हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

दुश्मन देश नहीं है भारतीय मुसलमान!

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/31/2015 11:34:00 AM


‘राष्ट्रवाद’, हिंदुत्व, ‘गाय’ और ‘आतंकवाद’ के नाम पर मुसलमान समुदाय को निशाना बनाने के फासीवादी मंसूबों पर मानव अधिकार कार्यकर्ता  भंवर मेघवंशी की रिपोर्ट. भंवर राजस्थान में दलित, आदिवासी और घुमन्तु समुदाय के लिए संघर्षरत है.

राजस्थान के दौसा में पाकिस्तानी झण्डा फहराये जाने, टौंक के मालपुरा में आईएसआईएस के पक्ष में नारे लगाये जाने तथा जयपुर में आतंकी नेटवर्क खड़ा करने में जुटे मोहम्मद सिराजुद्दीन को गिरफ्तार किये जाने के बाद यह चर्चा बहुत आम हो गई है कि क्या प्रदेश आतंकवादी गतिविधियों को संचालित करने की सबसे सुरक्षित जगह बन गया है?

उत्तरप्रदेश के एक स्वयंभू हिन्दू महासभाई कमलेश तिवाड़ी द्वारा हजरत मोहम्मद को अपमानित करने वाली टिप्पणी करने के विरोध में हुए देशव्यापी प्रदर्शन राजस्थान के भी विभिन्न शहरों में आयोजित किए गये.साम्प्रदायिक रूप से अतिसंवेदनशील मालपुरा कस्बे में भी मुस्लिम युवाओं ने अपने बुजुर्गों की मनाही के बावजूद एक प्रतिरोध जलसा किया.हालांकि शहर काजी और कौम के बुजुर्गों ने बिना मशवरे के कोई भी रैली निकालने से युवाओं को रोकने की भी असफल कोशिस की.जैसा कि मालपुरा के निवासी वयोवृद इकबाल दादा बताते हैं कि हमने उन्हें मना कर दिया था और शहर काजी ने भी इन्कार कर दिया था, मगर रसूल की शान के खिलाफ की गई अत्यंत गंदी टिप्पणी से युवा इतने अधिक आक्रोशित थे कि वे काजी तक को हटाने की बात करने लगे.


अंतत: मालपुरा के युवाओं की अगुवाई में 11 दिसम्बर को एक रैली जामा मस्जिद से शुरू हो कर कोर्ट होते हुए तहसीलदार को ज्ञापन देने पहुंची.शांतिपूर्ण तरीके से ज्ञापन दे दिया गया मगर दूसरे दिन सोशल मीडिया में वायरल हुए एक ऑडियो के मुताबिक रैली से लौटते हुये मुस्लिम नवयुवकों ने आरएसएस मुर्दाबाद तथा आईएसआईएस जिन्दाबाद के नारे लगाए.

जब मुस्लिम समाज के मौतबर लोगों को पुलिस के समक्ष यह वीडियो दिखाया गया तो उन्हें पहले तो यकीन ही नहीं हुआ, फिर उन्होंने अपने बच्चों की इस तरह की हरकत के लिये तुरंत माफी मांग ली और मामले को तूल नहीं देने का आग्रह किया.

मालपुरा के हिन्दुवादी संगठनों ने मांग की कि दोषियों को गिरफ्तार किया जाये.सत्तारूढ़ विचारधारा के राजनैतिक दबाव के चलते किसी व्यक्ति विशेष द्वारा बनाये गये वीडियो को आधार बना कर मुकदमा दर्ज कर लिया गया तथा सलीमुद्दीन रंगरेज, फिरोज पटवा, वसीम, शाहिद, शाकिर, अमान तथा वसीम सलीम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

60 वर्षीय राशन डीलर सलीमुद्दीन के बेटे नईम अख्तर का कहना है कि उनके वालिद एक जमीन के सौदे के सिलसिले में कोर्ट गये थे, वे रैली में शरीक नहीं थे, मगर पुलिस कहती है कि उनका चेहरा वीडियो में दिख रहा है जहां नारे लगाये जा रहे थे, इसलिये उन्हें गिरफ्तार किया गया है.

मुस्लिम समुदाय का आरोप है कि पुलिस जानबूझकर बेगुनाहों को पकड़ रही है.इतना ही नहीं बल्कि धरपकड़ अभियान के दौरान सादात मौहल्ले में पुलिस द्वारा मुस्लिम औरतों के साथ निर्मम मारपीट और बदसलूकी भी की गई.

पुलिस दमन की शिकार 50 वर्षीय बिस्मिल्ला कहती हैं कि हम बहुत सारी महिलाएं कुरान पढ़कर लौट रही थीं, तब घरों में घुसते हुए मर्द पुलिसकर्मियों ने हमें मारा, वह चल फिरने में असहाय महसूस कर रही है.सना, जमीला, फरजाना, फहमीदा, नसीम आदि पर भी पुलिस ने लाठियां भांजी, किसी को चोटी पकड़ कर घसीटा तो किसी को पैरों और जंघाओं पर मारा एवं भद्दी गालियां दे कर अपमानित किया.फरजाना, साजिदा और आरिफा को पुलिस पथराव और राजकार्य में बाधा उत्पन्न करने के जुर्म में गिरफ्तार कर ले गई.जहां से फरजाना को शांतिभंग के आरोप में पाबंद कर देर रात छोड़ दिया गया, वहीं आरिफा और साजिदा को जेल भेज दिया गया.मालपुरा में आतंकवादी संगठनों के पक्ष में नारे लगाने के वीडियो को वायरल किए जाने के बाद राज्य भर में इसकी प्रतिक्रिया हुई.हिन्दुत्ववादी संगठनों ने कुछ जगहों पर इसके विरुद्ध ज्ञापन भी दिये और देशविरोधी तत्वों पर अंकुश लगाने की मांग की.

जो वीडियो लोगों को उपलब्ध है उसे देखने पर ऐसा लगता है कि वापस लौटती रैली में नारे लगाते एक युवक समूह पर ये नारे सुपर इम्पोज किये गये हैं.क्योंकि नारों की घ्वनि और रैली में चल रहे लोगो के मध्य कोई तारतम्य ही नहीं दिखाई पड़ता है.

जिस जगह का यह वीडियो है, वहां के दुकानदारों का जवाब भी स्पष्ट नहीं है.वे यह तो कहते हैं कि मालपुरा में पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे आम बात है, मगर ये नारे कब और कहां लगते हैं तथा उस दिन क्या उन्होंने आईएसआईएस के नारे सुने थे? इसका जवाब वे नहीं देते, इतना भर कहते हैं कि शायद आगे जा कर लगाये हों या कोर्ट में लगा कर आये हों.

विचार योग्य बात यह है कि ज्ञापन के दिन ना किसी समाचार पत्र, ना  टीवी चैनल और ना ही पुलिस को ये नारे सुनाई पड़े. अगले दिन अचानक एक वीडियो को, जिसकी प्रमाणिकता ही संदिग्ध है, आधार बना कर पुलिस मालपुरा के मुस्लिम समाज को देशप्रेम की तुला पर कमतर पाने लगती है और फिर गिरफ्तारियों के नाम पर दमन और दशहत का जो दौर चलता है, वह दिन ब दिन बढ़ते ही जाता है. हालात इतने भयावह हो जाते हैं कि लोग अपने आशियानों पर ताले लगा कर दर बदर भागने को मजबूर कर दिये जाते हैं.

मालपुरा का घटनाक्रम चर्चा में ही था कि एक बड़े समाचार पत्र में दौसा के हलवाई मोहल्ले के निवासी खलील के घर की छत पर पाकिस्तानी झण्डा फहराये जाने की सनसनीखेज खबर साया हो गई. खलील को तो प्रथम दृष्टया ही देशद्रोही घोषित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई, मगर दौसा के मुस्लिम समाज ने पूरी निर्भीकता से इस शरारत का मुंह तोड़ जवाब दिया और पुलिस तथा प्रशासन को बुलाकर स्पष्ट किया कि यह चांद तारा युक्त हरा झण्डा इस्लाम का है, ना कि पाकिस्तान का! अंतत: पुलिस अधीक्षक गौरव यादव को उन्माद फैलाने वाली हरकत करने की इस घटना पर स्पष्टीकरण देना पड़ा तथा उन्होनें माना कि यह गंभीर चूक हुई है, एक धार्मिक झण्डे को दुश्मन देश का ध्वज बताना शरारत है. मुस्लिम समुदाय की मांग पर चार मीडियाकर्मियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया गया और खबर लिखने वाले पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया गया. खबर प्रकाशित करने वाले मीडिया समूह ने इसे पुलिस की नाकामी करार देते हुए स्पष्ट किया कि उनकी खबर का आधार पुलिस द्वारा दी गई सूचना ही थी, पुलिस ने अपनी असफलता छिपाने की गरज से मीडिया के लोगों को बलि का बकरा बना दिया है.

इन दिनों ईद मिलादुन्नबी की तैयारियों के चलते घरों पर चांद तारे वाला हरा झण्डा लगभग हर जगह लगा हुआ दिखाई पड़ जाता है, उसे पाकिस्तानी झण्डे के साथ घालमेल करके मुसलमानों के खिलाफ दुष्प्रचार का अभियान चलाया जा रहा है.

भीलवाड़ा में पिछले दिनों एक मुस्लिम तंजीम के जलसे के बाद ऐसी ही अफवाह उड़ाते एक शख्स को मैंने जब चुनौती दी कि वह साबित करे कि जिला कलेक्टरेट पर प्रदर्शन में पाकिस्तानी झण्डा लहराया गया है तो वह माफी मांगने लगा. इसी तरह फलौदी में पाक झण्डे फहराने सम्बंधी वीडियो होने का दावा कर रहे एक व्यक्ति से वीडियो मांगा गया तो उसने ऐसा कोई वीडियो होने से ही इन्कार कर दिया. तब ये कौन लोग है जो संगठित रूप से 'पाकिस्तानी झण्डे' के होने का गलत प्रचार कर रहे हैं? यह निश्चित रूप से वही अफवाह गिरोह है जो हर बात को उन्माद फैलाने और दंगा कराने में इस्तेमाल करने में महारत हासिल कर चुका है.

इन कथित राष्ट्रप्रेमियों को मीडिया की बेसिर पैर की खबरें खाद पानी मुहैया करवाती रहती है. भारत का कॉरपोरेट नियंत्रित  जातिवादी मीडिया लव जिहाद, इस्लामी आतंतवाद, गौ तस्करी, पाकिस्तानी झण्डा, जासूसी और आतंकी नेटवर्क के जुमलों के आधार पर चटपटी खबरें परोस कर मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध नफरत फैलाने के विश्वव्यापी अभियान का हिस्सा बन रहा है. आतंक की गैर जिम्मेदाराना  पत्रकारिता का स्वयं का चरित्र ही अपने आप में किसी  आतंकवाद से कम नहीं दिखता है. हर पकड़ा ग़या 'संदिग्ध' मुस्लिम 'दुर्दांत आतंकी' घोषित कर दिया जाता है और उसका नाम 'अलकायदा', 'इंडियन मुजाहिद्दीन', 'तालिबान' तथा इन दिनों 'इस्लामिक स्टेट ऑफ ईराक एण्ड सीरिया' से जोड़ दिया जाता है. आश्चर्य तो तब होता है जब मीडिया गिरफ्तार संदिग्ध को उपरोक्त में किसी एक आतंकी नेटवर्क का कमाण्डर घोषित करके ऐसी खबरें प्रसारित व प्रकाशित करता है, जैसे कि सारी जांच मीडियाकर्मियों के समक्ष ही हुई हो. अपराध सिद्ध होने से पूर्व किसी को आतंकी घोषित किए जाने की यह मीडिया ट्रायल एक पूरे समुदाय को शक के दायरे में ले आई है. इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि आज इस्लाम और आतंकवाद को एक साथ देखा जाने लगा है.इसी दुष्प्रचार का नतीजा है कि आज हर दाढ़ी और टोपी वाला शख्स लोगों की नजरों में संदिग्ध के रूप में चुभने लगा है.

हाल ही में जयपुर में इण्डियन ऑयल कार्पोरेशन के मार्केटिंग मैनेजर सिराजुद्दीन को एन्टी टेरेरिस्ट स्क्वॉयड ने आईएसआईएस के नेटवर्क का हिस्सा होने के आरोप में गिरफ्तार किया. मीडिया के लिए यह एक महान उपलब्धि का क्षण बन गया. पल पल की खबरें परोसी जाने लगी, आतंकी नेटवर्क का सरगना सिराजुद्दीन यहां रहता था, यह करता था, 13 देशों के चार लाख लोगों से जुड़ा था, अजमेर के कई युवाओं के सम्पर्क में था. सुबह मिस्र, इंडोनेशिया रिपोर्ट भेजता था, शाम को खाड़ी देशों तथा दक्षिणी अफ्रिकी देशों को रिपोर्ट भेजता था. फिदायीन दस्ते तैयार कर रहा था, आदि इत्यादि.

दस दिन आतंक की खबरों का बाजार गर्म रहा, सिराजुद्दीन को इस्लामिक स्टेट का एशिया कमाण्डर घोषित कर दिया गया, जबकि जांच जारी है और जांच एजेन्सियों की ओर से इस तरह की जानकारियों का कोई ऑफिशियल बयान जारी नहीं हुआ है.गिरफ्तार किये गये सिराजुद्दीन के पिता सरवर कहते हैं कि उनका बेटा पक्का वतनपरस्त है, वह अपने मुल्क के खिलाफ कुछ भी नहीं कर सकता है. उसकी पत्नी यास्मीन के मुताबिक उसने कभी भी सिराजुद्दीन को कुछ भी रहस्यमय हरकत करते हुए नहीं देखा, वह एक नेक धार्मिक मुसलमान के नाते लोगों की सहायता करनेवाला इंसान है. उसके बारे में यह सब सुनकर मैं विश्वास ही नहीं कर पा रही हूं.


खैर, सच्चाई क्या है, इसके बारे में कुछ भी कयास लगाना अभी जल्दबाजी ही होगी और जिस तरह का हमारी खुफिया एजेन्सियां, पुलिस और आतंकरोधी दस्तों का पूर्वाग्रह युक्त साम्प्रदायिक व संवेदनहीन चरित्र है, उसमें न्याय या सत्य के प्रकटीकरण की उम्मीद सिर्फ एक मृगतृष्णा ही है.ज्यादातर मामलों में बरसों बाद कथित आतंकवादी बरी कर दिए जाते हैं, मगर तब तक उनकी जवानी बुढ़ापा बन जाती है.परिवार तबाह हो चुके होते हैं. 


कुछ अरसे से पढ़े लिखे, सुशिक्षित, आईटी एक्सपर्ट मुसलमान नौजवान खुफिया एजेन्सियों और आतंकवादी समूहों के निशाने पर हैं, उन्हें पूर्वनियोजित योजनाओं के तहत तबाह किया जा रहा है. इसके विरुद्ध उठने वाली कोई भी आवाज देशद्रोह मान ली जा रही है, इसलिए राष्ट्र राज्य से भयभीत अल्पसंख्यक समूह अब बोलने से भी परहेज करने लगे हैं और बहुसंख्यक तबका मीडियाजनित विभ्रमों का शिकार हो कर राज्य प्रायोजित दशहतों को 'उचित' मानने लगा है.यह अत्यंत निराशाजनक स्थिति है.

राजस्थान में गोपालगढ़ में मुस्लिमों के जनसंहार के आरोपी खुलेआम विचरण करते हैं. नौगांवा के होनहार मुस्लिम छात्र आरिफ के, जिसे पुलिस ने घर में घुसकर एके सैंतालीस से भून डाला, हत्यारे पुलिसकर्मियों को सजा नहीं मिलती है. भीलवाड़ा के इस्लामुद्दीन नामक नौजवान की जघन्य हत्या करने वाले हत्यारों का पता भी नहीं चलता है. गौ भक्तों द्वारा पीट पीट कर मार डाले गए डीडवाना के गफूर मियां के परिवार की सलामती की कोई चिन्ता नहीं करता है. हर दिन होने वाली साम्प्रदायिक वारदात की आड़ में मुस्लिमों को लक्षित कर दमन चक्र निर्बाध रूप से जारी है. कहीं भी कोई सुनवाई नहीं है. लोग थाना, कोर्ट कचहरियों में चक्कर काटते काटते बेबस है और उपर से शौर्यदिवस के जंगी प्रदर्शनों में 'संघ में आई शान-मियांजी जाओ पाकिस्तान' या 'अब भारत में रहना है तो हिन्दू बन कर रहना होगा' जैसे नारे जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं.

हर दिन दूरियां बढ़ रही है, बेलगाम बयानबाजी, दिन प्रतिदिन गांव गांव में बढ रहे संचलन और हथियारों को लहराती हुई रैलियां किसी गृहयुद्ध के बीज बोती दिख रही है.

आश्चर्य की बात तो यह है कि हम अपना घर नहीं सम्भाल पा रहे हैं, अपने ही लोगों का भरोसा नहीं जीत पा रहे हैं और हमारे रक्षामंत्री अमेरिका की सैर से लौट कर कह रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र कहेगा तो हम इस्लामिक स्टेट से लड़ने को तैयार हैं. समझ नहीं आता कि हम आ बैल मुझे मार का निमंत्रण क्यों देना चाहते है.हथियार सौदागर अमेरिका कभी किसी का यार हुआ है. उसके बहकावे में आकर हमें किसी युद्ध में अपनी सेना को झोंकने की गलती क्यों करनी चाहिए. हमारी असफल विदेश नीति के चलते हमने नेपाल जैसे  पड़ोसी मित्र तक को चीन को दोस्त बना डाला है. अब हम क्या मुस्लिम दुनिया को भी दुश्मन बना लेंगे? गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि हम अमेरिका जैसे देशों के बिछाए जाल में तो नहीं फंसते जा रहे है.हमारा अमेरिका प्रेम हमें डुबो भी सकता है. स्थिति यह होती जा रही है कि वाशिंगटन ही पूरा विमर्श तय कर रहा है. इस्लामिक आतंकवाद जैसी शब्दावली से लेकर किनसे लड़ना है और कब लड़ना है? ईराक से लेकर अफगानिस्तान तक और सीरिया से लेकर लीबिया तक आतंकी समूहों का निर्माण, उनके सरंक्षण संवर्धन में अमेरिका की हथियार उद्योग और सत्ता सब लगे हुए हैं. वैश्विक वर्चस्व की इस लड़ाई में पश्चिम का नया दुश्मन मुसलमान है, मगर भारतीय राष्ट्र राज्य के लिए मुसलमान दुश्मन नहीं है. वे देश के सम्मानिक नागरिक हैं. राष्ट्र निर्माण के साथी हैं, उनसे दुश्मनों जैसा सलूक बंद करना होगा. उनके देशप्रेम पर सवालिया निशान लगाने की प्रवृति से पार पाना होगा. झण्डा, दाढ़ी, टोपी, मदरसे, आबादी, मांसाहार जैसे कृत्रिम मुद्दों के द्वारा उनका दमन रोकना होगा.उन्हें न्याय और समानता के साथ अवसरों में समान रूप से भागीदार बनाना होगा, ताकि हम एक शांतिपूर्ण तथा सुरक्षित विकसित राष्ट्र का स्वप्न पूरा कर सकें.

जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की आलोचना-3

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/29/2015 08:04:00 PM

महिलाओं की मुक्ति के बिना क्रांति मुमकिन नहीं और
क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं

 

-अनिर्बाण, अनुभव, आश्वथी, उफक, उमर, गोगोल,
प्रिय धर्शिनी, बनोज्योत्सना, रेयाज, रुबीना, स्रीरूपा

 

हैदराबाद में महिला संगठनों और क्रांतिकारी आंदोलन के प्रतिनिधियों के बीच 2004 में आयोजित बातचीत में अनेक कार्यकर्ताओं ने क्रांतिकारी आंदोलन में राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व के स्तर पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व की कमी का मुद्दा उठाया (ईपीडब्ल्यू, 6 नवंबर, 2004). उनका कहना था कि हालांकि आदोलन में महिलाओं की भागीदारी में पिछले कुछ दशकों में भारी इजाफा हुआ है, लेकिन नेतृत्व में उनका प्रतिनिधित्व चिंताजनक ढंग से कम है. जवाब में आंदोलन के प्रतिनिधियों ने पार्टी में ‘पितृसत्तात्मक नजरिए’ की मौजूदगी को खुल कर कबूल किया. उनके मुताबिक इसकी बड़ी वजह यह है कि सदस्य ऐसी चेतना लेकर आते हैं, जिस पर उनकी पृष्ठभूमि का भारी असर होता है. उन्होंने इस संदर्भ में एक दूसरी समस्या की पहचान करते हुए यह बताया कि औरतें ‘पारिवारिक विचारधारा’ से पार पाने के नाकाबिल होती हैं, जो उन्हें राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व की भूमिकाएं अपनाने से रोकती है. उन्होंने यह भी कहा कि ‘साम्राज्यवाद और सामंतवाद को मिटाना, पितृसत्ता को मिटाने से आसान है.’ (ईपीडब्ल्यू, 6 नवंबर, 2004). लेकिन ऐसा क्यों है? क्या पितृसत्ता हमारे दिमाग पर हावी वह भूत है, जिसको झाड़ कर उतारा तो जा सकता है, लेकिन जिससे लड़ा और हराया नहीं जा सकता? क्या असल में पितृसत्ता इतिहास की उपज नहीं है, जिसको हमारे मौजूदा समय और संदर्भ में सामंती और साम्राज्यवादी ताकतों ने गढ़ा है और साथ ही साथ जिसने सामंती और साम्राज्यवादी ताकतों को भी गढ़ा है? यहां यह मान लिया गया है कि औरतें क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व करने के काबिल राजनीतिक कर्ता (पोलिटिकल एजेंट) नहीं हो सकतीं क्योंकि पितृसत्तात्मक विचारधारा उन्हें अपने आसपास के माहौल से बाहर आने की इजाजत नहीं देती. इसलिए आइए, नेतृत्व में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर आने से पहले इंसानी एजेंसी और खास कर महिलाओं की एजेंसी के विवादास्पद और जटिल सवाल पर बात करते हैं.

