हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बेताल फिर उसी डाल पर

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/17/2014 07:57:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े

भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने मुंबई के जेवियर कॉलेज के छात्रों के खिलाफ एक लिखित चेतावनी जारी की, क्योंकि उन्होंने अपने वार्षिक आयोजन मल्हार में कबीर कला मंच की गायिका शीतल साठे को बुला लिया था. कबीर कला मंच पुणे के दलितों और मजदूर वर्गों के बीच काम करने वाला एक सांस्कृतिक संगठन है, जिसे राज्य ने नक्सलवादी संगठन के रूप में प्रचारित कर रखा है. महाराष्ट्र पुलिस ने ऐलान किया कि वे सुरक्षा मुहैया नहीं कराएंगे. इसके बाद शीतल को उस पैनल से अपना नाम वापस लेना पड़ा, जिसे 14 अगस्त को ‘इनविजबिलटी ऑफ कास्ट’ पर चर्चा करनी थी.

एक तरफ जबकि नरेंद्र मोदी, संप्रग दो के दौरान मनमोहन सिंह के नाकाम रहने के बाद, कांग्रस के नवउदारवादी विकास के एजेंडे को पूरा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ अपनी हैरान कर देने वाली जीत के नशे में मदहोश हजार सिरों वाले संघ परिवार ने इस तरह की बदमाशी भरी हरकतों के जरिए हिंदुत्व के अपने एजेंडे पर अमल शुरू कर दिया है. अगर इनमें से कुछ हरकतों को आने वाले विधान सभा चुनावों के लिए अपनाई गई एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा भी मान लिया जाए तब भी यह बात कही जा सकती है कि इनमें से ज्यादातर हरकते परिवार के घटकों के लिए बहुत ही स्वाभाविक हैं, जो मौजूदा राजनीतिक हालात में अपने सपने को पूरा होते हुए देख रहे हैं. यह उनके ‘हिंदू राष्ट्र’ को हासिल करने का मौका है, चाहे इसका जो भी मतलब हो. दिलचस्प बात यह है कि उनके सरसंघचालक मोहन भागवत के मुताबिक भारत पहले से ही एक हिंदू राष्ट्र है. उन्होंने यह तय कर दिया है कि यह देश हिंदुस्तान था और इस तरह यहां रहनेवाले सभी लोग हिंदू थे. अगर ऐसा है तब तो यह सवाल बनता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का अभियान तो पहले ही पूरा हो चुका है, या शायद यह शुरुआत से ही गलत समझ पर आधारित था. फिर इस संगठन के अस्तित्व के पीछे क्या तर्क है? क्या वे इसे भंग करके हमेशा के लिए रिटायर होने वाले हैं? भागवत को कम से कम यह तो करना ही चाहिए कि उन्हें संघ परिवार की बदमाशियों को आगे से बंद कर देना चाहिए कि कहीं वे मोदी की घातक कमजोरी और भाजपा के लिए आत्मघाती न बन जाएं.

हिंदुत्व और नवउदारवाद

हिंदुत्व और नवउदारवाद, इन दोनों एजेंडों का आपस में कोई विरोध नहीं है, बल्कि अगर उनको ठीक से साधा जाए तो वे एक दूसरे के पूरक हैं. एक दक्षिणपंथी कट्टरपंथी विचारधारा के रूप में हिंदुत्व वैश्विक रुझान का हिस्सा है, जिसका संबंध नवउदारवाद से है. दुनिया भर के अनेक विद्वानों ने नवउदारवाद और दक्षिणपंथी धार्मिक कट्टरतावाद के उभार के बीच रिश्तों को दर्ज किया है. हिंदुत्व की तरह नवउदारवाद के भी अनेक चेहरे हैं, जो इसकी बुनियादी अंतर्वस्तु को छुपाने का काम करते हैं. हिंदुत्व की बुनियादी अंतर्वस्तु को जिस तरह ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें बार बार आर्यवर्त के मिथकीय वैभव की दुहाई दी जाती है, नवउदारवाद को इसके अत्यंत व्यक्तिवादी और सामाजिक डार्विनवादी तौर तरीकों में देखा जा सकता है. इस तरह जनता की व्यापक बहुसंख्या के लिए नवउदारवाद ढांचागत और सांस्कृतिक संकट पैदा करता है. ऐसी स्थिति में यह व्यापक बहुसंख्या निजी स्तर पर किसी अदृश्य शक्ति में सुरक्षा खोजती है और सामूहिक रूप से किसी एक ‘अन्य’ की कल्पना करती है जो उसकी तकलीफों के लिए जिम्मेदार है. शासक वर्ग इस प्रक्रिया का फायदा उठाता है जिसे लोगों को बांटे रखने और उनका ध्यान भटकाए रखने की जरूरत होती है ताकि उसका खेल चलता रहे. मोटे तौर पर यही प्रक्रिया पिछले तीन दशकों के दौरान दुनिया के हर हिस्से में पुनरुत्थानवादी और कट्टरपंथी विचारधाराओं के उभार में निहित है.

