हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आप की शुरुआत और नया 'औजार'

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/10/2015 09:49:00 AM

 आनंद तेलतुंबड़े


आम आदमी पार्टी (आप) ने हालिया दिल्ली विधान सभा चुनावों में 95.71 फीसदी सीटों और 54.3 फीसदी लोकप्रिय वोटों को हासिल करके एक चुनावी इतिहास बनाया है. उसके पहले ऐसी तीन मिसालें रही हैं और सभी सिक्कम से हैं, जहां नर बहादुर भंडारी के नेतृत्व में सिक्किम संग्राम परिषद (एसएसपी), और पांच बार मुख्यमंत्री रहे पवन कुमार चामलिंग के सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसपीएफ) दोनों ने 1989 और 2009 में होने वाले चुनावों में क्रमश: सभी 32 सीटें जीती थीं और 2004 में एसडीएफ ने 96.9 फीसदी विधान सभा सीटों (32 में 31) पर जीत हासिल की थी. हालांकि ये आंकड़े इतिहास के रूप में ही अहम हैं,जबकि आप की जीत अनेक मायने में अनोखी है. पहली बात तो यह है कि अतीत में कोई भी पार्टी स्वच्छ शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के आधार पर चुनाव नहीं जीत पाई है. दूसरी बात है, बेहतर या तुलनात्मक रूप से चुनावी प्रदर्शन सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दों पर क्षेत्रीय दलों द्वारा ही आता रहा है, उनमें से कोई भी मुख्यधारा की सत्ताधारी पार्टी को ललकारा नहीं और स्थापित राजनीति के तौर-तरीकों को चुनौती नहीं दी. जिस संदर्भ में आप की जीत हुई है, वो असल में अनेक तरह से इसे अनोखा बनाता है. यह संदर्भ एक तरह से मोदी-शाह की जोड़ी द्वारा पिछले आम चुनावों के बाद छेड़े गए अश्वमेध का संदर्भ है, जिसने उन्हें पूरे देश भर में चुनाव दर चुनाव जिताया है और उन्हें अपराजेय के रूप में पेश किया है. एक के बाद एक मिल रही इन जीतों से पैदा हुई उद्दंडता ने उनके फासीवादी पंजों को नंगा कर दिया है और जनवाद पसंद लोगों के लिए दु:स्वप्नों की शुरुआत हुई है. यह डरावना तथ्य खौफनाक रूप में हकीकत बनने लगा है कि फासीवाद चुनावों के जरिए सत्ता में आता है लेकिन उसे चुनावों के जरिए खत्म नहीं किया जा सकता. यह वो भयावह संदर्भ है जिसमें आप की ऐतिहासिक जीत अनोखे रूप में अहम बन गई है.

यह स्वाभाविक है कि इस जीत पर जनता के ज्यादातर हिस्से ने खुशी जाहिर की. कम से कम 2014 के आम चुनावों में भाजपा को मिली 52 फीसदी सीटें महज 31 फीसदी वोटों से हासिल हुई थीं. वोटों का यह हिस्सा संसद में बहुमत हासिल करने वाली किसी भी दल के वोट फीसदी में सबसे कम है. इसके मायने यह हैं कि 69 फीसदी लोग, जो अब भी भाजपा के साथ नहीं हैं, वो आप की जीत का जश्न मनाएंगे. हालांकि आप की उम्मीद भरी जीत ने जो खुशी भरा उन्माद पैदा किया है, उससे हमें इस जीत को वस्तुगत रूप से समझ ने की जरूरत के प्रति अंधा नहीं हो जाना चाहिए और हमें इसे गंवा नहीं देना चाहिए कि इसके सकारात्मक और यथार्थवादी तथा साथ ही साथ नकारात्मक पहलू क्या हैं.

