हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बारह बरस से भटकती रूहें और एक चुनाव सर्वे

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/28/2014 06:36:00 PM


प्‍यू रिसर्च सेंटर का ओपिनियन पोल

अभिषेक श्रीवास्‍तव

इतिहास गवाह है कि प्रतीकों को भुनाने के मामले में फासिस्‍टों का कोई तोड़ नहीं। वे तारीखें ज़रूर याद रखते हैं। खासकर वे तारीखें, जो उनके अतीत की पहचान होती हैं। खांटी भारतीय संदर्भ में कहें तो किसी भी शुभ काम को करने के लिए जिस मुहूर्त को निकालने का ब्राह्मणवादी प्रचलन सदियों से यहां रहा है, वह अलग-अलग संस्‍करणों में दुनिया के तमाम हिस्‍सों में आज भी मौजूद है और इसकी स्‍वीकार्यता के मामले में कम से कम सभ्‍यता पर दावा अपना जताने वाली ताकतें हमेशा ही एक स्‍वर में बात करती हैं। यह बात कितनी ही अवैज्ञानिक क्‍यों न जान पड़ती हो, लेकिन क्‍या इसे महज संयोग कहें कि जो तारीख भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक कालिख की तरह यहां के फासिस्‍टों के मुंह पर आज से 12 साल पहले पुत गई थी, उसे धोने-पोंछने के लिए भी ऐन इसी तारीख का चुनाव 12 साल बाद दिल्‍ली से लेकर वॉशिंगटन तक किया गया है?

मुहावरे के दायरे में तथ्‍यों को देखें। 27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा स्‍टेशन पर साबरमती एक्‍सप्रेस जलाई गई थी जिसके बाद आज़ाद भारत का सबसे भयावह नरसंहार किया गया जिसने भारतीय राजनीति में सेकुलरवाद को एक परिभाषित करने वाले केंद्रीय तत्‍व की तरह स्‍थापित कर डाला। ठीक बारह साल बाद इसी 27 फरवरी को 2014 में नरेंद्र मोदी की स्‍वीकार्यता को स्‍थापित करने के लिए दो बड़ी प्रतीकात्‍मक घटनाएं हुईं। गुजरात नरसंहार के विरोध में तत्‍कालीन एनडीए सरकार से समर्थन वापस खींच लेने वाले दलित नेता रामविलास पासवान की दिल्‍लीमें नरेंद्र मोदी से होने वाली मुलाकात और भारतीय जनता पार्टी को समर्थन; तथा अमेरिकी फासीवाद के कॉरपोरेट स्रोतों में एक प्‍यू रिसर्च सेंटरद्वारा जारी किया गया एक चुनाव सर्वेक्षण, जो कहता है कि इस देश की 63 फीसदी जनता अगली सरकार भाजपा की चाहती है। प्‍यू रिसर्च सेंटर क्‍या है और इसके सर्वेक्षण की अहमियत क्‍या है, यह हम आगे देखेंगे लेकिन विडंबना देखिए कि ठीक दो दिन पहले 25 फरवरी 2014 को न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस नामक एक कांग्रेस समर्थित टीवी चैनल द्वारा 11 एजेंसियों के ओपिनियन पोल का किया गया स्टिंग किस सुनियोजित तरीके से आज ध्‍वस्‍त किया गया है! ठीक वैसे ही जैसे रामविलास पासवान का भाजपा के साथ आना पिछले साल नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की उम्‍मीदवारी के खिलाफ नीतिश कुमार के एनडीए से निकल जाने के बरक्‍स एक हास्‍यास्‍पद प्रत्‍याख्‍यान रच रहा है।

