हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

फांसी की सजा का औचित्य और उसका सामाजिक संदर्भ

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/16/2015 12:30:00 PM

7 जनवरी 2015, नयी दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान सभागार में 'सबके लिए समान न्याय: सन्दर्भ सुरेन्द्र कोली को दिया गया मृत्यु-दंड (इक्वलिटि बिफोर लॉ :रेफरेंस सुरेन्द्र कोलीज डैथ सेंटेंस) विषय पर आयोजित विचार-गोष्ठी की प्रस्तावना में प्रकाश चौधरी ने कहा कि क्या ये महज संयोग ही है कि आजाद भारत में जिन्हें मृत्युदंड की सजा दी गयी वे लगभग सभी समाज के सबसे निचले हिस्से के लोग रहे हैं। आज भी जेलों में बंद दो तिहाई से ज्यादा लोग समाज के इसी हिस्से से आते हैं। मृत्यु दंड की सजा पाए लगभग सभी लोग गरीब, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। इसी तरह की विडंबना निठारी कांड से जुड़ी है जिसमें एक दलित घरेलू नौकर को फांसी चढ़ाए जाने की पूरी तैयारी हो चुकी है। सवाल है क्या इससे निठारी की उस पीडि़त जनता को जिसके बच्चे गायब हुए हैं, न्याय मिल पायेगा, जबकि उस इलाके में बच्चों, महिलाओं का गायब होना बदस्तूर जारी है?

कथाकार पंकज बिष्ट, ने भारत सरकार के महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा भारत सरकार की संयुक्त सचिव मंजुला कृष्णन की अध्यक्षता में बनायी निठारी कांड जांच समिति की 2007 में दी गई रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि- कमेटी ने अपनी 35 पृष्ठ की रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि इस मामले की मानव अंगों के अवैध व्यापार की दृष्टि से जांच होनी चाहिए। रिपोर्ट में पोस्टमार्टम करनेवाले नोएडा के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डा. विनोद कुमार के हवाले से यह भी कहा गया है कि जो भी हड्डियां व अन्य अवशेष पाए गए हैं उनसे साफ नजर आता है कि हत्याएं सर्जिकल औजारों से बड़ी सफाई से की गई हैं। सभी शरीरों के धड़ का हिस्सा गायब है। डाक्टर ने स्पष्ट कहा कि नरभक्षण मात्र आड़ है, यह मामला मानव अंगों के व्यापार का लगता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह मामला अपनी भौगोलिक सीमाओं में यहीं तक सीमित नहीं है। इससे मानव अंगों के अवैध व्यापार के अलावा बंधुआ मजदूरी और वेश्यावृत्ति के लिए भी बच्चों के अपहरण की गंध आती है। आश्चर्य यह है कि इसके बावजूद पुलिस ने इस गंभीर मसले पर ध्यान नहीं दिया। जबकि इससे पहले भी उस इलाके में गुर्दे निकालने की घटनाएं हो चुकी थीं और एक नर्सिंग होम के कुछ डाक्टरों की गिरफ्तारी भी हुई थी। महिला व बाल कल्याण मंत्रालय की इस कमेटी में कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे।

पर पुलिस और सीबीआई ने इस पक्ष की जरा भी छानबीन करने के बजाय एक अविश्वसनीय कहानी को आधार बनाया और इस तरह से इतने गंभीर मामले को एक व्यक्ति की कथित अपराधिक प्रवृत्ति से जोड़कर खत्म कर दिया और न्यायालयों ने सुरेन्द्र कोली को दोषी करार दिया। कोली को नरभक्षी बताने के पीछे मंशा यह रही लगती है कि कटे हुए मानव अवशेषों की ओर से ध्यान ही हट जाए। बिष्ट ने कहा कि भारत में मानव अंगों के बढ़ते अवैध व्यापार पर अमेरिकी पत्रकार ने द रेड मार्केट नाम की एक किताब तक लिखी है।

