंह की। जाम सिंह के माथे पर राजा साब का हाथ। अपनी सारी समस्या की जड़ कलाली। गाँव में सरपँच भी तो जाम सिंह का बेटा। कलाली को हटवाने के बारे में सोचे भी, तो कैसे सोचे..? फिर भी जब कोई झब्बू से कहती- ‘ कुत्तरों की टाणी कर,  नी तो दाल रोटी से छेटी पड़ जायेगी। ’ या कहती- ‘ कैसे भी करके कलाली का पाप काट..।’ झब्बू नये सिरे से सोच में पड़ जाती-‘ क्या टाणी करूँ..? कैसे पाप काटूँ..! जाम सिंह से लड़ने-भिड़ने का मतलब, आत्महत्या करना। मैं कैलास के अहसास के साथ, उसके सपनों की ख़ातिर जीने आयी हूँ। पर झोपड़े में कैलास का अहसास ही न बचा। हर तरफ़, हर चीज़ में दारू की गँध। झोपड़े में रहूँ भी तो कैसे..? किवाड़ खोल बैठना तक मुश्किल..! बग़ैर कलाली हटे, पाप कैसे कटे ! ’

बात झब्बू के दिमाग़ में हिलग गयी। उठते-बैठते दिमाग़ में चलती। जैसे बात न थी, दिमाग़ के पतले और घने तारों में फँसी पतंग थी। ज़रा भी हवा चलती, पतंग फड़फड़ाती। धीरे-धीरे पतंग का फड़फड़ाना बढ़ता जाता। पतंग में लगी बाँस की कीमचियाँ चुभती। पतंग से झब्बू तंग आ गयी। पोलका, परकुल, पेटीकोट या कुछ भी सिलते वक़्त, यदि कुछ सोचती, तो सोचती कि पोलके की सिवन में, पेटीकोट की चीण में पतंग की फड़फड़ाहट सील दूँ। फड़फड़ाहट का शोर सील दूँ। सील दूँ..। सील दूँ..। भीतर उठती हुँकार का बीज। पर कैसे..? भीतर रह-रह वही बात गूँजती। ‘ झब्बू,  कुत्तरों की टाणी कर। कलाली का पाप काट..!

झब्बू यही-यही उधेड़ती-सिलती। जैसे कुछ और सिलना-उधेड़ना भूल गयी। फिर एक रात क्या हुआ ? झब्बू के बिस्तर पर काँटे उग आये। खजूर, करमंदी, बबूल के मज़बूत और बड़े-बड़े काँटे। धतुरे, बोर के छोटे-छोटे काँटे। काँटों पर करवट बदलने लगी। दिमाग़ में पतंग फड़फड़ाने लगी। तभी किसी ने किवाड़ की साँकल खड़खड़ायी। झब्बू ने काँटों की चुभन की सिसकी को रोकते हुए पूछा- कौन है..?

-मैं हूँ फूँदा..। फूँदा ने अपनी रुलायी को रोक कर कहा। मगर उसके स्वर से झब्बू समझ गयी कि फूँदा रो रही है। फूँदा धापू की पड़ोसन। भग्या की पत्नी। फ़िल्म अभिनेत्री नंदिता दास की तरह साँवली, और साधारण-सी क़द-काठी की थी। लेकिन आँखें, और नाक-नक़्श नंदिता से कुछ बेहतर था।

झब्बू ने जैसे ही किवाड़ खोला, घबरायी हुई फूँदा जल्दी से भीतर आ गयी। उसका पोलका फटा। साँवले चेहरे पर लाल-नीले चकते उभरे। भग्या ने दारू के नशे में उसे मारी-पीटी थी। एक बार, जब चँदा को उसके आदमी माँग्या ने पीटी थी। चँदा ने भी झब्बू के झोपड़े में ही शरण ली थी। जब भी कोई औरत को मार-पीट अपने झोपड़े से भगाता। औरत झब्बू के झोपड़े में ही आती। जैसे झब्बू का झोपड़ा, उसका घर नहीं, कोई सराय हो। फिर रात भर सिसक-सिसक कर अपनी व्यथा-कथा सुनाती। कलाली और दारूकुट्टे पति को कोसती। झब्बू तरफ़ उम्मीद से देखती। फिर वही-वही दोहराती, जो पहले भी कई औरतें दोहरा चुकी होती। झब्बू की नींद फाक्ता हो जाती। कभी बुदबुदाती कि डोकरा-डोकरी और भाई की ही बात मान लेती। ठीक रहता। मायके में रहती। दारूकुट्टों से परेशान तो न होती..!  बग़ैर कलाली हटे, पाप न कटे !  पर कलाली कैसे हटे..? मेरी कौन सुनेगा..? मैं क्या हूँ, जो कोई मेरी सुने भी..?