न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस ने तो तमाम देसी-विदेशी एजेंसियों के सर्वेक्षणों की पोल खोल ही दी थी, लेकिन आज आए प्‍यू के पोल की स्‍वीकार्यता देखिए कि सभी अखबारों और वेबसाइटों ने उसेप्रमुखता से प्रकाशित किया है और कहीं कोई आपत्ति का स्‍वर नहीं है। दरअसल, ओपिनियन पोल की विधि और तकनीकी पक्षों तक ही उनके प्रभाव का मामला सीमित नहीं होता, बल्कि उसके पीछे की राजनीतिक मंशा को गुणात्‍मक रूप से पकड़ना भी जरूरी होता है। इसलिए सारे ओपिनियन पोल की पोल खुल जाने के बावजूद आज यानी 27 फरवरी को गोधरा की 12वीं बरसी पर जो इकलौता विदेशी ओपिनियन पोल मीडिया में जारी किया गया है, हमें उसकी जड़ों तक जाना होगा जिससे कुछ फौरी निष्‍कर्ष निकाले जा सकें।

एक पोल एजेंसी के तौर पर अमेरिका के प्‍यू रिसर्च सेंटर का नाम भारतीय पाठकों के लिए अनजाना है। इस एजेंसी ने मनमाने ढंग से चुने गए 2464 भारतीयों का सर्वेक्षण किया है और निष्‍कर्ष निकाला कि 63 फीसदी लोग भाजपा की सरकार चाहते हैं तथा 78 फीसदी लोग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं। विस्‍तृत जानकारी किसी भी अखबार की वेबसाइट से ली जा सकती है, लेकिन हमारी दिलचस्‍पी पोल पर से परदा उठाकर उसके पीछे छुपे चेहरों को बेनक़ाब करने की है। ध्‍यान दें कि सवा अरब के देश में महज़ ढाई हज़ार लोगों के इस सर्वेक्षण को जारी करने की तारीख चुनी गई 27 फरवरी, जिस दिन रामविलास और मोदी दोनों अपने जीवन का एक चक्र पूरा करने वाले हैं। क्‍या कोई संयोग है यह? कतई नहीं।

प्‍यू रिसर्च सेंटर वॉशिंगटन स्थित एक अमेरिकी थिंक टैंक है जो अमेरिका और बाकी दुनिया के बारे में आंकड़े व रुझान जारी करता है। इसे प्‍यू चैरिटेबल ट्रस्‍ट्स चलाता और वित्‍तपोषित करता है, जिसकी स्‍थापना 1948 में हुई थी। इस समूह में सात ट्रस्‍ट आते हैं जिन्‍हें 1948 से 1979 के बीच सन ऑयल कंपनी के मालिक जोसेफ प्‍यू के चार बेटे-बेटियों ने स्‍थापित किया था। सन ऑयल कंपनी का ब्रांड नाम सनोको है जो 1886 में अमेरिका के पेनसिल्‍वेनिया में बनाई गई थी। इसका मूल नाम पीपुल्‍स नैचुरल गैस कंपनी था। कंपनी के मालिक जोसेफ प्‍यू के सबसे बड़े बेटे जे. हॉवर्ड प्‍यू (ट्रस्‍ट के संस्‍थापक) 1930 के दशक में अमेरिकन लिबर्टी लीग की सलाहकार परिषद और कार्यकारी कमेटी के सदस्‍य थे और उन्‍होंने लीग को 20,000 डॉलर का अनुदान दिया था। यह लीग वॉल स्‍ट्रीट के बड़े अतिदक्षिणपंथी कारोबारियों द्वारा बनाई गई संस्‍था थी जिसका काम अमेरिकी राष्‍ट्रपति रूज़वेल्‍ट का तख्‍तापलट कर के वाइट हाउस पर कब्‍ज़ा करना था। विस्‍तृत जानकारी 1976 में आई जूलेस आर्चर की पुस्‍तक दि प्‍लॉट टु सीज़ दि वाइट हाउस में मिलती है। हॉवर्ड प्‍यू ने सेंटिनेल्‍स ऑफ दि रिपब्लिक और क्रूसेडर्स नाम के फासिस्‍ट संगठनों को भी तीस के दशक में वित्‍तपोषित किया था।

प्‍यू परिवार का अमेरिकी दक्षिणपंथ में मुख्‍य योगदान अतिदक्षिणपंथी संगठनों, उनके प्रचारों और प्रकाशनों को वित्‍तपोषित करने के रूप में रहा है। नीचे कुछ फासिस्‍ट संगठनों के नाम दिए जा रहे हैं जिन्‍हें इस परिवार ने उस दौर में खड़ा करने में आर्थिक योगदान दिया:

