हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

विरोध प्रदर्शन: विष्णु शर्मा की कहानी/पहली किस्त

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/19/2014 12:22:00 AM


विष्णु शर्मा पत्रकार और कार्यकर्ता हैं. आजकल फेसबुक पर धारावाहिक कहानी लिख रहे हैं और बेहतर है कि इन कहानियों को अगर उसी धारा के साथ पढ़ा जाए. तो इसकी पहली किस्त.

जब सड़क के दायीं ओर से उसे कैलाश ने पुकारा तो आनंद को संबल मिला कि वह अकेला नहीं है। आज सुबह राजेश ने फ़ोन पर बताया था कि धरने पर आना है। कारण ? अजी छोड़िए, अब कोई कारण या कॉज देख कर धरने में जाता है क्या? शाम को जब आयोजक प्रेस रिलीज़ भेजेंगे तो पता चल ही जाएगा वह किस धरने का हिस्सा था। बहराल तो वह खुश था कि अकेला नहीं है।

जयपुर साहित्‍य उत्‍सव के विरुद्ध त्रैमासिक पत्रिका 'भोर' का वक्‍तव्‍य

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/18/2014 11:54:00 PM


साहित्य महोत्सव महज महोत्सव नहीं है और वे भी इस बात को छिपा नहीं रहे हैं। अगर यह सिर्फ महोत्सव होता तो मौखिक भर्त्‍सना ही काफी होती या महज उपेक्षा ही इनको मार देने के लिए पर्याप्त होती। अगर मकसद सिर्फ दुनिया भर के लेखकों का आपस में मिल कर मानवता के दुख पर बात करना होता तो भला किसे आपत्ति होती। हां, इतना ज़रूर कोई कह उठता कि मानवता के दुख पर बात करने के लिए ये हर बार जयपुर को ही क्यों चुनते हैं। और वहां भी बातचीत के लिए महल में क्यों जा बैठते हैं। या इसी तरह के कुछ और सवाल होते जिनसे बचने के लिए हो सकता है वे अपने कार्यक्रम में कुछ तब्दीली भी ले आते, लेकिन मामला सीधे तौर पर देखा जाए तो इतना भर ही नहीं है। यहां वे कार्यक्रमों में कुछ बदलाव लाकर कोई सुधार नहीं कर सकते क्योकि मामला बेहद गंभीर है और लेखकों के हाथ से बाहर है। क्योंकि वे खुद को आयोजकों के हाथों सुपुर्द किए होते हैं और सच पूछा जाए तो आयोजक की भी वहां कोई हैसियत नहीं होती बल्कि वह प्रायोजकों का कारिंदा भर होता है।

दरअसल, यह सारा खेल प्रायोजक का है जिसके पीछे उसकी अपनी सोची-समझी राजनीति है। लेकिन हम यह भी नहीं कह सकते कि जो लेखक वहां जाते हैं वे उनकी राजनीति का शिकार होते हैं क्योंकि इनमें से कई लेखकों के लेखन का आधार वही राजनीति होती है। ऐसे लेखक साहित्य में खुद को सही सिद्ध करने के लिए कॉर्पोरेट ताकत का सहारा लेने वहां जाते हैं जबकि जो कॉर्पोरेट ताकतें हैं वे विरोध के एकमात्र क्षेत्र साहित्य को अपने अनुकूल करना चाहती हैं, साथ ही अपनी छवि मानवीय और खुद को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रहरी के तौर पर स्थापित करना चाहती हैं। इसके अलावा ये कॉर्पोरेट ताकतें खुद को सही भी साबित करना चाहती हैं क्योंकि उनकी ताकत जिस पूंजी पर टिकी होती है उसका बहुत बड़ा भाग वे लूट, हत्या और दलाली से पैदा करती हैं। उनका तर्क होता है कि जिसका कहीं कोई विरोध नहीं होता वह सही होता है। इसलिए वे तमाम तरह के विरोध को या तो खरीदने की कोशिश करती हैं या उसे हमेशा के लिए खत्म कर देने की।

बहुत दिनों से जबकि एक ओर लोग इस बात को लेकर परेशान थे कि हिंदी साहित्य में आखिर कोई भी बड़ा साहित्यकार ऐक्टिविस्ट क्यों नहीं हुआ, वहीं दूसरी ओर कॉर्पोरेट ताकतें इस कमजोरी को सेंध लगाने के एक तैयार मौके के रूप में देख रही थीं। आज जो यह जयपुर साहित्य महोत्सव इतना विशाल दिख रहा है, उसके पीछे ऐसे आरामतलब साहित्यकारों की एक पूरी फौज का खड़ा हो जाना है जो नवमध्यवर्ग से आए हैं। यह नवमध्यवर्ग भूमंडलीकरण की देन है, और यह भूमंडलीकरण कॉर्पोरेट ताकतों की मानसिक उपज है जिसे दुनिया भर के शासक सच साबित करने पर न सिर्फ खुद तुले हैं बल्कि उन्हें भी उसने छूट दे रखी है कि वे अपनी ताकत भी अपनी इस मानसिक उपज को सच साबित करने में लगाएं।