भले ही झब्बू को ख़ुद पर भरोसा न था। लेकिन अपनी पड़ोसनों पर था। एक दोपहर, झब्बू के साथ उसी के झोपड़े में, धापू और श्यामू भी बैठी थीं। तीनों की बातचीत का विषय और चिंता एक ही थी- कलाली। फिर तभी धापू तपाक से बोली- चलो.., फिर जाम सिंह के पास ही चलें..! कलाली उसकी, सरपँच उसका, तो उसी से बात करें..!

-हाँ.. वो भी है तो आदमी ही, नहार तो है नी, जो खा जायेगा..! श्यामू ने भी हिम्मत दिखायी।

-मगर उससे कहेंगे कैसे.. कि कलाली हटा लो..! झब्बू ने पूछा।

-ये तू जान…। क्या बात करेगी..? कैसे करेगी..? धापू ने कहा।

-पर तू जो करेगी,  हमे मंजूर होगा। श्यामू ने कहा।

-चलो फिर.. चलें..। अपनी दुःख-तकलीफ़ ही तो बतानी है ! झब्बू ने भी साहस करते कहा कि कौन-सी राज-काज की बातें करनी हैं..! या फिर गीत-भजन सुनाने हैं..!

जब तीनों जाम सिंह ठाकुर के घर सामने पहुँची। ठाकुर बुलैट पर कहीं से लौटा ही था। साथ में दुबे मास्टर भी था। ठाकुर बुलैट को स्टैण्ड पर टिकाने लगा। दुबे मास्टर स्कूल तरफ़ रवाना हो गया। जाम सिंह नाम का ही ठाकुर न था। ठाकुर जैसा था भी। कटारबँध मूँछें। भौंहें चौड़ी। आँखें खलनायक प्राण की आँखों की तरह बड़ी-बड़ी। गोल-गोल। यूकोलिप्टस के तने की तरह सुडोल और लंबा क़द। ठाकुरों वाले ही ठाट भी। दोपहर की धूप में कहीं से आया था। तानकी गरम थी। अधपके बालों में से पसीने की तीरपन गालों पर रिस रही थी। उसने अपने गले में लिपटा गुलाबी गमछा खींचा और पसीना पोछने लगा। पसीना पोंछते हुए ही उन तीनों तरफ़ देखा। पहले भौंहें उछाली। फिर गरदन उचकायी, जैसे पूछा कि ‘ क्या बात है..? ’

जाम सिंह ने उन्हें पहनावे से ही पहचान लिया था कि औरतें झोपड़ों तरफ़ की हैं।  अगर उनके चेहरों पर घूँघट न होते, तो उनके मन की  जान लेता मगर, तीनों के चेहरों पर घूँघट थे। फिर भी जाम सिंह ने श्यामू को डील-डोल से पहचान लिया, और मन ही मन अँदाज़ा लगाया- ‘ ढोलन कुछ माँगने-टुँगने आयी होगी ! झोपड़े वाले उसके दर पर, और क्यों आयेंगे..? ’

-क्यों ढोलन.. मुझे यूँ धूप में कब तक सेंकेगी..! कुछ बोल भी… क्या चाहिए..? जाम सिंह ने पूछा।

-बोलती क्यों नी है झब्बू..! बता न ! श्यामू ने कहा।

जाम सिंह के सामने झब्बू पहली बार आयी थी। वह भीतर ही भीतर छुई-मुई-सी सिमटी खड़ी थी। कुछ सोचती । कुछ मन ही मन तौलती। झब्बू के कुछ बोलने से पहले, जाम सिंह ने पूछा- ये कौन है ढोलन..?