1. नेशनल एसोसिएशनऑफ मैन्‍युफैक्‍चरर्स: यह फासीवादी संगठन उद्योगपतियों का एक नेटवर्क था जो न्‍यू डील विरोधी अभियानों में लिप्‍त था और आज तक यह बना हुआ है।

2. अमेरिकन ऐक्‍शन इंक: चालीस के दशक में अमेरिकन लिबर्टी लीग का उत्‍तराधिकारी संगठन।

3. फाउंडेशन फॉर दि इकनॉमिक एजुकेशन: एफईई का घोषित उद्देश्‍य अमेरिकियों को इस बात के लिए राज़ी करना था कि देश समाजवादी होता जा रहा है और उन्‍हें दी जा रही सुविधाएं दरअसल उन्‍हें भूखे रहने और बेघर रहने की आज़ादी से मरहूम कर रही हैं। 1950 में इसके खिलाफ अवैध लॉबींग के लिए जांच भी की गई थी।

4. क्रिश्चियन फ्रीडम फाउंडेशन: इसका उद्देश्‍य अमेरिका को एक ईसाई गणराज्‍स बनाना था जिसके लिए कांग्रेस में ईसाई कंजरवेटिवों को चुनने में मदद की जाती थी।

5. जॉन बिर्च सोसायटी: हज़ार इकाइयों और करीब एक लाख की सदस्‍यता वाला यह संगठन कम्‍युनिस्‍ट विरोधी राजनीति के लिए तेल कंपनियों द्वारा खड़ा किया गया था।

6. बैरी गोल्‍डवाटर: वियतनाम के खिलाफ जंग में इसकी अहम भूमिका थी।

7. गॉर्डन-कॉनवेल थियोलॉजिकल सेमिनरी: यह दक्षिणपंथी ईसाई मिशनरी संगठन था जिसे प्‍यू ने खड़ा किया था।

8. प्रेस्बिटेरियन लेमैन: इस पत्रिका को सबसे पहले प्रेस्बिटेरियन ले कमेटी ने 1968 में प्रकाशित किया, जो ईसाई कट्टरपंथी संगठन था।

जोसेफ प्‍यू की 1970 में मौत के बाद उनका परिवार निम्‍न संगठनों की मार्फत अमेरिका में  फासिस्‍ट राजनीति को फंड कर रहा है:

1. अमेरिकन इंटरप्राइज़ इंस्‍टीट्यूट, जिसके सदस्‍यों में डिक चेनी, उनकी पत्‍नी और पॉल उल्‍फोविज़ जैसे लोग हैं।

2. हेरिटेज फाउंडेशन, जो कि एक नस्‍लवादी, श्रम विरोधी, दक्षिणपंथी संगठन है।

3. ब्रिटिश-अमेरिकन प्रोजेक्‍ट फॉर दि सक्‍सेसर जेनरेशन, जिसे 1985 में रीगन और थैचर के अनुयायियों ने मिलकर बनाया और जो दक्षिणपंथी अमेरिकी और ब्रिटिश युवाओं का राजनीतिक पोषण करता है।

4. मैनहैटन इंस्टिट्यूट फॉर पॉलिसी रिसर्च, जिसकी स्‍थापना 1978 में विलियम केसी ने की थी, जो बाद में रीगन के राज में सीआइए के निदेशक बने।

उपर्युक्‍त तथ्‍यों से एक बात साफ़ होती है कि पिछले कुछ दिनों से इस देश की राजनीति में देखने में आ रहा था, वह एक विश्‍वव्‍यापी फासिस्‍ट एजेंडे का हिस्‍सा था जिसकी परिणति ऐन 27 फरवरी 2014 को प्‍यू के इस सर्वे में हुई है। शाह आलम कैंप की की भटकती रूहों के साथ इससे बड़ा धोखा शायद नहीं हो सकता था। यकीन मानिए, चौदहवीं लोकसभा के लिए फासीवाद पर अमेरिकी मुहर लग चुकी है।