कोई पूछ सकता है कि आखिर इन सबका अभिप्राय क्या है? तो जैसा कि ऊपर कहा गया, इन सबका एकमात्र मतलब अपनी लूट को बेरोकटोक बनाए रखना है, इसलिए वे तमाम सोचने वाले दिमागों को अपनी सोच के अनुकूल बनाना चाहते हैं। हालांकि उन्हें पता होता है कि चाहे वे जितनी भी ताकत लगाएं कई ऐसे लोग होंगे जो तब भी उनका विरोध करेंगे। ये तमाम बड़े कार्यक्रम किए ही इसलिए जाते हैं ताकि ऐसे विरोधियों को हाशिये पर फेंका जा सके, ठीक उसी तरह जैसे ये किसानों को फेंक देते हैं जब गांव के गांव हथियाने निकलते हैं; ठीक उसी तरह जैसे आदिवासियों को धकिया देते हैं जब जंगल के जंगल अपने कब्जे में करने का नक्शा कागज़ पर तैयार करते हैं। साहित्य का असल मकसद क्या है, उसे वे तय करना चाहते हैं जिसे वे स्वान्तः सुखाय से शुरू करते हैं। वे कई बार अपने यहां विरोध के स्वर को भी उठने देते हैं ताकि विरोधियों को लगे कि वह एक खुला मंच है और वे वहां जाने में कोई पाप न देखें। लेकिन यह मुआवज़े से ज्यादा कुछ नहीं होता है। जैसे वे किसानों को देते हैं, आदिवासियों को देते हैं, ठीक उसी तरह वे विरोधी विचारों को भी मुआवज़ा देने में कोई गुरेज़ नहीं करते। इस तरह वे विरोधी विचार को एक तरह से खरीद लेते हैं और उसकी धार को कुंद कर देते हैं। मुआवज़ा लेने के बाद जिस तरह किसान या आदिवासी अपनी ज़मीन या जंगल की लड़ाई जारी रखने का नैतिक अधिकार खो देता है, उसी तरह लेखक भी अपने विचार की लड़ाई फिर नहीं लड़ पाता।

भोर पत्रिका ऐसे किसी भी महोत्सव, समारोहों या आयोजनों की भर्त्‍सना करती है और तमाम साहित्यकारों से अपील करती है कि वे जयपुर साहित्य महोत्सव का बहिष्कार करें और अपनी भूमिका पर गंभीरता से विचार करें।

भोर पत्रिका की ओर से
रंजीत वर्मा और अंजनी कुमार द्वारा जारी

मुजफ्फरनगर: सांप्रदायिक फासीवादी राज्य की जारी हिंसा

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/17/2014 11:56:00 PM



मुजफ्फरनगर-शामली के राहत शिविरों की स्थिति पर डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन की प्रारंभिक रिपोर्ट

बागपत जिले के चित्तमखेड़ी से आईं महबूबा ने बिना इलाज के अपनी बच्ची को मरते हुए देखा है-महीने भर पहले. दो दिसंबर को उनकी बेटी को मलकपुर शिविर में ठंड लगी. अगले दिन उन्होंने पास के कैराना में डॉक्टर को दिखाया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. बुखार तथा उल्टी के बाद उनकी बच्ची चल बसी. 35 साल के अनवर के साथ भी ऐसा ही हुआ. बागपत से आए भड़ल के अनवर का बेटा महज 22 दिन जीवित रह सका. ठंड से बचाव की कोई सुविधा नहीं रहने की वजह से उसे न्यूमोनिया हुआ और इलाज की कमी से उसकी मौत हो गई. महबूबा और अनवर शिविरों में रह रहे उन 30 से ज्यादा व्यक्तियों में से हैं, पिछले कुछ महीने में जिनके बच्चों की मौतें ठंड के कारण और इलाज की कमी से हुई हैं.

हालांकि भारतीय राज्य और इसके अलग अलग हिस्सों की राय इस पर एकदम अलग है. उत्तर प्रदेश सरकार के गृह सचिव की राय में ठंड से किसी की मौत नहीं हो सकती. राहुल गांधी के मुताबिक विभिन्न शिविरों में रह रहे एक लाख से ज्यादा लोग आईएसआई के एजेंट हैं और मुलायम सिंह के मुताबिक कांग्रेस के. प्रशासन उन्हें सरकारी जमीन पर गैर कानूनी कब्जा करने और पेड़ों को काटने वाला अतिक्रमणकारी मानता है. लेकिन मुजफ्फरनगर और शामली के राहतशिविरों में रहते आए करीब एक लाख लोगों ने पिछले चार महीनों में जो कुछ देखा और सहा है, ऐसी सरकारी बयानबाजी उसका सिर्फ त्रासदी पूर्ण मखौल ही उड़ा सकती है. उन्होंने देखा है कि कैसे महज कुछ दिनों के भीतर मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत से एक लाख से ज्यादा मुसलमानों को उनके घरों से भागने पर मजबूर कर दिया गया जिन्होंने राहत शिविरों में पनाह ली. कम से कम 80 लोगों की हत्याएं कर दी गईं (यह सरकारी आंकड़ा है, स्थानीय लोगों के मुताबिक यह संख्या 130 से अधिक हो सकती है). गांवों में हत्याएं, मुसलमानों का भारी विस्थापन, औरतों के साथ बलात्कार, राहत शिविरों में बच्चों की मौतें, जनसंहार के अपराधियों द्वारा अब तक जारी धमकियां और इन सबके बावजूद अपनी जिंदगी और आजीविका के लिए लोगों का संघर्ष इस सांप्रदायिक-फासीवादी राज्य की एक और कड़वी सच्चाई है. एक तरफ जहां भाजपा पूरे गर्व से इस जनसंहार के अपराधियों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित कर रही है तो दूसरी तरफ सपा सरकार हमले की तरफ से आंखें मूंदे रहने के बाद अब हमलों से हुए वास्तविक नुकसान को नकार रही है. हमले की भयावहता और राज्य की भूमिका के संदर्भ में इसकी मिसाल सिर्फ 2002 के गुजरात से दी जा सकती है. अपने घरों से बेदखल कर दिए गए और राहत शिविरों में रह रहे लोगों के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए जेएनयू, बीएचयू, इलाहाबाद विवि और एक स्वतंत्र पत्रकार की 12 सदस्यों की एक टीम ने 4 जनवरी को शामली जिले के कुछ शिविरों का दौरा किया. हमने शिविरों में बदहाली से भरी हुई उन अमानवीय स्थितियों को देखा जिनमें लोग रह रहे हैं और उनसे बातें करते हुए उस आतंक को जाना, जो सरकार और राज्य के विभिन्न धड़ों की तरफ से उन पर पिछले कुछ महीनों से थोपा जा रहा है. लोगों की कहानियां धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों, के उत्पीड़न और व्यवस्थित रूप से उन्हें हाशिए पर धकेले जाने की कहानी है, जो यहां के कथित धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के झूठ को उजागर करती हैं.