लुई बोनापार्ट की अठारहवीं ब्रूमेर में मार्क्स ने लिखा है, ‘जनता अपना इतिहास खुद बनाती है, लेकिन वह इसे अपने मनचाहे तरीके से नहीं बनाती; वह इसे अपने चुने हुए हालात के तहत नहीं बनाती बल्कि वह यह इतिहास उन हालात के तहत बनाती है, जिनसे वो सीधे-सीधे मुठभेड़ करती है, जो उसे सौंपे गए हैं, जिन्हें अतीत ने उसके हवाले किया है. मरी हुई सब पीढ़ियों की परंपराएं जिंदा लोगों के दिमाग पर बुरे सपने की तरह लदी रहती हैं.’ (https://www.marxists.org/archive/marx/works/1852/18th-brumaire/ch01.htm). इतिहास ने तरक्की नहीं की होती अगर जनता के पास एजेंसी नहीं होती. लेकिन जनता की एजेंसी हमेशा ही उन विचारधाराओं, राजनीतिक और भौतिक हालात के दायरे में और उनसे होकर बनती है, जिसमें वह जीती है. इतिहास के दौरान, जनता ने सामूहिक रूप से और अलग-अलग भी, शासक वर्गों के शोषण और उत्पीड़न का हमेशा ही विरोध किया है और उसके खिलाफ लड़ती आई है. लेकिन ये संघर्ष हमेशा ही जटिल रहे हैं और अनेक स्तरों पर चलते हैं, क्योंकि हरेक दौर में शासक वर्गों का न सिर्फ भौतिक उत्पादन के साधनों पर बल्कि वैचारिक उत्पादन के साधनों पर भी कब्जा रहा है. इस तरह हरेक सामाजिक बनावट में प्रभुत्वशाली विचार, मूल्य और नैतिकता, अपने समय में मौजूद उत्पीड़नकारी और शोषणकारी सामाजिक संबंधों को ऐसे पेश करती है कि वे प्राकृतिक हैं और उनका होना लाजिमी है. इस तरह वे उन्हें जायज ठहराते हुए शासक वर्गों के हितों की सेवा करती है. हालांकि हिंसा या हिंसा की धमकी शासक वर्ग के हाथों में नियंत्रण और प्रभुत्व को बनाए रखने का सबसे बड़ा जरिया होती है, लेकिन किसी भी सामाजिक व्यवस्था की मजबूती और उसका जारी रहना इस बात पर भी निर्भर करता है कि उत्पीड़ित वर्गों ने प्रभुत्वशाली विचारों, मूल्यों और नैतिकताओं को कितना अपने भीतर उतारा है. वर्ग संघर्ष हमेशा ही भौतिक और विचारधारात्मक स्तरों पर लड़े जाते हैं जो मूल्यों और नैतिकताओं के एक नए ढांचे को आगे बढ़ाते हैं, जिसका शासक वर्ग की विचारधारा से टकराव होता है. इंसानी एजेंसी सिर्फ मौजूदा भौतिक हालात से ही तय नहीं होती, बल्कि उसको आपस में लड़नेवाले वर्गों के परस्पर विरोधी विचार, मूल्य और नैतिकताएं भी तय करती हैं. इसलिए इंसानी एजेंसी हमेशा ही वर्ग संघर्ष की या दूसरे शब्दों में कहें तो इतिहास की उपज होती है.

भारतीय उपमहाद्वीप में जनता की चेतना सामंती और साम्राज्यवादी मूल्यों की खिचड़ी से ही नहीं बनती है, बल्कि तेभागा, तेलंगाना, नक्सलबाड़ी आंदोलन, मजदूर वर्ग के संघर्ष, दलित आंदोलन, महिलाओं के आंदोलन, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के संघर्ष, एलजीबीटीआईक्यू आंदोलन और रोजमर्रा के अनगिनत संघर्ष और आंदोलन भी इसको गढ़ते हैं. लेकिन असल में आपस में टकरानेवाले इन मूल्यों और नैतिकताओं के अलग अलग समूह जनता में एक साथ पाए जाते हैं और उसकी कार्रवाइयों और व्यवहार को अहम तरीकों से प्रभावित करते हैं. इसके अलावा, प्रभुत्वशाली मूल्य और नैतिकता उत्पीड़ित जनता की चेतना पर भारी असर डालती है, जो कहीं न कहीं अपने शोषण और उत्पीड़न के ही तर्क को कबूल कर लेती है. भारत में ब्राह्मणवादी सामंती पितृसत्ता की व्यवस्था भी इससे अलग नहीं है, जो बड़ी पूंजी के साथ सहयोग करते हुए अस्तित्व में है. फिर अपने समाज के संदर्भ में हम महिलाओं की एजेंसी को कैसे देखते हैं? क्या सचमुच उनकी कोई एजेंसी है? हां, महिलाओं की एजेंसी है. उनमें अलग अलग तरह की एजेंसियां होती हैं, जिनको वे विचारधारात्मक, राजनीतिक और भौतिक हालात तय करते हैं, जिनमें वे रहती हैं. यहां, इस मुद्दे पर बात को आगे बढ़ाने के लिए, हम महिलाओं की एजेंसियों को दो अलग अलग श्रेणियों में बांट कर देखेंगे, हालांकि असलियत में वे कभी भी अलग अलग नहीं पाई जातीं. पहली तरह की एजेंसी ‘यथास्थितिवादी एजेंसी’ होती है, जिसमें सचेत रूप से या अनजाने में प्रभुत्वशाली सामंती पितृसत्तात्मक ढांचे को कबूल करने का रुझान होता है. हालांकि इस तरह की एजेंसी उत्पीड़ित और शोषित बनी रहती है, लेकिन इसको पितृसत्तात्मक ढांचे से कई तरह के दिखावटी ‘इनाम’ भी हासिल होते हैं और इसको एक सीमित ताकत और ‘शरीफ या गुणवान महिला’, ‘त्याग करने वाली मां’ ‘समर्पित पत्नी’ वगैरह जैसे रुतबे भी हासिल होते हैं. दूसरी, ‘प्रगतिशील एजेंसी’ है, जो सचेत रूप से गैरबराबर लैंगिक रिश्तों और पितृसत्ता पर सवाल करती है और उसके खिलाफ लड़ती है. हमेशा ही इसको प्रभुत्वशाली सामंती और पितृसत्तात्मक ताकतों की ओर से पलटवार का सामना करना पड़ता है. इस तरह की एजेंसी के खिलाफ हिंसा या हिंसा की धमकी इस पलटवार का सबसे आम चेहरा है. हालांकि इस पलटवार के उतने ही हिंसक, दूसरे छुपे हुए और बारीक चेहरे भी होते हैं जिनकी जानबूझ कर अनदेखी कर दी जाती है या उन्हें वाम जनवादी और क्रांतिकारी आंदोलनों में गंभीरता से नहीं लिया जाता. जो महिलाएं पितृसत्ता के खिलाफ आवाज उठाती हैं और अपना अधिकार जताने के लिए बराबरी और आजादी की मांग करती हैं, उनको अक्सर ही ‘बदचलन’ और ‘अनैतिक’ कह कर प्रचारित किया जाता है. इन महिलाओं को सबसे बदतरीन किस्म की तोहमतों और अफवाहों का सामना करना पड़ता है. इसलिए महिलाओं और दूसरे उत्पीड़ित जेंडरों के खिलाफ होने वाले प्रचार, उन पर लगाई जाने वाली तोहमतों और अफवाहों को समझना जरूरी है, जो उनकी सामाजिक जगहों (स्पेस) को खत्म करते हैं और उनकी तरक्की और मन:स्थिति पर असर डालते हैं और जो खुद यौन हिंसा/उत्पीड़न के गंभीर रूप हैं. लेकिन सबसे परेशान करनेवाली बात यह है कि हिंसा के इन रूपों पर सिर्फ दक्षिणपंथी ताकतों का ही कब्जा नहीं है, बल्कि वाम जनवादी और क्रांतिकारी हलकों में भी इनकी उतनी ही भरमार है.

क्रांतिकारी आंदोलन में, उन महिलाओं को ‘फ्री सेक्स सिद्धांतकार’ या ‘बुर्जुआ नारीवादी’ कह बदनाम करने का रुझान है, जो पितृसत्ता, गैरबराबर लैंगिक संबंधों, यौन हिंसा, शादी और परिवार के संस्थानों के खिलाफ सवाल खड़े करती हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि वे साम्राज्यवादी संस्कृति को बढ़ावा देकर जानबूझ कर वर्ग संघर्ष को भोथरा कर रही हैं. क्रांतिकारी आंदोलन जिसे ‘फ्री सेक्स सिद्धांत’ कहता है, उसका झूठा और घिनौना इस्तेमाल, नेताओं (जो हमेशा ही मर्द होते हैं) और कैडरों को इसमें सक्षम बनाता है कि वे मुश्किल सवाल खड़े करनेवाली महिलाओं के खिलाफ तोहमतें लगाएं (स्लैंडर करें) और उनके बारे में तरह-तरह की अफवाहें फैलाएं. अब तक हमारे इस्तीफे पर जो जवाब आए हैं (डीएसयू-बिहार, इन्कलाबी छात्र मोर्चा-इलाहाबाद विश्वविद्यालय और भगत सिंह छात्र मोर्चा-बीएचयू) वे इसको बखूबी जाहिर करते हैं. इन जवाबों में, हमारे द्वारा उठाए गए सवालों पर ठीक से गौर करने की कोशिश किए बगैर, हमें ‘स्वच्छंद प्रेम’ और ‘स्वच्छंद यौन सम्बन्ध’ को बढ़ावा देने वाला कह कर प्रचारित किया गया है और कहा गया है कि हमने जो सवाल उठाए हैं उनसे ‘यौन अराजकता’ फैलेगी. हमारे कैंपस में, छात्रों के आंदोलनों से होने वाले एक तुलनात्मक जनवादीकरण को पचा पाने में नाकाम दक्षिणपंथी संगठन अक्सर ही प्रगतिशील-जनवादी संगठनों और खासकर महिला कार्यकर्ताओं के खिलाफ ऐसे ही प्रचार, तोहमतों और अफवाहों का सहारा लेते हैं. लेकिन डीएसयू-बिहार, आईसीएम और बीसीएम भी ठीक उसी सामंती-नैतिकतावादी बेचैनियों के शिकार कैसे बने हुए हैं? जैसे मिसाल के लिए आईसीएम-बीसीएम के जवाब की निम्नलिखित पंक्तियों पर गौर करें:

‘गांवों से शहरों में पढ़ने आये या कॉलेज में पहुंच चुके लड़के-लड़कियां अपने सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों को लेकर जब यहां पहुंचते हैं तो वहां वे नये तरह के मूल्यों से टकराते हैं ये हैं साम्राज्यवादी उपभोक्तावादी मूल्य। वे पहले को न तो पूरी तरह छोड़ पाते हैं और नये को अपनाने लगते हैं। दोनों का मेल उनके व्यक्तित्व को विकसित होने से रोक देता है और वे अजीब से मूल्यों के साथ अपनी इस आजादी का इस्तेमाल करना शुरू करते हैं। लड़के-लड़कियां को उनके घरों में जहां देखने की भी मनाही होती है यहां वे साथ में घूम सकते हैं, रह भी सकते हैं। इसका परिणाम अन्य बातों के अलावा स्वच्छंद यौन सम्बन्धों के रूप में सामने आ रहा है, और कई जगहों पर ये संगठनों के लिए बड़ी समस्या बन गया है। इन जगहों पर संगठन में जुडने वाले लड़के -लड़कियां अपने कामों से ज्यादा आपसी संबन्ध बनाने में या साथ में नशा करने में लगे रहते हैं।’ (https://web.facebook.com/inqalabichhatra.morchaicm/posts/1701916596760293)

इसमें और इस जैसे अनेक बयानों और नजरियों में दो कॉमरेडों के साथ रहने की संभावना को बार-बार खारिज किया गया है, कहा गया है कि ऐसे रिश्तों को कबूल नहीं किया जा सकता!

हमने विभिन्न जेंडरों के बीच यौन हिंसा को शादी के पहले या शादी के बाद के गलत और झूठे बंटवारे के भीतर देखने के बजाए उन गैरबराबर शक्ति संबंधों के भीतर देखने की कोशिश की है, जिनकी जड़ें सामंती पितृसत्तात्मक ढांचे में हैं. हमारी इन कोशिशों पर उन्होंने यह आरोप लगाया है कि हम ‘पूंजीवादी वेश्यालयों’ (यानी लिव इन संबंधों) को बढ़ावा दे रहे हैं जिसमें, उनका कहना है कि, औरतों का शोषण हर हालत में लाजिमी है. वे कहते हैं कि ‘एलीट’ महिलाएं अपनी भ्रमित चेतना की शिकार हैं, क्योंकि आईसीएम-बीसीएम के मुताबिक मध्यवर्ग और मेहनतकश वर्ग की महिलाओं के उलट ‘एलीट औरतें’ शादी के पहले सहमति से बनाए गए संबंधों को ‘पुरुषों की प्राकृतिक यौन आकांक्षा’ द्वारा अपने शोषण के रूप में नहीं देखतीं! हिंसा, नियंत्रण, मोरल पुलिसिंग और प्रभुत्व के इन सारे सवालों को ‘चंद मुट्ठी भर लोगों के जीवन में आए बदलाव से उपजा हुआ एक वर्गीय सवाल’ (https://www.facebook.com/dawa.sherpa.7543653/posts/1261264183899787) और ‘निजी संबंधों की समस्याएं’ बता दिया गया है, जिनका ‘मेहनतकश महिलाओं की व्यापक आबादी से कोई लेना देना नहीं’ है (जबकि वे मर्दों के नियंत्रण की तरफदारी करने वाले अपने नजरिए को औरतों के हित में बताते हैं). अक्सर ऐसा होता है कि गहराई तक धंसी पितृसत्ता और लैंगिक उत्पीड़न के पीछे के शक्ति संबंधों पर सवाल करने की किसी भी कोशिश पर रूढ़िवादी ताकतें ‘यौन अराजकता’ के ऐसे ही डर से कांपने लगती हैं. नारीवादियों को हिंसा, शादी, तलाक, यौनिकता वगैरह से जुड़े सवालों को उठाने के लिए अक्सर ही प्रतिक्रियावादी ताकतों की तरफ से ऐसे हमलों और दुष्प्रचारों का सामना करना पड़ता है. लेकिन जब खुद को प्रगतिशील और यहां तक कि क्रांतिकारी कहनेवाली ताकतें भी वही तरकीबें अपनानें लगती हैं, तब विडंबना और भी गहरी हो जाती है. डीएसयू-बिहार, आईसीएम, बीसीएम ने जो कहा है, उस तरह के आक्षेपों और महिलाओं से नफरत तथा पितृसत्तात्मक प्रचार का असर यह पड़ता है कि न सिर्फ इससे मुश्किल सवाल किनारे कर दिए जाते हैं, बल्कि साथ ही साथ यह सवाल उठाने वालों को भी अलग थलग कर देता है. खास कर ऐसा महिला कार्यकर्ताओं के साथ होता है, जिनको बिगड़े चरित्र की, पतित, बदचलन और ‘फ्री सेक्स के सिद्धांत को बढ़ावा देने वाली बुर्जुआ नारीवादी’ के रूप में चित्रित किया जाता है! यह एक आम बात है कि किसी भी संगठन में आनेवाले कार्यकर्ता अपने साथ अपने समाज की अवधारणाएं और नजरिए लेकर आते हैं, लेकिन एक क्रांतिकारी आंदोलन से यह उम्मीद की जाती है वह उन्हें इन समस्याग्रस्त बातों को छोड़ना सिखाएगा. लेकिन इस सवाल पर, आंदोलन न सिर्फ सामान्य बुद्धि (कॉमन सेंस) के विचारों को ही मजबूत करता है, बल्कि सक्रिय रूप से उन नेताओं और कैडरों को इसका साहस भी देता है कि वे सवाल उठाने वालों के खिलाफ तोहमतें लगाकर, बदनाम करके, अफवाहें फैलाकर और उनका चरित्र हनन करके या फिर मोरल पुलिसिंग का सहारा लेकर उनको अलग-थलग कर दें. सिद्धांत में जब ऐसी पितृसत्तात्मक और अलोकतांत्रिक समझदारी हो तो व्यवहार में इसका नतीजा एक ऐसे रवैए के रूप में सामने आएगा, जो मर्दों के नियंत्रण और संरक्षण वाला और महिला विरोधी हो. और खास कर जब यह समझदारी खुद को मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के मुखौटे में मार्क्सवादी लफ्फाजी और शब्दजाल के साथ खुद को पेश करे, तब तो दुष्प्रचार और तोहमतों (स्लैंडर) की एक ऐसी जबरदस्त और घिनौनी मिसाल बनती है कि उसको महिला विरोधी के रूप में पहचानने की बात कौन कहे, उसको ज्यादातर बढ़ावा ही दिया जाता है.

2004 में क्रांतिकारी आंदोलन के नेतृत्व ने यह कबूल किया कि आंदोलन में पितृसत्तात्मक नजरिया भी है. हालांकि क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी में पिछले कुछ दशकों में भारी इजाफा हुआ है, लेकिन राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी बेहद कम बना हुआ है. ऐसा है, तो फिर क्या यह मुमकिन नहीं है कि जिस तरह व्यापक समाज महिलाओं पर नियंत्रण और प्रभुत्व बनाने की कोशिश करता है, वैसा क्रांतिकारी आंदोलन में भी पाया जाता हो? क्या यह मुमकिन नहीं है कि क्रांतिकारी आंदोलन पितृसत्ता के बारे में अपनी सामान्य बुद्धि/सामंती नैतिकतावादी समझदारी की वजह से सिर्फ उन्हीं महिलाओं को जगह देता हो जो उसके अपने नजरिए के साथ सहमत हों और दोयम दर्जे की मातहत जगहों को कबूल कर लेती हों? क्या यह मुमकिन नहीं है कि मध्यवर्ती कतारों में या कुछ अहम जगहों पर एकाध महिलाओं का होना सिर्फ गहराई तक धंसी पितृसत्ता के साथ लड़ाई की कीमत पर मुमकिन हो पाया हो? कम्युनिस्ट आंदोलनों में नेतृत्व में अपने शुरुआती दौर हमेशा ही निम्न-पूंजीपति तबके से आता है. और हम इसकी ऐतिहासिक जरूरत को समझते हैं. हमने देखा है कि किस तरह पिछले कुछ दशकों में निम्न-पूंजीपति पृष्ठभूमि से आई हजारों महिलाओं ने क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रूप से भागीदारी की है. तब एकाध अपवादों को छोड़ कर वे नेतृत्व के पदों तक पहुंचने में कामयाब क्यों नहीं हो पाई हैं? क्या ऐसा है कि निम्न-पूंजीपति पृष्ठभूमि से आने वाले मर्द तो फौरन खुद को ‘डी-क्लास’ कर लेते हैं और सच्चे कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बन जाते हैं, जबकि महिलाएं अपनी ‘पारिवारिक विचारधारा’ से पार पाने में नाकाम रहती हैं? या ऐसा इसलिए है कि इनमें से ज्यादातर महिलाएं ‘फ्री सेक्स सिद्धांतकार’ और इसलिए ‘साम्राज्यवादी एजेंट’ बन जाती हैं? या फिर इसकी वजह आंदोलन के भीतर के महिलाओं से नफरत करने वाले, सामंती, पितृसत्तात्मक तत्व हैं, जो दुष्प्रचारों, तोहमतों और अफवाहों की मदद से उन महिलाओं के लिए जगहों को खत्म कर देते हैं, जो पितृसत्ता और मर्दों के प्रभुत्व के खिलाफ सवाल करती हैं? वे कोई भी तरीका अपनाएं, चाहे सवाल करने वालों की ‘सफाई’ करें या फिर अपना मुंह बंद रखने वालों को बढ़ावा दें, इससे आखिरकार नुकसान तो पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई को ही होता है.

असली जनवादीकरण की प्रक्रिया में न्याय अहम मुद्दा है. नियंत्रण और संरक्षण कभी भी क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं और दूसरे उत्पीड़ित जेंडरों की सचमुच में राजनीतिक भागीदारी को यकीनी नहीं बना सकता. आंदोलन को यह कबूल करना होगा और इस पर अमल भी करना होगा कि महिलाएं और दूसरे उत्पीड़ित जेंडर भी राजनीतिक कर्ता हैं. क्रांतिकारी आंदोलन का जनवादीकरण भी एक प्रक्रिया है, जो समाज के जनवादीकरण के व्यापक संघर्ष के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है. और यह जनवादीकरण अपने आप नहीं होता. इस दिशा में सचेत कदम उठाने पड़ते हैं. व्यापक समाज की और अपने भीतर की पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई के संदर्भ में, क्रांतिकारी आंदोलन को सबसे पहले महिलाओं तथा दूसरे उत्पीड़ित जेंडरों के खिलाफ दुष्प्रचारों, तोहमतों और अफवाहों को यौन हिंसा/उत्पीड़न के गंभीर रूपों के रूप में पहचानना होगा और जो लोग इसके जिम्मेदार हों, उनके खिलाफ कार्रवाई करनी होगी. क्रांतिकारी आंदोलन का असली जनवादीकरण, अकेले राजनीति शिक्षा के जरिए ही हासिल नहीं किया जा सकता; न्याय भी इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है. जब औरतें और दूसरे उत्पीड़ित जेंडर यौन उत्पीड़न/हिंसा का सामना करते हैं, तो इसका इल्जाम सिर्फ साम्राज्यवादी संस्कृति पर थोप कर और यह कह कर छुट्टी नहीं पाई जा सकती कि इसको राजनीतिक (यानी नैतिक) शिक्षा से ठीक किया जा सकता है. यौन उत्पीड़न/हिंसा, सत्ता और ताकत के अपराध होते हैं, जो उत्पीड़नकारी और शोषणकारी सामाजिक संबंधों से जुड़े हुए हैं और न्याय को यकीनी बनाने के लिए उनपर इसी रोशनी में गौर किया जाना चाहिए.

तब पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई और जेंडर संबंधों के जनवादीकरण की दिशा में बढ़ने का सही तरीका क्या हो सकता है? हमने अब तक इस मुद्दे पर क्रांतिकारी आंदोलन की समझदारी में गंभीर कमियों की आलोचना की है. दूसरे शब्दों में हमने अब तक इसी पर गौर किया है कि इस सही तरीके के दायरे में कौन कौन सी चीजें नहीं हो सकती हैं. और हमने इसकी वजह भी बताई है. हमने किसी भी सार्थक संवाद पर जोर दिया है, और यह अहम बात है कि हम पितृसत्ता की लड़ाई को एक अलग-थलग लड़ाई नहीं मानते बल्कि हम मानते हैं कि यह वर्ग संघर्ष का अभिन्न हिस्सा है. हमने एक विस्तृत वैकल्पिक नजरिए को पेश नहीं किया और न ही हमारे लिए यह मुमकिन है कि एक विश्वविद्यालय में बैठ कर हम ऐसा एक नजरिया पेश करें. बल्कि इस दिशा में एक अच्छी शुरुआत इस तरह हो सकती है कि राजनीतिक मतभेदों को मंजूर किया जाए और राजनीति पर आधारित बहस के लिए एक जनवादी स्पेस बनाया जाए. लेकिन ऐसी किसी बहस में शामिल होना तो दूर, विचारों के मतभेदों को जगह देना तो दूर, हमने अब तक बस यही देखा है कि किस तरह तोहमतों, दुष्प्रचारों और हमलों की एक आक्रामक लहर ने जो जगह थी, उसको भी तेजी से खत्म किया है. इसी ने आखिरकार डीएसयू से इस्तीफा देने के लिए हमें मजबूर किया. यहां तक कि अब तक हमारे सवालों का जो भी जवाब देने की कोशिश की गई है, उनमें न सिर्फ उसी सामंती-नैतिकतावादी नजरिए को मजबूती से पेश किया गया है, बल्कि इन सवालों और उन्हें उठाने वालों के खिलाफ दुष्प्रचार भी घिनौने रूप में जारी है. इन सबके बावजूद हमने अब तक अपने राजनीतिक मतभेदों को इस यकीन के साथ पेश किया है और आगे भी इसे जारी रखेंगे कि ये बहुत अहम सवाल हैं, जिन पर क्रांतिकारी आंदोलन को ईमानदारी से विचार करना चाहिए. उसे इन पर विचार करना ही चाहिए, क्योंकि पितृसत्ता और जेंडर के अहम सवाल पर ऐसी एक पितृसत्तात्मक, सामंती-नैतिकतावादी, मर्दों के नियंत्रण और संरक्षण वाली समझदारी के साथ न तो समाज का जनवादीकरण हो सकता है और न ही उसका क्रांतिकारी रूपांतरण हो सकता है.


जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की आलोचना-1
  
जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की आलोचना-2 

जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की आलोचना-2

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/28/2015 09:42:00 PM


महिलाओं की मुक्ति के बिना क्रांति मुमकिन नहीं और
क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं

 

-अनिर्बाण, अनुभव, आश्वथी, उफक, उमर, गोगोल,
प्रिय धर्शिनी, बनोज्योत्सना, रेयाज, रुबीना, स्रीरूपा


मार्क्स ने वर्ग संघर्ष की पहचान इतिहास को आगे बढ़ाने वाली ताकत के रूप में की थी. उत्पादन के पूंजीवादी तौर-तरीके के अपने विस्तृत अध्ययन के नतीजे में उन्होंने यह भरोसा जाहिर किया था कि इतिहास की दूसरी क्रांतियों (जैसे बुर्जुआ लोकतांत्रिक क्रांति) के उलट सर्वहारा के नेतृत्व में, जिनके पास खोने के लिए सिर्फ जंजीरें हैं, समाजवादी क्रांति न सिर्फ सर्वहारा को बल्कि पूरी मानवता को ही मुक्ति दिलाएगी. लेकिन मार्क्स ने यह भी दिखाया था कि वर्ग संघर्ष एक बेहद जटिल प्रक्रिया है, जो इतिहास के दौरान अलग अलग सामाजिक व्यवस्था में अलग अलग शक्ल में सामने आता है. इसलिए हर ठोस स्थिति, वर्ग संघर्ष के ठोस विश्लेषण की मांग करती है. पश्चिमी यूरोप में पूंजीवाद ने सामंती सामाजिक संबंधों को खत्म करने में और बुर्जुआ लोकतंत्र को कायम करने में एक प्रगतिशील भूमिका निभाई, जो औपचारिक बराबरी और आजादी के उसूलों पर आधारित था. मार्क्स ने जहां इसके प्रगतिशील चरित्र को कबूल किया, वहीं बुर्जुआ आजादी और बराबरी की सीमाओं को भी उजागर किया था. उन्होंने बताया कि कैसे व्यवस्था की बुनियाद में ही निहित अंतर्विरोध ऐसे हालात को पैदा करेंगे, जिनके बूते पर सर्वहारा एक सामाजिक क्रांति की रहनुमाई करेगा और हर तरह के शोषण को खत्म करके सच्ची आजादी और लोकतंत्र को कायम करेगा. लेकिन जब उपनिवेशवाद के दौरान पूंजी ने भारतीय उपमहाद्वीप में कदम रखा, इसने वही प्रगतिशील भूमिका नहीं निभाई जो इसने पश्चिमी यूरोप में निभाई थी. सामंतवाद को खत्म करने के बजाए, पूंजीवाद ने उसके साथ गठबंधन कर लिया और उसको सहारा देते हुए एक अर्ध-सामंती संबंध विकसित किया. हालांकि उपनिवेशवाद आखिरकार 1947 में औपचारिक रूप से खत्म हो गया, लेकिन सामंती ताकतों, साम्राज्यवाद और अंबानी, टाटा व बिड़ला जैसे दलाल बड़े पूंजीपतियों द्वारा जन समुदाय का शोषण जारी रहा.

ऐसे जटिल अर्ध-सामंती अर्ध औपनिवेशिक संदर्भ में वर्ग संघर्ष की किसी भी मशीनी समझदारी और उसके इस्तेमाल को नाकाम ही होना है, जैसा कि संशोधनवादी संसदीय वाम की दुर्गति ने बहुत साफ साफ साबित किया है. संशोधनवादी वामपंथ जिस वर्ग संघर्ष की मशीनी और अनगढ़ समझदारी की पैरवी करता रहा है, बरसों से भारत का क्रांतिकारी आंदोलन उसको चुनौती देता आया है. चाहे वह मजदूर वर्ग के संघर्षों, नव जनवादी क्रांति में किसानों की भूमिका, जाति-विरोधी संघर्षों, अल्पसंख्यक सवाल या फिर राष्ट्रीयताओं के आत्म निर्णय के संघर्षों की बात हो, इन सभी पर क्रांतिकारी आंदोलन की समझदारी में इस चुनौती की झलक मिलती है. लेकिन जब पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष के उतने ही अहम सवाल की बात आती है, तब हम देखते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलन की समझदारी पर एक कामचलाऊ और अनगढ़ सा वर्ग विश्लेषण हावी है. यह समझदारी पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई को सिर्फ ‘बड़े’ क्रांतिकारी कार्यभार में महिलाओं की भागीदारी तक सीमित कर देती है. जहां क्रांतिकारी आंदोलन की सैद्धांतिक समझ शराबबंदी आंदोलन, विस्थापन विरोधी आंदोलन, सलवा-जुडूम विरोधी आंदोलन या अफ्स्पा विरोधी संघर्षों में महिलाओं की भूमिका की तारीफ करती है, वहीं वो लैंगिक सवाल को परदे के पीछे धकेल देती है. और बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. असल में यह दशकों से महिला आंदोलनों द्वारा उठाए गए विभिन्न सवालों को ‘असली’ क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष से भटकाने वाला मानता है.

भारतीय उपमहाद्वीप में पितृसत्ता और जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई वर्ग संघर्ष का अंदरूनी हिस्सा है. बड़ी पूंजी के साथ मिल कर जनता की व्यापक बहुसंख्या का उत्पीड़न और शोषण करने वाले ये अर्ध-सामंती सामाजिक संबंध जाति व्यवस्था और पितृसत्ता से मिल कर बने भी हैं और इसी के साथ उन्हें बनाते भी हैं. एंगेल्स ने यह देखने की कोशिश की कि इतिहास में परिवार और शादी जैसे संस्थान किस तरह विकसित हुए. इस क्रम में उन्होंने यह दिखाया कि कैसे एक व्यक्ति से होने वाली शादी (मोनोगेमस मैरिज), एक महिला को महज एक यौन शरीर (सेक्सुअल बॉडी) मानते हुए उस पर नियंत्रण का औजार है और इसने ऐतिहासिक रूप से किस तरह निजी संपत्ति और मर्दों के प्रभुत्व को स्थापित करने में एक निर्णायक भूमिका अदा की थी. लेकिन हमारे संदर्भ में, महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण सिर्फ संसाधनों पर नियंत्रण को सुनिश्चित करने के लिए ही अहम नहीं रहा है, बल्कि यह जाति व्यवस्था को कायम रखने और उसे चलाते जाने के लिए भी अहम रहा है. दूसरे शब्दों में अगर आज जाति व्यवस्था बनी हुई है और साथ ही जमीन और श्रम पर अर्ध सामंती नियंत्रण भी बना हुआ है तो इसकी वजह यही है कि वे अभी भी अपने अस्तित्व के लिए महिलाओं और उनकी यौनिकता के ऊपर पितृसत्तात्मक नियंत्रण पर बड़े पैमाने पर निर्भर हैं, जिसको जाति के भीतर शादियों की सामाजिक बंदोबस्त के जरिए मुमकिन बनाया जाता है. इस तरह महिलाओं और उत्पीड़ित जातियों के श्रम पर गैर आर्थिक जोर जबरदस्ती और महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण भारतीय उपमहाद्वीप के अर्ध-सामंती संबंधों को कायम रखने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं. और इसलिए जिस तरह अर्ध सामंती भूमि संबंधों के खिलाफ लड़ाई को वर्ग संघर्ष का हिस्सा माना गया है, उसी तरह महिलाओं की मुक्ति के लिए लड़ाई और जाति के खात्मे की लड़ाई को भी वर्ग संघर्ष का अंदरूनी हिस्सा मानना होगा. लेकिन महिला आंदोलन से पैदा होने वाले मुद्दों मसलन यौन हिंसा, शादी, तलाक और अंतरंगता के मुद्दों पर गौर करने, उनके साथ बहस करने और उनकी गहराई में जाने के बजाए क्रांतिकारी आंदोलन इन सवालों को साम्राज्यवादी संस्कृति के असर में जन्म ले रहे ‘एलीट’ (अभिजात) महिलाओं के सरोकार कह कर खारिज कर देता है.

यह व्यवहार अपनी सबसे बदतरीन शक्ल के रूप में इस तरह सामने आता है कि यौन हिंसा, शादी, तलाक और अंतरंगता से जुड़े सरोकारों को उठाने वाली नारीवादियों और महिला कार्यकर्ताओं को ‘फ्री सेक्स थ्योरी’ के पैरोकार कह कर प्रचारित किया जाता है. आंदोलन नारीवादियों पर साम्राज्यवादी हमले के एक हिस्से के रूप में ‘फ्री सेक्स थ्योरी’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाता है. ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि इसको बिना किसी व्याख्या के, एक तथ्य के रूप में पेश किया गया. हम पूछना चाहेंगे- क्रांतिकारी आंदोलन जिसे ‘फ्री सेक्स थ्योरी’ कहता है, आखिर उसका मतलब क्या है? हम देखते हैं कि किस तरह प्रतिक्रियावादी ताकतें यौन हिंसा और पितृसत्तात्मक नियंत्रण पर सवाल उठाने वाली और परिवार और शादी जैसे संस्थानों के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाने वाली नारीवादियों और महिला कार्यकर्ताओं पर इसी भाषा में हमला करती हैं (मिसाल के लिए सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा जेएनयू को ‘फ्री सेक्स नक्सलाइटों और जिहादियों’ का गढ़ बताने वाली टिप्पणी देखें). फिर ऐसे  कल्पित शब्दों का इस्तेमाल करते हुए क्या क्रांतिकारी आंदोलन भी उन्हीं प्रतिक्रियावादी ताकतों जैसा व्यवहार नहीं कर रहा है? बेशक, ऊपर बताए गए अनेक सरोकारों को दशकों से अलग अलग धाराओं के महिला आंदोलन और नारीवादी उठाती रही हैं. यह भी सच है कि उनमें से अनेक का बहुत सीमित एजेंडा है और नारीवाद खुद अलग अलग धाराओं में बंटा हुआ है. लेकिन एक अर्ध-सामंती अर्ध-औपनिवेशिक संदर्भ में जहां क्रांति की अवस्था अभी नव जनवादी ही है, हर उस संघर्ष को अपना सहयोगी मानना चाहिए जो उत्पीड़नकारी सामाजिक संबंधों और संस्थानों को निशाने पर लेता हो या उसे चुनौती देता हो, न कि उसके साथ अपने दुश्मन के रूप में व्यवहार करना चाहिए. एक क्रांतिकारी पार्टी या क्रांतिकारी आंदोलन की भूमिका इन सवालों को समग्रता में उठाने और उन्हें दूसरे सामंतवाद विरोधी साम्राज्यवाद विरोधी संघर्षों के साथ जोड़ कर अपने मोर्चे को और व्यापक बनाने की होनी चाहिए. हालांकि इस मामले में, हम यह पाते हैं कि पेश किया गया नजरिया और व्यवहार दोनों ही यह है कि ये सवाल अपने आप में ही भटकाने वाले हैं और उनमें ऐसे एलीट सरोकारों की झलक मिलती है, जिनको खास वर्गीय नजरिए जन्म देते हैं. इससे भी बढ़कर वे एक ‘साम्राज्यवादी साजिश’ का हिस्सा हैं. खारिज कर देने और बदनाम करने का ऐसा रवैया और कुछ नहीं बल्कि घमंड और अहंकार है. यह सही है कि शासक वर्ग हमेशा ही सभी किस्म के लोकतांत्रिक आंदोलनों और उनके नेताओं को अपने में मिला लेने की कोशिश करते हैं. यह भी सच हो सकता है कि महिला आंदोलन आंशिक रूप से शासक वर्गों से जाकर मिल गए हों. लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि आंदोलनों द्वारा उठाए गए मुद्दे और सरोकार अप्रासंगिक या कम महत्वपूर्ण हो गए हैं? तब तो हमारे पास कम्युनिस्ट आंदोलनों/पार्टियों के शासक वर्ग के साथ मिल जाने की भी अनेक मिसालें हैं – चाहे वह सोवियत संघ हो या चीन या फिर नेपाल में हाल में माओवादी पार्टी की मिसाल. लेकिन इन पार्टियों या आंदोलनों के शासक वर्ग का हिस्सा बन जाने से यह नतीजा निकालना एक विडंबना ही होगी कि समाजवादी क्रांति या नव जनवादी क्रांति के लिए संघर्ष अब अप्रासंगिक हो गए हैं. इसलिए, मुद्दा यह है कि चाहे वो शासक वर्ग का हिस्सा बन गए हों या नहीं, क्रांतिकारी आंदोलन को महिला आंदोलनों या फिर जाति-विरोधी संघर्षों द्वारा उठाए गए मुद्दों और सरोकारों को जरूर ही गंभीरता से उठाना चाहिए, क्योंकि वे हमारे समाज के क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव का हिस्सा हैं.

आइए, यह देखते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलन ने शादी, तलाक और अंतरंगता के सवालों पर क्या  नजरिया पेश किया है. हमारे समाज का प्रगतिशील तबका, जिसमें क्रांतिकारी आंदोलन भी शामिल है, व्यक्तियों द्वारा आजादी से शादी के लिए अपना पार्टनर चुनने के लोकतांत्रिक अधिकार का समर्थन करता है. यह अधिकार और साथ में तलाक का अधिकार विभिन्न प्रगतिशील और लोकतांत्रिक संघर्षों के नतीजे में मंजूर और कबूल किए गए. खास कर इसमें महिला अंदोलनों और जाति-विरोधी संघर्षों की अहम भूमिका रही है. लेकिन जैसे ही दो व्यक्ति बिना शादी किए साथ में रहने का एक सचेत फैसला करते हैं, क्रांतिकारी आंदोलन फौरन उसे अपराध ठहरा देता है. क्रांतिकारी आंदोलन का यह लिखित नजरिया है: “जब शादी की उनकी इच्छा हो तब साथ में रहना और जब महसूस हो कि उसकी जरूरत नहीं रह गई है तब अलग हो जाना और कुछ नहीं बल्कि गैरजिम्मेदारी और अराजकता है. ...इसलिए जब एक दूसरे को पसंद करने वाले सदस्य साथ में रहना चाहते हैं तो उन्हें संबद्ध यूनिट को सूचित करना होगा और शादी के लिए इजाजत हासिल करनी होगी. शादी के पहले सेक्स संबंधों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए.” और वे इस मामले में ‘गंभीर’ हैं. इस मोर्चे पर गंभीरता इतनी भारी है कि इससे किसी भी भटकाव को, यानी मिसाल के लिए शादी के पहले सेक्स या फिर लिव इन संबंधों को एक ‘पराई वर्ग प्रवृत्ति’, ‘गैर सर्वहारा रुझान’ और एक ‘गंभीर उल्लंघन’ माना जाता है. जहां तक व्यापक समाज का मामला है, यह इन दोनों तरह के रिश्तों का ही विरोध करता है और उन्हें अपराध ठहराता है, क्योंकि उनमें अर्ध-सामंती सामाजिक संबंधों और नैतिकता में गड़बड़ी पैदा करने की क्षमता होती है. लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन इतिहास के गलत पाले में क्यों है? जब एक व्यक्ति आजादी के साथ अपना साथी चुनता है, तो क्रांतिकारी आंदोलन इसे उस इंसान का जनवादी अधिकार मानता है, लेकिन जब एक इंसान बिना शादी किए साथ रहने का फैसला करता है, तो यह इस रिश्ते को ऐसा अराजक व्यवहार कह कर उसे अपराध घोषित कर देता है, जो ‘जहरीली साम्राज्यवादी संस्कृति’ और पराए वर्ग व्यवहार से प्रभावित है. इस रवैए में सिर्फ इतिहास की अनदेखी ही नहीं की गई है, बल्कि यह सेक्स और यौनिकता के बारे में सामंती नैतिकता से सराबोर है. इससे बस औरतों को मर्दों के संरक्षण में रखने और औरतों पर नियंत्रण की इच्छा की ही झलक मिलती है और यह विचार इस समझ पर आधारित है कि सेक्स और सेक्सुअलिटी को लेकर सारे फैसले और पहलकदमी मर्द करते हैं, जबकि औरतें तो निष्क्रिय होती हैं और हमेशा ही शिकार बनती हैं. यह समझ यौनिकता (खास कर महिलाओं की यौनिकता) और यौन अंतरंगता के बारे में जड़ें जमाए गहरी बेचैनी से पैदा होती है, जो इन्हें किसी तरह की एक ऐसी प्राकृतिक इच्छा के रूप में देखती है, जिसे अगर काबू में नहीं किया गया तो इसका अंजाम ‘यौन अराजकता’, अफरा-तफरी और ‘यौन कमजोरी’ के रूप में सामने आएगा. सेक्स को, बस ‘धर्म, नशे और जहरीले मादक द्रव्यों’ की तरह एक औजार के रूप देखा गया, जिसका इस्तेमाल शोषक वर्ग नौजवानों को क्रांति से ‘भटकाने’ के लिए करते हैं.

क्रांतिकारी आंदोलन के यहां हालांकि तलाक को स्वीकार किया गया है, लेकिन यह इसको पसंद नहीं करता. क्रांतिकारी आंदोलन को इस जनवादी अधिकार को स्वीकार करने तक से इतनी हिकारत है इसने औरतों को ऐसी चेतावनी तक दे दी है कि अगर वो कई बार अलग हुईं और कई बार शादी की तो वे ‘वेश्या के रूप में पतित’ हो जाएंगी. ऐसा करते हुए, यह नजरिया शादी को महज सेक्स तक सीमित कर देता है, और उसमें भी मान लिया गया है कि महिलाओं की कोई चाहत, अहसास या इच्छा नहीं होती. एक दूसरी जगह पर, सबसे आमफहम तरीके से यह दलील दी गई है कि सेक्स पर बहुत ज्यादा जोर पश्चिम में यौन हिंसा और तलाक की दरों में इजाफा कर रहा है! एक बार फिर से यह बात भुला दी गई है कि शोषणकारी रिश्तों और शादियों से अलग होने और तलाक के अधिकारों को महिलाओं ने एक मुश्किल लड़ाई लड़कर और जीतकर हासिल किया है. ऐसा लगता है कि क्रांतिकारी आंदोलन के लिए सारी समस्याओं की जड़ सेक्स में है, जिसकी ‘उन्मुक्तता’ के खिलाफ अगर एक बार लड़ाई लड़ ली गई तो समाज एक ‘सेहतमंद’ समाज बन जाएगा (मार्क्स अपनी कब्र में कसमसा रहे होंगे और गांधी को यकीनन फख्र हो रहा होगा). इसी तरह, क्रांतिकारी आंदोलन, शहीदों की पत्नियों को फिर से शादी करने की इजाजत देता है, लेकिन यहां भी उन्हें मातम से उबरने के नाम पर एक साल की मुद्दत अकेले और बिना किसी के साथ गुजारने के बाद ही इसकी इजाजत मिलती है. और दलील दी गई है कि ऐसा न करने पर वे ‘लोगों और साथी कॉमरेडों के बीच मजाक का विषय बन जाएंगी’. तो अगर उस महिला ने, मान लीजिए एक साल पूरा होने से पहले किसी को पसंद करना शुरू कर दिया तो क्या आप इसको एक मुद्दा बना कर उसके बारे में फैसले लेंगे? चाहे यह मुद्दत अवधि छह महीने की हो या चार साल की, इसका फैसला महिला के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए. अगर कोई ऐसा कहता है कि यह पाबंदी महिला की खातिर ही लगाई गई है, ताकि उसे मर्दों से बचाया जा सके, तब भी ऐसी नियंत्रण और संरक्षण वाली समझदारी पक्के तौर पर मर्दों के ही प्रभुत्व को जाहिर करती है, क्योंकि महिला की भावनाओं और अहसासों को इस पूरी बहस में रत्ती भर भी जगह नहीं दी गई है. अगर उस महिला को अनुचित तरीकों से परेशान किया जा रहा है, तो इसके लिए जिम्मेदार मर्दों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन औरत पर पाबंदी लगाना आखिर में और कुछ नहीं बल्कि उसको नियंत्रित करना है और अगर वह इस पाबंदी को नहीं मानती है तो जाहिर है कि उसके बारे में नैतिकता के आधार पर राय कायम की जाएगी. क्या हम प्रगतिशीलता की ओट में असल में औरतों को नियंत्रित नहीं कर रहे हैं, ताकि सदस्यों और व्यापक समाज के बीच में एक निश्चित ‘व्यवस्था’ को कायम रखा जा सके जबकि जरूरत उनको राजनीतिक रूप से अधिक संजीदा, परिपक्व और समझदार बनाने तथा किसी उल्लंघन को गंभीरता से लेने की है?

जब क्रांतिकारी आंदोलन, संभवत: बिना शादी किए साथ रह रहे लोगों पर चुन चुन कर हमले करने, बदनाम करने या झूठी तोहमतें लगाने को अपनी जिम्मेदारी बना लेता है, तो इस रवैए की जड़ और कहीं नहीं बल्कि सामंती नैतिकतावादी नजरिए में है, जिनको यह आंदोलन ‘कम्युनिस्ट मूल्य’ कह कर प्रचारित कर रहा है. हम यहां भविष्य में शादी के रूपों, या उनको बनाए रखने या खत्म करने पर चर्चा (या ‘गर्मागरम बहस’) नहीं कर रहे हैं. कोई भी इस स्थिति में नहीं हो सकता है कि वह इस पर राय दे सके या भविष्यवाणी कर सके कि भविष्य में आने वाले बदलावों का स्वरूप क्या होगा या संपूर्ण बदलाव कैसे होंगे जिनकी अनदेखी संभावनाओं को वर्ग संघर्ष (जिसमें भौतिक और विचारधारा दोनों स्तरों पर पितृसत्ता और जाति के खिलाफ संघर्ष अनिवार्य रूप से शामिल है) लाजिमी तौर पर मुमकिन बनाता है. लेकिन जब हम आज की किसी संस्था के पक्ष में या उसको बनाए रखने की दलील देते हैं, तो इसका मतलब यही होता है कि हम भविष्य के बदलावों के स्वरूप की भविष्यवाणी कर रहे हैं, जिसमें हम इतिहास को मद्देनजर रखने के बजाए आज की नैतिकता और नैतिक तेवर के आधार पर फैसले ले रहे हैं. इसलिए क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए का नैतिक चश्मा पहनने की जगह, हमें एक मार्क्सवादी की तरह इस पर यकीन करना चाहिए कि इतिहास में हमेशा बनी रहने वाली अकेली चीज बदलाव है. एक सचेत राजनीतिक कर्ता के रूप में हमसे यही उम्मीद की जाती है कि हम आज हर जगह पर ज्यादा से ज्यादा जनवादी बनें, और इसमें लैंगिक संबंध भी शामिल हैं. ऐसा मुमकिन है कि एक कम्युनिस्ट पार्टी जिन इलाकों में काम कर रही है, वहां जनवादीकरण की प्रक्रिया उतनी आगे नहीं बढ़ पाई है, जिसकी वजह से पार्टी को इन सवालों पर ऐसे कार्यनीतिक नजरिए अपनाने पड़ते हैं (मिसाल के लिए जो कैडर लिव इन में रह रहे हों, उन्हें खुद को शादीशुदा के रूप में पेश करने जैसी सलाह). लेकिन जब हमारा कार्यनीतिक नजरिया ही हमारा रणनीतिक नजरिया बन जाए और हमारी राजनीतिक समझदारी की बुनियाद के रूप में काम करने लगे, तब यह दिखाता है कि हमने उन्हीं सामंती मूल्यों को अपने भीतर उतार लिया है, जिनके खिलाफ लड़ने का हम दावा कर रहे हैं.
 