(समकालीन तीसरी दुनिया के मार्च अंक में प्रकाशित होने वाले विस्‍तृत लेख के मुख्‍य अंश)

रणेन्द्र का नया उपन्यास गायब होता देश

Posted by चन्द्रिका on 2/26/2014 02:21:00 PM



रणेन्द्र का नया उपन्यास गायब होता देश  कुछ ही दिनों में पाठकों के बीच होगा. उनके लेखन की अपनी विशेषताएं हैं जो छोटी-छोटी चीजों से बुनती हुई एक बड़े संदर्भ को इंगित करती हैं. आने वाला उपन्यास गायब होता देश  ऐसे ही कई छोटी-छोटी कथाओं की एक बड़ी कथा है. उपन्यास के कुछ विशेष संदर्भों पर कवि अनुज लुगुन की टिप्पणी.

एक समय था जब शहर, गलियों, गाँवों, चौराहों में जादूगरों की चर्चा खूब होती थी. बच्चे से लेकर बड़े-बूढ़े इसी चर्चा में मशगूल होते थे कि फलां जादूगर ने कल के करतब में फलां को गायब कर दिया या फलां जादूगर की जादूगरी के आगे किसी का कुछ नहीं चल सकता. ऐसे ही बहुत सारे चर्चे.. बहुत सारी किवंदंतियाँ.. इत्यादि-इत्यादि. लेकिन अब वह दौर चला गया अब कोई ही है जो इस तरह की बातें करता हो. ऐसे समय में रणेंद्र का उपन्यास “गायब होता देश” आश्चर्य में डालता है कि क्या इसके माध्यम से वे कोई जादू कथा कहने वाले हैं..!! या कोई जादुई करतब दिखने वाले है?

निस्संदेह आज जादूगरों की कला नहीं रही, लेकिन यह कहना कि आज जादूगर नहीं हैं यह उचित नहीं है. हो सकता है पी.सी. सरकार की तरह जादू को कला या खेल मानने वाले जादूगर नहीं हों लेकिन जादूगर आज भी हैं. जिस तरह जादू के खेल में जादूगर की कलात्मक सफाई को समझ पाना या पकड़ पाना मुश्किल और समझ से परे होता था उसी तरह आज के जादूगरों को समझ पाना और उनकी कलाकारी को पकड़ पाना मुश्किल है. आज के ये जादूगर कौन हैं ..? इनका चेहरा कैसा है? और उनकी पहचान कैसी हो.? और वे किसे गायब कर रहे हैं..? रणेंद्र अपने उपन्यास ‘गायब होता देश’ में यही बताने की कोशिश करते हैं.

झारखण्ड के मुंडा आदिवासियों को केंद्र में रख कर लिखा गया यह उपन्यास (गायब होता देश) सम्पूर्ण आदिवासी समाज के संकट की ओर ध्यान खींचता है. पूंजीवादी विकास की दौड़ में शामिल लोग कैसे तरह घास की तरह एक मानव समुदाय को चरते जा रहे हैं ‘गायब होता देश’ इसी की मार्मिक कहानी है. इस घास को चरने में आज का हर वह मनुष्य शामिल है जो इस पूंजीवादी समाज की आपा-धापी और भागदौड़ में शामिल है. इसमें हम भी हैं आप भी हैं. हम वैचारिक धरातल पर बहस करते हुए बाजारवाद, साम्राज्यवाद और पूंजीवाद का घोर विरोध करते हैं लेकिन विडंबना यह है कि उसी के दाना-पानी से जीवित हैं. इस दौर में अगर कोई इस दाना-पानी से बचा है तो वह है आदिवासी समाज. इसलिए आज आदिवासी समाज को सबसे ज्यादा प्रलोभन देने की कोशिश जा रही है कि वह भी उस जाल में फंस जाय और उसके पास मौजूद जल, जंगल, जमीन को उन्हें ‘विकास’ के नाम पर सौंप दे. यह ‘विकास’ मछली को फंसाने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाली चारे की तरह है. जो इस चारे में नहीं फंसना चाहता है वह ‘विद्रोही’ मान लिया जाता है. उपन्यास में ऐसे भी विद्रोही हैं जिन्हें सरकारी भाषा में ‘नक्सली’ कहा जाता है. एक ओर आदिवासी समाज पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ संघर्ष कर रहा है वहीँ दूसरी ओर बाजारवाद ने अपनी गिरफ्त में बहुत तेजी से आदिवासी समाज के एक हिस्से को भी ले लिया है, यह आदिवासी समाज का कुछ पढ़ा-लिखा मध्य वर्ग है और वह अपने हित के लिए बाजार की चका-चौंध में आदिवासियों को भी घसीट लेना चाहता है. 

