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बीच सफ़हे की लड़ाई

कत्लेआम जब देशभक्ति बन जाए

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2015 07:30:00 PM


याकूब मेमन की अदालती आदेश से होने वाली हत्या के खिलाफ, लेखक और कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी की यह कविता दिखाती है, कि कैसे कानून और अदालतों के पूरे आडंबर के बीच, व्यवस्था कितनी हिंसक, बर्बर और मध्ययुगीन है.

‘फांसीवाद’ के दौर में एक कविता

अदालतें और हत्यारे
दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू
हत्यारे आवेशित हो कर करते हैं
हत्याएं
पर अदालतें बिलकुल भी नहीं
करतीं ऐसा
वे आवेशित नहीं होती
संपूर्ण शांति से
पूरी प्रक्रिया अपना कर
हर लेती हैं प्राण

दोनों ही करते है हत्याएं
हत्यारे-गैर कानूनी तरीके से
मारते हैं लोगों को
अदालतें कानूनन मारती हैं
सबकी सुनते दिखाई पड़ते हैं मी लार्ड
पर सुनते नहीं हैं
फिर अचानक अपने पेन की
निब तोड़ देते हैं
इससे पहले सिर्फ इतना भर कहते हैं
तमाम गवाहों और सबूतों के मद्देनज़र
ताजिराते हिन्द की दफा 302 के तहत
सो एंड सो को सजा-ए-मौत दी जाती है
मतलब यह कि नागरिकों को
मार डालने का हुक्म देती है
अदालतें
राज्य छीन सकता है
नागरिकों के प्राण
वैसे भी निरीह नागरिकों के प्राण
काम ही क्या आते हैं
सिवा वोट देने के?
अदालतें इंसाफ नहीं करतीं
अब सुनाती हैं सिर्फ फैसले
वह भी जनभावनाओं के मुताबिक
फिर अनसुनी रह जाती हैं दया याचिकाएं

हत्यारे, दुर्दांत हत्यारे,
सीरियल किलर, मर्डरर
सब फीके हैं,
न्याय के नाम पर होने वाले
कत्ल के आगे
फिर इस तरह के हर कत्लेआम को
देशभक्ति का जामा पहना दिया जाता है!

और अंध देशभक्त
नाचने लगते हैं
मरे हुए इंसानी जिस्मों पर
और जीत जाता है प्रचंड राष्ट्रवाद
इस तरह फासीवाद
फांसीवाद में तब्दील हो जाता है
और इसके बाद अदालतें तथा हत्यारे
फिर व्यस्त हो जाते हैं
क़ानूनी और गैर कानूनी कत्लों में।

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  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ कत्लेआम जब देशभक्ति बन जाए ”

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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