यह मोदी की हार है

दिल्ली के चुनाव एक सामान्य चुनाव हो सकते थे, लेकिन ये मोदी के शासन पर जनमत संग्रह के रूप में बदल गए. भाजपा ने दिल्ली पर कब्जा करने के लिए अपनी पूरी रणनीतिक ताकत झोंक दी. यह दीगर बात है कि इस प्रक्रिया में इसने एक के बाद एक भारी गलतियां कीं. मई 2014 में आम चुनावों में हासिल हुई जीत के बाद मोदी की बढ़ती हुई लहर पर सवार होकर भाजपा दिल्ली चुनावों की घोषणा कर सकती थी और तब इसके जीतने के मौके कहीं बेहतर थे. तब आप, लोगों के मन पर छाए गुस्से से नहीं उबर सकी थी और अपनी भारी भूल के बाद पूरी तरह बिखरी हुई थी जब उसने जनलोकपाल के मुद्दे पर बचकाने तरीके से सरकार से इस्तीफा दे दिया था, बिना संगठनात्मक समर्थन या संसाधनों के पूरे देश में लोकसभा चुनाव लड़ने की बेवकूफी की थी और वाराणसी में मोदी से टक्कर लेने की गुस्ताखी दिखाई थी. लेकिन तब भाजपा मौके की नहीं बल्कि अपनी जीत को मजबूत करने की चाह में थी. मोदी की आत्ममुग्धता ने उनको भरोसा दिला दिया था कि समय गुजरने के साथ वे मोदी के प्रदर्शन के साथ दिल्ली के मतदाताओं को आसानी से मोहित कर लेंगे. झारखंड, जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र में लगातार मिली जीतों के बाद, यह बात उनके दिमाग में बैठ गई थी कि वे अपराजेय हैं, हालांकि इन नतीजों में हालिया लोक सभा चुनावों की तुलना में उनका वोट प्रतिशत घटा था. उनका भरोसा सिर्फ और सिर्फ अपने सुपरस्टार मोदी के करिश्मे पर टिका हुआ था.

चुनावों की घोषना के बाद इसने आरएसएस के हजारों कैडरों के समर्थन से अपना ठोक-बजा कर बनाया हुआ प्रचार अभियान छेड़ा. जमीन खोखली होने के संकेत मिलते ही मोदी कैबिनेट के दिग्गजों को चुनाव के बारीक से बारीक प्रबंधन के लिए लगाया गया. और आखिरकार केजरीवाल जैसी एक छोटी सी मक्खी को कुचलने के लिए रौद्र रूप के साथ महायोद्धा भी दिल्ली में उतरा. मानो अपने अश्वमेध पर जोर डालने के लिए वह गरजा, ‘जो देश का मूड है वही दिल्ली का मूड है’, और तब उसे इसका जरा सा भी भान नहीं था कि यह बात पलट कर उसे नुकसान भी पहुंचा सकती है. भाजपा के तरकश में मौजूद मोदी, पैसा, कीचड़ उछालने की सियासत और बहुसंख्यकपरस्ती भी दिल्ली के मतदाताओं का दिल नहीं जीत सकी जिन्होंने इसे करारी मात दी और भाजपा को महज तीन सीटें ही हासिल हो सकीं. उसे लोकसभा चुनावों में 60 विधानसभा सीटों में हुई जीत में 95 फीसदी की गिरावट आई. वोटों में यह गिरावट 13 फीसदी है. चुनावों के दौरान आजमाए गए तरीकों में, जिसमें (अप)यश को छुपाने के लिए किरण बेदी को लाया जाना भी शामिल था और जिन्होंने अपनी बेवकूफी से भाजपा के विनाश में सिर्फ इजाफा ही किया, लेकिन यह साफ था कि मोदी दिल्ली में भाजपा के अभियान का चेहरा थे. भाजपा की हार उसको मिली सजा थी कि उसने गरीबों के साथ होने का ढोंग किया जबकि वह कॉरपोरेट दुनिया की सेवा करती रही और इसके लिए उसने अध्यादेशों जैसे कदमों की मदद भी ली जिन पर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं. यह मोदी के लिए एक सजा थी, कि वे उनके सत्ता में आने के बाद से छुट्टा घूम रहे किताब जलाने वालों, फिल्मों पर तोड़-फोड़ करने वालों और धार्मिक नफरत फैलाने वालों पर खामोशी साधे हुए उनका साथ देते रहे.

