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बीच सफ़हे की लड़ाई

सामाजिक वर्गों की पैदाइश और दूसरी कहानियां

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/16/2015 12:15:00 AM


 उरुग्वे में जन्मे और दुनिया भर में जन पक्षधर लेखक-पत्रकार के रूप में मशहूर एदुआर्दो गालेआनो के निधन के बाद उनके लेखन और जीवन के बारे में बहुत कुछ लिखा और पढ़ा जा रहा है. साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों में उनके जाने से एक तरह की उदासी है और कुछ देर की खामोशी, कि एक आवाज जो झूठ और फरेब के मलबे के बीच फावड़े की तरह अपना रास्ता बनाती थी और परचम की तरह गरदन ताने दुनिया का सफर करती थी, अब चुप हो गई. हालांकि उनके शब्द मौजूद हैं, और उन्हीं में से एक इंतखाब यहां पेश है. उनकी किताब एस्पेखोस: उना इस्तोरिया कासी उनिवेर्साल (आईने: करीब करीब हरेक की कहानी) से कुछ अध्याय. स्पेनिश से अनुवाद: रेयाज उल हक.

सामाजिक वर्गों की पैदाइश

शुरुआती दिनों में, भूख के उन दिनों में, पहली औरत मिट्टी कुरेद रही थी कि सूरज की किरनें  पीछे से आकर उसके भीतर दाखिल हो गईं. पल भर में ही, एक बच्चे का जन्म हुआ.

पचाकमाक देवता को सूरज की यह हरकत बिल्कुल पसंद नहीं आई और उसने अभी अभी पैदा हुए बच्चे के टुकड़े टुकड़े कर दिए. उस मरे हुए बच्चे में से पहले पौधे फूटे. दांतों से अनाज के दाने बने, हड्डियां युका बनीं, मांस आलू, यैम और स्क्वैश में तब्दील हुआ...

फिर तो सूरज को बहुत तेज गुस्सा आया. उसकी किरनों ने पेरु के तट को जला डाला और उसे हमेशा के लिए सूखा बना दिया. बदले की आखिरी हरकत के बतौर उसने मिट्टी में तीन अंडे फोड़े.

सुनहरे अंडे से मालिक पैदा हुए.
रुपहले अंडे से मालिकों की औरतें पैदा हुईं.
और तांबे के अंडे से वे पैदा हुए, जो मेहनत करते हैं.

गुलाम और मालिक

काकाओ को सूरज की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उसके पास अपना सूरज था.

उसकी भीतरी चमक से चॉकलेट का मजा और उससे मिलने वाली खुशी बनती थी.

बुलंदी पर रहनेवाले देवताओं ने गाढ़े रोगन पर कब्जा कर लिया और हम इंसान नादानी में रहने के लिए मजबूर कर दिए गए.

केत्जालकोआत्ल ने उसे तोल्तेक्स के लिए चुरा लिया. जब बाकी के देवता सो रहे थे, उसने कुछ बीज लिए और उन्हें अपनी दाढ़ी में छुपा लिया. फिर वो मकड़ी के जाल के एक बड़े से धागे से सहारे धरती पर उतरा और उन बीजों को उसने तुला शर में पेश किया.

केत्जालकोआत्ल के तोहफे को शहजादों, पुजारियों और जंगी सरदारों ने हड़प लिया.

उनकी पसंद को ही पसंद के लायक समझा गया.

और चूंकि जन्नत के मालिकों ने फानी इंसानों के लिए चॉकलेट को हराम ठहराया था, इसलिए धरती के मालिकों ने इसे आम इंसानों के लिए हराम बना दिया.

एक खतरनाक हथियार

तीस से ज्यादा देशों में रिवाज यह है कि (औरतों के यौनांग) क्लिटोरिस को काट कर हटा दिया जाए.

यह खतना पति को अपनी औरत या अपनी औरतों को अपनी जायदाद मानने के अधिकार की तस्दीक करता है.

औरतों का अंग काटने वाले यह कह कर इस जुर्म को जायज ठहराते हैं कि वे औरतों के मजे को पाक बना रहे हैं और वे बताते हैं कि क्लिटोरिस
 
एक जहरीला तीर है
बिच्छू का एक डंक है
दीमकों का खोता है
यह मर्दों को मार डालता है या उन्हें बीमार बनाता है
औरतों को उकसाता है
उनके दूध में जहर घोलता है
और उनकी प्यास को बुझने नहीं देता
और उन्हें पागल बना देता है

 
वे अपनी इस हरकत को जायज ठहराने के लिए पैगंबर मुहम्मद का हवाला देते हैं, जिन्होंने कभी इस मामले में कुछ नहीं कहा. वे कुरान का भी हवाला देते हैं, जबकि उसमें भी इसका कोई जिक्र तक नहीं है.

शैतान गरीब है

आज शहर एक बहुत बड़ी जेल हैं, जिसमें खौफ के कैदी रहते हैं, जहां मोर्चेबंदियों को घरों की शक्ल दी गई है और कपड़े बख्तरों की शक्लें हैं.

एक घेरेबंदी. अपना ध्यान भटकने मत दो, अपनी चौकसी को कभी ढीला मत पड़ने दो, कभी भरोसा मत करो, इस दुनिया के मालिक यह कहते हैं. बेधड़क मालिक जो आबोहवा से बलात्कार करते हैं, देशों को अगवा करते हैं, मजदूरियां छीन लेते हैं और सामूहिक जनसंहार करते हैं. वे चेतावनी देते हैं, खबरदार, बुरे लोग भरे पड़े हैं, बदनसीब झुग्गियों में ठसमठस, अपनी अदावत को अपने भीतर सुलगाते हुए, अपने जख्मों को बेकरारी से कुरदते हुए.