हालांकि इस प्रक्रिया से सावधानी से निबटने की जरूरत होती है, वरना यह नागरिक उपद्रव भड़का सकती है और शांति को भंग कर सकती है, जबकि नवउदारवाद से फायदा उठा रहे तबके यानी कारोबारी समुदाय और मध्य वर्ग शांति चाहते हैं. मोदी ने जिस तरह गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला और नवउदारवादी सब्ज बाग में सफलतापूर्वक बदला है, इससे उन्होंने साबित कर दिया है कि वे इस प्रक्रिया के उस्ताद हैं. यह उनकी महारत की ही निशानी थी कि उन्होंने पूरे नवउदारवादी खेमे को इसके लिए तैयार किया कि वे उन्हें देश के सबसे बड़े पद के लिए अपनी पसंद के रूप में पेश करें. वे यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि जिन वर्गों ने उनमें निवेश किया है, उनके प्रति उनका क्या कर्तव्य है. इससे भी बड़ी बात है कि उनके सामने कोई विपक्ष नहीं है, जिसकी वजह से उन्हें जनता का और अधिक ध्रुवीकरण करने की जरूरत नहीं है. हालांकि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक की छोटी सी अवधि में जिस तरह की घटनाएं घटी हैं और संघ परिवार की तरफ से जिस तरह की बयानबाजी चल रही है, वह इसके संकेत देती हैं कि जरूरी नहीं कि संघ परिवार के 180 संगठन, मोदी के विचार से सहमत हों. ये वे संगठन हैं, जिनको जान बूझ कर अलग अलग सुरों में बोलने के लिए ही गढ़ा गया है. उनमें से अनेक पूरे उत्साह से अपना रंग ढंग दिखाएंगे, जिसमें वे माहिर हैं, और यह अनिवार्य रूप से मोदी की रणनीति के आड़े आएगा.

जनादेश की गलत समझ

संघ परिवार को समझना चाहिए कि जिन लोगों ने मोदी को भारी जीत दिलाई है, वे लोग इसके अपने भरोसेमंद जनाधार के बाहर के हैं. कुल वोटों में भाजपा की हिस्सेदारी 1998 से लेकर अब तक 22 फीसदी के आसपास स्थिर बनी रही थी. इस बार 9 फीसदी की बढ़ोतरी ने हालात बदल दिए. पिछले लोक सभा चुनाव में भाजपा के लिए 10.27 करोड़ लोगों ने वोट डाला था, जबकि इस बार के चुनाव में 17.15 करोड़ लोगों ने. इस बार बढ़े कुल 6.85 करोड़ वोटों में, पहली बार वोट डाल रहे लोगों के 4 करोड़ वोटों ने (कुल 10 करोड़ में से) इस भारी कामयाबी में बड़ी अहम भूमिका अदा की है. इन नौजवानों का वोट भाजपा के लिए उतना नहीं था, जितना मोदी के लिए था (पूरा चुनावी अभियान राष्ट्रपति प्रणाली की तर्ज पर किया गया) और उनका वोट हिंदुत्व के लिए भी नहीं था बल्कि मोदी द्वारा की जा रही विकास की बड़ी-बड़ी बातों के लिए था, जिसमें सांप्रदायिक सुर या तो नदारद था या फिर उसे हल्का रखा गया था. इन मतदाताओं को भरोसा था कि मोदी ने गुजरात में विकास किया है, बावजूद इसके कि यह उजागर हो गया था कि मोदी के अनेक दावों की तरह यह दावा भी झूठा था. ये नौजवान मतदाता और इस बार पाला बदलने वाले 2.85 करोड़ मतदाता भी जाहिर तौर पर हिंदुत्वपरस्त नहीं थे. उन्हें यकीन था कि मोदी तरक्की के लिए मौके निर्मित करेंगे, महंगाई को कम करेंगे, नौकरियां बढ़ाएंगे. बल्कि वे लोग भाजपा की सांप्रदायिकता को लेकर बहुत संदेह में भी थे. अगर मोदी अपने वादों को पूरा नहीं करते हैं तो वे अगले चुनाव में आसानी से उनकी लुटिया डुबो सकते हैं. इसी तरह कॉरपोरेट भारत ने मोदी की हिमायत में अपना खजाना खोल रखा था, और वह नहीं चाहेगा कि सांप्रदायिक टकरावों से निवेश का माहौल बिगड़े. उनकी नाखुशी भाजपा के लिए आखिरी झटका साबित हो सकती है, जिसका जोखिम उठाने की स्थिति में अभी वह नहीं है. इसलिए मोदी के लिए यह जरूरी होगा कि वे विकास पर ही ध्यान केंद्रित रखें, जिसे वे ज्यादा बढ़िया जानते हैं, जैसा कि उनके अब तक के व्यवहार ने साफ दिखाया भी है.