ऐसे विकट समय में जब उससे निर्णायक भूमिका की अपेक्षा थी उस पर वह खरा नहीं उतर रहा है. कुछ मध्यवर्गीय विसंगतियों में फंस गए हैं तो कुछ उससे ही लाभ लेने का अवसर देख रहे हैं. ऐसी परिस्थिति में कुछ गैर आदिवासी लोग भी हैं जो आदिवासियों के संघर्ष को पहचानते हैं और उनके साथ शामिल हैं. उपन्यास में किशन विद्रोही ऐसे ही पात्र है. आदिवासी समाज के बुद्धिजीवी के रूप में सोमेश्वर पहान हैं, जो पूंजीवादी व्यस्था के विकल्प के रूप में आदिवासी समाज-व्यवस्था को मजबूत बनाना चाहते हैं. इस दिशा में लेखक की यह खोज बहुत महत्वपूर्ण है कि वह आदिवासी समाज में मौजूद विकल्प को पहचानते हैं और उसके लिए संघर्ष में सोमेश्वर पहान, नीरज, सोनामनी दी और अनुजा पहान के साथ हैं. वर्तमान समाज जिस तरह से संपूर्ण धरती के लिए संकट बना हुआ है ऐसी परिस्तिथियों में एकमात्र आदिवासी समाज के पास ही वे सारे ‘टूल्स’ मौजूद हैं जिससे इस धरती को बचाया जा सकता है. नहीं तो एक दिन इस धरती से नदी, जंगल, पहाड़ पेड़-पौधे सब एक बारगी विलुप्त हो जायेंगे. आदिवासी सामाज की इन विशेषताओं का उल्लेख करते हुए लेखक कभी भी मुग्ध नहीं होते बल्कि उसके अन्दर मौजूद अंतर्विरोधों को भी खोल कर सामने रखते हैं. आदिवासी समाज के भी अपने सामाजिक अन्तर्विरोध हैं. इन अंतर्विरोधों को उपन्यास की स्त्री-पात्र अनुजा पहान उद्घाटित करती है उससे संघर्ष करती है. लेकिन ऐसा करते वक्त लेखक कभी-कभी अपने बाहरी समाज के प्रभाव में भी होते हैं जिससे कुछ चीजों का अनावश्यक अतिक्रमण होता हुआ भी प्रतीत होता है. उपन्यास में अनुजा पहान जब स्त्री अधिकार के लिए बहस करती है तो ऐसा ही लगता है कि लेखक वर्तमान स्त्री विमर्श को भी शामिल करना चाहता है. आदिवासी समाज में स्त्रियों की स्थिति पर बात होनी ही चाहिए लेकिन जिस रूप में उपन्यास में स्त्री के सन्दर्भ से बात उठायी गयी है वह पूरी तरह वर्तमान मुख्यधारा की अवधारणा पर आधारित होती है. तब लगता है लेखक आदिवासी समाज को बाहर से देख रहा है और तब वह मुण्डा आदिवासी समाज, स्त्री और संपत्ति के संबंध को व्याख्यायित नहीं कर पाता है. इसी सन्दर्भ में अनुजा पहान कहती है कि – ‘मुंडाओं के जीवन के बारे ‘सेन गे सुसुन. काजी गे दुरंग’ (चलना ही नृत्य, बोलना ही गीत) की बात तो बहुत गर्व से कही जाती है लेकिन उसकी अगली कड़ी ‘दुरी गे दुमंग’ (नितम्ब ही मांदल) को जान बूझकर छोड़ दिया जाता है “और वह कहती है कि यह अश्लील और स्त्री विरोधी है. जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है ‘दुरी दुमंग’ भी है लेकिन वह अपनी डूरी है न कि किसी दूसरे की या किसी स्त्री का और यह कहावत पूरी तरह से आदिवासी समाज के राग-पक्ष को दर्शाता है. यहाँ ‘नितम्ब’ से आशय लेकर पूरी व्याख्या बदल दी गई है. जबकि आमतौर पर आदिवासी समाज में उस रूप का दिखना स्वाभाविक हो जाता है जब गीत गाये जा रहे हों और नृत्य का माहौल बन रहा हो लेकिन वाद्य यंत्र/मांदल की अनुपस्थिति हो. ऐसी स्थिति स्त्री या पुरुष कोई भी मांदल के रूप में अपने शरीर के ही हिस्से को बजाने का स्वांग करता है. इन सबके बावजूद उपन्यासकार ने पूरी कोशिश की है कि आदिवासी जीवन का यथार्थ खुल कर उभर आए.

