हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मातम से महरूम लाशें

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/11/2015 05:41:00 PM


तेजु कोल एक नाईजीरियाई अमेरिकी लेखक, कला इतिहासकार और फोटोग्राफर हैं. उन्होंने दो किताबें लिखी हैं: ओपेन सिटी और एवरी डे इज फॉर द थीफ. उनका यह लेख अमेरिका की प्रतिष्ठित पत्रिका द न्यूयॉर्कर में 9 जनवरी 2014 को प्रकाशित हुआ है, जिसमें वे 7 जनवरी 2015 को पेरिस में शार्ली एब्दो पत्रिका के दफ्तर पर हुए हमले और हत्याओं पर आने वाली प्रतिक्रियाओं के बारे में विचार कर रहे हैं. इसी हमले के संदर्भ में अमेरिकी कार्टूनिस्ट जो सैको का कार्टून भी देखें. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

बात सोलहवीं सदी की है. उत्तरी इटली के एक मिल मालिक को गैर परंपरागत धार्मिक आस्थाएं रखने के आरोप में पकड़ा गया था. लोग उसे मेनोचियो ने नाम से जानते थे. वह पढ़ा-लिखा था, लेकिन लिखने-पढ़ने वाले अभिजात तबके से ताल्लुक नहीं रखता था. उसका मानना था कि देह के मरने के साथ ही आत्मा भी मर जाती है, कि दुनिया गैर-सिलसिलेवार चीजों से बनाई गई थी, न कि शून्य से, और अपने पड़ोसी से प्यार करना ईश्वर से प्यार करने से ज्यादा अहम था. उसकी इन अजीबो-गरीब आस्थाओं के लिए उन थोड़ी-सी किताबों से ही बल मिला था, जो उसने पढ़ी थी. उन किताबों में डेकामेरोन, बाइबल, कुरान और ’द ट्रवल्स ऑफ सर जॉन मेंडेविल’ के अनुवाद शामिल थे. यह उसकी बदकिस्मती ही थी कि मेनोचियो को घसीट कर कई बार इन्क्विजिशन के सामने ले जाया गया, यातनाएं दी गईं, और आखिरकार 1599 में उसे जिंदा जला दिया गया. इस अंजाम तक पहुंचने वाले हजारों लोगों में से वह एक था.

पश्चिमी समाज आज भी शकपरस्ती (संशयवाद) और तार्किकता की जन्नत नहीं हैं, हालांकि वे खुद को ऐसा ही मानते रहे हैं. पश्चिम मुख्तलिफ रंगत वाली जगह रहा है, जहां आजादी का विचार और बहुत सख्ती से नियंत्रित आवाजें, दोनों की वजूद में रही हैं. और जहां खौफनाक हिंसा को नकारने का काम भी उसी तरह चलता रहता है, जिस तरह छुपे हुए तौर पर यातनाएं देने का काम. लेकिन कई मौकों पर जब पश्चिमी समाज खुद को हमले के शिकार के रूप में देखने लगते हैं, तब फौरन ही उकसावे के बरअक्स शांति और सब्र द्वारा लंबे समय से उठाई जाती रही मुश्किलों की एक गैर-तारीखी फैंटेसी पूरी बातचीत पर हावी हो जाती है. तब भी यूरोपीय और अमेरिकी इतिहास आवाजों को नियंत्रित करने की कोशिशों से इस कदर भरे पड़े हैं कि विद्रोही विचारों पर किए जाने वाले अत्याचारों को इन समाजों की बुनियाद में ही गिनना चाहिए. डायनों को जलाना, धर्म से इन्कार करनेवालों पर मुकदमे चलाना और इन्क्विजीशन के अनथक कामों ने यूरोप को गढ़ा और ये विचार अमेरिकी इतिहास तक में दाखिल हुए और उन्होंने अमेरिकी शक्लें अख्तियार कीं, जिसमें गुलामों को तोड़ने से लेकर ऑपरेशन इराकी फ्रीडम के आलोचकों का मुंह बंद करना तक शामिल है.

