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बीच सफ़हे की लड़ाई

‘...और मैं आखिरी सांस तक लड़ूंगा’ : समीह अल-कासिम

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/09/2014 10:55:00 PM

फलस्तीन के इन्कलाबी शायर समीह अल-कासिम को याद करते हुए

इन्हीं दिनों में, जब फलस्तीन की जनता पर एक और क्रूर इस्राइली हमला जारी है, फलस्तीन ने अपने इन्कलाबी शायर समीह अल-कासिम को खो दिया. 19 अगस्त को इस्राइल के रामेह में 75 वर्षीय अल-कासिम की कैंसर से मौत हो गई. अल-कासिम का जन्म 1939 में हुआ था और वे नौ साल के थे, जब 1948 में इस्राइल ने अपनी स्थापना के समय, सात लाख से ज्यादा फलस्तीनियों को उनकी जमीन से विस्थापित कर दिया और जिस जमीन पर वे पीढ़ियों से रहते आए थे, उस पर कब्जा कर लिया. नकबा के नाम से जाने जानेवाले इस नस्ली सफाए, जनसंहार और विस्थापन की बर्बादी के नजारे उनके चारों ओर थे और अल-कासिम ने नवंबर, 1948 को अपने जन्मदिन के रूप में याद रखने का फैसला किया. उनके मुताबिक, ‘मेरी सबसे पुरानी यादें नवंबर 1948 के हादसे की तस्वीरें ही हैं. मेरे विचार और तस्वीरें वहीं से फूटती हैं.’ यहीं से एक ऐसे शायर का विकास शुरू हुआ, जिसे आगे चल कर ‘प्रतिरोध के शायर’ के रूप में दुनिया भर में जाना गया. अल-कासिम का पहला काव्य संग्रह उन्नीस साल की उम्र में प्रकाशित हुआ. इसके बाद अल-कासिम ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. उनकी कविता और निजी जिंदगी राजनीति से गहराई से जुड़ती चली गई. अल-कासिम इस्राइल में रहने वाले एक अरबी मुसलमान थे, और हरेक इस्राइली नागरिक की तरह उन्हें भी अनिवार्य सैन्य सेवा में जाना था. लेकिन अल-कासिम ने इससे इन्कार कर दिया, जिसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा. यह 1960 की बात है. फिर तो घर में नजरबंदी और जेल का एक लंबा सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन अल-कासिम ने कभी समझौता नहीं किया. फलस्तीन की आजादी और इसके लिए फलस्तीनी जनता के अविराम संघर्ष के प्रति उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता दिनों दिन मजबूत होती गई. उन्होंने आगे चल कर इस्राइली कम्युनिस्ट पार्टी हदश की सदस्यता ली और 1967 में सिक्स-डे वार के दौरान फिर से गिरफ्तार कर लिए गए. अनेक बार उन्हें यातनाओं, खुफिया निगरानी, सेंसरशिप का निशाना भी बनाया गया. लेकिन अपने जीवन के आखिरी दिनों तक अल-कासिम एक ऐसी दुनिया के बारे में अपनी अडिग प्रतिबद्धता को दोहराते रहे, जिसमें ‘फलस्तीनी जनता आजाद होगी...अरब दुनिया एकजुट होगी...और पूरी दुनिया पर सामाजिक न्याय को जीत हासिल होगी.’