एक नवउदारवादी शुरुआत

आप की इस हैरान कर देने वाली कामयाबी के पीछे क्या राज है? यहां तक कि 2013 के अपने पहले चुनाव में भी उसने सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर और कांग्रेस के बिन मांगे समर्थन पर सरकार बना कर अनेक राजनीतिक जानकारों को हैरान कर दिया था. इसने राजनीतिक व्यवहार के प्रदर्शन में कोई गलती नहीं की. मीडिया और मध्य वर्ग इसकी अनेक कार्रवाइयों को समझने में नाकाम रहे लेकिन पार्टी ने साधारण जनता की कल्पना को अपनी तरफ खींचा. पहले वाला समूह जहां पुलिस के खिलाफ केजरीवाल के विरोध प्रदर्शनों को अराजकतावादी कह कर खारिज करता रहा, साधारण जनता के लिए यह देख कर अच्छा लगा कि एक मुख्यमंत्री सड़क पर सो रहा है, दिल्ली की ठिठुराने वाली सर्दी को चुनौती देते हुए उस पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है, जो राज्य का सबसे शैतानी चेहरा है. अपनी सियासी शुरुआत के बतौर यह जिस अशांतिकारक विचार का प्रतिनिधित्व करती थी, वह उस पर कायम रही. लेकिन जल्दी ही इसने सारी सहानुभूति खो दी, जब उसने साउथ ब्लॉक पर नजरें गड़ाते हुए इस्तीफा दे दिया. सियासत के बाजार में जमे-जमाए धाकड़ खिलाड़ियों से लोहा लेने में इसने गंभीर रूप से गलत दांव चले. लड़ाई से यह इस कदर जख्मी होकर बाहर निकली कि अनेक माहिर लोगों ने इसके फिर से उभर पाने की काबिलियत को ही खारिज कर दिया. लेकिन शुरुआत की शानदार फुर्ती के साथ, इसने खुद को फिर से संगठित किया, अपने ग्राहकों से अपनी गलती के लिए साफ-साफ माफी मांगी, उत्सुकता के साथ उन्हें सुना और उनके सुर में अपना सुर मिलाने के लिए अपनी मांगों को सुधारा. बेशक उसे इसमें मोदी के कुशासन और उनके दोस्तों की गंदी हरकतों के खिलाफ बढ़ रहे गुस्से ने भी मदद की.

असल में आप की शुरुआत काफी हद तक एक तकनीकी शुरुआत जैसी है जो स्थापित दिग्गजों को अपने कुशल कारोबारी मॉडल, फुर्तीलेपन और नई-नई चीजों को खोज निकालने की महारत के साथ कड़ी टक्कर देती है. हमारे महानगरों की आत्म-विश्वासी नवउदारवादी पीढ़ी ऐसी किसी चीज की इच्छा कर रही थी,, जिसको एक महाशक्ति के रूप में भारत की अनंत कुशलता पर भरोसा है, और जिन्हें लगता है कि पिछड़ चुके, भ्रष्ट और नाकाबिल राजनेता इसमें रुकावट डाल रहे हैं. इसीलिए वे देश को जन लोकपाल जैसे संस्थान के जरिए भ्रष्टाचार से मुक्त करने के विरोध प्रदर्शन में वे उत्साह से कूद पड़े, जिसे अन्ना हजारे जैसे एक छुटभैए नैतिक सनकी के चेहरे की मदद से शुरू किया गया था. अपने इस कामयाब बाजार की परख (टेस्ट मार्केटिंग) के साथ आप ने एक राजनीति-विरोधी राजनीतिक उद्यम के रूप में शुरुआत की. यह फौरन विचारधारा विहीन आदर्शवादियों की चहेती बन गई. नए विचारों की हिमायत में विचारधारा के बोझ को खारिज करना इस उत्तर-विचारधारात्मक युग में कारगर हो सकता है लेकिन इसमें पुराने गड्ढे में फिसल कर गिर जाने का भी खतरा है. जो भी हो, विचारधारा का ढोल पीटने के बावजूद सभी पुराने खिलाड़ियों में से किसी के पास भी कोई विचारधारा नहीं थी और सिर्फ मुफ्त में चीजें बांटने की बात करने वाले गरीब परस्ती और बहुसंख्यकवादी अपीलें ही काम करती आई थीं. बदकिस्मती से, आप इस सिलसिले को पलटती हुई नहीं दिखती.