जब हम कम्युनिस्ट मूल्यों की बात करते हैं तो यह समझना जरूरी है कि यह ऐसी कोई आध्यात्मिक अवधारणा नहीं हो सकती, जो इतिहास से ऊपर और परे हो. ऐसे मूल्य आसमान से नहीं टपकते और यकीनन पिछली दो सदियों के दौरान वे जस के तस नहीं बने रहे हैं. वे विभिन्न संघर्षों के जरिए विकसित हुए हैं और मार्क्सवादी-लेनिनवादी समझदारी से लैस एक क्रांतिकारी पार्टी से यह उम्मीद की जाती है कि उसमें समाज में सबसे आगे बढ़ी हुई चेतना का प्रतिनिधित्व होगा. वह जन समुदाय से पीछे रहने का जोखिम नहीं मोल ले सकती और न ही उसे जन समुदाय के आगे बढ़ जाना चाहिए. कम्युनिस्ट पार्टी मेहनत करने वाले वर्ग को संगठित करती है और सबसे उत्पीड़ित अवाम के बीच काम करती है और समाज के क्रांतिकारी बदलाव के संघर्ष के दौरान उनकी चेतना को विकसित करने की कोशिश करती है. लेकिन यह एकतरफा प्रक्रिया नहीं है, जिसमें चीजें ऊपर से नीचे की तरफ आती हैं, बल्कि आंदोलन अवाम से भी सीखता है. यह संघर्ष के दौरान हासिल किए गए अपने अनुभवों का मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के उसूलों की रोशनी में विश्लेषण करता है और एक बेहतर समझदारी तक पहुंचता है. यह जनता से लेकर जनता को सौंपने की हमेशा जारी रहने वाली प्रक्रिया है. जिस दिन यह प्रक्रिया रुक जाती है, समझदारी के नाकारा बन जाने का जोखिम पैदा हो जाता है. साम्राज्यवाद के दौर में मरणासन्न पूंजीवाद आजादी और चुनाव की जो झूठी और लुभानेवाली अवधारणाएं फैला रहा है, उनके बारे में जनता और कैडरों को राजनीतिक शिक्षा देना जरूरी है, लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन के लिए यह उतना ही जरूरी है कि वह अपने विस्तृत विश्लेषण के जरिए इसको दिखाए कि कैसे सामंतवाद के साथ सांठ-गांठ में मरणासन्न पूंजी पितृसत्तात्मक उत्पीड़न को बढ़ावा दे रही है. लेकिन ऐसे जटिल सवाल के प्रति कोई भी चोर गली या कामचलाऊ तरीके का अंजाम सिर्फ यह होगा कि आंदोलन ऐसे सरल नतीजों पर पहुंचेगा, जिसमें पितृसत्ता के खिलाफ जनवादी संघर्षों से पैदा होने वाली उपलब्धियों, उम्मीदों या मांगों को एक ही झटके में ‘जहरीली’ ‘फूहड़’ ‘साम्राज्यवादी संस्कृति’ की उपज बता कर खारिज कर दिया जाएगा. और ऐसा करते हुए, हम वापस हर जगह पर हावी सामंती-नैतिकतावादी सामान्य बुद्धि (कॉमन सेंस) के फंदे में जा गिरेंगे, और इसी आम समझ को ‘कम्युनिस्ट मूल्यों’ के रूप में पेश करने लगेंगे, जैसा कि क्रांतिकारी आंदोलन द्वारा पेश किए गए नजरिए में जाहिर होता है. 

 जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की आलोचना-1  

 जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की आलोचना-3 

जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की आलोचना-1

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/26/2015 01:20:00 PM

महिलाओं की मुक्ति के बिना क्रांति मुमकिन नहीं और
क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं

 

-अनिर्बाण, अनुभव, आश्वथी, उफक, उमर, गोगोल, 
प्रिय धर्शिनी, बनोज्योत्सना, रेयाज, रुबीना, स्रीरूपा
 

सन 2004 में महिला संगठनों और कार्यकर्ताओं द्वारा क्रांतिकारी एजेंडे में महिलाओं के लिए जगह को लेकर क्रांतिकारी आंदोलन की बढ़ती हुई आलोचना के मद्देनजर क्रांतिकारी आंदोलन की ओर से इस मुद्दे पर एक बातचीत की पहल की गई (इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली, 6 नवंबर, 2004). यह बातचीत जहां रखी गई, वहां दो बैनर लगाए गए थे, जिन पर यह नारा लिखा हुआ था: “मजदूर वर्ग की मुक्ति के बिना औरतों की आजादी नहीं हो सकती.” इसका मतलब यह है कि क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं होगी. दूसरे बैनर पर लिखा था “औरतों के बिना क्रांति नहीं”. इन नारों को सरसरी नजर से देखने पर शायद शब्दों में बारीक बदलाव पर नजर न जाए, लेकिन असल में ये नारे ऐसे होने चाहिए थे: “महिलाओं की मुक्ति के बिना क्रांति मुमकिन नहीं” और “क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं”. इनमें से कोई भी एक नारा, दूसरे के बिना बेमानी है. क्रांति एक प्रक्रिया है जिसमें पितृसत्ता और उत्पीड़नकारी लैंगिक रिश्तों के खिलाफ लड़ाई समाज के क्रांतिकारी बदलाव का ऐसा हिस्सा है, जिसको अलग नहीं किया जा सकता है. लेकिन हम पाते हैं कि इस सवाल पर क्रांतिकारी आंदोलन का रवैया ऐसा है कि इसने ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की मार्क्सवादी-लेनिनवादी समझदारी को ही पलट दिया है. यहां क्रांति अपने आप में ही एक मकसद हो गई है, जिसको अगर एकबार हासिल कर लिया गया तो इसके नतीजे में अपने आप ही महिलाओं की मुक्ति हो जाएगी. जबकि इसके उलट, असल में पितृसत्ता, या जाति व्यवस्था, के खिलाफ लड़ाई क्रांति की प्रक्रिया के दौरान हमेशा चलती रहती है और ऐसे संघर्षों के जरिए ही यह बात तय होती है कि क्रांति और उसके बाद आने वाले समाज की शक्ल क्या होगी. लेकिन जब कोई यह कहे कि “क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं” और “औरतों के बिना क्रांति नहीं”, तो उसका मतलब यह होता है कि पितृसत्ता एक ऐसा सवाल है जिसपर सिर्फ तभी गौर किया जाएगा, जब एक बार क्रांति हासिल कर ली जाएगी. और जब तक ऐसा नहीं हो जाता, महिला कैडरों से यह उम्मीद की जाती है कि वे एक औरत के रूप में जिस उत्पीड़न का सामना करती हैं, उसके बारे में सवाल उठाने के बजाए इस क्रांति को कामयाब बनाने के लिए अहम भूमिका अदा करें. मानो, उनके द्वारा अपने उत्पीड़न के बारे में सवाल उठाना, सिर्फ ध्यान बंटाने वाली एक चीज हो. मानो यह क्रांति की मौजूदा जरूरतों से सिर्फ एक भटकाव हो. क्रांति के बारे में ऐसी समझदारी इन दोनों संघर्षों को अलग अलग करके देखती है, मानो पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष सामाजिक बदलाव के क्रांतिकारी संघर्ष का हिस्सा न हो.

रोजाना के संघर्ष और क्रांति के व्यापक सवाल के बीच इस गलत और झूठे अलगाव ने जो स्थिति पैदा कर दी है, उसमें ऐसा दिखता है कि दशकों से महिला आंदोलन और कार्यकर्ता द्वारा हिंसा, शादी, तलाक, यौनिकता (सेक्सुअलिटी) वगैरह के बारे में जो सवाल उठाते रहे हैं, उन पर सिर्फ तभी गौर किया जाएगा, जब एक बार क्रांति हासिल कर ली जाए. पिछले तीन बरसों से हम क्रांति के व्यापक सवाल से महिलाओं के सवालों को अलगा कर उन्हें परदे के पीछे धकेले जाने की ठीक इसी समझदारी पर सवाल करते रहे हैं. हमारा संघर्ष एक सामंती-नैतिकतावादी पितृसत्तात्मक समझदारी से है, जो दशकों से महिला आंदोलनों द्वारा उठाए गए विभिन्न सवालों पर गौर करने के बजाए सिर्फ औरतों पर नियंत्रण और संरक्षण (पैट्रनाइज) करने के काम आती है. हम पाते हैं कि यहां क्रांति को एक प्रक्रिया के रूप में देखने के बजाए और इतिहास को इस तरह समझने के बजाए कि विभिन्न संघर्ष इस इतिहास को गढ़ते हैं, इस सवाल को लेकर एक तरह का कामचलाऊ रवैया है, जो मुख्यत: आम समझ (कॉमन सेंस) पर टिका हुआ है. हमारे समाज के संदर्भ में यह आम समझ मुख्यत: सामंती नैतिकता की पैदाइश है. इस समझदारी को लेकर हमारी जो असहमतियां हैं, उनके अहम पहलुओं का एक खाका हमने अपने इस्तीफे में दिया था. इसलिए हम यहां उनमें से कुछ पहलुओं पर विस्तार में चर्चा करने की कोशिश करेंगे और यह बताएंगे कि हमारे ऐसा कहने के पीछे क्या आधार था.

दुनिया के किसी भी समाज की तरह भारतीय उपमहाद्वीप में भी पितृसत्ता का चरित्र इसकी अपनी ऐतिहासिक खासियतों और उत्पादन के तरीके (मोड ऑफ प्रोडक्शन) के जरिए तय होता है. यहां के समाज में पितृसत्ता की बुनियाद अभी भी मजबूती से ब्राह्मणवादी सामंतवाद पर टिकी हुई है, और इसका साम्राज्यवादी बड़ी पूंजी के साथ गंठजोड़ पितृसत्ता को और मजबूती देता है. यहां तक कि जाति व्यवस्था को कायम रखने में महिलाओं तथा उनकी यौनिकता पर नियंत्रण को लेकर एक ऊपरी समझदारी भी इसको उजागर करती है कि कैसे पितृसत्ता के सवाल को प्रभुत्वशाली अर्ध-औपनिवेशिक सामाजिक संबंधों के दायरे से बाहर रख कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यही संबंध अलग अलग लिंगों के बीच में गैर बराबर शक्ति संबंधों को तय करते हैं. और इसलिए, जिस तरह अर्ध औपनिवेशिक भूमि संबंधों को ठीक ही वर्ग संघर्ष का हिस्सा माना जाता है, उसी तरह महिलाओं की मुक्ति की लड़ाई और जाति के खात्मे की लड़ाई को भी वर्ग संघर्ष का ही हिस्सा मानना जरूरी है. इतिहास गवाह है कि जाति या पितृसत्ता के ढांचों को हमेशा ही चुनौती मिलती रही है. मार्क्सवाद हमें समाज को गति में देखना सिखाता है. अपनी अंतिम अवस्था से गुजर रहा पूंजीवाद, यानी साम्राज्यवाद के दौर का पूंजीवाद, बाजार के जरिए आजादी या चुनाव के जिन विचारों और मूल्यों को बढ़ावा देता है, उनका असली मतलब कभी भी आजादी या चुनाव की आजादी नहीं होता. इस दशा में आते आते, पूंजी अपना प्रगतिशील और लोकतांत्रिक चरित्र खो चुकी है और सामंतवाद के साथ गठबंधन करके वजूद में है. लेकिन, एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी होने के नाते हमारे लिए यह अहम है कि हम अंतिम अवस्था वाले पूंजीवाद द्वारा परोसे जा रहे बुर्जुआ मूल्य/नैतिकता और जाति तथा पितृसत्ता के ढांचों के खिलाफ संघर्षों से जन्म ले रहे लोकतांत्रिक मूल्यों/नैतिकता के बीच फर्क को अलग अलग करके देखें और समझें. हमारे लिए यह पहचानना जरूरी है कि हमारे समाज के संदर्भ में, हमारी चेतना अकेले सामंती और बुर्जुआ मूल्यों/नैतिकताओं के मेल से ही नहीं बनती है, बल्कि यह विभिन्न संघर्षों से और उनके जरिए पैदा होने वाले जनवादी और प्रगतिशील मूल्यों से भी बनती और विकसित होती है - जैसे कि तेभागा व तेलंगाना के संघर्ष, नक्सलवादी आंदोलन, मजदूर वर्ग के विभिन्न संघर्ष, महिला आंदोलन, दलित आंदोलन, एलजीबीटीआईक्यू आंदोलन, राष्ट्रीयताओं के संघर्ष या फिर विभिन्न व्यक्तियों के संघर्ष आदि. ऐसी अनगिनत मांगें, जिनके बारे में कुछ दशकों पहले तक सोचा तक नहीं जा सकता था, वे आज पैदा हो रही हैं तो सिर्फ इसी वजह से कि उनके लिए इन आंदोलनों ने जगह बनाई. लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन में इतिहास के दौरान लैंगिकता और पितृसत्ता के सवालों पर हुए इस विकास को कबूल करने और उनके साथ एक संवाद बनाने में लगातार एक हिचक दिखाई दे रही है, जो दिखाता है कि इस मुद्दे पर इतिहास से आंख मूंद ली गई है और दोतरफा तरीके से संवाद करने के बजाए चीजों को सिर्फ ऊपर से लाकर लागू करने का रुझान दिखाई दे रहा है.

लेनिन ने कहा था कि ‘एक क्रांतिकारी सिद्धांत के बगैर क्रांतिकारी आंदोलन नहीं हो सकता.’ लेकिन लैंगिक पहलू को समझने के लिए इतिहास और सामाजिक संबंधों को लेकर जो समझ की कमी पाई गई है, उसका नतीजा यह है कि क्रांतिकारी आंदोलन यौन हिंसा और पितृसत्तात्मक उत्पीड़न से निबटने के मामलों में तथा इस लड़ाई में दखल देने और अपनी एक जगह बनाने के लिहाज से गलत तरीकों से काम ले रहा है. इसकी मिसाल के लिए हम अलग अलग ऐसे संगठनों के लिखे हुए दस्तावेजों, बयानों या फिर दर्ज किए गए विचारों को पेश करेंगे, जो एक विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद को मानते और क्रांतिकारी राजनीति पर अमल करते हैं. नारी मुक्ति संघ ऐसा ही एक संगठन है, जिसके राजनीतिक अनुभवों, काम-काज और महिलाओं की विभिन्न समस्याओं को लेकर उनके संघर्षों का एक छोटा सा इतिहास रिवॉल्यूशनरी वुमन्स मूवमेंट इन इंडिया नाम की एक किताब में दिया हुआ है. झारखंड में आदिवासी महिलाओं के संघर्षों और विभिन्न मुद्दों पर नारी मुक्ति संघ के हस्तक्षेप का एक छोटा सा ब्योरेवार इतिहास देने के बाद, यौन हिंसा के सवाल पर इसका विश्लेषण इस तरह शुरू होता है: “एनएमएस के इलाकों में यौन उत्पीड़न और बलात्कार की घटनाओं में कमी आई है. जब भी बलात्कार की घटना होती है, एनएमएस जन अदालत बुलाती है. वह जांच करती है और अगर वह पाती है कि लड़का एक गरीब परिवार से है और टीवी, सिनेमा की साम्राज्यवादी सांस्कृतिक के प्रभाव में आ गया है और अगर वह अपना अपराध कबूल कर लेता है, तो उसे कड़ी चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है.” (रिवॉल्यूशनरी वुमन्स मूवमेंट इन इंडिया, न्यू विस्टास पब्लिकेशंस, पृ.31) यहां भी, यौन हिंसा की वजहें ‘चेतना के दायरे’ में देखी गई हैं, जिसको ‘टीवी, सिनेमा की साम्राज्यवादी संस्कृति’ तय करती है (यह एक ऐसी बात है जो विभिन्न लेखों में आजिज कर देने की हद तक दोहराई गई है). इसका नतीजा सिर्फ यही नहीं है कि बलात्कार के अपराधियों को ‘कड़ी चेतावनी’ देकर छोड़ दिया जाता है, बल्कि यौन हिंसा की वजहों को भी गलत तरीके से समझा जाता है. इस संदर्भ में, साम्राज्यवादी संस्कृति की इतने जोर-शोर से की गई आलोचना खतरनाक तरीके से उस प्रतिक्रियावादी समझदारी के बेहद करीब आ गई है, जो कहती है कि एक बाहरी बुराई (इस मामले में साम्राज्यवादी संस्कृति) हमारे एकसार और आदर्श समाज को भ्रष्ट कर रही है और यौन हिंसा को बढ़ावा दे रही है.

जब मामला शहरों से जुड़ा हो, तब तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा को जन्म देने वाली ‘साम्राज्यवादी संस्कृति’ का यह विचार और जोर पकड़ लेता है, क्योंकि ऐसा माना गया है कि इस संस्कृति का असर निम्न-पूंजीपति तबके पर कहीं ज्यादा है. मिसाल के लिए रेवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट द्वारा अक्तूबर 2013 में लाए गए एक हिंदी बयान को देखें, जो तरुण तेजपाल द्वारा एक पत्रकार पर किए गए यौन हमले के बारे में है. शुरू में इसकी निंदा करने के बाद यह बयान निम्नलिखित विश्लेषण पर उतरता है:

“वैश्वीकरण और नवउदारवादी संस्कृति का जिस तेजी से हमारे सामने एक मॉडल खड़ा हुआ है उसे हम कारपोरेट, संसद व विधायिका, मीडिया और साम्राज्यवादी गिरोहों के गठजोड़ में देख सकते हैं। इस गठजोड़ में अहम हिस्सा है महिला को बाजार में ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ के रूप में उतारना। यह साम्राज्यवादी संस्कृति है जिसका गठजोड़ अपने देश में सामंतवादी ब्राह्मणवादी संस्कृति के साथ हुआ है। मीडिया संस्थानों के मालिकों, प्रबंधकों, संपादकों...में मुनाफे की होड़, संपदा निर्माण और सत्ताशाली होने का लोभ-लालच पत्रकारिता, लोकतंत्र, संस्कृति, आधुनिकता, जीवनशैली आदि आवरण में खतरनाक रूप से ऐसी संस्कृति को पेश कर रहा है जो पूरे समाज और महिला के लिए भयावह स्थिति बना रहा है।”

इस समझदारी ने यौन हिंसा को ताकत और सत्ता के अपराध के रूप में देखने के बजाए, इसे महज सेक्स और लालसा तक सीमित कर दिया है. यौन हिंसा को गैर बराबर सामाजिक रिश्ते में निहित ताकत के अपराध के रूप में देखने वाले यह मांग करेंगे कि घर से लेकर काम की जगहों तक सभी जगहों का जनवादीकरण किया जाए, जबकि ऊपर दिया गया आरडीएफ का विश्लेषण आखिर में औरतों के ऊपर मर्दों के नियंत्रण और संरक्षण को बढ़ावा देता है और अपने ऊपर होने वाले हमलों के लिए खुद औरतों को ही दोष देने की हद तक चला जाता है. इस तरह आरडीएफ के विश्लेषण ने, उन औरतों को एक तरह से खुद अपने पर होने वाली हिंसा के लिए जिम्मेदार बना दिया है, जो अपनी ‘भ्रमित चेतना’ के कारण ‘जीवन शैली/संस्कृति/आधुनिकता/लोकतंत्र’ के नाम पर परोसी जाने वाली चीजों को अपनाती हैं और ‘कॉरपोरेट मीडिया घरानों’ में काम कर रही हैं. हालांकि हम यहां ये भी जोड़ना चाहेंगे, कि यह आलोचना पेश करते हुए हम यह नहीं कह रहे हैं कि साम्राज्यवाद द्वारा परोसी जा रही संस्कृति या उपभोक्तावाद की हिमायत की जाए, बल्कि हम इस बात की तरफ ध्यान दिला रहे हैं कि जब साम्राज्यवादी संस्कृति या उपभोक्तावाद को अधकचरे तरीके से यौन हिंसा के मामलों की व्याख्या करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो यह समस्याजनक हो जाता है.

यह समझदारी कॉमरेड अनुराधा गांधी जैसी वरिष्ठ क्रांतिकारी नेता के लेखन में भी चली आई है. जब उनसे एक इंटरव्यू में शहरी महिलाओं द्वारा झेले जा रहे उत्पीड़न की प्रकृति के बारे में पूछा गया, तो वे जवाब देती हैं कि दूसरी समस्याओं के साथ साथ, “शहरी महिलाओं पर साम्राज्यवादी संस्कृति का असर बहुत ज्यादा है. शहरी जनता न सिर्फ उपभोक्तावाद से प्रेरित है, बल्कि इसकी शिकार भी है, जो इंसानी मूल्यों के बजाए फैशन और सौंदर्य उत्पादों को ज्यादा अहमियत देती है. इस साम्राज्यवादी संस्कृति के नतीजे में, शहरी इलाकों में अत्याचारों और यौन दुर्व्यवहारों की वजह से असुरक्षा का माहौल है.” (स्क्रिप्टिंग द चेंज, पृ.276). दक्षिणपंथी विचारकों और सभी रंगों के संसदीय दलों के नेता यौन हिंसा में इजाफे के लिए टीवी, सिनेमा, फैशन, सौंदर्य उत्पादनों वगैरह पर इल्जाम लगाते हैं, लेकिन जब मौजूदा सामाजिक ढांचे को पूरी तरह से बदलने के लिए लड़ने वाले आंदोलन भी उनसे मिलता जुलता विश्लेषण करें, तब यह भारी चिंता और खतरे का विषय है. इसलिए हमने इस पर सवाल उठाए, और जब भी हमने ऐसे सवाल उठाए, तो यह सुनने में आया कि हमें अनुराधा गांधी जैसी हस्ती पर सवाल करने या आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है. सवाल है कि यह अधिकार क्यों नहीं है? आखिर वह कौन सी बात है, जो हमें कुछ सवालों और चिंताओं को उठाने से रोकती है, यहां तक कि उन्हें अंदरूनी तौर पर भी नहीं उठाया जा सकता? ऐसे सवाल उठाने पर अगर कोई नाराज होता है, तो यह और कुछ भी नहीं बल्कि मतांधता और पोंगापंथ है. मार्क्सवादी व्यवहार हमेशा ही आलोचनाओं और उन आलोचनाओं के जवाबों से होकर विकसित हुआ है. खुद अनुराधा गांधी भी उन मुट्ठी भर लोगों में से थीं, जिन्होंने जाति के सवाल पर जड़ समझदारी के ऊपर सवाल करना शुरू किया. आखिरकार उनके सवालों ने इस मुद्दे पर मा-ले-मा की समझ को और धारदार ही बनाया. लेकिन यह विडंबना ही है कि जब हमने जेंडर और पितृसत्ता पर उनके कुछ विचारों पर सवाल उठाए तो कुछ लोगों ने कहा कि हमारी ‘सफाई’ होना जरूरी है.