अल-कासिम, फलस्तीन से ही आनेवाले अरबी के एक और मशहूर शायर महमूद दरवेश के दोस्त थे और दरवेश तथा तौफीक जायद के साथ मिल कर कासिम ने एक फलस्तीनी पहचान को गढ़ने में बड़ी भूमिका निभाई. अल-कासिम की क्रांतिकारी शायरी की खासियत यह है कि वे सामूहिक इतिहास की कहानियों, यादों और सपनों को बड़ी गहनता से आपस में बुन कर एक ऐसी कविता की रचना करते हैं जो एक सामूहिक क्रांतिकारी कार्रवाई के लिए लोगों को एकजुट, गोलबंद और प्रेरित करती है. यही वजह है कि उनकी शायरी फलस्तीनी आजादी के संघर्ष का राष्ट्रगान बन गई. हालांकि अल-कासिम की अनेक मशहूर कविताओं का अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं में अनुवाद हुआ है, लेकिन उनकी ज्यादातर रचनाओं का अनुवाद होना बाकी है. अंग्रेजी में उनकी कविताएं दो किताबों में पढ़ी जा सकती हैं: इनमें से पहली सैडर दैन वाटर है जो उनकी कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद का पहला संकलन है. दूसरी किताब विक्टिम्स ऑफ ए मैप है, जिसमें महमूद दरवेश और अदूनिस के साथ अल-कासिम की कविताएं संकलित की गई हैं. अल-कासिम इस्राइल के हाइफा शहर में अरबी अखबार कुल अल-अरब के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत थे और एक अरबी प्रकाशन चलाते थे. हिंदी में उनकी कविताएं रामकृष्ण पाण्डेय के संपादन और अनुवाद के साथ प्रकाशित फलस्तीनी कविताओं के संकलन इंतिफादा में शामिल हैं. प्रस्तुत हैं अल-कासिम की कुछ कविताएं. अनुवाद समर खान और रामकृष्ण पाण्डेय का है.

राफाह के बच्चे

उसके लिए जो लाखों के जख्मों से होकर गुजरता है
उसके लिए जिसकी तोपों ने बागीचे के सारे गुलाब रौंद डाले हैं
जो रात में तोड़ता है खिड़कियों के शीशे
जिसने जला डाले हैं बागीचे और अजायब घर
और जो गाता है आजादी के नगमे
जिसने पीस डाला है चौराहों पर गा रही बुलबुलों को
जिसके जहाज बच्चों के ख्वाबों पर बम गिराते हैं
जो आसमान के इंद्रधनुषों को कुचल डालता है

आज की रात, नामुमकिन जड़ों से उभरे बच्चे तुमसे यह ऐलान करते हैं
आज की रात, राफाह के बच्चे कहते हैं:
‘बिस्तर की चादरों में नहीं गूंथी हैं हमने कभी चोटियां
नहीं थूका है कभी हमने लाशों पर, न ही कभी उखाड़े हैं उनके सोने के दांत
फिर क्यों छीनते हो तुम हमारा सोना और गिराते हो हम पर बारूदॽ
क्यों बनाते हो अरबी बच्चों को यतीमॽ
शुक्रिया, हजार बार शुक्रिया!
कि हमारी उदासी ने जवानी में कदम रखे हैं
और अब हम लड़ेंगे.’

दोपहर का कबूलनामा

मैंने बोया एक दरख्त
मैंने नफरत की उसके फलों से
मैंने चूल्हे में जलाईं उसकी डालियां
मैंने बनाई एक सारंगी
मैंने बजाई एक धुन

मैंने तोड़ दी सारंगी
मैंने खो दिए फल
भूल गया मैं धुन
मैंने...मातम मनाया उस पेड़ का.

शलोम

किसी और को गाने को अमन के गीत
दोस्ती और भाईचारे और मेल-मिलाप के गीत
किसी और को गाने दो कौवों के बारे में
कोई ऐसा जो मेरे गीतों में बरबादी का सोग मना सके
जो गा सके कबूतरखानों के मलबे पर मंडराते उस काले उल्लू के बारे में

किसी और को गाने दो अमन के गीत
जबकि खेतों से पुकारता है अनाज
कटाई करने वालों के गीतों की गूंज के लिए तरसता हुआ

किसी और को गाने दो अमन के गीत
जबकि उधर, कंटीले तारों की बाड़ के पीछे
अंधेरे के सीने में
तंबुओं के शहर दर्द से बोझिल हैं
उनके बाशिंदे
यादों का मर्ज दिल में छुपाए हुए
गम और गुस्से की बस्ती में गुजारते हैं दिन

