हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

29 जून को दलित दस्तक पत्रिका का दूसरा वार्षिक कार्यक्रम

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/26/2014 03:55:00 PM

वंचित तबके की आवाज बन चुकी मासिक पत्रिका दलित दस्तक ने अपने दो वर्ष का सफर पूरा कर लिया है. वैकल्पिक मीडिया को स्थापित करने के इस सामूहिक प्रयास की आवाज को और भी बुलंद और सशक्त बनाने के लिए आगामी 29 जून को पत्रिका के दूसरे वार्षिक समारोह का आयोजन किया जा रहा है. कार्यक्रम  कांस्टीट्यूशन क्लब के डिप्टी स्पीकर हाल में होगा. कार्यक्रम का समय शाम को चार बजे रखा गया है. इस दिन कार्यक्रम को रखने का विशेष कारण बताते हुए पत्रिका के संपादक अशोक दास ने बताया कि इसी दिन सन 1928 में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने समता नाम से पाक्षिक अखबार शुरू किया था.

उन्होंने बताया कि अपने सफर से अब तक पत्रिका लगातार आगे बढ़ रही है. बहुत ही कम संसाधन में शुरू हुई और चल रही इस पत्रिका ने सिर्फ दो साल में 15 राज्यों में 30 हजार पाठकों को जोड़ लिया है. दूसरे वार्षिक कार्यक्रम के संबंध में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि इसमें देश भर से दलित दस्तक से जुड़े हुए पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और सोशल एक्टिविस्ट हिस्सा लेंगे. कार्यक्रम में बतौर वक्ता आनंद श्रीकृष्ण (साहित्यकार एवं चिंतक), जयप्रकाश कर्दम (साहित्यकार एवं लेखक) और देवप्रताप सिंह (एक्टिविस्ट) मौजूद रहेंगे. जबकि विशेष अतिथि के तौर पर प्रो. विवेक कुमार (समाजशास्त्री एवं चिंतक, जेएनयू) आदि मौजूद रहेंगे. अन्य उल्लेखनीय अतिथियों में शांति स्वरूप बौद्ध (बौद्ध चिंतक), जे.सी आदर्श (सामाजिक कार्यकर्ता एवं पूर्व पीसीएस अधिकारी), देवमणि भारतीय (एक्टिविस्ट एवं एआरटीओ, मुजफ्फर नगर) और भड़ास4मीडिया के संचालक यशवंत सिंह मौजूद रहेंगे.
 

गौरतलब है कि दलित दस्तक की स्थापना 27 मई, 2012 को हुई थी. इसके संपादन की जिम्मेदारी संभाल रहे अशोक दास ने एक साहस का परिचय देते हुए वंचित तबके की बात को उठाने का बीड़ा उठाया था. तब से एक पूरी टीम जिसमें जेएनयू के प्रो. विवेक कुमार सहित तमाम अन्य बुद्धिजीवी एवं अधिकारी शामिल हैं और सांगठनिक रूप से पत्रिका को आगे बढ़ाने में जुटे है. अशोक दास भारत के प्रतिष्ठित पत्रिकारिता संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (आईआईएमसी) के 2005-06 बैच के छात्र हैं. अपने आठ साल के पत्रकारिता कैरियर में उन्होंने लोकमत और अमर उजाला में काम किया है. फिलहाल वह दलित दस्तक के संपादन के साथ-साथ, दलितमत.कॉम नाम की वेबसाइट और दलितमत फाउंडेशन के जरिए वंचित तबके को आगे बढ़ाने की मुहिम में जुटे हैं. वह नागपुर-अकोला से प्रकाशित प्रसिद्ध मराठी दैनिक देशोन्नति (राष्ट्रप्रकाश, हिन्दी) का दिल्ली ब्यूरो भी संभाल रहे हैं.हाल ही में “एक मुलाकात दिग्गजों के साथ” नाम से उनका पहला साक्षात्कार संग्रह प्रकाशित हो चुका है.

बसपा का शीराजा क्यों बिखरा: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/24/2014 10:31:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े ने अपने इस लेख में बसपा की पराजय का आकलन करते हुए एक तरफ मौजूदा व्यवस्था के जनविरोधी चेहरे और दूसरी तरफ उत्पीड़ित जनता के लिए पहचान की राजनीति के खतरों के बारे में बात की है. अनुवाद: रेयाज उल हक


पिछले आम चुनाव हैरानी से भरे हुए रहे, हालांकि पहले से यह अंदाजा लगाया गया था कि कांग्रेस के नतृत्व वाला संप्रग हारेगा और भाजपा के नेतृत्व वाला राजग सत्ता में आने वाला है. वैसे तो चुनावों से पहले और बाद के सभी सर्वेक्षणों ने भी इसी से मिलते जुलते राष्ट्रीय मिजाज की पुष्टि की थी, तब भी नतीजे आने के पहले तक भाजपा द्वारा इतने आराम से 272 का जादुई आंकड़ा पार करने और संप्रग की सीटें 300 के पार चली जाने की अपेक्षा बहुत कम लोगों ने ही की होगी. खैर, भाजपा ने 282 सीटें हासिल कीं और संप्रग को 336 सीटें. महाराष्ट्र में शरद पवार, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह, बिहार में नीतीश कुमार जैसे अनेक क्षेत्रीय क्षत्रप मुंह के बल गिरे. लेकिन अब तक चुनाव नतीजों का सबसे बड़ा धक्का यह रहा कि बहुजन समाज पार्टी का उत्तर प्रदेश की अपनी जमीन पर ही पूरी तरह सफाया हो गया. लोग तो यह कल्पना कर रहे थे, और बसपा के नेता इस पर यकीन भी कर रहे थे, कि अगर संप्रग 272 सीटें हासिल करने नाकाम रहा तो इसके नतीजे में पैदा होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल में मायावती हैरानी में डालते हुए देश की प्रधानमंत्री तक बन सकती हैं. इस कल्पना को मद्देनजर रखें तो बसपा का सफाया स्तब्ध कर देने वाला है. आखिर हुआ क्या?

नतीजे आने के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में मायावती ने दावा किया कि दलितों और निचली जातियों में उनका जनाधार बरकरार है और चुनावों में खराब प्रदर्शन की वजह भाजपा द्वारा किया गया सांप्रदायिक ध्रुवीकरण है. उन्होंने कहा कि जबकि ऊंची जातियों और पिछड़ी जातियों को भाजपा ने अपनी तरफ खींच लिया और मुसलमान समाजवादी पार्टी की वजह से बिखर गए. बहरहाल उन्होंने इसके बारे में कोई व्याख्या नहीं दी कि ये चुनावी खेल अनुचित कैसे थे. मतों के प्रतिशत के लिहाज से यह सच है कि बसपा उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है. राष्ट्रीय स्तर पर इसे 2.29 करोड़ वोट मिले जो कुल मतों का 4.1 फीसदी है. 31.0 फीसदी मतों के साथ भाजपा और 19.3 फीसदी मतों के साथ इससे आगे हैं और 3.8 फीसदी मतों के साथ सापेक्षिक रूप से एक नई पार्टी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इससे पीछे है. 15वीं लोकसभा में बसपा की 21 सीटें थीं जिनमें से 20 अकेले उत्तर प्रदेश से थीं. बसपा से कम मत प्रतिशत वाली अनेक पार्टियों ने इससे कहीं ज्यादा सीटें जीती हैं. मिसाल के लिए तृणमूल कांग्रेस को मिले 3.8 फीसदी मतों ने उसे 34 सीटें दिलाई हैं और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम को इससे भी कम 3.3 फीसदी मतों पर तृणमूल से भी ज्यादा, 37 सीटें मिली हैं. यहां तक कि आम आदमी पार्टी (आप) महज 2.0 फीसदी मतों के साथ चार सीटें जीतने में कामयाब रही. उत्तर प्रदेश में बसपा को 19.6 फीसदी मत मिले हैं जो भाजपा के 42.3 फीसदी और सपा के 22.2 फीसदी के बाद तीसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी है. इसमें भी एक खास बात है: चुनाव आयोग के आंकड़े दिखाते हैं कि बसपा इस विशाल राज्य की 80 सीटों में 33 पर दूसरे स्थान पर रही.

लेकिन देश में तीसरी सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी का संसद में कोई वजूद नहीं होने की सबसे बड़ी वजह हमारी चुनावी व्यवस्था है, जिसके बारे में बसपा कभी भी कोई शिकायत नहीं करेगी. सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने वाली यह चुनावी व्यवस्था (एफपीटीपी) हमें हमेशा ही हैरान करती रही है, इस बार इसने कुछ ज्यादा ही हैरान किया. भाजपा कुल डाले गए वोटों में से महज 31.0 फीसदी के साथ कुल सीटों का 52 फीसदी यानी 282 सीटें जीत सकी. चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक कुल 66.36 फीसदी वोट डाले गए, इसका मतलब है कि भाजपा को जितने वोट मिले उनमें कुल मतदाताओं के महज पांचवें हिस्से (20.5 फीसदी) ने भाजपा को वोट दिया. इसके बावजूद भाजपा का आधी से ज्यादा सीटों पर कब्जा है. इसके उलट, हालांकि बसपा तीसरे स्थान पर आई लेकिन उसके पास एक भी सीट नहीं है. जैसा कि मैं हमेशा से कहता आया हूं, एफपीटीपी को चुनने के पीछे हमारे देश के शासक वर्ग की बहुत सोची समझी साजिश रही है. तबके ब्रिटिश साम्राज्य के ज्यादातर उपनिवेशों ने इसी चुनाव व्यवस्था को अपनाया. लेकिन एक ऐसे देश में जो निराशाजनक तरीके से जातियों, समुदायों, नस्लों, भाषाओं, इलाकों और धर्मों वगैरह में ऊपर से नीचे तक ऊंच-नीच के क्रम के साथ बंटा हुआ है, राजनीति में दबदबे को किसी दूसरी चुनावी पद्धति के जरिए यकीनी नहीं बनाया जा सकता था. एफपीटीपी हमेशा इस दबदबे को बनाए रखने में धांधली की गुंजाइश लेकर आती है. इस बात के व्यावहारिक नतीजे के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस या भाजपा का दबदबा इसका सबूत है. अगर मिसाल के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व (पीआर) व्यवस्था अपनाई गई होती, जो प्रातिनिधिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं द्वारा चुनावों के लिए अपनाई गई अधिक लोकप्रिय और अधिक कारगर व्यवस्था है, तो सभी छोटे समूहों को अपना ‘स्वतंत्र’ प्रतिनिधित्व मिला होता जो इस दबदबे के लिए हमेशा एक खतरा बना रहता. दलितों के संदर्भ में, इसने आरक्षण कहे जाने वाले सामाजिक न्याय के बहुप्रशंसित औजार की जरूरत को भी खत्म कर दिया होता, जिसने सिर्फ उनके अस्तित्व के अपमानजनक मुहावरे का ही काम किया है. कोई भी दलित पार्टी एफपीटीपी व्यवस्था के खिलाफ आवाज नहीं उठाएगी. बसपा तो और भी नहीं. क्योंकि यह उन सबके नेताओं को अपने फायदे के लिए धांधली करने में उसी तरह सक्षम बनाती है, जैसा यह शासक वर्गीय पार्टियों को बनाती आई है.

दूसरी वजह पहचान की राजनीति का संकट है, जिसने इस बार पहचान की राजनीति करने वाली बसपा से इसकी एक भारी कीमत वसूली है. बसपा की पूरी कामयाबी उत्तर प्रदेश में दलितों की अनोखी जनसांख्यिकीय उपस्थिति पर निर्भर रही है, जिसमें एक अकेली दलित जाति जाटव-चमार कुल दलित आबादी का 57 फीसदी है. इसके बाद पासी दलित जाति का नंबर आता है, जिसकी आबादी 16 फीसदी है. यह दूसरे राज्यों के उलट है, जहां पहली दो या तीन दलित जातियों की आबादी के बीच इतना भारी फर्क नहीं होता है. इससे वे प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं, जिनमें से एक आंबेडकर के साथ खुद को जोड़ता है तो दूसरा जगजीवन राम या किसी और के साथ. लेकिन उत्तर प्रदेश में जाटवों और पासियों के बीच में इतने बड़े फर्क के साथ इस तरह की कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं है और वे एक साझे जातीय हित के साथ राजनीतिक रूप से एकजुट हो सकते हैं. इसके बाद की तीन दलित जातियों – धोबी, कोरी और वाल्मीकि – को भी उनके साथ मिला दें तो वे कुल दलित आबादी का 87.5 फीसदी बनते हैं, जो राज्य की कुल आबादी की 18.9 फीसदी आबादी है. कुल मतदाताओं में भी इन पांचों जातियों का मिला जुला प्रतिशत भी इसी के आसपास होगा. यह बसपा का मुख्य जनाधार है. इन चुनावी नतीजों में कुल वोटों में बसपा का 19.6 फीसदी वोट हासिल करना दिखाता है कि बसपा का मुख्य जनाधार कमोबेश बरकरार रहा होगा.

दूसरे राज्यों के दलितों के उलट जाटव-चमार बाबासाहेब आंबेडकर के दिनों से ही आर्थिक रूप से अच्छे और राजनीतिक रूप से अधिक संगठित रहे हैं. 1957 में आरपीआई के गठन के बाद, आरपीआई के पास महाराष्ट्र के बाद उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत इलाके रहे हैं, कई बार तो महाराष्ट्र से भी ज्यादा. यह स्थिति आरपीआई के टूटने तक रही. महाराष्ट्र में आरपीआई के नेताओं की गलत कारगुजारियों के नक्शेकदम पर चलते हुए उत्तर प्रदेश में आरपीआई के दिग्गजों बुद्ध प्रिय मौर्य और संघ प्रिय गौतम भी क्रमश: कांग्रेस और भाजपा के साथ गए. इस तरह जब कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में कदम रखे तो एक दशक या उससे भी अधिक समय से वहां नेतृत्व का अभाव था. उनकी रणनीतिक सूझ बूझ ने उनकी बहुजन राजनीति की संभावनाओं को फौरन भांप लिया. उन्होंने और मायावती ने दलितों को फिर से एकजुट करने और पिछड़ों और मुसलमानों के गरीब तबकों को आकर्षित करने के लिए भारी मेहनत की. जब वे असल में अपनी इस रणनीति की कामयाबी को दिखा पाए, तो उन्होंने पहले से अच्छी तरह स्थापित दलों को एक कड़ी टक्कर दी और उसके बाद सीटें जीतने में कामयाब रहे. इससे राजनीतिक रूप से अब तक किनारे पर रहे सामाजिक समूह भी बसपा के जुलूस में शामिल हो गए. मायावती ने यहां से शुरुआत की और उस खेल को उन्होंने समझदारी के साथ खेला, जो उनके अनुभवी सलाहकार ने उन्हें सिखाया था. जब वे भाजपा के समर्थन के साथ मुख्यमंत्री बनीं, तो इससे बसपा और अधिक मजबूत हुई. ताकत के इस रुतबे पर मायावतीं अपने फायदे के लिए दूसरे राजनीतिक दलों के साथ बातचीत करने लगीं.

कुछ समझदार दलित बुद्धिजीवियों ने इस पर अफसोस जाहिर किया है कि बसपा ने दलितों के उत्थान के लिए कुछ नहीं किया है. लेकिन इस मामले की असल बात यह है कि इस खेल का तर्क बसपा को ऐसा करने की इजाजत नहीं देता है. जैसे कि शासक वर्गीय दलों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे जनसमुदाय को पिछड़ेपन और गरीबी में बनाए रखें, मायावती ने यही तरीका अख्तियार करते हुए उत्तर प्रदेश में दलितों को असुरक्षित स्थिति में बनाए रखा. वे भव्य स्मारक बना सकती थीं, दलित नायकों की प्रतिमाएं लगवा सकती थीं, चीजों के नाम उन नायकों के नाम पर रख सकती थीं और दलितों में अपनी पहचान पर गर्व करने का जहर भर सकती थीं लेकिन वे उनकी भौतिक हालत को बेहतर नहीं बना सकती थीं वरना ऐसे कदम से पैदा होने वाले अंतर्विरोध जाति की सोची-समझी बुनियाद को तहस नहस कर सकते थे. स्मारक वगैरह बसपा की जीत में योगदान करते रहे औऱ इस तरह उनकी घटक जातियों तथा समुदायों द्वारा हिचक के साथ वे कबूल कर लिए गए. लेकिन भेद पैदा करने वाला भौतिक लाभ समाज में ऐसी न पाटी जा सकने वाली खाई पैदा करता, जिसे राजनीतिक रूप से काबू में नहीं किया सकता. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि एक दलित या गरीब परस्त एजेंडा नहीं बनाया जा सकता था. राजनीतिक सीमाओं के बावजूद वे दिखा सकती थीं कि एक ‘दलित की बेटी’ गरीब जनता के लिए क्या कर सकती है. लेकिन उन्होंने न केवल अवसरों को गंवाया बल्कि उन्होंने लोगों के भरोसे और समर्थन का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया.

बाद में उनकी बढ़ी हुई महत्वाकांक्षाएं उन्हें बहुजन से सर्वजन तक ले गईं, जिसमें उन्होंने अपना रुख पलटते दिया और उनमें दलितों के लिए जो भी थोड़ा बहुत सरोकार बचा था, उसे और खत्म कर दिया. तब अनेक विश्लेषकों ने यह अंदाजा लगाया था कि दलित मतदाता बसपा से अलग हो जाएंगे, लेकिन दलित उन्हें हैरानी में डालते हुए मायावती के साथ पहले के मुकाबले अधिक मजबूती से खड़े हुए और उन्हें 2007 की अभूतपूर्व सफलता दिलाई. इसने केवल दलितों की असुरक्षा को ही उजागर किया. वे बसपा से दूर नहीं जा सकते, भले ही इसकी मुखिया चाहे जो कहें या करें, क्योंकि उन्हें डर था कि बसपा के सुरक्षात्मक कवच के बगैर उन्हें गांवों में सपा समर्थकों के हमले का सामना करना पड़ेगा. अगर मायावती इस पर गर्व करती हैं कि उनके दलित मतदाता अभी भी उनके प्रति आस्थावान हैं तो इसका श्रेय मायावती को ही जाता है कि उन्हें दलितों को इतना असुरक्षित बना दिया है कि वे इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं अपना सकते. निश्चित रूप से इस बार भाजपा ने कुछ दलित जातियों को लुभाया है और वे संभवत: गोंड, धानुक, खटिक, रावत, बहेलिया, खरवार, कोल आदि हाशिए की जातियां होंगी जो दलित आबादी का 9.5 फीसदी हिस्सा हैं. मुसलमान भी ऐसे ही एक और असुरक्षित समुदाय हैं जिन्हें हमेशा अपने बचाव कवच के बारे में सोचना पड़ता है. इस बार बढ़ रही मोदी लहर और घटती हुई बसपा की संभावनाओं को देखते हुए वे सपा के इर्द-गिर्द जमा हुए थे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा. 2007 के चुनावों में उत्तर प्रदेश की सियासी दुनिया में फिर से दावेदारी जताने को बेकरार ब्राह्मणों समेत ये सभी जातियां बसपा की पीठ पर सवार हुईं और उन्होंने बसपा को एक भारी जीत दिलाई थी, लेकिन बसपा उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी. तब वे उससे दूर जाने लगे जिसका नतीजा दो बरसों के भीतर, 2009 के आम चुनावों में दिखा जब बसपा की कुल वोटों में हिस्सेदारी 2007 के 30.46 फीसदी से गिरकर 2009 में 27.42 फीसदी रह गई. इस तरह 3.02 फीसदी वोटों का उसे नुकसान उठाना पड़ा. तीन बरसों में यह नुकसान 1.52 फीसदी और बढ़ा और 2012 के विधानसभा चुनावों में कुल वोटों की हिस्सेदारी गिरकर 25.90 पर आ गई. और अब 2014 में यह 19.60 फीसदी रह गई है जो कि 6.30 फीसदी की गिरावट है. यह साफ साफ दिखाता है कि दूसरी जातियां और अल्पसंख्यक तेजी से बसपा का साथ छोड़ रहे हैं और यह आने वाले दिनों की सूचना दे रहा है जब धीरे धीरे दलित भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलेंगे. असल में मायावती की आंखें इसी बात से खुल जानी चाहिए कि उनका राष्ट्रीय वोट प्रतिशत 2009 के 6.17 से गिर कर इस बार सिर्फ 4.1 फीसदी रह गया है.