4 जनवरी की सुबह एक स्थानीय दैनिक अमर उजाला की एक दिन पुरानी हेडलाइन ने हमें बताया कि ‘अपना पक्का मकान होते हुए भी इमदाद के लालच में’ शहर के परिवारों ने शिविर में डेरा डाल रखा है। जबकि सरकार इन राहत शिविरों को जबरन बंद कराने का अभियान चला रही है, ऐसी खबरें इस अभियान को जायज ठहरा रही थीं. लेकिन 2 डिग्री तापमान के आसपास फटे पुराने कपड़ों और प्लास्टिक की चादरों से बनाए हुए तंबू खुद इन खबरों के झूठ को उजागर करते हैं. असल में इन ‘राहत शिविरों’ में कोई भी सार्थक सरकारी राहत नहीं पहुंची है. बस कुछ अल्पसंख्यक संगठन ही हैं जो वहां थोड़ी बहुत सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं. मलकपुर के शिविर प्रभारी रईसुद्दीन बताते हैं कि सरकार इन्हें बस सिरदर्द मानते हुए इनसे छुटकारा पाना चाहती है.राहत पहुंचाने का काम कर रहे कुछ स्थानीय कार्यकर्ता बताते हैं कि सरकार ने कांडला और शामली में मदरसों की जमीन पर से भी शिविरों को जबरन हटा दिया है जो कि सरकारी जमीन पर नहीं थे. मलकपुर में, जहां 649 परिवार रह रहे हैं (शुरू में यहां 1300 परिवार थे), निवासियों ने हमें बताया कि पहले वे घर चलाने के लिए दिहाड़ी करने जाया करते थे, लेकिन जबसे शिविरों को हटाया जाने लगा है, उन्हें घर पर ही रुकना पड़ता है. इसी वजह से बच्चों को भी स्कूल जाने से रोक दिया गया है. लोगों को हमेशा सतर्क रहना पड़ता है. मर्द रातों को जाग कर सड़कों पर नजर रखते हैं. जिस दिन हम पहुंचे वह शिविरों को खाली करने के लिए सरकार द्वारा दिए गए अल्टीमेटम का आखिरी दिन था और उसके पहले वाली रात में पुलिस-प्रशासन मलकपुर शिविर को खाली कराने आया था. जब हम शिविर में थे, उस दौरान भी प्रशासन शिविर को खाली कराने आया था, लेकिन लोगों के विरोध से उसे लौट जाना पड़ा. शिविर हटा दिए जाने के हमेशा बने रहने वाले डर की वजह से लोगों को अपना रोजगार छोड़ना पड़ा है जिससे वे और बदहाल हुए हैं.