इक्यावन छोटे-छोटे अध्यायों में विभाजित (और अधिकतर किशन विद्रोही की डायरी की शक्ल में) इस उपन्यास के पहले अध्याय में ही (गायब होता देश, जिसके नाम से शीर्षक रखा गया है) सूत्र की तरह बात स्पष्ट हो जाती है 
“सरना-वनस्पति जगत गायब हुआ, मरांग-बुरु बोंगा, पहाड़ देवता गायब हुए, गीत गाने वाली, धीमे बहने वाली, सोने की चमक बिखेरने वाली, हीरों से भरी सारी नदियाँ जिनमें ‘इकिर बोंगा’- जल देवता का वास था, गायब हो गई. मुंडाओं की बेटे-बेटियाँ भी गायब होने शुरू हो गये. ’सोना लेकन दिसुम’ गायब होने वाले देश में तब्दील हो गया.”

यह पूरे उपन्यास का सूत्र है. मुंडा आदिवासी जीवन पर बाहरी समाज का प्रभाव और उसके बीच मुंडाओं के जीवन का द्वन्द और संघर्ष, उत्पीड़न, इन सबके माध्यम से लेखक उपरोक्त सूत्र की व्याख्या प्रस्तुत करते हैं. इसके लिए लेखक केवल वर्तमान मुंडा जीवन की ही यात्रा नहीं करते हैं बल्कि मुंडाओं के इतिहास और दर्शन की लम्बी यात्रा के बाद वे उपर्युक्त निष्कर्ष पर पहुँचते हैं. इस यात्रा में लेखक मुंडा जीवन के अनछुए पहलुओं को बहुत ही रोचकता के साथ प्रस्तुत करते हैं. छैला सन्दू जैसे मुंडा लोककथाओं के माध्यम से कहानी और भी पुष्ट होती है. लेखक द्वारा मुंडारी (आदिवासी) चिकित्सा पद्धति “होड़ोपैथी” का खासतौर से उल्लेख करना आदिवासी समाज व्यवस्था के प्रति उनकी जानकारी का संकेत है. वरन, बाहरी समाज तो आदिवासी समाज के बारे में टोना-टोटका और जादुई तिलस्मी बातों का ही प्रोपेगंडा करता है, जबकि आदिवासियों की अपनी निश्चित चिकित्सा पद्धति रही है जो किसी भी आधुनिक चिकित्सा पद्धति से कम नहीं है.