जबकि जाटव-चमार वोट उनके साथ बने हुए दिख रहे हैं, तो यह सवाल पैदा होता है कि वे कब तक उनके साथ बने रहेंगे. मायावती उनकी असुरक्षा को बेधड़क इस्तेमाल कर रही हैं. न केवल वे बसपा के टिकट ऊंची बोली लगाने वालों को बेचती रही हैं, बल्कि उन्होंने एक ऐसा अहंकार भी विकसित कर लिया है कि वे दलित वोटों को किसी को भी हस्तांतरित कर सकती हैं. उन्होंने आंबेडकरी आंदोलन की विरासत को छोड़ कर 2002 के बाद के चुनावों में मोदी के लिए प्रचार किया जब पूरी दुनिया मुसलमानों के जनसंहार के लिए उन्हें गुनहगार ठहरा रही थी. उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु कांशीराम के ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ जैसे नारों को भी छोड़ दिया और मौकापरस्त तरीके से ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ जैसे नारे चलाए. लोगों को कुछ समय के लिए पहचान का जहर पिलाया जा सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे बेवकूफ हैं. लोगों को मायावती की खोखली राजनीति का अहसास होने लगा है और वे धीरे धीरे बसपा से दूर जाने लगे हैं. उन्होंने मायावती को चार बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उन्होंने जनता को सिर्फ पिछड़ा बनाए रखने का काम किया और अपने शासनकालों में उन्हें और असुरक्षित बना कर रख दिया. उत्तर प्रदेश के दलित विकास के मानकों पर दूसरे राज्यों के दलितों से कहीं अधिक पिछड़े बने हुए हैं, बस बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और राजस्थान के दलित ही उनसे ज्यादा पिछड़े हैं. मायावती ने भ्रष्टाचार और पतनशील सामंती संस्कृति को बढ़ाना देने में नए मुकाम हासिल किए हैं, जो कि बाबासाहेब आंबेडकर की राजनीति के उल्टा है जिनके नाम पर उन्होंने अपना पूरा कारोबार खड़ा किया है. उत्तर प्रदेश दलितों पर उत्पीड़न के मामले में नंबर एक राज्य बना हुआ है. यह मायावती ही थीं, जिनमें यह बेहद गैर कानूनी निर्देश जारी करने का अविवेक था कि बिना जिलाधिकारी की इजाजत के दलितों पर उत्पीड़न का कोई भी मामला उत्पीड़न अधिनियम के तहत दर्ज नहीं किया जाए. ऐसा करने वाली वे पहली मुख्यमंत्री थीं.

जातीय राजनीति की कामयाबी ने बसपा को इस कदर अंधा कर दिया था कि वह समाज में हो रहे भारी बदलावों को महसूस नहीं कर पाई. नई पीढ़ी उस संकट की आग को महसूस कर ही है जिसे नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने उनके लिए पैदा की हैं. देश में बिना रोजगार पैदा किए वृद्धि हो रही है, और सेवा क्षेत्र में जो भी थोड़े बहुत रोजगार पैदा हो रहा है उन्हें बहुत कम वेतन वाले अनौपचारिक क्षेत्र में धकेल दिया जा रहा है. सार्वजनिक और सरकारी क्षेत्रों के सिकुड़ने से आरक्षण दिनों दिन अप्रासंगिक होते जा रहे हैं. दूसरी तरफ सूचनाओं में तेजी से हो रहे इजाफे के कारण नई पीढ़ी की उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं. उन्हें जातिगत भेदभाव की वैसी आग नहीं झेलनी पड़ी है जैसी उनके मां-बाप ने झेली थी. इसलिए वे ऊंची जातियों के बारे में पेश की जाने वाली बुरी छवि को अपने अनुभवों के साथ जोड़ पाने में नाकाम रहते हैं. उनमें से अनेक बिना दिक्कत के ऊंची जातियों के अपने दोस्तों के साथ घुलमिल रहे हैं. हालांकि वे अपने समाज से रिश्ता नहीं तोड़ेंगे लेकिन जब कोई विकास के बारे में बात करेगा तो यह उन्हें अपनी तरफ खींचेगा. और यह खिंचाव पहचान संबंधी उन बातों से कहीं ज्यादा असरदार होगा जिसे वे सुनते आए हैं. दलित नौजवान उदारवादी संस्कृति से बचे नहीं रह सकते हैं, बल्कि उन्हें व्यक्तिवाद, उपभोक्तावाद, उपयोगवाद वगैरह उन पर असर डाल रहे हैं, इनकी गति हो सकता है कि धीमी हो. यहां तक कि गांवों में भीतर ही भीतर आए बदलावों ने निर्वाचन क्षेत्रों की जटिलता को बदल दिया है, जिसे हालिया अभियानों में भाजपा ने बड़ी महारत से इस्तेमाल किया जबकि बसपा और सपा अपनी पुरानी शैली की जातीय और सामुदायिक लफ्फाजी में फंसे रहे. बसपा का उत्तर प्रदेश के नौजवान दलित मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाना साफ साफ दिखाता है कि दलित वोटों में 1.61 करोड़ के कुल इजाफे में से केवल 9 लाख ने ही बसपा को वोट दिया.

भाजपा और आरएसएस ने मिल कर दलित और पिछड़ी जातियों के वोटों को हथियाने की जो आक्रामक रणनीति अपनाई, उसका असर भी बसपा के प्रदर्शन पर दिखा है. उत्तर प्रदेश में भाजपा के अभियान के संयोजक अमित शाह ने आरएसएस के कैडरों के साथ मिल कर विभिन्न जातीय नेताओं और संघों के साथ व्यापक बातचीत की कवायद की. शाह ने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हमले का इस्तेमाल पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में लुभाने के लिए किया. उसने मोदी की जाति का इस्तेमाल ओबीसी वोटों को उत्साहित करने के लिए किया कि उनमें से ही एक इंसान भारत का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है. इस रणनीति ने उन इलाकों की पिछड़ी जातियों में सपा की अपील को कमजोर किया, जो सपा का गढ़ मानी जाती थीं. इस रणनीति का एक हिस्सा बसपा के दलित आधार में से गैर-जाटव जातियों को अलग करना भी था. भाजपा ने जिस तरह से विकास पर जोर दिया और अपनी सुनियोजित प्रचार रणनीति के तहत बसपा की मौकापरस्त जातीय राजनीति को उजागर किया, उसने भी बसपा की हार में एक असरदार भूमिका अदा की. लेकिन किसी भी चीज से ज्यादा, बसपा की अपनी कारगुजारियां ही इसकी बदतरी की जिम्मेदार हैं. यह उम्मीद की जा सकती है कि इससे पहले कि बहुत देर हो जाए बसपा आत्मविश्लेषण करेगी और खुद में सुधार करेगी.

सृष्टि पर पहरे के खिलाफ बज रही हैं घंटियां: केदारनाथ और अशोक वाजपेयी की कविता

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/21/2014 01:35:00 PM


 रंजीत वर्मा के इस आलेख में अशोक वाजपेयी और केदारनाथ सिंह के नए कविता संग्रहों की विवेचना की गई है. समयांतर से साभार .

हिंदी कविता की जो वरिष्ठतम पीढ़ी आज हमारे बीच सृजनरत हैं केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी वहीं से आते हैं। सृष्टि पर पहरा (केदारनाथ सिंह) और कहीं कोई दरवाजा (अशोक वाजपेयी) ये दोनों कविता संग्रह इस बात के उदाहरण हैं जो 2014 और 2013 में क्रमश: छप कर आए हैं। दोनों के पास कविता लिखने का लगभग पचास साल या उससे ज्यादा समय का अनुभव है। भाषा पर इन दोनों का समान रूप से अधिकार है और ये चाहें तो सिर्फ अभ्यास से भी कविता लिख सकते हैं और लोग कह सकते हैं कि कविता अच्छी बन पड़ी है। लेकिन कविता बन पढ़ने की चीज नहीं है बल्कि रची जाती है और इसका रचा जाना एक खास मनःस्थिति में ही संभव हो पाता है। दोनों इस बात से न सिर्फ अच्छी तरह वाकिफ होंगे बल्कि इसका अनुसरण भी करते होंगे फिर भी कोई बात है जो इन दोनों को एक दूसरे से अलग करती है। हम देखते हैं कि जहां एक ओर केदारनाथ सिंह का कविता-संसार व्यापक होता जाता है वहीं दूसरी ओर अशोक वाजपेयी का दायरा सिकुड़ता जाता है यद्यपि भौगोलिक रूप से देखें तो अशोक वाजपेयी की कविता देश की सीमा से बाहर निकल कर दूर तक फैलती दिखती है जबकि केदारनाथ सिंह की कविता महानगर से निकल कर कहीं पीछे छूट गए जनपदों में भटकते लोगों की गठरी और पोटली जैसी लगभग नगण्य चीजों की ओर जाती है। कोई कह सकता है कि आखिर इसमें ऐसा क्या है कि दूर तक फैलती कविता को सिकुड़ती जाती कविता और छोटी-छोटी चीजें को समेटती चलती कविता को व्यापक होती कविता कहा जा रहा है। वैसे भी यह तो कवि के स्वभाव और पहुंच से जुड़ा मसला भर है इसलिए इस आधार पर कुछ तय नहीं किया जा सकता। लेकिन बात सच में इतनी भर नहीं है बल्कि कहीं गहरे वहां तक जाती है जहां दो कविताएं एक दूसरे से अलग अपनी पहचान बनाने लगती हैं। यहीं इस बात के भी भेद छिपे हैं कि क्यो एक को सिकुड़ती जाती कविता और दूसरे को व्यापक होती कविता यहां कहा जा रहा है।

इसके पहले कि हम कविता में जाएं और इसकी वजहों की पड़ताल करें कुछ सूत्र जो हमारे हाथ लगे हैं उनका उल्लेख यहां करना अप्रासंगिक नहीं होगा। केदारनाथ सिंह ने अपना कविता-संग्रह अपने गांव के लोगों को समर्पित किया है जिनके बारे में उनका मानना है कि उन तक यह किताब कभी नहीं पहुंचेगी। जाहिर है कि इन पंक्तियों में कविता को लेकर कोई निराशा नहीं है बल्कि उस बाजार पर सवाल है जो लोगों तक कविता को पहुंचने नहीं देता। यानी कि जिस तरह से कविता बाजार के विरुद्ध खड़ी है उसी तरह से बाजार भी कविता के खिलाफ खड़ा है। इन पंक्तियों में वे इसी ओर इशारा कर रहे है। साथ ही वे यह भी कह रहे हैं कि उनकी कविता दूर जनपदों में उपेक्षित पड़ी जिंदगियों की कविता है इसलिए यहां एक सच्चे कवि की चिंता भी है जो सिर्फ लिख देने तक ही अपना दायित्व नहीं समझता बल्कि जिसके लिए लिखी गई है कविता वहां तक पहुंचे इसे भी वह अपने काम का हिस्सा मानता है। जबकि दूसरी ओर हम देखते हैं कि अशोक वाजपेयी में कविता को लेकर एक प्रकार की निराशा है जो शायद कविता को लेकर निरर्थकता बोध से पैदा हुई है जिसने इस चौदहवें संग्रह के बाद उनके कविता लिखने की रफ्तार को थाम लिया है। अपने संग्रह की भूमिका के पहले पैराग्राफ में उन्होंने लिखा है:

अच्छी-बुरी कविता लिखते एक अधसदी से अधिक का समय हो गया है। पहला कविता-संग्रह 1966 में प्रकाशित हुआ था और यह चौदहवां 2013 में आ रहा है। हालांकि कविता को लेकर उत्साह और उम्मीद में कोई कमी नहीं हुई है, कविता लिखने की रफ्तार जरूर धीमी पड़ गई है जो ठीक ही है।

इन पंक्तियों से पता चलता है कि वे उत्साह और उम्मीद में कविता लिखते हैं लेकिन यह उत्साह क्यों है और उम्मीद किस बात को लेकर वे पाले हुए थे या हैं इसका जिक्र अपनी भूमिका में उन्होंने करने की जरूरत नहीं समझी और न इसका पता उनकी कविताओं को पढ़ने से चल पाता है। आखिर वह कैसी उम्मीद थी जो बकौल उनके अब भी बनी हुई है लेकिन कविता लिखने की रफ्तार धीमी पड़ गयी है जिसे वे अच्छा बता रहे हैं। वे यहां फिर यह बताने की जरूरत नहीं समझते कि यह अच्छा कैसे है क्योंकि इस पंक्ति में यह आशय भी छिपा हुआ है कि पहले जरूर कुछ था जो बुरा था। अगर बुरा था तो क्या और क्यों इस पर भी उन्हें रोशनी डालनी चाहिए थी लेकिन वे ऐसा कुछ नहीं करते। कविता लिखने के लिए जिस आंतरिक मनःस्थिति की जरूरत पड़ती है क्या उस मनःस्थिति में कविता नहीं लिखा जाना भी संभव है जो अब वे कम लिख रहे हैं या पहले वे अभ्यासवश भी कविता लिख जाते थे जैसा करने का उन्हें अब कोई प्रयोजन नजर नहीं आ रहा है। क्या हम यह न मान लें कि जिसे वे उत्साह या उम्मीद कह रहे हैं दरअसल वह इच्छाएं थीं लेकिन कोई प्रयोजन-चाहे वह जो भी हो-सिद्ध ना होता देख कर जन्मी हताशा ने कविता लिखने की रफ्तार को थाम लिया है। भला सोचिए कविता लिखने की भी कहीं कोई रफ्तार होती है जिसका वो जिक्र कर रहे हैं। यहां तो गहरे उतर जाने वाली बात होती है।  

ऐसा क्यों होता है कि एक ही समय में लिखते हुए भी दो कवियों का विकास भिन्न तरीके से होता है। हम देखते हैं कि जो कवि कविता की चिंता करता है वह सिमटता जाता है फिर भी वह ऐसा करता है और वह भी उसी समय में जिसमें दूसरा कवि दुनिया की चिंताओं से कविता का जोड़ता चलता है और व्यापक होता जाता है। क्यों एक को चिंता नहीं होती कि वह सिमटता जा रहा है और वह भी इस हद तक कि कविता का कोई मकसद भी होता है उसे यह दिखना बंद हो जाता है जबकि दूसरा दुनिया भर के दुख और संघर्ष से जुड़ने की हर संभव कोशिश में लगा रहता है। जाहिर तौर पर विचारधारा होना और विचारधारा नहीं होना यह अंतर पैदा करता है। वही विचारधारा जिसे इन दिनों अप्रासंगिक करार देने की मुहिम सी कुछ लोगों ने साहित्य में चला रखी है। यहां तक कि उसे मृत तक घोषित किया जाने लगा है जबकि आज के विषमता भरे समय में कविता के लिए यह प्राणवायु की तरह है। यह धारणा केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी की कविता को पढ़ते हुए और भी पुरजोर तरीके से पुष्ट होती है कि कैसे इसका होना या नहीं होना काम करता है। कैसे यह प्राणवायु केदारनाथ सिंह की कविता को समय के एक जीवंत दस्तावेज में बदल देती है जबकि इसके बिना अशोक वाजपेयी की कविता निरुद्देश्य भटकती हुई प्रतीत होती है। और इस भटकाव में भी कोई आवारगी नही है दीवानापन नहीं है बल्कि हड़बड़ी है। ’तेजी से क्यों?’ कविता में वे खुद कबूलते हैं ’हमारी मुश्किल है हमारी हड़बड़ी’। आखिर यह हड़बड़ी क्यों है? इसी कविता में वे एक जगह लिखते हैं:

जिस अनन्त वर्तमान में रहने को अब हम विवश हैं
उसमें स्मृति की जगह नहीं बची है
याद करना अपने को गुनाह में शामिल करना है।


यहां ’अनन्त वतर्मान’ शब्दावली ध्यान देने योग्य है। साफ है कि वे यह मान कर चल रहे हैं कि यह पूरा समय एक अनन्त वर्तमान की तरह है, इतिहास का अंत हो चुका है और इस पर अब बहस करने के लिए भी कुछ नहीं बचा है। अगली पक्तियों में वे ऐसा ही कुछ कह भी रहे हैं। बात सिर्फ इतनी ही भर नहीं है कि कविता इतिहासविहीन है बल्कि यह भविष्योन्मुखी भी नहीं है क्योंकि भविष्य के सपने इतिहास के गर्भ में पलते हैं और विचारधारा उसे निश्चित आकार देती है। अशोक वाजपेयी इन दोनों का निषेध करते हैं अतः वे ’अनन्त वर्तमान’ में रहने को अभिशप्त हैं। वे इस बात को समझते भी हैं लेकिन इस स्थिति से उबरने का कोई संघर्ष उनकी कविता या कविता की चेतना में दिखाई नहीं देता है। बल्कि इसके उलट एक प्रकार की स्वीकारोक्ति है। कोई दुख या क्षोभ भी नहीं है बल्कि एक तरह का सहज भाव है जो कविता को लम्पटता की हद तक ले जाता है। उपरोक्त कविता में एक जगह ये पंक्तियां आती हैं:

दूर से दुख, भले वह करोड़ों का रहा हो
जिनका संहार हुआ और जिन्हें उसका कारण
या अपना दोष तक पता नहीं चला
रंगीन-सा लगता है।


एक दूसरी कविता ’अपने शब्द वापस’ की इन पंक्तियों को देखिये:

शब्दों का इतिहास होता है
पर मेरे शब्द उसमें होंगे
ऐसी दुराशा करने का कोई आधार नहीं।


इसी कविता के अंत में जैसे हाथ खड़े करते हुए वे कह उठते हैं:


सचाई, शब्दों से, कम से कम मेरे शब्दों से
दूर जा चुकी है
और अब तो यह मानना तक मुश्किल है
कि वह कभी इन शब्दों में थी।


सवाल है कि अगर शब्दों में सचाई या कहना चाहिए कि अर्थ नहीं है तो क्यों नहीं है। जाहिर है कि शब्दों में सचाई या अर्थ जीवन से आते हैं। जीवन जितना अर्थपूर्ण और समर्पित होता है शब्द भी उतने ही अर्थपूर्ण और सच के रूप में सामने आते हैं और कई बार तो जीवन का नया आयाम खोलते हुए एक बिल्कुल नया अर्थ प्रकट कर जाते हैं। आप जिसके लिए जी रहे हैं आपकी कविता भी उसी के लिए होगी। इस भ्रम में रहने की कोई जरूरत नहीं कि आपकी कविता सब के लिए होगी। ठीक वैसे ही जैसे कि आप सबके लिए जी नहीं सकते। अगर आप यह भ्रम पैदा करने में सफल हो भी जाते हैं तो कविता सब कुछ उजागर कर देती है। संग्रह की अंतिम कविता ’कहां से उठाऊं शब्द’ बता देती है कि कवि तय नहीं कर पाया है कि वह किस ओर है। एक उहापोह की स्थिति है। और वह भी ऐसी कि वह चीजों को जोड़ कर नहीं देख पा रहा है। टुकड़े-टुकड़े में देख रहा है। अगर ऐसा है तो फिर जुड़ाव कहां से हो, कोई भी पक्ष कैसे सामने आए, जुझारूपन तो दूर की बात है। ’ऐसा क्यों हुआ’ कविता में वे कहते हैं:

हमें भ्रम है कि हम साहसी थे
जब साहस की सबसे ज्यादा दरकार थी
हम आगे की कतार में नहीं थे।

यहां वे ’हम’ शब्द का इस्तेमाल पता नहीं किन लोगों के लिए कर रहे हैं। वह हर जगह एक अकेले व्यक्ति की तरह दिखते हैं किसी संगठन या आंदोलन में शरीक कार्यकर्ता की तरह नहीं। फिर इस ’हम’ का क्या मतलब है। अगर यहां ’हम’ की जगह ’मैं’ होता तो मैं यह मान लेता कि वह जो कुछ कह रहे हैं वह उनकी ईमानदार स्वीकारोक्ति है लेकिन ’हम’ कह कर उन्होंने जो धुंधलका खड़ा करने की कोषिष की है वह उनकी ईमानदारी पर सवाल खड़े कर जाती है। यह मैं यूं ही नहीं कह रहा हूं बल्कि देखने में यह आता है कि अनेक दूसरी कविताओं में उन्होंने ’हम’ नहीं बल्कि ’मैं’ का इस्तेमाल किया है जैसे कि ’फिर भी आवाज सुनाई देती है’, ’भले’, ’अब सब कुछ को’ , ’अपने शब्द वापस’, ’तीन कविताएं’, ’विनय गीत’, ’मैंने’ आदि बहुतेरी कविताओं में देखा जा सकता है।

दूसरी ओर हम देखते हैं कि केदारनाथ सिंह की कविता का स्वर अशोक वाजपेयी की कविता के मुकाबले कहीं ज्यादा समकालीन है। आसपास की आवाजें, बदलते रुख को यहां सुना और देखा जा सकता है। कई नाम मिलेंगे, कई जगहें मिलेंगी, कई घटनाएं मिलेंगी जो अपने जीवन में घटती रहती हैं, कई दृश्य आते हैं जो आपकी अपनी आंखों से देखी हुइ्र होती हैं और यह सब मिल कर कविता जो संसार रच जाती है वहां आपके जीवन के कई सारे अर्थ खुलने लगते हैं। संग्रह के नाम ’सृष्टि पर पहरा’ के नाम से संग्रह में एक छोटी कविता भी है जिसमें वे लिखते हैं:

कितना भव्य था
एक सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर
महज तीन-चार पत्तों का हिलना
उस विकट सुखाड़ में
सृष्टि पर पहरा दे रहे थे
तीन-चार पत्ते।


सूखता हुआ वृक्ष दुख का वह पहाड़ है जिसे वे पत्ते अपने अंदर समेटे हुए ऊपर निकल आए हैं। वे तीन चार पत्ते कविता हैं जो दुख के पहाड़ से निकले हैं शायद इसीलिए वह सही मायने में कविता की भूमिका अदा कर पाते हैं। ये कविताएं जूझते या लड़ते आदमी के हाथ में पतवार या तलवार की तरह होती हैं या नहीं तो कम से कम उसे यह अहसास जरूर करा जाती हैं कि वह कोई महती काम में शरीक है, उसका जीवन-संघर्ष निरर्थक या नगण्य नहीं है बल्कि वह जीवन-समर में जरूरी हस्तक्षेप कर रहा है। असफलताओं की मार से इस तरह ये कविताएं उसे बचाती हैं हालांकि मैं तुलनात्मक अध्ययन नहीं करना चाह रहा लेकिन मुझे जरूरी लग रहा है कि यहीं पर अशोक वाजपेयी की ’इतनी भर’ कविता पर भी बात कर ली जाए नहीं तो हो सकता है आगे मौका न मिले क्योंकि उनकी कविताओं को लेकर जो कुछ कहा जाना था कहा जा चुका है। ’इतनी भर’ में वे लिखते हैं:
 

दुनिया इतनी भर बची है
जितनी एक कविता में आ जाए
दुनिया इतनी भर है अब
जितनी एक उपन्यास में समा जाए
दुनिया इतनी भर बाकी है
जितनी एक बच्चे की किलकारी में बस सके।


यानी कि दुनिया को वे उतनी ही भर मान रहे हैं जो किसी बच्चे की किलकारी सी निष्छलता, मासूमियत और पवित्रता को बिना नष्ट किये उसमें आ सके। यही शर्त कविता के साथ भी दुनिया को लेकर लागू है जैसा कि प्रारम्भिक पंक्तियों में वे कहते हैं। यानी कि कविता से वे एक ही झटके में जिंदगी के उन तमाम पहलुओं को बाहर निकाल फेंकते हैं जो धूसर है, जिसे व्यवस्था की चालाकी, मक्कारी और बेईमानी ने पस्त होती या फिर लहूलुहान होती जिंदगी की ओर धकेल दिया है, जहां संघर्ष है, हताशा है फिर संघर्ष है और फिर फिर संघर्ष है। जबकि केदारनाथ सिंह की कविता इसी मिट्टी से तप कर निकली है। कविताओं में एक मद्धम राजनीतिक स्वर भी है जो रह रह कर सुनाई देता रहता है। कई बार यह स्वर अबूझमाड़ के जंगलों से भी उठता सुनाई देता है और अचानक सुनने वाला चौंक पड़ता है।

केदारनाथ सिंह हिंदी के संभवतः पहले बड़े कवि हैं जिनकी कविता में माओवादी राजनीति की धमक सुनाई पड़ती है। यह बेहद महत्वपूर्ण है इस अर्थ में कि कवि जो महसूस करता है उसे वह बिना इस बात की चिंता किये कि यह अभिव्यक्ति उसका नुकसान भी कर सकती है वह उसे कविता में उसके पूरे अधिकार और सम्मान के साथ रखता है। एक ऐसे समय में जब लोग ईमानदारी को ताख पर रखकर अपने नफे-नुकसान के गणित में इस कदर मशगूल हैं कि उनकी सवेदना को ऐसी बातें छू भी नहीं पातीं वहीं केदारनाथ सिंह इस जोखिम को उठाते नजर आते हैं। इस पहल को सभी नोटिस में लें यह जरूरी है क्योंकि तभी यह संग्रह एक अर्थ में हिंदी कविता का टर्निंग प्वायंट हो सकता है। यह हिंदी कविता के अराजनीतिकरण के छद्म को तोड़ता है। इस संग्रह का महत्व क्यों और कैसे है यह समझने के लिए जरूरी है कि साहित्य और राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को समझ लिया जाए। दरअसल पिछले दिनों हुआ यह कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई से खुद को अलगाने की कोशिश में कविता या तो ’निरुद्देश्य भटकती’ कविता होकर रह गयी या फिर सामाजिक रूढि़यों से लड़ती पहचान की राजनीति करती हुई स्त्री विमर्ष या दलित विमर्ष की राजनीति में सिमट गई जो कहीं न कहीं से इसी व्यवस्था को मजबूत बनाये रखने का काम करती है। इसका नतीजा यह हुआ कि कविता भाषा, विचार और सत्ता के स्तर पर जकड़ गई। ऐसे समय में सबसे बड़ी चुनौती साहित्य को उसके इस जकड़न से निकालने की है। यह कहना अभी मुश्किल है कि माओवाद की लड़ाई को इस तरह की कविता से ताकत मिलेगी या नहीं लेकिन यह तय है कि माओवाद की लड़ाई की जो ताकत है वह कविता को उसके जकड़न से जरूर मुक्त कर सकती है और उसे जनता के बीच पुनः प्रतिष्ठित कर सकती है। केदारनाथ सिंह ने इस संग्रह के जरिये यही काम किया है। संग्रह में एक कविता है ’कविता’ शीर्षक से जिसमें वे यह बताते हैं कि वास्तविक कविता कहां है। उनका साफ मानना है वह वहां नहीं है जहां मंच है, पुरस्कार है प्रतिष्ठान है और उसका संरक्षण है। वे कहते हैं

सरकारें परेशान
कि क्या करें-क्या करें इस कविता का
कि हवा दो
पानी दो
टैक्स में दे दो चाहे जितनी छूट
पर वोट मांगने जाओ
तो कभी अपने पते पर मिलती ही नहीं
जाने कैसी बनैली प्रजाति की लतर है
किसी राष्ट्रीय उद्यान में
खिलती ही नहीं।


फिर कहां है कविता। इसी कविता में पूरे आत्मविश्वास से वे बताते हैं कि वह कहां है:

पता लगा लो-जो मारे जाते हैं जंगलों में
उन युवा होंठों पर
अक्सर होती है कोई न कोई कविता।


मरते वक्त भी जिसके होंठों पर कविता होगी कोई शक नहीं कि कविता भी उसी की होगी, उसी के गीत गाएगी।

एक छोटी कविता है ‘बाजार में आदिवासी’ जिसे यहां पूरा का पूरा रखा जाना जरूरी है:

भरे बाजार में
वह तीर की तरह आया
और सारी चीजों पर
एक तेज हिकारत की नजर फेंकता हुआ
बिक्री और खरीद के बीच के
पतले सुराख से
गेहुंअन की तरह अदृश्य हो गया
एक सुच्चा
खरा
ठनकता हुआ जिस्म
कहते हैं वह ठनक अबूझमाड़ में
रात बिरात
अक्सर सुनाई पड़ती है
मिला कोई गायक
तो एक दिन पूछूंगा
संगीत की भाषा में
क्या कहते हैं इस ठनक को?


सात सुरों से सजे शास्त्रीय गायकों के लिए इसका जवाब ढूंढ पाना सरल नहीं होगा कि आखिर महज तीन सुरों में गाने वाले इन आदिवासियों ने यह कैसी ठनक पैदा कर दी है जिसका जवाब खंगालने से भी नहीं मिल रहा है। समझा जा सकता है कि कविता और संगीत की धुन पर जिस आंदोलन के कदम उठ रहे हों उसे बमों और गोलियों की बौछारों से ध्वस्त नहीं किया जा सकता। भला ध्वस्त किया भी कैसे जा सकता है जहां सिर्फ कान ही नहीं पांव भी सुनते हैं। ’पांव’ कविता में वे कहते हैं:

कभी चलते हुए अचानक
अगर तेज-तेज चलने लगे तुम्हारे पांव
समझना उन्होंने सुन ली है
किन्हीं जंजीरों की झन-झन


’जहां से अनहद शुरू होता है’ की पंक्तियां हैं:

कोहरे में ये घंटियों की आवाज
कहां से आ रही है सुबह-सुबह
क्या आज फिर कोई मीटिंग है
झरही किनारे
या बेलवा जंगल में


संग्रह में एक गजल है जिसका एक शेर इस प्रकार है:

इक शख्स वहां जेल में है सबकी ओर से
हंसना भी यहां जुर्म है क्या पूछ लीजिए


दरअसल देखा जाए तो इस तरह की पंक्तियां बिखरी पड़ी हैं संग्रह में। ’गुमशुदा कवि’ में वे लिखते हैं:

हर चेहरा लगता है
एक लपट के जैसा


या ’चुप्पियां’ में कहते हैं:

चुप्पियां बढ़ती जा रही हैं
उन सारी जगहों पर
जहां बोलना जरूरी था


आप कह सकते हैं कि इसी चुप्पी को तोड़ने की कोशिश है यह संग्रह। इस बेहद नाजुक दौर में यह संग्रह एक जरूरी हस्तक्षेप की तरह है।

घृणाजन्य अपराध और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/13/2014 07:01:00 PM


राम पुनियानी

मोदी सरकार को सत्ता संभाले तीन हफ्ते से ज्यादा हो गए हैं। एक ओर जहां समाज के कुछ तबकों को इस सरकार से ढेरों आशाएं हैं वहीं दूसरी ओर, इस सरकार के बारे में जो भय और आशंकाएं पहले से व्यक्त की जा रही थीं, वे सच होती दिख रही हैं। बाल ठाकरे और शिवाजी के रूपांतरित चित्र, सोशल वेबसाईटों पर अपलोड होने के कुछ समय बाद ही पुणे में अल्पसंख्यकों पर योजनाबद्ध हमले शुरू हो गए। हिंसक भीड़ ने शहर को मानो अपने कब्जे में ले लिया। कई मस्जिदों को नुकसान पहुंचाया गया और कम से कम 200 सरकारी व निजी वाहनो को आग के हवाले कर दिया गया। इस हिंसा का सबसे भयावह पक्ष था मोहसिन शेख नाम के एक आईटी कंपनी में कार्यरत पेशेवर की सार्वजनिक रूप से हत्या। धनंजय देसाई के नेतृत्व में ‘हिंदू राष्ट्र सेना’ के कार्यकर्ताओं ने इस जघन्य कृत्य को अंजाम दिया। यह घटना बताती है कि नफरत हमें किस हद तक क्रूर और अमानवीय बना सकती है। जहाँ इस घटना से अल्पसंख्यक समुदाय सकते में हैं और कई नागरिक समूहों ने इसकी कड़ी निंदा की है, वहीं भारत के प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर चुप हैं। महाराष्ट्र की सरकार इस घटना को एक सामान्य अपराध मान रही है। यह समझना कठिन है कि किसी व्यक्ति को केवल उसके धर्म के कारण, सड़क पर घेरकर, पीट-पीटकर मार डालने को केवल एक सामान्य हत्या कैसे समझा या बताया जा सकता है? वैसे भी, मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही अल्पसंख्यक समुदाय के लोग आशंकित और भयग्रस्त हैं। पुणे और आसपास के इलाकों में पिछले दो हफ्तों में अल्पसंख्यकों के घरों व उनके धर्मस्थलों पर अनेक हमले हुए हैं। भाजपा की विचारधारा में यकीन करने वालों की हिम्मत बहुत बढ़ गई है। पुणे के आईटी पेशेवर की हत्या, उन लोगों के लिए एक चेतावनी का संकेत है जो सांप्रदायिक सद्भाव व राष्ट्रीय एकता के लिए संघर्षरत हैं और जो इस बात के हामी हैं कि अल्पसंख्यकों को समाज में सम्मान के साथ जीने का और आगे बढ़ने के समान अवसर प्राप्त करने का हक है।

पुणे की घटना को हम उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर से जोड़कर भी देख सकते हैं। वहां भी चुनाव के पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए हिंसा भड़काई गई थी। यह मात्र संयोग नहीं है कि महाराष्ट्र में भी जल्द ही चुनाव होने वाले हैं। उत्तरप्रदेश में एक सड़क दुर्घटना के बाद हुई मारपीट को ‘‘हमारी महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़’’ का स्वरूप दे दिया गया था। ‘लव जिहाद’ की चर्चा होने लगी और सांप्रदायिक खेमे के एक विधायक ने एक नकली वीडियो क्लिप अपलोड कर आग में घी डालने का काम किया। इस सबके बाद, पूरे इलाके में भयावह हिंसा हुई। हिंसा की कोख से जन्मा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और इसके बाद, उत्तरप्रदेश में भाजपा को भारी विजय हासिल हुई। उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत का श्रेय अमित शाह को दिया जा रहा है। वे ही अमित शाह अब महाराष्ट्र जा रहे हैं जहां वे आगामी चुनाव में भाजपा को जीत दिलवाने के लिए काम करेंगे। और इसके ठीक पहले, हिन्दू राष्ट्र सेना जैसी ताकतों ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का तांडव शुरू कर दिया है।

हमारे देश में लंबे समय से सांप्रदायिक हिंसा और सांप्रदायिक अपराधों का इस्तेमाल धार्मिक ध्रुवीकरण करने के लिए  किया जाता रहा है। हालिया लोकसभा चुनाव में, सतही तौर पर देखने पर ऐसा लग सकता है कि मोदी को उनके विकास के एजेण्डे ने जीत दिलाई। परंतु सच यह है कि मोदी की जीत की पृष्ठभूमि में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही था। इसी ध्रुवीकरण की खातिर मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान अनुच्छेद ३७०, बांग्लादेशी घुसपैठियों और पिंक रिवोल्यूशन आदि की बातें कीं। नतीजे में हुए धार्मिक ध्रुवीकरण ने मोदी की जीत में कितनी भूमिका अदा की, यह कहना मुश्किल है।

कुल मिलाकर, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, सांप्रदायिक पार्टियों का एक प्रमुख हथियार है। गुजरात में हमने देखा कि किस तरह, गोधरा ट्रेन आगजनी के बाद हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने बड़े पैमाने पर हिंसा भड़कायी, जिसमें मारे जाने वालों में से 80 प्रतिशत मुसलमान थे। इस हिंसा ने ध्रुवीकरण को और गहरा किया और भाजपा सरकार, जो उस समय डगमगा रही थी, बहुमत से सत्ता में वापिस आ गई।