-वो कैलास था न… सोसोसायटी में हम्माल.. उसकी लाड़ी है झब्बू..। श्यामू ने कहा।

-ठाकुर साब.. एक अरज़ है। झब्बू ने सधे किन्तु, विनम्र लहज़े में कहा, और आगे बताने लगी- मैं नीम सामने रहती हूँ। लोग सवेर-साँझ कुछ नी देखते। जब तब दारू पीते। बैराँ माणस को उल्टा-सीधा बोलते। आप कलाली को गाँव बाहर कहीं भी खोल लो..पर वाँ से हटा लो।

जब झब्बू बोल रही थी। तब जाम सिंह को याद आ रहा था। उसे कलाली का ठेका कितनी सेटिंग से मिला था ! महानगर के पंडिजी के साथ कितनी बार राजा साब के बंगले पर धौक दी। कलेक्टर, एस.पी. और आबकारी के किन-किन को भोग चढ़ाया। हालाँकि भाग-दौड़ से जो सम्बन्ध बने, उनकी बदौलत रेती, गिट्टी, मुरम की खदानों के ठेके भी मिले। लेकिन माखन और मुझे कितनी छाछ करनी पड़ी। तब जाकर ये मक्खन निकला।

-और ये बिना श्यान की जाने कहाँ से उठकर चली आयी ! कहती है कि कलाली हटवा लो..! मैं कोई दानी कर्ण हूँ !  समाज सुधारक हूँ !  जो कहूँ भूल हो गयी। दारू बुरी चीज़ ! चलो..समाज से ही हटवाते ! अरे गैलचौदी.. हटवानी होती तो लगाता ही क्यों..? जाम सिंह ने मन ही मन कहा और प्रकट में बोला- तू सुसाइटी क्यों नी हटवाती..! या वो खाळ हटवा, या उस पर पुलिया बनवा !

जाम सिंह का माथा ठनक उठा। अपनी मूँछ की तरह ही नुकीले शब्दों में उसका बोलना ज़ारी रहा-  ताकि फिर कोई ट्रेक्टर न पलटे। कोई विधवा न हो ! कैलास तो ट्रेक्टर पलटने से मरा था न ! दारू पीकर तो नी मरा ! जो मुँह उठा चली आयी, कलाली हटवा लो..! मालूम भी है..! कितनी झक मारनी पड़ती..! तब खुलती है कलाली..! ऎं..! 

-ट्रॉली पलटने से तो.. मेरी ही माँग उजड़ी..। दारू जाने कितनी औरतों की माँग उजाड़ेगी ! घर उजाड़ेगी ! झब्बू ने धीरज न खोया, और गुज़ारिश के लहज़े में ही कहा- जिन बच्चों की खेलने खाने की उमर है.. वे भी आड़े-छुपके पीने लगे। दूर रहेगी.. तो कम से कम बच्चे न बिगड़ेंगे। मैं सिलाई करती हूँ। मेरे याँ आने वाली बहू-बेटियाँ तानो-तिसनो से भी बचेगी..। 

-देख झब्बू… कलाली तेरी या मेरी मर्ज़ी से नी हटेगी…जाम सिंह ने सख़्त लहज़े  में कहा, और धमकाता बोला- दूबारा कलाली के बारे में मत आना।

-तो ये बता दो.. किसकी मर्ज़ी से.. और कैसे हटेगी..? झब्बू ने बेझिझक पूछा।

जाम सिंह की गाँव में धाक थी। यूँ समझ लो, खाल बासती। कोई भी उससे ऎसी बात न करता। झब्बू ने की, तो उसे मन में खुटका हुआ। हो सकता है कि संतोष पटेल ने इन औरतों के कान भरे हों..! वह गणपत का सरपँच बनना पचा न सका हो..! हरामी.. सामने मिलता.. तो काकाजी..काकाजी करता.... और पीठ पीछे अपनी रखैलों के ज़रिए चाल चलता..! वाह रे..लोमड़ी की औलाद !