आदिवासियों के अस्वीकार एवं प्रतिरोध को ‘आधुनिकता’ विरोधी कहा जाता है और जैसे ही ‘आधुनिक’ पद कहीं प्रयुक्त होता है ‘सभ्य-सुशील’(?) लोग अपना ‘कॉलर’ संभालने लगते हैं कि कहीं वे पिछड़े और पुरातन न मानें जाएँ. इस प्रवृत्ति की वजह से वे आदिवासी समाज के साथ खुल कर नहीं आते हैं. जो भी इनके साथ होना चाहते हैं या होते हैं वे अपनी शर्तों और उसुलों के साथ आदिवासियों के साथ होते हैं और उन्हें अपना ही पाठ पढ़ाने लगते है लेकिन रणेंद्र ऐसा नहीं करते बल्कि वे आदिवासी समाज की वैज्ञानिकता और उसकी आधुनिकता को तार्किकता के साथ सामने रखने की कोशिश करते हैं और जिसे ‘आधुनिक’ कहा जाता है उसके अमानवीय कृत्यों को उद्घाटित करते हैं. रणेंद्र मुंडा जीवन के संस्कारों की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए प्राक-इतिहास से भी पूर्व के इतिहास की खोज में जाते हैं और उस समय मौजूद ल्युमेरिया सभ्यता के अवशेषों, उसकी विशेषताओं के साथ मुंडा जीवन की समानता प्रस्तुत करते हुए हमारे सामने मानव इतिहास के विकास को देखने का भिन्न नजरिया प्रस्तुत करते हैं. उपन्यास में सबसे रोमांचक प्रसंग “मेगालिथों” का है. वे मेगालिथ पत्थर से जुड़ी ऐतिहासिकता की बात करते हुए जिन सन्दर्भों को उभारते हैं वह हतप्रभ करने वाला है. मुंडाओं कीं परंपरा और संस्कार में पत्थरों का बहुत अहम योगदान है. बिना पत्थर के मुंडाओं का कोई भी संस्कार संपन्न नहीं होता है. चाहे वह जन्म के समय हो या अंतिम समय में मृत्यु के दिनों में. कालांतर में ये पत्थर इतिहासकारों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हुए लेकिन आश्चर्य है कि ऐसे किसी भी स्रोत से न आदिवासी जीवन की वैज्ञानिकता साबित हो सकी और न ही उनके जीवन की प्रमाणिकता और उपन्यास में लेखक का यह महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है. वे मेगालिथों के द्वारा आदिवासी जीवन और दर्शन और उनकी वैज्ञानिकता की खोज करते हुए मिस्र के पिरामिडों और इंनका-अज्टेक सभ्यता की बनावट और उसकी संरचना की व्याख्या करते हुए जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं वह अविश्वसनीय प्रतीत होता है लेकिन इसके लिए वे जो तर्क रखते हैं उसे खारिज नहीं किया जा सकता है. वे लिखते हैं
 “हर मेगालिथ –ससनदिरी –विददिरी न मातृ पहाड़ी से बल्कि अन्य दिरी (चट्टान), पवित्र सरना, जलाशय के साथ अदृश्य संबंधों के आधार पर अपनी ऊर्जा द्विगुणित-चतुर्गुणित करते रहते हैं. इस प्रकार ये दिरी धरती के नाभि क्षेत्र में तब्दील हो जाते हैं....”

इसी तरह निम्न कथन से यह स्पष्ट होता है कि किस तरह सांस्कृतिक औपनिवेशिकता का दौर भी चला है और सबसे ज्यादा आदिवासी उसके शिकार हुए– “दरअसल मिस्र के पिरामिडों और इंका-अज्टेक के पहाड़ी के सामान ऊंचे पूजा स्थलों की तरह हमारे लेमुरियन पुरखों ने दिरियों की न जाने कितनी अद्भुत संरचनाएं खड़ी की होंगी इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है. क्योंकि यूरोप के कथित सभी लोगों ने अपने मेगालिथ संरचनाओं को नष्ट कर उन्हीं जगहों पर ग्रीक मंदिर बनाए जो समय की धारा में रोमन मंदिरों में तब्दील हुए फिर चर्चों में....यहाँ हिन्दुस्तान में जहाँ की सहिष्णु सभ्यता के डंके पीटे जाते हैं प्राचीन मेगालिथों की जगह पहले बौद्ध –जैन मंदिर बने फिर वे हिन्दू मंदिर में बदले गये. चाहे वह वेणीसागर-देवघर किचिंग के शिव मंदिर हों या रजरप्पा-तारापीठ के देवी मंदिर.” इस तरह की व्याख्या के द्वारा वे गहरी सांस्कृतिक राजनीति की पड़ताल करते हैं. उपन्यास के पात्र एवं मुंडाओं के बुद्धिजीवी सोमेश्वर पहान इसके बारे में विशेष जानकारी रखते हैं. आदिवासी समाज में वैज्ञानिकता की खोज के मामले में यह भिन्न उपन्यास है.

