हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

औरंगजेब रहेगा लेकिन आप नहीं रहेंगे

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/13/2015 12:38:00 AM

कवि रंजीत वर्मा की कविताएं हमारे वक्त की राजनीति और समाज में मजबूत दखल हैं. एक बयान हैं. उन्होंने हाल के राजकाज पर यह कविता हाशिया के लिए भेजी है.

मैं खड़ा हूं औरंगजेब रोड पर
औरंगजेब की क्रूरता यहां कराहती है
तेज भागते हजार पहियों के नीचे
अब इन पहियों के नीचे
एपीजे अब्दुल कलाम की मृदुलता होगी
अब यहां मृदुलता की कराह सुनाई देगी

तो क्या अब इस बदली कराह से
तेज भागते पहियों को आराम मिलेगा
कोई गिरेगा कभी टकरा कर या फिसल कर
तो उसे चोट पहले से कम आएगी
क्या उसकी हड्डियां नहीं टूटेंगी
क्या भिखारियों को यहां
दूसरी सड़कों के मुकाबले ज्यादा भीख मिलेगी
क्या कलाम साहब के नाम
हो जाने से यह औरंगजेब रोड
किसी भटकते राही को अचानक रास्ता बताने लगेगा
क्या यहां अब कभी कोई वारदात नहीं होगी
क्या बच्चों के लिए यह
घास से भरे मैदान की तरह हो जाएगा
क्या औरंगजेब से सड़क छीन लिये जाने के बाद
समाज से कट्टरता खत्म हो जाएगी
तो क्या इस समाज में जो भी कट्टरता थी
वह सिर्फ इसलिए थी
कि दिल्ली में एक सड़क का नाम औरंगजेब रोड था
क्या एक सड़क पर से नाम मिटा देने भर से
सत्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध मिट जाएगा इतिहास से

उन्चास साल शासन करने के बाद
1707 में जब उसकी मृत्यु हुई
पूरी दुनिया की संपत्ति का पच्चीस प्रतिशत
अकेले औरंगजेब के शाही खजाने में था
फिर भी वह अपना खर्च राजकोष के पैसे से नहीं
बल्कि कुरआन लिख कर और टोपियां सिल कर चलाता था
यह थी कट्टरता उसकी
क्या यह कट्टरता वर्तमान निजाम दिखा सकता है
कभी चाय बेचते थे यह कोई बात नहीं
बात तो तब है जब वह आज भी चाय बेच कर
अपना खर्च चलाएं
सच पूछिए तो देश को ऐसे
राजनेताओं की जरूरत भी है
आखिरकार भारत एक गरीब मुल्क है
आज भारत सरकार के खजाने में
पूरी दुनिया के खजाने का पच्चीस प्रतिशत नहीं
एकाध प्रतिशत है मुश्किल से 

सवाल यह भी है कि
अगर किसी शासक के नाम पर कोई रोड हो सकता है
तो औरंगजेब के नाम पर क्यों नहीं
फिर भी अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो
जाहिर है कि इतिहास को लेकर आपका नजरिया सांप्रदायिक है
आप इतिहास को हिंदू और मुसलमान समझ रहे हैं
1925 के बाद जो पैदा की है आपने यह दृष्टि
वह औरंगजेब के दरबार में बैठे
पंडित जगन्नाथ के पास नहीं थी
वह तो पूरे इत्मीनान से
काव्यशास्त्र मीमांसा ‘रसगंगाधर’
साथ ही ’गंगालहरी’ ’लक्ष्मीलहरी’ ’अमृतलहरी’
और भी न जाने कितना कुछ रच रहे थे
फिर भी औरंगजेब के मन में उनकी हत्या करने का
विचार कभी आया तक नहीं
जबकि भाषा संस्कृति और विचार के मामले में
पंडित जगन्नाथ उलटी वाणी ही बोल रहे थे
आपके लोग कहां बर्दाश्त कर पाते हैं
अलग हट कर बोलने वालों को
हत्यारों की तरह पेश आते हैं वो ऐसे लोगों के साथ