सांप्रदायिक हिंसा और ध्रुवीकरण के लिए जिन मुद्दों का इस्तेमाल किया जाता है, वे समय के साथ बदलते रहे हैं। ब्रिटिश काल में मस्जिदों के सामने बैंड बजाना, मस्जिदों में सुअर का मांस और मंदिरों में गाय का मांस फेंकना, दंगे शुरू करवाने के पसंदीदा तरीके थे। गोधरा में मुसलमानों को हिंदू कारसेवकों को जिंदा जलाने का दोषी ठहराया गया तो मुंबई में बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने का उत्सव मनाकर अल्पसंख्यकों को भड़काया गया। जहां ये मुद्दे हिंसा शुरू करवाने में मदद करते हैं वहीं लोगों के दिमागों में जहर भरने का काम लगातार चलता रहता है। मुस्लिम राजाओं की क्रूरता के किस्से बयान किए जाते हैं, यह बताया जाता है कि किस तरह मुसलमान बादशाह, मंदिरों को जमींदोज किया करते थे और अपनी हिंदू प्रजा पर जजि़या थोपते थे। यह भी कहा जाता है कि इस्लाम को तलवार की नोंक पर भारत में फैलाया गया। इसके अलावा, धारा 370 व मुसलमानों की ‘‘तेजी से बढ़ती’’ आबादी आदि जैसे मुद्दों पर भी भड़काऊ और झूठी बातें कही जाती हैं। इतिहासविद् व सामाजिक कार्यकर्ता चाहे लाख कहते रहें कि ये बातें सही नहीं हैं और सच कुछ और है तब भी उनकी कोई नहीं सुनता। केवल कुछ लोग, जो कि दूसरों की बातें आँख मूंदकर मानने में विश्वास नहीं रखते, तार्किकता और सत्य की आवाज को सुन पाते हैं। अधिकांश लोग आरएसएस के अतिप्रभावकारी व शक्तिशाली प्रचारतंत्र के जाल में फंस जाते हैं। आरएसएस ने पिछले कई दशकों से चले आ रहे अपने दुष्प्रचार के जरिये यह सुनिश्चित कर लिया है कि देश के अधिकांश हिंदू, मुसलमानों के बारे में गलत धारणाएं पाल लें। नोम चोम्स्की ने राज्य द्वारा ‘सहमति के निर्माण’ की बात कही थी। यहां, हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन, ‘सामाजिक मान्यताओं’ का उत्पादन कर रहे हैं और इन मान्यताओं को आम लोगों के दिमागों में बिठा रहे हैं। इन मिथकों और गलत धारणाओं का इस्तेमाल, धार्मिक ध्रुवीकरण करने और सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के लिया किया जाता रहा है।

सांप्रदायिक ताकतों के हथियारों के जखीरे में सोशल मीडिया एक नए व अत्यंत पैने हथियार के रूप में उभरा है। इसकी पहुंच व्यापक है। जहां अखबार व पत्र-पत्रिकाएं अपने लेखन में कम से कम कुछ संतुलन व परिपक्वता रखते हैं वहीं सोशल मीडिया में कोई भी, कुछ भी लिख सकता है और उसे लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। मुजफ्फरनगर में हिंसा भड़काने के लिए मुसलमानों के पारंपरिक परिधान पहने हुए लोगों द्वारा, पाकिस्तान ने दो चोरों की पिटाई की वीडियो क्लिप का इस्तेमाल किया गया। ऐसा बताया गया कि यह मुसलमानों द्वारा हिंदू लड़कों को मारने के दृश्य हैं। बजरंग दल के कार्यकर्ता, हैदराबाद के मंदिरों में गौमांस फेंकते हुए और कर्नाटक में पाकिस्तान का झंडा फहराते हुए पकड़े जा चुके हैं। हिंदू राष्ट्र सेना जैसे संगठन सोशल मीडिया का इस्तेमाल समाज को बांटने के लिए कर रहे हैं। इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी, उनकी असली सोच व इरादे को जाहिर करती है। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव आसन्न हैं और इस तरह की घटनाओं से भाजपा को वोटों की फसल काटने में मदद मिलेगी। यह आवश्यक है कि महाराष्ट्र सरकार चुनावी समीकरणों की परवाह करे बगैर विघटनकारी ताकतों को पूरी तरह से कुचल दे। इसके साथ ही, विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच आपसी प्रेम व सद्भाव को बढ़ावा देने की जरूरत भी है। अल्पसंख्यकों के बारे में गलत धारणाओं, मिथकों और पूर्वाग्रहों को दूर किया जाना भी उतना ही जरूरी है। यह भी उतना ही आवश्यक है कि हम आमजनों को यह समझाएं कि हमारे देश की विविधवर्णी संस्कृति और उसके बहुवाद का सम्मान करके ही हम आगे बढ़ सकते हैं।

(अनुवाद:अमरीश हरदेनिया)

खेल शुरू हो चुका है: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/11/2014 12:00:00 AM




गरीबों-उत्पीड़ितों की हिमायत के ऐलान के साथ मोदी सरकार के बनते ही भगाणा के आंदोलनकारी दलित परिवारों को जंतर मंतर से बेदखल करने की कोशिशों और पुणे में एक मुस्लिम नौजवान की हत्या में आनंद तेलतुंबड़े ने आने वाले दिनों के संकेतों को पढ़ने की कोशिश की है. अनुवाद: रेयाज उल हक.

अब इस आधार पर कि लोगों ने भाजपा की अपनी उम्मीदों से भी ज्यादा वोट उसे दिया है और नरेंद्र मोदी ने ‘अधिकतम प्रशासन’ की शुरुआत कर दी है, बहुत सारे लोग यह सोच रहे थे कि हिंदुत्व के पुराने खेल की जरूरत नहीं पड़ेगी. अपने हाव-भाव और भाषणों के जरिए मोदी ने बड़ी कुशलता से ऐसा भ्रम बनाए भी रखा है. इसके नतीजे में मोदी के सबसे कट्टर आलोचक तक गलतफहमी के शिकार हो गए हैं. यहां तक कि जिन लोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया है, उनमें से भी कइयों को ऐसा लगने लगा है कि मोदी शायद कारगर साबित हों. लेकिन संसद के केंद्रीय कक्ष में, भावनाओं में लिपटी हुई लफ्फाजी से भरे ऐलान के आधार पर यह यकीन करना बहुत जल्दबाजी होगी कि मोदी सरकार गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति समर्पित होगी. तब भी कइयों को लगता है कि चूंकि वे एक साधारण पिछड़ी जाति के परिवार से आते हैं और पूरी आजादी से काम करते हैं, इसलिए हो सकता है कि गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हों. नहीं भी तो वे मुसलमानों (जिन्होंने मोदी को वोट नहीं दिया है) और दलितों (जिन्होंने भारी तादाद में उन्हें वोट दिया है) के प्रति संवेदनशील होंगे. यही वे दो मुख्य समुदाय हैं जिनसे मिल कर वह गरीब और उत्पीड़ित तबका बनता है, जिसके प्रति मोदी समर्पित होने की बात कह रहे हैं. 

लेकिन इस हफ्ते हुई दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने इन उम्मीदों को झूठा साबित कर दिया. दलितों के बलात्कारों और हत्याओं की लहर तो चल ही रही थी, उनके साथ साथ घटी इन दो घटनाओं ने ऐसे संकेत दिए हैं कि शायद पुराना खेल शुरू हो चुका है.

दलितों की नामुराद मांगें

भगाणा की भयानक घटना देश को शर्मिंदा करने के लिए काफी थी: घटना ये है कि हरियाणा में 23 मार्च को 13 से 18 साल की चार लड़कियों को नशा देकर रात भर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के ये अपराधी उन्हें ले जाकर भटिंडा रेलवे स्टेशन के पास झाड़ियों में फेंक आए. लेकिन इसके बाद जो हुआ वह कहीं अधिक घिनौना और शर्मनाक है. लड़कियों को मेडिकल जांच के दौरान अपमानजनक टू फिंगर टेस्ट से गुजरना पड़ा, जिसका बलात्कार के मामले में इस्तेमाल करने पर आधिकारिक पाबंदी लगाई जा चुकी है. हालांकि पुलिस को दलित समुदाय के दबाव के चलते शिकायत दर्ज करनी पड़ी, लेकिन उसने अपराधियों को पकड़ने में पांच हफ्ते लगाए. जबकि हिसार अदालत में उनको रिहा कराने की न्यायिक प्रक्रिया फौरन शुरू हो गई. और यह गिरफ्तारी भी तब हुई जब भगाणा के दलितों को उन लड़कियों के परिजनों के साथ इंसाफ के लिए धरने पर बैठना पड़ा. ये दलित परिवार अपने गांव वापस लौटने में डर रहे हैं क्योंकि उन्हें जाटों के हमले की आशंका है. भगाणा के करीब 90 दलित परिवार, जिनमें बलात्कार की शिकायतकर्ता लड़कियों के परिवार भी शामिल हैं, दिल्ली के जंतर मंतर पर 16 अप्रैल से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इसके अलावा 120 दूसरे परिवार हिसार के मिनी सचिवालय पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इन प्रदर्शनों के दौरान ही नाबालिग लड़कियों के बलात्कारों की अनेक भयानक खबरें निकल कर सामने आई हैं. जैसा कि एक हिंदी ब्लॉग रफू ने प्रकाशित किया है, पास के डाबरा गांव की 17 साल की एक दलित लड़की का जाट समुदाय के ही लोगों ने 2012 में सामूहिक बलात्कार किया था जिसके बाद उसके पिता ने आत्महत्या कर ली थी. एक और 10 वर्षीय बच्ची का एक अधेड़ मर्द ने बलात्कार किया था. इसके अलावा एक और लड़की का एक जाट पुरुष ने बलात्कार किया जो आज भी सरेआम घूम रहा है और उल्टे पुलिस ने लड़की को ही गिरफ्तार करके उसे यातनाएं दीं. ये सारी लड़कियां इंसाफ के लिए निडर होकर लड़ रही हैं और इन विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा हैं.

जंतर मंतर पर 6 जून को सुबह करीब 6 बजे, जब ज्यादातर आंदोलनकारी सो रहे थे, पुलिसकर्मियों का एक बड़ा समूह आया और उसने आंदोलनकारियों के तंबू गिरा दिए. उन्होंने उनके तंबुओं को जबरन वहां से हटा दिया और चेतावनी दी कि वे लोग दोपहर 12 बजे तक वहां से चले जाएं. हिसार मिनी सचिवालय में भी विरोध करने वाले इसी तरह हटाए गए. दोनों जगहों पर पुलिस ने उन्हें तितर बितर कर दिया और उनका सामान तोड़ फोड़ दिया. छोटे-छोटे बच्चों समेत ये निर्भयाएं (बलात्कार से गुजरी लड़कियों के लिए मीडिया द्वारा दिया गया नाम) सड़कों पर फेंक दी गई, लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां भी नहीं रहने दिया. वहां पर जुटे महिला, दलित और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों तथा दो शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं को साथ लेकर प्रदर्शनकारी दोपहर 2 बजे संसद मार्ग थाना के प्रभारी अधिकारी को यह ज्ञापन देने गए कि उन्हें जंतर मंतर पर रुकने की इजाजत दी जाए क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है. लेकिन इस समूह को थाना के सामने बैरिकेड पर रोक दिया गया. जब महिलाओं ने जाने देने और थाना प्रभारी से मिलने की इजाजत देने पर जोर दिया तो पुलिसकर्मी उन्हें पीछे हटाने के नाम पर उनके साथ यौन दुर्व्यवहार करने लगे. वुमन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन की कल्याणी मेनन सेन के मुताबिक, जो प्रदर्शनकारियों का हिस्सा थीं, पुलिस ने प्रदर्शनकारी महिलाओं के गुप्तांगों को पकड़ा और उनके गुदा को हाथ से दबाया. शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं और अनेक महिला कार्यकर्ताओं (समाजवादी जन परिषद की वकील प्योली स्वातीजा, राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की सुमेधा बौद्ध और एनटीयूआई की राखी समेत) पर इसी घटिया तरीके से हमले किए गए. बताया गया कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी चिल्ला रहा था, ‘अरे ये ऐसे नहीं मानेंगे, लाठी घुसाओ.’ इस घिनौने हमले के बाद अनेक कार्यकर्ताओं को पकड़ कर एक घंटे से ज्यादा हिरासत मे रखा गया.

इस नवउदारवादी दौर में जनसाधारण के लिए लोकतांत्रिक जगहें सुनियोजित तरीके से खत्म कर दी गई हैं और इन जगहों को राज्य की राजधानियों के छोटे से तयशुदा इलाके और दिल्ली में जंतर मंतर तक सीमित कर दिया गया है. लोग यहां जमा हो सकते हैं और पुलिस से घिरे हुए वे अपने मन की बातें कह सकते हैं, लेकिन वहां उनकी बातों की सुनवाई करने वाला कोई नहीं होता. यह भारतीय लोकतंत्र का असली चेहरा है. इस बदतरीन मामले में गांव के पूरे समुदाय को दो महीने तक धरने पर बैठना पड़ा है, अपने आप में यही बात घिनौनी है. उनकी जायज मांग की सुनवाई करने के बजाए – वे अपने पुनर्वास के लिए एक सुरक्षित जगह मांग रहे हैं क्योंकि वे भगाणा में नहीं लौट सकते – सरकार लोकतंत्र की इस सीमित और आखिरी जगह से भी उन्हें क्रूरतापूर्वक बेदखल कर रही है. यह बात यकीनन इसे दिखाती है कि ये दलितों के लिए वे ‘अच्छे दिन’ तो नहीं हैं, जिनका वादा मोदी सरकार ने किया था. दिल्ली पुलिस सीधे सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आता है और यहां पुलिस तब तक इतने दुस्साहस के साथ कार्रवाई नहीं करती जब तक उसे ऐसा करने को नहीं कहा गया हो. यह बात भी गौर करने लायक है कि हरियाणा और दिल्ली की पुलिस ने, जहां प्रतिद्वंद्वी दल सत्ता में हैं, समान तरीके से कार्रवाई की है. तो संदेश साफ है कि विरोध वगैरह जैसी बातों की इजाजत नहीं दी जाएगी. क्योंकि अगर जंतर मंतर और आजाद मैदान जैसी जगहें आबाद रहीं तो फिर कोई ‘अच्छे दिनों’ का नजारा कैसे कर पाएगाॽ

पहला विकेट गिरा

ऊपर की कार्रवाई तो सरकार की सीधी कार्रवाई थी, लेकिन कपट से भरी ऐसी अनेक कार्रवाइयां ऐसे संगठनों ने भी की हैं, जिनके हौसले भाजपा की जीत के बाद बढ़े हुए हैं. भगाणा के प्रदर्शनकारियों को उजाड़े जाने से ठीक दो दिन पहले 2 जून को पुणे में एक मुस्लिम नौजवान को हिंदू राष्ट्र सेना से जुड़े लोगों की भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला. दशक भर पुराना यह हिंदू दक्षिणपंथी गिरोह फेसबुक पर शिव सेना के बाल ठाकरे और मराठा प्रतीक छत्रपति शिवाजी की झूठी तस्वीरें लगाए जाने का विरोध कर रहा था. पुणे पुलिस के मुताबिक, इन झूठी तस्वीरों वाला फेसबुक पेज पिछले एक साल से मौजूद था और उसको 50,000 लाइक्स मिली थीं. भीड़ को उकसाने के लिए हिंदू राष्ट्र सेना के उग्रवादियों ने इस बहुप्रशंसित पेज के लिंक को चैटिंग के जरिए तेजी से फैलाया. उनका कहना था कि यह पेज एक मुसलमान ‘निहाल खान’ द्वारा बनाया गया और चलाया जाता है, लेकिन पुलिस के मुताबिक यह असल में एक हिंदू नौजवान निखिल तिकोने द्वारा चलाया जाता है, जो काशा पेठ के रहने वाले हैं. फिर इस गड़बड़ी का अहसास होते ही इस पेज को शुक्रवार को सोशल नेटवर्किंग साइटों से हटा लिया गया और तब इस मुद्दे पर विरोध को हवा देने की जरूरत नहीं रह गई थी. लेकिन हिंदू राष्ट्र सेना और शिव सेना के गुंडे सोमवार को प्रदर्शन करने उतरे. पुणे के बाहरी इलाके हदसपार में शाम उन्होंने एक बाइक रोकी, इसके सवार को उतारा और उसके सिर पर हॉकी स्टिक और पत्थरों से हमला किया और दौरे पर ही उसे मार डाला. मार दिया गया वह व्यक्ति मोहसिन सादिक शेख नाम का एक आईटी-प्रोफेशनल था और उसका उन तस्वीरों से कोई लेना देना नहीं था. लेकिन चूंकि उसने दाढ़ी रख रखी थी और हरे रंग का पठानी कुर्ता पहन रखा था हमलावरों ने उसे मार डाला. शेख के साथ जा रहे उनके रिश्ते के भाई बच गए जबकि दो दूसरे लोगों अमीन शेख (30) और एजाज युसूफ बागवान (25) को चोटें आईं. पुलिस ने पहले हमेशा की तरह इस रटे रटाए बहाने के नाम पर इस मामले को रफा दफा करने की कोशिश की कि हमलावर शिवाजी की मूर्ति का अपमान किए जाने और एक हिंदू लड़की के साथ मुस्लिम लड़कों द्वारा बलात्कार किए जाने की अफवाह के कारण वहां जमा हुए थे. मानो इससे एक बेगुनाह नौजवान की हत्या जायज हो जाती हो.

शेख की हत्या के फौरन बाद, आनेवाले दिनों के बारे में बुरे संकेत देता हुआ एक एसएमएस भेजा गया जिसमें मराठी में कहा गया था: पहिली विकेट पडली (पहला विकेट गिर गया). इस संदेश को मद्देनजर रखें और शेख को मारने के लिए इस्तेमाल किए गए हथियारों पर गौर करें तो यह साफ जाहिर है कि यह एक योजनाबद्ध कार्रवाई थी. पुलिस ने रोकथाम करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए. हालांकि उसको बस इसी का श्रेय दिया जा सकता है, खास कर संयुक्त आयुक्त संजय कुमार को, कि उन्होंने हिंदू राष्ट्र सेना के प्रमुख धनंजय देसाई समेत 24 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया है और उनमें से 17 पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया है. देसाई पर शहर के विभिन्न थानों में पहले से ही दंगा करने और रंगदारी वसूलने के 23 मामले दर्ज हैं. लेकिन इस फौरी कार्रवाई को इसके मद्देनजर भी देखना चाहिए कि आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए महाराष्ट्र की कांग्रेस-राकांपा सरकार अपना धर्मनिरपेक्ष मुखौटा दिखाने की कोशिश करेगी. लेकिन चूंकि मोदी सरकार इस पर चुप है, इसलिए संकेत अच्छे नहीं दिख रहे हैं.

ऐसा लगता है कि खेल शुरू हो गया है. देखना यह है कि नरेंद्र मोदी इस खेल में किस भूमिका में उतरते हैं.

अल्पसंख्यक अधिकार और राज्य हिंसा

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/06/2014 05:36:00 PM



शासक वर्ग के संकट के नतीजे में जिस तरह से राज्य की केंद्रीय भूमिका के साथ अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ रहे हैं उसमें सुभाष गाताड़े का यह लेख एक जरूरी पाठ है. यह अगस्त 2013 ‘साहित्य और मानवाधिकार’ शीर्षक पर इंग्लिश विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित सेमिनार में प्रस्तुत व्याख्यान है.