जाम सिंह के मन में उपजी आशंका ने चिंता और झेंप के बीज डाल दिये थे। वह बीजों को अंकुरित होने और पेड़ बनने का मौक़ा नहीं दे सकता। वह तत्क़ाल रौंदने वाले अंदाज़ में बोला- वो तेरा खसम है न.. कलेक्टर ! उसके आदेश से हटेगी..। वो ज़िले में बैठता..। जा आदेश करा ला ।

झब्बू और साथिने लौट चली। उन्होंने देखा कि नीम की छाँव में माँग्या, और दो-तीन लोग दारू पी रहे। झब्बू और साथिनो ने उन्हें अनदेखा किया। झब्बू अपने झोपड़े का किवाड़ खोलने लगी। मगर माँग्या एक आदमी तरफ़ देख फुसफुसाया- जाने कहाँ से नेतागीरी करके लौटी है !

झब्बू और साथिनो ने न सुना। झब्बू ने छादरी बिछायी। साथिनो को पिलाने के लिए पानी लेने पनेहरी तरफ़ जाने लगी। धापू बोली- ले ज़रा टीवी का खटका दबा दे.. ।

झब्बू ने खटका दबाया। टीवी ने कहा- ‘ पोखरण में परीक्षण।’ और बिजली गुल हो गयी। टीवी बन्द। पँखा बन्द।

-कोढ़िया का मूत, उनाले ( गर्मी ) में तो लेण मत काटा कर। श्यामू ने कहा, और  साड़ी के पल्लू से अपने सीने, और चेहरे पर हवा करने लगी।

-दौणीफूटे कलेक्टर को कहाँ ढूँढेंगे…और जब  अपने गाँव के ठाकुर ने ही अपनी न सुनी… तो वो क्यों सुनेगा..? धापू ने पूछा।

-अब कहीं किसी के पास नी जाना अपन को.. झब्बू ने पानी का गिलास देते हुए कहा। उसके भीतर कुछ और पकने लगा था।

-तो फिर ये दारूकुट्टे…यूँज धींगा-मस्ती करते रहेंगे..? आती-जाती को छेड़ते रहेंगे..। धापू ने पूछा।

-एक तरक़ीब है। करके देखें.. शायद सबकी पक्की टाणी हो जाये..! झब्बू ने कहा।

-क्या..? श्यामू ने पूछा

-एक फ़िल्म देखी थी। जाँ सिलाई सीखने जाती थी वाँ।

-कैसी फ़िल्म..? श्यामू ने पूछा।

-दारू बन्दी पर…। झब्बू बताने लगी- उसमें औरतों ने..पूरे ज़िले में ..पूरे प्रदेश में दारू बन्द करा दी थी। रुपा ने भी फ़िल्म देखने के बाद.. अपने डोकरे की दारू छुड़ा दी थी। पर उसमें पूरे प्रदेश की औरतें इकट्ठी थीं। अपन तो तीन ही हैं..।

-तो क्या हुआ.. तीन औरतें पूरे प्रदेश की न सही... एक कलाली तो हटा सकती। श्यामू हिम्मत बंधाती बोली- तू तो तरक़ीब बता..!

-हाँ..और क्या.. ? और तीन ही क्यों..? पूरी बाखल की औरतें आ जायेंगी… धापू ने कहा- सभी तो जूते खाती हैं..!

-तो एक बार बाखल की औरतों से बात कर लें… सब राज़ी हों.. तो सवेरे ही कलाली का पाप काट दें..? झब्बू ने कहा।

-हो.. चलो पूछ लें.. श्यामू ने कहा।

उसी क्षण तीनों बाक़ी औरतों का मन टटोलने लगी। रात तक चँदा, फूँदा, रामरति, माँगी और पच्चीस-तीस औरतों ने हामी भर ली। बस..झब्बू को सुबह का इंतज़ार, और सुबह तो समय पर होनी ही थी। हुई भी। औरतें रोज़ के कामों से जल्दी ही फ़ारिग़ हो गयी। कलाली खुलने से पहले ही नीम नीचे जमा हो गयी। झब्बू भी तैयार थी। सबकी सब जाकर कलाली के किवाड़ सामने बैठ गयीं।