पिछले तीन बरसों में हमने बस इस समस्याग्रस्त समझदारी पर एक बहस की मांग की है. लेकिन इसके बदले में हमने सिर्फ और सिर्फ यही देखा कि हमारे द्वारा उठाए गए सवालों को अवैध घोषित करने के लिए हमें बेईमान करार देने की बार-बार कोशिशें की कईं. लगातार इस बेशर्म निरंकुशता का सामना करते हुए, आखिर में हम 21 नवंबर को अपना इस्तीफा सौंपने पर मजबूर हुए, हालांकि विडंबना यह थी कि हम संगठन की एक्जीक्यूटिव कमेटी (ईसी) और जेनेरल बॉडी दोनों जगहों पर बहुमत में थे. हमारे इस्तीफे के बाद डीएसयू की तथाकथित ईसी एक जवाब लेकर आई. हमारे द्वारा उठाए गए राजनीतिक सवालों और आलोचनाओं पर गौर करने के बजाए, उम्मीद के मुताबिक इस जवाब में भारी लफ्फाजी और तोहमतों (स्लैंडरिंग) की भरमार है. अगर हमारा इरादा किसी को बचाने का था, जैसा कि इस बयान में दावा किया गया है, तो हमारे लिए भारी बहुमत के साथ संगठन में बने रह कर ऐसा करना कहीं आसान था. हमने इसलिए इस्तीफा दिया, क्योंकि हमने यह महसूस किया कि इस संगठन में रहते हुए इस बहस को रचनात्मक रूप से आगे बढ़ाने की कोई जगह और गुंजाइश नहीं बची थी. हमने यह पूरी तरह जानते हुए इस्तीफा दिया कि ऐसा करने के बाद हम पर घिनौने पलटवार होंगे और उससे भी घिनौनी तोहमतों के साथ हमला किया जाएगा. और अगर पिछले महीने भर में डीएसयू के कथित ईसी और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के रवैए को आधार माना जाए, तो इन्होंने असल में हमें सही साबित किया है. जेंडर और पितृसत्ता पर कोई भी बहस, जो मौजूदा हालात और ढांचे को जस का तस बनाए रखने वाली किसी भी पिछड़ी हुई समझदारी पर सवाल करे और उसे चुनौती दे, उसको हमेशा ही घसीट कर व्यक्तियों पर हमलों में बदल दिया जाता है. और फिर तोहमतें, हमेशा ही इस पितृसत्तात्मक समाज की प्रतिक्रियावादी ताकतों के हाथ का ऐसा हथियार रही हैं, जिसे वे खुद को चुनौती देने और सवाल उठाने वाले लोगों के खिलाफ इस्तेमाल करती हैं. और इस मामले में यह रवैया जेंडर और पितृसत्ता पर आंदोलन की सामंती-नैतिकतावादी समझदारी के साथ साफ-साफ मेल भी खाता है. लेकिन यह शोरशराबा, भारी लफ्फाजी, कानाफूसियों के अभियान, तोहमतें और अलग-अलग लोगों के चरित्र के बारे में कही जा रही बातें उन सवालों को दफना नहीं सकतीं, जो हमने उठाए हैं. और हम अभी भी यह उम्मीद करते हैं कि आखिर में क्रांतिकारी आंदोलन इन अहम सवालों पर गौर करेगा, जो इस समाज के क्रांतिकारी बदलाव और समाज के जनवादीकरण के मकसद के साथ इतने करीबी रूप से जुड़े हुए हैं कि उसका हिस्सा हैं.


[यहां पढ़ें: भाग 2, भाग 3]

छत्तीसगढ़ के कैद पत्रकारों के समर्थन में बयान

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/20/2015 04:58:00 PM



संतोष-सोमारू को रिहा करो!
पत्रकार सुरक्षा कानून बनाओ!
जन सुरक्षा अधिनियम खत्‍म करो!

छत्‍तीसगढ़ के बस्‍तर में इस साल जुलाई और सितंबर में जन सुरक्षा अधिनियम के तहत फर्जी मामलों में गिरफ्तार किए गए दो पत्रकारों सोमारू नाग और संतोष यादव की रिहाई व पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की मांग को लेकर 21 दिसंबर, 2015 को जगदलपुर में होने जा रहे पत्रकार महाआंदोलन को हम बेशर्त समर्थन ज़ाहिर करते हैं। देश में पिछले कुछ समय से अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर जिस तरह से हमले बढ़े हैं और पत्रकारों को लगातार डराया, धमकाया व मारा गया है, उसने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों की वैधता पर सवाल खड़ा कर दिया है और लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों को ही खतरे में डाल दिया है।

छत्‍तीसगढ़ की स्थिति इस मामले में इसलिए विशिष्‍ट है क्‍योंकि वहां पत्रकारों को नक्‍सलियों और राज्‍यसत्‍ता के दो खेमों में बांट दिया गया है। हालत यह है कि दंतेवाड़ा के सुदूर अंचलों में सांस लेने के लिए पत्रकारों को पुलिस या नक्सलियों की अनुमति लेनी होती है और अगर किसी पत्रकार को पुलिस और नक्सलियों के संघर्ष में पिस रहे आदिवासियों की चीखें बेचैन करती हैं और वह तटस्थ रहने का अपराधबोध सहन नहीं कर सकता है, तो उसकी जगह जेल या मृत्युलोक ही तय है। बस्तर में आंचलिक पत्रकारों की भयावह स्थिति को नेमीचंद्र जैन और साईं रेड्डी के उदाहरणों से समझा जा सकता है जिनको पहले पुलिस ने नक्सलियों का मुखबिर होने के आरोप में जेल भेजा और बाद में रिहा होने पर नक्सलियों ने उन्हें पुलिस का एजेंट बता कर मार डाला। अब संतोष यादव और सोमारू नाग को लगातार जगदलपुर की जेलों में उत्‍पीड़न से गुज़रना पड़ रहा है लेकिन अब तक देश भर में कोई बड़ा आंदोलन इनके समर्थन में खड़ा नहीं हो सका है।

बस्तर में पत्रकार पहले भी आन्दोलित हुए हैं। उन्होंने न केवल सरकार और पुलिस तंत्र के विरुद्ध अपना स्वर तीखा किया बल्कि नक्सलियों के विरोध में भी अपनी जान को हथेली पर रख कर उतरे हैं। जब पत्रकार नेमीचन्द्र जैन की हत्या नक्सलियों द्वारा की गई थी, तब एकजुट होकर सभी आंचलिक पत्रकारों ने यह निर्णय लिया था कि कोई भी नक्सल सम्बन्धी समाचार नहीं बनाया जाएगा। इसके बाद नक्सली प्रवक्ता गुडसा उसेंडी ने लिखित माफीनामा जारी किया था। एक अन्य आन्दोलन पत्रकार साईं रेड्डी की हत्या के साथ आरम्भ हुआ जिसमें सभी आंचलिक पत्रकार दोबारा एकजुट हुए और उन्होंने नक्सल इलाकों के भीतर घुस कर अपनी बात रखने और विरोध करने का फैसला किया। यह नक्‍सलियों को स्पष्ट संदेश था कि कलम की अभिव्यक्ति पर आतंक हरगिज़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यही स्थिति पुलिस तंत्र और उसकी ज्यादतियों के विरुद्ध भी है और होनी भी चाहिए। ये घटनाएं और आन्दोलन स्पष्ट करते हैं कि बस्तर के पत्रकार व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि अभिव्यक्ति के मूलभूत अधिकार के लिए लड रहे हैं।

लोकतंत्र के कारगर तरीके से काम करने के लिए ज़रूरी है कि इस देश का पत्रकार निष्‍पक्ष और निर्भीक होकर बिना किसी दबाव के अपना काम कर सके ताकि लोगों तक सही खबरें पहुंचायी जा सकें। संतोष यादव और सोमारू नाग का उदाहरण इस लिहाज से राज्यसत्‍ता के आतंक व तानाशाही के खिलाफ एक प्रतीक है और देश में अभिव्‍यक्ति की आज़ादी की लड़ाई को इसी के इर्द-गिर्द खड़ा किया जाना ज़रूरी है। देर से ही सही, लेकिन देश भर के पत्रकारों के बीच इस मसले पर हो रही हलचल स्‍वागत योग्‍य है।

हमारी मांग है कि संतोष और सोमारू को तत्‍काल बिना शर्त रिहा किया जाए। इसके अलावा छत्‍तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम नाम का काला कानून तुरंत खत्‍म किया जाए और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक कानून बनाया जाए, जिसकी मांग 21 दिसंबर को पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त संघर्ष समिति के तहत उठायी जा रही है। इसके अलावा हम राज्‍य सरकार से यह भी मांग करते हैं कि बीते पांच वर्षों में पत्रकारों पर हुए हमलों और उत्‍पीड़नों पर वह एक श्‍वेत पत्र जारी करे और इस मसले पर एक सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया चलाए जिससे एक समग्र पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने में मदद मिलेगी।

हम यह भी मांग करते हैं कि जिन पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया है उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की शिनाख्त कर उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जाएं और इन पत्रकारों की क्षतिपूर्ति की जाए। अंत में, हम छत्‍तीसगढ़ के सभी पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों से अपील करते हैं कि अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर हो रहे हमलों के विरोध में वे 21 दिसंबर, 2015 को अपना संपादकीय खाली छोड़ दें।


दस्‍तखत करने वाले संगठनों व व्‍यक्तियों के नाम:

अर्जुन प्रसाद सिंह (पीपुल्‍स डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ इंडिया)
आनंद स्‍वरूप वर्मा (समकालीन तीसरी दुनिया)
पंकज बिष्‍ट (समयान्‍तर)
असद ज़ैदी (लेखक और प्रकाशक)
उदय प्रकाश (लेखक)
अपूर्वानंद (दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय)
जावेद नक़वी (वरिष्‍ठ पत्रकार)
भारत भूषण (वरिष्‍ठ पत्रकार)
उज्‍ज्‍वल भट्टाचार्य (वरिष्‍ठ पत्रकार, दिल्‍ली/जर्मनी)
दिलीप मंडल (वरिष्‍ठ पत्रकार, दिल्‍ली)
अनिल चमडि़या (मीडिया स्‍टडीज़ ग्रुप)
सुभाष गाताड़े (न्‍यू सोशलिस्‍ट इनीशिएटिव)
ईश मिश्र (दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय)
शबनम हाशमी (सामाजिक कार्यकर्ता, दिल्‍ली)
कविता कृष्‍णन (एपवा, सीपीआइ-एमएल लिबरेशन)
मनीषा सेठी (जामिया टीचर्स सॉलिडरिटी असोसिएशन)
सीमा मुस्‍तफा (वरिष्‍ठ पत्रकार)
शोमा सेन
ऋचा पांडे (प्रगतिशील महिला एकता केंद्र)
सन्‍हति (दिल्‍ली)
अमीक जामेइ (ऑल इंडिया तंज़ीम-ए-इंसाफ़)
डॉ. ए.के. अरुण (युवा संवाद और युवा भारत)
दीप सिंह शेखावत (जन संघर्ष समन्‍वय समिति)
महताब आलम (पीयूसीएल, दिल्‍ली)
शाहनवाज़ आलम (रिहाई मंच)
राजीव यादव (इंसाफ अभियान, उत्‍तर प्रदेश)
जर्नलिस्‍ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी
भूपेन सिंह (जर्नलिस्‍ट सॉलिडरिटी फोरम)
यशवंत सिंह (भड़ास4मीडिया डॉट कॉम)
राजकिशोर (वरिष्‍ठ पत्रकार, दिल्‍ली)
प्रशान्‍त टंडन (वरिष्‍ठ पत्रकार, दिल्‍ली)
नासिरुद्दीन हैदर खान (स्‍वतंत्र पत्रकार)
अमलेन्‍दु उपाध्‍याय (हस्‍तक्षेप डॉट कॉम)
पाणिनि आनंद (प्रतिरोध डॉट कॉम)
दिलीप खान (पत्रकार, दिल्‍ली)
प्रशांत राही (सामाजिक कार्यकर्ता)
अवनीश राय (जन मीडिया/मास मीडिया)
प्रकाश कुमार रे (बरगद डॉट ऑर्ग)
पीयूष पंत (लोक संवाद)
पंकज मोलेखी (वरिष्‍ठ पत्रकार, दिल्‍ली)
गीता शेषु (पत्रकार, दिल्‍ली)
जितेंद्र चाहर (संघर्ष संवाद)
रंजीत वर्मा (कविता: 16 मई के बाद)
अशोक कुमार पांडे (आग़ाज़ सांस्‍कृतिक मंच)
रेयाज़-उल-हक़ (हाशिया)
देबादित्‍य सिन्‍हा (विंध्‍य बचाओ अभियान, मिर्जापुर)
अभिषेक श्रीवास्‍तव (जनपथ)
वरुण शैलेश (पत्रकार, दिल्‍ली)
सरोज कुमार (पत्रकार, दिल्‍ली)
अरविंद के. पांडे (इंडोवेव्‍स)
मेरी मथाई
मुकुल सरल

नैरोबी डब्ल्यूटीओ: कयामत के आसार

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/04/2015 05:05:00 PM


पिछले एक महीने से पहले जेएनयू और फिर देश के दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्र अपनी स्कॉलरशिप को बढ़ाने और इसका विस्तार कर राज्य विश्वविद्यालयों में भी लागू करने की मांग के लिए आंदोलन कर रहे हैं. यह आंदोलन यूजीसी द्वारा स्कॉलरशिप की समीक्षा के फैसले से शुरू हुआ था, जिसके नतीजे में अभी मिल रही स्कॉलरशिप के बंद होने या उसमें मेरिट और आर्थिक स्थिति जैसे मानदंडों को लागू किए जाने की आशंका पैदा हो गईं. धीरे-धीरे यह आंदोलन बढ़ कर शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ आंदोलन में विकसित हो गया है और दिसंबर में नैरोबी में होनेवाली डब्ल्यूटीओ की बैठक के दौरान सेवाओं और सुविधाओं के व्यापक निजीकरण के हक में लिए जानेवाले फासलों की आशंका के खिलाफ उठ खड़े आंदोलनों का एक हिस्सा बन गया है. आनंद तेलतुंबड़े इस बार बता रहे हैं कि इस बैठक के नतीजे और शिक्षा का निजीकरण किस तरह बराबरी पर आधारित एक जनवादी के सपने के खिलाफ है. अनुवाद: रेयाज उल हक

केन्या के नैरोबी में 15-18 दिसंबर को होने वाली डब्ल्यूटीओ की 10वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में उच्च शिक्षा पर यह सार्वजनिक विमर्श आखिरकार खत्म हो जाएगा कि उच्च शिक्षा सार्वजनिक/प्रतिभा/निजी सुविधा है और पिछले दो दशकों में उच्च शिक्षा से सरकार द्वारा अपने हाथ खींच लेने की खुली और छुपी हुई कार्रवाइयों का भी अंत हो जाएगा. इसी बैठक में मौजूदा दोहा दौर की वार्ताओं के नतीजे पर पहुंचने की योजना भी है. ये वार्ताएं 2001 में शुरू हुईं लेकिन सबसे कम विकसित और विकासशील देशों के लगातार विरोध के कारण वे कभी पूरी नहीं हो पाईं. डब्ल्यूटीओ की महापरिषद की एक विशेष बैठक नवंबर 2014 में जेनेवा में बुलाई गई थी, जिसने प्रतिरोध को दबाने की प्रक्रिया पर फैसला लिया था और नैरोबी वार्ताओं को अंजाम तक पहुंचाने के लिए ‘कार्य योजना’ को आखिरी शक्ल दी थी. एक बार इसके अमल में लाए जाने के बाद गरीब देशों के लोगों के लिए इसके तबाही भरे नतीजे होंगे क्योंकि बहुत सारी वस्तुएं और सेवाएं अचानक ही उनकी पहुंच से बाहर हो जाएंगी.

भारत के लिए इसके कोई कम गंभीर नतीजे नहीं होंगे. अगस्त 2005 में इसने हांग कांग में उच्च शिक्षा का जो प्रस्ताव रखा था, वह दोहा दौर के अंजाम तक पहुंचने के साथ ही एक ऐसी प्रतिबद्धता बन जाएगा, जिससे पीछे नहीं हटा जा सकेगा. हालांकि यह प्रस्ताव कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने रखा था, लेकिन इसके अंजाम को भाजपा के नेतृत्व वाली मौजूदा राजग सरकार फख्र से दिखाएगी और यह एक बार फिर से इन दलों के बुनियादी जनविरोधी चरित्र को उजागर करता है. सिर पर खड़ी इस तबाही के असर जनता पर अभी भी जाहिर नहीं हुए हैं, हालांकि ऑल इंडिया फोरम फॉर राइट टू एजुकेशन (एआईएफआरटीई) के तहत देश भर में विरोध का सिलसिला जारी है. एआईएफआरटीई, केजी से लेकर स्नातकोत्तर तक सबके लिए मुफ्त और समान शिक्षा की मांग करने के लिए 2009 में शुरू की गई सैकड़ों संगठनों और कार्यकर्ताओं की एक संघबद्ध संस्था है.

जाली अर्थव्यवस्था

उच्च शिक्षा के बाजारीकरण के पैरवीकार, लोगों को यह कह कर गलतफहमी पैदा करते हैं कि उच्च शिक्षा एक सार्वजनिक सुविधा नहीं है. अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक सुविधा को बहुत ही संकीर्ण तरीके से दोहरे मानकों के आधार पर तय किया गया है: बिना होड़ वाली और बाहर न किए जा सकने लायक, मतलब यह कि एक इंसान द्वारा उस सुविधा का इस्तेमाल किया जाना एक दूसरे इंसान द्वारा उसके इस्तेमाल में रुकावट न डाले और उस सुविधा को किसी भी इंसान द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने से रोका नहीं जा सकता. सार्वजनिक सुविधा की इस दोहरी प्रकृति उनकी मांग को पूरा करने के लिहाज से बाजार के प्रतिकूल बना देती है. और इसीलिए, उनके बारे में यह अपेक्षा की जाती है कि उनको बिना लाभ वाले संगठनों और सरकार द्वारा मुहैया कराया जाएगा. परंपरागत रूप से, लाइटहाउस (रोशनीघर) और राष्ट्रीय सुरक्षा अर्थव्यवस्था की किताबों में सार्वजनिक सुविधा के सबसे बेहतरीन मिसालें हैं. लेकिन अर्थव्यवस्था इस पर भी गौर करती है कि अमल में ऐसी मिसालें बहुत कम हैं और ज्यादातर सुविधाएं एक न एक मानक पर खरी उतरती हैं, या कभी वे सार्वजनिक सुविधा होती हैं और कभी नहीं, अपनी अलग अलग किस्मों के कारण वे बदलती रहती हैं. एक सार्वजनिक नजरिया ही अक्सर किसी सुविधा को सार्वजनिक या निजी बनाता है. मसलन लंदन की नेशनल पोर्ट्रेट गैलरी में हेनरी अष्टम का आधिकारिक पोर्ट्रेट सार्वजनिक सुविधा बनाया जाता है लेकिन लूवर में मोना लीजा की पेंटिंग नहीं. जैसा कि हम देखते हैं, अनेक ऐसी सुविधाएं हैं जिन्हें परंपरागत रूप से सार्वजनिक सुविधा माना गया था, जैसे कि सार्वजनिक सड़कें, जो अब तेजी से निजी सुविधा में बदलती जा रही हैं और टोल मार्गों के रूप में हाल में बाजार के दायरे में लाई गई हैं.

उच्च शिक्षा की क्या बात करें, यहां तो प्राथमिक शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं भी इस दलील के साथ निजी सुविधाएं बताई जा सकती हैं. यह पानी और हवा समेत हर चीज को मुनाफे के लिए बाजार में बेचे जाने के लिए वस्तु के रूप में बदलने की एकदम ठेठ नवउदारवादी तरकीब है. सार्वजनिक नजरिए में आम तौर पर शिक्षा और खास तौर से उच्च शिक्षा के चार बड़े काम हैं: नए ज्ञान का विकास (शोध का काम), उच्च गुणवत्ता वाले व्यक्यितों का प्रशिक्षण (सिखाने का काम), समाज को सेवाएं मुहैया कराना (सेवा का काम) और सामाजिक आलोचना (आचार संबंधी काम). अगर हम इनमें से हरेक कामों पर बिना होड़ वाले और बाहर न किए जा सकने वाले आर्थिक मानकों के मुताबिक भी गौर करें तो उच्च शिक्षा का झुकाव निजी सुविधा के बजाए एक सार्वजनिक सुविधा होने की ओर ही होगा. मिसाल के लिए नया ज्ञान पुराने ज्ञान पर बनता है; आइंस्टीन के सिद्धांत न्यूटन के आधारों के बिना मुमकिन नहीं होंगे. नवउदारवादियों द्वारा बौद्धिक संपत्ति अधिकार (आइपीआर) के जरिए शोध को निजी सुविधा के रूप में सीमित कर देने की पैरवी अदूरदर्शी है. लंबी दौड़ में, सैद्धांतिक ज्ञान नहीं पैदा होने या फिर आईपीआर या फिर डब्ल्यूटीओ की किसी दूसरी तरकीब के कृत्रिम औजारों के जरिए इसको अभिजात दायरे में सीमित कर देने का नए ज्ञान के उत्पादन की गति पर और इस तरह इंसानी भविष्य पर बहुत ही बुरा असर पड़ेगा.

फिर मैकाले के समय से ही दी जा रही एक और सदाबहार दलील शिक्षा के लिए संसाधनों की कमी के बारे में है. राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने अंदाजा लगाया है कि भारत को 2020 तक उच्च शिक्षा में 30 % ग्रॉस एनरॉलमेंट राशन (जीईआर: कुल नामांकन राशन) के लक्ष्य को पूरा करने के लिए करीब 19 हजार करोड़ डॉलर के निवेश की जरूरत है और उसने अपेक्षित रूप से सलाह दी है कि चूंकि सरकार के पास संसाधनों की कमी है इसलिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिए इसको पूरा किया जाए. साल 2012-13 के महज एक साल में सरकार ने कंपनियों के जो कर माफ किए थे, उनकी गिनती 5,73,627 करोड़ रुपए की गई थी (तब की विनिमय दर के मुताबिक 10 हजार करोड़ डॉलर से ज्यादा). सरकार कॉरपोरेट क्षेत्र को हर साल ऐसी रकम तोहफे में दे रही है, जिसके महज कुछेक बरसों की रकम को जोड़ दिया जाए तो इस तरह की अनेक जरूरतें पूरी हो सकती हैं.

भारी मुनाफे की काबिलियत

ये दलीलें दुनिया में उच्च शिक्षा के सबसे बड़े बाजार में वैश्विक पूंजी के खुले हितों के लिए महज एक मुखौटा हैं, जहां 15-24 साल की उम्र के 23.4 करोड़ लोग रहते हैं, जो अमेरिकी आबादी के बराबर है (फिक्की, 2011). यह बाजार सालाना 6500 करोड़ डॉलर का है जो 18 % से ज्यादा की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ रहा है और जो शिक्षा के 59.7 % ऐसे बाजार से बना है, जिसकी कीमतों में बढ़ोतरी होने से भी उसकी मांग पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. इसको ठीक ही निवेश के लिए ‘उभरता हुआ क्षेत्र’ करार दिया गया है. भारत के अकेले ऑनलाइन शिक्षा बाजार के ही 2017 तक 4000 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है, जिसमें संयुक्त राज्य (अमेरिका) ने भारी रुचि जाहिर की है. ‘बूमिंग डिस्टेंस एजुकेशन मार्केट आउटलुक 2018’ शीर्षक वाली आरएनसीओएस (एक बाजार शोध कंपनी) रिपोर्ट उम्मीद करती है कि भारत में दूर शिक्षा बाजार 2013-14 से 2017-18 के बीच 34 % की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ेगी.

इस क्षेत्र को निजी हाथों में सौंप देने की तैयारियां 1986 से ही शुरू हो गई थीं, जब नई शिक्षा नीति ने उच्च शिक्षा में निजी निवेश की इजाजत दी थी और जिसके नतीजे में शैक्षिक संस्थानों के भेष में निजी दुकानें पनप आईं जो भारी मांग वाली प्रोफेशनल शिक्षा बेच रही हैं. तब से लेकर अब वृद्धि करते हुए उन्होंने सचमुच के साम्राज्य खड़े कर लिए हैं. 1991 से, जब नवउदारवादी सुधारों को औपचारिक रूप से लागू किया गया, एक के बाद एक कमेटियों के जरिए लगातार कोशिशें की गईं और जिनका अंजाम मुकेश अंबानी-कुमारमंगलम बिड़ला कमेटी के रूप में हुआ जिसने अप्रैल 2000 में इस पर जोर डालने के लिए ‘अ पॉलिसी फ्रेमवर्क फॉर रिफॉर्म्स इन एजुकेशन’ तैयार किया कि उच्च शिक्षा को बाजार की ताकतों के भरोसे छोड़ दिया जाए. हालांकि तब से सरकार ने फीस में भारी बढ़ोतरी करते हुए अपने खर्च पर पढ़ने (स्व-वित्त) की प्रक्रिया को तेज किया है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह मुमकिन नहीं रहा था कि उच्च शिक्षा में राजकीय वित्त पोषण को पूरी तरह खत्म किया जाए. हालांकि इन कदमों ने निश्चित रूप से 2005 में डब्ल्यूटीओ को दिए गए उच्च शिक्षा प्रस्ताव की दिशा में जमीन तैयार किया था. इसके बाद, तब की संप्रग-दो सरकार ने विभिन्न (छह) बिलों के जरिए उच्च शिक्षा को गैट्स के हवाले करने में आनेवाली सारी बाधाओं को दूर करने की कोशिश की, जिसमें उच्च शिक्षा विधेयक और शोध विधेयक शामिल हैं जिनमें यूजीसी, एमसीआई, एआईसीटीई, एनसीटीई, बीसीआई आदि को पूरी तरह खत्म कर देने की पैरवी की गई थी. लेकिन सरकार इन्हें राज्य सभा में पास नहीं करा पाई. फिर सरकार ने संसद को दरकिनार करने की अपनी जानी-पहचानी तरकीब अपनाई और सितंबर 2013 में एक राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान की शुरुआत की, ताकि यूजीसी को खोखला करते हुए और निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) को बढ़ावा देते हुए उच्च शिक्षा के पूरे ढांचे को बदला जा सके. च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम, कॉमन सिलेबस वगैरह संभावित विदेशी खिलाड़ियों के लिए राह आसान बनाने की दिशा में उठाए गए कुछ कदम थे.

एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने उच्च शिक्षा के आंकड़ों को बेहतर बना कर दिखाने की होड़ भरी रणनीति अपनाई और इस प्रक्रिया में इसके तेजी से गिरते हुए मानकों की तरफ से आंखें मूंदे रखा. यहां तक कि आईआईटी और आईआईएम जैसे बेहतर शिक्षा के एकाध मानक भी बख्शे नहीं गए और अपने बुनियादी ढांचे और फैकल्टी का ख्याल किए गए बगैर उनकी तादाद बढ़ाई गई. इसने निश्चित रूप से जीईआर को 17-18% के दावे तक बढ़ा दिया लेकिन यह 26% के विश्व औसत और चीन (26.70 %), ब्राजील (36%) और रूस (76%) जैसे उभरते हुए देशों से काफी नीचे है. भारत के महाशक्ति बनने की हसरत के लिहाज से यह तो पूरी तरह निराशाजनक आंकड़ा है. यह फर्क वैश्विक पूंजी के लिए भारी निवेश और मुनाफे के मौकों के संकेत देता है.

नतीजे जिनको बदला नहीं जा सकेगा

थोड़े व्यंग्यपूर्वक कोई यह सोच सकता है कि भारत दुनिया के सबसे निजीकृत उच्च शिक्षा वाला देश बन चुका है; जहां कुल शैक्षिक संस्थानों में से 64% संस्थान निजी हैं. भारत में शिक्षा क्षेत्र में सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को इजाजत पहले ही मिल चुकी है, अप्रैल 2000 से 117.11 करोड़ अमेरिकी डॉलर से ज्यादा की रकम आ चुकी है. एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज के मुताबिक, देश में 631 विदेशी विश्वविद्यालय/संस्थान हैं, जिनमें से ज्यादातर ‘जुड़ कर काम करने (ट्विनिंग)’ (भारतीय विश्वविद्यालयों के साथ साझे उपक्रम के रूप में या अकादमिक साझेदारी के रूप में) की अवधारणा के साथ काम कर रहे हैं. ऐतिहासिक रूप से उच्च शिक्षा को हमेशा ही वित्तीय समर्थन की कमी रही है; इस पर सार्वजनिक खर्च 406 डॉलर प्रति छात्र रहा है जो मलेशिया (11,790 डॉलर), ब्राजील (3,986 डॉलर), इंडोनेशिया (666 डॉलर) और फिलीपींस (625 डॉलर) जैसे विकासशील देशों से भी कम है. गुणवत्ता के लिहाज से उच्च शिक्षा कहीं नहीं ठहरती; हमारे बेहतरीन शिक्षा संस्थान भी 240 की वैश्विक रैंकिंग से बाहर हैं. इसलिए अगर उच्च शिक्षा गैट्स के हवाले हो गई तो और ज्यादा नुकसान क्या हो सकता है? सबसे छोटा जवाब यह होगा कि मौजूदा नीति का अटपटा सा ‘मुनाफे के लिए नहीं’ का प्रावधान खत्म हो जाएगा; भारत की उच्च शिक्षा को लेकर भविष्य की सारी नीतियों की ट्रेड पॉलिसी रिव्यू मैकेनिज्म द्वारा वार्षिक समीक्षा की जाएगी जो डब्ल्यूटीओ के तहत एक कानूनी उपकरण है और उसके द्वारा सुझाए गए बदलावों को जरूरी तौर पर अपनाना होगा – यह भारत की आजादी और संप्रभुता का एक खुला उल्लंघन होगा – और बेशक अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए लागू आरक्षण और दूसरी रियायतें भी खत्म हो जाएंगी. कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए कभी खत्म न होने वाला चारा पैदा करने के मकसद के साथ उच्च शिक्षा व्यापार के लायक एक सुविधा बन जाएगी जिसे छात्रों द्वारा एक उपभोक्ता के रूप में खरीदना होगा.

नरेंद्र मोदी द्वारा भारतीय युवाओं के लिए बेहतर मौके पैदा करने के दावे पूरी तरह उजागर हो गए हैं, जब वे नैरोबी में अपने पिछले प्रधानमंत्री के नक्शेकदम पर चलते हुए उन्हें उच्च शिक्षा तक पहुंच से स्थायी रूप से बाहर कर देने की बंदोबस्त कर रहे हैं. कांग्रेस के लिए यह एक तरकीब थी, मोदी के लिए यह विचारधारात्मक मामला है. उनके परिवार की ब्राह्मणवादी श्रेष्ठतावादी विचारधारा के सुर इस प्रक्रिया में उदारवाद की सामाजिक डार्विनवाद के साथ बखूबी मिलते हैं, जिसके तहत अवाम की बहुसंख्या के पास जो कुछ भी थोड़ा बहुत है उसे उनसे छीन कर मुट्ठी भर अभिजातों के हाथ सौंप दिया जाता है ताकि वे उन पर प्रभुत्व स्थापित कर सकें. उन मुट्ठी भर लोगों के लिए उच्च शिक्षा में गैट्स की हुक्मरानी का मतलब शायद एक कभी न खत्म होने वाला एक मौका हो, लेकिन व्यापक अवाम के लिए इसका मतलब खतरे की घंटी होगी. आखिर इस दुनिया में किस तरह वे उच्च शिक्षा के लिए कीमत चुका पाएंगे, जिनसे 20 रु. रोज पर गुजर-बसर करने की उम्मीद की जाती है, जिनका कैलोरी सेवन चिंताजनक स्तर तक गिर चुका है, जो स्थायी अकाल की दशा में रह रहे हैं? उनके लिए सिर पर खड़ी इस कयामत को रोकने के लिए बस यही हफ्ता बचा हुआ है.

सहिष्णुता के अहंकार में डूबा समाज

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/25/2015 06:57:00 PM


आमिर खान के बयान के बाद छिड़े विवाद पर विद्या भूषण रावत की टिप्पणी।

आमिर खान की पत्नी के 'विदेश में बसने की खबर' से हर 'भारतीय' सदमे में हैं और उनको शाहरुख़ खान के साथ पाकिस्तान भेजने की बात कह रहे है। आमिर के पुतले जलाए जा रहे हैं और देश की विभिन्न अदालतों में उनके खिलाफ मुकदमे किए गए हैं जिनमें देशद्रोह का मुकदमा भी शामिल है। सबसे मज़ेदार बात यह है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय इस अभियान को बहुत हवा दे रहे हैं. वैसे भारत में रहने वाले लोग भी कह रहे हैं कि आमिर ने गद्दारी की है और उनको इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। है न कितनी अच्छी बात कि हम पश्चिमी लोकतान्त्रिक देशों में रहकर पूरे अधिकार के साथ भारत माता की जय बोलना चाहते हैं, मंदिर बनाना चाहते हैं, मोदी की बड़ी बड़ी रैलियां करना चाहते हैं लेकिन अपने देश में हम पूरी दबंगई दिखाना चाहते हैं। अगर यही बात अमिताभ करते तो क्या उन्हें कहीं भेजने की बात होती?

हम फ़िल्मी कलाकारों को भगवान बनाकर न देखें। व्यक्तिगत तौर पर मैं आमिर खान को ढकोसलेबाज़ मानता हूँ क्योंकि उनकी सत्य की जीत 'रिलायंस' के चंदे से होती है और भारत में अगर हम भ्रष्टाचार को लेकर लालू को इतना गरियाते हैं तो अम्बानी तो उस बीमारी के जनक थे। क्या अर्नब गोस्वामी जैसे भारत में 'ईमानदारी' का राग अलापने वाले मसीहा लोग अम्बानी और अडानी के बारे में बात करेंगे? जब करप्शन की बात हो तो राजनेताओं का ही हिसाब किताब क्यों हो, उद्योगपतियों का क्यों नहीं, क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगा उनकी ही दुकानों से निकलती है। इसलिए आमिर ने जो कहा वो बहुत सोच-विचार, रिहर्सल के बाद कहा और वो उनका व्यू पॉइंट है और उसे रखने की उनको छूट होनी चाहिए। उनको पाकिस्तान भेजने और उनको गाली देकर हिंदुत्व के लठैत आमिर की ही बात को सही साबित कर रहे हैं।

हालांकि, मैं आमिर की बातों से कत्तई इतेफाक नहीं रखता। सबसे पहले तो आमिर की यह बात गलत है कि भारत में असिहष्णुता अचानक बढ़ गई। हमारा देश असल में असभ्य और क्रूर है, जहाँ दहेज़ के लिए लड़कियां रोज जलती हैं, जहाँ प्रेम विवाह करने पर माँ बाप अपने ही बच्चों की निर्ममता से हत्या करने से नहीं घबराते, जहाँ किसी भी लड़की का शाम को घर से बाहर निकलना मुश्किल होता है। जहाँ सती का आज भी महिममंडन होता हो और विधवा होने पर औरतों की जिंदगी नरक बना दी जाती हो, जहाँ आज भी मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर उनकी हत्या कर दी जाती हो, जहाँ किसी के घर में क्या बन रहा हो उस पर समाज नियंत्रण करना चाहता हो, जहाँ स्कूलों से बच्चे इसलिए निकल कर चले जाते हो कि खाना किसी दलित महिला ने बनाया है, उस देश की महानता और संस्कृति का क्या कहें, जहां एक समाज को पढ़ने का हक़ नहीं और दूसरे को केवल मलमूत्र उठाने की जिम्मेवारी दी गई हो, जिसके छूने भर से लोग अछूत हो जाएं! लेकिन भारत की महान सभ्यता का ढोंग करने वालों का ध्यान इधर कभी नहीं गया। ऐसा नहीं कि इस विषय में लिखा नहीं गया हो या बात नहीं की गई हो।

असहिषुणता का इतिहास लिखें तो शर्म आएगी, तब आमिर खान से क्यों इतनी नाराज़गी है? मतलब साफ़ है। भारत के इलीट मुस्लिम सेकुलरिज्म के खेल में भारत की सहिष्णुता के सबसे बड़े 'ब्रांड' एम्बेसडर हैं। और जो व्यक्ति 'अतुलनीय भारत' की नौटंकी करता रहा हो वो अचानक पाला क्यों बदल बैठा! आमिर खान और अन्य कलाकारों ने भारत के 'सहिष्णु' होने के सबूत दिए और साथ ही दलितों या पसमांदा मुसलमानों की हालतों पर चुप रहकर उन्होंने हमेशा ही 'सहिष्णु' परम्परा का 'सम्मान' किया है। शायद रईसी परंपरा में केवल बड़े बड़े लोगों की बड़ी बड़ी बातें सेकुलरिज्म होती हैं लेकिन हलालखोर, कॅलण्डर, नट या हेला भी कोई कौम है, इसका शायद इन्हें पता भी नहीं होगा। हमें पता है कि अभी तक मैला ढोने की प्रथा के विरुद्ध आमिर ने कभी निर्णायक बात नहीं की, वो केवल टीवी शो में आंसू बहाने तक सीमित थी।

तो फिर क्या बदला? लोग कहते हैं कि कांग्रेस के ज़माने में भी सेंसरशिप लगी और फिल्में प्रतिबंधित हुईं। बिलकुल सही बात है। हम इमरजेंसी के विरुद्ध खड़े हुए लेकिन अब ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ दल का मुख्य आदर्श संजय गांधी और चीखने चिल्लाने वाले मुल्ले हैं जो किसी भी उदार विचार को या उनसे विपरीत विचार को डंडे और धमका डरा के रुकवाना चाहते हैं। फ़िल्मी लोगों को उतनी ही तवज्जो मिलनी चाहिए जिसके वे हक़दार हैं। पिछले कुछ वर्षों में बम्बइया फ़िल्मी लोग हिंदुत्व का एजेंडा लागू करने में सबसे प्रमुख रहे हैं और उनकी प्रसिद्धि ने चुनाव भी जितवाया है लेकिन उनमें कोई भी ऐसे नहीं हैं जो शाहरुख़, आमिर या अमिताभ का दूर दूर तक मुकाबला कर सके। अमिताभ हालाँकि गुजरात या अन्य सरकारी विज्ञापनों में आते हैं लेकिन वो भी राजनैतिक हकीकतों से वाकिफ हैं, इसलिए चुप रहते हैं। हालाँकि देर सवेर उन्हें मुंह खोलना पड़ेगा। आज के हिंदुत्व कॉर्पोरेट के दौर में भारत की आक्रामक मार्केटिंग चल रही है इसलिए आमिर या शाहरुख़ जो वाकई में भारत के सवर्णों की 'सहनशीलता' के 'प्रतीक' हैं इसलिए उनसे ये 'उम्मीद' ये की जाती है कि वे डॉ. ए. पी. जे. कलाम की तरह अपने 'भारतीय' होने का सबूत दें। कोई मुसलमान यदि अपने दिल की बात रख दे तो वो 'देशद्रोही' है। जिन लोगों को सुनकर हम बड़े हुए उन साहिर, दिलीप कुमार, मोहम्मद रफ़ी, बेगम अख्तर को धर्म के दायरे में डाला जा रहा क्योंकि वे अपनी एक राय रखते हैं। कई बार फिल्म स्टार, गायक या खिलाड़ी लोग वो बात कह देते हैं जो उनके कई प्रशंसकों को नहीं जंचती। उसमें कोई बुरी बात नहीं है। हम आमिर खान से साम्प्रदायिकता और सहिष्णुता का ज्ञान नहीं लेते, अपितु उनकी फिल्म इसलिए देखते हैं कि वो साफ सुथरी फिल्म बनाते हैं। क्या हम रवीना टंडन, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान या मनोज तिवारी से ज्ञान लें? हाँ फिल्मो में बहुत से लोग रहे हैं जिन्होंने गंभीर विषयों पर बोला है और उनकी समझ समझ है। बाकी हमको कोई कलाकार इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि हमें उसकी एक्टिंग अच्छी लगती है या फिल्म अच्छी लगती है। अगर आप आमिर या शाहरुख़ की फिल्मों का बॉयकॉट इसलिए करना चाहते हैं कि उनकी कोई बात आपको अच्छी नहीं लगी तो फैसला आपका है क्योंकि फिर आपको मनोज तिवारी, अनुपम खेर, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान आदि की फिल्मे देखनी पड़ेंगी क्योंकि उनके विचार आपको अच्छे लगते हैं।

आमिर खान ने जो कहा वो उनका हक़ था और शायद देश का बहुत बड़ा तबका वैसे ही सोच रहा है। अपने दिल की बात को अगर वो कह दिए तो हमारा क्या फ़र्ज़ है? उसको गालियों से लतियाएं या भरोसा दिलाएं? आमिर ने बस एक ही बात गलत कही कि असहिष्णुता बढ़ रही है, क्योंकि वो पहले से ही है। इस देश के लोगों ने उनको प्यार दिया है। जो लोग इस वक़्त दबंगई कर रहे हैं वो हमें आपातकाल के संजय गांधी के गुंडों की याद दिला रहे हैं। आमिर को कहना चाहिए कि कौन लोग ऐसा तमाशा कर रहे हैं। ये पूरे देश के लोग नहीं हैं, ये एक पार्टी विशेष और जमात विशेष के लोग हैं जिन्होंने उन सभी को गरियाने और धमकाने का लाइसेंस लिया हुआ है जो इनकी विचारधारा से मेल नहीं खाते। इसलिए आमिर साहेब सबको न गरियाएं। साफ़ बोलिए वो कौन हैं जो असहिष्णुता फ़ैला रहे हैं। इमर्जेन्सी का विरोध करने वालों का सबसे बड़ा मॉडल इमरजेंसी का दौर ही है और वही व्यक्तिवादी राजनीति आज हावी है। केवल फर्क इतना है कि उस दौर में दूरदर्शन और रेडियो पर समाचार सरकार सेंसर करती थी और आज सरकार और सरकारी पार्टी के दरबारी पत्रकार पूरी ताकत से ये काम कर रहे हैं। आज अर्नब गोस्वामी और सुधीर चौधरी का दौर है जिसमें सरकार से मतभेद रखने वालों की खबरें सेंसर ही नहीं होंगी बल्कि उनको अच्छे से गरियाया जाएगा। आखिर 9 बजे के प्राइम टाइम शोज का यही उद्देश्य है। हकीकत यह है कि हम वाकई में एक भयानक दौर से गुजर रहे हैं जिसमें तिलिस्मी राष्ट्रवादी नारों की गूँज में हमारे मानवाधिकारों और अन्य संवैधानिक अधिकारों की मांग की आवाज़ों को दबा दिया जा रहा है। पूंजीवादी ब्राह्मणवादी लोकतंत्र से आखिर आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं? वो तो सन्देश वाहक को ही मारना चाहता है ताकि खबर ही न रहे और खबरें बनाने और बिगाड़ने के वर्तमान युग में मीडिया निपुण होता जा रहा है, जो बहुत ही शर्मनाक है।

इतिहास और वर्तमान का संबंध: रोमिला थापर

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/24/2015 09:41:00 PM




प्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रोमिला थापर से रणबीर चक्रवर्ती की इतिहास, समाज और संस्कृति पर बातचीत. साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार, अंग्रेज़ी पाक्षिक फ्रंटलाइन में प्रकाशित, रोमिला थापर के लंबे साक्षात्कार “लिंकिंग द पास्ट एंड द प्रेजेंट” का कुछ संपादित रूप है और यहां इसका पहला आधा हिस्सा प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवाद: शुभनीत कौशिक

रोमिला थापर, जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एमेरिटस हैं, भारत के सबसे प्रसिद्ध इतिहासकारों में से एक हैं। आदिकालीन भारत के अपने व्याख्यापरक अध्ययनों के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली है। उनके अनथक प्रयासों से आदिकालीन भारतीय इतिहास का अध्ययन समाज-विज्ञानों की ओर अधिक उन्मुख हुआ है। भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का उनका विशद अध्ययन अतीत के अन्वेषण और व्याख्याओं से पूर्ण है, जो न सिर्फ़ साक्ष्यों में समृद्ध है बल्कि प्राचीन इतिहास के अध्ययन में समाज-विज्ञानों जैसे, समाज शास्त्र, राजनीति विज्ञान, सामाजिक एवं सांस्कृतिक मानव-विज्ञान, भूगोल आदि को भी जोड़ने के लिए विशिष्ट है। जिसका नतीजा हमारे सामने प्राचीन/आदिकालीन इतिहास के ऐसे अध्ययन के रूप में आया है, जिसमें महज़ राजवंशों के विवरण और तिथियों की जगह अतीत के अंतर्दृष्टिपूर्ण अध्ययन ने ली है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान, रोमिला थापर ने हमें बार-बार इन बातों की भी याद दिलाई है: इतिहासलेखन के बदलते पैटर्न, इतिहासकारों द्वारा उठाए जाने वाले सवालों का विश्लेषण, इतिहासकारों की प्रविधियाँ और अतीत के अध्ययन के प्रति उनके दृष्टिकोण, जो अक्सर ही वर्तमान से भी जुड़े होते हैं। रोमिला ने अपने अध्ययनों के जरिये यह भी दिखाया है कि कैसे अतीत के एक अध्ययन-विशेष का प्रभाव वर्तमान की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक दशाओं पर भी पड़ता है। 


रोमिला थापर ने 1958 में लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरियंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ से, प्रो. ए एल बाशम के शोध-निर्देशन में पीएच-डी की उपाधि हासिल की। मौर्यकाल पर आधारित उनका यह शोध ग्रंथ बाद में, अशोक एंड द डिक्लाइन ऑव द मौर्याज़ शीर्षक से पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में प्राथमिक स्रोतों के आलोचनात्मक अध्ययन के आधार पर रोमिला थापर ने, अशोक और मौर्यकाल को उसके सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भ में देखने का प्रयास किया। इस पुस्तक ने आदिकालीन भारत से जुड़े इतिहासलेखन पर अमिट छाप छोड़ी। एंशियंट इंडियन सोशल हिस्ट्री और इंटरप्रेटिंग अर्ली इंडिया जैसी उनकी किताबों ने प्राचीन भारत के सामाजिक इतिहास संबंधी अध्ययन में उल्लेखनीय योगदान दिया। 1980 के दशक में रोमिला थापर द्वारा आरंभिक राज्यों के अध्ययन ने (मसलन, फ़्राम लिनिएज़ टू स्टेट और मौर्याज़ रिविजिटेड), ऐतिहासिक अनुसंधान के नए क्षेत्र खोले। इन पुस्तकों में, उन्होंने राज्य-समाजों के निर्माण के लिए उत्तरदायी जटिल सामाजिक-राजनीतिक और वैचारिक कारकों को रेखांकित करते हुए आदिकालीन भारत में राज्यों के गठन के इतिहास को समझाने की कोशिश की। यद्यपि रोमिला थापर की मुख्य रुचि आदिकालीन भारत के सामाजिक इतिहास में रही है, फिर भी उन्होंने आर्थिक इतिहास से जुड़े विषयों, जैसे जंगलों, व्यापारिक श्रेणियों, और व्यापार पर भी प्रचुर लेखन किया है।
 

