हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

असमानता की बढ़ती खाई के इशारे

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/09/2015 05:27:00 PM


डॉ. भारती

स्विट्जरलैंड के दावोस शहर में 21 से 24 जनवरी 2015 को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की वार्षिक बैठक सम्पन्न हुई। इस बैठक की खास बात यह थी कि जार्ज सोरोस जैसे अनोखे हेज फंडर, पॉल पोलमैन जैसे मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी एवं क्रिस्टीन लेगार्ड जैसे अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रंबध निदेशक, सब ने एक स्वर में विश्व में अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई पर फौरी चिन्ता प्रकट की।

अपने वाम विचारों के लिए प्रसिद्ध ब्रिटिश पत्रकार-लेखक श्यूमाश मिल्ने ने गार्जियन अखबार के अपने आलेख ‘इन दावोस, वरिंग एबाउट इनइक्वलिटी’ में इस दिखावे की चिन्ता की अच्छी खबर ली है। अपने आलेख में श्यूमाश मिल्ने ने आश्चर्यव्यक्त किया है कि ऐसी वैचारिकी के संचालक-अधिपतिगण अपने ही कृत्य के परिणामों पर चिन्ता व्यक्त कर रहे हैं, जिसके कारण मानवीय इतिहास में अमीरी-गरीबी के बीच अभूतपूर्व और खतरनाक खाई पैदा हो गई है। उनकी यह चिन्ता दिखावटी और अविश्वसनीय दिख रही है। अपने आलेख में मिल्ने ने स्पष्ट किया है कि दरअसल चैरिटी ऑक्सफैम नामक संस्था ने इस बढ़ती असमानता का विस्तृत खाका प्रस्तुत किया है। केवल अस्सी लोगों के पास दुनिया की आधी आबादी (साढ़े तीन अरब) की आमदनी के बराबर का धन एकत्रित हो गया है। पिछले वर्ष दुनिया की आबादी के मात्र एक प्रतिशत लोगो (पूंजीपतियों) ने विश्व की समस्त सम्पदा के 48 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा कर लिया जबकि एक वर्ष पूर्व यह केवल 44 प्रतिशत था। सम्पदा लूट की यही गति बनी रही तो आने वाले वर्षो में ये ‘सुपररिच’ एक प्रतिशत लोग 99 प्रतिशत विश्व सम्पदा को हथिया लेंगे। अमेरिका के 0.1 प्रतिशत सुपररिच की गति तो अन्य अपने समानधर्मियों के मुकाबले ज्यादा तेज है, 1980 से आजतक उन्होंने सम्पदा-लूट में अपनी हिस्सेदारी चौगुनी बढ़ा ली है।

सम्पदा-लूट की यह वही भयावह तस्वीर है जिसे पिछले तीस वर्षों में ‘मार्केट फन्डामेंटलिज्म’ ने गढ़ा है। आय और सम्पदा की असमानता ने राष्ट्रों की बीच और राष्ट्रों के भीतर आवाम के बीच गैर बराबरी की इस खाई को निरन्तर गहरा और चौड़ा किया है। 1981 ईस्वी से आज तक अफ्रीकी महादेश में 2 डॉलर प्रतिदिन की आय पर जीवन-यापन करने वाले लोगों की संख्या दुगुनी हो गई है।

पत्रकार मिल्ने इसे गहराई से रेखांकित किया है कि राष्ट्रीय आय में मजदूरों का हिस्सा निरन्तर घटता गया है। निजीकरण एवं श्रम कानूनों के बदलाव के इस दौर में मजदूरी की दर ठिठक गई है, जबकि धनी लोगों पर टैक्स की दरें घटाई जा रही हैं। वित्तीय पूँजी गरीबों की जेबों से धन सोख कर उसे चन्द हाथों में एकत्रित करती जा रही है। यह प्रक्रिया पूरी अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो रही है। इसके कारण न केवल अनैतिकता का बोध और जन असंतोष व्यापक हो रहा है बल्कि सामाजिक और पर्यावरण सम्बन्धी संघर्ष तीव्र हो रहे हैं, युद्ध, सामूहिक विस्थापन, राजनैतिक भ्रष्टाचार बढ़ते जा रहे हैं।