अगर मैं नहीं जलता
अगर आप नहीं जलते
हम लोग नहीं जलते
फिर अंधेरे में उजास कौन करेगा
- नाजिम हिकमत

1.
कुछ समय पहले एक अलग ढंग की किताब से मेरा साबिका पड़ा जिसका शीर्षक था ‘रायटर्स पुलिस’ जिसे ब्रुनो फुल्गिनी ने लिखा था। जनाब बुल्गिनी जिन्हें फ्रांसिसी संसद ने पुराने रेकार्ड की निगरानी के लिए रखा था, उसे अपने बोरियत भरे काम में अचानक किसी दिन खजाना हाथ लग गया जब दो सौ साल पुरानी पैरिस पुलिस की फाइलें वह खंगालने लगे। इन फाइलों में अपराधियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अलावा लेखकों एवं कलाकारों की दैनंदिन गतिविधियों का बारीकी से विवरण दिया गया था। जाहिर था कि 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में महान लेखकों पर राजा की बारीकी निगरानी थी।

जाहिर है कि अन्दर से चरमरा रही हुकूमत की आन्तरिक सुरक्षा की हिफाजत में लगे लोगों को यह साफ पता था कि ये सभी अग्रणी कलमकार भले ही कहानियां लिख रहे हों, मगर कुलीनों एवं अभिजातों के जीवन के पाखण्ड पर उनका फोकस और आम लोगों के जीवनयापन के मसलों को लेकर उनके सरोकार मुल्क के अन्दर जारी उथलपुथल को तेज कर रहे हैं। उन्हें पता था कि उनकी यह रचनाएं एक तरह से बदलाव के लिए उत्प्रेरक का काम कर रही हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि कानून एवं सुरक्षा के रखवालों द्वारा विचारों के मुक्त प्रवाह पर बन्दिशें लगाने के लिए की जा रही वे तमाम कोशिशें बेकार साबित हुई और किस तरह सामने आयी फ्रांसिसी क्रान्ति दुनिया के विचारशील, इन्साफपसन्द लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन कर सामने आयी।

या आप ‘अंकल टॉम्स केबिन’ या ‘लाईफ अमंग द लोली’ नामक गुलामी की प्रथा के खिलाफ अमेरिकी लेखिका हैरिएट बीचर स्टोव द्वारा लिखे गए उपन्यास को देखें। इसवी 1852 में प्रकाशित इस उपन्यास के बारे में कहा जाता है कि उसने अमेरिका के ‘‘गृहयुद्ध की जमीन तैयार की’। इस किताब की लोकप्रियता का अन्दाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 19 वीं सदी का वह सबसे अधिक बिकनेवाला उपन्यास था। कहा जाता है कि अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन, जिन्होंने गुलामी की प्रथा की समाप्ति के लिए चले गृहयुद्ध की अगुआई की, जब 1862 में पहली दफा हैरिएट बीचर स्टोव से मिले तो उन्होंने चकित होकर पूछा ‘‘ तो आप ही वह महिला जिन्होंने लिखे किताब ने इस महान युद्ध की नींव रखी।’

ईमानदारी की बात यह है कि मैं कभी भी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा हूं मगर मैं साहित्य में समाहित इस जबरदस्त ताकत का हमेशा कायल रहता हूं। यह अकारण नहीं कि पहली समाजवादी इन्कलाब के नेता लेनिन ने, लिओ टालस्टॉय को ‘रूसी क्रान्ति का दर्पण’ कहा था या उर्दू-हिन्दी साहित्य के महान हस्ताक्षर प्रेमचन्द अपनी मृत्यु के 75 साल बाद आज भी लेखकों एवं क्रान्तिकारियों द्वारा समान रूप से सम्मानित किए जाते हैं।

और जब मैं यह विवरण पढ़ता हूं और ‘भविष्य को देखने की’ साहित्य की प्रचण्ड क्षमता का आकलन करने की कोशिश करता हूं तब यह उम्मीद करता हूं कि अब वक्त़ आ गया है कि इस स्याह दौर में साहित्य उस भूमिका को नए सिरेसे हासिल करे।

2.

इसमें कोई दोराय नहीं कि यह एक स्याह दौर है, अगर आप निओन साइन्स और चमक दमक से परे देखने की या हमारे इर्दगिर्द नज़र आती आर्थिक बढ़ोत्तरी के तमाम दावों के परे देखने की कोशिश करें। जनता की बहुसंख्या का बढ़ता दरिद्रीकरण और हाशियाकरण तथा अपनी विशिष्ट पहचानों के चलते होता समुदायों का उत्पीड़न अब एक ऐसी सच्चाई है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। तरह तरह के अल्पसंख्यक – नस्लीय, एथनिक, धार्मिक आदि – को दुनिया भर में बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। दक्षिण एशिया के इस हिस्से में स्थितियां वाकई बेहद विपरीत दिखती हैं। बहुसंख्यकवाद का उभार हर तरफ दिखाई देता है। एक दिन भी नहीं बीतता जब हम पीड़ित समुदायों पर हो रहे हमलों के बारे में नहीं सुनते। दक्षिण एशिया के इस परिदृश्य की विडम्बना यही दिखती है कि एक स्थान का पीड़ित समुदाय दूसरे इलाके में उत्पीड़क समुदाय में रूपान्तरित होता दिखता है।

कुछ समय पहले इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि महात्मा बुद्ध के सिद्धान्त के स्वयंभू रक्षक ‘बर्मा के बिन लादेन’ में रूपान्तरित होते दिखेंगे। मुमकिन है कि आप सभी ने ‘गार्डियन’ में प्रकाशित या ‘टाईम’ में प्रकाशित उस स्टोरी को पढ़ा हो जिसका फोकस विराथू नामक बौद्ध भिक्खु पर था, जो 2,500 बौद्ध भिक्खुओं के एक मठ का मुखिया है और जिसके प्रवचनों ने अतिवादी बौद्धों को मुस्लिम इलाकों पर हमले करने के लिए उकसाया है। बर्मा के रोहिंग्या मुसलमानों की दुर्दशा जिन पर बहुसंख्यकवादी बौद्धों द्वारा जबरदस्त जुल्म ढाये जा रहे हैं सभी के सामने है।

बर्मा की सीमा को लांघिये, बांगलादेश पहुंचिये और आप बिल्कुल अलग नज़ारे से रूबरू होते हैं। यहां चकमा समुदाय – जो बौद्ध हैं, हिन्दू और अहमदिया – जो मुसलमानों का ही एक सम्प्रदाय है – वे सभी इस्लामिक अतिवादियों के निशाने पर दिखते हैं। कुछ समय पहले ‘हयूमन राइटस वॉच’ ने हिन्दुओं के खिलाफ वहां जारी हिंसा के बारे में रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें उनके मकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों या मन्दिरों को जलाने का जिक्र था। यह उसी वक्त की बात है जब बांगलादेश जमाते इस्लामी के वरिष्ठ नेताओ ंके खिलाफ 1971 में किए गए युद्ध अपराधों को लेकर मुकदमे चले थे और कइयों को सज़ा सुनायी गयी थी। हालांकि वहां सत्ता में बैठे समूहों या अवाम के अच्छे खासे हिस्से ने ऐसे हमलों की लगातार मुखालिफत की है, मगर स्थितियां कब गम्भीर हो जाए इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

पड़ोसी पाकिस्तान में इस्लामीकरण की तेज होती प्रक्रिया के अन्तर्गत न केवल हिन्दुओं, अहमदियाओं और ईसाइयों पर बल्कि शिया मुसलमानों पर भी हमले होते दिखते हैं। एक वक्त़ था जब पाकिस्तान में प्रचलित इस्लाम अपनी सूफी विरासत का सम्मान करता था, मगर स्थितियां इस मुका़म तक पहुंची है कि ऐसी सभी सूफी परम्पराएं अब निरन्तर हमले का शिकार हो रही हैं। जाने माने पाकिस्तानी विद्धान एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता परवेज हुदभॉय इसे पाकिस्तान का ‘सौदीकरण’ या ‘वहाबीकरण’ कहते हैं। सूफी मज़ारों पर आत्मघाती हमले और बसों को रोक कर हजारा मुसलमानों का कतलेआम या लड़कियों को शिक्षा देने वाले स्कूलों पर बमबारी जैसी घटनाएं अब अपवाद नहीं रह गयी हैं। ईशनिन्दा के कानून के अन्तर्गत वहां किस तरह गैरमुस्लिम को निशाने पर लिया जा रहा है और किस तरह पंजाब (पाकिस्तान) के गवर्नर सलमान तासीर को इस मानवद्रोही कानून को वापस लेने की मांग करने के लिए शहादत कूबूल करनी पड़ी, इन सभी घटनाओं के हम सभी प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं।

‘सार्क’ प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा मालदीव भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ता दिखता है। श्रीलंका जो तमिल विद्रोहियों की सरगर्मियों के चलते दशकों तक सूर्खियों में रहा, वह इन दिनों सिंहल बौद्ध अतिवादियों की गतिविधियों के चलते इन दिनों चर्चा में रहता है, जो वहां की सत्ताधारी तबकों के सहयोग से सक्रिय दिखते हैं। कुख्यात बोडू बाला सेना के बारे में समाचार मिलते हैं कि किस तरह वह मुस्लिम प्रतिष्ठानों पर हमले करती है, ‘पवित्रा इलाकों’ से मस्जिदों तथा अन्य धर्मों के प्रार्थनास्थलों को विस्थापित करने का निर्देश देती है, यहां तक कि उसने मुसलमानों के लिए धार्मिक कारणों से प्रिय हलाल मीट को बेचने पर भी कई स्थानों पर रोक लगायी है। बर्मा की तरह यहां पर भी मुस्लिम विरोधी खूनी मुहिम की अगुआई बौद्ध भिक्खु करते दिखते हैं।

अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र कहलानेवाला भारत भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं है।

3.

जहां तक अल्पसंख्यक अधिकारों का सवाल है तो यहां की परिस्थितियां भी अपने पड़ोसी मुल्कों से गुणात्मक तौर पर भिन्न नहीं हैं। संविधान को लागू करने के वक्त़ डा अम्बेडकर ने साठ साल पहले दी चेतावनी आज भी मौजूं जान पड़ती है कि एक व्यक्ति एक वोट से राजनीतिक जनतंत्रा में प्रवेश करते इस मुल्क में एक व्यक्ति एक मूल्य कायम करना अर्थात सामाजिक जनतंत्रा कायम करना जबरदस्त चुनौती वाला काम बना रहेगा।

कई अध्ययनों और सामाजिक परिघटनाओं के अवलोकन के माध्यम से अल्पसंख्यक अधिकारों की वास्तविक स्थिति को जांचा जा सकता है। इनमें सबसे अहम है साम्प्रदायिक हिंसा की परिघटना। इसकी विकरालता को समझने के लिए हम साम्प्रदायिक विवाद को लेकर चन्द आंकड़ों पर निगाह डाल सकते हैं।

केन्द्रीय गृहमंत्रालय से सम्बद्ध महकमा ब्युरो आफ पुलिस रिसर्च एण्ड डेवलपमेण्ट द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक 1954 से 1996 के बीच हुए दंगों की 21,000 से अधिक घटनाओं में लगभग 16,000 लोग मारे गए, जबकि एक लाख से अधिक जख्मी हुए। इनमें से महज मुट्ठीभर लोगों को ही दंगों में किए गए अपराध के लिए दंडित किया गया। और हम यह नहीं भूल सकते कि यह सभी ‘आधिकारिक’ आंकड़े हैं, वास्तविक संख्या निश्चित ही काफी अधिक होगी।
प्रधानमंत्राी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद आयोजित सिख विरोधी जनसंहार को हम याद कर सकते हैं जब राष्ट्रीय स्तर पर सिख हमले का शिकार हुए और आधिकारिक तौर पर दिल्ली की सड़कों पर एक हजार से अधिक निरपराध – अधिकतर सिख – गले में जलते टायर डाल कर या ऐसे ही अन्य पाशवी तरीकों से मार दिए गए। हर कोई जानता है कि यह कोई स्वतःस्फूर्त हिंसा नहीं थी, वह बेहद संगठित, सुनियोजित हिंसा थी जिसमें तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के नेता शामिल थे। इसकी जांच के लिए कई आयोग बने, जिनमें सबसे पहले आयी थी ‘सिटिजन्स फार डेमोक्रेसी’ द्वारा तैयार की रिपोर्ट। इस रिपोर्ट ने स्पष्टता के साथ कांग्रेस के नेताओं को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था।

क्या आज कोई यकीन कर सकता है कि दिल्ली, जो भारत जैसे सबसे बड़े जनतंत्र की राजधानी है, वह महज तीस साल पहले आधिकारिक तौर पर एक हजार से अधिक निरपराधों के – जिनका बहुलांश सिखों का था – सरेआम हत्या का गवाह बनी और आज दस जांच आयोगों और तीन विशेष अदालतों के बाद, सिर्फ तीन लोग दंडित किए जा चुके हैं और बाकी मुकदमे अभी उसी धीमी रफ्तार से चल रहे हैं, जबकि इस सामूहिक संहार के असली कर्ताधर्ता एवं मास्टरमाइंड अभी भी बेदाग घूम रहे हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब तक हम सिखों के खिलाफ हुई इस हिंसा के असली कर्णधारों को दंडित नहीं करते, वह हमारे वक्त़ के ‘हिन्दू हृदय सम्राटों’ को वैधता प्रदान करता रहेगा जिन्होंने 2002 में गुजरात की अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा को ‘क्रिया-प्रतिक्रिया’ के पैकेज में प्रस्तुत किया है।
जैसे कि एक वरिष्ठ पत्रकार ने लिखा है गुजरात 2002 की इस संगठित हिंसा के तीन विचलित करनेवाले पहलुओं को लेकर सभी की सहमति होगी। ‘‘एक यही कि यह जनसंहार शहरी भारत की हृदयस्थली में मीडिया की प्रत्यक्ष मौजूदगी में हुआ’, ‘दूसरे जिन्होंने इस जनसंहार को अंजाम दिया वह इसके तत्काल बाद इन अपराधों के चलते सत्ता में लौट सके’ और ‘तीसरे, इतने सालों के बाद भी कहीं से भी पश्चात्ताप की कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती है।’

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हर सम्वेदनशील, मानवीय, न्यायप्रिय व्यक्ति तथा संगठन इस समूची परिस्थिति को लेकर आंखें मूंद कर रह सकता है या चुप्पी के इस षडयंत्र को तोड़ने के लिए तैयार है। क्या हमारे स्तर पर यह मानना उचित होगा कि हम उस जनसंहार को चन्द ‘बीमार हत्यारों’, ‘कुछ धूर्त मस्तिष्कों की हरकतों’ तक सीमित रखें और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सहयोगी संगठनों – जिन्होंने इसकी योजना बनायी और उस पर अमल किया – को बेदाग छोडें़ ?

इस हक़ीकत को देखते हुए कि आज की तारीख में दंगा कराने का काम बकौल पाल आर ब्रास ‘संस्थागत दंगा प्रणालियों’ की अवस्था तक पहुंचा है, यह मुनासिब नहीं होगा कि हम किसी भी दंगे में स्वतःस्फूर्तता के तत्व तक अपने आप को सीमित रखें। हमें इस बात पर बार बार जोर देना पड़ेगा क्योंकि आज दंगा पीड़ितों से न्याय से बार बार इन्कार को लेकर ‘स्वतःस्फूर्तता’ का यही जुमला दोहराया जाता है। इस पहलू की चर्चा करते हुए सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश सुश्री इंदिरा जयसिंह ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया था:

    ‘ हमारी कानूनी प्रणाली इस बुनियादी प्रश्न को सम्बोधित करने में असफल रही है: आखिर ऐसी जनहत्याओं को लेकर राज्य के मुखिया की संवैधानिक और व्यक्तिगत जिम्मेदारी क्या होती है’ और उनकी सिफारिश थी: ‘वे सभी जिन्होंने ऐसी हत्याओं को अंजाम दिया हो उन्हें जिम्मेदार ठहराने के अलावा, हमें उन लोगों को भी जिम्मेदार मानना होगा जिनके हाथों में सत्ता के सूत्रा रहे हैं, जो न केवल हत्याओं को रोकने में असफल रहे, बल्कि घृणा आधारित वक्तव्यों से ऐसी हत्याओं की जमींन तैयार करते हुए उन्होंने उसे समझ में आने लायक प्रतिक्रिया घोषित किया।’’

इस समूची बहस की याद नए सिरेसे ताज़ा हो जाती है जब हम देखते हैं कि यह नेल्ली कतलेआम का इकतीसवां साल है और इस जघन्य हत्याकाण्ड के कर्ताधर्ता आज भी खुलेआम घुम रहे हैं। वह फरवरी 18, 1983 का दिन था जब हथियारबन्द समूहों ने असम के जिला नागौन में 14 गांवों में छह घण्टे के अन्दर 1,800 मुसलमानों को (गैरसरकारी आंकड़ा: 3,300) मार डाला। आज़ाद हिन्दोस्तां के धार्मिक-नस्लीय जनसंहार के इस सबसे बर्बर मामले में हमलावरों ने यह कह कर अपने हत्याकाण्ड को जायज ठहराया कि मरनेवाले सभी बांगलादेश के अवैध आप्रवासी थे। इस मामले की जांच के लिए बने आयोग – तिवारी कमीशन – की रिपोर्ट, जो ढाई दशक पहले सरकार को सौंपी गयी, आज भी वैसी ही पड़ी हुई है। उसकी सिफारिशों पर कार्रवाई होना दूर रहा। और सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों के बीच वहां एक अलिखित सहमति बनी है कि इस मामले को अब खोला न जाए।

4.