उन्होंने कहा कि इस प्रसंग का वृहत्तर समाजिक पहलू भी है। बिहार, बंगाल, झारखण्ड, उत्तराखंड आदि गरीब और पिछड़े राज्यों से बड़ी संख्या में लोग देश के समृद्ध इलाकों में छोटी-मोटी नौकरी की तलाश में आते हैं। उनके साथ कई तरह के अमानवीय व्यवहार के रोज समाचार देखने को मिलते हैं। यही नहीं मालिकों द्वारा किए गए अपराधों को नौकरों के सर मढ़ कर उन्हें जेल तक भेजा जाता रहा है। इसलिए जिस तरह से सुरेन्द्र कोली को फंसाया गया है वह कोई अजूबा नहीं माना जाना चाहिए। सुरेन्द्र कोली का मामला अंतत: उन गरीब लोगों का मामला है जो छोटी मोटी नौकरियां करने आते हैं और जिन्हें किसी भी तरह की कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। ना ही न्याय मिल पाता है।

पंकज बिष्ट ने कहा कि यह उत्साहवर्धक है कि लोग अब इस मामले को ज्यादा विवेकपूर्ण तरीके से ले रहे हैं। जहां पहले सुरेन्द्र कोली के गांव के इलाके में उस के पूरे परिवार का बहिष्कार किया हुआ था अब वही लोग मांग कर रहे हैं कि उसकी फांसी की सजा को माफ किया जाए और मामले की नये सिरे से जांच की जाए। कम से कम तब तक तो उसकी मृत्युदंड की सजा को तत्काल रोका जाए जब तक कि इस मामले में चल रहे अन्य 15 मुकदमों, जिनमें वह सह अभिव्यक्त है, का फैसला नहीं हो जाता। इस मांग को लेकर अल्मोड़ा जिले के पश्चिमी अंचल के इलाके के, जहां का सुरेन्द्र कोली रहनेवाला है, विभिन्न गांवों के लगभग आठ सौ लोगों ने इस याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं।

उल्लेखनीय है कि 14 वर्ष की रिंपा हलदर की, जो कि पिछले दशक के शुरू में निठारी (नोएडा, उत्तर प्रदेश) से गायब हुए कई बच्चों में से थी, हत्या के लिए सुरेंद्र कोली को फांसी की सजा दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उसकी मृत्युदंड की सजा पर पुनर्विचार की अपील को खारिज कर दिया था। इस संदर्भ में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि 2007 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक रिंपा अपने प्रेमी के साथ नेपाल चली गई थी और वह वहीं बस गई है।
जहाँ तक मृत्युदंड का प्रश्न है यह अपने आप में एक सभ्य आधुनिक समाज के बजाय बर्बरता का प्रतीक है और हमारे समाज में तो यह सरासर अन्याय का प्रतीक भी बन गया है। अंग्रेजी पत्रिका 'आउटलुक' में पिछले दिनों छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक जितने भी लोग इस समय मृत्युदंड की सजा पाए हुए हैं उन में से शतप्रशित मामलों में एक भी प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है। सब को परिस्थितिगत साक्षों के आधार पर सजा दी गई है।

सर्वोच्च न्यायालय के वकील रवीन्द्र सिंह गडिय़ा ने मृत्यु दंड पर कानूनी स्थिति, आपराधिक जांच की खामियों, अधीनस्थ न्यायपालिका की विवशता आदि की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि कोली ने दिल्ली में मजिस्ट्रेट के आगे दिए बयान में अपना अपराध माना है। लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पुलिस ने उसे प्रताडि़त कर फलां-फलां बातें याद करने को कहा। उन्होंने दावा किया कि मजिस्ट्रेट के आगे दिए बयान के अलावा कोई ऐसा सबूत नहीं है जिसके आधार पर उसे दोषी करार दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के सामने सुरेन्द्र कोली की मृत्युदंड की सजा पर पुनर्विचार करने की अपील के संदर्भ में बतलाया कि किस तरह से सर्वोच्च न्यायालय ने राम जेठमलानी की दलील को मानते हुए भी कि इस मामले में ठीक से जांच नहीं हुई है, मृत्यु दंड की सजा पर पुनर्विचार करने से मना कर दिया। न्यायालय ने कहा कि वह आदेश देगा कि भविष्य में ऐसा न हो। आश्चर्य यह है कि उसने इस पर कोई विचार करने की जरूरत नहीं समझी कि उसके इस निर्णय से एक निर्दोष फांसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा।