मिल्ने ने दो अपवादों का उल्लेख भी अपने आलेख में किया है। उनका मानना है कि लैटिन अमेरिका के प्रगतिशील वाम सरकारों ने आपदाकारी आर्थिक मॉडलों को खारिज करते हुए पूँजीपतियों के हाथों से संसाधनों को वापस ले लिया। नतीजन एक दशक से भी कम समय में 2 डॉलर प्रतिदिन की आय पर जीवन गुजारने वाले 108 मिलियन लोगों की संख्या घट कर 53 मिलियन रह गई। दूसरी ओर चीन ने बाजारवादी मॉडल को तो अपनाया किन्तु नवउदारवादी सिद्धान्तों के अधिकांश निर्देशों की उपेक्षा की। नतीजन असमानता तो बढ़ी किन्तु गरीबी की दलदल से बाहर निकलने वाली आबादी का प्रतिशत भी उल्लेखनीय रहा।

फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी की नवीनतम पुस्तक कैपिटल इन द ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी इधर काफी चर्चा में रही है। इस पुस्तक का मुख्य विषय भी असमानता है। पुस्तक में दर्शाया गया है कि पूँजीवाद का प्रत्येक मॉडल असमानताओं से अनिवार्य रूप से जुड़ा है। उनकी प्रमुख प्रस्तावना यह है कि मुक्त बाजार व्यवस्था की स्वभाविक प्रवृति सम्पदा के केन्द्रीकरण को बढ़ावा देने की ओर होती है क्योंकि सम्पति पर मिलने वाला प्रतिफल, आर्थिक संवृद्धि की दर से ऊँचा होता है। पिकेटी और उनके सहयोगियों ने उन सांख्यिकीय तकनीकों को प्रस्तुत किया है जिनके आधार पर सुदूर अतीत से लेकर अब तक आय और सम्पति के संकेन्द्रण का अनुमान लगाया जा सकता है। उनके अनुसार आने वाले समय में आय तथा धन की विषमता न केवल अर्थशास्त्रियों के लिए बल्कि राजनीतिज्ञों तथा विशेषकर जनतांत्रिक सरकारों के लिए भी खतरे की घंटी होगी।

विश्व बैंक के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और मुख्य अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्ज ने अपनी पुस्तक ग्लोबलाइजेशन एंड इट्स डिस्कंटेट्स में यही समझाने की कोशिश की है कि कैसे भूमण्डलीकरण और नवउदारवादी नीतियों ने लोगों, समुदायों और राष्ट्रों को हाशिये पर ला खड़ा किया है। इनका कहना है कि असमानता विकास को अस्थिर करती है और जीडीपी वृद्धि दर को मंदी की ओर धकेलती है। आर्थिक संवृद्धि की गति गैर-बराबरी को भी लगातार बढ़ा रही है। अपनी सरपट बढ़ती आमदनी के साथ अमीर लोग वैसी वस्तुओं की मांग करते हैं जो समाज के शेष लोगों की पहुँच से बाहर है। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था चुनींदा अमीरों को लाभ पहुँचाती है और अधिकांश सम्पति का केन्द्रीकरण चन्द अरबपतियों की मुट्ठियों में होता जा रहा है।