कई तरीके हो सकते हैं जिसके माध्यम से बाहरी दुनिया के सामने भारत को प्रस्तुत किया जाता है, प्रोजेक्ट किया जाता है। कुछ लोगों के लिए वह दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्रा है, जबकि बाकियों के लिए वह दुनिया की तेज गति से चल रही अर्थव्यवस्था है जिसका अब विश्व मंच पर ‘आगमन’ हो चुका है। लेकिन शायद ही कोई हो यह कहता है कि वह ‘जनअपराधों की भूमि’ है जहां ऐसे अपराधों के अंजामकर्ताओं को शायद ही सज़ा मिलती हो। जनमत को प्रभावित करनेवाले लोग कहीं भी उस अपवित्रा गठबन्धन की चर्चा नहीं करते हैं जो सियासतदानों, माफियागिरोहों और कानून एवं व्यवस्था के रखवालों के बीच उभरा है जहां ‘जनअपराधों को अदृश्य करने’ की कला में महारत हासिल की गयी है। और ऐसे जनअपराधों के निशाने पर – धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लोग, सामाजिक श्रेणियों में सबसे नीचली कतार में बैठे लोग या देश के मेहनतकश – दिखते हैं।

क्या कोई इस बात पर यकीन कर सकता है कि 42 दलितों – जिनमें मुख्यतः महिलाएं और बच्चे शामिल थे – का आज़ाद हिन्दोस्तां का ‘पहला’ कतलेआम तमिलनाडु के तंजावुर जिले के किझेवनमन्नी में (1969) में सामने आया था जहां तथाकथित उंची जाति के भूस्वामियों ने इसे अंजाम दिया था, मगर सभी इस मामले में बेदाग बरी हुए क्योंकि अदालती फैसले में यह कहा गया कि ‘इस बात से आसानी से यकीन नहीं किया जा सकता कि उंची जाति के यह लोग पैदल उस दलित बस्ती तक पहुंचे होंगे।’ गौरतलब है कि कम्युनिस्ट पार्टी की अगुआई में मजदूरों ने वहां हड़ताल की थी और अदालत में भले ही उन शोषितों को न्याय नहीं मिला होगा मगर वहां के संघर्षरत साथियों ने भूस्वामियों के हाथों मारे गए इन शहीदों की स्मृतियों को आज भी संजो कर रखा है, हर साल वहां 25 दिसम्बर को – जब यह घटना हुई थी – हजारों की तादाद में लोग जुटते हैं और चन्द रोज पहले यहां उनकी याद में एक स्मारक का भी निर्माण किया गया।

अगर हम स्वतंत्र भारत के 60 साला इतिहास पर सरसरी निगाह डालें तो यह बात साफ होती है कि चाहे किझेवनमन्नी, यहा हाशिमपुरा (जब यू पी के मेरठ में दंगे के वातावरण में वहां के 42 मुसलमानों को प्रांतीय पुलिस ने सरेआम घर से निकाल कर भून दिया था 1986), ना बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बम्बई में शिवसेना जैसे संगठनों द्वारा प्रायोजित दंगों में मारे गए 1,800 लोग (जिनका बहुलांश अल्पसंख्यकों का था, 1992 और जिसको लेकर श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट भी दी है), ना ही राजस्थान के कुम्हेर में हुए दलितों के कतलेआम (1993) और न ही अतिवादी तत्वों द्वारा किया गया कश्मीरी पंडितों के संहार (1990) जैसे तमाम मामलों में किसी को दंडित किया जा सका है। देश के विभिन्न हिस्सों में हुए ऐसे ही संहारों को लेकर ढेर सारे आंकड़े पेश किए जा सकते हैं।

और हम यह भी देखते हैं कि उत्तर पूर्व और कश्मीर जैसे इलाकों में, दशकों से कायम सशस्त्रा बल विशेष अधिकार अधिनियम जैसे दमनकारी कानूनों ने सुरक्षा बलों को एक ऐसा कवच प्रदान किया है कि मनगढंत वजहों से उनके द्वारा की जानेवाली मासूमों की हत्या अब आम बात हो गयी है। हम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मणिुपर की फर्जी मुठभेड़ों को लेकर बनाए गए सन्तोष हेगडे कमीशन की रिपोर्ट हालिया रिपोर्ट पढ़ सकते हैं और जिन चुनिन्दा घटनाओं की जांच के लिए उन्हें कहा गया था उसका विवरण देख सकते हैं। बहुत कम लोग इस तथ्य को स्वीकारना चाहेंगे कि कश्मीर आज दुनिया का सबसे सैन्यीकृत इलाका है और विगत दो दशकों के दौरान वहां हजारों निरपराध मार दिए गए हैं।

आप यह जान कर भी विस्मित होंगे कि किस तरह ऐस जनअपराधों को या मानवता के खिलाफ अपराधों को सत्ताधारी तबकों द्वारा औचित्य प्रदान किया जाता है या वैधता दी जाती है, जहां मुल्क का प्रधानमंत्राी राजधानी में सिखों के कतलेआम के बाद – जिसे उसकी पार्टी के सदस्यों ने ही अंजाम दिया – यह कहता मिले कि ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो जमीन हिलती ही है।’ या किसी राज्य का मुख्यमंत्राी उसके अपने राज्य में मासूमों के कतलेआम को न्यूटन के ‘क्रिया प्रतिक्रिया’ के सिद्धान्त से औचित्य प्रदान करे।

ऐसे तमाम बुद्धिजीवी जो ‘हमारी महान संस्कृति’ में निहित सहिष्णुता से सम्मोहित रहते हैं और उसकी समावेशिता का गुणगान करते रहते हैं, वह यह जान कर आश्चर्यचकित होंगे कि किस तरह आम जन, अमनपसन्द कहलानेवाले साधारण लोग रातों रात अपने ही पड़ोसियों के हत्यारों या बलात्कारियों में रूपान्तरित होने केा तैयार रहते है और किस तरह इस समूचे हिंसाचार और उसकी ‘उत्सवी सहभागिता’ के बाद वही लोग चुप्पी का षडयंत्रा कायम कर लेते हैं। बिहार का भागलपुर इसकी एक मिसाल है – जहां 1989 के दंगों में आधिकारिक तौर पर एक हजार लोग मारे गए थे, जिनका बहुलांश मुसलमानों का था – जहां लोगाईं नामक गांव की घटना आज भी सिहरन पैदा करती है। दंगे में गांव के 116 मुसलमानों को मार दिया गया था और एक खेत मंे गाड़ दिया गया था और उस पर गोबी उगा दिया गया था।

निस्सन्देह अल्पसंख्यक अधिकारों के सबसे बड़े उल्लंघनकर्ता के तौर पर हम राज्य और दक्षिणपंथी बहुसंख्यकवादी संगठनों को देख सकते हैं मगर क्या उसे सामाजिक वैधता नहीं होती। यह बात रेखांकित करनेवाली है कि एक ऐसे मुल्क में जहां अहिंसा के पुजारी की महानता का बखान करता रहता है, एक किस्म की हिंसा को न केवल ‘वैध’ समझा जाता है बल्कि उसे पवित्रता का दर्जा भी हासिल है। दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य उत्पीड़ित तबकों के खिलाफ हिंसा को प्राचीन काल से धार्मिक वैधता हासिल होती रही है और आधुनिकता के आगमन ने इस व्यापक परिदृश्य को नहीं बदला है। भारत एकमात्रा ऐसा मुल्क कहलाता है जहां एक विधवा को अपने मृत पति की चिता पर जला दिया जाता रहा है। अगर पहले कोई नवजात बच्ची को बर्बर ढंग से खतम किया जाता था आज टेक्नोलोजी के विकास के साथ इसमें परिवर्तन आया है और लोग यौनकेन्द्रित गर्भपात करवाते हैं। यह बात आसानी से समझ आ जाती है कि आखिर क्यों भारत दुनिया का एकमात्रा मुल्क है जहां 3 करोड 30 लाख महिलाएं ‘गायब’ हैं। रेखांकित करनेवाली बात यह है कि ऐसी तमाम प्रथाओं एवं सोपानक्रमों की छाप – जिनका उदगम हिन्दू धर्म में दिखता है – अन्य धर्मों पर भी नज़र आती है। इस्लाम, ईसाइयत या बौद्ध धर्म में जातिभेद की परिघटना – जिसकी बाहर कल्पना नहीं की जा सकती – वह यहां मौजूद दिखती है।

इस परिदृश्य को बदलना होगा अगर भारत एक मानवीय समाज के तौर पर उभरना चाहता है। यह चुनौती हम सभी के सामने है। अगर इस उपमहाद्वीप के रहनेवाले लोग यह संकल्प लें कि ‘दुनिया का यह सबसे बड़ा जनतंत्रा’ भविष्य में ‘जन अपराधों की भूमि’ के तौर पर न जाना जाए तो यह काम जल्दी भी हो सकता है। इसे अंजाम देना हो तो सभी न्यायप्रिय एवं अमनपसन्द लोगों एवं संगठनों को भारत सरकार को इस बात के लिए मजबूर करना होगा कि वह संयुक्त राष्ट्रसंघ के जनसंहार के लिए बने कन्वेन्शन के अनुरूप अपने यहां कानून बनाए। गौरतलब है कि भारत ने इस कन्वेन्शन पर 1959 में दस्तख़त किए थे मगर उसके अनुरूप अपने यहां कानूनों का निर्माण नहीं किया। इसका परिणाम यह हुआ कि जनअपराधों को लेकर न्याय करने की भारत के आपराधिक न्याय प्रणाली की क्षमता हमेशा ही सन्देह के घेरे में रही है। यह बात रेखांकित करनेवाली है कि उपरोक्त ‘कन्वेन्शन आन द प्रीवेन्शन एण्ड पनिशमेण्ट आफ द क्राइम आफ जीनोसाइड’ के हिसाब से जीनोसाइड अर्थात जनसंहार की परिभाषा इस प्रकार है:

    - ऐसी कोईभी कार्रवाई जिसका मकसद किसी राष्ट्रीय, नस्लीय, नृजातीय या धार्मिक समूह को नष्ट करने के इरादे से अंजाम दी गयी निम्नलिखित गतिविधियां
    क) समूह के सदस्यों की हत्या ;
    ख) समूह के सदस्यों को शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाना ;
    ग) किसी समूह पर जिन्दगी की ऐसी परिस्थितियां लादना ताकि उसका भौतिक या शारीरिक विनाश हो
    घ) ऐसे कदम उठाना ताकि समूह के अन्दर नयी पैदाइशों को रोका जा सके
    च) समूह के बच्चों को जबरन किसी दूसरे समूह को हस्तांतरित करना

हम आसानी से अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि अगर असली जनतंत्र पसन्द लोग सत्ताधारी तबकों पर हावी हो सकें तो हम जनअपराधों पर परदा डाले रखने या दंगाइयों या हत्यारों के सम्मानित राजनेताओं में रूपान्तरण को रोक सकते हैं और जनअपराधों पर परदा डालने के दोषारोपण से मुक्त हो सकते हैं।

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हमें यह बात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए कि साम्प्रदायिक हिंसा भले ही अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमले की सबसे क्रूर अभिव्यक्ति हो, मगर भेदभाव के बहुविध स्तर अस्तित्व में रहते हैं। मुस्लिम समाज की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति को जानने पर केन्द्रित रही सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर सरसरी निगाह डालें – जिसे संसद के सामने नवम्बर 2006 में प्रस्तुत किया गया था – तो विचलित करनेवाली स्थिति दिखती है। शिक्षा और सरकारी रोजगार तथा विभिन्न स्तरों पर वंचना की उनकी स्थिति को रेखांकित करने के अलावा उसने दो महत्वपूर्ण तथ्यों की तरफ इशारा किया था। भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति और जनजाति की स्थिति से भी नीचे है और भले ही भारत की आबादी में मुसलमानों की तादाद 14 फीसदी हो, मगर नौकरशाही में उनका अनुपात 2.5 फीसदी ही है। उसने आवास, काम और शैक्षिक क्षेत्रा में समानता विकसित करने के लिए बहुविध सुझाव भी पेश किए थे।

यह बात अधिक विचलित करनेवाली है कि वास्तविक व्यवहार में कुछ नहीं किया जा रहा है। नेशनल क्राइम रेकार्ड ब्युरो की हालिया रिपोर्ट इस पर रौशनी डालती है, जो बताती है कि आज भले ही भारत में पुलिस की संख्या बढ़ा रहे हैं मगर जहां तक अल्पसंख्यक समुदाय के हिस्से की बात है, तो वह प्रतिशत कम हुआ है।

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कुछ समय पहले आप सभी ने डब्लू डब्लू डब्लू गुलैल डाट कॉम पर प्रख्यात खोजी पत्रकार आशीष खेतान द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को देखा होगा जिसमें इस बात का दस्तावेजीकरण किया गया था कि ‘गोपनीय फाइलें इस तथ्य को उजागर करती हैं जिसका मुसलमानों को पहले से सन्देह रहा है: यही कि राज्य जानबूझ कर निरपराधों को आतंकवाद के आरोपों में फंसा रहा है।’ जबकि इलाकाई मीडिया में या उर्दू मीडिया में इस रिपोर्ट को काफी अहमियत मिली मगर राष्ट्रीय मीडिया ने एक तरह से खेतान के इस खुलासे को नज़रअन्दाज़ किया कि किस तरह आधे दर्जन के करीब आतंकवाद विरोधी एंजेन्सियों के आन्तरिक दस्तावेज इस बात को उजागर करते हैं कि राज्य जानबूझ कर मुसलमानों को आतंकी मामलों में फंसा रहा है और उनकी मासूमियत को परदा डाले रख रहा है।

पत्रकार ने ‘आतंकवाद केन्द्रित तीन मामलों की-ं 7/11 टेªन बम धमाके, पुणे ; पुणे जर्मन बेकरी विस्फोट ; मालेगांव धमाके 2006 जांच की है और पाया है कि इसके अन्तर्गत 21 मुसलमानों को यातनाएं दी गयीं, अपमानित किया गया और बोगस सबूतों के आधार पर उन पर मुकदमे कायम किए गए। और जब उनकी मासूमियत को लेकर ठोस सबूत पुलिस को मिले तबभी अदालत को गुमराह किया जाता रहा।’’

हम अपने हालिया इतिहास के तमाम उदाहरणों को उदधृत कर सकते हैं जहां ऐसी आतंकी घटनाओं में संलिप्तता के लिए – जिनको हिन्दुत्व आतंकियों ने अंजाम दिया था – अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को जेल में ठंूसा जाता रहा है। फिर चाहे मालेगांव 2006 के बम धमाके का मामला हो या मक्का मस्जिद धमाके की घटना हो या समझौता एक्स्प्रेस बम विस्फोट की घटना हो – हम यही देखते हैं कि इन्हें संघ के कार्यकर्ता अंजाम देते रहे – मगर दोषारोपण मुसलमानों पर होता रहा। यह भी सही है कि राज्य मशीनरी के एक हिस्से की ऐसे मामलों में संलिप्तता के बिना ऐसा सम्भव नहीं था।

जांच एजेंसियां अब तक देश के अलग अलग हिस्सों में सक्रिय हिन्दुत्ववादी संगठनों को देश के अलग अलग हिस्सों में हुई बम विस्फोट की सोलह (मुख्य) घटनाओं के लिए जिम्मेदार मानती हैं। आम लोगों को लग सकता है कि ऐसे सभी बम विस्फोट राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ के असन्तुष्ट तत्वों द्वारा किए गए हैं, इससे बड़ा झूठ दूसरा हो नहीं सकता।

अगर हम विकसित होते गतिविज्ञान पर गौर करें तो पाएंगे कि यह ‘आतंकी मोड़’ एक तरह से हिन्दुत्व संगठनों द्वारा तैयार की गयी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है जब उन्होंने तय किया कि वह ‘दंगे के आतंक’ से वह अब ‘बम के आतंक’ की तरफ मुडेंगे। उन्होंने पाया कि अब पुरानी रणनीति अधिक ‘लाभदायक’ साबित नहीं हो रही हैं और नयी रणनीति अधिक उचित हैं और मुल्क में फासीवाद के निर्माण के लिए लाभदायक है।

हम देख सकते हैं कि वह दो प्रक्रियाओं – एक राष्ट्रीय और दूसरी अन्तरराष्ट्रीय – का परिणाम है। गुजरात 2002 के जनसंहार में हिन्दुत्व ब्रिगेड की संलिप्तता की वैश्विक स्तर पर जितनी भर्त्सना हुई कि उसे दंगे की राजनीति की तरफ नये सिरेसे देखने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस बात का एहसास गहराया कि साम्प्रदायिक दंगों को अंजाम देने का वांछित राजनीतिक लाभ नहीं मिलता बल्कि साम्प्रदायिक राजनीति के माध्यम से निकले राजनीतिक लाभ अन्य कारणों से निष्प्रभावी हो जाते हैं। एक दूसरा कारक जो हिन्दुत्व ब्रिगेड की इस नयी कार्यप्रणाली के लिए अनुकूल था वह यह सहजबोध जिसका निर्माण 9/11 के बहाने अमेरिका ने किया था। ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ के नाम पर अमेरिका ने जो मुहिम शुरू की थी उसमें एक विशिष्ट समुदाय और उसके धर्म – इस्लाम – को निशाना बनाया गया था।

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ऐसे अवसर आते हैं जब आप अपने आप को बहुत निराशा की स्थिति में पाते हैं – ऐसी स्थिति जब धरती के इस हिस्से में रहनेवाले हर शान्तिकामी एवं न्यायप्रिय व्यक्ति के सामने आयी वर्ष 2002 में उपस्थित हुई थी जब हम सूबा गुजरात में सरकार की शह या अकर्मण्यता से सामने आ रहे जनसंहार से रूबरू थे। आज़ाद हिन्दोस्तां के इतिहास का वह सबसे पहला टेलीवाइज्ड दंगा अर्थात टीवी के माध्यम से आप के मकानों तक चौबीसों घण्टे ‘सजीव’ पहुंचनेवाला दंगा था।
अगर भारत सरकार ने जीनोसाइड कन्वेन्शन अर्थात जनसंहार कन्वेन्शन पर दस्तखत किए होते तो हिंसा के अंजामकर्ता या जिनकी संलिप्तता के चलते दंगे हो सके उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध के लिए सलाखों के पीछे डाला जाता। समय का बीतना और शान्ति का कायम हो जाना इस सच्चाई को नकार नहीं सकता कि आज भी वहां न्याय नहीं हो सका है।

बदले हुए हालात पर गौर करें। एक ऐसा शख्स – जिसने आधुनिक नीरो की तर्ज पर इन ‘दंगों’ को होने दिया वह आज की तारीख में ‘विकास पुरूष’ में रूपान्तरित हुआ दिखता है और उसके नए पुराने मुरीद उसे ही देश के भविष्य का नियन्ता बनाने के लिए आमादा हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि इस मुल्क का चुनावी गतिविज्ञान इस तरह आगे बढ़े कि यह शख्स भारतीय राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे। मुमकिन है कि एक अधिक समावेशी, अधिक सहिष्णु, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक शान्तिप्रिय मुल्क बनाने की हमारी ख्वाहिशें, हमारी आकांक्षाएं और हमारी कोशिशें फौरी तौर पर असफल हों।

क्या हमें इस परिणाम के लिए तैयार रहना चाहिए और अपनी ‘नियति’ के प्रति समर्पण करना चाहिए।

निश्चितही नहीं।

इसका अर्थ होगा जनतंत्र के बुनियादी सिद्धान्तों को बहुसंख्यकवाद के दहलीज पर समर्पित करना। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि बहुमत के शासन के अलावा जनतंत्रा का मतलब होता है, अल्पमत के जीवन के अधिकारों एवं मतों की सुरक्षा और अधिक महत्वपूर्ण, यह कानूनी सम्भावना कि आज का राजनीतिक अल्पमत भविष्य में चुनावी बहुमत हासिल करेगा और इस तरह शान्तिपूर्ण तरीके से व्यवस्था को बदल देगा।

यह वर्ष 2001 का था जब नार्वे में अफ्रीकी नार्वेजियन किशोर बेंजामिन हरमानसेन की नवनात्सी गिरोह ने हत्या की, जो उस मुल्क के इतिहास की पहली ऐसी हत्या थी। आगे जो कुछ हुआ उसकी यहां कल्पना करना भी सम्भव नहीं होगा। अगले ही दिन दसियांे हजार नार्वे के निवासी राजधानी ओस्लो की सड़कों पर उतरे और उन्होंने किशोर को न्याय दिलाने की मांग की और इस विशाल प्रदर्शन की अगुआई नार्वे के प्रधानमंत्राी जेन्स स्टोल्टेनबर्ग ने की जिन्होंने यही कहा: ‘यह हमारा तरीका नहीं है ; अपने समाज में नस्लीय अपराधों के लिए कोई स्थान नहीं है।’’ एक साल के अन्दर पांच सदस्यीय पीठ ने दो हमलावरों को दोषी ठहराया और उन्हें 15 साल की सज़ा सुनायी।

‘‘यह हमारा तरीका नहीं है…।’’

मुझे यह किस्सा तब याद आया जब नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्राी डा अमर्त्य सेन, भारत की सरजमीं पर यहां के नवनात्सी समूहों के निशाने पर आए जब उन्होंने कहा कि वह मोदी के देश का प्रधानमंत्राी बनने के हक में नहीं हैं क्यांेकि उनके शासन में धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं होंगे। अधिकतर लोगों ने डा सेन के वक्तव्य को गौर से नहीं पढ़ा होगा: ‘‘मुझे लगा कि बहुसंख्यक समुदाय का सदस्य होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है, न केवल मेरा अधिकार, कि मैं अल्पसंख्यकों के सरोकारों पर बात करूं। अक्सर बहुसंख्यक समुदाय का हिस्सा होने के नाते हम अक्सर इस बात को भूल जाते हैं।’’
हमारी अपनी आंखों के सामने जनतंत्रा को खोखला करने की इन तमाम कोशिशों पर हमें गौर करना ही होगा।

अल्पसंख्यक अधिकारों को सुरक्षित करने में अहमियत इस बात की होगी कि हम जनतंत्र के बुनियादी मूल्य को अपनाएं और तहेदिल से उस पर अमल करे ताकि हम ऐसे शासन का निर्माण कर सकें जहां धर्म और राजनीति में स्पष्ट फरक हो। राज्य की धर्मनिरपेक्षता और नागरिक समाज का धर्मनिरपेक्षताकरण हमारा सरोकार बनना चाहिए।

दोस्त अक्सर मुझे पूछते हैं कि आप क्यों जनतंत्र को गहरा करने और धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने पर जोर देते हो। इसका एकमात्रा कारण यही है कि जिस दिन हम अपने इस ‘ध्रुवतारे’ को भूल जाएंगे, फिर वह दिन दूर नहीं होगा जब हम भी अपने पड़ोसी मुल्क के नक्शेकदम पर चलेंगे जिसने राष्ट्र के आधार के तौर पर धर्म को चुना और जो आज विभिन्न आंतरिक कारणों से अन्तःस्फोट का शिकार होता दिख रहा है।

8.