मुआवजे को सरकार शिविरों को खाली कराने के एक और तरकीब के रूप में इस्तेमाल कर रही है. लोगों ने बताया कि शिविर में रह रहे किसी भी व्यक्ति को मुआवजा नहीं मिला है. बाजिदपुर गांव की संजीदा ने कहा कि मुआवजा तो छोड़ दें, सरकार आज तक इससे इन्कार करती आई है कि बागपत जैसी अनेक जगहों पर कोई हमला हुआ था. जिन कुछेक लोगों को 5 लाख रु का मुआवजा मिला भी है, उन्हें एक हलफनामे (एफिडेविट) पर दस्तखत करने पड़े कि वे लौट कर अपने गांव या घर नहीं जाएंगे. साफ है कि इसके जरिए सरकार इन इलाकों में आबादी की संरचना में बदलाव करना चाहती है. हालांकि हमने यह भी पाया कि सरकार कुछ परिवारों को मुआवजे दे कर पूरे शिविर को हटाने की कोशिश कर रही है.लख गांव के मुस्तकीम ने बताया कि दो दिन पहले अधिकारियों ने उनसे आकर शिविर खाली करने को कहा क्योंकि उनके पिता को मुआवजा दिया जा चुका है. सरकार मुआवजे की बड़ी राशि को लेकर बड़े दावे कर रही है. लेकिन यह कितना खोखला है, मुस्तकीम की बातों से यह जाहिर होता है. सरकार घरों के आधार पर मुआवजा दे रही है. अगर एक घर में कई दंपती और उनके बच्चे हों तो यह मुआवजा भी नाकाफी साबित होता है. कई बार तो यह सिर्फ एक ही व्यक्ति को मिलता है और उसी घर के बाकी लोगों के हाथ कुछ नहीं आता, जबकि वे भी उतने ही तबाह हुए होते हैं. मुस्तकीम के पिता को मुआवजा मिला, लेकिन वे और उनके भाई (दोनों शादीशुदा हैं और उनके बच्चे हैं) को कुछ भी नहीं मिला और वे आज खाली हाथ हैं. उन्होंने हमें सरकारी अधिकारियों के साथ हुई बातचीत के बारे में बताया, ‘जब अधिकारियों ने मुझसे यह कहते हुए शिविर छोड़ने को कहा कि मेरे अब्बा को मुआवजा मिल चुका है, मैंने उनसे पूछा कि मैं अपने बच्चों को लेकर कहां जाऊं? उन्होंने मुझसे पास के जंगल में चले जाने को कहा. मैंने उनसे पूछा कि कहां, क्या हमें दूसरे देश चले जाना चाहिए?’

सुविधाओं के अभाव, ठंड, बीमारी और बदहाली के बावजूद लोग शिविर छोड़ कर नहीं लौटना चाहते तो इसकी सबसे बड़ी वजह लगातार मिलने वाली धमकियां, असुरक्षा की भावना और डर है. ‘हम गांव लौटने के बजाए सड़कों पर रह लेंगे. हमारे हत्या रे खुले घूम रहे हैं. वे हमें भी मार सकते हैं,’ बाजिदपुर की समीना बताती हैं. सरकार ने सुरक्षा देने का दिखावा तक नहीं किया है. मलकपुर शिविर में एक बुजुर्ग औरत कहती हैं कि उन्हें डर है कि फिर से हमला हुआ तो सरकार की उसमें भी मिलीभगत होगी. सरकारी की हमलावर सांप्रदायिक फासिस्टों के साथ मिलीभगत और उनकी सरपरस्ती लोगों के लिए बहुत साफ है. हमले के सारे मुख्य कर्ता-धर्ता अपने खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बावजूद खुलेआम घूम रहे हैं और उनका सार्वजनिक सम्मान तक किया जा रहा है. ऐसे में कैसे मुसलमानों से वापस लौट जाने की उम्मीद की जा सकती है? शिविर के एक और निवासी इरशाद ने इसे बहुत साफ शब्दों में कहा, ‘जब अपराधी खुले घूम रहे हैं वे जांच कैसे होने देंगे? वे खुद ही प्रशासन हैं, वे खुद ही अपराधी हैं.’ अनेक गांववालों ने एफआईआर तक दर्ज नहीं कराई क्योंकि इससे उन्हें गांव लौट कर जाने की जरूरत पड़ती. अनेक लोगों ने टीम को बताया कि जब वे गांव गए तो उन्हें धमकियों की वजह से लौट कर शिविर आना पड़ा. नूरपुर खुरगान शिविर में मो. दिलशाद ने बताया कि दो परिवार गांव के प्रधान के कहने पर कुरमल गांव लौटे लेकिन उन्हें शिविर लौट आना पड़ा क्योंकि प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के लोग पेट्रोल के साथ उन्हें धमकाने आए थे. काकडा, कुतबा-कुतबी और अनेक गांवों के निवासी जब अपने गांवों में सामान लेने के लिए लौटे तो पाया कि स्थानीय प्रभुत्वशाली तबकों और पुलिस द्वारा उनके घर जला दिए गए हैं, सामान लूट लिया गया है.

पिछले सितंबर में लोगों को जिस आतंक का सामना करना पड़ा, वह इतना भयावह है कि वे आने वाले समय में उसी जगह पर लौटने की सोच नहीं सकते. कई लोगों ने बताया कि कैसे डरावने तरीकों से गांवों में बूढ़ों और बच्चों को मारा गया. इन हमलों की एक विशेषता मुसलिम समुदाय की औरतों पर हुए यौन हमले भी थे. हालांकि शुरू-शुरू में लोग इन पर बात करने से हिचके लेकिन बाद में अनेक लोगों ने टीम को भयावह घटनाओं के ब्योरे दिए. अनेक महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुए, कइयों को निर्वस्त्र होकर शीशे के टुकड़ों पर नाचने को मजबूर किया गया. एक ग्रामीण ने एक औरत के बारे में बताया जिसे अगवा कर लिया गया और फिर उसका कुछ पता नहीं लगा. एक दूसरी महिला अपनी छोटी बहन को बीच से दो टुकड़ों में काट कर मार दिए जाने के बारे में बताया. जिन महिलाओं के साथ गांवों में यौन हिंसा हुई या जिन्होंने दूसरों के साथ ऐसा होते देखा वे इन शिविरों में अधिक महफूज महसूस करती हैं. यहां बस पुलिस का डर है लेकिन शिविरों के बीच सड़कों पर गश्त लगाते लोगों और कार्यकर्ताओं के कारण वे थोड़ी सुरक्षा महसूस कर पा रहे हैं. जो थोड़े से लोग रिश्तेदारों के यहां कोई बंदोबस्त करने में कामयाब हुए हैं, वे शिविर से चले गए हैं लेकिन अपने गांवों को कोई नहीं लौटा है. वैसे भी उनकी जो थोड़ी बहुत संपत्ति वगैरह थी, उस पर स्थानीय प्रभुत्वशाली तबके ने कब्जा कर लिया है और अब लौटने के लिए कुछ बचा नहीं है. लख गांव की वसीला पहले ईंट भट्ठे पर काम करती थीं. उन्होंने बताया कि हमलावर भीड़ ने उनके गहने लूटे, फिर 10 क्विंटल अनाज जला दिया और फिर घर में आग लगा दी. अब जबकि मुसलमान गांवों को लौट जाने में सक्षम नहीं हैं, एक नए तरह का घेट्टोकरण दिख रहा है- नया इस अर्थ में कि यह अब तक शहरों में होता आयाहै जो अब गांवों में भी फैल रहा है.