एपवा की सचिव कविता कृष्णन ने कहा कि निठारी क्षेत्र बंगाली मजदूरों के परिवारों का इलाका है जहां पर आज भी महिलाओं और बच्चों का गायब होना जारी है। यदि सही अपराधी जेल में है तो फिर ये घटनाएं क्यों हो रही हैं? निठारी कांड के पंद्रह और मामले कोर्ट में हैं जिनमें सुरेन्द्र कोली भी अभियुक्त है। कविता कृष्णन ने कहा कि इंसानियत के पक्ष में कुछ बातों को बोलने-कहने की जरूरत है। अभी मुझसे कुछ चैनलों के पत्रकार पूछ रहे थे कि वह निर्दोष है? मैंने कहा, हमें पूछना चाहिए कि क्या यही एकमात्र दोषी है? दोषी है या नहीं, यह पूछने के लिए भी निठारी मामले में कई सवाल हैं। सवाल है कि क्या कोली ने कोई सर्जरी सीखी थी? यह अंग व्यापार का मामला था या नहीं? क्या कोली के आने से पहले बच्चे गायब हो रहे थे? क्या उसके बाद भी हो रहे हैं? उन्होंने पूछा कि आज भी वहां बच्चे क्यों गायब हो रहे हैं? कविता ने कहा कि निठारी मामले में न्याय यह है कि सत्य तक पहुंचे बिना उसे फांसी पर न चढ़ाया जाए। यदि उसके अपराधी होने में रत्ती-भर की भी शंका है तो मामले की फिर जांच होनी चाहिए, क्योंकि मृत्युदंड ऐसी सजा है जिसे फिर वापस नहीं लिया जा सकता। निठारी में जिन बच्चों-महिलाओं की हत्या हुयी है उन परिवारों को न्याय मिलाना ही चाहिए। इसीलिये हमने महिला संगठनों की ओर से राष्ट्रपति के नाम एक अपील तैयार की है जिसमें सुरेन्द्र कोली की फांसी को निठारी के अन्य पंद्रह मामलों में निर्णय आने तक रोकने की मांग है।

वरिष्ठ हिंदी लेखक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर गंगाप्रसाद विमल ने कहा कि जिस एजेंसी को जांच सौंपी उसने लीपापोती की, ऐसा इस मामले से स्पष्ट होता है। कुछ चीजें छूट गईं। घरेलू नौकर मानव अंगों को इतने सटीक तरीके से कैसे निकाल सकता है ?
सुप्रसिद्ध पत्रकार रामशरण जोशी ने प्रश्न उठाया कि यदि कोली कोई करोड़पति होता तो क्या उसे ये सजा मिलती ?