जबकि उधर, हमारे लोगों में
मासूमों में, जिन्होंने किसी की जिंदगी को
कभी खरोंच तक नहीं लगाया
फूंक कर बुझाए जा रहे हैं जिंदगी के चिराग

और इसी बीच, यहां
कितने सारे आ जुटे हैं...इतने सारे लोग!
उनके बाप दादों ने कितना बोया था उनके लिए
और अफसोस कि दूसरों के लिए भी.
बरसों का यह दर्द, यह विरासत अब उनकी हुई!
इसलिए भरने दो भूखों को अपना पेट
और यतीमों को अदावत की दावत के
जूठन पर पलने दो
किसी और को गाने दो अमन के गीत
क्योंकि मेरे वतन में, इसकी पहाड़ियों और इसकी वादी में
अमन का कत्ल हुआ है.

(अनुवाद: समर खान)

एक दिवालिए की रिपोर्ट

अगर मुझे अपनी रोटी छोड़नी पड़े
अगर मुझे अपनी कमीज और अपना बिछौना बेचना पड़े
अगर मुझे पत्थर तोड़ने का काम करना पड़े
या कुली का
या मेहतर का
अगर मुझे तुम्हारा गोदाम साफ करना पड़े
या गोबर से खाना ढूंढ़ना पड़े
या भूखे रहना पड़े
और खामोश
इन्सानियत के दुश्मन
मैं समझौता नहीं करूंगा
आखिर तक मैं लड़ूंगा

जाओ मेरी जमीन का
आखिरी टुकड़ा भी चुरा लो
जेल की कोठरी में
मेरी जवानी झोंक दो
मेरी विरासत लूट लो
मेरी किताबें जला दो
मेरी थाली में अपने कुत्तों को खिलाओ
जाओ मेरे गांव की छतों पर
अपने आतंक का जाल फैला दो
इंसानियत के दुश्मन
मैं समझौता नहीं करूंगा
और आखिर तक मैं लड़ूंगा

अगर तुम मेरी आंखों में
सारी मोमबत्तियां पिघला दो
अगर तुम मेरे होंठों के
हर बोसे को जमा दो
अगर तुम मेरे माहौल को
गालियों से भर दो
या मेरे दुखों को दबा दो
मेरे साथ जालसाजी करो
मेरे बच्चों को चेहरे से हंसी उड़ा दो
और मेरी आंखों में अपमान की पीड़ा भर दो
इंसानियत के दुश्मन
मैं समझौता नहीं करूंगा
और आखिर तक मैं लड़ूंगा
मैं लड़ूंगा

इंसानियत के दुश्मन
बंजरगाहों पर सिग्नल उठा दिए गए हैं
वातावरण में संकेत ही संकेत हैं
मैं उन्हें हर जगह देख रहा हूं
क्षितिज पर नौकाओं के पाल नजर आ रहे हैं
वे आ रहे हैं
विरोध करते हुए
यूलिसिस की नौकाएं लौट रही हैं
खोए हुए लोगों के समुद्र से
सूर्योदय हो रहा है
आदमी आगे बढ़ रहा है
और इसके लिए
मैं कसम खाता हूं
मैं समझौता नहीं करूंगा
और आखिर तक मैं लड़ूंगा
मैं लड़ूंगा।

(अनुवाद: रामकृष्ण पाण्डेय)


हिब्रू शब्द शलोम का मतलब अमन होता है।  

समयांतर (सितंबर, 2014 से साभार)।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ ‘...और मैं आखिरी सांस तक लड़ूंगा’ : समीह अल-कासिम ”

  2. By Sanjay Verma on September 10, 2014 at 5:38 PM

    शानदार कविताएं, जानदार अनुवाद. आभार स्वीकारें.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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