इससे जुड़ी हुई, भाजपा की भारी जीत की एक वजह असल में जान बूझ कर नरम रखा गया हिंदुत्व का सुर भी था. हालांकि किसी को यकीन नहीं था कि मोदी आरएसएस के एजेंडे को ताक पर रख सकेंगे. बल्कि सभी मौकों पर मोदी ने खुद ही इस एजेंडे के सुर में सुर मिलाया, लेकिन ऐसा उन्होंने इतनी सावधानी से किया कि यह विकास संबंधी उनकी बातों को नुकसान नहीं पहुंचा दे. लोगों ने इसे एक चुनावी खेल समझ कर इसकी अनदेखी की कर दी, जिसे सारे दल ही खेला करते हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि चुनावी नतीजों की उमंग में गलती से पूरे संघ परिवार ने इसे अपने हिंदुत्व के लिए दिया गया जनादेश समझ लिया है. इसने बड़ी आसानी से भुला दिया है कि भाजपा का वोट प्रतिशत अब भी महज 31 फीसद है जिसका मतलब है कि बाकी के 69 फीसदी मतदाता कम से कम इसके पक्ष में नहीं हैं. ऐसा नहीं लग रहा है कि हिंदुत्व का यह उभार पूरी तरह रणनीतिक है और थोड़े समय के लिए रहने वाला है, और जिसका मकसद महज आगामी विधानसभा चुनाव हैं. अगर यह रणनीतिक भी हो तब भी यह जोखिम भरा है, क्योंकि इसने कुछ ही महीनों पहले जोर-शोर से दिए जा रहे विकास के संदेश का खंडन कर दिया है. चुनाव के बाद भारत के हिंदू राष्ट्र होने का शोर शराबा कट्टरपंथी हिंदुत्ववादियों को भले खुश कर दे, लेकिन यह बाकियों को पूरी तरह अलग कर देगा जिन्हें यह महसूस होगा कि उन्हें पिछले चुनावों में धोखा दिया गया.

सांप्रदायिक झलकियां

मोदी की भाषणबाजी के केंद्र में विकास के बने रहने के बावजूद भाजपा ने चुनावों के पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को एक कला के रूप में विकसित किया जिसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में लाया गया. हालांकि मोदी विकास के अगुआ की बड़ी सावधानी से बनाई गई अपनी छवि से चिपके रहे, लेकिन मोदी को उत्तर प्रदेश में शानदार जीत दिलाने की सारी कलाकारी मोदी के विवेकहीन विश्वासपात्र अमित शाह की थी, जिनके ऊपर गुजरात में हत्या के अनेक मुकदमे चल रहे हैं. प्रवीण तोगड़िया ने चुनावों के ऐन बीच में अपने गुंडों से कहा कि वे भावनगर के हिंदू इलाकों से मुसलमानों को निकाल बाहर करें. हालांकि तोगड़िया की मोदी से अच्छी नहीं बनती, लेकिन वे विश्व हिंदू परिषद के मुखिया होने के नाते परिवार में अहमियत रखते हैं और अपनी तीखी जुबान और उजड्ड हरकतों के लिए बदनाम हैं. इसी तरह भाजपा के एक और नेता, बिहार के गिरिराज किशोर ने बेलाग-लपेट यह ऐलान किया कि मोदी का विरोध करने वालों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए. हालांकि कई बार भाजपा इस तरह की खुलेआम सांप्रदायिक और असमर्थनीय टिप्पणियों से खुद को अलग करते हुए बयान जारी करती रही है, लेकिन वो यह जानती है कि एक बार लोगों का ध्रुवीकरण करने का मकसद पूरा हो जाए तो फिर ऐसे बयानों की कोई अहमियत नहीं होती है.