कलाली में काम करने वाले दो-तीन लोग भीतर सोते। एक-दो बाहर से आते। औरतों ने न भीतर वालों को, न बाहर वालों को कलाली खोलने दी। कलाली के भीतर फ़ारिग़ होने की व्यवस्था नहीं थी। कलाली वाले बाहर खाळ में या तालाब तरफ़ ही जाते। भीतर वाले भीतर दम साधे बैठे रहे। बाहर वालों ने ठाकुर के घर तरफ़ दौड़ लगायी।

जाम सिंह ख़बर सुन चौंक उठा, और बड़बड़ाया- एँ… स्साली.. बलाट्टी की ये हिम्मत..! चींटी हाथी का शिकार करने चली..!

ठाकुर के दोनों लड़के गणपत सिंह और अर्जुन सिंह भी वहीं थे। ख़बर सुन उनकी भी त्यौरियाँ चढ़ गयीं। गणपत सिंह ने फ़ोन कर माखन शुक्ला को भी ख़बर दी। ठाकुर लूँगी और बनियान पहने ही बैठा था। उसने बदन पर कुर्ता पहना, और पाँव में मोजड़ियाँ पहनता बोला- चलो.. देखते हैं..।

जाम सिंह दारू की भट्टी-सा धधकता पहुँचा, और  देखा, कलाली के सामने जितनी औरतें बैठी थीं, वो तो बैठी ही थीं। वहाँ बूढ़े, बच्चे और जवान भी खड़े देख रहे थे। दौलत पटेल का लड़का संतोष पटेल भी अपने चंगु-मंगुओं के साथ खड़ा। माखन शुक्ला भी आ गया। जाम सिंह के लौंड़े-लपाड़ी दया, दामू आदि भी जमा हो गये।

जाम सिंह समझाते हुए बोला-  देखो, मैंने कहा था ! कलाली कलेक्टर के आदेश से हटेगी..। आदेश करा लाओ.. हटा लेंगे…। कलाली सरकारी .. कोई बकरी नी.. जो चाहे जिधर हाँक दो..।

झब्बू धीरज भरे स्वर में घूँघट के पीछे से बोली- कलाली सरकारी .. नी खुलेगी तो… सरकार आवेगी खोलाने…। जब तक सरकार नी आवेगी… हम याँज बैठाँगा।

-काका आप बोलो… तो हम अभी कूल्हे बजा दें...। अर्जुन सिंह ने उतावला होते हुए माखन से कहा।

-पागल है क्या..? देख नी रहा, कितनी औरतें हैं। कितने लोग खड़े हैं… क़ायमी होगी, तो ये सब गवाह बनेंगे..! माखन ने डपटते हुए समझाया।

-मेरे को तो ये संतोष की कारस्तानी लग री… देखो.. कैसा हँस रहा। गणपत सिंह ने आशंका जताते हुए जाम सिंह से कहा।

-हाँ.. आज कल फूल छाप पार्टी के गायक विधायक के तलवे चाटने जाता है… तो ज़्यादा उड़ रहा है..। जाम सिंह ने कहा।

-क्या करें..?  जाम सिंह ने माखन तरफ़ भौंहे उछालते हुए पूछा।

-देखो.. कलाली सरकारी… पुलिस भी सरकारी… माखन धीमे स्वर में सुझाव देने लगा। जाम सिंह और गणपत सिंह गरदन हिलाते हुए सुनने लगे- थानेदार रमेश जाटव कब काम आयेगा…बुलाओ उसको..। दो-चार सिपइंयो को लेकर आयेगा। दारियों के पोंद पर सटके मारेगा… तो घाघरी ऊँची करती भागेगी..!