अब्दुल कलाम निर्मम नहीं थे
इसलिए कि उन्हें निर्मम होने की जरूरत नहीं थी
लेकिन उनके द्वारा तैयार किया गया मिसाइल
बिना निर्मम हुए नहीं चलाया जा सकता है
औरंगजेब की आधी जिंदगी घोड़े पर बीती थी
साइकिल पर नहीं
उसके अंदर घोड़े की तरह खून दौड़ता था
और फिर हाथ में लहराती चमकती नंगी तलवार से
निर्ममता नहीं तो क्या करुणा टपकेगी
चाहे वह शिवाजी की तलवार हो या वह
लक्ष्मीबाई की ही तलवार क्यों न हो
निर्ममता और चपलता ही उन्हें दुश्मनों के वार से बचा सकती थी
मध्ययुगीन काल की राजनीति थी वह
अदालतें भी दरबार में ही लगती थी
फैसले वही सुनाता था
जिसकी तलवार के आगे कोई टिक नहीं पाता था
यानी कि वह जो सिंहासन पर बैठा होता था

संविधान की शपथ खाकर नहीं आया था
औरंगजेब शासन करने
न जनता के मताधिकार की कोई कल्पना थी उसके पास
मैग्नाकार्टा से वह पूरी तरह अनभिज्ञ था
जैसे उसका समकालीन शिवाजी अनभिज्ञ था
जैसे उसके समय की जनता अनभिज्ञ थी
मौलिक अधिकारों को तो खैर
औरंगजेब के मरने के बाद भी
ढाई सौ साल और इंतजार करना पड़ा
इस देश में आने के लिए
उस वक्त तो इन बातों को लेकर
कोई बहस भी नहीं चल रही थी जनपदों में
राजनीति सिर्फ राजा और उसके दरबार तक सीमित होती थी
बाहर षड्यंत्रों की कुछ खबरें ही होती थीं गप्प के लिए
जिनसे इतिहास के पन्ने रंग कर आपने
घोटाने की पूरी तैयारी कर रखी है स्कूलों में

औरंगजेब को जानना है तो
औरंगजेब के पास आपको जाना होगा
वह चल कर नहीं आएगा आपके पास सफाई देने

वह अपने भाइयों को मार कर पहुंचा था तख्त तक
नहीं मारता तो खुद मारा जाता अपने उन्हीं भाइयों के हाथों
लेकिन इस बात को याद रखिए कि
किसी दंगे में मासूमों को मार कर वह नहीं आया था
जैसा कि 2002 में किया आपने
न किसी मंदिर को गिरा कर पहुंचा था सत्ता तक
जैसे कि आप आए
बाबरी मस्जिद ढहाते हुए

मैं औरंगजेब के पक्ष में नहीं हूं
लेकिन रोड का नाम बदले जाने पर विचलित हूं

अपनी चौथी जन्म शताब्दी से सिर्फ तीन कदम दूर
औरंगजेब रोड पर दिखता है हमें औरंगजेब
टोपियां बेचता हुआ
लोगों को कुरआन की आयतें सुनाता हुआ
उसकी आवाज के पीछे
चार सौ साल की गहराई लिए
कोई तेज बवंडर सा आता सुनायी देता है हमें

आप सब चाहे एकतरफा वोट डाल दें
फिर भी आप औरंगजेब को इतिहास और स्मृति से
अपदस्थ नहीं कर सकते महोदय
आप किस रोड की बात कर रहे हैं
रोड तो कल भी रहेगा और उसके बाद भी
और औरंगजेब भी रहेगा
और हम भी रहेंगे पुकारने के लिए
बस आप कहीं नहीं होंगे महोदय

आपका समय इतना ही था
जैसे 1914 से 1919
प्रथम विश्वयुद्ध का समय
उसी तरह 2014 से 2019
आपका समय
इसके बाद आपका जाना तय है।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ औरंगजेब रहेगा लेकिन आप नहीं रहेंगे ”

  2. By Jaya Karki on September 13, 2015 at 4:05 PM

    Bahut marmik bahut historical, Bahut tathyapark aur bakhubi se nirbhik kabita hai . yek Ek kabi ki lalkar bhi hai aur bhabisyabani bhi.


    bahut bahut dhanyabad .phir bhi aisi hi kabita ki pratksya mein hun.


    Jaya karki
    Kathmandu
    Nepal

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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