नौकरशाह से सामाजिक कार्यकर्ता बने हर्ष मंदर ने दावा किया कि जिस आधार पर यह फैसला (कोली को फांसी दिए जाने का) किया गया वह बहुत ही कमजोर है। उन्होंने कहा- मैंने पूरे बयान का ट्रांसक्रिप्ट पढ़ा। उस व्यक्ति को क्या डॉक्टर की जरूरत है, यह भी समाज को सोचना चाहिए। उन्होंने कहा बहुत सारे कारण हैं कि वह निर्दोष हो। तब उसे सजा नहीं होनी चाहिए। अगर वह दोषी है तो भी क्या हम यह समझते हैं कि उसे फांसी की सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह फैसला तय करेगा कि हम किस तरह का समाज चाहते हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया के बहुत सारे देशों में फांसी की सजा को बंद कर दिया गया है। फांसी की सजा बंद किए जाने के बाद वहां अपराध बढ़े, ऐसा कोई तथ्य नहीं है। हर्ष मंदर ने कहा कि अपराध सिद्ध भी हो जाए तो फांसी नहीं होनी चाहिए यह मानवीय समाज की मांग होनी चाहिए।

अंत में पंकज बिष्ट ने श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए कहा कि देश के प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं ने निठारी कांड और सुरेन्द्र कोली के मामले में पूरी गंभीरता से कई तथ्य सामने रखे हैं और रख रहे हैं, मगर एक भी हिंदी पत्र-पत्रिका ने इस अन्याय पर कोई लेख या टिप्पणी नहीं छापी है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि अंतत: निम्र और निम्र मध्यवर्ग ही मुख्यत: हिंदी अखबारों का पाठक रह गया है और यह उन्हीं आम लोगों से जुड़ा मामला है।

'ए कलेक्टिव इनिसिएटिव फॉर जस्टिस' द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित गोष्ठी में सामाजिक कार्यकर्ता व दलित एक्टिविस्टों के साथ ही साथ, हिंदी और उर्दू के कई लेखक और बुद्धिजीवी उपस्थित थे। इन में इब्बार रब्बी, असगर वजाहत, मंगलेश डबराल, प्रदीप पंत, अजय सिंह, प्रेमपाल शर्मा, हरिसुमन बिष्ट, उदभ्रांत, देवेंद्र चौबे, राकेश तिवारी, खालिद अशरफ, सुभाष सेतिया, सुल्तान त्यागी, कृष्ण सिंह, चारु तिवारी, भूपेन सिंह आदि के साथ ही साथ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया के कई अध्यापक, रिसर्च स्कॉलर, अधिवक्ता, डाक्टर, इंजीनियर आदि भी उपस्थित थे। गोष्ठी में राष्ट्रपति के नाम सुरेन्द्र कोली के लिए एक दया याचिका पर हस्ताक्षर किये गए।

इस संबंध में छपी मीडिया रिपोर्टों को नीचे दिए गए लिंकों पर देखा जा सकता है।

द हिंदू (1, 2, 3)
फ्रंटलाइन
तहलका (1, 2)
ईपीडब्ल्यू (पीडीएफ डाउनलोड करें)
आउटलुक (1, 2)
हिंदुस्तान टाइम्स

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ फांसी की सजा का औचित्य और उसका सामाजिक संदर्भ ”

  2. By ओमप्रकाश कश्यप on January 18, 2015 at 9:28 AM

    मृत्युदंड दिए जाने से पहले आवश्यक है कि मामले की सभी दृष्टिकोण से पूरी जांच की जाए. बड़े दुख और हैरानी की बात है कि इस प्रकरण में जांच एजेंसियों ने सरकार की रिपोर्ट पर गंभीरता पूर्वक काम नहीं किया. मानव—अंगों की तस्करी का सुझाव, रिंपा हालदार के बारे में प्रकाशित रिपोर्ट कि वह अपने प्रेमी के साथ नेपाल जा बसी है, मामले की नए सिरे से जांच की अपेक्षा करते हैं. सरकार को चाहिए कि फांसी के निर्णय को टालते हुए प्रकरण की सभी पहलुओं से पड़ताल की जाए.

  3. By dinesh gautam on October 3, 2015 at 10:31 AM

    आप सभी पाठकों से निवेदन है कि "क्या भारत में फाँसी की सजा होनी चाहिए" इस विषय पर अपने विचार
    Dineshgautam785@gmail.com पर भेजने का कष्ट करेंगे...

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें