हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

किस रास्ते से गए थे आप हत्यारे की सभा में

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/28/2014 08:06:00 PM

भले ही वे चुप रहें, भले ही वे सवालों को उद्दंडता और बदतमीजी के साथ खारिज कर दें, भले ही वे गौरवमय अतीत के प्राचीरों पर चढ़ कर चीखें या अपनी किताबों के पन्नों में मुंह छुपा लें, रायपुर साहित्य महोत्सव में शामिल हुए उन लेखकों को जवाब देना पड़ेगा, जो वैचारिक और राजनीतिक रूप से इसमें अपनी भागीदारी को जायज ठहराने के हर तरीके अपना रहे हैं. चाहे वे यह जवाब अपने साथी लेखकों को न दें, ब्लॉगरों और फेसबुक पर बहस कर रहे साथियों को न दें, अपने पाठकों को न दें, उस जनता को भी न दें जिसके बारे में और जिसकी तरफ से बोलने के दावे के साथ सारे विशेषाधिकारों पर कब्जा करते रहते हैं, उस जुबान को भी न दें, जिसकी सेवा करने का उन्हें गुरूर है, लेकिन उन्हें जवाब देना पड़ेगा. इतिहास उनसे यह जवाब लेगा - इंसाफ पर आमादा, निर्मम और निष्ठुर इतिहास. वह कोई रियायत नहीं करेगा. झूठे और गढ़े हुए इतिहास के ऊपर और अलग जनता का यह पक्षधर, अजदकी इतिहास उन सबके लिखे और जीए जा रहे झूठों पर फैसला सुनाएगा. और तब वे किस जुबान में बोलेंगे? तब वे किससे बच कर जाएंगे? उस इतिहास के एक गवाह के रूप में रंजीत वर्मा की यह कविता.

किस रास्ते से गए थे आप हत्यारे की सभा में

सच कहिएगा महाशय
जब आप उत्सव में शामिल होने जा रहे थे
तो क्या रास्ते में कहीं आपको
उजाड़े गए आदिवासियों के पांव के निशान नहीं मिले
क्या आपको उनकी औरतें भी नहीं मिलीं
जिनके साथ थानों और पुलिस कैंपों में बलात्कार किया गया था
जिनकी आत्मा से आज भी खून टपक रहा है
क्या आपको वह खून भी नहीं दिखा
क्या आपको यह भी नहीं दिखा कि जहां जहां उनके खून गिरे
वहां वहां माओवाद एक विस्फोट के साथ पैदा हुआ
देखिए सच कहिएगा महोदय
क्या आपको रास्ते में कहीं
जला दिए गांव की उड़ती हुई राख भी नहीं दिखी
आखिर किस रास्ते से गए थे आप हत्यारे की सभा में
सलवा जुड़ूम के सिपाहियों ने तो वहां
परखौती मुक्तांगन के दरवाजे पर आपको
जरूर सलाम किया होगा
या वे भी नहीं दिखे आपको

आश्चर्य तो यह है कि
आपको वहां हत्यारा भी नहीं दिखा
आप कह रहे हैं कि वह तो
जनता द्वारा चुना गया व्यक्ति था
जिसने आपसे हाथ मिलाया था
और ईनाम दिया था आपको
दसियों कैमरों के क्लिक के सामने
तो क्या आप सच में ऐसा मानते हैं कि चुन लिए जाने के बाद
व्यक्ति के आपराध खत्म हो जाते हैं
क्या आप आज भी यही समझते हैं कि चुने गए व्यक्ति के काम
कभी अपराध की गिनती में नहीं आते चाहे वह कुछ भी करे

आश्चर्य तो यह भी है कि
आपको वहां मची हुई लूट भी नहीं दिखाई दी
आपको वहां जनता का पैसा तो दिखा
लेकिन यह नहीं दिखा कि वह
जनता को लूट कर जमा किया गया पैसा था
भला दिखता भी कैसे
जब जनता ही नहीं दिखी पूरे रास्ते तो
उसका लुटना कैसे दिखता
आप तो अभी तक यह भी नहीं समझ पा रहे कि
लूट के पैसे के हिस्सेदार होकर आप लौटे हैं वहां से

खाप की तरह फैसले सुनाने का इल्जाम
आप हम पर मत लगाइए
आप खुद खाप के हिमायतियों से
हाथ मिला कर आ रहे हैं

इतनी नासमझी ठीक नहीं महोदय
देखिए उनके लोगों को गौर से देखिए
उनका उन्माद देखिए
नीचे गिरे हुए उनके चेहरे उनके विचार देखिए
इस देश में रहने के लिए हिंदू होने की शर्त
और इन सब पर प्रधानमंत्री की चुप्पी देखिए
देखिए उनके चेहरों को देखिए
खून में सनी बर्बरता आपको साफ दिखाई देगी
क्या इन चेहरों के बीच
आप अपने चेहरे को देख सकते हैं
उनके नामों के साथ कोई आपका भी नाम ले
क्या आप इसे बर्दाश्त कर सकते हैं

एक चुने गए व्यक्ति के साथ
सत्ता में नाजायज ढंग से पहुंचे
नहीं चुने गए उनके लोगों
और नहीं चुने गए उनके विचारों के बीच
आप कैसे पहुंच गए महाशय विचार कीजिए
लकीर आपको एक जगह खींचनी ही होगी।

फुले-आंबेडकर का महाराष्ट्र? - आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/21/2014 09:58:00 AM

आनंद तेलतुंबड़े

महाराष्ट्र फिर से अपने असली रंग में है. हाल के कुछ महीनों में जातीय उत्पीड़नों की एक लहर रही है, जिसने इसके अंधेरे अंतरतम को और फुले तथा आंबेडकर की विरासत के झूठे दावों को फिर से उजागर किया है. इस महान देश में दलितों पर अत्याचार वैसे कोई नई परिघटना नहीं है. इन सांख्यिकीय आंकड़ों का जाप भी अब उत्पीड़नों की बढ़ती घटनाओं को दर्शाने में नाकाफी साबित हो रहा है कि हर रोज दो दलितों की हत्या होती है और तीन दलित औरतों के साथ बलात्कार की घटना होती है. मिसाल के लिए, बलात्कार की दर का जब 2000 में हिसाब लगाया गया था, तब से यह करीब दोगुनी हो गई है. राष्ट्रीय अपराध रिसर्च ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2013 के ताजा आंकड़े दलितों के अपराधों की खिलाफ वास्तविक दर 1.85 हत्या प्रतिदिन और 5.68 बलात्कार प्रतिदिन है. उत्पीड़न की कुल संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है और अब यह 39,408 पर पहुंच गई है, जिसका मतलब है 108 जातीय अपराध रोज या 4.5 जातीय अपराध हर घंटे होते हैं. और ये पुलिस के आंकड़े हैं, वास्तविक आंकड़ों का अंदाजा कोई भी लगा सकता है.

इस रुझान में महाराष्ट्र का कोई छोटा मोटा योगदान नहीं रहा है जो अपने जोर-जबरदस्ती वाले और आंख मूंद लेने वाले चरित्र के साथ बेहतरीन भारत का प्रतिनिधि है. एक प्रगतिशील राज्य की अपनी छवि के उलट यह समझ में आनेवाले हर तरह के जातिवाद, सांप्रदायिकता, धार्मिक रूढ़िवाद और धर्मांधता के मामलों में लगभग अगली कतार में रहा है. इसका शासक कुलीन तबका अपनी इन सारी करतूतों को जोतिबा फुले और बाबासाहेब आंबेडकर की प्रगतिशील विरासत के आवरण में जनता से छुपाता आया है. लेकिन वक्त आ गया है कि इस आवरण को फाड़ दिया जाए और उस गौरवशाली विरासत को बर्बाद करनेवालों को बेनकाब और शर्मिंदा किया जाए.

खैरलांजी से खरडा तक

खैरलांजी में सितंबर 2006 में एक दलित परिवार के चार लोगों की क्रूर हत्या के खिलाफ राज्य भर में फूटे पड़े गुस्से से भी महाराष्ट्र में हालात नहीं बदले, जबकि इन हत्याओं ने राज्य को अंतर्रराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी की वजह बने थे. सिविल सोसायटी को छोड़ भी दें, तो न तो राज्य और कुछ अपवादों को छोड़ कर न ही मीडिया जातीय उत्पीड़नों पर अपने रवैए को लेकर किसी तरह के अफसोस की भावना को जाहिर किया है. मीडिया ने खैरलांजी के घिनौने जातीय अपराध को यह कह कर रफा-दफा करने की कोशिश की कि यह एक महिला द्वारा पड़ोस के एक व्यक्ति के साथ विवाहेतर संबंध को खत्म करने के बारे में गांववालों की बात सुनने से मना कर देने के बाद नैतिक रूप से विचलित गांववालों के गुस्से से उपजी दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी. लेकिन जब फिर भी सच्चाई छन कर बाहर आ गई और फौरी विरोध प्रदर्शनों की चिन्गारी फूट पड़ी तो राज्य अपने तत्कालीन गृह मंत्री की शक्ल में सामने आया, जिन्होंने इन प्रदर्शनों को नक्लसवादियों द्वारा समर्थित बता दिया और इस तरह पुलिस को अपना आतंक फैलाने की खुली छूट दे दी. हरेक जातीय उत्पीड़न को नकारने और इसके खिलाफ दलितों के विरोध को बदनाम करने के लिए राज्य और मीडिया दोनों ने ही मिल कर ‘प्रेम प्रसंग’ और ‘नक्सलवादी’ शब्दों का कुशलता से इस्तेमाल किया. यह तो राज्य के दलित नौजवान थे, जिन्होंने राज्य के इस पूर्वाग्रह और मीडिया के पक्षपात को चुनौती दी और अपनी जानकारी में आए हरेक उत्पीड़न के खिलाफ अपने संघर्ष को जारी रखा.

पिछले साल की शुरुआत कुख्यात सोनाई हत्याओं से हुई थी, जिनमें एक मराठा लड़की के साथ प्रेम करने के आरोप में तीन दलित नौजवानों की पीट पीट कर दी गई. पुलिस और मीडिया द्वारा इश मामले को सफलता ते साथ महीने भर से ज्यादा दबा कर रखा गया, जब तक कि दलित कार्यकर्ताओं ने उन्हें कार्रवाई करने पर मजबूर नहीं कर दिया. यह मामला अदालत में बिना किसी खास प्रगति के घिसट रहा है. इस साल लोकसभा चुनावों के ठीक बाद 16 मई 2014 को, भाजपा के समर्थन से गोंदिया जिले के कवलेवाड़ा गांव के पवारों ने मोदी लहर के अवतरित होने के जश्न में एक 48 वर्षीय दलित कार्यकर्ता संजय खोबरागढ़े को आग के हवाले कर दिया, जो बुद्ध विहार की जमीन को हड़पने की उनकी साजियों का विरोध कर रहे थे. 94 फीसदी जल चुके खोबरागढ़े ने छह व्यक्तियों को नामजद किया, जिनमें सभी पवार थे. उन्होंने अपना बयान दो बार अधिकारियों के सामने और साथ साथ पत्रकारों के सामने दोहराया, जो उनकी मृत्यु के बाद पुलिस के लिए नामजद व्यक्तियों पर आरोप लगाने के लिए मृत्यु ठीक पहले दिया गया बयान होना चाहिए था. हालांकि, पुलिस इंस्पेक्टर अनिल पाटिल ने फौरन ‘प्रेम प्रसंग’ वाली तरकीब अपनाई और उनकी अधेड़ पत्नी देवकीबाई और उनके पड़ोसी राजू गडपायले को गिरफ्तार कर लिया. इसके लिए उन्होंने एक कहानी गढ़ ली कि उन्होंने खोबरागढ़े को हटाने के लिए साजिश रची थी, जिन्होंने उन दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देखा था. पवारों पर उत्पीड़न अधिनियम और भारतीय दंड विधान (आईपीसी) की धारा 310 और 307 लगाई गई और उन्हें जल्दी ही छोड़ दिया गया. पूरा गांव और दलित कार्यकर्ता पुलिस की इस मनगढ़ंत कहानी से हक्का बक्का थे, लेकिन वे देवकीबाई और गडपायले को पुलिस की यातना और बदनामी से बचा नहीं पाए – संजय की मौत से उन्हें पहुंचे सदमे की तो बात ही अलग है.

कुछ दिन पहले 28 अप्रैल को अहमदनगर जिले के जमखेड तालुका के खरडा गांव के एक गरीब दलित मजदूर दंपती के 17 साल के इकलौते बच्चे नितिन आगे को गांव के कुछ मराठे उसे उसके स्कूल से घसीट कर ले आए  और दिन दहाड़े बुरी तरह यातना देकर उसकी हत्या कर दी. नितिन का गुनाह बस उनके परिवार की एक लड़की से बात करना था. इस हत्या ने दलित नौजवानों के एक फौरी विरोध प्रदर्शन को जन्म दिया, लेकिन तब भी वे अपराधियों को जेल में नहीं रख सके.

क्रूरता के कीर्तिमान

20 अक्तूबर को अहमदनगर जिले में ही जवखेडे (खालसा) गांव में सोनाई से लगभग मिलती जुलती घटना दोहराई गई. खैरलांजी की तरह ही इस गांव को भी महाराष्ट्र सरकार का ‘टंटा मुक्त गांव’ (विवादमुक्त गांव) का पुरस्कार मिला हुआ है, जो दलितों के जले पर नमक छिड़कने जैसा है, क्योंकि इसमें खदबदाते जातीय तनाव को नजरअंदाज कर दिया गया है और दलितों को यह संकेत देता है कि बेहतर होगा कि वे जातीय व्यवस्था को चुपचाप कबूल कर लें. एक दलित परिवार के तीन सदस्यों, संजय जगन्नाथ जाधव (42), उनकी पत्नी जयश्री (38) और उनके इकलौते बेटे सुनील (19) को उनके खेत में हत्या कर दी गई, जहां फसल की कटाई के लिए वे अस्थाई रूप से डेरा डाल कर रह रहे थे. पुरुषों की लाश को टुकड़ों में काट कर पास के एक बेकार पड़े कुएं में फेंक दिया गया था, और बाकियों को बोरवेल के गड्ढे में फेंक दिया गया था. जयश्री की साबुत लाश को कुएं से बरामद किया गया, जिनके सिर में गहरी चोट थी. सुनील मुंबई के गोरेगांव स्थित डेयरी साइंस इंस्टीट्यूट में दूसरे साल का छात्र था और दीवाली की छुट्टियों में घर आया था. दलित अत्याचार क्रुति समिति के मुताबिक, जिसने अपनी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट प्रकाशित की है, संजय के भाई ने फौरन पुलिस के यहां मराठा वाघ परिवार के कुछ सदस्यों को नामजद किया था, लेकिन दलितों द्वारा अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन के बावजूद पुलिस जानबूझ कर अनजान बनी रही और तफ्तीश के नाम पर उल्टे गांव वालों और संजय के दोस्तों को ही परेशान करती रही. पुलिस के इस रवैए के विरोध में गांव वालों को गैर मामूली तौर पर बंद बुलाना पड़ा. वाघ परिवार हाल ही में भाजपा की विधायक चुनी गईं मोनिका राजाले के तथा दूसरे ताकतवर नेताओं के रिश्तेदार हैं इसलिए पुलिस दिग्भ्रमित होने का दिखावा कर रही है. यहां भी इस पूरे मामले को इस रंग में रंगा जा रहा है कि यह सुनील के वाघ परिवार की एक महिला से संबंध होने के नतीजे में हुई घटना है और विरोध में चलाए जा रहे प्रदर्शन नक्सलियों द्वारा समर्थित हैं. वजह चाहे जो भी हो, इसकी जड़ में सुनील के आत्मविश्वास से भरा कदम था, जिसे गांव के लोगों ने बड़ी आसानी से जातीय आचारों को चुनौती दिए जाने के रूप में लिया.

‘प्रेम प्रसंग’ का यह टैग पुलिस के बड़े काम की चीज साबित होती है, जिसकी मदद से वह दलितों को एक ऐसे दुस्साहसी तबके के रूप में पेश करती है, जो ऊंची जातियों की औरतों का पीछा करते हैं और ऐसा करते हुए पुलिस बहुसंख्यक समुदाय में जातीय उत्पीड़न के अपराधियों के लिए हमदर्दी जुटा देती है. पुलिस और साथ साथ समाज इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते हैं कि प्रेम करना अपराध नहीं है और अगर कोई इसके लिए किसी को सजा देता है तो प्रेम का मामला होने के कारण अपराधी के अपराध की गंभीरता कम नहीं हो जाती. दिलचस्प बात ये है कि पुलिस ने उत्पीड़न अधिनियम के तहत गुमनाम लोगों पर अपराध का मामला दर्ज किया है, यह नादानी की एक और मिसाल है क्योंकि उत्पीड़न अधिनियम गुमनाम लोगों पर इसलिए लागू नहीं होता कि खुद ब खुद यह नहीं मान लिया जा सकता है कि वे गैर एससी/एसटी होंगे. जिस दिन जवखेड़े के जाधवों की लाशें कुएं में पाई गईं, उसी दिन यानी 21 अक्तूबर को इसी अहमदनगर जिले के परनेर तालुका के अलकोटी गांव में ग्राम पंचायत के दफ्तर में गांववालों द्वारा चार पारधी आदिवासियों को पत्थरों से बुरी तरह पीटा गया. उन पर चोरी का संदेह था. दो भाई राहुल पुंज्य चवन और पिकेश पुंज्य चवन जख्मों के कारण दम तोड़ दिया और दो गंभीर हालात में अस्पताल में हैं. पिछले साल ऐसी 113 घटनाएं इस अकेले जिले में दर्ज की गई हैं. इस साल अक्तूबर तक उत्पीड़न के 74 मामले दर्ज किए गए हैं. इनमें से बस कुछ ही रोशनी में आ सकीं, जैसे कि पूर्व मंत्री बबनराव पाचपुते के रिश्तेदारों द्वारा प्रेम प्रसंग के आरोप में एक मूक और बधिर भूमिहीन परिवार के एक दलित नौजवान आबा काले की पिटाई किए जाने की घटना; दो दलितों बबन मिसाल और जनाबाई बोरगे को जिंदा जलाए जाने की घटना; करजट तालुका में दीपक कांबले की भारी पिटाई की घटना; एक खानाबदोश कबीले की एक युवती सुमन काले के क्रूर बलात्कार और हत्या की घटना; और शेवगांव तालुका के पैथन गांव में एक दलित नौजवान के टुकड़े टुकड़े कर दिए जाने की घटना. इनमें से किसी भी मामले में अपराधियों को सजा देना तो दूर, उन्हें गिरफ्तार तक नहीं किया गया. इसने जातीय तत्वों को मजबूत ही किया है, कि वे दलितों की सांस्कृतिक दावेदारी को क्रूर ताकत के साथ कुचल दें.

ब्राह्मणवाद की लानत

जब भी कोई उत्पीड़न की घटना होती है, हर बार महाराष्ट्र के कुलीन लोग बेशर्मी से फुले-आंबेडकर की विरासत का मातम मनाने लगते हैं. असल में, जैसा कि नीचे दी गई तालिका से जाहिर होता है, हाल के वर्षों में हत्या और बलात्कार की घटनाओं के मामले में राज्य लगातार भारत के 28 राज्यों में ऊपर के पांच या छह राज्यों में से एक रहा है. दलितों के खिलाफ अपराधों में इसका खासा मजबूत योगदान रहा है और हाल के बरसों में यह बढ़ता गया है.

महाराष्ट्र इस मायने में सबसे अलग था कि यहां आधुनिक समय में पेशवाओं का प्रतिक्रियावादी ब्राह्मण शासन था. जब इसे महार फौजियों की बहुसंख्या वाली ब्रिटिश फौज ने 1818 में हरा दिया, तो पुणे के ब्राह्मणों ने उपनिवेश-विरोधी देशभक्त होने का दिखावा करते हुए ब्रिटिशों के खिलाफ हथियार उठा लिए लेकिन वे असल में अपना खोया हुआ राज वापस पाना चाहते थे. हिंदू आंदोलन जहां भी पैदा हुआ हो, लेकिन यह महाराष्ट्र ही था, जहां उसे नेतृत्व हासिल हुआ. यहीं पर हिंदुत्व की विचारधारा और इसका फासीवादी झंडावाहक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने जन्म लिया. यहां तक कि कम्युनिस्ट और समाजवादी समेत दूसरे आंदोलन भी ब्राह्मणवादी वर्चस्व से बच नहीं सके; उनके अगुवा नेताओं ने वेदों में कम्युनिज्म की खोज कर डाली. महाराष्ट्र नाथूराम गोडसे, भारी प्रतिक्रियावादी बाल ठाकरे, अभिनव भारत के खुफिया आतंकवादियों और शाहिद आजमी तथा नरेंद्र दाभोलकर के हत्यारों की जमीन रहा है. आज ब्राह्मणवाद की मशाल नव धनाढ्य लेकिन असभ्य शूद्रों के हाथ में है. उभरता हुआ हिंदुत्व राज्य में दलितों के बुरे दिनों के साफ संकेत दे रहा है.

अगर आप कुछ और नहीं कर सकते तो कम से इस खदबदाती हुई जातीय कहाड़ी से फुले और आंडेबकर को तो बख्श ही दीजिए.


(अनुवाद- रेयाज उल हक. समयांतर के दिसंबर 2014 अंक में प्रकाशित.)

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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