जाम सिंह ने गणपत सिंह तरफ़ देखा। गणपत सिंह भीड़ से एक तरफ़ गया। रमेश जाटव को मोबाइल फ़ोन लगाया। पूरी बात समझायी, और जल्दी बुलाया।

रमेश जाटव थाने पर ही था। जाम सिंह के मामले में लेत-लाली कैसे करता ? कभी सरकारी तनख्वाह में देर हो जाती। पर जाम सिंह ने जब से दारू का धंधा शुरू किया, कभी बंदी देर से न भेजी। रमेश जाटव ने थाना हाज़िरी में बैठे पुलिसवालों को जीप में बैठाला, और धरना स्थल पर आ धमका।

झब्बू और साथिनो से ख़ुद मुखातीब हुआ। उनकी बात सुनी। अपनी क़ाबिलियत के मुताबिक़ समझाने की कोशिश करने लगा। लेकिन झब्बू और साथिन न समझने को राज़ी। न हटने को तैयार। हर बात का एक ही जवाब- जब तक ये कलाली नी हटेगी, हम भी नी हटाँगा। न आज हटाँगा, न काल हटाँगा।

रमेश जाटव ने कहा- अगर कलाली से कोई दिक़्क़त है। कलेक्टर , एस.पी. को ग्यापन दो।

-हम न एस.पी. को जाने, न कलेक्टर को पेचाने..। झब्बू ने विनम्रता से कहा, और आगे बोली- जो याँ आयेगा… उससे हाथ जोड़ी के ये ही कहेंगे.. याँ से कलाली हटा लो… हटा ले तो ठीक… नी तो हम खोलने नी देंगे। 

-ये छिनालें यूँ मानने वाली नी है..। रमेश जाटव को एक तरफ़ ले जाकर जाम सिंह ने कहा- इनको सटके जमाओ अच्छे… तो अभी भैंसों की तरह चळक..चळक.. मूतती हुई भागेगी।

-ठाकुर साब बात तो ठीक है। पर मारने की कोई वजह तो हो। रमेश जाटव ने बेबसी जताते हुए कहा, और समझाता बोला- मैं जब से कोशिश कर रहा हूँ। औरतें हमारे साथ झूमा-झटकी करे। ग़ाली बके। पत्थर फेंके। हमारी वर्दी फाड़ दे। कुछ तो ऎसा करे ! हम इनको मारें..। ये तो मादर... सब राँडें हाथ जोड़ कर बात कर रही। मैंने एक-दो को धक्के मारे.. तो भी वे हाथ जोड़ती रही..। अब ऎसे में कैसे मारें..?

-फिर..? जाम सिंह ने पूछा।

-एस.पी., कलेक्टर को सूचना देनी पड़ेगी..! रमेश जाटव ने कहा।

-दे दो फिर…माखन शुक्ला ने कहा।

गाँव में जैसे-जैसे बात फैलने लगी। कलाली सामने दर्शकों की भीड़ भी बढ़ने लगी। कलाली के सामने चार गलियाँ आकर मिलती। एक गली वह-  जहाँ रमेश जाटव, जाम सिंह, माखन आदि खड़े बात कर रहे । दूसरी गली के मुँह पर रमेश जाटव के मातहत पुलिस वाले खड़े। दो गली के मुँह औरतों के धरने पर बैठने, और भीड़ के जमा होने से बन्द हो गये।

गाँव में किसी भी तरह का वह पहला धरना। सभी के लिए अजूबा। संतोष पटेल भी अपने चंगु-मंगुओं के साथ खड़ा ही था। वह कलाली के बायीं बाजू खड़ा था। वह श्यामू और झब्बू पर नज़र जमाये था। श्यामू तो उसकी पटी हुई थी ही। वह झब्बू की भी ताक में था। जब से झब्बू राँडी हुई, संतोष पटेल की उस पर नज़र थी।

झब्बू की बग़ल में धापू बैठी थी। धापू की लड़की छोटी थी। धापू उसे साथ नहीं लायी थी, सोचा था कि धूप में नन्हीं जान को लेकर कैसे बैठूँगी..?