आगे बढ़ने के विचार

शुरुआत करने से पहले सबसे बड़ी चुनौती आगे बढ़ने की या फिर बड़ी मछली द्वारा निगल लिए जाने की होती है. याद रखिए कि माइक्रोसॉफ्ट ने नेस्केप के साथ क्या किया. इन विचारों के अभाव में शुरुआतें आखिर में व्यापारी पूंजीपतियों और प्रमोटरों की तिजोरियां भरने के काम आती हैं.

अपने घोषणापत्र में आप ने दिल्ली के लिए 70सूत्री कार्ययोजना का वादा किया है, जिनके बारे में बताया जा रहा है कि उन्हें जनता के साथ सलाह-मशविरा करने के बाद बनाया गया है. उनमें से अनेक में भारी खर्च होगा, इसके अलावा केंद्र में संभावित विरोधियों और दिल्ली राज्य के भीतर घटकों के साथ सियासी लड़ाई की जरूरत पड़ेगी. जैसा कि एक अर्थशास्त्री (अशोक लाहिड़ी, इंडिया टुडे, 23 फरवरी 2015) ने बहुत सतर्क रूप से संकेत किया है, पांच बरसों के लिए वित्तीय खर्च 69,000 करोड़ या 13,800 करोड़ रुपए प्रति वर्ष होगा. यह दिल्ली के बजट का एक तिहाई है जिसका आधा वेतन और रख-रखाव में खर्च होता रहा है. संसाधनों में इतनी गहरी खाई है कि उन्हें कम करके नहीं देखा जा सकता. इसमें संदेह नहीं है कि आप इस योजना को लागू करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी, क्योंकि उसे पता है कि वह इस बार कोई चूक नहीं कर सकती. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भाजपा आप के फीके वादों को निचोड़े बिना उसको इतनी आसानी से यश का भागी नहीं बनने दे सकती. चीजें कैसे रंग लाएंगी, यह देखना बाकी है. ये सुधारात्मक कदम जरूरी हो सकते हैं, लेकिन वे गुणात्मक रूप से उन कदमों जैसे ही हैं, जो पुरानी पार्टियां हर वक्त करती आई हैं. यकीनन, आगे बढ़ने के लिए यह कोई सही खयाल नहीं है.

अपनी साख को खोए बिना आगे बढ़ने का सबसे कारगर तरीका, जनता के लिए एक नए जनवादी आदर्श की रचना करना है. वीआईपी संस्कृति और मोहल्ला समितियों में सत्ता के विकेंद्रीकरण को खत्म करने जैसे विचार आप के एजेंडे में पहले से ही रहे हैं. उनको नव-उदारवादी आदर्शों से परे, उनके गहरे मर्म तक ले जाने की जरूरत है. जनवाद का मर्म इसमें है कि मूल्यों के बंटवारे में जनता के बीच भेदभाव किया जाए और जनता के अलग अलग हिस्से को अलग अलग मूल्य दिए जाएं चाहे वो राष्ट्रपति हो या प्रधान मंत्री या कोई और. उनकी जिंदगियां एक सफाईकर्मी (मैला ढोनेवाले) या गांव के स्कूल टीचर से ज्यादा अहम नहीं हैं. जनवाद की एक दूसरी और शायद सबसे बड़ी दुश्मन शख्सियतों की पूजा (व्यक्तित्व पूजा) है, जो सभी गैर-जनवादी दस्तूरों और रिवाजों की जड़ है. आप को अरविंद केजरीवाल के इर्द-गिर्द बुनी जा रही शख्सियत को रोकना चाहिए. कहा जाता है कि चीन के देंग जियाओ पिंग की तरह वे भी बिल्लियों का रंग जानने में रुचि नहीं रखते, कि वे सफेद हैं या काली, जब तक वे चूहे पकड़ रही हैं. अच्छा हो या बुरा, उन्हें वाजिब तरीके से याद दिलाया जाना चाहिए कि देंग की सबसे बड़ी अच्छाई ये थी कि उसने अपने इर्द-गिर्द व्यक्ति पूजा को पनपने नहीं दिया. उसने माओ द्वारा किए गए कामों को पलटते हुए भी माओ को एक पूजनीय शख्सियत के रूप में बने रहने दिया.
 

अनुवाद- रेयाज उल हक

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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