गरीब: हर तरह की गुलामी के लिए एक फटेहाल कंधा, सभी जंगों के लिए लाशें, सभी जेलों के लिए मांस, सभी नौकरियों के लिए मोलभाव के हाथ.

भूख, जो खामोशी से मारती जाती है, खामोश लोगों को भी मार डालती है. विशेषज्ञ उनके लिए बोलते हैं, गरीबी के माहिर, जो हमें बताते हैं कि गरीब क्या नहीं करते हैं, कि वे क्या नहीं खाते हैं, कि वे कितने वजनी नहीं हैं, कि वे किस बुलंदी तक नहीं पहुंच सकते, कि वे क्या नहीं सोचते, कि वे किन पार्टियों को वोट नहीं देते, कि वे किसमें यकीन नहीं करते.

अकेला सवाल, जिसका जवाब नहीं दिया जाता कि गरीब लोग गरीब क्यों हैं. क्या शायद ऐसा इसलिए है कि हम उनकी भूख पर पलते हैं और उनकी बेपर्दगी से अपना तन ढंकते हैं?

शासक और शासित

येरुशेलम का बाइबल कहता है कि बनी इस्राइल खुदा के चुने हुए लोग थे. वे खुदा की औलाद थे.
दूसरी आयत के मुताबिक, चुने हुए लोगों को राज करने के लिए दुनिया बख्शी गई थी:
मुझसे मांगो, और मैं विरासत में तुम्हें काफिर दूंगा, और तुम्हारी मिल्कियत में धरती का सबसे ऊपरी हिस्सा.

लेकिन बनी इस्राइल ने खुदा को बहुत नाराज किया, वे नाशुक्रे और गुनहगार थे. और अनेक धमकियों, बद्दुआओं और सजाओं के बाद खुदा का सब्र तमाम हुआ.

तब से दूसरे लोगों ने तोहफे पर दावा ठोंक रखा है.

सन 1900 में, संयुक्त राज्य के सीनेटर अलबर्ट बेवेरिज ने कहा: 'सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने चुने हुए लोगों के रूप में हमारी निशानदेही की है,  आगे से दुनिया को फिर से पैदा करने में रहनुमाई के लिए.'

मेहनत के बंटवारे की शुरुआत

कहते हैं कि यह राजा मनु थे, जिन्होंने भारत की जातियों को दैवीय बनाया.

उसके मुंह से पुरोहित पैदा हुए. उसकी बांहों से राजा और योद्धा. उसकी जांघों से व्यापारी. उसके पैरों से गुलाम और कारीगर.

और इस बुनियाद पर एक सामाजिक पिरामिड खड़ा हुआ, भारत में जिस पर तीन हजार से ज्यादा कहानियां हैं.

हरेक वहीं पैदा होता है, जहां उसे पैदा होना चाहिए. वही करने के लिए, जो उसे करना चाहिए. पालने में ही कब्र है, पैदाइश ही मंजिल है: हमारी जिंदगियां हमारी पहले की जिंदगियों का मुआवजा हैं या वाजिब सजा और यह विरासत ही हमारी जगह और हमारी भूमिका को तय करती है.

भटकावों को ठीक करने के लिए राजा मनु ने सिफारिश की: 'अगर निचली जाति का कोई इंसान पवित्र ग्रंथों के श्लोकों को सुन लेता है, तो उसके कानों में पिघला हुआ शीशा डाला जाए; और अगर वह उनका पाठ करता है, तो उसकी जीभ काट ली जाए.' ऐसी सीख अब चलन में नहीं है, लेकिन जो कोई भी अपनी जगह से हिलता-डुलता है, प्यार में, काम में, या चाहे जिस भी वजह से, वह सरेआम कोड़ों से पीटे जाने का जोखिम उठाता है, जिसका अंजाम उसे मुर्दा बना सकता है या वह बच भी गया तो मुर्दा ही ज्यादा बचता है.

जातिहीन (अवर्ण) लोग, हरेक पांच में से एक भारतीय, सबसे नीचे हैं. उन्हें 'अछूत' कहा जाता है, क्योंकि उनसे छूत फैलती है: वे घिनौनों में भी घिनौने हैं, वे दूसरों से बात नहीं कर सकते, उनके रास्तों पर चल नहीं सकते, उनका गिलास या प्लेटें नहीं छू सकते. कानून उनकी हिफाजत करता है, लेकिन हकीकत उन्हें छांट कर अलग करती है. मर्दों को कोई भी जलील कर सकता है, औरतों के साथ कोई भी बलात्कार कर सकता है, और सिर्फ तभी ये अछूत, छूने लायक बन जाते हैं.

2004 के आखिर में, जब सुनामी ने भारत के तटों पर रौंद डाला, वे मलबा और लाशें उठा रहे थे.

हमेशा की तरह.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ सामाजिक वर्गों की पैदाइश और दूसरी कहानियां ”

  2. By नताशा on April 16, 2015 at 10:45 AM

    वर्ण व्यवस्था के जहर का आस्वाद कराती हुई पोस्ट.. . सार्थक

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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