वह लड़की को अपने आदमी नाथ्या के पास झोपड़े में ही छोड़ आयी। नाथ्या को मालूम नहीं। धापू कहाँ जा रही। जब काफ़ी देर तक धापू न लौटी। झोपड़े सामने नाथ्या ने भीड़ देखी। वह लड़की को गोदी में उठाये आ गया, और उधर ही खड़ा हो गया, जिधर संतोष पटेल खड़ा था।

वहाँ बैठी लगभग सभी औरतों ने घूँघट काढ़ा हुआ। धापू ने भी काढ़ा। पर नाथ्या की नज़रों से छुप न सकी। उसने लूगड़ी से पहचान लिया-  ‘ धापू तो औरतों में धरने पर बैठी ! ’

नाथ्या ने सोचा कि धापू को कैसे बुलाऊँ..? आँख मिले तो इशारा कर दूँ। पर उसकी आँख पर लूगड़ी का पर्दा पड़ा है।

नाथ्या को और कुछ न सूझा, केवल ये सूझा- लड़की को नाख़ून से चिमटी खोड़ लूँ। चिमटी खोड़ूँगा.., लड़की रोएगी। धापू उठ कर चली आयेगी।

नाथ्या लड़की की जाँघ में चिमटी खोड़ने लगा। कुछ महीने की मासूम लड़की रोने लगी। धापू ने लड़की का रोना सुना भी। घूँघट के पीछे से देखा भी, और सोचा कि लड़की को भूख नी है। मैं दूध पिलाकर आयी हूँ। फिर रो क्यों री ! उसका रोना भी भूख का रोना नी है !

तभी उसकी नज़रों ने नाथ्या को चिमटी खोड़ते पकड़ लिया। धापू का जी तोड़ाया। वह कुछ बड़बड़ायी भी। धापू की अस्पष्ट बड़बड़ाहट सुन झब्बू बोली- जा तेरी छोरी को ले ले…भूखी होगी..।

-वो भूखी नी है । मैं दूध पिला के आयी हूँ। वो साँड उसके पैर में चिमटी खोड़ रहा है। ताकि मैं उठ जाऊँ..! कहते हुए धापू ने दूसरी तरफ़ मुँह फेर लिया।

चँदा का आदमी माँग्या दाँत पिसता हुआ भीड़ में खड़ा था। माँग्या नज़रों से चँदा का घूँघट चीरने की कोशिश करता। मन ही मन बुदबुदाने लगा- आज झोपड़ा में आ, फिर नेतागिरी का भूत उतारता हूँ।

श्यामू का आदमी परबत ढोली। फूँदा का भग्या गारी। रामारति का जग्या भंगी भीड़ में न थे। उन्हें मालूम भी न था ।  कलाली के सामने क्या हो रहा..!  पर गाँव में ही, झोपड़ों की गलियों में ही थे।

परबत और भग्या तो बकरा-बकरी के पीछे उधर ही चले आ रहे। उन दोनों की आपस में अच्छी दोस्ती थी। दोनों रोज़ साथ-साथ बकरा-बकरी चराने जाते। सवेरे दस-साढ़े दस बजे बासी रोटी की सिरावणी-कलेवा कर जाते। साँझ को पाँच-साढ़े पाँच बजे तक लौटते। अँधेरा होने पर कलाली पर पीने जाते। उन दोनों का यही रुटिन था। कलाली पास खुल गयी, तो उन्हें जैसे आराम हो गया था।

रमेश जाटव, जाम सिंह, माखन आदि जहाँ खड़े थे। उसके सामने वाली गली में वे दोनों आ रहे थे। उनके आगे उनके बकरा-बकरी चल रहे। उस गली के कलाली तरफ़ के मुँह पर रमेश जाटव के मातहत पुलिस वाले खड़े थे। बकरा-बकरी उन्हीं तरफ़ बढ़ते आ रहे। दूर से पुलिस को देख भग्या फुसफुसाया- कलाली के सामने पुलिस क्यों खड़ी है..?

-उधर ही तो चल रहे.. देख लेंगे ..? परबत बोला।

जब बकरा-बकरी पुलिस वालों के नज़दीक पहुँचने वाले थे, तब सिपाही नत्थू लाल भदोरे गली में आगे बढ़ा। भग्या और परबत को माँ-बहन की ग़ालियाँ देने लगा। बकरा-बकरी को दूसरी तरफ़ से ले जाने का कहने लगा।  


(उपन्यास को आधार प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.)

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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