इन इलाकों में मुसलमानों पर हमला मुसलमानों को व्यापक तौर पर हाशिए पर धकेले जाने की ऐतिहासिक प्रक्रिया का ही हिस्सा है. शिविरों में रह रहे लोगों में एक छोटा सा हिस्सा कारीगरों, बुनकरों और दुकान चलाने वालों का था, बाकी के ज्यादातर लोग दिहाड़ी मजदूर हैं. वे या तो ईंट भट्ठों पर काम करते हैं या निर्माण कार्यों में या फिर यहां प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के गन्ने के खेतों में. उनमें बहुत कम के पास अपनी जमीन थी. दूसरी तरफ प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के पास, जिसने इन हमलों से सबसे ज्यादा लाभ उठाया, न केवल सबसे ज्यादा जमीन की मिल्कियत है बल्कि वे सूदखोर भी हैं जो 10 फीसदी की ऊंची दरों तक पर ब्याज वसूलते हैं.मिसाल के लिए कुरमल गांव के मो. दिलशाद ने 2003 में 40000 हजार रुपए एक जमींदार सूदखोर से लिए थे, जिसके बदले में उनपर 2006 में एक लाख 80 हजार रुपए की देनदारी थी. पैसा न चुका पाने की हालत में उन्हें जमींदारों के यहां बंधुआ मजदूर के रूप में काम करना पड़ता है, जो ज्यादातर मामलों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है. इस प्रभुत्वशाली तबके का कानूनी और साथ साथ कानून के बाहर की राजनीतिक-सामाजिक संगठनों पर पूरा कब्जा होता है-चाहे वह पंचायतों के सरपंच हों, मुखिया हों या प्रधान या फिर खाप पंचायतें हों. उनका पुलिस और स्थानीय प्रशासन पर पूरा नियंत्रण होता है. दिशलाद ने मुसलमानों द्वारा झेले जा रहे सामंती उत्पीड़न और हमले के डर के बारे में बताया, ‘अगर हम नए कपड़े पहनें तो वे हमें गाली देते हैं और सूअर कहते हैं. वे हमारे साथ गाली के बगैर बात ही नहीं करते...और तो और वे किसी को भी कभी भी गिरफ्तार करा सकते हैं.’ दिलशाद ने कहा कि यह शिविर तो उनके लिए ‘जन्नत’ है भले यहां दिक्कतें हैं लेकिन यहां जलालत और हमले का डर तो नहीं है.’

अपने प्यारों को खो चुके, अपनी आजीविका गंवा चुके और इन शिविरों में बदतरीन हालात में रहने को मजबूर कर दिए गए लोग अपनी मौजूदा हालत को ‘आजादी’ भरी बताते हैं. क्योंकि इंसानी जिंदगी की कीमत महज आजीविका से ही नहीं लगाई जा सकती. यह बुनियादी इंसानी इज्जत से भी बनती है, जिससे मुजफ्फरनगर के मुसलमानों को व्यवस्थित रूप से महरूम रखा गया. सिर्फ इन जनसंहारों के दिनों में ही नहीं, बल्कि उसके पहले के दशकों तक. वे जिस संपत्ति को, घरों, जगहों, मजहबी जगहों को छोड़ आए हैं, उन पर उसी सामंती प्रभुत्वशाली तबके ने कब्जा कर लिया है, जो हमलों के लिए जिम्मेदार है. जैसा कि शिविर में रह रहे शहजाद सैफी ने बताया, मुसलमानों को 20 साल पीछे धकेल दिया गया है. राठौड़ा गांव की एक दूसरी महिला का, जिसके परिवार के तीन मकान थे, कहना था, ‘इन घरों का फायदा क्या जब हमारी जिंदगियों पर खतरा बना रहता है...इसलिए हम यहां ठीक हैं भले हमारे पास कोई घर नही है.’ मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों में ये घटनाएं फिर से इसे साबित करती हैं कि सत्ता में चाहे कोई पार्टी रहे, किस तरह सांप्रदायिक फासीवाद उन सामाजिक संबंधों और उत्पीड़नकारी संरचनाओं का हिस्सा है, जिन पर यह भारतीय राज्य टिका हुआ.