हालिया दशकों में, शकुंतला और सोमनाथ: मेनी वायसेज़ ऑव हिस्ट्री जैसी उनकी किताबों में सांस्कृतिक इतिहास के प्रति उनका रुझान स्पष्ट है (यद्यपि, यहाँ यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि सांस्कृतिक इतिहास, उत्तर-आधुनिक एवं उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययनों से प्रभावित और उन्हीं से उपजे ‘सांस्कृतिक अध्ययन’ से कदाचित भिन्न है)। उनके अध्ययन का एक अन्य विशिष्ट क्षेत्र रहा है, इतिहास-पुराण की परंपरा का, आधुनिक विषय के रूप में इतिहास के साथ संबंध और इन दोनों का परस्पर तुलनात्मक अध्ययन। उन्होंने इस यूरोकेंद्रिक अवधारणा का भी सफलतापूर्वक खंडन किया कि आदिकालीन भारत में इतिहास का सेंस नहीं था और इसी प्रक्रिया में उन्होंने चक्रीय समय और रेखीय समय की अवधारणाओं का भी आलोचनात्मक विश्लेषण किया।
उनकी सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली किताबों में अर्ली इंडिया: फ़्राम द ओरिजिंस टू एडी 1300  शामिल है, जो उनकी पहले लिखी गयी किताब, हिस्ट्री ऑव इंडिया खंड (I) का ही परिवर्धित रूप है। इस पुस्तक में जो बदलाव और संवर्धन उन्होंने किए हैं, वह नए आंकड़ों, व्याख्या के नए मॉडलों, और नए परिप्रेक्ष्यों को अपने अध्ययन में शामिल करने को लेकर उनके खुलेपन को दर्शाते हैं। इससे विषय के प्रति उनकी निष्ठा का भी पता चलता है और यह दर्शाता है कि इतिहासकार की धारणाओं और मान्यताओं में भी बदलाव आते हैं – जो इतिहास की सजीवता का परिचायक है। अतीत की सांप्रदायिक और दक़ियानूसी व्याख्याओं की बेबाक आलोचक, रोमिला थापर को इतिहास में उनके योगदान के लिए, क्लुग प्राइज़ फॉर लाइफ़टाईम अचीवमेंट से भी नवाजा जा चुका है। वे वर्ष 1983 में भारतीय इतिहास कांग्रेस की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।
 

इस साक्षात्कार में प्रो. रोमिला थापर बताती हैं कि कैसे अतीत – सुदूर और/या हालिया- वर्तमान से अंतरंग रूप से जुड़ा हुआ है। वे इस बात पर भी चर्चा करती हैं कि अतीत के किसी चरण-विशेष के अध्ययन के चुनाव को वर्तमान परिस्थितियाँ कैसे और किस हद तक प्रभावित और निर्धारित करती हैं। उनके ये वक्तव्य अतीत के अध्ययन के प्रति अधिक संवेदना और जागरूकता पैदा करने वाले हैं। वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर अतीत के समरूपीकरण को लेकर हमें चेताती है और भारत के बहुलतावादी परम्पराओं पर ज़ोर देती हैं। वर्तमान को अधिक बेहतर समझने के दृष्टिकोण से, अतीत संबंधी अध्ययनों में नए सवाल उठाने को भी वे इस साक्षात्कार में बार-बार प्रोत्साहित करती हैं।
 

रणबीर चक्रवर्ती: आपकी हाल में आई किताब पास्ट एज़ प्रीजेंट पढ़ने पर ऐसा लगता है कि भारत में इतिहास के अध्ययन की दशा और इतिहास के प्रति बनी आम धारणा को लेकर आप थोड़ा दुखी हैं। इसे लेकर आप आशावादी नहीं दिखतीं। यद्यपि आप इसे लेकर निराश भी कतई नहीं हैं – जैसा आपने स्पष्ट ही लिखा है। इस बारे में बताएं।  

रोमिला थापर: आपका सवाल यह है कि पिछले कुछ दशकों में भारत में एक विषय के रूप में इतिहास कहाँ पहुँचा है। मुझे स्पष्ट करने दें कि इतिहास के अध्ययन और उस पर चर्चा करने के दो स्तर रहे हैं। एक तो है, अकादमिक इतिहासकारों वाला स्तर जहां मैं समझती हूँ कि पिछले दशकों में इतिहासलेखन में उल्लेखनीय और प्रभावशाली प्रगति हुई है, कम-से-कम उन इतिहासकारों के कार्यों में जो बेहतर विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से जुड़े हुए हैं। जब मैं इस मुद्दे पर विचार करती हूँ कि आज से पचास साल पहले इतिहास कैसे पढ़ाया जाता था, और उस समय इतिहासकारों को इतिहासलेखन को नयी दिशा की ओर उन्मुख करने में, जो संघर्ष करने पड़े, और इसकी तुलना जब आज इतिहास की दिशा-दशा से करती हूँ तो मुझे काफी बदलाव नजर आता है। यद्यपि ये बदलाव विश्वविद्यालयों में सार्वभौम नहीं रहे हैं। फिर भी, अब ऐसे इतिहासकार हैं जो इतिहास को बतौर समाज-विज्ञान ही नहीं देखते बल्कि उसके वैचारिक आधार को भी संज्ञान में लेते हैं।
 

पर इतिहास की एक दूसरी धारा भी है, जिसके बारे में मेरे विचार पहली धारा से बिलकुल विपरीत हैं। मेरा अभिप्राय है लोकप्रिय इतिहास (पापुलर हिस्ट्री) से, जिससे आम लोग अधिक परिचित हैं। इस धारा के अंतर्गत हो रहा लेखन या तो इतिहास ही नहीं है या है भी तो इसकी पद्धति लगभग एक सदी पिछड़ी हुई है। ‘लोकप्रिय इतिहास’ की इन किताबों में अक्सर बेतुके सवाल पूछे जाते हैं, अतीत के बारे में हर तरह का सामान्यीकरण किया जाता है, जो सामान्यतया इतिहास के बारे में ज्ञान के अभाव को ही दर्शाता है। लोक वृत्त में फैल रही इतिहास की यह धारा, जिसका प्रचार-प्रसार ऐसे लोगों द्वारा किया जा रहा है जो पेशेवर इतिहासकार नहीं हैं, कहीं-न-कहीं स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाये जा रहे इतिहास की पद्धति से भी जुड़ी हुई है। हम आज भी इतिहास की ऐसी समझ और इतिहास पढ़ाने की ऐसी पद्धति इस्तेमाल कर रहे हैं, जो पुरानी पड़ चुकी हैं। आज भी पूरा ज़ोर तिथियों और घटनाओं पर है और इतिहास को उन सूचनाओं के संकलन के रूप में देखा जा रहा है, जिसे छात्रों को कंठस्थ करना है। छात्रों को दिये गए इतिहास के नोट्स को देखकर किसी ने सही ही कहा कि वे बिलकुल टेलीफ़ोन डायरेक्ट्री की तरह दिखते हैं, जिसमें एक ओर संख्याएँ होती हैं और दूसरी ओर लोगों के नाम।
 

इतिहास की पद्धति के बारे में.   

यह दुखद है कि लोग आज भी यही सोचते हैं कि इतिहास अतीत के बारे में सूचना भर ही है। यह दृष्टिकोण, बतौर विषय इतिहास की सीमाओं को अत्यंत सीमित कर देने वाला है। इतिहास के शोध में हमारा ज़ोर महज़ ज्ञात स्रोतों से सूचनाएँ जुटाना ही नहीं है। बल्कि इसमें स्रोतों के नए प्रकारों की खोज करना, और अतीत को समझने और उसकी व्याख्या करने के लिए सूचनाओं का इस्तेमाल करने से पूर्व, पहले से कहीं अधिक सजग होकर साक्ष्यों की निर्भरता को जाँचना भी शामिल है। सूचनाएँ हासिल करने के लिए अतीत को खंगालने और फिर अतीत की व्याख्या करने के ये दो पक्ष, जोकि ‘ऐतिहासिक पद्धति’ का निर्माण करते हैं, आज अत्यंत ज़रूरी हो गए हैं।
 

दुर्भाग्य से इस बात पर पर्याप्त ज़ोर नहीं दिया जा रहा है कि स्कूलों और कॉलेजों में यह पद्धति, छात्रों को कैसे पढ़ाई जाये। इस पद्धति का अनिवार्य पहला चरण है: आँकड़े और साक्ष्य जुटाना। दूसरा चरण है इन आँकड़ों की विश्वसनीयता को जांचना और यह सुनिश्चित करना कि इस्तेमाल किए जाने वाले साक्ष्य विश्वसनीय और निर्भर-योग्य हैं। तीसरा चरण, घटनाओं के बीच कार्य-कारण संबंधों को देखना है क्योंकि तार्किक विश्लेषण के लिए यह बहुत ज़रूरी है। अगले चरण में यह सुनिश्चित करना कि हर विश्लेषण आँकड़ों के आलोचनात्मक मूल्यांकन पर आधारित हो। लोकप्रिय इतिहास में अक्सर ही, वास्तविक तार्किक विश्लेषण की जगह फंतासियां ले लेती हैं।
 

इन चरणों से गुजरकर ही आप वह वक्तव्य दे सकते हैं, जिसे हम ऐतिहासिक सामान्यीकरण कहते हैं। आज इस पूरी प्रक्रिया से गुजरने की अपेक्षा इतिहास के हरेक छात्र से की जाती है।
 

तो आप यह सुझा रही हैं कि इतिहास और अतीत में शौकिया रुचि और अतीत की एक इतिहासकार की समझ में, जो तार्किक आधार पर सूचनाओं को एकत्र कर उनके पद्धतिगत व्याख्या से संभव होती है, काफी अंतर है।   

हाँ, बिलकुल। यह बात सभी इतिहासों के संदर्भ में सही है। पर यह प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में और भी जटिल है, अगर हम इस्तेमाल होने वाले स्रोतों के वैविध्यता को ध्यान में रखें। प्राचीन भारतीय इतिहास की दर्जन भर किताबें पढ़ लेना ही काफी नहीं है, इससे आप विशेषज्ञ नहीं हो जाते। आपको स्रोतों के बारे में पता होना चाहिए और यह भी कि उनका विश्लेषण कैसे करना है। स्रोतों की भाषाओं में भी आपकी दक्षता होनी चाहिए। आपको पुरातत्व, भाषा-विज्ञान की भी जानकारी होनी चाहिए। भाषा-विज्ञान के जरिये ही आप भाषाओं में आने वाले बदलावों, शब्द-भंडारों के निर्माण, व्याकरण के बारे में और भाषाओं के अलगाव और उनके बीच होने वाली अंतःक्रिया के संबंध में अधिक बेहतर समझ बना पाएंगे।
 

उदाहरण के लिए, जब हम छात्र थे तो हमें यह बताया जाता था कि ऋग्वेद की भाषा इंडो-आर्यन भाषा ही है। पर आज यदि आप ऐसा वक्तव्य दें, तो वैदिक काल में विशेषज्ञता रखने वाले कुछ विद्वान इस कथन से जरूर अपनी असहमति जताएंगे क्योंकि भाषा-विज्ञान के सिद्धांतों के प्रयोग ने यह दर्शाया है कि ऋग्वेद में द्रविड़ भाषाओं के भी अंश सम्मिलित हैं। इन जानकारियों से इतिहासकार के प्रत्यक्षीकरण और स्रोतों के प्रति उसके दृष्टिकोण में भी बदलाव आते हैं। अब ऋग्वेद के संदर्भ में ही यह जानकारी इतिहासकार को ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है, जो एकल संस्कृति का न होकर सह-अस्तित्व में विद्यमान उन संस्कृतियों का है, जिनमें एक का प्रभुत्त्व है। तो इतिहासकार को इन अन्य संस्कृतियों के बारे में भी जानकारी जुटानी होगी और उनका अध्ययन करना होगा। इतिहासकार को नदियों के जल तंत्र के अध्ययन (हाइड्रोलॉजी) और आनुवंशिकी के अध्ययन और रिपोर्टों से मिलने वाली जानकारियों का समावेश भी अपने अध्ययन में करना होगा।
 

साक्ष्य से जुड़े इन पक्षों की चर्चा मैं इसलिए कर रही हूँ ताकि मैं यह समझा सकूँ कि इतिहास से जुड़े सवालों के जवाब, यह ज़रूरी नहीं कि हमेशा हाँ या ना में ही हों। क्योंकि इतिहास से जुड़े साक्ष्य वैविध्यता से भरे हुए और विवादित दोनों हो सकते हैं (इस कारण भी मुझे लगता है कि इतिहास में वस्तुनिष्ठ सवाल पूछे जाने का कोई मतलब नहीं बनता)। इतिहासकार को अपनी व्याख्याओं की तार्किकता पर निर्भर रहना होगा। यह भी कि साक्ष्यों में बदलाव होने पर इन व्याख्याओं में भी बदलाव हो सकते हैं। ऐतिहासिक व्याख्याएँ, एक निश्चित समय-बिन्दु पर एक विषय से संबंधित ज्ञान-विशेष की मात्रा पर भी निर्भर होती हैं। ऐसी व्याख्याओं पर प्रयोजन-विशेष के उद्देश्य से एक खास रंग भी चढ़ सकता है।  
 

अब मैं आपका ध्यान एक व्यापक मुद्दे की ओर आकर्षित करना चाहूँगा। वह यह कि आम लोगों के समक्ष कई बार कुछ समूहों द्वारा इतिहास और अतीत का एक समरूपी संस्करण प्रस्तुत किया जाता है। हम जानते हैं कि अतीत घटनाओं का समरूपी प्रस्तुतीकरण भर नहीं है। आप कह रही थीं कि ऋग्वेद में सिर्फ़ इंडो-आर्यन भाषा ही नहीं है! यह एक भाषा में रचा हुआ ग्रंथ नहीं है, इसमें अनेक भाषाएँ शामिल हैं जो विविध संस्कृतियों के अस्तित्व की ओर भी इशारा करती हैं।
 

एक अंतर तो विद्वत्ता के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी है। प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि आर्य भाषा मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत के स्थानीय निवासी ही थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! यह ऐसा तर्क है जो मुझे विभिन्न कारणों से कतई स्वीकार नहीं। भाषाई और पुरातात्विक आधार पर भी यह किसी तरह से संभव नहीं जान पड़ता। हम कहते हैं कि ऋग्वैदिक संस्कृति उत्तर-हड़प्पाकालीन थी, तो जाहिर है कि इसका मतलब हुआ कि इसमें इसकी पूर्वतर संस्कृति परिलक्षित नहीं होगी। हड़प्पा संस्कृति का संपर्क ओमान और मेसोपोटामिया से था, जिनका जिक्र ऋग्वेद में नहीं मिलता। ईसा पूर्व की तीसरी सहस्राब्दी के अंत और दूसरी सहस्राब्दी के आरंभ में, हड़प्पा संस्कृति अन्य समकालीन गैर-हड़प्पाई संस्कृतियों के साथ अस्तित्व में थी। दूसरी सहस्राब्दी के मध्य से अंत तक, जो ऋग्वेद का रचनाकाल भी माना जाता है, अनेक संस्कृतियों की मौजूदगी की जानकारी मिलती है। जैसे, चित्रित धूसर मृदभांड (पेंटेड ग्रे वेयर) संस्कृति, काला एवं लाल मृदभांड (ब्लैक एंड रेड वेयर) संस्कृति, महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति आदि। यह एकल संस्कृतियाँ नहीं हैं, इनमें विविधता भरी हुई है। अपने प्रसार और विस्तार के क्रम में आर्यभाषा भाषी, इन संस्कृतियों के संपर्क में ज़रूर आए होंगे। यह भी याद रखना चाहिए कि जहां एक ओर हड़प्पा संस्कृति एक विकसित नगरीय संस्कृति थी, जो लिखने की कला से भी परिचित थी, वहीं दूसरी ओर ऋग्वेद कालीन समाज नगरीकरण से अपरिचित एक कृषि आधारित समाज था।        
 

पर इस सबके बावजूद आज एक “परिशुद्ध आर्यवाद” (सेनीटाइज्ड आर्यानिज़्म) गढ़ने की कोशिश की जा रही है, जिसमें सब कुछ सरलीकृत होगा और जिसका स्रोत भी बस एक होगा। और समस्या की सारी जटिलताओं को दरकिनार कर दिया जाएगा।
 

ऋग्वेद में दक्षिणी प्रायद्वीप की महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति का भी कोई उल्लेख नहीं मिलता।
 

हाँ, ऋग्वेद में इस रूप में महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति का जिक्र नहीं है। पर इस टेक्स्ट में अन्य समूहों की चर्चा जरूर की गयी है, जैसे असुर, दास, दस्यु आदि। ऋग्वेद दो वर्णों की चर्चा करता है – आर्य और दास। ‘दास’ कौन थे? उनके बारे में ऋग्वेद में जो विवरण मिलता है वह यह है कि वे उन कर्मकांडों और रीति-रिवाजों को मानने वाले थे, जो आर्यों से भिन्न थे। ‘दास’ अलग देवताओं की उपासना करते थे, और वे वैदिक ग्रंथों के लेखकों की भाषा से भिन्न भाषाएँ बोलते थे। वे समृद्ध थे, मवेशियों के रूप में उनकी संपत्ति ईर्ष्या का विषय थी और वे अलग बसावटों में रहते थे। इसलिए कुछ विद्वान यह भी सोचते हैं कि वे अलग संस्कृति के थे। इतिहासकार के रूप में हमें यह सवाल करना होगा कि ‘दास कौन थे’ और उनका मिथकीकरण क्यों किया गया?
 

इसी तरह ‘दासी-पुत्र ब्राह्मणों’ का भी उल्लेख मिलता है। जिन्हें पहले तो अस्वीकार्य माना गया, पर बाद में जब इन लोगों ने अपनी शक्ति दिखाई तो उन्हें ब्राह्मण के रूप में स्वीकार कर लिया गया। ‘दासी-पुत्र ब्राह्मण’ स्वयं में ही एक विरोधाभाषी शब्द है क्योंकि ‘दासी-पुत्र’ (यानि एक दासी से उत्पन्न हुआ पुत्र) होना और ब्राह्मण की हैसियत दोनों में विरोध भाव है। वैदिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि देवों और असुरों में अक्सर संघर्ष होते रहते थे। यह एक स्तर पर मिथक है, पर यह मिथक भी तत्कालीन समाज की अवधारणाओं से बिलकुल अलग नहीं है। इतिहासकारों के मत में, वैदिक ग्रंथों में उत्तर-हड़प्पा काल से लेकर ईसापूर्व पाँचवी सदी के ऐतिहासिक नगरों के रूप में नगरीय संस्कृति के उदय तक का उल्लेख मिलता है। ऐसी स्थिति में क्या यह कहना संभव है कि ये वैदिक ग्रंथ संस्कृति के एक पैटर्न के उद्विकास के परिचायक भर हैं! पाँच हजार वर्षों के ऐतिहासिक गतिविधियों के बाद भी आज हम विविध संस्कृतियों के अस्तित्व के साक्षी हैं।
 

यह न तो एकल संस्कृति थी न एकाश्मी, यह तो संस्कृति के विविध समुच्चयों का संयोग थी। पर समरूपीकरण की इस प्रक्रिया में कहीं-न-कहीं यह दावा भी निहित है कि ‘हमारी सभ्यता अन्य सभ्यताओं से श्रेष्ठ है’।   
 

एक प्रचलित तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए और यूरोप में भी सभ्यता लेकर आर्य ही गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, पर यह आज भी उतना ही लोकप्रिय है। सबसे पहले अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थिओसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थिओसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे।
 

ये वे सिद्धांत हैं जो भारत के प्राचीनतम अतीत से जुड़े ऐतिहासिक विवादों से गहरे जुड़े हुए हैं। इनकी शुरुआत 19वीं सदी में हुई। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि यह वही समय था जब ‘नस्ल विज्ञान’ के अधीन यूरोपीय सर्वोच्चता पर, आर्य उत्पत्ति को आधार बनाकर चर्चा की जा रही थी। इनमें से कुछ सिद्धांत, बीसवीं सदी के यूरोप में ‘आर्यवाद’ को विनाशकारी दिशा की ओर ले गए। अतिरेक राष्ट्रवाद और अस्मिता की राजनीति के साथ ऐतिहासिक सिद्धांतों की जुगलबंदी के भयानक नतीजे हो सकते हैं, इसलिए यह ज़रूरी है इन सिद्धांतों पर चर्चा की जाए।
 

उन सवालों को, जिन पर ऐतिहासिक रूप से मतभेद है, वैसे ही सवाल या मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए, जिन पर विद्वान अलग-अलग मत रख सकें और उनमें से हरेक का दृष्टिकोण साक्ष्यों के आधार पर आँका जाए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में ‘आर्यों’ का मुद्दे पर इतना अधिक राजनीतिकरण हो चुका है कि जो विद्वान ‘आर्यों के भारत में ही उत्पन्न होने’ की अवधारणा पर सवाल उठाते हैं, उन्हें सोशल मीडिया और इंटरनेट का गुस्सा और अपमान झेलना पड़ता है। ऐसी स्थिति ऐतिहासिक परिचर्चा और वाद-विवाद-संवाद की संभावना को घटा देती है।
 

क्या आपको लगता है कि भारत की राजनीतिक संस्कृति में एक रुझान तेजी से बढ़ रहा है जिसमें अतीत को समरूपी बनाने और अतीत तथा वर्तमान के बीच एक निर्बाध निरंतरता दिखाने की कोशिश हो रही है।  
 

अतीत को विविध संस्कृतियों की जटिल अंतःक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए न कि एक सरलीकृत एकल संस्कृति के प्रभुत्त्व के रूप में। पर कुछ लोग अतीत को इसके जटिल रूप में देखना ही नहीं चाहते, वे इससे डरते हैं। हमारे अंदर यह आत्मविश्वास भी नहीं है कि हम अपनी संस्कृतियों को ऐसी संस्कृति के रूप में स्वीकार कर सकें, जिसकी उत्पत्ति विविध स्रोतों से हुई है और जो सदियों में विकसित हुई है और आगे ऐसे ही विकसित होगी। यह बात विश्व की अन्य संस्कृतियों के बारे में भी सच है। इतिहास के हर कालखंड ने संस्कृति-विशेष के उद्विकास को देखा है और हर समय में एकाधिक महत्त्वपूर्ण संस्कृतियाँ विद्यमान रही हैं। इतिहासकार के रूप में हमें इन संस्कृतियों के बीच समानताओं, विभेदों और उनमें होने वाली परस्पर अंतःक्रिया का अध्ययन करना होगा।
 

पर कुछ ऐसे लोग हैं जो चाहते हैं कि राष्ट्रवाद एक ही प्रभुत्वशाली संस्कृति पर आधारित हो, और जो अपनी संस्कृति मात्र को ही देश की सार्वकालिक राजनीतिक अस्मिता के तौर पर देखना चाहते हैं। समस्या की शुरुआत तभी होती है क्योंकि हम एक बहुलतावादी संस्कृतियों के समाज में रह रहे हैं।
 

इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में क्या राष्ट्रीकृत संस्कृति (नेशनलाइज्ड कल्चर) शामिल नहीं है? दूसरे शब्दों में, यह दावा कि केवल एक तरह की संस्कृति भारत में है और सब कुछ समरूप है और था।
 

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के निर्माण की प्रक्रिया की जड़ संस्कृति के औपनिवेशिक व्याख्याओं में है, बजाय कि संस्कृति के उन व्याख्याओं में जो प्राक-औपनिवेशिक काल में मौजूद थीं। हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि अलग-अलग समयों में, मसलन मौर्य काल, गुप्त काल, चोल युग, मुग़लों के समय में संस्कृति को किस रूप में देखा गया और उसे कैसे परिभाषित किया गया। हम इस मुद्दे पर सोचने से शायद इसलिए कतराते हैं क्योंकि इसकी पुनर्रचना करना आसान नहीं है। पर वे सभी देश, जो कभी उपनिवेश रहे हैं, उन्हें यह बात विचारनी होगी कि जिस रूप में आज वे अपनी पारंपरिक संस्कृति को स्वीकार कर रहे हैं, उसमें से कितना कुछ औपनिवेशिक परियोजना का रचा हुआ और औपनिवेशिक मान्यताओं का अंश है। यह बात जितनी भारत के लिए सच है उतनी ही इंडोनेशिया के लिए भी। और पेरू और मेक्सिको जैसे देशों के लिए तो और भी ज्यादे, जहाँ के पुराने दस्तावेजों को स्पेनिश आक्रमणकारियों ने जला दिया था।
 

इतिहास हमें बताता है कि परम्पराएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी या कुछ विशेष अवसरों पर रची जाती हैं। इसलिए यह कहना बिलकुल निराधार है कि एक खास समकालीन परंपरा पूर्णतः शुद्ध है और उसका इतिहास सहस्राब्दियों पीछे तक जाता है। वे परम्पराएँ भी, जिनका लंबा इतिहास होता है, समय-समय पर खुद में बदलावों का दौर देखती हैं।
 

यही बात शब्दों के इतिहास पर भी लागू होती है। अगर कोई संस्कृत, पालि और प्राकृत ग्रंथों में ‘आर्य’ शब्द के उल्लेख का अध्ययन करे, और यह समझने की कोशिश करे कि कैसे इतिहास में ‘आर्य’ शब्द का अर्थ और अस्मिता समय-समय पर बदले हैं। तो वह इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि ‘आर्य’ शब्द का यह जटिल इतिहास, 19वीं सदी में की जा रही ‘आर्य’ शब्द की व्याख्याओं से कदाचित भिन्न है। इस अध्ययन के दौरान इतिहासकार को यह भी देखना होगा कि संस्कृत, पालि और प्राकृत टेक्स्ट में कौन किसे ‘आर्य’ संबोधित कर रहा है, और क्यों। इस शब्द का इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है? पालि टेक्स्ट में हम पाएंगे कि ‘आर्य’ वह है जो श्रद्धेय है, जैसे एक बौद्ध संन्यासी, और इसका उसकी जाति, उत्पत्ति या पूर्व-व्यवसाय से कोई लेना-देना नहीं है।
 

देशज आर्यवाद (इंडीजेनस आर्यानिज़्म), कुछ अंशों में, धार्मिक राष्ट्रवाद का ही सह-उत्पाद है। धार्मिक राष्ट्रवाद संस्कृतियों की बहुलता को स्वीकार नहीं करता। यह एक धार्मिक संस्कृति को मुख्य ‘राष्ट्रीय’ संस्कृति बनाने की पुरजोर कोशिश करता है। दुनिया भर में राष्ट्रवाद का यह एक प्रमुख लक्षण रहा है, चाहे वह उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रवाद हो या भाषाई, धार्मिक या नृजातीय राष्ट्रवाद हो। राष्ट्रीय आंदोलनों में भी एक संस्कृति की सर्वोच्चता को स्वीकारने की प्रवृत्ति होती है, और यही संस्कृति ‘राष्ट्रीय’ संस्कृति बन जाती है।
 

धार्मिक राष्ट्रवाद एक धर्म, संस्कृति, भाषा आदि के सबसे अलग होने को रेखांकित करता है। यह अक्सर, राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए जान-बूझकर गढ़ा जाता है, जैसा हिंदुत्व के उदाहरण में हमें स्पष्ट दिखता है। जैसा कि बहुत-से विद्वानों ने कहा है कि ‘हिंदुइज़्म’ और हिंदुत्व दोनों एक ही चीज नहीं हैं।‘हिंदुइज़्म’ एक धर्म है, जबकि हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा। हिंदुत्व एक आधुनिक विचारधारा है जो कुछ बातें तो ज़रूर ‘हिंदुइज़्म’ से लेती है, पर यह ‘हिंदुइज़्म’ से बहुत अलग है। हिंदुत्व की अवधारणा 20वीं सदी में अस्तित्त्व में आई, और इसका उद्देश्य था - हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए हिंदुओं को राजनीतिक रूप से संगठित करना। धर्म पर आधारित विचारधारा के निर्माण में ज़रूरत पड़ने पर धर्म की आधारभूत बातों को भी फिर से रचा जा सकता है। यह पुनर्रचना अक्सर धर्म के अभिजात्य और पुरातनपंथी अनुयायियों को ध्यान में रखकर की जाती है। हिंदुत्व एक निश्चित भू-भाग, एकल संस्कृति और नृजातीय उत्पत्ति, एक भाषा और एक धर्म की बात करता है। यह हिंदुओं की साझी ‘पुण्यभूमि, पितृभूमि’ की भी बात करता है और अन्य सभी को विदेशी बतलाता है। हिंदुत्व अपने धार्मिक पक्ष में, सामी (सेमिटिक) धर्मों की रूपरेखा का ही अनुसरण करता है, मसलन, ‘ऐतिहासिकता’ पर ज़ोर और एकाश्मी (मोनोलिथिक) धर्म, एक पवित्र ग्रंथ, चर्च जैसे धार्मिक संगठन। गौरतलब है कि ये बातें सामाजिक और राजनीतिक संगठन में सहायक होती हैं। इसीलिए मैंने इसे ‘सिंडिकेटेड हिंदुइज़्म’ कहा है।
 

हाँ।                        
 

कई बार राष्ट्रीय संस्कृतियाँ उन महाकाव्यों (एपिक) को भी आधार बनाती हैं, जिनसे बहुसंख्यक लोग परिचित होते हैं। जब किसी महाकाव्य के बहुत से संस्करण होते हैं तो समस्या हो जाती है क्योंकि फिर ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ के निर्माण के लिए उनमें से एक ‘सही’ संस्करण का चुनाव करना होता है। जैसे भारत में रामायण के बहुत-से और विरोधाभासी संस्करण मौजूद हैं। पर धार्मिक राष्ट्रवाद को तो उनमें से किसी एक को ही ‘सही’ संस्करण के रूप में प्रोजेक्ट करना है – अब जाहिर है कि इतिहासकार इस पूरे प्रयास को ही अस्वीकार्य मानेंगे। एक टेक्स्ट जो ‘पवित्र ग्रंथ’ बन जाता है, असल में एक क्षेत्र के एक समुदाय के लिए रचा गया होता है। पर अलग-अलग कारणों से अन्य क्षेत्रों के लोगों द्वारा भी उस टेक्स्ट के स्वीकार्य हो जाने की स्थिति में, उस क्षेत्र के लोगों द्वारा उस टेक्स्ट में, या उसके कुछ भागों में अपनी ज़रूरत के हिसाब से आवश्यक बदलाव किए जाते हैं।
 

कई बार इतिहास के एक काल-विशेष को चुनकर उसे ‘क्लासिकल’ बताया जाता है, जिसके अंतर्गत उस समय में एकल प्रभुत्वशाली संस्कृति होने और सब कुछ सकारात्मक होने की अतिशयोक्तिपूर्ण बातें कही जाती हैं। यह राष्ट्रीय आंदोलन का भी केंद्रीय विचार (‘कोर आईडिया’) बन जाता है। पर असल समस्या तब पैदा होती है जब राष्ट्र-राज्य अस्तित्व में आता है, क्योंकि यह एकल संस्कृति अक्सर प्रभुत्वशाली बहुसंख्यक समुदाय की ही संस्कृति होती है। पर अब इस एकल संस्कृति की अवधारणा की ज़रूरत नहीं रह जाती चूँकि राष्ट्र एक धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्र बन चुका होता है, या वैसा बनने की कोशिश कर रहा होता है। अन्य संस्कृतियाँ भी समान दर्जे की मांग करने लगती हैं।
 

और यदि कोई ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ की बात कर रहा है तो स्पष्ट है कि इसमें देश की सभी संस्कृतियों का समावेश होना चाहिए – मसलन, आदिवासी, दलित, मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, पारसी आदि। ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ के निर्माण में बहुलता और विविधता तथा साझे इतिहास का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
 

आज हम संस्कृति के एक खास पक्ष को ही, उस संस्कृति-विशेष का परिचायक बताने का रुझान बढ़ता हुआ देख रहे हैं। यह कोशिश उन लोगों द्वारा की जा रही है जो या तो शक्तिशाली समूह का हिस्सा हैं या किसी तरह की सत्ता/शक्ति पाने की आकांक्षा रखते हैं। और सत्ता की इस आकांक्षा में कोई सांस्कृतिक संदेश या अभिव्यक्ति जैसी बात नहीं है, यह तो महज राजनीतिक सत्ता की आकांक्षा भर है। इससे इतिहास को भी नुकसान पहुँच रहा है।   
 

हाँ, इस पूरी प्रक्रिया में इतिहास को ज़रूर नुकसान पहुँच रहा है। इस बात के बावजूद कि आज इतिहासकार अतीत को इसकी विविधताओं में समझने की कोशिश कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि जब तक कि वह एक समुदाय-विशेष का ही इतिहास न लिख रहा हो, तब तक इतिहासकार को चाहिए कि वह अन्य समुदायों की उपेक्षा करते हुए एक ही समुदाय पर ध्यान न केन्द्रित करे। क्योंकि अतीत की इस विविधता में भी एक-दूसरे से अलग प्रतीत होने वाली इन बातों को, जोड़ने वाले संपर्क सूत्र मौजूद होते हैं।
 

19वीं सदी के सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलनों ने, कुछ सीमा तक ही सही, भारतीय धर्मों के प्रारूप में बदलाव लाये। 20वीं सदी में जब विद्वानों ने बदलाव की इस प्रक्रिया को समझने और इसे समर्थन देने वाले सामाजिक समूहों को पहचानने और समझने की कोशिश की, तो उन्होंने अपना ध्यान उच्च जतियों पर ही केन्द्रित किया। यद्यपि वे अन्य जातियों का भी संदर्भ देते थे, पर उनका मुख्य ज़ोर उच्च जातियों पर ही था। कुछ इतिहासकारों ने अलग-अलग सामाजिक समूहों के राष्ट्रवादी उन्मुखता पर काम करना शुरू किया। सबआल्टर्न स्टडीज़ में इसकी शुरुआत हुई, जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। जल्द ही यह बात भी पता चल गयी कि ‘निम्न’ माने जाने वाले सामाजिक स्तरों ने भी, मसलन, दलित एवं आदिवासी, राष्ट्रीय आंदोलन में अलग-अलग तरीकों से भागीदारी की।
 

इन अध्ययनों में दूसरे किस्म के भी सवाल पूछे गए, जैसे किन समूहों ने राष्ट्रवाद को धार्मिक राष्ट्रवाद में तब्दील किया, जिसका नतीजा हम वर्तमान में अस्मितापरक राजनीति के रूप में भी देख रहे हैं। और किन समूहों ने इस प्रक्रिया का विरोध, यह कहते हुए किया कि राष्ट्रवाद को धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए। तो इस तरह ‘राष्ट्रवाद’ से जुड़े दावों और अवधारणाओं का विधिवत अध्ययन शुरू हुआ।
 

पर ये अध्ययन अपने प्रभावशीलता में अकादमिक दुनिया तक ही सीमित रहे, इसका लोकप्रिय स्तर पर कोई खास प्रभाव नहीं दिखा। कारण यह कि राष्ट्रवाद के इन विश्लेषणात्मक और आलोचनापरक अध्ययनों को, नेताओं और जनता के द्वारा इन विद्वानों में ‘देशभक्ति के अभाव’ के रूप में देखा गया। इसलिए मेरा मानना है कि यदि हमें “धार्मिक राष्ट्रवाद” और “सेकुलर (धर्मनिरपेक्ष) राष्ट्रवाद” में फर्क करना है तो हमें सेकुलरवाद की एक स्पष्ट परिभाषा की भी जरूरत होगी।
 

इस तरह, उत्तर-औपनिवेशिक भारत में धर्मनिरपेक्षता की समझ बनाने के क्रम में विविध संस्कृतियों और बहुलतावाद को संज्ञान में लेना अनिवार्य हो जाता है। इसमें एक समस्या तो, ‘सेकुलरवाद’ शब्द के हमारे प्रयोगों को लेकर ही है। सेकुलरवाद का भारतीय दृष्टिकोण, आमतौर पर केवल धर्मों के सह-अस्तित्व की ही बात करता है। पर मैं इस दृष्टिकोण को अपर्याप्त समझती हूँ। अक्सर इस संदर्भ में, अशोक के शिलालेखों को उद्धृत किया जाता है, जिनमें अशोक ने सभी पंथों (सेक्ट्स) को एक-दूसरे का सम्मान करने और, विशेषतया, अन्य लोगों के पंथ का भी आदर करने की बात कही है। हालिया समय में, अक्सर यह कहा जाता है कि भारतीय सभ्यता ऐसी सभ्यता है, जिसमें हर धर्म का आदर किया जाता था और किया जा रहा है। यह कहना भर काफी नहीं है कि सभी धर्मों के सह-अस्तित्व का मतलब है एक सेकुलर समाज। बल्कि हमें इसके साथ ही सभी धर्मों के बराबरी के दर्जे पर, उनकी एक समान हैसियत पर भी ज़ोर देना होगा। जब हम धर्मों को एक ‘बहुसंख्यक समुदाय’ और ‘अल्पसंख्यक समुदाय’ से जोड़ते हैं, जैसा कि हम अक्सर ही करते हैं, तो हमारे द्वारा किया गया यह अंतर धर्मों के बराबरी के दर्जे के अभाव को भी मान्यता देता है।
 

कुछ विद्वानों ने कई बार यह कहा है कि ‘भारतीय समाज को सेकुलर बनाने और धर्म से अलग करने की सीमाएं हैं’। मेरा यह कहना है कि इसी अर्थ में धर्म की भी सीमाएं हैं, यानि राजनीति और समाज तथा इनसे संबंधित संस्थाओं को प्रभावित करने वाला एकमात्र कारक धर्म ही नहीं हो सकता। समाज की अस्मिता ‘खुली/मुक्त अस्मिता’ (ओपन आइडेंटिटी) होनी चाहिए।
 

क्या आपका तात्पर्य ‘बहु-अस्मिताओं’ (मल्टीपल आइडेंटिटीज़) से है?    
 

“ओपन आइडेंटिटी” शब्द का इस्तेमाल मैं इसलिए कर रही हूँ क्योंकि एक सच्चे लोकतन्त्र में एक स्थायी बहुसंख्यक समुदाय या अस्मिता का वर्चस्व नहीं हो सकता। हर बदलते मुद्दे के साथ, ‘बहुसंख्यक’ समूह की अवधारणा, उसका स्वरूप और गठन भी बदल जाता है। इसलिए ‘बहुसंख्यक’/बहुमत’ (मेजोरिटी) की अवधारणा, कोई पूर्व-निर्धारित अवधारणा नहीं है। यह एक प्रवाहमान तरल (फ्लुइड) अवधारणा है और लोकतंत्र में ऐसा ही होना चाहिए। जब हम लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं, तो हम एक ऐसी व्यवस्था के बारे में बात कर रहे होते हैं, जिसमें बहुतेरी अस्मिताएं सह-अस्तित्व में तो होती ही हैं, वे प्रवाहमान और वैविध्यतापूर्ण भी होती हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि एक धर्मनिरपेक्ष समाज में, ये अस्मिताएं कोई वर्चस्वशाली धार्मिक अस्मिताएं नहीं हैं।
 

हम भारतीय, अतीतकाल से ही खुद के अत्यंत सभ्य और सहिष्णु होने के दावे करते हैं। पर हम ‘अछूतों’ के साथ किए गए अमानवीय व्यवहार, जिसमें उन्हें अधिकार, प्रतिष्ठा और मानव-अस्तित्व के लिए ज़रूरी बुनियादी चीजों से भी वंचित कर दिया गया, की चर्चा नहीं करते।
 

जब हम ‘हिन्दू’ होने को परिभाषित करते हैं तो सामान्यतया ऐसा उच्च जाति के लोगों के संदर्भ में ही किया जाता है। क्योंकि इस परिभाषा का आधार वे टेक्स्ट होते हैं, जो इन्हीं जाति-समूहों के हैं। चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई या सिख, इस तथ्य की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता कि बहुतेरे धर्मावलंबी ऐसे होते हैं जो अपने धार्मिक ग्रंथों से थोड़ा ही परिचय रखते हैं। उनके लिए धर्म एक अलग ही मसला होता है। असल व्यवहार में, ये लोग अपना खुद का धर्म निर्मित कर लेते हैं, अपने चुने हुए तरीके से अपने देवताओं की पूजा करते हैं। ये लोग भले ही, जनगणना की रिपोर्ट में खुद को हिन्दू या मुस्लिम के रूप में दर्ज़ कराएं, पर असल में तो ये अपना खुद का धर्म ही निभाते है। मुझे लगता है कि इतिहास में हमेशा से ऐसा ही होता आया है। धर्म के इतिहासकारों को इसका मूल्यांकन करना चाहिए कि आखिर लोगों के धर्म और उनके विश्वास किस हद तक धार्मिक टेक्स्ट पर या व्यवहारों पर निर्भर होते हैं।
 

दलित समूहों की आकांक्षाओं और उनकी सामाजिक दशा को लेकर हम बिलकुल हाल ही में अधिक सजग हुए हैं। यद्यपि हम सर्वाधिक सहिष्णु समाज होने का दावा करते जरूर हैं, पर ऐसा है नहीं। हम एक अहिंसक समाज नहीं हैं।
 

एक जुमले के रूप में ‘अहिंसा और सहिष्णुता’ को राष्ट्रवाद के आविर्भाव के साथ ही अधिक लोकप्रियता मिली, जब पारंपरिक मूल्यों पर अधिक ज़ोर दिया जाने लगा। यह कहा गया कि भारतीय आध्यात्मिकता ने खुद को अहिंसा और सहिष्णुता के रूप में अभिव्यक्त किया जबकि पश्चिम में भौतिकवाद के प्रभाव के कारण, इन मूल्यों का अभाव दिखता है। इसके बावजूद जब कोई भारतीय इतिहास का अध्ययन करता है तो पाता है कि दुनिया के किसी अन्य हिस्से की तरह ही भारतीय इतिहास में भी असहिष्णुता और हिंसक संघर्षों के उदाहरण मौजूद हैं। ऐसे उदाहरण अरबों, तुर्कों और मंगोलों के आने से पहले के समय में भी मौजूद हैं। प्राचीन भारत में सेनाओं का जितना बड़ा आकार बताया जाता है, वह अगर अतिरंजित भी हो तो, यह बताता है कि पड़ोसी राज्यों से होने वाले युद्धों में बड़ी सेना की जरूरत होती थी। ऐसे ग्रंथों की भी कोई कमी नहीं है जो युद्धों का बखान करते नहीं थकते।
 

जब हम अतीत के धार्मिक समूहों की बात करते हैं तो अक्सर हम सोचते हैं कि ये समूह समरूपी अथवा समांगी समूह थे, पर असलियत इससे अलग थी। अतीत में बहुत से पंथ अस्तित्व में थे और इन पंथों के बीच प्रतिरोध, मेल-मिलाप, अंतःक्रिया की प्रक्रिया अनवरत चलती थी। पंथों की बहुलतावादी छवि की अक्सर ही उपेक्षा की जाती है। आम लोगों को के समक्ष अतीत की इस बहुलतावादी छवि को प्रस्तुत करने में इतिहास की क्या भूमिका हो सकती है?  
 

असल में धर्मों ने, व्यावहारिक रूप में समाज में कैसे काम (फंक्शन) किया, यह आप तभी पढ़ा सकते हैं, जब आप इतिहास की पाठ्यचर्या में धर्मों के इतिहास को भी शामिल करें। एक विषय के रूप में, धर्मों का इतिहास, सिर्फ टेक्स्ट पर ही निर्भर नहीं होता। इसमें दैनंदिन व्यवहार, धर्म के प्रदर्शन और धर्म के संरक्षकत्व के मसले भी शामिल होते हैं। धर्मों का इतिहास इन बातों को भी समझने की कोशिश करता है: धर्म-विशेष के समर्थकों का समाजशास्त्र, धार्मिक संस्थाओं की संरचना, धर्म को प्राप्त होने वाले समर्थन के कारणों की पड़ताल।
 

हमें धर्मों के इतिहास का अध्ययन जरूर करना चाहिए। कारण कि धर्म और समाज की जो परस्पर निर्भर प्रकृति है, उसकी समझ धर्म और समाज को बेहतर समझने के लिए बेहद जरूरी है। धर्मों के इतिहास के जरिये ही लोग धर्मों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पक्षों को समझ सकेंगे। वे यह जान पाएंगे कि धर्म और धर्म की समझ, महज धार्मिक टेक्स्ट और कुछ अमूर्त मूल्यों तक ही सीमित नहीं है। बल्कि इसमें ये बातें भी शामिल होंगी: धार्मिक शिक्षाओं का इस्तेमाल राजदरबारों द्वारा कैसे किया गया, कुछ सामाजिक संस्थाओं को प्राधिकार (अथॉरिटी) देने में इसका प्रयोग कैसे हुआ, तीर्थस्थलों में, संन्यासियों द्वारा, और भू-स्वामित्व और वाणिज्य जैसी आर्थिक गतिविधियों में धर्म और इसकी शिक्षाओं का उपयोग कैसे हुआ।
 

धर्म लोगों के जीवन से अलग कोई वस्तु नहीं है। धर्म, कुछ लोगों के भावनात्मक जीवन का एक स्पंदित हिस्सा होता है, जबकि कुछ लोगों के जीवन में यह इतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता। पर सामाजिक-राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में धर्म, अक्सर एक धार्मिक समूह के दूसरे धार्मिक समूह के प्रति व्यवहार को निर्धारित करता है। यह पूरी प्रक्रिया इतिहास का हिस्सा रही है, इसलिए सामाजिक-राजनीतिक अभिप्रेरणाओं को उतना ही महत्त्व दिया जाना चाहिए जितना कि धार्मिक भावों को। क्योंकि व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारक अक्सर धर्मेतर होते हैं। अंततः धर्मों को बिना विशेष दर्जे की मांग किए, एक दूसरे के साथ बराबरी के दर्जे में रहना भी सीखना होगा। जाहिर है कि एक ऐसे समाज में जहां एक धर्म सदियों से वर्चस्व में रहा हो, ऐसा होना आसान नहीं है।
 

(यह अंश समयांतर के नवंबर 2015 अंक में प्रकाशित हुआ है. बाकी हिस्सा जल्दी ही हाशिया पर.)

[यहां पढ़ें: भाग 1, भाग 2

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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