आज जिस पूंजीवादी आधुनिकता की वकालत की जा रही है वही आज का जादूगर है. उसी के काला जादू का परिणाम है कि आदिवासी समाज तेजी से विलुप्त हो रहा है. वर्चस्व की मानसिकता की वजह से एक ओर तो आदिवासी जीवन–दर्शन और संस्कृति को हमेशा हेय की दृष्टि से देखा गया वहीँ दूसरी ओर उनकी जमींन, उनका जंगल, उनका जीवन सब एक-एक कर “विकास” की भेंट चढ़ा दिया गया. उसकी जमीन पर कल-कारखाने और बड़े उद्योग बन रहे हैं, बड़े-बड़े चमकदार मॉल बन रहे हैं लेकिन उस जमीन के असली हकदार उसी की चमक में दफ़न हो रहे हैं और इस आधुनिकता की विडम्बना यह है कि इस पर राष्ट्रीय जश्न मनाया जाता है. इस उपन्यास में राजनीतिक और प्रशासनिक मिली-भगत से किस तरह झारखण्ड में भू-माफियाओं ने आदिवासियों की जमीन को कब्जाया और किस तरह जमीन हाथ से निकलते ही आदिवासियों की पहचान मिट जाती है, इसका बहुत बारीकी से विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है. आदिवासियों की जमीन से बेदखली, उनकी प्रताड़ना और धार्मिक-सांस्कृतिक रूप से उन्हें उपनिवेश बनाना, इन सभी बिन्दुओं पर लेखक ने न केवल गंभीरता से बहस प्रस्तुत किया है बल्कि आदिवासी जीवन-दर्शन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है.

वर्तमान आदिवासी जीवन अपनी पहचान के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है. वह वैश्वीकरण के नये-साम्राज्यवादी ताकतों का सबसे ज्यादा शिकार है और वही जमीन पर वास्तविक लड़ाई लड़ रहा है. इन सबके मद्देनजर साहित्य और विचार के क्षेत्र में इस प्रकार के चिंतन और बहस से उनके संघर्ष को और बल मिलेगा, उनका मनोबल बढ़ेगा. ध्यान देने की बात यह है कि यह ऐसी लड़ाई है जिसे अकेले नहीं जीता जा सकता है, तमाम लोकतांत्रिक और जनवादी ताकतों के समन्वय से ही इस चुनौती का सामना किया जा सकता है. अपने पहचान की संकट से जूझ रहे आदिवासी समाज को अपनी इस लड़ाई को बहुत आगे लेकर मानव की मुक्ति का प्रतिनिधि बनना होगा. आदिवासी समाज को चौतरफा संघर्ष करना है. एक ओर तो उसे उस मानसिकता से टकराना है जो उसे जंगली, असभ्य और नीच कहता है वहीँ दूसरी ओर साम्राज्यवादी ताकतों से. हाल के दिनों में झारखंड के आदिवासियों पर केन्द्रित रचनाओं और उसके रचनाकारों ने इस दिशा में सार्थक पहल की है. उपन्यास के रूप में ’ग्लोबल गाँव के देवता’ ने हजार साल पुरानी ‘असुर’ संबंधी मान्यताओं को तोड़ा है, वहीँ ‘मारंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ ने आदिवासी समाज से संबंधित भिन्न नजरिये को विकसित किया है. इस तरह की रचनाएं बहुत लिखी जा रही है फिर भी अभी बहुत लम्बी यात्रा तय करनी है और यह यात्रा तब तक अधूरी ही होगी जब तक आदिवासी समाज स्वंय इन बौद्धिक और वैचारिक मामलों पर ठोस हस्तक्षेप नहीं करेगा.

चलअ अपन राज बनावे हो: आरसीएफ का एक गीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/11/2014 01:00:00 AM


सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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