अगले हफ्ते हम एक विस्तृत रिपोर्ट भी जारी करेंगे. दौरे पर गई टीम का हिस्सा थे: आश्वती, भावना, रजत, रेयाज, शामला, उफक, उमर (सभी डीएसयू, जेएनयू), मिशाब, अब्दुर्रहमान (एसआईओ, जेएनयू), नीरज (इन्कलाबी छात्र मोर्चा, इलाहाबाद विवि), शैलेश (भगत सिंह छात्र मोर्चा, बीएचयू) और चंद्रिका (स्वतंत्र पत्रकार)

किसकी चाय बेचता है तू

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/16/2014 05:39:00 PM


पेश है ब्रजरंजन मणि की यह कविता. अगर यह नहीं भी बताया जाए कि कविता किस पर लिखी गई है तो हजारों अल्पसंख्यक मुसलमानों के खून और बर्बादी से सने अपने चेहरे पर चाय बेचने वाले की मासूमियत ओढ़ कर प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाले इस शख्स को आप आसानी से पहचान सकते हैं. ब्रजरंजन मणि जाने माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. भारतीय समाज में जाति और प्रभुत्व तथा प्रतिरोध संबंधी उनकी दो किताबें प्रकाशित हुई हैं: Debrahmanising History: Dominance and Resistance in Indian Society तथा Knowledge and Power: A Discourse for Transformation.

अपने को चाय वाला क्यूँ कहता है तू
बात-बात पे नाटक क्यूँ करता है तू
चाय वालों को क्यों बदनाम करता है तू
साफ़ साफ़ बता दे किसकी चाय बेचता है तू !

खून लगाकर अंगूठे पे शहीद कहलाता है
और कॉर्पोरेट माफिया में मसीहा देखता है
अंबानी-अदानी की दलाली से 'विकास' करता है
अरे बदमाश, बता दे, किसकी चाय बेचता है तू !

खंड-खंड हिन्दू पाखंड करता है
वर्णाश्रम और जाति पर घमंड करता है
फुले-अंबेडकर-पेरियार से दूर भागता है
अरे ओबीसी शिखंडी, किसकी चाय बेचता है तू !

मस्जिद गिरजा गिराकर देशभक्त बनता है
दंगा-फसाद की तू दाढ़ी-मूछ उगाता है
धर्म के नाम पर बस क़त्ले-आम करता है
अरे हैवान बता तो, किसकी चाय बेचता है तू !

धर्मपत्नी को छोड़ कुंवारा बनता है
फिर दोस्त की बेटी से छेड़खानी करता है
काली टोपी और चड्डी से लाज बचता है
अरे बेशर्म, किसकी चाय बेचता है तू !

काली करतूतों से शर्म नहीं करता है
कोशिश इन्सान बनने की ज़रा नहीं करता है
चाय वालों को मुफ्त में बदनाम करता है
अरे मक्कार अब तो कह दे, किसकी चाय बेचता है तू !

अपने को चाय वाला क्यूँ कहता है तू
बात-बात में नाटक क्यूँ करता है तू
चाय वालों को क्यों बदनाम करता है तू
साफ़ साफ़ बता दे किसकी चाय बेचता है तू!

दिल्ली में संसदीय वामपंथियों का ‘आप’ राग !

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/09/2014 02:03:00 PM


रूपेश कुमार सिंह

अब जबकि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बन गई है और दिल्ली के 7वें मुख्यमंत्री के तौर पर अरविंद केजरीवाल ने गद्दी संभल ली है, तो इस पूरे चुनावी परिदृश्य में संसदीय वामपंथी पार्टियों की भूमिका का विश्लेषण एक बार फिर से जरूरी कार्यभार बन जाता है! हम थोड़ा सा पीछे लौटकर अन्ना आंदोलन की याद को अगर ताजा करें तो उस समय भी उस भ्रष्टाचार विरोधी उभार को हथियाने के लिए भाजपा से लेकर तमाम संसदीय वामपंथी पार्टियों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अन्ना के मंच से भाषण देने के लिए लालायित कॉमरेडों ने उस समय अपना पूरा जोर लगाया। जब राजघाट के मंच पर ये भाषण देने आए, इन्हें तब वहां जुटे अन्ना के अनुयायियों ने उन्हें हूट किया और उन्हें भाषण तक नहीं देने दिया गया! जब केजरीवाल ने पार्टी बनाई तो अन्य पार्टियों के तरह संसदीय वाम दलों ने भी कहा कि ‘ये पार्टी नहीं चलनेवाली!’ जब दिल्ली में केजरीवाल ने सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए और अपना लम्बा-चौड़ा घोषणापत्र जनता के बीच रखा तो इसे भी उन्होंने बकवास ही करार दिया और 5 वामपंथी पार्टियों (भाकपा, माकपा, भाकपा-माले लिबरेशन, फॉरवर्ड ब्लॉक, एसयूसीआई (सी)) ने अलग-अलग 20 सीटों से अपने उम्मीदवार भी खड़े किये! स्वाभाविक है, जिस क्षेत्र से इन्होंने अपने उम्मीदवार खड़े किये थे, वहां इन्होंने आप का विरोध भी किया होगा, लेकिन चुनाव परिणाम आते ही इनके सुर-ताल बदल गये !