इस हफ्ते पेरिस में एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए. इस अपराध के पीड़ितों के बारे में पूरी दुनिया मातम मना रही है: वे इन्सान थे, उन्हें उनके परिवार वाले प्यार करते थे और वे अपने दोस्तों के लिए कीमती थे. बुधवार को, उनमें से बारह लोगों को बंदूकधारी लोगों ने इसलिए निशाना बनाया कि वे फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्दो से जुड़े हुए थे. शार्ली अक्सर ही मुसलमानों को निशाना बनाती रही है, और वह पैगंबर मुहम्मद के चित्र बनाने पर इस्लामी पाबंदी का उल्लंघन करने में खासतौर से मजे लेती रही है. इसने इससे भी ज्यादा किया है, इसने सियासी और साथ ही साथ ईसाई और यहूदी निशानों को भी आड़े हाथों लिया है. पत्रिका ने फादर, सन और पवित्र आत्मा को यौन क्रिया करते हुए दिखाया है. ऐसे चित्रणों का हवाला इसके सबूत के रूप में दिया जा रहा है कि शार्ली एब्दो पत्रिका हरेक पर हमले करना चाहती थी. लेकिन हाल के बरसों में पत्रिका खास तौर नस्लवादी और इस्लाम के प्रति नफरत और दुराग्रहों (इस्लामोफोबिया) को उकसाने की हद तक चली गई है, और इसके अनेक इस्लाम-विरोधी तस्वीरें नई-नई तरह की विकृतियों से भरी रही हैं, जिसमें टेढ़े नाक वाले अरब लोगों, गोलियों से छलनी कुरान, अनेक तरह के गुदा मैथुन, और जनसंहारों के पीड़ितों का मजाक उड़ाते हुए चित्रण किया गया है. धर्म के प्रति एक चुटीली असहमति और एक धौंस भरे नस्लवादी एजेंडे के बीच फर्क को देख पाना हमेशा आसान नहीं रहता, लेकिन इस फर्क को देखने की कोशिश करना जरूरी है. यहां तक कि बोलने की आजादी के समर्थकों के नायक वॉल्टेयर ने भी इसे गलत तरीके से समझा था. पुरोहितवाद के खिलाफ उनका शानदार और साहस से भरा लेखन पढ़ने में अच्छा लगता है, लेकिन वे एक प्रतिबद्ध सेमाइट-विरोधी (एंटी-सेमाइट) थे जिनके द्वारा की गई यहूदीवाद की आलोचना में यहूदियों के जन्मजात चरित्र के बारे में उनका झूठा प्रचार भी शामिल है.

इस हफ्ते में फ्रांस में जो हुआ उसकी पृष्ठभूमि में फ्रांस का बदसूरत उपनिवेशवादी इतिहास, इसकी बड़ी मुस्लिम आबादी और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिजाब जैसी इस्लामी सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का दमन शामिल हैं. काले लोगों ने भी शार्ली एब्दो को आसानी से नहीं लिया होता: पत्रिका के एक कार्टून में गिनी मूल की न्याय मंत्री क्रिस्टीन तौबीरा को बंदर के रूप में दिखाया गया था (कुदरती तौर पर इसके बचाव में यह तर्क दिया जाएगा कि एक हिंसक नस्ली छवि को नस्लवाद पर व्यंग्य करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है); एक दूसरा चित्रण ओबामा का है, जिन्हें ब्लैक-सैंबो की शैली में पेश किया गया है. यह जिम क्रो के रेखांकनों की जानीमानी शैली है.

कत्लेआम के अगले दिन, गुरुवार की सुबह मैं पेरिस में था. ले फिगारे की सुर्खी थी “LA LIBERTÉ ASSASSINÉE.” ले पेरिसियन और ल’यूमेनिते ने भी अपनी सुर्खियों में liberté (आजादी) का इस्तेमाल किया था. असल में आजादी पर हमला हुआ भी था – एक लेखक के बतौर लोगों को आहत करने के अधिकार (राइट टू अफेंड) को मैं प्यार करता हूं और दूसरे लेखकों के इस अधिकार का मैं समर्थन भी करता हूं – लेकिन मुद्दे को इस शक्ल में पेश करते हुए क्या चीज छोड़ दी जा रही थी? पश्चिमी सत्ता के केंद्रों में आतंकवादी हमलों के साथ साथ हमेशा ही एक सचमुच की उलझन चली आती है. वे हमारे अमन-चैन वाले समाज में हिंसक खौफ लेकर क्यों आते हैं? जब हम हत्याएं नहीं करते तो वे क्यों करते हैं? लुसिल क्लेर्क का यह खूब शेयर किया गया रेखांकन इसकी एक बानगी था, जिसमें एक टूटी हुई पेंसिल खुद को नए सिरे से दो नुकीली पेंसिलों में बदल रही है. #jesuischarlie (मैं शार्ली हूं) हैशटैग की ही तरह इसका भी संदेश साफ था, कि लोगों द्वारा अपनी मर्जी का रेखांकन करने का अधिकार ही दांव पर नहीं था, बल्कि हत्याओं के दौर में, वे जो भी चित्र बनाएं उन पर जश्न मनाया जाना चाहिए और उनका प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए. इस पर अमल करते हुए न सिर्फ शार्ली एब्दो की अनेक तस्वीरों को प्रकाशित और शेयर किया गया, बल्कि हमलों को देखते हुए पत्रिका को भारी तादाद में पैसे भी मिले हैं – गार्जियन मीडिया ग्रुप की तरफ से एक लाख पाउंड और गूगल की तरफ से तीन लाख डॉलर.