चुनावी नतीजों के बाद, हिंदुत्व ब्रिगेड द्वारा सांप्रदायिक हमलों में एक तेजी आई है. खुद को हिंदू राष्ट्र सेना कहने वाले एक अनजान से संगठन ने, जिसका मुखिया एक पेशेवर अपराधी धनंजय देसाई है, पुणे में अपनी बाइक पर घर लौट रहे एक मुस्लिम नौजवान मोहसिन शेख की पीट-पीट कर हत्या कर दी. सहारनपुर, मुरादाबाद और मेरठ में सांप्रदायिक आग भड़काई गई. इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी चार किस्तों में छपी रिपोर्ट में खबर दी कि 16 मई को चुनावी नतीजे आने के बाद के 10 हफ्तों में उत्तर प्रदेश पुलिस ने छोटे-मोटे 605 सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की हैं. जाहिर है कि उत्तर प्रदेश अकेला राज्य नहीं है. जिन राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं, शायद उन सभी राज्यों में यही हो रहा है. इन खुलेआम सांप्रदायिक उपद्रवों के अलावा, माहौल को सांप्रदायिक रूप से गरमाए रखने के लिए भीतर ही भीतर विवादों को भी हवा दी जा रही है. मिसाल के लिए द्वारकापीठ शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने एक विवादास्पद बयान जारी किया कि शिरडी के साईबाबा भगवान नहीं बल्कि एक मुसलमान संत थे और हिंदुओं को उनकी पूजा नहीं करनी चाहिए. यह खुशकिस्मती की बात है कि इसपर उन्हें ही लेने के देने पड़ गए, लेकिन फिर भी इससे सांप्रदायिक उथल-पुथल तो मच ही गई.

भारत के हिंदुस्तान होने और सभी भारतीयों के हिंदू होने जैसी बातों को बचकाना कह कर खारिज किया जा सकता है और इसे फौरन हंस कर टाला जा सकता है, लेकिन एक राष्ट्र के रूप में भारत की बुनियादी अवधारणा के लिए यह बात एक संभावित खतरा है. यह 1990 के आसपास भाजपा के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के हास्यास्पद बयान का ही ताजा रूप है कि सभी भारतीय हिंदू थे; मुसलमान अहमदिया हिंदू थे, ईसाई क्रिस्टी हिंदू थे और जैन-सिख-बौद्ध तो वैसे भी हिंदू थे क्योंकि आरएसएस के मुताबिक उनके धर्म हिंदू धर्म के पंथ भर हैं. 16 अगस्त के द हिंदू ने यह मजेदार खबर दी है कि गोवा की सत्ताधारी पार्टी, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) के विधायक लावू मामलेदार ने कहा, ‘बिकिनी पहनना भारत के महाशक्ति बनने की आकांक्षाओं में बाधक है’ और उन्होंने राज्य के लिए ‘निजी और भुगताने करके इस्तेमाल में लाए जाने वाले बिकिनी बीचों (समुद्र तटों)’ के लिए एक बिजनेस मॉल भी पेश किया. इसके बाद एमजीपी से जुड़े कैबिनेट मंत्री सुदिन धवलीकर ने इसे दोहराते हुए बिकिनी और पबों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की. इसके बाद उनके भाई और प्रदेश के सहकारिता मंत्री दीपक धवलीकर ने कहा कि मोदी भारत को एक ‘हिंदू राष्ट्र’ बना रहे हैं. राज्य के उप मुख्यमंत्री फ्रांसिस डिसूजा (भाजपा) तो उनसे भी आगे निकल गए, जिन्हें यह मतिभ्रम है कि भारत ‘हिंदू राष्ट्र’ पहले ही बन चुका है और वे एक ‘ईसाई हिंदू’ हैं. लगभग इन्हीं दिनों फेसबुक इस्तेमाल करने वाले दो व्यक्तियों ने खुद को एक मामले में आरोपित पाया. गोवा पुलिस ने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने मोदी पर एक संभावित नस्ली सफाए का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया है और दीपक धवलीकर का एक फर्जी फोटो प्रसारित किया जिसमें वे गुलाबी बिकिनी पहने हुए हैं. हालांकि इसी पुलिस ने मुतालिक के खिलाफ नफरत से भरे बयान देने पर शिकायत दर्ज करने से इन्कार कर दिया, जिसने हिंदुओं को तलवार और भगवत गीता से खुद को हथियारबंद करने की मांग की थी.

हम इन्हें क्या मानेंॽ क्या ये महज बदमाशियां हैं या यह भाजपा की आत्मघाती सहज प्रवृत्ति हैॽ



अनुवाद: रेयाज उल हक

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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