वैसे अगर कहा जाये तो इस तरह का बदलाव कोई पहली घटना नहीं थी, इनका इतिहास ही अवसरवादिता का रहा है! ये बिहार में कभी लालू का विरोध करते हैं तो कभी समर्थन और नीतीश कुमार के साथ भी यही सलूक है इनका। यूपी में कभी मुलायम सिंह से गलबहियाँ करते हैं तो कभी इनके खिलाफ सड़क पर प्रदर्शन! खैर यहाँ हम दिल्ली के बारे में बात कर रहे हैं, दिल्ली में इनका गिरगिट क़ी तरह रंग बदलने का कारण, इन पार्टियों को मिले वोट से भी पता चलता है। माकपा को द्वारका, करावल नगर और शाहदरा में क्रमशः 684, 1199 और 121 वोट मिले, भाकपा को बाबरपुर, छतरपुर, मंगोलपुरी, नरेला, ओखला, पालम, पटपड़गंज, सीमापुरी, तीमारपुर और त्रिलोकपुरी में क्रमशः 794, 745, 789, 643, 660, 498, 362, 699, 637 और 476 वोट मिले, भाकपा-माले लिबरेशन को कॉन्डली, नरेला, पटपड़गंज और वजीरपुर में क्रमशः 203, 338, 146 और 172 वोट मिले, फॉरवर्ड ब्लॉक को किरारी और मुंडका में क्रमशः 173 और 175 वोट मिले और एसयूसीआई(सी) को बुराड़ी में 325 वोट मिले ! अब अगर हम इन सभी वोटों को एक साथ भी मिला दें तो वह संख्या आप को किसी एक सीट पर मिले वोटों की बराबरी भी नहीं कर सकेगी! इसलिए जैसे ही चुनाव का रुझान आप के पक्ष में आना शुरू हुआ, संसदीय वामपंथी पार्टियों के नेता और विचारकों का मूल्यांकन भी बदलने लगा! चुनाव परिणाम आने के बद तो हद ही हो गई, जब इनके महासचिवों ने प्रेस बेयान जारी कर केजरीवाल को भ्रष्टाचार विरोधी नायक के रूप में स्थापित करने की बेशर्मी भरी कोशिश शुरू कर दी, फिर क्या था, इनके विचारकों ने भी इनको आप से सीख लेते हुए अपनी नीतियों में तब्दीली लाने की सिफारिश की और सोशल साइटों पर आप के कशीदे काढ़ने शुरू कर दिए!

जबकि असलियत सभी जानते हैं कि केजरीवाल प्रसिद्ध एनजीओ कर्मी रहे हैं और आरक्षण विरोधियों के समर्थक भी! एनजीओ किस तरह से जनता को बरगलाता है, ये किसी से छुपा नहीं है और आप का पूरा घोषणापत्र या एजेंडा एक एनजीओ के तरह ही सुधारवादी घोषणाओं से भरा पड़ा है! आप आर्थिक नीतियो या फिर राज्य दमन के सवाल पर कुछ नहीं बोलती!

अंत में कुछ सवाल

भाकपा-माले लिबरेशन के दिल्ली राज्य सचिव संजय शर्मा ने 28 दिसम्बर को प्रेस बयान जारी कर कहा है ‘दिल्ली में शक्तिशाली तीसरी ताकत के रूप में ‘आप’ का उभार और आम लोगों के बुनियादी सवालों का राजनीति में केन्द्रीय एजेण्डा बन जाना स्वागत योग्य परिघटना है। ‘आप’ के उदय ने आन्दोलन आधारित राजनीति के महत्व को पुर्नस्थापित किया है, साथ ही यथास्थितिवादी राजनीति के पैरोकारों, खासकर कांग्रेस और भाजपा, के विकल्प के लिए आम जनता की तलाश को महत्वपूर्ण रूप से रेखांकित किया है। ‘आप’ के घोषणापत्र में दिल्ली के मेहनतकशों के बहुत से सवाल शामिल हैं, जिस कारण उन्हें इस तबके से महत्वपूर्ण समर्थन भी मिला."

ये बयान कई सवाल खड़े करता है:

1)    अगर ‘आप’ ने आम लोगों के बुनियादी सवालों को राजनीति के केन्द्रीय एजेंडे में ला दिया, तो अब तक आप क्या कर रहे थे कॉमरेड?

2) अगर "आप" ने आन्दोलन आधारित राजनीति के महत्व को पुनर्स्थापित किया है तो आपलोग आन्दोलन कर रहे हैं या नौटंकी?

3) "आप" की चुनावी सफलता की ओट में सुधारवादी कार्यनीति आपका प्रमुख एजेंडा तो नहीं बन जाएगा?

साल 2013 और प्रगतिशील हिंदी बुद्धीजीवियों की भूमिका

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/09/2014 01:59:00 PM


बीते साल में हिंदी के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की भूमिका पर रूपेश कुमार सिंह की यह टिप्पणी।

2013 में अगर हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील लोगों की सरसरी तौर पर समीक्षा की जाये तो एक पंक्ति में हम कह सकते हैं कि यह साल भी उतार और चढ़ाव का रहा, लेकिन अगर हम गहराई में जाकर देखते हैं तो पता चलता है कि किस तराह से इस साल में प्रगतिशीलता की धज्जियां उडायी गयीं, नामी-गिरामी साहित्यकारों द्वारा और दूसरी तरफ हम ये भी देखते हैं कि एक बड़ा समूह "सोशल साइट" के जरिये और भी विभिन्न तरिकों से एक जन पक्षधर भूमिका निभा रहा है! एक तरफ सरकार का दमनचक्र लेखकों, साहित्यकारो, संस्कृतिकर्मियों पर तेजी से चल रहा है तो दूसरी तरफ उस से भी तेजी से प्रतिरोध का स्वर विभिन्न तरीकों से तेज हो रहा है !