लेकिन उनकी कही हुई बात को बढ़ावा दिए बिना या उनको प्रायोजित किए बिना भी, घिनौनी और नस्ली बातें कहने के अधिकार का बचाव किया जा सकता है. नस्लवाद की हिमायत किए बिना भी पवित्रता पर सवाल खड़े करने को मंजूरी दी जा सकती है. और इस्लाम के प्रति दुराग्रहों और नफरत को गैरकानूनी बनाए बिना भी उन्हें अनैतिक माना जा सकता है. गम में डूबे हुए पल न तो हमारी जटिलताओं को हमसे छीनते हैं और न ही फर्क करने की हमारी जिम्मेदारी से हमें बरी करते हैं. ए.सी.एल.यू. ने 1978 में एक नव-नाजी समूह का बचाव करके मुनासिब काम किया था, जो इलिनोइस के स्कोकी में जुलूस निकालना चाहते थे. हिंसा के खास खतरे के बगैर, जुलूस में शामिल लोगों की उग्र आक्रामकता गैर कानूनी नहीं थी और उसे होना भी नहीं चाहिए. लेकिन कोई भी समझदार इंसान फर्स्ट एमेंडमेंट अधिकारों की हिमायत करने को नाजी आस्थाओं की हिमायत के रूप में नहीं लेता. शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्ट महज एक तंग करनेवाली मक्खी (कुकुरमक्खी) नहीं थे, वे आहत करने के अधिकार के शहीद भर नहीं हैं: वे एक विचार के हिमायती भी थे. सिर्फ इसलिए कि हम उनकी बेरहमी से की गई हत्याओं की निंदा करते हैं, इसका मतलब यह नहीं हो जाता है कि हमें उनकी विचारधारा की अनदेखी कर कर देनी चाहिए.

सवाल को इस तरह से पेश करने के बजाए कि पेरिस में हुए हमले आजाद बयानी के लिए संकट के पल हैं – जैसे कि अनेक टिप्पणीकारों ने किया है – यह समझना जरूरी है कि बोलने की आजादी और आजादी की दूसरी अभिव्यक्तियां पश्चिमी समाज में पहले से ही संकट में हैं; यह संकट उन तीन विक्षिप्त बंदूकधारियों ने शुरू नहीं किया है. मिसाल के लिए संयुक्त राज्य ने चरम हिंसा पर अपने परंपरागत एकाधिकार को और मजबूत किया है और भारीभरकम डाटा के इस दौर में इसने इस हिंसा की अपनी तैनाती के बारे में सूचना का अंबार भी जमा किया है. जो लोग इस एकाधिकार पर सवाल खड़े करते हैं उनको इसके कठोर नतीजे भुगतने पड़ते हैं. सी.आई.ए. के घिनौने यातना के साम्राज्य के लिए सवाल करने वाले जॉन किरियाकोऊ अकेले इंसान हैं जो जेल में हैं. सार्वजनिक निगरानी के बारे में जानकारी को सार्वजनिक कर देने के लिए एडवर्ड स्नोडेन का पीछा किया जा रहा है. चेल्सिया मैनिंग को विकिलीक्स में उनकी भूमिका के लिए पैंतीस साल के कारावास की सजा भुगतनी पड़ रही है. कुफ्र तो उन्होंने भी किया है, लेकिन पूरी दुनिया में उनका वैसा गुणगान नहीं हो रहा है जैसा शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्टों का हो रहा है.