जब हमारे इर्दगिर्द ऐसे हालात हों और आप के इर्दगिर्द खड़ी उन्मादी भीड़ किसी नीरो को अपना नेता मानने के लिए आमादा हो तब उम्मीद के सोतों के लिए कहां देखा जा सकता है ?

साहित्य ही ऐसा स्त्रोत हो सकता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि उसी ने लोगों को शीतनिद्रा से जगाने का काम किया है और उनमें बड़े बड़े दुश्मनों को ललकारने की हिम्मत पैदा की है।

मैं अपनी प्रस्तुति को फ्रांसिसी इतिहास के एक प्रसंग से समाप्त करना चाहूंगा जिसे ‘द्रेफ्यू काण्ड’ कहा जाता है। वह 1890 का दौर था जब फ्रांस में एक यहुदी सैन्य अधिकारी द्रेफ्यू को ‘देशद्रोह’ के आरोप में गिरफ्तार कर सेण्ट हेलेना द्वीप भेज दिया गया था। उसे तब गिरफ्तार किया गया था जब वह अपने बच्चे के साथ खेल रहा था। पुलिस ने उसके खिलाफ इतना मजबूत मामला बनाया था कि ऐसा प्रतीत हो रहा था कि इससे उसे जिन्दगी भर जेल में ही रहना पड़ेगा।

संयोग की बात कही जा सकती है कि महान फ्रांसिसी लेखक एमिल जोला ने इस काण्ड के बारे में जाना और इस घटना को लेकर अख़बारों में लेखमाला लिखी जिसका शीर्षक था ‘आई एक्यूज’ अर्थात ‘मेरा आरोप है’ जिसमें यहुदी सैन्य अधिकारी की मासूमियत को रेखांकित किया गया था और यहभी बताया गया था कि किस तरह वह एक साजिश का शिकार हुए। े उपरोक्त लेख में जोला ने यह भी बताया कि द्रेफ्यू के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज करनेवाले सभी लोग किस तरह ‘यहुदियों से घृणा’ करते थे। लेखों की इस श्रृंखला का असर यह हुआ कि द्रेफ्यू को रिहा करने की मुहिम अधिक तेज हुई और सरकार को उन्हें छोड़ना पड़ा।

क्या अब वक्त़ नहीं आया है कि आतंकवाद के फर्जी आरोपों को लेकर आज जो तमाम द्रेफ्यू जेल में हैं या अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले तेज हो रहे हैं, उस परिस्थिति में साहित्य के रचयिता और विद्यार्थी एक सुर में अपनी आवाज़ बुलन्द करें और कहें ‘आई एक्यूज’।

बस, बहुत हो चुका: आनंद तेलतुंबड़े का नया लेख

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/04/2014 02:17:00 AM



आनंद तेलतुंबड़े का यह लेख एक बेशर्म और बेपरवाह राष्ट्र को संबोधित है. एक ऐसे राष्ट्र को संबोधित है जो अपने ऊपर थोप दी गई अमानवीय जिंदगी और हिंसक जातीय उत्पीड़नों को निर्विकार भाव से कबूल करते हुए जी रहा है. यह लेख बदायूं में दो दलित किशोरियों के बलात्कार और हत्या के मामले से शुरू होता है और राज्य व्यवस्था, पुलिस, कानून और इंसाफ दिलाने वाले निजाम तक के तहखानों में पैवस्त होते हुए उनके दलित विरोधी अपराधी चेहरे को उजागर करता है. मूलत: द हिंदू में प्रकाशित इस लेख के साथ इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली में छपे उनके मासिक स्तंभ मार्जिन स्पीक का ताजा अंक भी पढ़ें. अनुवाद रेयाज उल हक

यह तस्वीर उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के कटरा गांव की है. इसमें दो दलित लड़कियों की लाश पेड़ से टंगी हुई है और तमाशबीनों की एक भीड़ हैरानी से खड़ी देख रही है. यह तस्वीर हमारे राष्ट्रीय चरित्र को सबसे अच्छे तरीके से बयान करती है. हम कितना भी अपमान बर्दाश्त कर सकते हैं, किसी भी हद की नाइंसाफी सह सकते हैं, और पूरे सब्र के साथ अपने आस पास के किसी भी फालतू बात को कबूल कर सकते हैं. यह कहने का कोई फायदा नहीं कि वे लड़कियां हमारी अपनी बेटियां और बहनें थीं, हम तब भी इसी तरह हैरानी और निराशा से भरे हुए उन्हें उसी तरह ताकते रहे होते, जैसी भीड़ में दिख रहे लोग ताक रहे हैं. सिर्फ पिछले दो महीनों में ही, जबकि हमने एक देश के रूप में नरेंद्र मोदी और अच्छे दिनों के उसके वादे पर अपना वक्त बरबाद किया, पूरे देश में दलित किशोरों और किशोरियों के घिनौने बलात्कारों और हत्याओं की एक बाढ़ सी आ गई.

लेकिन इस फौरन उठने वाले गुस्से से अलग, इन उत्पीड़नों के लिए सचमुच की कोई चिंता मुश्किल से ही दिखती है. शासकों को इससे कोई सरोकार नहीं है, मीडिया की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, और फिर इसको लेकर प्रगतिशील तबका उदासीन है और खुद दलितों में भी ठंडा रवैया दिख रहा है. यह शर्मनाक है कि हम दलितों के बलात्कार और हत्या को इस तरह लेते हैं कि वे हमारे सामाजिक ताना-बाने का अटूट हिस्सा हैं और फिर हम उन्हें भुला देते हैं.

मनु का फरमान नहीं हैं बलात्कार

जब भी हम जातियों की बातें करते हैं, तो हम शतुरमुर्ग की तरह एक मिथकीय अतीत की रेत में अपना सिर धंसा लेते हैं और अपने आज के वक्त से अपनी आंखें मूंद लेते हैं. हम पूरी बात को आज के वक्त से काट देते हैं, जिसमें समकालीन जातियों का ढांचा कायम है और अपना असर दिखा रहा है. यानी हम ठोस रूप से आज के बारे में बात करने की बजाए अतीत के किसी वक्त के बारे में बातें करने लगते हैं. आज जितने भी घिसे पिटे सिद्धांत चलन में हैं वे या तो यह सिखाते हैं कि चुपचाप बैठे रहो और कुछ मत करो या फिर वे जाति की पहचान का जहर भरते हैं – जो कि असल में एक आत्मघाती प्रवृत्ति है. वे हमारे शासकों को उनकी चालाकी से भरी नीतियों के अपराध से बरी कर देते हैं जिन्होंने आधुनिक समय में जातियों को जिंदा बनाए रखा है. यह सब सामाजिक न्याय के नाम पर किया गया. संविधान ने अस्पृश्यता को गैरकानूनी करार दिया, लेकिन जातियों को नहीं. स्वतंत्रता के बाद शासकों ने जातियों को बनाए रखना चाहा, तो इसकी वजह यह नहीं थी कि वे सामाजिक न्याय लाना चाहते थे बल्कि वे जानते थे कि जातियों में लोगों को बांटने की क्षमता है. बराबरी कायम करने की चाहत रखने वाले एक देश में आरक्षण एक ऐसी नीति हो सकता है, जिसका इस्तेमाल असाधारण मामले में, अपवाद के रूप में किया जाए. औपनिवेशिक शासकों ने इसे इसी रूप में शुरू किया था. 1936 में, अनुसूचित जातियां ऐसा ही असाधारण समूह थीं, जिनकी पहचान अछूत होने की ठोस कसौटी के आधार पर की गई थी. लेकिन संविधान लिखे जाने के दौरान इसका दायरा बढ़ा दिया गया, जब पहले तो एक बेहद लचर कसौटी के आधार पर एक अलग अनुसूची बना कर इसको आदिवासियों तक विस्तार दिया गया और फिर बाकी उन सबको इसमें शामिल कर लिया गया, जिनकी पहचान राज्य द्वारा ‘शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़ों’ के रूप में की जा सकती हो. 1990 में मंडल आरक्षणों को लागू करते हुए इस बाद वाले विस्तार का इस्तेमाल हमारे शासकों ने बेहद सटीक तरीके से किया, जब उन्होंने जातिवाद के घोड़े को बेलगाम छोड़ दिया.

उनके द्वारा अपनाई गई इन और ऐसी ही दूसरी चालाकी भरी नीतियों ने उस आधुनिक शैतान को पैदा किया है जो दलितों के जातीय उत्पीड़न का सीधा जिम्मेदार है. समाजवाद की लफ्फाजी के साथ शासक वर्ग देश को व्यवस्थित रूप से पूंजीवाद की तरफ ले गया. चाहे वह हमारी पहली पंचवर्षीय योजना के रूप में बड़े पूंजीपतियों द्वारा बनाई गई बंबई योजना (बॉम्बे प्लान) को अपना कर यह दिखावा करना हो कि भारत सचमुच में समाजवादी रास्ते पर चल रहा है, या फिर सोचे समझे तरीके से किए गए आधे अधूरे भूमि सुधार हों या फिर हरित क्रांति की पूंजीवादी रणनीति को सब जगह लागू किया जाना हो, इन सभी ने भारी आबादी वाले शूद्र जाति समूहों में धनी किसानों के एक वर्ग को पैदा किया जिनकी भूमिका केंद्रीय पूंजीपतियों के देहाती सहयोगी की थी. अब तक जमींदार ऊंची जातियों से आते थे, लेकिन अब उनकी जगह इन धनी किसानों ने ले ली, और उनके हाथ में ब्राह्मणवाद की पताका थी. दूसरी तरफ, अंतरनिर्भरता बनाए रखने वाली जजमानी प्रथाओं के खत्म होने से दलित ग्रामीण सर्वहारा बनकर और अधिक असुरक्षित हो गए. वे अब धनी किसानों से मिलने वाली खेतिहर मजदूरी पर निर्भर हो गए थे. जल्दी ही इससे मजदूरी को लेकर संघर्ष पैदा हुए जिनको कुचलने के लिए सांस्कृतिक रूप से उजड्ड जातिवाद के इन नए पहरेदारों ने भारी आतंक छेड़ दिया. इस कार्रवाई के लिए उन्होंने जाति और वर्ग के एक अजीब से मेल का इस्तेमाल किया. तमिलनाडु में किल्वेनमनी में 1968 में रोंगटे खड़े कर देने वाले उत्पीड़न से शुरू हुआ यह सिलसिला आज नवउदारवाद के दौर में तेज होता गया है. जो शूद्र जोतिबा फुले के विचारों के मुताबिक दलितों (अति-शूद्रों) के संभावित सहयोगी थे, नए शासकों की चालाकी भरी नीतियों ने उन्हें दलितों का उत्पीड़क बना दिया.

उत्पीड़न को महज आंकड़ों में न देखें

‘‘हरेक घंटे दो दलितों पर हमले होते हैं, हरेक दिन तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, दो दलितों की हत्या होती है, दो दलितों के घर जलाए जाते हैं,’ यह बात तब से लोगों का तकिया कलाम बन गई है जब 11 साल पहले हिलेरी माएल ने पहली बार नेशनल ज्योग्राफिक में इसे लिखा था. अब इन आंकड़ों में सुधार किए जाने की जरूरत है, मिसाल के लिए दलित महिलाओं के बलात्कार की दर हिलेरी के 3 से बढ़कर 4.3 हो गई है, यानी इसमें 43 फीसदी की भारी बढ़ोतरी हुई है. यहां तक कि शेयर बाजार सूचकांकों तक में उतार-चढ़ाव आते हैं लेकिन दलितों पर उत्पीड़न में केवल इजाफा ही होता है. लेकिन तब भी ये बात हमें शर्मिंदा करने में नाकाम रहती है. हम अपनी पहचान बन चुकी बेर्शमी और बेपरवाही को ओढ़े हुए अपने दिन गुजारते रहते हैं, कभी कभी हम कठोर कानूनों की मांग कर लेते हैं – यह जानते हुए भी कि इंसाफ देने वाले निजाम ने उत्पीड़न निरोधक अधिनियम को किस तरह नकारा बना दिया है. जबसे ये अधिनियम लागू हुआ, तब से ही जातिवादी संगठन इसे हटाने की मांग करते रहे हैं. मिसाल के लिए महाराष्ट्र में शिव सेना ने 1995 के चुनावों में इसे अपने चुनावी अभियान का मुख्य मुद्दा बनाया था और महाराष्ट्र सरकार ने अधिनियम के तहत दर्ज किए गए 1100 मामले सचमुच वापस भी ले लिए थे.

दलितों के खिलाफ उत्पीड़न के मामलों को इस अधिनियम के तहत दर्ज करने में भारी हिचक देखने को मिलती है. यहां तक कि खैरलांजी में, जिसे एक आम इंसान भी जातीय उत्पीड़न ही कहेगा, फास्ट ट्रैक अदालत को ऐसा कोई जातीय कोण नहीं मिला कि इस मामले में उत्पीड़न अधिनियम को लागू किया जा सके. खैरलांजी में एक पूरा गांव दलित परिवार को सामूहिक रूप से यातना देने, बलात्कार करने और एक महिला, उसकी बेटी और दो बेटों की हत्या में शामिल था, महिलाओं की बिना कपड़ों वाली लाशें मिली थीं जिन पर हमले के निशान थे, लेकिन इन साफ तथ्यों के बावजूद सुनवाई करने वाली अदालत ने नहीं माना कि यह कोई साजिश का मामला था या कि इसमें किसी महिला की गरिमा का हनन हुआ था. यहां तक कि उच्च न्यायालय तक ने इस घटिया राय को सुधारने के लायक नहीं समझा. उत्पीड़न के मामलों में इंसाफ का मजाक उड़ाए जाने की मिसालें तो बहुतेरी हैं. इंसाफ दिलाने का पूरा निजाम, पुलिस से लेकर जज तक खुलेआम असंगतियों से भरा हुआ है. किल्वेनमनी के पहले मामले में ही, जहां 42 दलित मजदूरों को जिंदा जला दिया गया था, मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि धनी जमींदार, जिनके पास कारें तक हैं, ऐसा जुर्म नहीं कर सकते और अदालत ने उन्हें बरी कर दिया. रही पुलिस तो उसके बारे में जितना कम कहा जाए उतना ही अच्छा. ज्यादातर पुलिसकर्मी तो वर्दी वाले अपराधी हैं. वे उत्पीड़न के हरेक मामले में दलितों के खिलाफ काम करते हैं. चाहे वो खामियों से भरी हुई जांच हो और/या आधे-अधूरे तरीके से की गई पैरवी हो, संदेह का दायरा अदालतों के इर्द गिर्द भी बनता है जिन्होंने मक्कारी से भरे फैसलों का एक सिलसिला ही बना रखा है. हाल में, पटना उच्च न्यायालय ने अपने यहां चल रहे दलितों के जनसंहार के मामलों में एक के बाद एक रणवीर सेना के सभी अपराधियों को बरी करके दुनिया को हैरान कर दिया. हैदराबाद उच्च न्यायालय ने भी बदनाम सुंदुर मामले में यही किया, जिसमें निचली अदालतों ने सभी दोषियों को रिहा कर दिया था.

अपराधियों का हौसला बढ़ाया जाता है

इंसाफ देने वाले निजाम द्वारा कायम की गई इस परिपाटी ने अपराधियों का हौसला ही बढ़ाया है कि वे दलितों के खिलाफ किसी भी तरह का उत्पीड़न कर सकते हैं. वे जानते हैं कि उनको कभी सजा नहीं मिलेगी. पहले तो वे यह देखते हैं कि जो दलित अपने अस्तित्व के लिए उन्हीं पर निर्भर हैं, वे यों भी उनके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे. इस तरह उत्पीड़न के अनेक मामले तो कभी सामने तक नहीं आ पाते हैं, जिनमें से ज्यादातर दूर दराज के देहाती इलाकों में होते हैं. और अगर किसी तरह उत्पीड़न का कोई मामला दबाया नहीं जा सका, तो असली अपराधी तो पुलिस की गिरफ्त से बाहर ही रहते हैं और न्यायिक प्रक्रिया के लपेटे में उनके छुटभैए मातहत आते हैं. पुलिस बहुत कारीगरी से काम करती है जिसमें वह जानबूझ कर जांच में खामियां छोड़ देती है, मामले की पैरवी के लिए किसी नाकाबिल वकील को लगाया जाता है और आखिर में एक पक्षपात से भरे फैसले के साथ मामला बड़े बेआबरू तरीके से खत्म होता है. यह पूरी प्रक्रिया अपराधियों को काफी हौसला देती है.