हमने देखा कि किस तरह से कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों को गीत गाने के जुर्म में प्रताड़ित किया जाता है, गिरफ्तार किया जाता है और इसके खिलाफ पूरे देश में संस्कृतिकर्मियों को सड़क पर उतरते भी देखा! जेएनयू के पूर्व छात्र और संस्कृतिकर्मी हेम मिश्रा की गिरफ्तारी का आलम भी देखा और व्यापक विरोध प्रदर्शन के बावजूद भी आज तक जेल में बंद हैं!

वही दूसरी तरफ, एक जमाने के प्रसिद्ध और प्रगतिशील साहित्यकारों, जिसके बदौलत आज वो चाँदी काट रहे हैं, का मानसिक दिवालियापन भी देखने को मिला। किस तरह से उन्होंने प्रगतिशील मूल्यों का कबाड़ा किया, इसके लिए एक घटना का उल्लेख जरूरी बनता है!

बिहार के चर्चित माफिया पप्पू यादव, जिसे पूर्णिया के माकपा विधायक अजित सरकार की हत्या के आरोप में निचली अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई थी, उन्होंने अपनी जेल यात्रा के दौरान एक किताब लिखी ‘द्रोहकाल का पथिक’ और जब उन्हें उच्च न्यायालय ने बरी कर दिया तो उनकी पुस्तक का लोकार्पण दिल्ली में जिनके हाथों हुआ, हिन्दी साहित्य के लिए वो बहुत ही शर्मनाक वाकया था। लोकार्पण समारोह में शामिल हुए प्रगीतिशीलता का लबादा ओढ़े नामवर सिंह, उदय प्रकाश, ओम थानवी और सियासी दल कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह, लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान, सपा प्रमुख मुलायम सिंह! लोकार्पण समारोह की सबसे बड़ी विशेषता रही नामवर सिंह का भाषण, जिसमें उन्होंने कहा कि 'पप्पू यादव वो शेर हैं, जो चीटियों के डर से रास्ता नहीं बदलते।" अब जबकि माकपा ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है, तो नामवर सिंह को जवाब तो देना होगा कि शेर अगर पप्पू यादव है तो चींटी कौन है?

दूसरा वाकया हमें तब देखने को मिला, जब यौन शोषण का आरोप लगने पर खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या कर ली। तब उनके प्रगतिशील साथियों ने जिस तरह से अपना रंग बदला वो भी अवसरवादिता के लिए याद रखा जाएगा। जो कल तक तेजपाल प्रकरण हो या फिर जस्टिस गांगुली प्रकरण, गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाते थे, अपने साथी पर आरोप लगने के बाद इन छद्म प्रगतिशीलों ने यौन शोषण की परिभाषा ही बदल दी ! कहा जाने लगा कि "हर समय महिलाएं सही ही नहीं होतीं और पुरुष गलत ही नहीं होते" ! प्रसिद्ध प्रगतिशील बुद्धिजीवी नीलाभ ने तो यहां तक कह दिया कि "क्या उस लड़की को पटक कर जबरदस्ती शराब पिलाई गयी थी?" ऐसे सवाल खुद उनकी प्रगतिशील मूल्यों पर ही सवाल नहीं उठाते?

2013 में घटी इन दोनों घटनाओं ने ये साफ कर दिया कि हमारे तथाकथित स्थापित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के लिए प्रगतिशीलता अब सिर्फ कमाने-खाने का साधन बन चुकी है और सत्ता क़ी चाकरी करना ही इनका काम हो गया है लेकिन वहीं दूसरी तरफ 2013 में हिन्दी साहित्य ने कठिन-कठोर जिंदगी जीने और जल-जंगल-जमीन क़ी लड़ाई लड़ने वालों से प्रेरणा लेते हुए कलम भी चलाई है और जनता क़ी जिंदगी क़ी जद्दोजहद क़ी लड़ाई में खुद को स्थापित करने क़ी कोशिश भी जारी है। 2013 में त्रैमासिक पत्रिका के रूप में भोर का आना भी एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी, जिन्होंने अपना बैनर ही रखा है ‘प्रतिरोध की संस्कृति के निर्माण के लिए’!

साल 2013 जहाँ हमें सिखाता है कि अब प्रगतिशील साहित्य सत्ता की चाकरी करनेवाले नामवर सिंह और अवसरवादी नीलाभ जैसे लोगों की मोहताज नहीं है, वहीं दूसरी तरफ हमें ये भी सिखाता है कि अगर चारों तरफ अंधेरा है तो कहीं उम्मीद की किरण भी है, कहीं प्रगतिशीलता के नाम पर ठगी है तो दूसरी तरफ जिंदगी की जद्दोजहद भी है !

‘उठाने होंगे अभिव्यक्ति के खतरे’ बोलते तो सब हैं, लेकिन ये खतरे उठाने के लिये कोई तैयार नहीं। वर्ष 2014 में हमें नये जोश और जज्बे के साथ जन पक्षधर लेखनी को और भी मजबूत करना होगा और छद्म प्रगतिशीलों को बेनकाब करने की चुनौती भी स्वीकर करनी होगी!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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