एक नहीं अनेक अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं कि देश के भीतर भी अमीरों और गरीबों की बीच खाई बहुत गहरी होती जा रही है। दक्षिण एशिया में असमानता से जुड़ी विश्व बैंक की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत में असामान्य तरीके से अरबपतियों की तादाद बढ़ी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) में अमीरों की सम्पति का योगदान 2012 में 12 प्रतिशत रहा जो समान विकास स्तर की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले ज्यादा था। इस लिहाज से वियतनाम में यह अनुपात दो फीसदी से भी कम है जबकि चीन का पाँच फीसदी तक है। अरबपतियों की बढ़ती आय के विपरीत सामाजिक संकेतकों (ह्यूमन डेवलपमेन्ट इन्डेक्स) के पैमाने पर भारत का प्रदर्शन बेहद खराब है।

हाल ही में वेल्थ-एक्स और यूवीएस ने वर्ल्ड अल्ट्रा वेल्थ नामक अपनी रिपोर्ट-2013 (विश्व अतिरेक सम्पति रिपोर्ट) जारी की।इस रिपोर्ट में दुनिया भर के अमीरों की सूची बनाई गई है। धनकुबेरों की इस गणना में भारत भी शिखर के दस में से छठवें स्थान पर जगह बनाने में सफल रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ मुम्बई में ही 30 अरबपति हैं। आईएमएफ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टीना लगार्दे ने भी डिंबलवी व्याख्यानमाला में बोलते हुए कहा कि भारत के अरबपतियों की अकूत सम्पति में पिछले पन्द्रह सालों में बारह गुना वृद्धि हुई है। इन मुट्ठी भर अमीरों के पास इतना पैसा है जिससे पूरे देश की गरीबी एक बार नहीं, दो बार मिटाई जा सकती है। (आतिफ रब्बा, ‘आर्थिक असमानता का बढ़ता दायरा’, समयान्तर, नवम्बर, 2014)

अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी का मानना है कि दरअसल, भारत जैसा विकासशील देश जब पूँजीवादी मॉडल को अपनाता है और ऊँची संवृद्धि और फटाफट औद्योगीकरण की दौर में शामिल होने की कोशिश करता है तो उनके पास विकल्प और भी सीमित होते हैं। विकास के नाम पर सरकार अपने ही नागरिकों की जमीन छीनकर निजी कंपनियों के हवाले करने लगती है। खनन, उद्योग और विशेष आर्थिक क्षेत्र कायम करने के लिए ऐसी कम्पनियों की लागत कम हो जाती है क्योंकि इन्हें लगभग मुफ्त में जमीन, पानी और संसाधन मिल जाते हैं। इस तरह उनके उत्पाद अन्तराष्ट्रीय बाजार में टिक सकते हैं। इन संसाधनों के जबरन हस्तान्तरण के जरिये आज भारत में निजी कम्पनियों की दौलत ताबरतोड़ बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि गरीबी से ग्रस्त इस देश में खतरनाक रफ्तार से अरबपति पैदा होते जा रहे हैं। (अमित, भादुड़ी, विकास का आतंक, पृ॰ 9)

असमानता की आर्थिक व्याख्या के अलावे इसे इसकी निरन्तरता के परिपे्रक्ष्य में भी देखना होगा। असमानता की निरन्तरता या इसका दुश्चक्र मजबूत होता है-सतत भूख की स्थिति बने रहने से, उचित आवास के अभाव होने से, बीमार होने पर स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ न मिल पाने से, विद्यालय न जा पाने और शिक्षित न हो पाने से, आजीविका के साधनों को अभाव, उत्पादन के साधनों पर हक न होने से, सामाजिक परिप्रेक्ष्य में शक्ति हीनता से, राजनीतिक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व न होने से तथा अवसरों के अभाव होने से ।

जाहिर है इन सारी समस्याओं पर और खास कर तेजी से बढ़ती असमानता पर घड़ियाली आंसू बहाने से कुछ नहीं होने वाला लैटिन अमेरिकी देशों और ग्रीस के हाल के चुनाव ने वैकल्पिक आर्थिक राजनीति की राह दिखाई है। अब इस राह की ओर न देखने का नाटक करने से पानी सर के ऊपर से निकल जायेगा।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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