पेरिस में हत्याएं इंसानी जिंदगी और सम्मान पर एक डरावना हमला थीं. इन अपराधों की भयावहता हमें लंबे समय तक सदमा पहुंचाती रहेगी. लेकिन खुद को जिहादी कहने वाले लोगों द्वारा की गई हिंसा को ही पश्चिमी समाज में आजादी के लिए अकेला खतरा बताना दूसरे खतरों को नजरअंदाज करना है, जबकि ये खतरे अक्सर ही कहीं अधिक फौरी और करीबी खतरे हैं. संयुक्त राज्य और यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस में अलग अलग राज व्यवस्थाएं हैं, लेकिन दुनिया के बारे में एक खास नजरिए में वे एक दूसरे के सहयोगी हैं, और उन सब में एक बात समान है कि वे पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष धर्म के बारे में मुनासिब सम्मान की उम्मीद करते हैं. राजसत्ता के खिलाफ विद्रोह पर नजर रखी जाती है और उसे सजा दी जाती है. यूनाइटेड किंगडम में, सोशल मीडिया पर फौज विरोधी या पुलिस विरोधी टिप्पणियां करने के लिए लोगों को गिरफ्तार किया जाता रहा है. संयुक्त राज्य में व्यापक निगरानी के पत्रकारिता और कानून के अमल पर भयावह नतीजे हुए हैं. इसी बीच इन देशों में सशस्त्र बलों और खुफिया एजेंसियां अपने नागरिकों से निर्बाध समर्थन की मांग करती हैं और यह उन्हें मिलता भी है. जब वे यातना या युद्ध अपराध करती हैं, तो उनकी पूरी जिम्मेदारियां तय करने या उसके लिए जिम्मेदार पक्षों पर मुकदमे चलाने की बहुत कम ही उम्मीद होती है, चाहे वे अपराध कितने भी गैरकानूनी या घटिया हों.

पेरिस में हत्याओं के पीड़ितों के लिए हम जितने बड़े पैमाने, शिद्दत और शक्लों में एकजुटता को देख रहे हैं, वह हौसला बढ़ानेवाली हो सकती है, लेकिन इसकी ओर भी इशारा करती है कि पश्चिमी समाजों में रेडिकल इस्लाम को असली या अकेले दुश्मन के रूप में पेश करना कितना आसान है. यह मातम के लायक लाशों के बारे में आम सहमति का हिस्सा है और यह अक्सर हमें दुनिया भर में चल रहे दूसरे भयावह कत्लेआमों पर वाजिब तरीके से गौर करने से रोकता है: मैक्सिको में अपहरण और हत्याएं, गाजा में इस्राइल के हाथों पिछले साल सैकड़ों बच्चों (और एक दर्जन से ज्यादा पत्रकारों) की हत्याएं, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में आपस में होने वाले कत्लेआम, और इसी तरह की दूसरी मिसालें. और जब हम वाजिब तौर पर उन हत्यारों की निंदा करते हैं जो इस्लाम के नाम पर ये काम करने का दावा कर रहे हैं, तो उनके हमलों के अनगिनत मुस्लिम पीड़ितों तक हमारे शोक का जरा सा हिस्सा ही पहुंच पाता है – चाहे यह यमन या नाइजीरिया का मामला हो – जहां इसी हफ्ते खौफनाक कत्लेआम हुए हैं – या फिर सऊदी अरब हो, जहां इंसानी अधिकारों के उल्लंघन होते रहे हैं, जिनमें ‘इस्लाम की तौहीन’ करने वाले पत्रकारों को कोड़े मार कर सजा दी जाती है. हो सकता है कि हम दुनिया के हरेक कोने के हरेक जुल्म तक नहीं पहुंच पाएं, लेकिन हमें कम से कम इस पर जरूर गौर करना चाहिए कैसे मुख्यधारा की राय इतनी जल्दी यह फैसला कर लेती है कि कुछ खास तरह की हिंसक मौतें दूसरों के मुकाबले ज्यादा मायने रखती हैं और शोक मनाए जाने के ज्यादा लायक हैं.

फ्रांस आज गमगीन है और आने वाले अनेक हफ्तों तक गमगीन रहेगा. फ्रांस के साथ हम भी मातम में हैं. हमें होना ही चाहिए. लेकिन यह भी सच है कि 'हमारी' तरफ से होने वाली हिंसा बेधड़क जारी रहेगी. सारे अंदेशों के मुताबिक अगले महीने इस समय तक पाकिस्तान और दूसरी जगहों पर अमेरिका के ड्रोन हमलों में 'फौज में जाने वाली उम्र के नौजवान' और दूसरे अनेक, जो न तो नौजवान हैं और न ही सिर्फ पुरुष हैं, मार दिए जाएंगे. अगर अतीत में हुए हमलों से कोई मतलब निकलता है तो यही कि इनमें से अनेक पूरी तरह बेगुनाह होंगे. उनकी मौतों को उसी तरह कुदरती और सवालों से परे माना जाएगा, जैसा कि इन्क्विजिशन में मेनोचियो की मौत को माना गया. हममें से जो लोग लेखक हैं, वे तब यह नहीं मानेंगे कि इन हत्याओं ने भी हमारी पेंसिलें तोड़ डाली हैं. लेकिन उस वक्त सवालों का नहीं खड़ा किया जाना और मातम का नहीं मनाया जाना हमारी सामूहिक आजादी के लिए साफ-साफ और एकदम सामने खड़ा खतरा है - उतना ही बड़ा, जितना बड़ा पेरिस का यह कत्लेआम है.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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