क्या भगाना के उन बलात्कारियों के दुस्साहस का अंदाजा लगाया जा सकता है, जिन्होंने 13 से 18 साल की चार दलित किशोरियों का क्रूरता से पूरी रात सामूहिक बलात्कार किया और फिर पड़ोस के राज्य में ले जाकर उन्हें झाड़ियों में फेंक आए और इसके बाद भी उन्हें उम्मीद थी कि सबकुछ रफा दफा हो जाएगाॽ जो लड़कियां अपने अपमान को चुनौती देते हुए राजधानी में अपने परिजनों के साथ महीने भर से इंसाफ की मांग करते हुए बैठी हैं और कोई उनकी खबर तक नहीं ले रहा है, क्या इसकी कल्पना की जा सकती है कि यह सब उन्हें कितना दर्द पहुंचा रहा होगाॽ क्या हम देश के तथाकथित प्रगतिशील तबके के छुपे हुए जातिवाद की कल्पना कर सकते हैं, जिसने एक गैर दलित लड़की के बलात्कार और हत्या पर राष्ट्रव्यापी गुस्से की लहर पैदा कर दी थी, उसे निर्भया नाम दिया था, लेकिन वो भगाना की इन लड़कियों की पुकार पर चुप्पी साधे हुए हैॽ महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के खरडा गांव के 17 साल के दलित स्कूली लड़के नितिन को जब दिनदहाड़े पीट-पीट कर मारा जा रहा था – सिर्फ इसलिए कि उसने एक ऐसी लड़की से बात करने का साहस किया था जो एक प्रभुत्वशाली जाति से आती है – तो क्या उस लड़के और उसके गरीब मां-बाप की तकलीफों की कल्पना की जा सकती है, जिनका वह इकलौता बेटा थाॽ और क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि इन दो बेगुनाह लड़कियों पर क्या गुजरी होगी, जिनके साथ अपराधियों ने रात भर बलात्कार किया और फिर पेड़ पर लटका कर मरने के लिए छोड़ दियाॽ और मामले यहीं खत्म नहीं होते. पिछले दो महीनों में इन दोनों राज्यों में उत्पीड़न के ऐसे ही अनगिनत मामले हुए, लेकिन उन्हें मीडिया में जगह नहीं मिली. क्या यह कल्पना की जा सकती है कि अपराधी बिना राजनेताओं की हिमायत के ऐसे घिनौने अपराध कर सकते हैंॽ इन सभी मामलों में राजनीतिक दिग्गज अपराधियों का बचाव करने के लिए आगे आए: हरियाणा में कांग्रेस के दिग्गजों ने, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के दिग्गजों ने और महाराष्ट्र में एनसीपी के दिग्गजों ने अपराधियों का बचाव किया.

अमेरिका में काले लोगों को पीट-पीट कर मारने की घटनाओं के जवाब में काले नौजवानों ने बंदूक उठा ली थी और गोरों को सिखा दिया था कि कैसे तमीज से पेश आया जाए. क्या जातिवादी अपराधी यह चाहते हैं कि भारत में इस मिसाल को दोहराया जाएॽ

गुंडों की सल्तनत का महापर्व: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/01/2014 05:44:00 PM




आनंद तेलतुंबड़े का यह लेख दलितों की जिंदगी के एक ऐसे सफर पर ले चलता है, जहां हिंसक उत्पीड़नों, हत्याओं और बलात्कारों को उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बना दिया गया है. अनुवाद रेयाज उल हक.

एक तरफ जब मीडिया में लोकतंत्र के महापर्व की चकाचौंध तेज हो रही थी, वहीं दूसरी तरफ देश के 20.1 करोड़ दलितों को अपने अस्तित्व के एक और रसातल से गुजरने का अनुभव हुआ. उन्होंने शैतानों और गुंडों की सल्तनत का महापर्व देखा. बहरहाल, उनके लिए लोकतंत्र बहुत दूर की बात रही है. इस अजनबी तमाशे में वे यह सोचते रहे कि क्या उन्हें इस देश को अब भी अपना देश कहना चाहिएॽ

‘हरेक घंटे दो दलितों पर हमले होते हैं, हरेक दिन तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, दो दलितों की हत्या होती है, दो दलितों के घर जलाए जाते हैं,’ यह बात तब से लोगों का तकिया कलाम बन गई है जब 11 साल पहले हिलेरी माएल ने पहली बार नेशनल ज्योग्राफिक में इसे लिखा था. अब इन आंकड़ों में सुधार किए जाने की जरूरत है, मिसाल के लिए दलित महिलाओं के बलात्कार की दर हिलेरी के 3 से बढ़कर 4.3 हो गई है, यानी इसमें 43 फीसदी की भारी बढ़ोतरी हुई है. ऐसे में जो बात परेशान करती है वह देश की समझदार आबादी का दोमुहांपन है. यह वो तबका है जिसने डेढ़ साल पहले नोएडा की एक लड़की के क्रूर बलात्कार पर तूफान मचा दिया था, और इसकी तारीफ की जानी चाहिए, लेकिन उसने हरियाणा के जाटलैंड में चार नाबालिग दलित लड़कियों के बलात्कार पर या फिर ‘फुले-आंबेडकर’ के महाराष्ट्र में एक दलित स्कूली छात्र की इज्जत के नाम पर हत्या पर चुप्पी साध रखी है. इस चुप्पी की अकेली वजह जाति है, इसके अलावा इसे किसी और तरह से नहीं समझा जा सकता. अगर देश के उस छोटे से तबके की यह हालत है, जिसे संवेदनशील कहा जा सकता है, तब दलित जनता बेवकूफी और उन्माद के उस समुद्र से क्या उम्मीद कर सकती है, जिसमें जाति और संप्रदाय का जहर घुला हुआ हैॽ

भगाना की असली निर्भयाएं

भगाना हरियाणा में हिसार से महज 13 किमी दूर एक गांव है जो राष्ट्रीय राजधानी से मुश्किल से तीन घंटे की दूरी पर है. 23 मार्च को यह गांव उन बदनाम जगहों की लंबी फेहरिश्त में शामिल हो गया, जहां दलितों पर भयानक उत्पीड़न हुए हैं. उस दिन शाम को जब चार दलित स्कूली छात्राएं – मंजू (13), रीमा (17), आशा (17) और रजनी (18) – अपने घरों के पास खेत में पेशाब करने गई थीं तो प्रभुत्वशाली जाट जाति के पांच लोगों ने उन्हें पकड़ लिया. उन्होंने उन लड़कियों को नशीली दवा खिला कर खेतों में उनके साथ बलात्कार किया और फिर उन्हें कार में उठा कर ले गए. शायद उनके साथ रात भर बलात्कार हुआ और फिर उन्हें सीमा पार पंजाब के भटिंडा रेलवे स्टेशन के बाहर झाड़ियों में छोड़ दिया गया. जब उनके परिजनों ने गांव के सरपंच राकेश कुमार पंगल से संपर्क किया, जो अपराधियों का रिश्तेदार भी है, तो वह उन्हें बता सकता था कि लड़कियां भटिंडा में हैं और उन्हें अगले दिन ले आया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भारी नशीली दवाओं के असर में और गहरी वेदना के साथ लड़कियां अगली सुबह झाड़ियों में जगीं और मदद के लिए स्टेशन तक गईं, लेकिन उन्हें दोपहर बाद 2.30 बजे तक इसके लिए इंतजार करना पड़ा जब राकेश और उसके चाचा वीरेंदर लड़कियों के परिजनों के साथ वहां पहुंचे. लौटते वक्त परिजनों को ट्रेन से भेज दिया गया और लड़कियों को कार में बिठा कर भगाना तक लाया गया. रास्ते में राकेश ने उनके साथ गाली-गलौज और बदसलूकी की, उन्हें पीटा और धमकाते हुए मुंह बंद रखने को कहा. जब वे गांव पहुंचे तो दलित लड़को ने कार को घेर लिया और लड़कियों को सरपंच के चंगुल से निकाला. अगले दिन लड़कियों को मेडिकल जांच के लिए हिसार के सदर अस्पताल ले जाया गया. वहां सुबह से दोपहर बाद डेढ़ बजे तक जांच चली, जो समझ में न आने वाली बात थी. लड़कियों ने बताया कि डॉक्टरों ने कौमार्य की जांच के लिए टू फिंगर टेस्ट जैसा अपमानजनक तरीक अपनाया जिसकी इतनी आलोचना हुई है और सरकार ने बलात्कार के मामले में इसका इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगा रखा है. 200 से ज्यादा दलित कार्यकर्ताओं के दबाव और मेडिकल रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि होने के बाद सदर हिसार पुलिस थाना ने (एससी/एसटी) उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की. हालांकि लड़कियों द्वारा दिए गए बयान में राकेश और वीरेंदर का नाम होने के बावजूद उनको इससे बाहर रखा.

ऐसा हिला देने वाला अपराध भी पुलिस को कार्रवाई करने के लिए कदम उठाने में नाकाम रहा. खैरलांजी की तरह, जब हिसार मिनी सेक्रेटेरिएट पर 120 से ज्यादा दलित जुटे और जनता का गुस्सा भड़क उठा तथा शिकायतकर्ता लड़कियों के साथ भगाना के 90 दलित परिवार दिल्ली में जंतर मंतर पर 16 अप्रैल से धरना पर बैठे तब हरियाणा पुलिस हरकत में आई और उसने 29 अप्रैल को पांच बलात्कारियों – ललित, सुमित, संदीप, परिमल और धरमवीर – को गिरफ्तार किया. दलित परिवार इंसाफ मांगने के मकसद से दिल्ली आए हैं, लेकिन इसके साथ साथ एक और वजह है. वे गांव नहीं लौट सकते क्योंकि उन्हें डर है कि बर्बर जाट उनकी हत्या कर देंगे. इन दलित मांगों को सुनने और न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने के बजाए हिसार जिला अदालत अपराधियों को रिहा करने के मामले को देख रही है. हालांकि ये बहादुर लड़कियां, असली निर्भयाएं, खुद अपनी आपबीती जनता के सामने रख रही हैं, लेकिन दिलचस्प रूप से मीडिया ने बलात्कार से गुजरने वाली महिलाओं की पहचान को सार्वजनिक नहीं करने के कायदे का पालन नहीं किया, जैसा कि उसने गैर दलित ‘निर्भयाओं’ के साथ बेहद सतर्कता के साथ किया था. राजनेताओं के बकवास बयानों से तिल का ताड़ बनाने में जुटे मीडिया ने इन परिवारों द्वारा किए जा रहे विरोध की खबर को दिखाने के लायक तक नहीं समझा – एक अभियान शुरू करने की तो बात ही छोड़ दीजिए, जैसा उसने उन ज्यादातर बलात्कार मामलों में किया है, जिनमें बलात्कार की शिकार कोई गैर दलित होती है. ऐसी भाषा में बात करने से नफरत होती है, लेकिन उनका व्यवहार इसी भाषा की मांग करता है.

दिसंबर 2012 में जारी की गई पीयूडीआर की जांच रिपोर्ट इसके काफी संकेत देती है कि भगाना बलात्कार महज अमानवीय यौन अपराध भर नहीं है बल्कि ये दलितों को सबक सिखाने के उपाय के बतौर इस्तेमाल किया गया है. वहां दलित परिवार जाटों द्वारा अपनी जमीन, पानी और श्मशान भूमि पर कब्जा कर लेने और अलग अलग तरीकों से उन्हें उत्पीड़ित करने के खिलाफ विरोध कर रहे थे.

महाराष्ट्र के चेहरे पर एक और दाग

हरियाणा की घिनौनी खाप पंचायतों वाले जाट इज्जत के नाम पर हत्या के लिए बदनाम हैं, लेकिन फुले-शाहूजी-आंबेडकर की विरासत का दावा करने वाले सुदूर महाराष्ट्र में एक गरीब दलित परिवार से आने वाले 17 साल के स्कूली लड़के को आम चुनावों की गहमागहमी के बीच 28 अप्रैल को एक मराठा लड़की से बाद करने के लिए दिन दहाड़े बर्बर तरीके से मार डाला गया. यह दहला देने वाली घटना अहमदनगर जिले के खरडा गांव में हुई. फुले का पुणे यहां से महज 200 किमी दूर है, जहां से उन्होंने ब्राह्मणवाद के खिलाफ विद्रोह की चिन्गारी सुलगाई थी. दलित अत्याचार विरोधी क्रुति समिति की एक जांच रिपोर्ट ने उस क्रूर तरीके के बारे में बताया है, जिससे गांव के सिरे पर एक टिन की झोंपड़ी में रहने वाले और एक छोटे से मिल में पत्थर तोड़ कर गुजर बसर करने वाले भूमिहीन दलित दंपती राजु और रेखा आगे से उनके बेटे को छीन लिया गया. नितिन आगे को गांव के एक संपन्न और सियासी रसूख वाले मराठा परिवार से आनेवाले सचिन गोलेकर (21) और उसके दोस्त और रिश्तेदर शेषराव येवले (42) ने पीट पीट कर मार डाला. नितिन को स्कूल में पकड़ा गया, उसके परिसर में ही उसे निर्ममता से पीटा गया, फिर उसे घसीट पर गोलेकर परिवार के ईंट भट्ठे पर ले आया गया, जहां उनकी गोद और पैंट में अंगारे रखकर उसे यातना दी गई और फिर उनकी हत्या कर दी गई. इसके बाद उसका गला घोंट दिया गया, ताकि इसे आत्महत्या के मामले की तरह दिखाया जा सके. नितिन से प्यार करने वाली गोलेकर परिवार की लड़की के बारे में खबर आई कि उसने आत्महत्या करने की कोशिश की और ऐसी आशंका जताई जा रही है उसे भी जाति की बलिवेदी पर नितिन के अंजाम तक पहुंचा दिया गया.

स्थानीय दलित कार्यकर्ताओं के दबाव में, अगले दिन नितिन की लाश की मेडिकल जांच के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर लिया जिसमें उसने आरोपितों पर हत्या करने, सबूत गायब करने, गैरकानूनी जमावड़े और दंगा करने का आरोप लगाया है. यह मामला भारतीय दंड विधान के तहत और उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम की धारा 3(2)(5) और नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 7 (1)(डी) के तहत भी दर्ज किया गया है. पुलिस ने सभी 12 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया है, जिसमें दोनों मुख्य अपराधी और एक नाबालिग लड़का शामिल है. लेकिन दलित अब यह जानते हैं कि दलितों के खिलाफ किए गए अपराध के लिए देश में संपन्न ऊंची जाति के किसी भी व्यक्ति को अब तक दोषी नहीं ठहराया गया है. अपनी दौलत के बूते और सबसे विवेकहीन पार्टी में – जिसका नाम राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) है – अपनी पहुंच के बूते गोलेकर परिवार को शायद जेल में बहुत दिन नहीं बिताने पड़ेंगे. आखिरकार एनसीपी के दिग्गजों के रोब-दाब वाले इस अकेले जिले में ही, हाल के बरसों में हुए खून से सने जातीय उत्पीड़न के असंख्य मामलों में क्या हुआॽ नवसा तालुका के सोनाई गांव के तीन दलित नौजवानों संदीप राजु धनवार, सचिम सोमलाल धरु और राहुल राजु कंदारे के हत्यारों का क्या हुआ, जिन्होंने ‘इज्जत’ के नाम पर उनकी हत्या की थीॽ धवलगांव की जानाबाई बोरगे के हत्यारों का क्या हुआ, जिन्होंने बोरगे को 2010 में जिंदा जला दिया थाॽ उन लोगों का क्या हुआ जिन्होंने 2010 सुमन काले का बलात्कार करने के बाद उनकी हत्या कर दी थी या फिर उनका जिन्होंने वालेकर को मार कर उनकी देह के टुकड़े कर दिए थे, या 2008 में बबन मिसाल के हत्यारों का क्या हुआॽ यह अंतहीन सूची हमें बताती है कि इनमें से हरेक उत्पीड़न में असली अपराधी कोई धनी और ताकतवर इंसान था, लेकिन दोषी ठहराया जाना तो दूर, मामले में उस नामजद तक नहीं बनाया गया.

जागने का वक्त

अपने अकेले बेटे को इस क्रूर तरीके से खो देने वाले राजू और रेखा आगे की भयावह मानवीय त्रासदी ‘हत्याओं’ की संख्या में बस एक और अंक का इजाफा करेगी और भगाना की उन लड़कियों को तोड़ कर रख देने वाला सदमा और जिंदगियों पर हमेशा के लिए बन जाने वाला घाव का निशान एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो) की ‘बलात्कारों’ की गिनती में जुड़ा बस एक और अंक बन कर रह जाएगा. इन मानवीय त्रासदियों को आंकड़ों में बदलने वाली सक्रिय सहभागिता, जिनके बगैर वे भुला दी गई होती, गुम हो गई है. ऐसी सामाजिक प्रक्रियाओं द्वारा पैदा किए गए उत्पीड़न के आंकड़े अब भी 33,000 प्रति वर्ष के निशान के ऊपर बनी हुई हैं. इन आधिकारिक गिनतियों का इस्तेमाल करते हुए कोई भी यह बात आसानी से देख सकता है कि हमारे संवैधानिक शासन के छह दशकों के दौरान 80,000 दलितों की हत्या हुई है, एक लाख से ज्यादा औरतों के बलात्कार हुए हैं और 20 लाख से ज्यादा दलित किसी न किसी तरह के जातीय अपराधों के शिकार हुए हैं. युद्ध भी इन आंकड़ों से मुकाबला नहीं कर सकते हैं. एक तरफ दलितों में यह आदत डाल दी गई है कि वे अपने संतापों के पीछे ब्राह्मणों को देखें, जबकि सच्चाई ये है कि इस शासन की ठीक ठीक धर्मनिरपेक्ष साजिशों ने ही उन शैतानों और गुंडों को जन्म दिया जो दलितों को बेधड़क पीट पीट कर मार डालते हैं और उनका बलात्कार करते हैं.

इसने सामाजिक न्याय के नाम पर जातियों को बरकरार रखने की साजिश की है, इसने पुनर्वितरण के नाम पर भूमि सुधार का दिखावा किया जिसने असल में भारी आबादी वाली शूद्र जातियों से धनी किसानों के एक वर्ग को पैदा किया. वह सबको खाना मुहैया कराने के नाम पर हरित क्रांति लेकर आई, जिसने असल में व्यापक ग्रामीण बाजार को पूंजीपतियों के लिए खोल दिया. वह ऊपर से रिस कर नीचे आने के नाम पर ऐसे सुधार लेकर आई, जिन्होंने असल में सामाजिक डार्विनवादी मानसिकता थोप दी है. ये छह दशक जनता के खिलाफ ऐसी साजिशों और छल कपट से भरे पड़े हैं, जिनमें दलित केवल बलि का बकरा ही बने हैं. भारत कभी भी लोकतंत्र नहीं रहा है, जैसा इसे दिखाया जाता रहा है. यह हमेशा से धनिकों का राज रहा है, लेकिन दलितों के लिए तो यह और भी बदतर है. यह असल में उनके लिए शैतानों और गुंडों की सल्तनत रहा है.

दलित इन हकीकतों का मुकाबला करने के लिए कब जागेंगेॽ कब दलित उठ खड़े होंगे और कहेंगे कि बस बहुत हो चुका!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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